हास-परिहास हो, उपहास नहीं

दादा श्री बालकवि बैरागी की पहली बरसी (13 मई 2019) पर कुछ लेख पढ़ने को मिले। वे सारे लेख ‘नियमित लेखकों’ के थे। अचानक ही मुझे फेस बुक पर भाई बृज मोहन समदानी का यह लेख पढ़ने को मिला। भाई बृज मोहन समदानी अनियतकालीन लेखक, तीखे, दो-टूक, निरपेक्षी टिप्पणीकार और संवाद-विश्वासी हैं। मनासा में वे अपनी पीढ़ी के सम्भवतः ऐसे इकलौते व्यक्ति रहे जो दादा से निस्संकोच, सहज सम्वाद कर लेते थे। दादा के व्‍यक्तित्‍व के कुछ अनछुए पहलू उजागर करनेवाले इस लेख को इससे अधिक टिप्पणी की दरकार नहीं।

  
हास-परिहास हो, उपहास नहीं
बृज मोहन समदानी
  'बातचीत' की 10 अप्रेल 2018 की गोष्‍ठी  में बोलते हुए दादा।  यह उनकी अन्तिम गोष्‍ठी थी। 
मेरे बड़े भाई साहब आदरणीय गोविन्दजी समदानी (जो मुम्बइवासी हैं जहाँ उन्हें सर्वोच्च न्यायालय और महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के हलकों में ‘जीएस मनासावाला’ के रूप में पहचाना जाता है) के बाल सखा एवं हमेशा उनको स्मरण करने वाले, मनासा की पहचान, विनोदप्रिय, ठहाके लगा कर हँसने वाले, फक्कड़पन से जिन्दगी का आनन्द लेने वाले, आदरणीय दादा बालकविजी बैरागी को देह त्यागे एक बरस हो गया। 

दादा को अपनी इच्छानुरूप ‘अकस्मात मृत्यु’ मिली। अवसान के कुछ दिनों पहले ही उन्होंने नगेन्द्रश्री वीथिका, समदानीजी की बाड़ी में उनकी ही प्रेरणा से चल रहे आयोजन ‘बातचीत’ में कहा था - ‘ईश्वर से कुछ भी मत माँगो। उसने सब व्यवस्था की हुई है।’ फिर बोले थे - ‘मैं घनश्याम दासजी बिड़ला की इस बात से प्रभावित हुआ हूँ और ईश्वर से यही कहता हूँ कि मेरी चिन्ता तो तुझे है। मैं औेर कुछ नही माँगता। बस! माँगता हूँ तो अकस्मात मृत्यु।’ 
और क्या यह संयोग नहीं था कि दादा एक उद्घाटन समारोह से आये, घर पर सोये और सोये ही रह गए। अकस्मात मृत्यु! 

मुझ पर दादा का असीम प्रेम था। मेरे कई सुझावों को उन्होंने दिल्ली दरबार तक पहुँचाया था, कुछ क्रियान्वित भी हुए। ‘केश सबसीडी स्कीम’ इनमें प्रमुख है। 15-16  वर्ष पूर्व मेरे इस सुझाव को दिल्ली दरबार में पहुँचा कर सीधे हिताधिकारी के बैंक खाते में पैसे डालने की इस योजना के क्रियान्वित होने पर उन्होंने मुझे पत्र भी लिखा था। मेरे लिए धरोहर बन चुका यह पत्र यहाँ दृष्टव्य है।



पिछले कुछ सालों मे दादा ने मुझे कई बार कहा कि बाड़ी (हमारे पैतृक परिसर) में 10-20 जने बैठो और बिना किसी विषय के चर्चा करो। दादा का बचपन गोविन्द भाई साहब के साथ बाड़ी में ही बीता था। इससे दादा की यादें भी जुड़ी थी और कुछ दादा की रुचि भी संवाद कायम रखने की थी।

दादा ने एक संस्था बनाने हेतु दो नाम सुझाये - रंगबाड़ी और बातचीत। सबकी राय से ‘बातचीत’ नाम तय हुआ। दादा समय के पाबन्द थे। वे ठीक समय पर आ जाते। करीब 3 -4 घण्टे बातों का दौर चलता। दादा के कहे अनुसार संस्था में कोई छोटा-बड़ा नहीं था। कोई पदाधिकारी भी नहीं। सभी बराबरी के सदस्य। आश्चर्य तो तब हुआ जब हमने दादा की कुर्सी पर गादी रखी तो दादा ने पहले गादी हटाई फिर बैठे।

‘बातचीत’ में दादा सहित सर्वश्री विजय बैरागी, नरेन्द्र व्यास ‘चंचल’, सुरेश शर्मा, कैलाश पाटीदार ‘कबीर’, भाई संजय समदानी, अर्जुन पंजाबी, अनिल मलहरा, जगदीश छाबड़ा, बसन्त लिमये, कैलाश सोनी, अस्तु आचार्य और स्वयं मैं भागीदार रहते।




चित्र में बॉंये से बृज मोहन समदानी, दादा और मेरे प्रिय मित्र गोपाल आचार्य की बिटिया अस्तु आचार्य।  गोपाल  की निश्छलता भरे कुछ संस्मरण   आप   यहाँयहाँ और  यहाँ पढ़ सकते हैं।

यह अपनी तरह का अनूठा, अनौपचारिक ऐसा आयोजन होता था जिसमें कोई पूर्व निश्चित विषय नही होता। राजनीति पर चर्चा नहीं करने का अघोषित निर्णय सर्वसम्मति से ले लिया गया था। दादा अलग-अलग विषय रखते। दूसरे भागीदार भी रखते थे। सहज चर्चा में दादा बहुत गम्भीर बातें बोलते थे। बकौल दादा, किसी के संघर्ष को छोटा मत समझो क्योंकि संघर्ष का अनुभव भोगने वाले की  सहनशीलता, संघर्षशीलता पर भी निर्भर करता है।

दादा का कहना था कि आज रिश्ते औपचारिक हो गये हैं। हास्य का अभाव हो गया है। बातचीत में हास-परिहास हो, उपहास नहीं। एक गोष्ठी में दादा ने कहा था कि सशर्त विवाह कभी सफल नही हो सकते। जैसे शिवजी के धनुष को तोड़ने की शर्त पर हुए सीता के विवाह में सीता का क्या हुआ? धरती में समाना पड़ा। और ठीक भी तो है। दहेज की शर्त, शहर में रहने की शर्त, परिवार से अलग रहने की शर्त, व्यापार या नौकरी की शर्त पर आज जो विवाह होते हैं उनमें कितने सम्बन्ध आपसी क्लेश में उलझ जाते हैं।

दादा ने शिक्षा और विद्या पर भी चर्चा की। प्राचीन काल के गुरु विद्यार्थियों के समग्र विकास की, नैतिक एवं चारित्रिक शिक्षा की भी सोचते थे। दादा के अनुसार उनके जमाने मंे नामजोशीजी (रामपुरावाले) एक आदर्श गुरु थे। आज के विद्यार्थी आदर्श गुरु का नाम नहीं बता सकते। 

दादा की उपस्थिति और उनके चिन्तन-मनन-वक्तव्य का असर यह होता था कि किसी की उठने की इच्छा ही नहीं होती थी। आखिकार दादा ही सभा विसर्जन की घोषणा करते - ‘अब बहुत हो गया।’ 

‘बातचीत’ की गोष्ठियों का आरम्भ और समापन चाय से होता था। दादा काली, फीकी, बिना दूध वाली चाय पीते थे। 10 अप्रेल 2018 वाली उनकी गोष्ठी अन्तिम थी। शुरुआती चाय का मौका आया तो दादा बोले ‘तुम सब मीठी दूध वाली चाय पियो। मेरे लिए तो गरम पानी ही मँगवा दो। मैं अपनी चाय की थैली (टी बेग) साथ लाया हूँ।’ समापनवाली चाय के वक्त हमने मान लिया कि दादा अपना टी बेग लेकर आए ही हैं। हमने गरम पानी का कप उनके सामने बढ़ा दिया। दादा बोले ‘थैली एक ही लाया था।’ अब क्या किया जाय? हम कुछ सोचते उससे पहले ही दादा बोले ‘इस गरम पानी में ही चाय की पत्ती डाल दो।’ चाय की पत्ती डाल दी गई और हम लोग छन्नी तलाशने लगे तो दादा बोले ‘छानने के चक्कर में मत पड़ो।’ और उन्होंने, पेंदे में बैठी चाय-पत्ती से बचते हुए, ऊपर-ऊपर से चाय पी ली। गजब की सहजता!

10 अप्रेल 2018 वाली इसी गोष्ठी में मैंने दादा से कहा था - ‘उम्र के इस पड़ाव पर भी आपकी स्मरण शक्ति अद्भुत और धैर्य गजब का है। आप स्थितप्रज्ञता को जी रहे हैं।’ दादा कुछ नहीं बोले थे। बस! मुस्करा दिए थे।

दो साल पहले ही दिगम्बर जैन मुनिद्वय प्रणम्य सागरजी महाराज एवं शीतल सागरजी महाराज के साथ नगेन्द्रश्री वीथिका में दादा भी पधारे थे और जैनत्व की चर्चा की थी। दादा ने मुनिश्री जिज्ञासा प्रकट की थी कि महावीर ने मान, मोह, माया,सब त्याग दिए लेकिन एक मन्द मुस्कान यानी स्मित हमेशा उनके चेहरे पर रही। वो नही त्यागी। यानी महावीर हमेशा सस्मित रहे।

तब प्रणम्यसागर जी महाराज ने बहुत सुन्दर दार्शनिक विवेचना की थी कि जब महावीर ने माया-मोह सब छोड़ दिये एवं ध्यान लगाया तो उन्हें संसार की नश्वरता दिखी। तब उन्होंने नेत्रों को थोड़ा सा खोला तो यह देखकर उन्हें हल्की सी हँसी आई कि दुनियावी लोग इसी नश्वरता को अमरता समझ रहे हैं। इसी कारण महावीर सदैव सस्मित रहे। दादा को मुनिवर का यह दार्शनिक विवेचन बहुत पसन्द आया था।

आचार्य तुलसी एवं आचार्य महाप्रज्ञ जी से दादा काफी प्रभावित थे। उनसे कई बार मुलाकातें भी की थीं। ओशो भी दादा की कवितायें पढ़ते थे। कुमार विश्वास भी दादा के नाम का उल्लेख करते हुए दादा की कविताएँ उद्धृत करते हैं। 

आदरणीय गोविन्द भाई साहब एवं दादा  सहपाठी भी रहे और रामपुरा होस्टल के कमरे के सहरहवासी भी। दादा अन्तरंग और सार्वजनिक रूप से दोनों के सम्बन्धों के बारे में बताते ही रहते थे। गोविन्द भाई साहब के पचहत्तर वर्ष पूर्ण करलेने के अवसर पर उन्होंने एक विस्तृत लेख भी लिखा था। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय एक कविता में उन्होंने गोविन्द भाई साहब के कारण ही, टाटा-बिड़ला के साथ समदानी शब्द भी जोड़ा था।

बहुत कुछ लिखने को है। मेरा सौभाग्य है कि दादा का मुझे भरपूर  स्नेह एवं वात्सल्य मिला। अपने अन्तिम बरसों में दादा असामान्य रूप से अतिरिक्त, अत्यधिक सहज हो  गए थे। मैं शायद कुछ ज्यादा भी पा सकता था उनसे। नहीं पा सका। चूक मेरी ही रही।

दादा को श्रद्धा सुमन सहित प्रणाम।





बृज मोहन समदानी, 
मनासा-458110  (जिला-नीमच, म. प्र.)
मोबाइल नम्बर - 90397 12962

8 comments:

  1. दादा के साथ बीते पल हम सब याद करते है तो अतीत के परम सुख में खो जाते है । यादें अमर रहती है ।

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  2. दादा के सानिंध्य की स्मृतियाँ हमारी धरोहर है।

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  3. सौभाग्य शाली हैं ऐसे लोग जिन्हें ऐसा साथ और साहचर्य मिलता है, ज्ञान की गंगा तो फिर फूट ही पड़ती हैl

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (16-05-2019) को "डूब रही है नाव" (चर्चा अंक- 3337) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  6. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व दूरसंचार दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  7. बहुत अच्छा लिखा है आपने

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  8. बदलते माहौल में कई बार छोटी-छोटी बातें भी बड़ी प्रेरक सी बन जाती हैं। मेरा ब्लॉग कुछ यादों को सहेजने का ही जतन है। अन्य चीजों को भी साझा करता हूं। समय मिलने पर नजर डालिएगा
    Hindi Aajkal

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