आशंका में लिपटा अभिनन्दन

अड़सठवाँ गणतन्त्र दिवस सामने है। सरकारी स्तर पर की जानेवाली तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी हैं। परेड का अन्तिम पूर्वाभ्यास हो चुका है। सरकारी स्कूलों, कॉलेजों में ‘यह काम राजी-खुशी निपट जाए’ की चिन्ता छाई हुई है तो निजी स्कूल, कॉलेज ‘उसकी कमीज मेरी कमीज से उजली कैसे’ के तनाव में हैं। एक अखबार, घर-घर पर तिरंगा फहराने की, खुद ही ओढ़ी जिम्मेदारी पूरी करने में जुटा हुआ है। निजी संगठनों, संस्थाओं ने ध्वजारोहण के अपने-अपने पारम्परिक कब्जेवाले चौराहों पर झण्डा वन्दन के कार्यक्रम घोषित कर दिए हैं। राजनीति में जगह और पहचान बनाने के महत्वाकांक्षी, सम्भावनाखोजियों ने पहली बार किसी सार्वजनिक स्थान पर झण्डा फहराने के कार्यक्रम घोषित किए हैं। स्कूली बच्चे उत्साह और उल्लास से छलक रहे हैं किन्तु उनके माँ-बाप असहज, तनाव में हैं। 

दो दिनों से योजनापूर्वक पूरे कस्बे में घूम रहा हूँ। किन्तु तमाम कोशिशों के बाद भी कस्बे का बड़ा हिस्सा छूट गया है। किन्तु जितना भी घूमा हूँ, उतना ताज्जुब से भरता गया हूँ। चारों ओर, एक सामान्य दिन और सामान्य दिनचर्या। केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के लिए यह गणतन्त्र दिवस एक दिन (शुक्रवार) की छुट्टी लेकर चार दिनों की छुट्टी का अवसर बनकर सामने आया है। उनमेें से कुछ मेरे पॉलिसीधारक, अपने ‘देस’ चले गए हैं। राज्य सरकार के कर्मचारी उनसे ईर्ष्या कर रहे हैं। गण्तन्त्र दिवस का उल्लास कहीं नजर नहीं आ रहा। और तो और, अब तक वाट्स एप पर ग्रुप पर या व्यक्तिगत रूप से एक भी अभिनन्दन-बधाई सन्देश नहीं। सब लोग, तारीख बदलने के लिए शायद आधी रात की प्रतीक्षा कर रहे हैं। तब, भारतीय संस्कृति की दुहाई देनेवाले भी ‘अंग्रेजों से अधिक अंग्रेज’ बन कर ‘मुझसे अधिक देशभक्त कौन’ के प्रतियोगी भाव से टूट पड़ेंगे। जब 2017 का साल शुरु होनेवाला था तब 30 दिसम्बर को मोबाइल कम्पनी का सन्देश आया था कि मैंने थोक में एसएमएस करने का जो ‘पेक’ ले रखा है, उसका फायदा मुझे नहीं मिलेगा और 30 की आधी रात से लेकर पहली जनवरी की आधी रात किए जानेवाले एसएमएस का सामान्य शुल्क लिया जाएगा। लेकिन गणतन्त्र दिवस पर ऐसा सन्देश अब तक नहीं मिला है। 

मैं उल्लास तलाश रहा हूँ लेकिन मुझे या तो सामान्यता मिल रही है या निस्पृहता, उदासीनता। ‘गणतन्त्र’ के सबसे बड़े दिन पर ‘गण’ की यह निस्पृहता, उदासीनता मुझे चौंका भी रही है और असहज भी कर रही है। यह शिकायत तो मुझे बरसों से बनी हुई है कि अंग्रेजी शासन पद्धति अपनाने की वजह से ‘तन्त्र’ ने हमारे ‘गण’ पर सवारी कर ली है और हमारा गणतन्त्र केवल वोट देने की खनापूर्ति बनकर रह गया है। किन्तु इस बरस तो मुझे कुछ और ही अनुभूति हो रही है। इस बरस तो मुझे लग रहा है कि हमने गणतन्त्र का एक नया स्वरूप दुनिया को दे दिया है - एकाधिकारवादी गणतन्त्र या कि तानाशाहीवादी गणतन्त्र। 

देश की स्थितियाँ गणतान्त्रिक नहीं लग रहीं। अब तक ‘गण’ की उपेक्षा की जाती रही है। किन्तु लगता है, अब ‘गण’ की उपस्थिति ही या तो अनुभव नहीं की जा रही या फिर उसे अनावश्यक मान लिया गया है। इतना अनावश्यक कि उसकी चिन्ता करने की भी आवश्यकता अनुभव नहीं की जा रही। जनता जीए या मरे, यह तो मानो सोच का विषय ही नहीं रह गया है। कहने को सब समान हैं किन्तु कुछ लोग या कि एक तबका ‘समानों में अधिक समान’ हो गया है और सब कुछ इन ‘अधिक समानों’ की चिन्ता के अधीन किया जा रहा है। लोग अपना पैसा बैंक से अपनी इच्छानुसार नहीं निकाल पा रहे। शादी के लिए पैसा चाहिए तो पचास प्रमाण और खर्चे की सूचियाँ अग्रिम पेश करो। लेकिन गड़करियों, रेड्डियों को सब छूट है। नोटबन्दी के चलते दिहाड़ी मजदूर, अपनी मजदूरी छोड़ कर बैंक के सामने पंक्तिबद्ध हो मरने के लिए अभिशप्त कर दिया गया। किन्तु एक भी पैसेवाला, एक भी अधिकारी, एक भी धर्म गुरु, एक भी नेता, यहाँ तक कि एक भी पार्षद या पार्षद प्रतिनिधि एक भी दिन, किसी भी बैंक के सामने खड़ा दिखाई नहीं दिया। नोटबन्दी के चलते किसानों की उपज का मोल दो कौड़ी से भी गया-बीता हो गया, उन्हें अपनी उपज सड़कों पर फेंकनी पड़ गई लेकिन कोलगेट, लीवर के टूथ पेस्ट का या कि कोका कोला पेप्सी की बोतल का भाव एक पैसा भी कम नहीं हुआ। और तो और, ‘स्वदेशी’ की दुहाई देकर माल बेच रहे पतंजलि के बिस्कुट का भी भाव एक पैसा भी कम नहीं हुआ। 

बात इससे भी काफी आगे जाती दीख रही है। संविधानिक संस्थाओं को पालतू बनाने की कोशिशें सहजता से, खुले आम की जा रही हैं। नोटबन्दी जिस तरह से लागू की गई और उसके क्रियान्वयन में जो मनमानी बरती गई उसने भारतीय रिजर्व बैंक की व्यर्थता अत्यधिक प्रभावशीलता से रेखांकित की। इसके गवर्नर उर्जित पटेल की छवि एक फूहड़, देहाती विदूषक जैसी बन कर रह गई। न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर चल रही खींचातानी, प्रतिबद्ध न्यायपालिका की स्थापना का श्रमसाध्य यत्न अनुभव हो रहा है। सेना का राजनीतिक उपयोग अधिकारपूर्वक किया जा रहा है। आठ नवम्बर को, प्रधान मन्त्रीजी द्वारा नोटबन्दी के घोषित चारों के चारों लक्ष्य औंधे मुँह धूल चाट रहे हैं। यह सब हो रहा है किन्तु कहीं पत्ता भी नहीं खड़क रहा। बरबस ही डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की, कोई डेड़-दो बरस पहले, किसी समाचार चैनल की बहस में भाग लेते हुए कही बात याद आ रही - ‘अब आपातकाल की औपचारिक घोषणा की आवश्यकता नहीं रह गई।’

चारों ओर पसरी, बेचैन चुप्पी मानो मुखरित होने के लिए इधर-उधर देख रही है। प्रतिपक्षी राजनीतिक दल ऐसे समय अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराते हैं। लेकिन देश के तमाम प्रतिपक्षी राजनीतिक दलों की दाल पतली है। वे तो अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए ही जूझ रहे हैं। जिन्दा रहेंगे तो ही तो जनता की बात कर पाएँगे? उस पर नुक्ता यह कि एक भी दल में आन्तरिक लोकतन्त्र नहीं रह गया है। मूक जनता की जबान बनने की जिम्म्ेदारी निभानेवाले अखबार/मीडिया की दशा, दिशा अजब-गजब हो गई है। किसी जमाने में जनता को अखबार का वास्तविक स्वामी कहा जाता था और पाठकों की नाराजी अखबारों के लिए सबसे बड़ी चिन्ता होती थी। आज ऐसा कुछ भी नहीं है। अखबार/मीडिया ने मानो अपनी कोई नई भूमिका तलाश कर ली है।  सम्पादक के नाम पत्र स्तम्भ समाप्त कर दिए गए हैं और यदि किसी अखबार में है भी तो खानापूर्ति करते हुए। प्रकाशित होने वाले पत्र ‘कफन के अनुसार मुर्दा’ की तरह होते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया में तो दर्शकों/श्रोताओं की बात के लिए जगह शुरु से ही कभी रही ही नहीं। 

एक सन्तुष्ट गुलाम, आजादी का सबसे बड़ा शत्रु होता है। चारों ओर देखने पर मन में सवाल उठता है - देश ने आत्मीय प्रसन्नतापूर्वक खुद को एक अधिनायक को तो नहीं सौंप दिया? कभी-कभी परिहास में सुनने को मिल जाता है कि लोकतन्त्र को ढंग-ढांग से चलाने के लिए एक तानाशाह की जरूरत होती है। हम उसी स्थिति मेें तो नहीं आ रहे? हमने सचमुच में एकाधिकारवादी गणतन्त्र या कि तानाशाहीवादी गणतन्त्र ईजाद तो नहीं कर लिया? हमारी यह नई खोज कहाँ खत्म होगी?

अपनी यह आशंका मैंने राजनीति शास्त्र के एक अध्येता को कही तो वे भी विचार में पड़ गए। बोले - ‘इण्डियन केरेक्टर कुछ कह भी कर सकता है। हकीकत तो 2019 के चुनावों के समय ही मालूम हो सकेगी।’

लेकिन व्याप्त दास भाव और अखबारों/मीडिया, राजनीतिक दलों की भूमिका को देख आशंका उपजी - 2019 के चुनाव होंगे भी?

इस आशंका के साथ गणतन्त्र दिवस की बधाइयाँ।
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(दैनिक 'सुबह सवेरे', भोपाल के 26 जनवरी 2017 के अंक में मुखपृष्‍ठ पर प्रकाशित।)

मोदी से माफी माँग लें गाँधी प्रेमी

कठोर मुख-मुद्रा और हाथ में पोनी लिए बिना, चरखे पर सूत कातने का उपक्रम कर रहे, प्रधान मन्त्री मोदी के चित्र को लेकर उनके विरोधी और अनेक गाँधी-प्रेमी मोदी पर टूट पड़े हैं। मुझे हैरत नहीं हो रही न ही गुस्सा आ रहा। मुझे दोनों पर तरस और हँसी आ रही है। गुस्सा करनेवाले यदि केवल मोदी ही नहीं, समूचे संघ परिवार के संकट और हीनताबोध का अनुमान लगा पाते तो वे भी हँसतेे।

संघ और भाजपा सहित उसके तमाम अनुषांगिक संगठनों का सबसे बड़ा संकट है-उनके पास अपना एक भी महापुरुष नहीं। सारी दुनिया जानती है कि भारत के स्वाधीनता संग्राम से संघ ने खुद को घोषित रूप से दूर रखा क्योंकि वह  ‘हिन्दू भारत’ चाहता था जबकि गाँधी और काँग्रेस ऐसे स्वतन्त्र भारत के लिए संघर्षरत थे जिसमें सब धर्मों, मतों, सम्प्रदायों, समुदाय के लोगों के लिए बराबर की जगह थी। 

महापुरुषविहीन ऐसी स्थिति में कोई भी वही करता जो संघ परिवार और मोदी कर रहे हैं। उन्हें ऐसा अतीत और ऐसे व्यक्तित्व चाहिए जिनके सहारे गर्वपूर्वक लोगों के बीच जा सके। हीनताबोध से कभी मुक्ति नहीं पाई जा सकती क्योंकि हम खुद से झूठ नहीं बोल सकते। इसलिए संघ परिवार समय-समय पर ऐसे व्यक्तित्वों का अवलम्बन लेता रहता है जो जनमानस में श्रेष्ठ चरित्र, उत्कृष्ट देशभक्ति और प्रतिभा-वैशिष्ट सम्पन्न हों। लेकिन इसके समानान्तर वह यह चतुराई भी बरतता है कि किसी भी व्यक्तित्व को अपनी स्थायी पहचान कभी नहीं बनाता। कभी वह सरदार पटेल को लेकर आता है, कभी विवेकानन्द को, कभी भगतसिंह को, कभी महाराणा प्रताप को, कभी शिवाजी को, कभी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस आदि-आदि को। संघ भली प्रकार जानता है कि यदि किसी एक को भी अपनी स्थायी सम्पत्ति बनाया तो लेने के देने पड़ जाएँगे क्योंकि ये तमाम चरित्र संघ के सिद्धान्तों, मतों, बातों को सिरे से खारिज करते हैं। 

यह तथ्य इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि सरदार पटेल ने संघ को भारत की साम्प्रदायिक एकता के लिए हानिकारक बताते हुए उसे प्रतिबन्धित करने की सलाह दी थी। गाँधी हत्या में भी सरदार पटले ने संघ की भूमिका का अन्देशा जताया था। भला ऐसे आदमी को संघ अपना स्थायी गर्व पुरुष कैसे बना सकता है?

शहीद-ए-आजम भगतसिंह संघ के प्रमुख गर्व पुरुष हैं। भगतसिंह ने खुद को कम्युनिस्ट और नास्तिक घोषित किया। वे ईश्वर को खारिज करते थे। उनके कारावास काल में जिस महिला (जिसे वे ‘बेबे’ याने माँ कहते थे) ने उनका मल-मूत्र साफ किया, उसके हाथ का बनाया भोजन करना उनकी अन्तिम इच्छा थी। जबकि संघ मनु स्मृति आधारित वर्ण व्यवस्था का समर्थन करता है। इसीलिए संघ भगतसिंह को भी सदैव ही ‘ठीक समय और प्रसंग’ पर ही काम में लेता है। 

शिवाजी और राणा प्रताप को संघ हिन्दू रक्षक रूप में पेश करता है। किन्तु जैसे ही लोग इन दोनों के मुसलमान सेनापतियों के बारे में बताना या पूछना शुरु करते हैं तो फौरन ही विषय बदल दिया जाता है। विस्तार से बात करने पर मालूम होता है कि इन दोनों की विजय में मुसलमान सेनापतियों का अमूल्य योगदान है। 

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को लेकर भी संघ का संकट कम नहीं है। उनकी मृत्यु को लेकर संघ परिवार शुरु से ही नेहरू और काँग्रेस को अपराधी घोषित करता रहा। किन्तु पहले अटलजी की सरकार और अब मोदी सरकार के होते हुए ऐसा कोई दस्तावेज सामने नहीं लाया जा सका। नेताजी से जुड़ी दस्तावेजी सामग्री किश्तों में दे कर सनसनी बनाए रखी जा रही है किन्तु अब तक एक भी ऐसा दस्तावेज सामने नहीं लाया जा सका जो नेहरू की फजीहत कर सके। खास बात यह है कि नेताजी को हिन्दू प्रतीक के रूप में कभी पेश नहीं किया गया क्योंकि सारी दुनिया जानती है कि उनकी आजाद हिन्द फौज में सभी धर्मों के लोग शरीक थे।

विवेकानन्द संघ के सर्वाधिक प्रिय हिन्दू प्रतीक हैं। विवेकानन्द को अन्तरराष्ट्रीय पहचान दिलानेवले, सितम्बर 1893 में, शिकागो में सम्पन्न, 17 दिवसीय धर्म सम्मेलन में उन्होंने 12 व्याख्यान दिए किन्तु एक भी व्याख्यान में किसी धर्म कह निन्दा या आलोचना नहीं की न ही किसी धर्म को छोटा कहा।  उन्होंने कहा कि किसी इसाई को हिन्दू या बौद्ध नहीं बनना है न ही किसी हिन्दू या बौद्ध को इसाई बनना है। उन्होंने प्रत्येक धर्म को अपनी स्वतन्त्रता और विशिष्टता बनाए रखकर दूसरे धर्मों के भाव ग्रहण करते हुए चलने को उन्नति और विकास का मन्त्र बताया। विवेकानन्द ने रोटी को धर्म से पहले माना और उस ईश्वर में अनास्था जताई जो रोटी न देकर स्वर्ग में सुख देता है। 

अपने महापुरुष के नाम पर संघ के पास केवल सावरकर का नाम है। किन्तु यह दुःखद और अप्रिय संयोग है कि अंग्रेजों को पेश किया लिखित माफीनामा और खुद को अंग्रेजों का निष्ठावान सहयोगी घोषित करने वाले पत्र इतिहास के पन्ने बने हुए हैं। इसलिए सावरकर भी बहुत थोड़ी दूर तक संघ के लिए उपयोगी साबित हो पाते हैं।

संघ के इतिहास में दीनदयाल उपाध्याय अब तक के इकलौते ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने आर्थिक चिन्तन किया। किन्तु उनका ‘अन्त्योदय’ भी अन्ततः गाँधी के ‘अन्तिम आदमी की चिन्ता’ के विचार की नकल कह दिया जाता है।

ये कुछ छोटे-छोटे उदाहरण हैं जिनसे संघ का संकट समझा जा सकता है। गाँधी पहले ही क्षण से संघ के गले की फाँस बना हुआ है। वह न निगलते बनता है न उगलते। गाँधी की सर्वकालीनता और वैश्विकता सारी दुनिया मानती है। स्थिति यह है कि गाँधी भारत से अधिक शेष दुनिया में जाने-माने-पूजे जाते हैं। संघ की उलझन इसी से समझी जा सकती है कि वह गाँधी को जहाँ ‘प्रातः स्मरणीय’ कहता है वहीं गाँधी-हत्या को ‘गाँधी-वध’  कहता है। 

इस देश में गाँधी के बिना किसी का काम नहीं चल पाता। गाँधी सर्वप्रिय, सर्वस्वीकार और सर्व-सुलभ हैं। उनसे खुद को जोड़कर हर कोई अपना कद बढ़ा सकता है। बाजार की भाषा में कहें तो गाँधी ‘बेस्ट सेलेब्रिटी’ हैं। इसकी सबसे ज्यादा बिक्री और सर्वाधिक लाभ-अर्जन काँग्रेस ने किया और कुछ इस तरह किया कि वह इसे अपनी जागीर समझने लगी जबकि गाँधी तो सबके हैं।

इसीलिए, मोदी यदि खुद को गाँधी से जोड़ने से नहीं रोक सके तो यह सहज स्वाभाविक है। इस उपक्रम पर नाराज होनेवाले भूल जाते हैं कि किसी से भी जुड़ने पर गाँधी का कद कम नहीं होता। गाँधी यदि होते तो वे भी नाराज नहीं होते। हाँ! बड़ा अन्तर यह रहा कि काँग्रेसियों ने कभी खुद को गाँधी की तरह पेश नहीं किया जबकि अपने इस विवादित उपक्रम में मोदी खुद को गाँधी साबित करते हुए गाँधी से आगे जाते हुए लगते हैं। 

मेरे विचार से मोदी गुस्से के नहीं, सहानुभूति के पात्र हैं। पता नहीं किन क्षणों में उन्हें (या उन्हें इस स्थिति में प्रस्तुत करनेवाले को) यह विचार आया और उनकी दशा, गाँवों-कस्बों के मेले में, लम्बे बाँसों पर चढ़कर चलनेवाले विज्ञापनी-व्यक्ति जैसी हो गई जिसकी असामान्य ऊँचाई को ताज्जुब से देखते तो सब हैं किन्तु जानते हैं कि यह उसकी नहीं, बाँसों की ऊँचाई है। हमारा जनमानस बोलता भले न हो किन्तु जानता खूब है कि फूलों के साथ धागा और कीट-पतंग भी देवताओं के कण्ठ तक पहुँच जाते हैं। धागा तो दिखाई नहीं देता। कीट-पतंग दिखाई देते हैं। तकलीफ की बात यह है कि उन्हें देखते समय लोगों को उनकी उपयोगिता याद नहीं आती। याद आता है, उनका काटना और उससे उपजी खुजलाहट।

मेरा तो मत है कि मोदी पर गुस्सा होनेवालों और गाँधी प्रेमियों ने गाँधी की आत्मा की प्रसन्नता के लिए मोदी से सार्वजनिक क्षमा याचना कर लेनी चाहिए। 
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(दैनिक सुबह सवेरे, भोपाल में 18 जनवरी 2017 को प्रकाशित)

सूचना हासिल कर लो तो जानें

शेखरजी के अनुभवों को आधर बनाया जाए तो मानना पड़ेगा कि मध्य प्रदेश सरकार, यदि सूचना के अधिकार अधिनियम और प्रधान मन्त्री मोदी के, डिजिटल इण्डिया के इरादे विफल नहीं कर रही तो इन दोनों को साकार करने को तो बिलकुल ही उत्सुक अनुभव नहीं होती।

शेखरजी ने पेट्रोलियम पदार्थों पर आरोपित विभिन्न करों के ब्यौरे जानने के लिए, वाणिज्यिक कर कार्यालय इन्दौर से दो प्रश्न और गए पाँच वर्षों म्ों पेट्रोलियम पदार्थों के जरिए संग्रहित कर राशि जानने के लिए तीसरे प्रश्न के जरिए, सूचना के अधिकार के अन्तर्गत जानकारी माँगी।

इस हेतु आवेदन शुल्क 10/- रुपयों के पोस्टल आर्डर के साथ अपना आवेदन पंजीकृत-पत्र के रूप में  भेजा जिस पर 22/- रुपये खर्च हुए। जवाब में वाणिज्यिक कर विभाग ने 25/- रुपयों के खर्चवाले पंजीकृत पत्र द्वारा शेखरजी से 10 पन्नों की सूचना के लिए 20/- रुपयों का सूचना शुल्क और जवाब के लिए डाक व्यय भेजने को कहा। सरकार ने यदि ऑन लाइन व्यवस्थाएँ अपनाई होती तो यह खर्च और समय बचाया जा सकता था। शेखरजी ने रजिस्ट्री के 22/- रुपये खर्च कर 20/- रुपयों का पोस्टल आर्डर तो भेज दिया किन्तु डाक व्यय भेजने से यह कह कर इंकार कर दिया कि यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है और कहा कि विभाग, वांछित सूचनाएँ शेखरजी को उनके ई-मेल पते पर भेज दे।

विभाग ने 30/- रुपये खर्च कर शेखरजी को सूचनाएँ भेज दीं। ऑन लाइन और डिजिटल व्यवस्था होती तो यहाँ भी डाक डाक खर्च, मँहगा कागज और समय बचाया जा सकता था।  शेखरजी ने उत्सुकता से लिफाफा खोला तो पाया कि विभाग ने पहले दो प्रश्नों की ही जानकारी भेजी और सबसे महत्वपूर्ण सूचना (पेट्रोलियम पदार्थों पर लगाए गए करों से गत पाँच वर्षों में प्राप्त रकम) बतानेवाले तीसरे प्रश्न का उत्तर ही नहीं दिया।

चूँकि प्रथम लोक सूचना अधिकारी अपनी ओर से आवेदन का निपटान कर चुका था इसलिए अपील करने के सिवाय शेखरजी के पास कोई विकल्प नहीं था। सो शेखरजी ने अभी-अभी ही, आवश्यक शुल्क 50/- रुपयों और आवश्यक जानकारियाँ 22 पन्नों में तैयार करवा कर अपनी अपील, अपीलीय अधिकारी को भेजी है और जवाब की प्रतीक्षा कर रहे हैं। 

पहली ही नजर में साफ अनुभव हो जाता है कि पहला लोक सूचना अधिकारी, शेखरजी की चाही गई सूचना देने में देर करना चाहता था। क्योंकि अपीलीय अधिकारी भी जो उत्तर देगा वह प्रथम लोक सूचना अधिकारी से ही हासिल करेगा। सूचना के अधिकार को विफल और  अनुपयोगी साबित करने की इस कोशिश को आप अपनी इच्छा और सुविधा से, जो भी नाम देना चाहें दे सकते हैं।

इस मामले में यह भी महत्वपूर्ण है कि मध्य प्रदेश सरकार ने डिजिटल व्यवस्था अपनाई होती तो भरपूर समय, मानव श्रम, मँहगा कागज और डाक खर्च बचाया जा सकता था। किन्तु यह मामला बताता है कि यह सब बचाना तो दूर, समय पर वांछित सूचनाएँ उपलब्ध न कराने में मध्य प्रदेश सरकार की रुचि अधिक है। इस मामले में अपील करने की स्थिति पैदा करना, इस रुचि का ही प्रत्यक्ष प्रमाण है।

इसके समानान्तर शेखरजी के अनुभवों के आधार पर यह जानकारी महत्वपूर्ण और उत्साहजनक है कि केन्द्र सरकार, राजस्थान सरकार और पंजाब सरकार ऐसी सूचनाएँ ई-मेल पर, डिजिटल स्वरूप में, ऑन लाइन उपलब्ध कराती हैं। केन्द्र सरकार तो ऑफ लाइन भी उपलब्ध करा देती है जबकि पंजाब सरकार ने एक बार 10 पन्नों की सूचना निःशुल्क ही भेज दी।

डिजिटल इण्डिया और सूचना के अधिकार को अपनाने और प्रोत्साहित करने के मामले में मध्य प्रदेश सरकार से जुड़े, शेखरजी के ये दो अनुभव जानकर गालिब का यह शेर, (एक छोटे से घालमेल सहित सहित) लागू होता लगता है -

                                        यह ‘राज्य’ नहीं आसाँ, बस इतना समझ लीजे
                                        इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।
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सूचना का अधिकार और डिजिटल इण्डियाः कबूल नहीं! कबूल नहीं!!

मध्य प्रदेश का एक नगर है-नीमच। जिला मुख्यालय है। अंग्रजों के जमाने में सेना का बड़ा केन्द्र था। आज सीआरपीएफ का बड़ा केन्द्र है। यहीं रहते हैं चन्द्र शेखर गौड़। एक निजी संस्थान में काम करते हैं। संस्थान के कर्मचारियों की भीड़ में उनकी कोई अलग पहचान शायद ही हो। लेकिन उनकी एक पहचान उन्हें भीड़ से अलग करती है। यह पहचान है - आरटीआई एक्टिविस्ट की। सूचना के अधिकार के तहत लोकोपयोगी जानकारियाँ माँगना उनका शौक था जो आज व्यसन बन गया है। इसके पीछे किए जानेवाले मासिक खर्च का आँकड़ा वे निश्चय ही अपनी उत्तमार्द्धजी से छुपाते होंगे। मालूम हो जाए तो शायद, बाल-बच्चों पर खर्च की जानेवाली रकम फालतू कामों में खर्च करने पर झगड़ा कर लें। लेकिन शेखरजी के पास आई सूचनाओं का मोल, खर्च की गई रकम से कई गुना अधिक है। मैं यदि किसी अखबार का या समाचार एजेंसी का सम्पादक होता तो शेखरजी से अनुबन्ध कर लेता और बीसियों-पचासों नहीं, सैंकड़ों से भी आगे बढ़कर अनगिनत ‘एक्सक्लूसिव’ समाचार (इतने कि महीनों तक दैनिक स्तम्भ के रूप में) छापने का श्रेय हासिल कर लेता। 

इन्हीं शेखरजी से मेरा सम्पर्क बना रहता है। बातों ही बातों में इन्होंने दो ऐसे किस्से सुनाए जो, राष्ट्रीय स्तर के दो महत्वपूर्ण मुद्दों, मोदी के डिजिटल इण्डिया के सपने और सूचना के अधिकार की सफलता, के प्रति मध्य प्रदेश सरकार की ‘नीयत’ उजागर करते हैं।

पहला किस्सा। 

मध्य प्रदेश की जेलों में बन्द कैदियों से जुड़ी मानवीय स्थितियों की कुछ सूचनाएँ उपलब्ध कराने के लिए शेखरजी ने जेल मुख्यालय को आवेदन भेजा। जवाब में उनसे, सूचना के चार पन्नों का शुल्क आठ रुपये जमा कराने को कहा गया। साथ ही, जवाब प्राप्त करने के लिए पर्याप्त डाक टिकिट लगा लिफाफा भी भेजने को कहा गया। 

आठ रुपये भेजने के लिए शेखरजी ने खूब माथा खुजाया। बैंक ड्राफ्ट बनवाएँ तो ‘सोने से घड़ावन मँहगी’ और मनी आर्डर करें तो, पत्र और मनी आर्डर अलग-अलग भेजने पर (दोनों का प्राप्ति समय अलग-अलग होने से) जवाब मिलने में देर होने का खतरा। सो, शेखरजी ने दस रुपयों का पोस्टल भेजा और साथ में रजिस्टर्ड पत्र से जवाब पाने के लिए सत्ताईस रुपयों के डाक टिकिट लगा लिफाफा भेजा। इसमें रजिस्‍ट्री खर्च आया 22/- रुपये। जवाब में शेखरजी को चार पन्नों की सूचना मिल गई।

पहली नजर में, देखने-सुनने में इसमें सब कुछ नियमानुसार, सामान्य ही लगता है। कुछ भी अटपटा और आपत्तिजनक नहीं लगता। किन्तु बकौल शेखरजी, इस मामले को तनिक ध्यान से और प्रधान मन्त्री मोदी के ‘डिजिटल इण्डिया’ की भावना के परिप्रेक्ष्य में देखें तो कुछ अलग ही तस्वीर सामने आती है।

यदि सरकार ने अपने कामकाज में ऑन लाइन या कि डिजिटल व्यवस्था अपनाई होती तो शेखरजी आठ रुपयों का सूचना शुल्क ऑन लाइन जमा कर देते और शेखरजी को वांछित सूचनाएँ पहली ही बार में डिजिटल स्वरूप में मिल जातीं। 

यह तो विलम्ब की बात हुई। खर्चे का हिसाब तो और भी रोचक तो है ही, धन और संसाधनों के अपव्यय का मामला भी बनता है। विस्तृत ब्यौरे इस प्रकार हैं -

शेखरजी ने आवेदन शुल्क 10/- रुपयों के पोस्टल आर्डर सहित अपना आवेदन रजिस्टर्ड डाक से भेजा जिसका खर्च आया - 22/- रुपये। 

उत्तर में जेल मुख्यालय ने रजिस्टर्ड पत्र भेजकर शेखरजी से आठ रुपये सूचना शुल्क माँगा जिसका खर्च आया  22/- रुपये।

तदनुसार शेखरजी ने 27/- रुपयों के डाक टिकिट लगे लिफाफों सहित 10/- रुपयों का पोस्टल आर्डर रजिस्ट्री से भेजा। रजिस्ट्री का खर्च आया 22/- रुपये।

जेल मुख्यालय ने रजिस्टर्ड पत्र से शेखरजी को चार पन्नों में सूचना भेजी। इसमें रजिस्ट्री खर्च आया 22/- रुपये। 

इस तरह कुल खर्च आया 135/- रुपये। भरपूर समय, लिखा-पढ़ी का मानव श्रम और कागज-लिफाफे लगे सो अलग।

शेखरजी के मुताबिक सरकार ने यदि ऑन लाइन/डिजिटल व्यवस्था अपनाई होती और सूचना शुल्क 8/- रुपये ऑन लाइन जमा कराने की सूचना ई-मेल पर दी होती तो पहली बार आवेदन शुल्क 10/- रुपये, रजिस्ट्री शुल्क 22/- रुपये और बाद में 8/- रुपये सूचना शुल्क की सकल रकम केवल 40/- रुपये खर्च होते और सूचनाएँ डिजिटल स्वरूप में उपलब्ध करा दी जातीं। इसमें समय, मानव श्रम और संसाधनों के खर्च की जो बचत होती वह ‘शुद्ध मुनाफा’ होती। 

किन्तु इससे भी महत्वपूर्ण बात यह होती कि यदि मध्य प्रदेश सरकार ने ऑन लाइन व्यवस्थाएँ अपनाई होतीं तो यह जहाँ एक ओर सूचना के अधिकार की पारदर्शिता की भावना के अनुकूल होता वहीं मोदी के, डिजिटल इण्डिया के विचार को भी साकार करता।

लेकिन यह उदाहरण बताता है कि मध्य प्रदेश सरकार को इन दोनों बातों से कोई लेना-देना नहीं है। 

दूसरा किस्सा अगली कड़ी में।
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पेटीएम तो नहीं करोगे?


09 जनवरी 2017. 

मैं इन्दौर में हूँ। कनाड़िया मार्ग स्थित शहनाई-2 के सामने, सर्व सुविधा नगर से मुझे और मेरी उत्तमार्द्धजी को ए. बी. रोड़ पर, सीएचएल अपोलो अस्पताल जाना है। मेरा परम मित्र रवि शर्मा वहाँ भरती है। सोमवार सुबह ही उसका, हर्निया का ऑपरेशन हुआ है।

मेरे बड़े बेटे वल्कल ने मेरे मोबाइल पर जुगनू ऑटो रिक्शा का एप स्थापित कर मुझे उसका उपयोग सिखा दिया है। उसी का उपयोग कर मैं एक ऑटो बुलाने का उपक्रम करता हूँ। मेरे मोबाइल के पर्दे पर एक ऑटो का नम्बर और ड्रायवर का नाम उभर आता है। कुछ ही क्षणों में मेरा मोबाइल घनघनाता है। उधर से ऑटो रिक्शा का ड्रायवर जानना चाह रहा है कि मैं कहाँ खड़ा हूँ। मैं अपनी जगह बताता, समझाता हूँ। वह पूछता है - ‘कहाँ जाओगे?’ मैं कहता हूँ - ‘अपोलो अस्पताल।’ वह पूछता है - ‘कौनसे वाला? विजय नगरवाला या एलआईजीवाला?’ मैं मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ कि मुझे दूसरे अस्पताल की जानकारी है। मैं ठसके से कहता हूँ - ‘एलआईजीवाला।’ वह कहता है - ‘अच्छा। थोड़ी ही दूर पर हूँ। बस! दो मिनिट में पहुँचता हूँ।’

दो मिनिटि, दो मिनिट में ही पूरे हो जाते हैं लेकिन उसका अता-पता नहीं। हम दोनों इन्दौर के भूगोल से अपरिचित हैं। नहीं जानते कि वह कौन सी दिशा से आएगा। सड़क किनारे खड़े हम दोनों दाँये-बाँये देखते हैं। कोई दस-बारह मिनिट बाद वह आता है। हम दोनों बैठने को होते हैं। वह पूछता है- ‘पेमेण्ट केश करोगे या पेटीएम करोगे?’ मैं कहता हूँ - ‘नगद करूँगा।’ वह शायद ‘नगद’ का मतलब समझ नहीं पाता है। तनिक ऊँची आवाज में कहता है - ‘नहीं! नहीं! मैं पूछ रहा हूँ कि पेमेण्ट केश करोगे या पेटीएम करोगे?’ मुझे अपनी चूक समझ में आ जाती है। कहता हूँ - ‘केश करेंगे।’ वह मानो राहत की साँस लेता है। कहता है - ‘तो ठीक है। बैठो।’

हम दोनों बैठ जाते हैं। रिक्शा चल पड़ता है। उसके सवाल मेरे पत्रकार को जगा भी देते हैं और उकसा भी देते हैं। रास्ते भर मैं उसके सवाल को लेकर उसे कुरेदता रहता हूँ। टुकड़ों-टुकड़ों में उसके जवाबों का समेकित जवाब कुछ इस तरह होता है - ‘पेटीएम में यूँ तो कोई तकलीफ नहीं सा’ब लेकिन भुगतान सात-सात दिन में मिलता है। अब, सात दिनों के लिए दाना-पानी कहाँ से लाऊँ। घर में तो रोज पैसे चाहिए होते हैं। पेटीएम के भरोसे रहने के लिए घर में एक मुश्त रकम चाहिए होती है। वो कहाँ से लाऊँ? कागजी बातें छोड़ दो तो ये रिक्शा भाड़े का है। मालिक को तो अपना भाड़ा रोज ही चाहिए। बहुत हुआ तो चौबीस घण्टों की उधारी कर ले। लेकिन उसके बाद? उसे तो भाड़ा चाहिए ही चाहिए और वो भी केश में। वो पेटीएम-वेटीएम नहीं जानता। इसलिए पेमेण्ट केश में लेना मेरी मजबूरी है। इस कारण कभी-कभी ग्राहक छोड़ भी देता हूँ। हम लोग ग्राहक के लिए घण्टों राह देखते हैं। इसलिए सामने आया धन्धा छोड़ने में बहुत तकलीफ होती है लेकिन क्या करूँ सा’ब! मेरी भी मजबूरी है।’

उसकी बात सुनकर मन में करुणा उपजती है। उसने मेरे सारे सवालों के जवाब दे दिए हैं। उससे असहमत होना कठिन है। फिर भी मैं कहता हूँ - ‘अपने मोदीजी तो भारत को केशलेस बनाना चाहते हैं। तुम उनकी मदद नहीं करोगे?’ निर्विकार भाव से वह कहता है - ‘मोदीजी की क्या बात करें सा’ब! वो तो बड़े आदमी हैं। उनके सामने तो, वो नहीं माँगें तो भी काजू-किशमिश आ जाते हैं। वो हमारी बात क्या समझेंगे! उनके बाल-बच्चे होते तो समझते। तब वो केशलेस की बात करने से पहले हजार बार सोचते सा’ब।’ मैं कहता हूँ - ‘तुम ऐसी बातें करोगे तो देश केशलेस कैसे बनेगा?’ उसी तरह, निर्विकार भाव से वह कहता है - ‘बन जाएगा सा’ब। पीएम ने कहा है तो कैसे नहीं बनेगा? मोदीजी हमारे जैसे लोगों के भरोसे थोड़े ही हैं। सब बड़े लोग उनके दोस्त हैं। वो सब मिलकर बना देंगे सा’ब।’

बात-बात में हम अस्पताल पहुँच जाते हैं। वह मोबाइल उठाकर ‘राइड एण्ड’ कर दो पल बाद रकम बताता है। मैं भुगतान करता हूँ। वह जाने के लिए ऑटो स्टार्ट करता है। मैं अस्पताल की ओर जाने को होता हूँ कि वह मुझसे कहता है - ‘सा’ब! आप मोदीजी की पार्टी के हो। उनसे कहना कि कोई भी फैसला लेने से पहले कम से कम एक बार हम गरीबों की जरूर सोच लें।’

मैं कुछ कहूँ, उससे पहले ही वह गाड़ी को गीयर में डाल, तेजी से चल देता है। उसे क्या पता कि मैं कहना चाहता था कि भाई! मोदीजी तक मेरी पहुँच नहीं है। लेकिन, होती तो भी नहीं कहता। वे किसी सुनते ही कहाँ हैं?
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