अनूठा नजदीकी रिश्तेदार

पूरे एक बरस पहले, 11 जनवरी 2017 को उन्हें देखा था। उस दिन सुबह ग्यारह बजे मेरे दा साहब माणक भाई अग्रवाल का दाह संस्कार था। उससे बहुत पहले से लोग आने शुरु हो गए थे। अधिकांश आगन्तुक परस्पर परिचित थे। सो, दो-दो, चार-चार के समूहों में बँटकर बातें कर रहे थे। कड़ाके की ठण्ड थी। मल्टी के पार्किंग एरिया में छाया का साम्राज्य कुछ ऐसा था कि था कि टिकने के लिए धूप को भी जगह मुश्किल से मिल रही थी। हर कोई धूप में आने का जतन कर रहा था। ‘वे’ भी अपनी कुर्सी उठाकर धूपवाले हिस्से में आ गए।

 वे किसी से बात नहीं कर रहे थे। चुपचाप, अपने आप में बैठे थे। उनका इस तरह चुपचाप बैठना, भीड़ में अपने एकाकीपन के साथ सहज बने रहना अब सबको जिज्ञासु बना चुका था। पूछा तो जवाब आया - ‘आय एम क्लोज रिलेटिव ऑफ माणक भाई।’ (मैं माणक भाई का नजदीकी रिश्तेदार हूँ।) जितने लोगों तक उनकी बात पहुँची वे सबके सब चौंके। दा साहब के अनेक ‘क्लोज रिलेटिव’ वहाँ मौजूद थे। वे सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे। एक ने पूछा - ‘लेकिन आप उनके यहाँ किसी काम में कभी नजर नहीं आए।’ वे बोले - ‘यस। यू आर राइट।’ (हाँ। आप ठीक कह रहे हैं।) पूछा गया - ‘कभी उनके साथ बैठे हुए, उनसे बात करते हुए भी आप नजर नहीं आए।’ वे बोले - ‘आई नेव्हर मेट, नेव्हर सा माणक भाई।’ (मैं न तो माणक भाई से मिला हूँ न ही उन्हें देखा है।) 

मैं उनसे बहुत दूर नहीं था। सारा संवाद सुन पा रहा था। उनकी यह बात सुन मैं उनके पास पहुँचा और बोला - ‘आपकी बात लोगों को समझ में नहीं आ रही है। यदि आपको आती हो तो हिन्दी में बात कीजिए ना!’ वे बोले - ‘अरे! हिन्दी क्यों नहीं आएगी मुझे? आती है। आती है। आफ्टर ऑल आय एम इन्दौरी।’ मैंने पूछा - ‘आपने माणक भाई को कभी देखा नहीं, उनसे मिले नहीं और कह रहे हैं कि आप उनके नजदीकी रिश्तेदार हैं। मैं भी उनके परिवार का सदस्य जैसा ही हूँ। उनके अधिकांश रिश्तेदारों को जानता हूँ। लेकिन आप न तो कभी नजर आए न ही कभी दा’ साहब से आपका नाम, आपके बारे में कुछ सुना।’ उन्होंने मुझे घूर कर देखा। बोले - ‘अरे! आपने सुना नहीं मैंने क्या कहा? मैंने कहा है कि मैं उनसे न तो कभी मिला न ही मैंने उन्हें कभी देखा। वे भी मुझे नहीं जानते। तो मैं कैसे उनके साथ कभी नजर आता और कैसे वे कभी मेरा जिक्र करते?’ अब तक, वहाँ मौजूद लगभग सारे के सारे लोग उनके आसपास आ चुके थे। एक छोटी-मोटी भीड़ के बीच वे आकर्षण और कौतूहल का केन्द्र बन चुके थे। सबका कौतूहल चरम पर पहुँच चुका था। वे कभी हिन्दी तो कभी अंग्रेजी में बात कर रहे थे। हम सब जानने को अधीर थे - ‘दा साहब का यह ऐसा कैसा, कौन रिश्तेदार है जो उनसे कभी मिला नहीं, जिसने उन्हें कभी देखा नहीं?’ अब मुझसे नहीं रहा गया। संवाद सूत्र मैंने थाम लिया था। अजीजी से कहा - ‘आप बाकी सब कुछ कह रहे हैं लेकिन अपने बारे में कुछ नहीं कह रहे। प्लीज! अपना परिचय दीजिए।’ वे हँस कर बोले - ‘आपने जो-जो बात पूछी, सबका जवाब दिया। अब मेरा परिचय पूछा है तो बता रहा हूँ। आय एम डॉक्टर डी एस कापसे। रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर ऑफ वेटेरनरी सर्विसेस।’ कहने को तो उन्होंने अपना परिचय दे दिया था लेकिन बात सुलझने के बजाय और उलझ गई। अब मैंने हथियार डाल दिए। कुछ चिढ़ और कुछ गिड़गिड़ाहट के मिलेजुले स्वरों में कहा - ‘थैंक्यू डॉक्टर साब। लेकिन आप उनके नजदीकी रिश्तेदार कैसे हुए?’ अपने आसपास घिरे हुए उत्सुक चेहरों पर नजर मारकर वे मुस्कुराकर बोले - ‘यस। आय एम हिज क्लोज रिलेटिव। बोथ ऑफ अस आर फ्रीडम फायटर्स।’ (हाँ। मैं उनका नजदीकी रिश्तेदार हूँ। हम दोनों ही स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी हैं।) 

कापसे साब का जवाब सुनकर वहाँ सन्नाटा फैल गया। किसी के मुँह से बोल नहीं फूटा। हम सब एक-दूसरे की शकल देखने लगे। आपस में हम सब, दा’ साहब से अपनी नजदीकी जताने का हर सम्भव प्रयत्न कुछ  इस कर रहे थे मानो होड़ लगी हुई हो। लेकिन कापसे साहब ने ‘नजदीकी’ और ‘रिश्तेदारी’ की परिभाषा, उसका अर्थ ही बदल दिया। हममें से प्रत्येक यही मानकर आत्म-मुग्ध था कि एक वही दा साहब के सबसे नजदीक है। लेकिन कापसे साब के एक वाक्य ने  एक झटके में हम सबको बौना बना दिया। यह ऐसी रिश्तेदारी थी जिसका सूत्र हममें से किसी के पास नहीं था। दा साहब से कभी न मिलनेवाले, उन्हें कभी न देख पानेवाले कापसे साहब एक पल में दा साहब के सबसे नजदीकी बन गए थे। अब तक तो वे ही कह रहे थे लेकिन अब तो हम सब, बिना बोले मान रहे थे कि उनसे अधिक नजदीकी रिश्तेदार कोई नहीं था। यह ऐसा रिश्ता था जो केवल महसूस किया जा सकता।

अर्थी उठने से पहले तक कापसे साब से काफी बातें हुईं। नौ अगस्त 1942 के ऐतिहासिक दिन वे मुम्बई में धोबी तालाब वाले जलसे में मौजूद थे। गाँधीजी के आह्वान पर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। चालीस दिनों तक इन्दौर जेल में रहे। अखबार में उन्होंने दा साहब के निधन और अन्तिम संस्कार की खबर देखी/पढ़ी तो रिश्‍तेदारी निभाने आ गए। ऐसा वे, ऐसे प्रत्येक अवसर पर करते आए हैं। उन्होंने बताया कि नौकरी के दौरान वे मन्दसौर जिले में भी पदस्थ रहे। तब माणक भाई के बारे में सुना तो था लेकिन देखा-देखी कभी नहीं हुई।

उन्होंने अपना विजिटिंग कार्ड दिया। आप भी देखिए। अपने अते-पते के साथ, अपने ओहदे और कार्य-क्षेत्र के बारे में वे जिस ठसके से बता रहे हैं वह देख कर फिल्म शोले का संवाद बरबस ही याद आ जाता है - ‘हम अंगरेजों के जमाने के अफसर हैं।’

उनका पूरा नाम दत्‍तात्रय शंकर कापसे है। अपने जीवन के 92वें बरस में चल रहे कापसे साहब अपनी जीवन संगिनी अ. सौ. श्रीमती सुधा कापसे और बेटे-बहू के साथ पूर्ण स्वस्थ, सहज, सामान्य जीवन जी रहे हैं। हम सब उनके सुदीर्घ जीवन की कामना करें और ‘रिश्तेदारी’ की इस अभिनव परिभाषा के लिए उन्हें सलाम करें। 

कापसे साब जिन्दाबाद।
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6 comments:

  1. दादा, हर बार की तरह इस बार भी आपसे बहुत कुछ सीखने को मिला, सलाम। आपका लिखना ईश्वर हमेशा ही निरंतर रखें

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (12-01-2018) को "कुहरा चारों ओर" (चर्चा अंक-2846) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. शायद सही तिथि 9अवस्त 1942 हो

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    1. जी। आपने सही कहा। मेरा ध्यान भी कल इस ओर गया था। अपनी चूक नजर आ गई थी। किन्तु कुछ ऐसा सिलिसिला बना रहा कि दुरुस्त नहीं कर पाया। अब आज रात में यह चूक दुरुस्त कर लूँगा। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।

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    2. अभी-अभी चूक की दुरुस्‍ती कर ली है। देखिएगा। धन्‍यवाद।

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