निजी स्कूलों के लिए की गई एक प्रार्थना

निजी स्कूलों की कुछ बातें मुझे बहुत ही बुरी लगती है। एक तो यह कि वे जानबूझकर बच्चों को इतना होम वर्क देते हैं कि अकेला बच्चा उसे करने में असमर्थ हो जाता है और उसे अपने माता-पिता की सहायता लेनी ही पड़ती है। स्कूलवालों की मंशा भी यही होती है - पालकों को अनुभव कराना कि उनके उनके बच्चे को कितना पढ़ाया जा रहा है। दूसरी बात जो मुझे इतनी ही बुरी लगती है - प्रोजेक्ट के नाम पर पालकों पर भारी-भरकम आर्थिक बोझ डालना। ये प्रोजेक्ट ऐसे उलझे हुए और खर्चीले होते हैं कि उससे कुछ सीखने के बजाय उस प्रोजेक्ट को कैसे भी पूरा करके उससे मुक्ति पाना, बच्चे का (और उसके माता-पिता का) लक्ष्य बन जाता है।
 
किन्तु इस सन्दर्भ में मैं, कल एक अच्छे, सुखद अनुभव से गुजरा।
 
मैं चाँदनीवालाजी के यहाँ बैठा था। उनका फोन घनघनाया। उनकी बातों से लगा कि कोई उनसे मिलने के लिए आना चाहता है। उसे जवाब देते हुए बोले - ‘अभी तो एक मेहमान बैठे हैं। आधे घण्टे बाद, फोन करके आ जाना।’ सामनेवाले को दिया गया उनका यह उत्तर यह मेरे लिए साफ-साफ सन्देश था। किन्तु भाषा को लेकर चल रही हमारी बात में आधा घण्टा कब निकल गया, मालूम ही नहीं हुआ। उनका फोन फिर घनानाया। इस बार बोले - ‘हाँ। हाँ। आ जाओ।’ सुनकर मैं उठने को हुआ तो मुझे रोकते हुए बोले - ‘रुकिए। आप एक अच्छे प्रसंग का आनन्द लेकर जाइए।’
 
पाँच मिनिट भी नहीं हुए कि सात बच्चियों के साथ एक सज्जन प्रकट हुए। मालूम हुआ कि वे सातों बच्चियाँ एक निजी स्कूल की, आठवीं कक्षा की छात्राएँ हैं और चाँदनीवालाजी का साक्षात्कार लेने आई हैं। इतनी छोटी बच्चियाँ और सबको एक साथ चाँदनीवालाजी का साक्षात्कार लेना है! खुद चाँदनीवालाजी को बात समझ नहीं आई। अब मुझे लगा कि मुझे रोकते समय खुद चाँदनीवालाजी को पूरी बात मालूम नहीं हो पाई थी। बच्चियों ने बताया कि उनकी कक्षा के समस्त बच्चों को, नगर के कवियों से साक्षात्कार लेने का प्रोजेक्ट दिया गया है। इस क्रम में वे प्रो. रतन चौहान और मालवी के लोक कवि पीरुलालजी बादल के साक्षात्कार ले चुकी हैं। प्रो. रतन चौहान ने ही चाँदनीवालाजी का नाम-पता, फोन नम्बर इन बच्चियों को दिया था। जानकर हम दोनों को ताज्जुब भी हुआ और अच्छा भी लगा।
 
बच्चियाँ अपने प्रश्न लिख कर लाई थीं और देख-देख कर प्रश्न पूछ रहीं थीं। किन्तु दो बच्चियों ने प्रश्नों में से प्रश्न निकाल लिए। यह देखकर हम दोंनों को और अच्छा लगा। घण्टा भर से अधिक समय तक वे बच्चियाँ चाँदनीवालाजी से बातें करती रहीं। लिख कर लाए सवालों के बीच ही ‘विधा का अर्थ क्या होता है, तुकान्त-अतुकान्त कविता क्या होती है, दोनों में क्या अन्तर होता है, गेय-अगेय का अर्थ और अन्तर क्या होता है’ जैसी कुछ और  महत्वपूर्ण  बातें  भी  सामने  आईं।  चाँदनीवालाजी  ने  अपनी एक सस्ंकृत-कविता का सस्वर पाठ किया। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर बच्चियों द्वारा पूछे गए सवालों से मुझे भी चाँदनीवालाजी के बारे में कई जानकारियाँ पहली बार मिलीं। बच्चियों ने जब उनसे उनकी माँ का नाम पूछा तो चाँदनीवालाजी अनायास ही भावुक हो गए। विगलित स्वरों में बोले - ‘किसी ने पहली बार मुझसे मेरी माँ का नाम पूछा।’
 
 
चॉंदनीवालाजी से  सवाल  पूछती बच्चियॉं
 
 
जाने से पहले चाँदनीवालाजी ने बच्चियों से आग्रह कर उनके साथ फोटो खिंचवाया। बच्चियों ने उनके ऑटोग्राफ लिए। 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
               चॉंदनीवालाजी ने आग्रह कर बच्चियों के साथ फोटो खिंचवाया
 
 
 
बच्चियों को ऑटग्राफ देते हुए चॉंदनीवालाजी
 
च्चियों के जाने के बाद हम दोनों, निजी स्कूलों के चाल-चलन में आए इस अनपेक्षित किन्तु सुखद बदलाव पर चर्चा करते रहे। यह सचमुच में ‘शिक्षा’ तो थी ही, अपने नगर के साहित्यकारों से मिलने का, उनसे बात करने का एक सुन्दर और दूरगामी प्रभाववाला अवसर भी इन बच्चियों को उपलब्ध कराया गया था। ऐसे उपक्रम बच्चों को अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत और परम्पराओं से परिचित कराने का श्रेष्ठ माध्यम होते हैं। यह ऐसा प्रोजेक्ट था जिसमें बच्चों के माता-पिता पर एक पाई का आर्थिक वजन नहीं पड़ा। इसके विपरीत, बच्चे सचमुच में ‘सम्पन्न और समृद्ध’ ही हुए। ऐसे प्रोजेक्ट बच्चों के व्यक्तित्व विकास में सचमुच में सहायक होते हैं।
 
चाँदनीवालाजी ने और मैंने ईश्वर से एक साथ प्रार्थना की - निजी स्कूलवालों को ऐसी ही बुद्धि देना ताकि बच्चे  अपने साहित्यकारों से परिचित हो सकें, अपनी इस विरासत को जान सकें, समझ सकें।

पत्थर का शोरबा बनानेवाला देश

समाचार पढ़कर पहले क्षण तो गुस्सा आया लेकिन अगले ही क्षण कपूर हो गया और खुद पर पहले झेंप और उससे लगी-लगीई हँसी आ गई। मैं अपने कस्बे के लोगों पर बेकार ही गुस्सा कर रहा हूँ। सारे देश में ही यही तो हो रहा है!
 
सारा देश पत्थर का शोरबा बनाने में जुटा हुआ है।

मेरे कस्बे के एक बड़े, निजी स्कूल ने अपने यहाँ पढ़ रहे बच्चों को हिदायत दे दी कि वे स्कूटर-मोटर सायकिल जैसे वाहन लेकर न आएँ क्योंकि अवयस्कों का ऐसे वाहन चलाना गैरकानूनी है। स्कूल का परिसर खूब बड़ा है और बच्चों के वाहन वहीं खड़े किये जाते थे। स्कूल का फरमान सुन कर पालकों और समझदार बच्चों ने इसका तोड़ निकाला - अपने वाहन स्कूल परिसर में नहीं, स्कूल की कम्पाउण्ड वाल के बाहर, सड़क पर खड़े करना शुरु कर दिया। यह तोड़ स्कूलवालों की समझ में तो आया किन्तु ‘आँख ओट, पहाड़ ओट’ की तर्ज पर उन्होंने सन्तोष कर लिया और खुश हो गए कि उन्होंने अपने स्कूल के बच्चों को एक कानून से न केवल परिचित करा दिया अपितु उनसे उसका पालन भी करवा लिया।

लेकिन, ‘भैया की शादी हुई और माँ मर गई, घर में फिर से तीन के तीन’ वाली कहावत चरितार्थ हो गई। यातायात पुलिसवाले हरकत में आ गए। उन्होंने, सड़क पर पार्किंग के अपराध में वाहनों के चालान बनाने शुरु कर दिए और जिन्होंने चालान की रकम नहीं दी, उनके वाहन जप्त करना शुरु कर दिया। चालान की रकम कम से कम चार सौ चालीस रुपये। इतनी बड़ी रकम अपवादस्वरूप ही किसी बच्चे के पास होती है। सो, स्कूल की कम्पाउण्ड वाल के बाहर खड़े, लगभग सारे के सारे वाहन जप्त हो गए। पहले ही दिन भूचाल आ गया।

पहले दिन तो पालकों ने वाहन छुड़ा लिए लेकिन सब समझदार तो थे ही। अब वे सीधे प्रशासन के सामने खड़े हैं। माँग कर रहे हैं कि, सबको अनुकूल लगनेवाला कोई रास्ता निकाल कर उन्हें राहत दी जाए। सबने एक स्वर में कहा कि ऑटो रिक्शा में उनके बच्चे सुरक्षित नहीं है और न ही उनके पास इतना समय है कि प्रतिदिन अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने और लेने के लिए आ-जा सकें। 

मैंने अधिकांश पालकों से बात की। सब जानते और मानते हैं कि अवयस्क बच्चों का स्कूटर-मोटर सायकिल चलाना गैर कानूनी है। सब कबूल करते हैं कि स्कूल ने अच्छा काम किया। वे यह भी कबूल करते हैं कि यातायात पुलिस ने अपना काम किया और ऐसा काम पूरे कस्बे में समान-भाव से किया जाना चाहिए। फिर?

मैंने कहा कि वे अपने बच्चों को सायकिल से स्कूल भेजना शुरु कर दें। जिनके घरों में  सायकिल हैं, उन्होंने तो पहले ही यह बात सोच ली किन्तु उनके बच्चे तैयार नहीं। उन्हें सायकिल से स्कूल आना स्वीकार नहीं। उनकी ‘पोजीशन’ का सवाल उन्हें (बच्चों को!) इसकी अनुमति नहीं देता। अधिकांश पालकों ने कहा कि उनके पास नई सायकिल खरीदने के पैसे नहीं हैं जबकि कुछ पालकों ने मेरी इस सलाह को अपनी बेइज्जती माना। उनका कहना था कि जब भगवान ने ‘सब कुछ’ दे रखा है और वे अपने बच्चों के लिए ऐसे दुपहिया वाहन तो क्या, चार-पहिया वाहन भी ‘अफोर्ड’ कर सकते हैं तो अपने बच्चों को सायकिल से स्कूल क्यों भेजा जाए। ऐसे सारे पालकों ने भी इसे अपनी ‘स्थापित सामाजिक/सार्वजनिक प्रतिष्ठा के विपरीत’ ही माना।

मैंने पूछा - ‘तब आप ही बताइए कि क्या किया जाए? आप खुद कलेक्टर होते तो क्या करते?’ कुछ ने चुप रहने की समझदारी बरती किन्तु अधिकांश ने गैरजिम्मेदारी से (अत्यधिक अशिष्टता और सीनाजोरी से) कहा कि यह उनका नहीं, प्रशासन का सरदर्द है। खुद के कलेक्टर होने के मेरे तर्क पर जवाब मिला - ‘कलेक्टर बनवा दीजिए। बता देंगे कि क्या रास्ता निकालते हैं।’

कुछ पालकों का सुझाव है कि स्कूली बच्चों को दुपहिया वाहन चलाने की छूट दे दी जाए। लेकिन ऐसा कहनेवाले, कहने से पहले ही अनुभव कर रहे थे कि इस छूट का भरपूर दुरुपयोग होगा और छूट अर्थहीन हो जाएगी। इसलिए किसी ने जोर से यह बात नहीं कही।

समस्या यथावत् बनी हुई है। कोई भी अपनी बात से पीछे हटने को तैयार नहीं है। किन्तु कुछ छुट भैये नेता सक्रिय हो गए हैं और लग रहा है कि वे बात को ‘वोट’ से जोड़कर अपने आकाओं के जरिए, प्रशासन को इस छूट के लिए मना लेंगे और सब कुछ पूर्ववत् हो जाएगा। स्कूलवाले कह देंगे कि वे तो बच्चों से कानून का पालन करवा रहे थे किन्तु क्यों करें? कलेक्टर ने ही छूट दे दी। पालक खुश हो जाएँगे कि वे रोज सुबह की आफत से या नई सायकिल खरीदने के खर्च से मुक्त हो जाएँगे या कि अपनी इज्जत बनाए रखने में कामयाब। और रहा सवाल यातायात पुलिस का तो वे भी खुश ही होंगे। एक झंझट से मुक्ति मिली।

सारे देश में यही हो रहा है। पत्थर का शोरबा बन रहा है।

खेड़ा में खड़े हैं ब्रह्माजी

देश में मन्दिरों की संख्या दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही है। मन्दिरों की ही क्यों? प्रत्येक समुदाय अपने-अपने धार्मिक आस्था स्थलों की संख्या बढ़ाने में लगा हुआ है। इसके पीछे ‘आस्था’ तो नाम मात्र की ही दिखाई देती है। दिखाई देती है तो केवल, ‘अपने धर्म का दबदबा बढ़ाने’ की संकुचित, अधार्मिक प्रवृत्ति। इस मामले में सड़कों के आसपास की जमीनें सर्वाधिक आसान और उपयुक्त होती हैं। वहाँ न तो किसी से पूछना पड़ता है और न ही कोई आपत्ति जताता है। आते-जाते किसी दिन अचानक ही, सड़क किनारे कुछ पत्थरों की ढेरी और उस पर जैसे-तैसे अटकाई हुई, छोटी सी हरे/भगवा रंग की झण्डी नजर आती है। यह छोटी सी शुरुआत कालान्तर में कब मन्दिर या मजार में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता। ऐसे धार्मिक स्थल जब यातायात में या सड़क के विस्तार में बाधक अनुभव होने लगते हैं तब तक स्थिति ऐसी बन जाती है कि कोई भी सरकार या प्रशासन उसकी ओर आँख उठाने की हिम्मत भी नहीं कर सकता - पता नहीं, कब धार्मिक भावनाएँ भड़क जाएँ।

सड़क किनारे बनने वाले ऐसे मन्दिरों में हनुमानजी सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। मजार किसी भी पीर/बाबा की हो सकती है। कुछ मामलों में स्थानीय ग्राम-देवी/देवता स्थापित कर दिए जाते हैं।

लेकिन, मन्दिरों/मजारों के मामले में ‘सरप्लस’ होते जा रहे इस देश में ब्रह्माजी का कोई मन्दिर बनने की बात मैंने कहीं नहीं देखी/सुनी। ब्रह्माजी के मन्दिर के मामले में ले-दे कर एक ही मन्दिर देखा मैंने - पुष्कर में।

ऐसे में, अपनी बदनावर यात्रा में मैंने जब ब्रह्माजी की मूर्ति के बारे में सुना तो पहले ही क्षण मूर्ति देखने की इच्छा उत्कट हो गई। मेरी बदनावर यात्रा करानेवाले माँगीलालजी यादव ने जब पूछा - ‘चलें क्या ब्रह्माजी की मूर्ति देखने?’ तो मैंने उनका सवाल पूरा होने से पहले ही जवाब दिया - ‘फौरन चलिए।’

बदनावर से लगा हुआ ही छोटा सा गाँव है - खेड़ा। (बदनावर की मामूली जानकारी यहाँ उपलब्ध है।) इसे बदनवार का मोहल्ला भी कह सकते हैं। ग्राम पंचायत बनी हुई है। बदनावर से, मुश्किल से एक किलोमीटर दूर है। इसी खेड़ा के एक खेत में खड़े हैं ब्रह्माजी।

इस मूर्ति के बारे में भी बतानेवाला कोई नहीं मिला। केवल यही बताया जाता है कि कुछ बरस पहले यह जमीन में से निकली थी।

मूर्ति पहली नजर में पूर्ण अनुभव होती है - खण्डित नहीं। धर्म के नाम पर अपनी पहचान बनानेवालों ने इस पर आईल पेण्ट पोत कर इसका पुरातात्विक महत्व कम कर दिया है। पुष्कर में ब्रह्माजी बैठे हैं जबकि ये खड़े हैं। खेड़ा के सुनसान खेत में खड़े ब्रह्माजी, अपनी देखभाल करनेवालों की प्रतीक्षा करते लगते हैं।

मूर्ति के कुछ चित्र देख कर बाकी अनुमान आप खुद ही लगाएँ क्यों कि जैसा मैं कह ही चुका हूँ - पुरातत्व मेरा विषय नहीं है और मूर्ति के बार में बतानेवाला वहाँ कोई नहीं मिला।

पूरी मूर्ति


मूर्ति के तीन मुँहों वाले अंश का क्लोज-अप


मूर्ति के पाँवों के दोनों ओर एक-एक युगल की मूर्तियाँ बनी हुई हैं।


मूर्ति के सामने खड़े होकर देखने की दिशा के मान से, पैरों की दाहिनी ओर बनी युगल मूर्तियों का क्लोज-अप।


मूर्ति के सामने खड़े होकर देखने की दिशा के मान से, पैरों की बाँयर ओर बनी युगल मूर्तियों का क्लोज-अप। महिला मूर्ति ने बाँये हाथ में कलश उठा रखा है।


मूर्ति और मूर्ति के सामने रखे  पत्थर के बीच ‘सुरक्षित’ रखी हुई ताश की गड्डी। ‘वक्त-कटी’ के लिए चरवाहों और खेतीहर मजदूरों ने यह व्यवस्था कर रखी होगी।

बदनावर के नागेश्‍वर महादेव

पुरातत्व मेरा विषय नहीं है। किन्तु पुरावशेष देखना अच्छा  लगता  है - भले ही मैं न तो उन्हें जान पाऊँ और न ही उनका महत्व। गणित और इतिहास मेरे लिए सदैव ही ‘भयानक’ विषय रहे और पुरातत्व तथा इतिहास का रिश्ता तो चोली-दामन का है! इसलिए, मैं इतना भर जान लेता हूँ कि फलाँ गाँव/कस्बे में पुरावशेष हैं और मौका मिले तो उन्हें देख भी लेता हूँ। बस। अब इसे मेरी मूर्खता समझा जाय या अपनी विरासत के प्रति आपराधिक उपेक्षा भाव। मैं ऐसा ही हूँ। इस विषय में जो ‘थो ऽ ऽ ऽ ड़ी सी रुचि’ बनी है उसके लिए आदरणीय राहुलसिंहजी जिम्मेदार हैं। उसके लिए मुझे दोषी न समझा जाए।

सो, जब दो दिन पहले बदनावर गया और मालूम हुआ कि वहाँ कुछ पुरावशेष हैं तो देखने चला गया।

बदनावर मेरे कस्बे से, इन्दौर के रास्ते पर चालीस किलोमीटर दूर है। मुख्य सड़क से दो किलामीटर अन्दर जाना पड़ता है बदनावर पहुँचने के लिए। यहाँ से, बाजबहादुर-रूपमती वाला माण्डू, पचास किलोमीटर पड़ता है। यह धार जिले में आता है। तहसील मुख्यालय है और सम्पन्न गाँवों से जुड़ा, प्रमुख व्यापारिक केन्द्र है।

बदनावर कस्बे में और इसके आसपास काफी पुरा सम्पदा बिखरी पड़ी है। कस्बे में घुसते ही एक काफी प्राचीन, बहुत बड़ा मन्दिर मिलता है। संयोगवश मैं इस मन्दिर में न तो जा पाया और न ही इसके चित्र ले पाया। बस, पास से निकल आया। किन्तु मन्दिर आकर्षक है। केवल उसी के लिए एक बार फिर बदनावर जाऊँगा।

बदनावर से लगभग पॉंच किलोमीटर दूर, नागेश्वर महादेव मन्दिर जाना हुआ। कष्टवाली बात यह रही कि इस मन्दिर के बारे में बतानेवाला कोई नहीं था। इस मन्दिर का बाह्य स्वरूप जरूर आधुनिक हो गया है किन्तु अन्दरवाला हिस्सा लगभग जस का तस बना हुआ है।

यहाँ जन सामान्य का आना-जाना बहुत ही कम है। लोग तभी आते हैं जब उन्हें यहाँ आना पड़ता है। बदनावर के श्री शेखर यादव ने इस मन्दिर के पास ही ‘शहीद गैलरी’ बनाई है। मैं उसे ही देखने गया था। यह मन्दिर तो मेरे लिए बोनस रहा।

यह मन्दिर पुरामहत्व का तो है ही, इसकी अपनी ऐतिहासिकता भी है। पुरा प्रमियों के लिए यह पोस्ट सूचना या निमन्त्रण मात्र है।

इसी नागेश्वर महादेव मन्दिर के चार चित्र यहाँ प्रस्तुत हैं।



मन्दिर का बाह्य चित्र



मन्दिर में स्थापित शिव लिंग


वही शिव लिंग दूसरे कोण से


मन्दिर के मण्डप की शिल्प-सज्जा देखते ही बनती है। मण्डप में उकेरी गई मूर्तियों में से नौ मूर्तियाँ चोरी हो गई हैं। चित्र में एक मूर्ति दिखाई दे रही है और आसपास की, चोरी हो चुकी दो मूर्तियों की खाली जगह आसानी से देखी जा सकती है।

‘अगली बार’ की प्रतीक्षा, हर बार

ये हैं हमारे डॉक्टर संघई साहब (डॉक्टर विजय कुमारजी संघई) और उनकी उत्तमार्द्ध, हमारी मीरा भाभी। मेरी पीढ़ी के बादवालों को तो पता ही नहीं होगा कि डॉक्टर साहब मूलतः मनासा के निवासी नहीं है। नागपुर के पास अंजनगाँव के मूल निवासी थे। मेरे गाँव मनासा (जिला नीमच) के सरकारी अस्पताल में सहायक सर्जन बन कर आए थे। उस जमाने में, जब इनके हस्ताक्षरों से मनासा के सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह सरकारी खजाने से निकल पाती थी।

नौकरी करते-करते वे कब मनासा के हो गए, न तो उन्हें पता लगा और न ही मनासा के लोगों को। अचानक ही उनका तबादला हुआ तो उन्हें और पूरे मनासा को याद आया - ‘अरे! ये तो सरकारी नौकरी में हैं।’
 
मनासा में मानो भूचाल आ गया था। डॉक्टर साहब भोपाल गए - पता नहीं, तबादला रुकवाने या त्याग-पत्र देने। किन्तु लौट कर मनासा पहुँचते, उससे पहले ही मनासा के लोग उनका भविष्य तय कर चुके थे। खाली पड़ा, जगदीश टॉकीज लोगों ने उनके लिए किराये पर ले लिया था। डॉक्टर साहब मनासा बस स्टैण्ड पर उतरे तो लोगों ने जगदीश टॉकीज की चाबी थमा दी - ‘लीजिए! अपना अस्पताल शुरु कीजिए।’ डॉक्टर साहब ने भी लोगों का कहा मान लिया, चुपचाप। और कुछ ही दिनों बाद वहाँ ‘मंगला क्लीनिक्स एण्ड नर्सिंग होम’ शुरु हो गया।
 
अस्पताल शुरु हुआ और जैसे, होली की माँदल की मादक थाप, धीरे-धीरे पूरे वातावरण को अपनी गिरफ्त में ले लेती है, सबको बेसुध कर देती है, कुछ इसी तरह डॉक्टर साहब का यह अस्पताल पूरे मनासा और आसपास के गाँवों की आदत बन गया।
 
आज संघई परिवार और मनासा ‘यौगिक’ बने हुए हैं। कोई ताज्जुब नहीं कि कभी कोई अचानक ही डॉक्टर साहब से पूछे -‘डॉक्टर साहब! आप कहाँ के हो?’ तो डॉक्टर साहब कहें - ‘एक मिनिट रुक। सोच कर बताता हूँ।’ डॉक्टर साहब की दोनों बेटियों और तीनों बेटों ने मनासा में ही आँखें खोलीं। आज डॉक्टर साहब और मीरा भाभी अपनी तीसरी पीढ़ी का सुख भोग रहे हैं। बड़ा बेटा मनोज, ‘छोटे डॉक्टर साहब’ बन कर विरासत को बेहतरी देने की जिम्मेदारी निभा रहा है। ‘मंगला क्लनिक्स एण्ड नर्सिंग होम’ खुलने के बाद मनासा में और भी निजी अस्पताल खुले तो हैं किन्तु अधिसंख्य परिवारों का  ‘खानदानी डॉक्टर’ का जिम्मा संघई साहब ही निभा रहे हैं। स्थिति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि फोन की घण्टी बजती है, डॉक्टर साहब ‘हेलो’ कहते हैं। उधर से आवाज आती है - ‘डॉक्टर साहब! मैं रामनारायण बोल रहा हूँ। सात दिन पहले आपने बई (माँ) को देखा था। सुबह तक तो ठीक थी लेकिन दोपहर से फिर से खाँसी का दौरा पड़ गया है। क्या करूँ?’ डॉक्टर साहब पूछते हैं - ‘कौन रामनारायण? विश्वनाथजी का बेटा?’ उधर से जवाब आता है - ‘हाँ डॉक्टर साहब। वो ही।’ और डॉक्टर साहब फोन पर ही दवा बता देते हैं। 
 
ऐसा पाँच-सात बार हुआ कि संघई साहब मनासा से बाहर थे और मेरी माँ बीमार हो गई। दूसरे डॉक्टर से ईलाज करवाया किन्तु तबीयत ठीक नहीं हुई। हम जब भी गोलियाँ/दवाइयाँ देते, वह मना करती - ‘मुझे मत दो ये गोलियाँ। मेरा ईलाज तो संघई साहब ही करेंगे।’ और होता भी ऐसा ही। संघई साहब आते। मेरी माँ को देखते। दूसरे डॉक्टर की दी हुई गोलियों/दवाइयों को देखते और कहते - ‘ठीक तो है!  और कौन सी दवा दूँ? यही ईलाज चलेगा आपका।’ और हर बार हम सब ने देखा कि दूसरे डॉक्टर की जो गोलियाँ माँ पर असर नहीं कर रही थीं, संघई साहब के देखने के बाद वे ही गोलियाँ असरकारक हो जातीं। ऐसी दशा केवल मेरी माँ की नहीं थी। गोया, संघई साहब डॉक्टर न रह कर खुद औषधि बन गए - समूचे अंचल के।

 
लेकिन मुझे डॉक्टर साहब के बारे में नहीं, मीरा भाभी के बारे में लिखना है।

 
मेरे परिवार के सन्दर्भ में कहूँ तो मेरी माँ और भाभी के बाद मीरा भाभी ही हमारे घर की सबसे बड़ी महिला सदस्य बनी रहीं। मैंने मनासा छोड़ दिया। मनासा आना-जाना दिन-ब-दिन कम होता गया। लेकिन संघई साहब और मीरा भाभी से मिलना हर बार अनिवार्यता होता है। हर बार बाकी सारी बातें तो बदल जाती हैं किन्तु एक बात बिलकुल नहीं बदलती - मीरा भाभी की ‘मीरा सुपर चाय।’

 
किस्सा कुछ इस तरह ‘अथ’ से ‘इति’ तक पहुँचता है -

 
मैं अस्पताल पहुँचता हूँ। डॉक्टर साहब और मीरा भाभी के चरण स्पर्श करता हूँ। दोनों खुश होते हैं। मुझे आशीर्वाद देते हैं। डॉक्टर साहब प्रायः ही व्यस्त रहते हैं। सो, मैं मीरा भाभी के पास ही बैठ जाता हूँ। कुशल-मंगल जानने के बाद सम्वाद शुरु होता है -

‘विष्णु! चाय तो पीएगा ना?’

‘हाँ भाभी! पीयूँगा तो सही। लेकिन बिना शकर की।’

‘बिना शकर की? क्यों? शुगर हो गई क्या?’

‘नहीं भाभी! शुगर नहीं है।’

‘तो फिर बिना शकर के क्यों?’

‘वो क्या है भाभी कि वजन बहुत बढ़ गया है और चलना-फिरना होता नहीं। इसलिए शकर बन्द कर दी। शकर से वजन बढ़ता है। डॉक्टर साहब ही तो कहते हैं!’

‘हाँ। वो तो है। सही बात है। अच्छा किया जो शकर छोड़ दी। कब से छोड़ी?’

‘बहुत दिन हो गए भाभी।’

‘बिलकुल नहीं लेता?’

‘नहीं भाभी। कभी-कभी लेनी पड़ जाती है। बीमे का मेरा काम ही ऐसा है। जहाँ जाओ, चाय आगे मिलती है। लोग मुझसे पूछे बिना बना लेते हैं तो शकरवाली चाय पीनी पड़ जाती है। वरना मैं फीकी चाय ही पीता हूँ।’

सम्वाद के दौरान ही मीरा भाभी का, चाय बनाने का उपक्रम चालू रहता है। गैस जलाई। दूध-पानी रखा। कुनकुना हुआ नहीं कि इलायची-मसाला डाला। चाय उबलने को होती है। मीरा भाभी चाय-पत्ती डालती हैं। एक-दो उबाल आए नहीं कि भाभी पूछती हैं -

‘शकर बिलकुल ही नहीं लेता कि कम शकर लेता है?’

‘नहीं भाभी। बिलकुल ही नहीं।’

‘नाम को भी नहीं?’

‘नहीं भाभी। नाम को भी नहीं। बिलकुल फीकी।’

‘बात तो अच्छी है लेकिन फीकी चाय कैसे पीता होगा तू? कैसी लगती होगी?’

‘आराम से पी लेता हूँ भाभी। अच्छी लगती है। आदत हो गई है।’

‘वे तो ठीक है। लेकिन बिना शकर की चाय, चाय नहीं होती।’

तब तक चाय अच्छी-भली उबल चुकी होती है। इतनी कि बस छानना ही बाकी रह जाता है। इस बीच मीरा भाभी, रसोई के प्लेटफार्म पर कप-प्लेट जमा चुकी होती हैं। अब कुछ भी काम बाकी नहीं है। बस! चाय छाननी बाकी है। तभी मीरा भाभी सुर बदलती हैं -

‘तेने कहा कि कभी-कभी शकरवाली चाय पीनी पड़ जाती है?’

‘हाँ भाभी।’

‘तो फिर ऐसा करना कि अगली बार फीकी पी लेना। आज शकरवाली पी ले।’

और मैं कुछ कहूँ उससे पहले मीरा भाभी, बिजली को मात देती हुई ‘एक..दो..तीन..चार..पाँच....’ गिनती हुई, ‘मुक्त-मन, मुक्त-हस्त’ से, औढरदानी बन, उबलती चाय में शकर डाल देती हैं और जब तसल्ली हो जाती है कि हाँ, अब शकर घुल भी गई और उबल भी गई - तो तसल्ली से, ‘सेठाणी के ठसके और माँ की फिकर से’ चाय छान कर कप थमाती हुई कहती हैं - ‘बात तो तेरी बिलकुल ठीक है विष्णु! लेकिन बिना शकर की चाय, चाय नहीं होती। शकर में चाय कम से कम इतनी तो होनी ही चाहिए कि पीते-पीते होठ चिपक जाएँ। चाय तो ऐसी ही होती है। नहीं तो चाय, चाय नहीं होती।’

मैं कुछ नहीं बोलता हूँ। हँसते-हँसते कप थाम लेता हूँ। मुझे पहले ही क्षण से पता रहता है कि ऐसा ही होगा - वे हर बार कहती हैं ‘अगली बार फीकी पी लेना’ लेकिन यह ‘अगली बार’ एक बार भी नहीं आता। हर बार ‘अगली बार’ बना रहता है - बिलकुल, गाँव की, परचून की दुकान पर, गत्ते पर चिपकाए कागज पर लिखी इबारत ‘आज नगद-कल उधार’ की तरह, जहाँ उधार मिलनेवाला कल कभी नहीं आता।

मुझे चाय पीता देख मीरा भाभी पूछती हैं - ‘ज्यादा मीठी तो नहीं हुई?’

मैं जवाब देता हूँ - ‘‘नहीं भाभी! बिलकुल भी नहीं। बस! पहले जैसी ही मीठी है - ‘मीरा सुपर चाय’ का स्टैण्डर्ड बराबर बना हुआ है।’’ वे खुश हो जाती हैं। मानो, मुझसे यही सुनने के लिए सारा खट-करम किया हो। मैं सहास्य पूछता हूँ - ‘भाभी! आप कभी फीकी चाय पीलाएँगी भी?’ वे मुझसे अधिक सहास्य उत्तर देती हैं - ‘‘कभी की तभी देखी जाएगी। आज तो तू ‘मीरा सुपर चाय’ पी ले।’’

मुझे उनका कहा मानना ही है। चुपचाप मान लेता हूँ। ‘मीरा सुपर चाय’ पीने लगता हूँ।

उपस्थित की उपेक्षा : अनुपस्थित की तलाश

इसका भान तो मुझे था अवश्य किन्तु इस ओर ध्यान कभी नहीं गया। यह तो, गए दिनों, लगातार तीन बार ऐसा हुआ कि इस ओर ध्यान चला गया।
 
इस बरस या तो विवाह अधिक हुए या फिर हम लोगों को न्यौते अधिक मिले। सब के सब ऐसे के किसी को टाल पाना सम्भव नहीं था। लिहाजा,  हम दोनों, पति-पत्नी, ने अपनी-अपनी पसन्द से आयोजन छाँट लिए। इस तरह हम दो लोगों ने 6 आयोजनों में उपस्थित रहने का व्यवहार निभा लिया। किन्तु हम दोनों को, अपने-अपनेवाले तीनों आयोजनों में एक ही सवाल का सामना करना पड़ा। मेरी उत्तमार्द्धजी से पूछा गया - ‘दादा नहीं आए?’ और मुझसे पूछा गया - ‘भाभीजी को नहीं लाए?’ मेरी उत्तमार्द्धजी तो कहीं कुछ नहीं बोली लेकिन, तीसरी बार जब  मुझसे पूछा गया तो चुप नहीं रहा गया। मैंने कहा - ‘भैया! जो सामने खड़ा है उसकी पूछ-परख तो गई भाड़ में और जो नहीं आया है, उसकी तलाश कर रहे हो? मेरा अकेला आना अच्छा नहीं लग रहा हो तो वापस चला जाऊँ?’ मेजबान झेंप गया। बोला - ‘अरे! कैसी बात कर दी आपने? आपका आना अच्छा नहीं लगता तो आपको बुलाते ही क्यों? लेकिन भाभीजी भी आते तो और अच्छा लगता।’
 
इसी कारण इस ओर ध्यान गया। जो सामने है, उसकी अनदेखी करना और जो सामने है ही नहीं, उसकी पूछ-परख, तलाश, प्रतीक्षा करना। यह क्या है? क्यों है?
 
शायद यह मनुष्य स्वभाव ही है या कि यही मनुष्य स्वभाव है - जो हाथ में है, उसकी अनदेखी कर, जो हाथ में नहीं है, उसकी तलाश करना। यह, कुछ अतिरिक्त प्राप्त करने का लालच है या मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति? या, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं?
 
सयानों से सुनता आया हूँ कि मृत्यु मनुष्य की सहोदर है। मनुष्य के जन्म लेते ही उसकी मृत्यु सुनिश्चित हो जाती है। प्रति पल, उसके सर पर मँडराती, उसके साथ-साथ चलती है। किन्तु अब लग रहा है कि केवल मृत्यु ही नहीं, दुःख भी मनुष्य का सहोदर है। इसीलिए, मनुष्य आजीवन मृत्यु से कन्नी काटता रहता है और सुख की तलाश में खुद को झोंके रखता है। सुख की तलाश की यह आदिम प्रवृत्ति ही मनुष्य के दुःखों का मूल है। अन्यथा, सुख-दुःख तो मानसिक अवस्थाओं के अतिरिक्त और कुछ भी तो नहीं! ‘दर्द का हद से गुजर जाना है दवा हो जाना’ की तर्ज पर दुःख में भी सुख को तलाशा जा सकता है और सुखी रहा जा सकता है। इसी के समानान्तर कहा जाता है कि दुःखी होने के लिए मनुष्य को किसी और की आवश्यकता नहीं होती। इसका विलोम सूत्र अपने आप ही सामने आ जाता है - मनुष्य चाहे तो परम् सुखी रह सकता है। बात वही है - मनःस्थिति की। जिस तरह ‘मन के जीते जीत है, मन के हारे हार’ होती है। उसी तरह मानो तो दुख ही दुख और मानो तो सुख ही सुख।
 
यह मनःस्थिति ही तो है कि टेकरी पर बनी फूस की अकेली टपरिया में आदमी घोड़े बेच कर सो लेता है और अट्टालिकाओं/प्रासादों में, गुदगुदे बिस्तरों पर लेटे आदमी को, सोने के लिए नींद की गोलियाँ खानी पड़ती हैं। मनुष्य ने भले ही गरीबी और अमीरी के भौतिक पैमाने बना लिए हों किन्तु हमारा ‘लोक’ तो इन्हें भी मनःस्थिति ही मानता है। कोई साढ़े चार बरस पहले की मेरी इस पोस्ट के तीसरे हिस्से में लिखी मालवी लोक कथा ‘गरीब’ काफी-कुछ कह देती है।
 
किन्तु इसके समानान्तर एक सच और है - ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाला सच। उपदेश या सलाह तो होती ही है दूसरों के लिए! उस पर आचरण कर लिया तो वह ‘उपदेश’ या ‘सलाह’ का गुण नहीं खो देगी? इसी के चलते, मुझे आकण्ठ विश्वास है कि मैं भी सुखी नहीं रह पाऊँगा। अन्ततः हूँ तो एक सामान्य मनुष्य ही - सुख की तलाश में घूमने की आदिम प्रवृत्ति से संचालित।

समय, मनुष्य और मेरी उलझन

कल जो कुछ हुआ उससे उलझन में हूँ। बड़ा या कि बलवान कौन है - समय या मनुष्य?
 
कल रात ‘वे’ आए थे। बरसों से उन्हें देखता आ रहा हूँ। सम्पन्नता के सहोदर थे। आर्थिक सहायता की अपेक्षा में लोग उनके सामने पंक्तिबद्ध खड़े रहते थे। सब कुछ ठीक ही चल रहा था। किन्तु नहीं, कब, क्या हुआ कि दशा बदल गई। आज वे ‘विपन्न’ तो नहीं हैं किन्तु ‘भरे-पूरे’ भी नहीं रहे। उनके रहन-सहन और कपड़े-लत्तों से काफी-कुछ समझ में आ जाता है। उनके कहे बिना ही। कल के ‘दाता’ को आज ‘याचक-मुद्रा’ में देखना मुझे असहज भी कर रहा था और भयभीत भी।
 
घुमा-फिरा कर उन्होंने जो कुछ कहा उसका एक ही अर्थ था - उन्हें आर्थिक सहायता चाहिए थी। मुझे सिहरन हो आई। मैं भी किसी के लिए आर्थिक सहायता का अपेक्षा-बिन्दु हो सकता हूँ! मुझसे जो बन पड़ा, किया। रुपये हाथ में लेते-लेते वे रो पड़े। बोले - ‘आपने तो मुझसे कभी एक पैसे की मदद नहीं ली लेकिन मुझे मदद कर रहे हैं। दूसरी तरफ वो लोग हैं जिनकी मैंने बार-बार मदद की लेकिन आज जब मैं तंगी में हूँ तो मेरी ओर देख ही नहीं रहे हैं। माँगने पर भी मदद नहीं कर रहे हैं।’ यह स्थिति मेरे लिए और अधिक कष्टदायक थी। मैं पहले से ही असहज था और अब यह क्षण? उन्हें तसल्ली देने से पहले खुद को संयत करना जरूरी था। तनिक कठिनाई से उन्हें तसल्ली दी। ढाढस बँधाया। कहा कि जब ‘वह समय’ नहीं रहा तो ‘यह समय’ भी नहीं रहेगा। बस! हाथ-पाँव मारते रहें। गहरी और लम्बी निश्वास छोड़ते हुए वे बोले - ‘आप कह तो ठीक रहे हैं लकिन अब यही कर पाना तो मुमकिन नहीं हो पा रहा।’ उनका यह जवाब मुझे अच्छा नहीं लगा लेकिन चुप रहा गया।
 
वे तो चले गए लेकिन मुझे मोहनजी याद आ गए।
 
बात पुरानी तो है किन्तु बहुत पुरानी नहीं। मैं अलकापुरी में रहता था। दिसम्बर की, हाड़ जमा देनेवाली ठण्डी रात थी वह। रात एक बजेवाली गाड़ी से हमें बाहर जाना था। ऑटो रिक्शा की तलाश में सज्जन मील आया। दो ऑटो रिक्शा खड़े थे। एक खाली था। दूसरे में, पीछेवाली सीट पर एक आदमी सो रहा था। उसे उठाया। पूछा - ‘स्टेशन चलोगे?’ ताबड़तोड़ जवाब मिला - ‘हाँ। हाँ। जरूर चलेंगे सा’ब। इसीलिए तो आधी रात में यहाँ खड़े हैं।’ मैं भाव-ताव करने लगा तो वह बोला - ‘अपनी आत्मा की बात सुनकर आप जो भी देंगे, वही मेरा भाड़ा होगा। बेफिकर रहिए! मैं कोई बहस नहीं करूँगा। बस! मौसम, वक्त और आपकी जरूरत के आधार पर तय कीजिएगा।’ स्कूटर पर आगे-आगे मैं और पीछे-पीछे ऑटो रिक्शा।

घर के छोटे से आँगन में मैंने अपना स्कूटर खड़ा किया। तब तक मेरी उत्तमार्द्ध और बच्चे, सामान लेकर बाहर आ चके थे। दरवाजे पर ताला लगा कर ऑटो रिक्शा में सामान रखते हुए, ऑटो चालक की शकल देखते ही मैं जड़ हो गया। मेरी रीढ़ की हड्डी में सिहरन हो आई और हाड़ जमा देनेवाली उस ठण्ड में भी मुझे पसीना आ गया। वे मोहनजी थे। मोहनजी - पत्रकारितावाले अपने समय में मैं जिनके दफ्तर के बाहर, विज्ञापन माँगनेवालों की कतार में खड़ा रहा करता था! मोहनजी - विशाल कारोबारी संस्थान के स्वामी और बीसियों कर्मचारियों के नियोक्ता! मोहनजी - जिनके साथ चाय पीने का प्रसंग हमारे लिए उल्लेखनीय होता था! वही मोहनजी इस दशा में? मेरी घिघ्घी बँध गई। मेरी यह दशा देख, मोहनजी हँसे। मेरे हाथ से सामान लेते हुए बोले - ‘चौंकिए मत। मैं मोहन ही हूँ। मैंने तो आपको वहीं, सज्जन मील के सामने ही पहचान लिया था। जल्दी कीजिए। बैठिए। अभी तो यात्रा कीजिए। लौट कर मिलिएगा। तभी बात करेंगे।’ तब तक मेरी साँस में साँस आ चुकी थी। हकलाते हुए बोला - ‘मोहनजी! यह क्या? आप इस दशा में?’ वे बोले - ‘सब बता दूँगा। पहले आप बैठिए और स्टेशन चलिए।’

हम सब बैठे। उन्होंने एक झटके में ऑटो स्टार्ट किया। लेकिन मुझसे रहा नहीं जा रहा था। बोला - ‘मोहनजी! कुछ तो बताइए।’ पूरी सहजता से (मैं उनकी शकल नहीं देख पा रहा था किन्तु उनकी संयत आवाज से लग रहा था कि वे हँस रहे हैं) बोले - ‘बखत-बखत की बात है बैरागीजी! कभी घी घणा तो कभी मुट्ठी चणा। सब ठीक हो जाएगा। जब वो बखत नहीं रहा तो यह बखत भी नहीं रहेगा।’
 
मैं यात्रा पर गया तो जरूर लेकिन उन पाँच दिनों में मोहनजी की शकल आँखों के सामने बराबर बनी रही। लौटते ही मोहनजी को तलाश किया। आसानी से मिल गए। कोई घण्टा-सवा घण्टा हम साथ-साथ बैठे। जैसा उन्होंने बताया, कुछ निर्णय गलत हो गए और कारोबार की दशा-दिशा बदल गई। जिन कम्पनियों के सामान की एजेन्सी ले रखी थी, उनमें से कुछ कम्पनियों ने दूसरे व्यापारियों को समानान्तर एजेन्सियाँ दे दीं। मोहनजी की ‘डिपाजिट मनी’ लौटाने में जानबूझ कर देर की। लोगों/कर्मचारियों ने हवा देख कर अपने मचानों की दिशा बदल ली। मोहनजी अकेले भी पड़ गए और संसाधनविहीन भी हो गए। एक दिन अपना बचा-खुचा समेट कर, यहाँ चले आए। कुछ दिनों तक किराए पर लेकर ऑटो चलाया। बाद में खुद का ऑटो खरीद लिया। लेकिन वे रुके नहीं। जो कुछ कर रहे थे, वह मुकाम हासिल करने की जुगत मात्र था।

उनसे मिलना बना रहा। कभी मैं उनके पास चला जाता। कभी वे मेरे घर आ जाते। एक दिन बोले - ‘आज ऑटो बेच दिया है।’ मेरे कस्बे की एक बड़ी, अग्रणी, स्थापित और प्रतिष्ठित व्यापारिक पेढ़ी पर उन्हें प्रमुख मुनीम का काम मिल गया था। कुछ ही महीनों बाद उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और छोटी सी दुकान में ‘जनरल स्टोर’ शुरु कर दिया। उनके इस स्टोर पर मैंने पाँच-सात बार चाय पी। कोई दो-ढाई साल में यह दुकान छोटी पड़ गई। उन्होंने जैसे-तैसे पासवाली, खाली पड़ी दुकान ले ली। उनका जनरल स्टोर धड़ल्ले से चल पड़ा था। उन्होंने ‘मोहन सेठ’ की हैसियत हासिल कर ली थी। लगभग तीन बरस बाद, एक शाम वे आए - ढाई सौ ग्राम मिठाई का डिब्बा हाथ में लिए। बोले - ‘मुँह मीठा कीजिए। कल दुकान का सौदा कर दिया है। अच्छे पैसे मिल गए हैं। साज-सामान, घर-गिरस्ती समेट कर दस-बीस दिनों में गाँव लौट जाऊँगा। यहाँ आपके साथ ने हिम्मत और ताकत दी।’

मैं कुछ भी कह दूँ, कितना ही लिख दूँ किन्तु तब भी मेरी मनोदशा व्यक्त नहीं हो पाएगी। बरसों की इस अवधि में मैंने उन्हें एक बार भी निराश, थका, निरुत्साहित नहीं देखा। उनके मुँह से कभी, किसी की, कोई शिकायत नहीं सुनी। मैंने कहा - ‘मोहनजी! और कुछ नहीं, एक बात बताइए। अपने अच्छे वक्त में आपने अनेक लोगों को उपकृत किया। आपके इस समय में उनमें से किसी ने आपकी मदद की? आपने किसी से मदद माँगी?’ सदैव हँसते रहनेवाले मोहनजी अचानक ही गम्भीर हो गए। बोले - ‘बैरागीजी! मैंने क्या किसी की सहायता की या क्या किसी पर उपकार किया? सबको अपने-अपने भाग्य का मिला। मैं तो निमित्त मात्र था। रहा सवाल किसी से मदद माँगने या मिलने का तो मेरा मानना रहा कि सबको मेरी दशा मालूम थी। जिसे मदद करनी होती, मेरे बिना कहे/माँगे ही कर देता और जिसे नहीं करनी होती वो मेरे माँगने पर भी नहीं करता। इसलिए मैंने किसी से कुछ नहीं कहा। इसके बावजूद कुछ मित्रों ने मेरे माँगे बिना मेरी मदद की। और मदद केवल रुपये-पैसों से ही तो नहीं होती! मेरे इन दिनों में आप मुझसे बराबर मिलते रहे। मेरे साथ बैठते रहे। मेरे सुख-दुःख बाँटते रहे। यह भी तो मदद ही है। मेरा तो मानना है कि मुझे तो सबने मदद की। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं। सब प्रभु इच्छा।’

मोहनजी अपने देस लौट गए। उनका कारोबार फिर अच्छा-भला चल रहा है। पहले जैसी बात तो नहीं है किन्तु तीन कर्मचारियों के नियोक्ता बने हुए हैं।

सोच रहा हूँ - एक ‘वे’ हैं जिनके पास शिकायतें ही शिकायतें हैं और एक मोहनजी हैं जिनके पास शिकायतों के लिए न तो वक्त हैं और न ही विचार और जिन्‍होंने अपनी कर्मठता/पुरुषार्थ से अपनी खोई हैसियत हासिल कर ली।

इन दोनों उदाहरणों ने ही मुझे उलझन में डाल रखा है।
 
बड़ा या बलवान कौन है - समय या मनुष्य?

ऐसे बचाई जाती है हिन्दी

अपनी खुशी प्रकट करने के लिए कोई किसी को डाँट भी सकता है - यह मैंने नरेश से जाना। कह रहा था - ‘सरजी! इतराइए नहीं! आप जैसे और भी लोग हैं दुनिया में।’ पूरी बात सुनकर मुझे आत्मीय प्रसन्नता हुई।

नरेश का पूरा नाम नरेश चौधरी है। उस उम्र में पितृविहीन हो गया कि अपने पिता का चेहरा भी बराबर याद नहीं है उसे। परिवार में छः बहनें और उनका इकलौता भाई नरेश। माँ ने हाड़तोड़ परिश्रम कर सातों को पाला-पोसा, बड़ा किया, पढ़ाया-लिखाया। बचपन में नरेश को खेलने के लिए जो खिलौना मिला वह था - संघर्ष। यह परिवार खुद को कैसे बचाए रख पाया, किस तरह सब बहनों-भाई ने माँ के कन्धे से कन्धा मिलाया, अपनी इच्छाओं पर सात ताले जड़े और किस तरह सबने अपना-अपना मुकाम हासिल किया, वह अविश्वसनीय और प्रेरक संघर्ष-गाथा अपने आप में एक स्वतन्त्र पोथी की सामग्री है।

होश सम्हालने से पहले ही नरेश को घर की जिम्मेदारियाँ सम्हालनी पड़ीं। परिवार का इकलौता पुरुष सदस्य होने के कारण उसे बचपन में ही सयाना हो जाना पड़ा।

नरेश से मेरा परिचय ढाई-तीन दशकों का है। उम्र में वह मुझसे छोटा है किन्तु उसका संघर्ष, उसका जीवट, उसकी जिजीविषा के चलते वह मेरे लिए प्रणम्य है। उससे मैं व्यापारिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत रूप से उपकृत हूँ। अपने आचरण से उसीने समझाया कि किसी की सहायता करने के लिए न तो पैसों की जरूरत होती है न ही पैसेवाला बनना पड़ता है। यह सब भी तब, जबकि हमारे व्यापारिक कारणों से उसे आर्थिक विपत्तियाँ और अपने निजी/व्यापारिक क्षेत्रों में अवमानना झेलनी पड़ी। एक व्यापारिक भागीदारी फर्म के हम तत्कालीन तीन भगीदारों में से मेरे शेष दो भगीदारों की तो मैं नहीं जानता किन्तु मैं खुद को इस क्षण तक नरेश का अपराधी मानता हूँ।

वही नरेश मुझे डाँट रहा था।

हिन्दी के प्रति अपने प्रेम को दुराग्रह में बदल लेना मेरी फितरत हो गई है। इसी के चलते मैंने अपने लेटर हेड पर एक वाक्य छपवा रखा है। वही वाक्य मैंने इस वर्ष अपने दीपावली अभिनन्दन-पत्र पर भी छपवाया था। उसी को लेकर नरेश मुझे टोक रहा था।


हिन्दी के मामले में नरेश ‘खानदानी’ है। साधारण बीमा करनेवाली एक सरकारी कम्पनी में विकास अधिकारी है। परिवार का अच्छा-भला व्यापार है। इस सबमें, जहाँ तनिक भी सम्भावना बनती है, वहाँ अधिकतक काम हिन्दी में करता है। हस्ताक्षरों के बारे में नरेश ने कहा - ‘‘मुझे तो याद भी नहीं आता कि हस्ताक्षर के नाम पर मैंने कभी ‘नरेश’ का ‘न’ भी अंग्रेजी में लिखा हो।’’ ग्यारह जून 1979 को नरेश का विवाह हुआ। सुश्री पूर्णिमा गोयल ( अब हम सबकी पूर्णिमा भाभी) उसकी जीवन संगिनी बनी। वे एक सार्वजनिक बैंक में सेवारत थीं और अपने हस्ताक्षर ‘पी गोयल’ के नाम से करती थीं। किन्तु विवाह के तत्काल बाद से ही वे हिन्दी में हस्ताक्षर करने लगीं और अब तक कर रही हैं। बेटे अपूर्व ने बीई उपाधि भारत में और एमबीए उपाधि अमेरीका में प्राप्त की। गत बारह बरसों से अमेरीका में है। लेकिन हस्ताक्षर और निजी व्यवहार हिन्दी में ही कर रहा है। नरेश की बहू श्वेता अवश्य अंग्रेजी में हस्ताक्षर कर रही है। अमेरीका में रहते हुए उसकी नौकरी के अभिलेखों में उसके हस्ताक्षर शुरु से ही अंग्रेजी में हैं जिन्हें बदल पाना उसके लिए सम्भव नहीं हो पा रहा है। किन्तु उसने घोषित कर दिया है कि स्वदेश वापसी के पहले ही दिन से वह हिन्दी में ही हस्ताक्षर करेगी। नरेश-पूर्णिमा के बेटी प्राची ने अपनी बीई और एमबीए की उपाधियाँ विदेश में ही प्राप्त कीं किन्तु वह अपने हस्ताक्षर हिन्दी में ही करती है। उसने आज तक अंग्रेजी में हस्ताक्षर नहीं किए।

बैठे हुए नरेश के आसपास खडे हुए बॉंये से प्राची, श्‍वेता, अपूर्व और पूर्णिमा भाभी

नरेश से ये सारी बातें जानकर मुझे आत्मीय प्रसन्नता हुई। उस पर गर्व-गुमान तो पहले से ही था। उसमें और बढ़ोतरी हो गई। नरेश का यह उदाहरण साबित करता है कि यदि हम सब अपना-अपना घर सम्हाल लें, जैसे कि नरेश ने सम्हाला है तो हमारे भाषागत संकट सहजता से समाप्त हो सकते हैं। हमारी हिन्दी अपना वह स्थान प्राप्त कर सकती है जहाँ से हम ही ने उसे विस्थापित कर दिया है।

मैं, मेरी उत्तमार्द्धजी और मेरे दोनों बेटे भी हिन्दी में ही हस्ताक्षर करते हैं। मेरे बेटे हिन्दी में हस्ताक्षर करें, इस हेतु मुझे दो वर्षों तक निरन्तर प्रयास करने पड़े। हमारी बहू प्रशा, विवाह के चार बरस पूरे होने के बाद, अभी अंग्रेजी में ही हस्ताक्षर कर रही है। मैं उसे टोकता रहता हूँ, इस आशा से कि मेरे टोकने को वह कभी न कभी तो गम्भीरता से लेगी।

अपनी मातृभाषा की रक्षा कैसे की जाती है, कैसे उसे सहेजा-सँवारा जाता है, यह नरेश के इस उदाहरण से अनुभव से किया जा सकता है। जो लोग खुद तो कुछ नहीं करना चाहते किन्तु हिन्दी का रोना रोते रहते हैं, उनके लिए नरेश से बेहतर उत्प्रेरक और क्या होगा? ऐसे तमाम लोग जान लें कि ‘नरेश’ बने बिना वे हिन्दी का भला कभी नहीं कर सकेंगे।

नरेश इन्दौर में रहता है और मोबाइल नम्बर 093021 12233 पर उससे मेरी बातों की पुष्टि की जा सकती है।

पाणिग्रहण संस्कार से तनिक आगे

परसों, आठ दिसम्बर को मेरी पोती, नीरजा-गोर्की की बड़ी बेटी अभिसार का पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुआ। गोर्की मेरा छोटा भतीजा है और नीरजा उसकी उत्तमार्ध्द। नीरजा का घर का नाम ‘मीरू’ है और विवाहोपरान्त दादा ने उसका नाम बदल कर ‘रूपा’ कर दिया है। मैं उसे ‘मीरू’ ही सम्बोधित करता हूँ। ‘नामसझ उम्र’ में ही दोनों में ‘स्कूली-प्रेम’ हो गया था। कानूनी परिभाषा के अनुसार गोर्की तो ‘बालिग’ हो गया था किन्तु मीरू नाबालिग ही थी। दोनों के प्रेम को दोनों ही परिवारों ने गम्भीरता से नहीं लिया था। परवाह ही नहीं की थी शायद। बचकानी बात मानी थी दोनों के प्रेम को। किन्तु दोनों ही अड़े रहे। इतने और ऐसे कि दोनों परिवारों को सहमत होना ही पड़ा (गोर्की ने हम सबसे कहा था -  ‘आप कह रहे हैं तो मैं इस लड़की से विवाह नहीं करूँगा। किन्तु  यह भी सुन लीजिए कि फिर विवाह करूँगा ही नहीं।’ दादा ने मीरू से कहा/पूछा था - ‘इस लड़के में अकल-वकल तो हैं नहीं। तुम क्या देख/जान/समझ कर इसके चक्कर में पड़ गई?’ उत्तर में मीरू ने कहा था - ‘अंकल! यह देखने के लिए आपको मीरू की आँखों से देखना पड़ेगा और जानने/समझने के लिए मीरू का मन चाहिएगा।’ कहना न होगा कि इसके बाद दादा के पास कोई जवाब नहीं रहा) और 21 जून 1983 को, नीमच में, हजारों लोगों की उपस्थिति में दोनों जीवन साथी बने। यह केवल प्रेम विवाह नहीं था। इससे तनिक आगे बढ़कर यह ‘अन्तर्जातीय प्रेम विवाह’ था। गोर्की की जाति बैरागी और मीरू का जाति कायस्थ।

जैसा कि मैं बार-बार बताता रहा हूँ, ‘भिक्षा वृत्ति’ हमारे परिवार की आजीविका थी सो समाज की, आर्थिक स्तर आधारित वर्ग व्यवस्था में हमारा परिवार ‘निम्न वर्ग’ से निचली सीढ़ी पर खड़ा परिवार रहा है। जातिगत आग्रहों और परम्पराओं/रूढ़ियों के सन्दर्भों में ऐसे परिवार स्वाभाविक रूप से ‘कट्टर’ ही होते हैं। फिर, मेरे पिताजी अपने इलाके के बैरागी समाज के ‘महन्त’ थे। ऐसे में, अन्तर्जातीय विवाह को लेकर उनकी और मेरी अनपढ़ माँ की मनःस्थिति का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। सो, जातिवाद को देश की तरक्की में बड़ी बाधा माननेवाली, दादा की (और मेरी भी) सम्पूर्ण प्रगतिशीलता, एक सीमा तक ही कारगर हो पा रही थी। ऐसे में, आज से लगभग तीस बरस पहले, गोर्की-मीरू का विवाह, न केवल बैरागी समाज में अपितु हमारे समूचे अंचल में किसी ‘क्रान्ति’ से कम नहीं था।

इन्हीं गोर्की-मीरू की बड़ी बेटी, अभिसार (जिसे हम सब ‘मीकू’ कहते/पुकारते हैं) ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। उसने गौरव को अपना जीवन साथी चुना। दोनों एक ही संस्थान में काम करते हैं। गौरव, मीकू का ‘सीनीयर’ है। अब तक मीकू का ‘गौरव सर’ था। अब जीवन संगी है। गौरव का पूरा नाम गौरव जुनेजा है। नाम से ही उसका पंजाबी होना मालूम हो जाता है। मुझे नहीं पता कि पंजाबियों में उसकी जाति क्या है किन्तु तय है कि वह बैरागी तो नहीं ही है। मीकू और गौरव जब मालाएँ पहना कर, एक दूसरे को जीवन साथी के रूप में स्वीकार करने को सर्वाजनिक कर रहे थे तब मैं सोच रहा था - ‘मीकू के पिता की जाति बैरागी, माता की जाति कायस्थ। मीकू की खुद की जाति क्या? और अब पति की जाति पंजाबी! इन दोनों के बच्चों की जाति क्या होगी?’ अपने इस सवाल के जवाब मैं खुद ही पुलकित हो गया - आनेवाले बरसों में नामों के आगे जाति का उल्लेख या तो होगा ही नहीं और यदि होगा तो वह अर्थहीन ही होगा - कोई उसकी ओर ध्यान ही नहीं देगा। तब विद्यालयों के प्रवेश पत्रों में और विभिन्न प्रश्नावलियों में ‘कुल नाम’ (सरनेम) वाला प्रावधान शायद ही दिखाई देगा। इस अनुमान ने मुझे यह अतिरिक्त प्रसन्नता दी कि भारत के ऐसे भविष्य के निर्माण में मेरे कुटुम्ब के बच्चे भी शरीक हैं।

बॉंये से -  गोर्की, गौरव, मीकू और मीरू


किन्तु इससे तनिक अधिक महत्वपूर्ण बात अभी बाकी है।

मीकू की बिदाई से कुछ ही मिनिट पहले दादा इस नव-युगल के पास पहुँचे। सबने अनुमान लगाया - विदा से पहले दादाजी अपनी पोती और दामाद को आशीर्वाद देने पहुँचे होंगे। किन्तु वास्तविकता कुछ और ही रही। दादा ने एक माँग रखी - ‘मेरी बात ध्यान से सुनना और जवाब अभी ही देना। जवाब देने में भले ही तुम्हें वक्त लगे। मैं प्रतीक्षा कर लूँगा लेकिन जवाब अभी ही देना। वादा करो कि चाहे जो स्थिति बने, तुम दोनों भ्रूण हत्या नहीं करोगे।’ कुछ क्षणों के लिए मानो समय ठिठक गया, प्रकृति अवाक् हो गई। सन्नाटा पसर गया। मीकू की आँखें बरसात की झड़ी की तरह बहनी शुरु हो गईं। गौरव अकबका गया। आसपास खड़े हमसब जड़वत् हो गए। अन्ततः मीकू ने ही सबको और सब कुछ को सजीव किया। बहते आँसुओं और अविराम हिचकियों के बीच बोली - ‘हाँ! दादाजी!! ऐसा ही होगा।’ अब दादा की आँखें बह रही थीं। उन्होंने मीकू के माथे पर हाथ फेरा और गौरव की ओर देखा। गौरव ने दो बार पलकें झपका कर हामी भरी। दादा ने दोनों को बाँहों में भर, आसीसा।

वर माला के ठीक बाद गौरव और मीकू

बारात कल विदा हो गई है। मीकू अपने घर पहुँच गई है। हम सब अपने-अपने घर लौट आए हैं। मीकू-गौरव अपनी-अपनी दिनचर्या का पुनर्निधारण में लग गए होंगे और हम सब अपनी बँधी-बँधाई दिनचर्या पर लौट आए हैं।

नहीं जानता कि मेरे इस लिखे को किस तरह लिया जाएगा - एक परिवार में सम्पन्न पाणिग्रहण संस्कार की सूचना की तरह या कि राष्ट्रीय स्तर पर जरूरी एक बड़े सामाजिक बदलाव हेतु आयोजित हवन में दी गई एक आहुति की तरह। किन्तु मुझे लगा कि मेरे आसपास ऐसा कुछ, तनिक असाधारण अवश्य हुआ है जिसे लिखने से मैं खुद को रोक नहीं सका।

मैं चाहूँगा कि ऐसा ही लिखने के लिए मुझे रोज-रोज विवश होना पड़े।

प्रशंसनीय और अनुकरणीय सार्वजनिक नागरिक-आचरण

अपने चार दिवसीय पुणे प्रवास में जिस बात ने मुझे सर्वाधिक आकृष्ट और प्रभावित (और खुद पर लज्जित भी) किया, वह थी - लोगों का, नागरिक-बोध से ओतप्रोत सार्वजनिक आचरण।
 
इन चार दिनों में मैंने पुणे से बाहर, ‘अष्ठ विनायक’ के कारण आठ स्थानों की, और भीमाशंकर ज्योर्तिलिंग के कारण एक स्थान की, कुल मिलाकर लगभग आठ सौ किलोमीटर की यात्रा की। गन्तव्य स्थानों के अतिरिक्त रास्ते में कुछ स्थानों पर रुका। आहार-अल्पाहार किया। लोगों से बातें की। लेकिन सब कुछ मुझे चकित भी करता रहा और प्रभावित भी। ऐसे प्रत्येक क्षण और अवसर पर मुझे मेरे अंचल का सार्वजनिक व्यवहार याद आता रहा और मैं स्वीकार करता हूँ कि हर बार मैं अपनी ही नजरों में शर्मिन्दा हुआ। चूँकि मेरी नजर ‘खोजी’ नहीं है और न ही सामाजिक व्यवहार का विश्लेषण करने की सूझ मुझे है, इसलिए मैं बिलकुल ही नहीं जान सका कि किन्हीं दो समाजों में ऐसा, सचमुच में जमीन-आसमान का, अन्तर क्यों और कैसे हो सकता है?
 
साफ-सफाई के मामले ने मुझे ठेठ अन्दर तक प्रभावित किया। यहाँ दिए दो चित्रों में से एक चित्र शिवाजी नगर एसटी बस स्थानक (राज्य परिवहन बस स्टैण्ड) का तथा दूसरा, गन्ने के रस की एक दुकान का है। इन दोनों ही स्थानों की सफाई देखते ही बनती है। ये दोनों ही जगहें ऐसी हैं जहाँ लोग उन्मुक्त आचरण करते हैं और कचरा फैलने की स्थितियाँ आसानी से बनती हैं। किन्तु आश्चर्य कि एक भी स्थिति का दुरुपयोग नहीं होता। गन्ने के रसवाली दुकान में गन्ना पेराई के कारण कचरा फैलने की स्थितियाँ सहज भाव से बनी रहती हैं किन्तु दुकानदार बड़ी ही सहजता से, आदत की तरह, कचरे को व्यवस्थित रख रहा था। मालवा में गन्ना रस निकालने की ऐसी मशीनें सामान्यतः लोहे की होती हैं किन्तु वहाँ अधिकांश मशीनें स्टेनलेस स्टील की नजर आईं। सफाई की तथा सफाई की मनःस्थित की शुरुआत शायद इसी तरह से होती होगी।
 
गन्‍ने के रस की दुकान का भीतरी दृष्‍य। यह चित्र दोपहर 12 बजे का है।
 
शिवाजी नगर एसटी बस स्थानक पर मुझे कोई पौन घण्टा प्रतीक्षा करनी पड़ी। इस बीच लोग बराबर आते-जाते रहे और अधिकांश का मुँह चलता ही रहा। लेकिन किसी ने भी, पेकिंग की प्लास्टिक थैली फर्श पर नहीं डाली। मैंने ध्यान से देखा, ऐसे प्रत्येक मामले में आदमी उठ कर कूड़ादान तक गया और प्लास्टिक थैली उसमें डाल कर अपनी जगह लौट आया। इस पौन घण्टे में वहाँ कोई सफाई कर्मचारी नहीं आया लेकिन फर्श ऐसा साफ-सुथरा बना रहा कि बैठ कर पूजा-पाठ कर लिया जाए।
 
शिवाजी नगर एसटी बस स्‍थानक का चित्र। फर्श की दशा दर्शनीय है।
 
देव-दर्शन के निमित्त मैं  जिन-जिन गाँवों/कस्बों में गया, सब जगह यही स्थिति मिली मुझे और ताज्जुब यह कि इसके लिए कोई भी अतिरिक्त सावधानी बरतता नजर नहीं आया। सब कुछ सहज, स्वाभाविक।
 
एक और अजूबा मेरे लिए यह रहा कि, कुल मिला कर लगभग तीस घण्टों और आठ सौ किलोमीटर की इन यात्राओं में मुझे कहीं भी लोग लड़ते-झगड़ते, बहस करते नहीं मिले। क्या कोई संयोग इतनी लम्बी अवधि, सुबह आठ बजे से लेकर रात नौ बजे तक और इतनी दूरी तक और इतने सारे स्थानों पर लगातार हो सकता है? मैं जानने को उत्सुक हूँ कि इतने व्यापक स्तर पर, ऐसा कैसे हो सकता है?
 
किन्तु कुछ बातों ने मुझे निराश भी किया। शिवाजी नगर बस स्टैण्ड पर चौकशी (पूछताछ/इन्क्वायरी) पर बैठे स्त्री/पुरुषों ने अत्यधिक निराश किया। वे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं मिले। उनका व्यवहार ऐसा था मानों वे कोई सजा भुगत रहे हैं जिसका गुस्सा ने पूछताछ करनेवालों पर उतार रहे हैं। इसके विपरीत, सारे चालकों-परिचालकों का व्यवहार अत्यधिक मीठा और सहायतापूर्ण मिला। उन्हें जैसे ही मेरी भाषा-कठिनाई की जानकारी हुई, प्रत्येक ने अतिरिक्त रूप से ध्यान देकर और चिन्ता कर मेरी सहायता की।
 
सार्वजनिक शौचालयों की साफ-सफाई के मामले में मेरी उत्तमार्द्ध ने लगभग प्रत्येक स्थान पर असन्तोष जताया। उल्लेखनीय बात यह कि ऐसे प्रत्येक स्थान पुरुष सुविधाघर निःशुल्क थे और महिला सुविधाघरों पर कम से कम दो-दो रुपयों का शुल्क था किन्तु, जैसा कि मेरी उत्तमार्द्ध ने हर बार बताया, महिला सुविधाघर अत्यधिक अव्यवस्थित और गन्दे मिले। क्या यह भी कोई संयोग है?
 
किन्तु नागरिकता बोध को लेकर वहाँ का सार्वजनिक आचरण निस्सन्देह अनुकरणीय है। पूरा देश वैसा हो न हो, काश! मेरा अंचल ऐसा हो जाए।

पुणे में मेरी तीर्थ यात्रा

मेरी यह तीर्थ यात्रा ऐसी रही है जिसमें मैं न तो किसी मन्दिर में गया और न ही किसी देव प्रतिमा के दर्शन किए। भारत सरकार के पुरातत्व विभाग में यह एक ‘संरक्षित स्मारक’ है (जिसमें प्रवेश के लिए पाँच रुपयों का टिकिट लेना पड़ता है) और पुणे नगर परिषद् की सूची में एक ऐसा ‘दर्शनीय स्थान’ जिसे ‘पुणे दर्शन’ के बस मार्ग में शामिल किया गया है।
 
जिस क्षण मेरी पुणे यात्रा निश्चित हुई थी, उसी क्षण मेरी यह तीर्थ यात्रा भी निश्चित हो गई थी। भगवान भला करे अफलू भाई का कि उन्होंने मुझे (यरवदा जेल जाने के) भ्रम से और भटकने से बचा लिया अन्यथा मैं ‘जाते थे जापान, पहुँच गए चीन’ वाली गति को प्राप्त हो कर अपना समय और धन अकारण ही नष्ट कर देता।
 
 
मेरा यह तीर्थ, पुणे का ‘आगा खाँ महल’ था जहाँ गाँधीजी और उनके संगी-साथी बन्दी बनाकर रखे गए थे और जहाँ, गाँधीजी के सचिव महादेव भाई देसाई तथा गाँधीजी की उत्तमार्द्ध कस्तूरबा गाँधी ने प्राण त्यागे। इन दोनों की समाधियाँ इसी आगा खाँ महल में बनी हुई हैं और इन्हीं सब कारणों से मेरे लिए यह ‘तीर्थ क्षेत्र’ बना।

मैं कुछ कहूँ और उसे सुनने/पढ़ने के लिए आप अपना अमूल्य समय नष्ट करें, उससे अच्छा है कि वहाँ के कुछ चित्र प्रस्तुत कर दूँ जिससे आपको आसानी भी होगी और कई बातें, मेरे कहे बिना ही समझ लेंगे।

 
आगा खाँ महल के परिसर में लगा, ‘महल’ का परिचय पट्ट।




 बन्दी काल में मीरा बहन, इस कमरे के इसी कोने में रहती थीं। चित्र ठीक उसी कोने का है।






गाँधीजी की लालटेन।


 
 
चित्र से मालूम नहीं हो पाता कि महादेव भाई और कस्तूरबा की समाधियों पर कौन पुष्पहार चढ़ा रहा है। चित्र की इबारत कुछ इस प्रकार है -
 
बन्दी होने के फौरन बाद ही गाँधीजी 9 अगस्त 1942 से पूना के आगा खाँ महल में लाए गए थे। 21 महीनों तक यहाँ रखने के बाद वे 6 मई 1944 को छोड़े गए। बन्दी अवस्था में ही उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा और सचिव श्री महादेव भाई देसाई का आगा खाँ महल में देहान्त हुआ। उनकी समाधियाँ आज तीर्थ स्थल बन गई हैं।


गाँधीजी की बन्दी अवस्था के दौरान आगा खाँ महल को ‘जेल’ घोषित किया गया था। जेलर का प्रभार अर्देशर ई. कटेली को दिया गया था। श्री कटेली ने अत्यधिक सहृदयता से गाँधीजी सहित अन्य कैदियों की देखभाल की। प्रसन्न होकर गाँधीजी ने अपने हाथ से बनाया एक वस्त्र श्री कटेली को उपहार में दिया था।

 महादेव भाई की मृत्यु और उनकी समाधि को लेकर गाँधीजी की भावनाएँ। गाँधीजी की कही बात शब्दशः सच हुई। यह समाधि स्थल आज (तीर्थ) यात्रा स्थल बना हुआ है।


महादेव भाई की मृत्यु के क्षण का ब्यौरा।


महादेव भाई के साथ गाँधीजी।


  महोदव भाई देसाई का चित्र।


 लिखा-पढ़ी की, दैनिक उपयोग की सामग्री। सूचना पट्ट से स्पष्ट नहीं होता कि ये वस्तुएँ महादेव भाई की हैं या गाँधीजी की।



 महादेव भाई के साथ गाँधीजी। अफलू भाई शायद बता सकें कि महादेव भाई के कन्धों पर कौन बच्चा है।



  महादेव भाई और कस्तूरबा की समाधियों पर गाँधीजी।


 बन्दी काल में गाँधीजी का कमरा। यह कमरा बन्द रहता है। मुझे, बन्द दरवाजे के काच से अपना मोबाइल सटा कर यह चित्र लेना पड़ा।


 कस्तूरबा का निधन भी इसी (ऊपरकेचित्रवाले) कमरे में हुआ था।


 महादेव भाई और कस्तूरबा की समाधियाँ।


महादेव भाई की समाधि पर लगा आलेख पट्ट।


  कस्तूरबा की समाधि पर लगा आलेख पट्ट।


गाँधीजी की भस्म यहाँ रखी गई है।


अपनी मनोदशा को मैं अपनी धरोहर के रूप में खुद तक सीमित रखते हुए भी कुछ प्रतिक्रियाओं से बच नहीं पा रहा हूँ।

सरकारी तौर पर इसे शायद ‘गाँधी स्मृति’ नाम दिया गया है किन्तु इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। ‘आगा खाँ महल’ को लोग खूब जानते हैं किन्तु गाँधीजी, महादेव भाई देसाई और कस्तूरबा गाँधी से इसका कोई सम्बन्ध है, यह बहुत ही कम लोग जानते हैं। तनिक क्रूर होकर कहूँ तो इस सम्बन्ध के बारे में वे ही जानते हैं जिन्होंने जानना चाहा। जिस ऑटो में हम लोग गए वह इसके महत्व के बारे मे कुछ भी नहीं जानता था। स्थिति यह रही कि उसने हमें, इस स्मारक के उस दरवाजे पर छोड़ दिया जो शायद ही कभी खोला जाता होगा।
 
मुझे यह भी लगा कि सरकार और पुणे नगर निगम इसे विवशता में संचालित कर रही हैं - किसी अनचाही जिम्मेदारी की तरह। किसी भी स्मारक के लिए छापी जानेवाली पुरिचय पुस्तिका भी यहाँ उपलब्ध नहीं है। पुणे में मुझे कहीं भी इस स्मारक के बारे में कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं दिखाई दी। हाँ, रास्ता दिखानेवाले बोर्डों पर जरूर इसका उल्लेख है।

मुझे लगता है कि इस स्मारक का यथोचित प्रचार किया ही जाना चाहिए तथा इसके प्रति सरकार की तथा पुणे नगर निगम की चिन्ता सतह पर, प्रखरता से अनुभव होनी चाहिए।

फिलहाल तो इतना ही। बाकी सब कुछ मेरा निजी।

हिन्दी अखबार : पुणे के और मेरे अंचल के

पढ़ता-सुनता आया हूँ कि हिन्दी की जितनी चिन्ता और सेवा अहिन्दीभाषियों ने की, उतनी हिन्दीभाषियों ने नहीं। दक्षिण भारत में तो हिन्दी के लिए पगडण्डी अहिन्दीभाषियों ने ही बनाई, हिन्दी की पताका फहराई और थामे रखी। यह अतिशयोक्ति हो सकती है किन्तु असत्य नहीं कि आज हिन्दी का जितना नुकसान हिन्दीभाषी कर रहे हैं, उतना कोई दूसरा नहीं। इसमें यदि हिन्दी अखबारों की बात जोड़ दी जाए तो कहना ही पड़ेगा कि हिन्दी का जितना अहित हिन्दी अखबारों ने किया और निरन्तर किए जा रहे हैं, वह सब ‘ अनुपम  और अवर्णनीय’ है। अपनी मातृभाषा के साथ ऐसा अत्याचारी व्यवहार दुनिया में शायद ही किसी अन्य समाज ने किया होगा और कर रहा होगा। यह अनुभूति मुझे अपने चार दिवसीय पुणे-प्रवास में लगातार होती रही।

‘बोलचाल की भाषा’ के नाम पर हिन्दी को ‘हिंगलिश’ बनाने और अकारण ही, जानबूझकर हिन्दी शब्दों को विस्थापित करने में हिन्दी पट्टी के अखबारों ने मानो गला-काटू प्रतियोगिता चला रखी है जिसे जीतने के लिए प्रत्येक अखबार अपनी पूरी शक्ति, सम्पूर्ण कल्पनाशीलता, पूरी क्षमता और समूची प्रतिभा लगा रहा है, लगाए जा रहा है।

पुणे में मुझे चार हिन्दी अखबार देखने-पढ़ने को मिले - लोकमत समाचार, आज का आनन्द, नव-भारत और यशोभूमि। चारों ही दिन मैंने अलग-अलग स्थानों से अखबार खरीदे और इसी आधार पर अनुमान लगा रहा हूँ कि ‘लोकमत समाचार’ सर्वाधिक पढ़ा जाता है। उसके बाद क्रमशः ‘आज का आनन्द’, ‘यशोभूमि’ और ‘नव-भारत’ पढ़े जाते हैं। ‘नव-भारत’ को देख कर अच्छा लगा। किसी जमाने में यह अखबार मेरे अंचल में दूसरे स्थान पर हुआ करता था। किन्तु आज तो इसकी शायद फाइल प्रतियाँ ही छप रही होंगी। मेरे अंचल में यह कहीं नजर नहीं आता। ‘यशोभूमि’ मुम्बई से छप कर आता है। शेष तीनों अखबार पुणे में ही छपते हैं।

इन अखबारों में प्रयुक्त हिन्दी ने मुझे चौंकाया। मन में पहली प्रतिक्रिया उभरी - ‘हिन्दी पट्टी के अखबारों को यदि हिन्दी में अखबार निकालने हैं तो पुणे के अखबारों को नमूना बनाएँ।’

पुणे के इन चार अखबारों की हिन्दी, मेरे अंचल के हिन्दी अखबारों की अपेक्षा अधिक शुद्ध, अधिक प्रांजल तथा अधिक सरल है। अंग्रेजी का घालमेल या तो है ही नहीं और यदि है तो नाम मात्र को। मुझे दहशत हो रही है कि ‘नाम मात्र’ की यह स्थिति कहीं ‘भयानक शुरुआत की पहली सीढ़ी’ न हो। अंग्रेजी शब्दों के बहुवचन रूपों (इंजीनीयर्स, बैंकर्स, आर्किटेक्ट्स) को हिन्दी में प्रयुक्त करने के संक्रमण ने यह भय पैदा किया।

किन्तु ‘नव-भारत’ के शीर्षकों में अंग्रजी लिपि का अत्यधिक घातक प्रयोग देख कर मुझे अत्यधिक घबराहट हुई। इससे पहले ऐसा प्रयोग मैंने कहीं नहीं देखा। (भगवान करे, और कहीं देखने को न मिले - ‘नव-भारत’ में भी नहीं।)

पुणे के हिन्दी अखबारों में पठनीय सामग्री की प्रचुरता भी चकित करती है। सामग्री का परिमाण और विविधता लगभग प्रत्येक अखबार को ‘पारिवारिक पत्रिका’ बनाती हैं। मनुष्य जीवन के दैनन्दिन व्यवहार (यथा स्वास्थ्य, साहित्य, भोजन, जीवन शैली, कार्यालयीन व्यवहार, लोक व्यवहार आदि-आदि) से जुड़ी सामग्री लगभग प्रतिदिन मिलती है जबकि मेरे अंचल के अखबार इस मामले में औपचारिकता पूरी करते नजर आते हैं।

पाठकों के पत्र यद्यपि रोज नहीं छपते किन्तु जब भी छपते हैं, यथेष्ठ स्थान और प्रमुखता पाते हैं। इस मामले में मेरे अंचल के अखबार इन पत्रों को ऐसे छापते हैं मानो या तो विवशता हो या फिर पाठकों पर उपकार कर रहे हों। ‘नईदुनिया’ पत्रों की संख्या पर केन्द्रित हो कर रह गया है जबकि किसी जमाने में यह स्तम्भ इस अखबार की पहचान और प्राण हुआ करता था। अपने इस स्तम्भ के माध्यम से ‘नईदुनिया’ ने लेखकों की फौज खड़ी की और उन्हें पहचान दी। मैं भी उसी भीड़ का एक छोटा सा अंश हूँ। लेकिन आज ‘नईदुनिया’ में यह स्तम्भ देख कर दया आती है ओर रोना भी। ‘दैनिक भास्कर’ तो केवल और केवल खानापूर्ति करता है। नाम मात्र के दो पत्र छापता है और कुछ इस तरह कि कफन के नाप का मुर्दा तय किया जा रहा हो। ‘पत्रिका’ में पत्रों की संख्या तो भरपूर होती है किन्तु प्रस्तुति ऐसी होती है कि पढ़ना तो दूर, देखने को भी जी नहीं करे। इसके विपरीत, पुणे के अखबार, पाठकों के पत्र जब भी छापते हैं, पूरी गम्भीरता और सम्मान के साथ छापते हैं।

इस मामले में मराठी के अग्रणी दैनिक ‘सकाळ’ ने मुझे हताश किया। किसी जमाने में यह (भारत का) इकलौता अखबार था जो ‘पाठकों के पत्र’ स्तम्भ की शुरुआत अपने मुखपृष्ठ से करता था। मुझे यह देखकर पीड़ा हुई कि इस अखबार ने अपनी यह कीर्तिमानी परम्परा छोड़ दी है।

एक मराठी कहावत में पुणे को ‘विद्या का मायका’ कहा जाता है। इसका नमूना मुझे ‘आज का आनन्द’ और ‘यशोभूमि’ में देखने को मिला। ये दोनों ही अखबार, नियमित रूप से ‘गणित पहेली’ छापते हैं। ‘यशोभूमि’ तो इस क्रम में ‘काकुरो पहली’ भी छापता है। गणित को सामान्यतः कठिन और अनाकर्षक विषय माना जाता है और अधिकांश बच्चे इससे घबराते/बचते हैं। मेरी भी यही दशा है। हायर सेकेण्डरी परीक्षा में मुझे, गणित में साढ़े सात प्रतिशत अंक मिले थे। यदि ‘पीसीएम’ समूह के अंक संयुक्त रूप से न जोड़े जाते तो मैं तो हायर सकेण्डरी भी पास नहीं कर पाता। किन्तु ऐसी पहेलियाँ गणित को आसान भी बनाती हैं और रोचक भी। इन पहेलियों को हल करते हुए मुझे अनेक लोग नजर आए। उत्साहित होकर मैंने भी कोशिश की किन्तु एक बार फिर अनुत्तीर्ण हो गया।

कुल मिलाकर हिन्दी के मामले में पुणे के अखबार हिन्दी के प्रति अधिक सजग तथा अधिक ईमानदार अनुभव हुए। इसका बड़ा कारण, पुणे का अहिन्दीभाषी होना लगा। किन्तु इससे भी बड़ा कारण लगा - अपनी मातृभाषा मराठी के प्रति मराठीभाषियों का अनुराग। पुणे की हिन्दी पर मराठी का भरपूर प्रभाव है और चूँकि मराठीभाषियों ने मराठी को अंग्रेजी के संक्रमण से अभी भी बचाए रखा है,  इसीलिए वहाँ की हिन्दी भी इस संक्रमण से बची हुई है। मातृभाषा से इतर भाषा प्रयुक्त करते हुए हर कोई अतिरिक्त रूप से सजग/सावधान रहता ही है। यह ‘सहज सजगता/सावधानी’ ही पुणे के हिन्दी अखबारों की हिन्दी को हिन्दी बनाए हुए लगी मुझे।

बहरहाल, पुणे के हिन्दी अखबार देखकर मेरा निष्कर्ष तो यही है कि हिन्दी अखबारों की हिन्दी कैसी हो, यह जानने के लिए हिन्दी अखबारों को अहिन्दीभाषी अंचल के हिन्दी अखबारों से सीख लेनी चाहिए।