जो ये आग पियेगा



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की चौंतीसवी कविता 
 
यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


जो ये आग पियेगा

गण-गंगा ने गहराई ली, गति और अधिक गतिवान हुई
इन कूल-कछारों की महिमा, सचमुच ही और महान हुई
गुंजार मिली फिर भँवरों को, फगुनाहट मिली बहारों को
शोणित के रथ को राह मिली, फिर आग मिली अंगारों को

जो ये आग पियेगा
वो जरूर जियेगा
इस ज्वाला को पी के पचाओ रे।
मेरी जान की कसम! रे ईमान की कसम!
तुम पल-पल दहकते ही जाओ रे।
जो ये आग पियेगा।

बर्फानी पानी में हो के खड़े, जो आवाज देते अंगारों को
ओ रे अंगारों, अब तो समझ लो, उनके नपुंसक इशारों को
उनको डूब जाने दो, गहरे खूब जाने दो,
उनसे बारूद अपनी बचाओ रे।
मेरी जान की कसम।

कन्धा तुम्हारा, बन्दूक उनकी, तो इतिहास को फिर रोना ही है
आँखों के अन्धे, साधें निशाना, तो कन्धों को घायल होना ही है
पोंछो, घाव को पोंछो, सोचो दूर की सोचो
यूँ तो इतिहास को मत रुलाओ रे।
मेरी जान की कसम।

काली अमावस से घबरा के, कोई रोने लगे चिल्लाने लगे
तो समझो वो सूरज का वंशज नहीं है, जो अपना ही पौरुष लजाने लगे
रातें रोज आयेंगी, रातें रोज जायेंगी
तुम तो प्राणों को अपने जलाओ रे।
मेरी जान की कसम।

जब तक रगों में है जिन्दा वो ज्वाला, तब तक जवानी जवानी है
वरना तो शीर्षक ही शीर्षक है प्यारे! सम्बोधनों की कहानी है
जिन्दा लाश नहीं हो, कोई पलाश नहीं हो
जो फागुन ही फागुन में झर जाओ रे।
मेरी जान की कसम।

जब कोई बादल, बहिनाँ कहे, किसी ज्वाला की जायी चिनगारी को
तो समझो दबोचेगी कोई हविस, किसी मासूम कन्या कुमारी को
जिसका भाव दूजा हो, और प्रभाव तीजा हो
ऐसी राखी नहीं बँधवाओ रे।
मेरी जान की कसम।

जब भी जलाओ अँधेरा जलाओ, तिल भर तरस मत खाओ रे
मौसम के सुर में सुर क्या मिलाना, अपना भी मौसम बुलाओ रे
खुद की लाश मत ढोओ, अपने प्राण को बोओ
और किरणों की फसलें उगाओ रे।
मेरी जान की कसम।
-----


संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















मर्दों की कविता



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की इकतीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


मर्दों की कविता

या तो सूखा या बेहद बरखा
यानी कि
दोनों तरफ दुश्मन पानी
और गडबड़ा जाये हर भविष्यवाणी।
एक के बाद दूसरा अभाव
तिस पर फिर मानव का स्वभाव?
जीना और वह भी ऐसा
कि राम ही जाने
जाने कैसा।
उस पर फिर अमावस?
वह भी उजास की आस में
चिकनी और काली
अब कैसे मने दीवाली?
पर आ ही गई, है आँगन में तो
स्वागत करो
जैसी हैसियत, वैसी हिम्मत
जैसी हिम्मत, वैसा हौसला
चलो गूँधो मिट्टी
बनाओ दीया।
ढूँढो कोई चिन्दी या फटी लत्ती
बँटो बत्ती
नहीं है तेल तो रोओ मत
निचोड़ो शरीर
नितारो पसीना
और फिर चकमक लो संकल्प की।
अब मारो चोट, चमकाओ चिनगारी,
छँटने दो आग के फव्वारे
झड़ने दो फुलझड़ी
बारूद की बदतमीजी में लगा दो पलीता,
दुःख का क्या? वह तो पहिले ही गया-बीता।
छाती ठोक के आसमान से बोलो
तू एक नहीं लाख बरस, मत बरस,
और तेरा मन पड़े उस बस्ती को डुबा दे
परस-परस 
हम भी हैं मरद के बच्चे
धरती पर जब भी चलेगी
मरदों की चलेगी
और तू बरसाता रह
अभाव, अँधियारा, अनय और उल्का,
मर्दों के घर दीवाली की रोशनी
जलेगी, जलेगी और करोड़ बार जलेगी।
बहुत हो गई तेरी बक-बक,
अपनी आसमानी सुल्तानी
अपने घर रख।
-----
 

रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
-----
 
 

 






















पता नहीं



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की तैंतीसवी कविता  

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


पता नहीं

बद से बदतर दिन बीतेगा, अब सारा का सारा
सूरज उनका भी निकला है अन्धा औ’ आवारा।

मौसम में कुछ फर्क नहीं है, ऋतुओं में बदलाव नहीं
मधुमासों की आवभगत का, कोई भी प्रस्ताव नहीं
वैसा का वैसा है पतझर, वही हवा की मक्कारी
तापमान का तर्क वही है, वही घुटन है हत्यारी
बड़े मजे से नाच रहा है, फिर वो ही अँधियारा
सूरज उनका भी निकला है अन्धा औ’ आवारा।

शोक-गीत में बदल रही है, धीरे-धीरे लोरी
उनने तो फन्दा डाला था, ये खींचेंगे डोरी
अब जीवन की शर्त यही है, जैसे-तैसे जी लो
आँख मूँदकर सारा गुस्सा, एक साँस में पी लो
नभ-गंगा निस्तेज पड़ी है, रोता है ध्रुवतारा
सूरज उनका भी निकला है, अन्धा औ’ आवारा।

किरन-किरन आरोप लगाती, दिशा-दिशा है रोती
पछतावे का पार नहीं है, असफल हुई मनौती
लगता है परिवेश समूचा, खुद को हार गया है
लगता है गर्भस्थ स्वप्न को, लकवा मार गया है
पिण्ड न जाने कब छोड़ेगा, ये दुर्भाग्य हमारा
सूरज उनका भी निकला है, अन्धा औ’ आवारा।

अगर यही है मुक्त हवा तो, इससे मुक्ति दिलाओ
मुक्ति व्यर्थ बदनाम नहीं हो, अपनों को समझाओ
‘इससे तो बन्धन अच्छा था’, कहने लगीं हवाएँ
जी करता है इस जीने से, बेहतर है मर जाएँ
पता नहीं कल को क्या होगा, मेरा और तुम्हारा
सूरज उनका भी निकला है अन्धा औ’ आवारा।

आधा जीवन कटा रेत में, शेष कटे कीचड़ में
और पीढ़ियाँ रहें भटकती, नारों के बीहड़ में
दुश्चरित्र हो जाएँ अगर, नैया के खेवनहारे
(ता) गंगा हो या हो वैतरणी, प्रभु ही पार उतारे
नया फैसला करना होगा, शायद हमें दुबारा
सूरज उनका भी निकला है अन्धा औ’ आवारा।
-----
 


संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















आत्म-स्वीकृति



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की तीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


आत्म-स्वीकृति

कितना अच्छा लगता है
इन पर्वों का आना
त्यौहारों, जयन्तियों और
स्मृति-दिवसों को
विशेषांकों के माध्यम से
घर बैठे पा जाना ।

तब वे चाहते हैं कि
मैं कुछ लिखूँ
अनुक्रमणिका में जीवित दिखूँ।
और जब जागता है मेरा पर-पीड़क,
मेरा पशु, मेरा अमानव,
करवट लेती है एक बर्बरता
फड़कने लगती है कलम की निब
घुमड़-घुमड़ जाता है एक
नितान्त निन्दनीय अट्टहास,
दौड़ती है दोगली नजर
फूठता है कमीना स्वर
गाता हूँ गीत भूख के
उगलता हूँ एक नपुंसक लावा
गालियाँ देता हूँ व्यवस्था को
कोसता हूँ उन्हें जो कि
मेरी सुविधाओं के दाता हैं,
संरक्षक हैं।

धोखा देता हूँ दरिद्रनारायण को।
नोचता हूँ बाल।
फाड़ लेता हूँ बनियान
एक थरथराते
क्रान्ति-आवेश में
जो कि कहीं नहीं है
मेरे सारे परिवेश में।
राम जाने कब उगेगा भविष्य का अग्निबीज
मेरे देश में?

सर्वहारा!
मेरे बन्धु!
तुम कितने दृढ़-कवच हो मेरे?
तुम्हें पहन कर मैं ठाट से
उड़ा लेता हूँ खिल्ली
गरीबी हटाओ
समाजवाद और
सम्पूर्ण क्रान्ति की।
खींच लेता हूँ कमाऊ तस्वीरें
तुम्हारी क्रान्ति और क्लान्ति की।
तुम नहीं होते तो
क्या होता मेरे पेट का?
कोई कुछ भी चाहे पर मैं,
हाँ, मैं चाहता हूँ कि
तुम पर सदैव जलता रहे सूरज
तमतमाते जेठ का।

तुम चख तो लो मेरे आँसू
मीठे हैं, खारे नहीं हैं
मेरी आँखों में तुम
जिन्हें अपना समझ रहे हो
वे ग्लीसरीन के हैं,
तुम्हारे नहीं हैं।
तुम जितना मरोगे
मेरे गीतों में
उतनी ही जान होगी,
तुम जितने कुचले जाओगे,
मेरी कविता उतनी ही
महान् होगी,
तुम जितना जोर से रोओगे
मैं उतना ही जोर से गाऊँगा,
तुम जब-जब मरोगे
मैं तब-तब
जयन्तियाँ मनाऊँगा।
-----
 

रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
-----
 
 

 






















सुलझ नहीं पाती है गुत्थी



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ 
की एकसौदोवी/अन्तिम कविता


यह कविता संग्रह
पाठकों को समर्पित किया गया है।



सुलझ नहीं पाती है गुत्थी
(स्व. श्री लालबहादुर शास्त्री के प्रति)

ऐसा ही लगता है मानो प्रभु के घर भी
खत्म हो गई है वह मिट्टी
जिससे निर्मित होते थे तुम जैसे मानव।

पता नहीं हँस-हँस कर कैसे
जीवन बिता लिया तुमने
घोर असंगत और अँधेरे अवमूल्यन तक में!
सुलझ नहीं पाती है गुत्थी।

तुमको यदि आदर्श मान कर।
शुरु करें हम जीवन जीना
एक साँस भी लेना
शायद दुष्कर हो जायेगा।

दूर-दूर तक घटाटोप है, घना अँधेरा
किन्हीं अजानी स्याह सुरंगों में मनुष्यता
चीख रही है लुटी-लुटी सी
और किरन की कोर तलक को
तरस रहे हैं प्राण पखेरू।

पता नहीं इन चिन्ताओं से
मुक्ति मिलेगी कब मनुष्य को।
कब हम तोल सकेंगे खुद को
देव-तुला पर, जिस पर तोल दिया था
तुमने अपना जीवन
बिना किसी संकोच, झिझक के
और खरे उतरे शत-प्रतिशत।

रथ शताब्दी का पहुँच गया
अन्तिम मुड़ाव पर।
नई सदी दस्तक देती है
देव-भूमि के सिंहद्वार पर।

क्या उत्तर देंगे उस क्षण को
जब कि सदी चाहेगी दर्शन
उस मिट्टी से निर्मित थे तुम?
मूर्ति विहीन महा मन्दिर में
मिट्टी तक का पता नहीं है।

ऐसा ही लगता है मानो प्रभु के घर भी
खत्म हो गई है वह मिट्टी 
जिससे निर्मित होते थे
तुम जैसे मानव।
-----




जैसा कि दादा श्री बालकवि बैरागी ने ‘आत्म-कथ्य’ में कहा है, इस संग्रह ‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की कई रचनाएँ अन्य संग्रहों में पूर्व प्रकाशित हैं। इसलिए यहाँ, उन सब कविताओं को एक बार फिर से देने के बजाय उनकी लिंक यहाँ दी जा रही हैं। सम्बन्धित कविता की लिंक क्लिक करने पर कविता पढ़ी जा सकती है।

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अट्ठाईसवी कविता ‘हम हैं सिपहिया भारत के’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनतीसवी कविता ‘आह्वान’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तीसवी कविता ‘दो-दो बातें’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इकतीसवी कविता ‘गोरा-बादल’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बत्तीसवी कविता ‘मेरे देश के लाल हठीले’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तैंतीसवी कविता ‘हम बच्चों का है कश्मीर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौंतीसवी कविता ‘नई चुनौती जिन्दाबाद’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पैंतीसवी कविता ‘नये पसीने की नदियों को’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छत्तीसवी कविता ‘अन्तर का विश्वास’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सैंतीसवी कविता ‘मधुवन के माली से’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अड़तीसवी कविता ‘देख ज़माने आँख खोल कर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनचालीसवी कविता ‘छोटी सी चिनगारी ही तो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चालीसवी कविता ‘ऐसा मेरा मन कहता है’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इकतालीसवी कविता ‘काफिला बना रहे’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बयालीसवी कविता ‘माँ ने तुम्हें बुलाया है’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तरालीसवी कविता ‘रूपम् से’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चव्वालीसवी कविता ‘उमड़ घुमड़ कर आओ रे’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पैंतालीसवी कविता ‘मेघ मल्हारें बन्द करो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियालीसवी कविता ‘एक गीत ज्वाला का’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सैंतालीसवी कविता ‘जो ये आग पियेगा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अड़तालीसवी कविता ‘फिर चुपचाप अँधेरा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनपचासवी कविता ‘तरुणाई के तीरथ’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पचासवी कविता ‘अधूरी पूजा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इक्यावनवी कविता ‘अंगारों से’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बावनवी कविता ‘एक बार फिर करो प्रतिज्ञा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तरेपनवी कविता ‘अग्नि-वंश का गीत’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौपनवी कविता ‘चिन्तन की लाचारी’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पचपनवी कविता ‘कोई इन अंगारों से प्यार तो करे’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छप्पनवी कविता ‘इस वक्त’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सत्तावनवी कविता ‘उनका पोस्टर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अट्ठावनवी कविता ‘घर से बाहर आओ’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनसाठवी कविता ‘मरण बेला आ गई त्यौहार है’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की साठवी कविता ‘चलो चलें सीमा पर मरने’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इसठवी कविता ‘आई नई हिलोर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बासठवी कविता ‘हौसला हमारा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तिरसठवी कविता ‘युवा गीत’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौंसठवी कविता ‘हिन्दी अपने घर की रानी’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियासठवी कविता ‘ज्ञापन: अतिरिक्त योद्धा को’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सड़सठवी कविता ‘बन्द करो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अड़सठवी कविता ‘क्रान्ति का मृत्यु-गीत’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनसत्तरवी कविता ‘ठहरो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सत्तरवी कविता ‘आस्था का आह्वान’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इकहत्तरवी कविता ‘समाजवाद’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बहत्तरवी कविता ‘रात से प्रभात तक’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तिहत्तरवी कविता ‘सीधी सी बात’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौहत्तरवी कविता ‘आत्म-निर्धारण’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पचहत्तरवी कविता ‘आलोक का अट्टहास’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियोत्तरवी कविता ‘माँ ने कहा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अठहत्तरवी कविता ‘महाभोज की भूमिका’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उन्यासीवी कविता ‘चिन्तक’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अस्सीवी कविता ‘गन्ने! मेरे भाई!’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इक्यासीवी कविता ‘जीवन की उत्तर-पुस्तिका’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बयासीवी कविता ‘पर्यावरण प्रार्थना’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तिरयासीवी कविता ‘एक दिन’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौरियासीवी कविता ‘एक और जन्मगाँठ’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पिच्यासीवी कविता ‘जन्मदिन पर-माँ की याद’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियासीवी कविता ‘पेड़ की प्रार्थना’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सित्यासीवी कविता ‘रामबाण की पीड़ा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इट्ठ्यासीवी कविता ‘पर जो होता है सिद्ध-संकल्प’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उन्नब्बेवी कविता ‘उठो मेरे चैतन्य’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इठ्यानबेवी कविता ‘वंशज का वक्तव्य: दिनकर के प्रति’ यहाँ पढ़िए




संग्रह के ब्यौरे -
मैं उपस्थित हूँ यहाँ: छन्द-स्वच्छन्द-मुक्तछन्द-लय-अलय-गीत-अगीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - डायमण्ड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि.
एक्स-30, ओखला इण्डस्ट्रियल एरिया, फेज-2, नई दिल्ली-110020
वर्ष - 2005
मूल्य - रुपये 95/-
सर्वाधिकार - लेखकाधीन
टाइप सेटिंग - आर. एस. प्रिण्ट्स, नई दिल्ली
मुद्रक - आदर्श प्रिण्टर्स, शाहदरा


रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।
 



























विकृत (कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की इक्कीसवीं/अन्तिम कहानी)

 



श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह
‘बिजूका बाबू’ की इक्कीसवीं/अन्तिम कहानी

यह संग्रह, इन कहानियों के पात्रों को
समर्पित किया गया है।



विकृत

शालाएँ खुल गईं, विद्यालयों के कमरे बच्चों से लबरेज हो गए, जन-जीवन की चहल-पहल में एक सात्विक बदलाव आ गया। जिम्मेदार शिक्षकों ने पढ़ाई शरु कर दी। एकाध सप्ताह पाठ्य पुस्तकों का हो-हल्ला मचा और फिर गाड़ी पटरी पर आ गई। दो-ढाई हजार की आबादीवाले इस छोटे से गाँव में सरकार ने मिडिल स्कूल दे रखा था। जैसा कि आम वतीरा है, यहाँ भी कमरे कम थे और बच्चे अधिक। परिवार नियोजन की विफलता और नागरिक भावना में देश के प्रति अवमानना का सीधा प्रभाव यह पड़ा कि छठवीं, सातवीं और आठवीं कक्षा के दो-दो सेक्शन करने की नौबत आ गई। हेडमास्टर श्री मसर्रत खान अपने घिचपिच ऑफिस में साल भर तक पेश आनेवाली दुश्चिन्ताओं से घिरे बैठे अपने भृत्य पन्नालाल से कुछ कहने ही वाले थे कि पदक बाबू, उनके कमरे में बिना किसी पूछताछ, बिना किसी पूर्वाज्ञा और बिना किसी औपचारिक परवानगी के घुस आए। आए वहाँ तक तो ठीक है, पर वे बिना पूछे ही सामनेवाली अकेली कुरसी पर बैठ भी गए और हेडमास्टर साहब से उन्होंने शुद्ध अंग्रेजी में पूछा, ‘मे आई कम इन सर?’ मसर्रत साहब का मुँह फटा-का-फटा रह गया। उनके दिमाग में न जाने क्या-क्या कौंध गया। पन्नालाल का मन हुआ कि वह जोर से खिलखिलाए, पर अपनी हँसी दबाकर वह खान साहब की तरफ आदेश के लिए देखने लगा।

खान साहब ने पदक बाबू से पूछा, ‘फरमाइए! क्या बात है?’ हालाँकि वे जानते थे कि बात क्या हो सकती है।

पदक बाबू ने पहले कुरसी पर खुद को बिलकुल सीधा किया, रीढ़ की कमान को ताना और बोले, ‘मिस्टर खान! अहं ब्रह्मास्मि। मैं कल विवेकानन्द था, आज वशिष्ठ नारायण सिंह हूँ, कल सुकरात होऊँगा और फिर अरस्तू। कहिए, आपकी तत्काल जिज्ञासा क्या है? आपकी जन्म-जन्मान्तरों की कोई तपस्या फलीभूत हुई है जो मुझ जैसा अप्रतिम ऋषि, मार्ग प्रदर्शन और आशीर्वचन के लिए आपको उपलब्ध है। मैं इस विश्व को प्रभु का दिया हुआ पदक हूँ। स्पीक ऑन, बोलो, मैं सन्नद्ध हूँ, उपलब्ध हूँ।’

मसर्रत साहब ने अपनी दोनों कुहनियाँ मेज पर टिकाकर ‘हे भगवान!!’ की सिसकारी भरते हुए अपना माथा दोनों हथेलियों में दबाकर अन्ततः मेज पर रख दिया। पन्नालाल के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। मसर्रत खान सहज होते, तब तक पदक बाबू फिर बोले, ‘इतनी ग्लानियुक्त मानसिकता से आप प्रधानाध्यापकी किस तरह कर सकेंगे, मिस्टर खान? वैसे मैं प्रकटतः यह कहने आया हूँ कि इस विद्यालय का प्रधानाध्यापक मुझे होना था और आपको होना था मेरा सहायक। मेरा सहायक क्या, आपको तो पन्नालाल का सहायक होना था। पर मैं एक ‘अस्तु’ लगाकर आपसे कहना चाहता हूँ कि आप अपनी समस्याओं का समाधान मुझसे प्राप्त कर सकते हैं, अहं ब्रह्मास्मि। यदा-यदा हि धर्मस्य.....’

इससे आगे मसर्रत खान के लिए सुनना कठिन था। उनका मन हुआ कि चीखें और पन्नालाल से कह कर पदक बाबू को अपने कक्ष से बाहर फिंकवा दें। पर तभी परिवेश में बढ़ती हुई धर्मान्धता का जहर उनके आड़े आ गया। वे सोच बैठे कि बिना किसी बात के गाँव में न जाने कैसा तनाव हो जाएगा। लोग अपने मतलब निकालेंगे और.....।

पदक बाबू उठे और अभय मुद्रा में हाथ फैलाकर बुद्ध की मुद्रा में तर्जनी को अंगूठे से मिलाकर वर्तुल बना कर बोले, आपकी सुविधा के लिए मैं आपके कक्ष से बहिर्गमन करता हूँ। हमारी याद जब आए तो आँसू बहा लेना। विदा दो मेरे महबूब! मैं जा रहा हूँ। कल पुनः प्रविष्ट होकर आपका स्वास्थ्य परीक्षण करूँगा। ओ. के.। पुनरपि, पुनरपि, थैंक्यू मिस्टर ग्लॉड!’ और पदक बाबू कमरे से बाहर हो गए।

मसर्रत खान कातर दृष्टि से सामने लगा अपने प्रदेश का नक्शा देखते रह गए। पन्नालाल फर्नीचर की धूल पोंछने का बहाना करके दीवार की तरफ मुह करके हँसता रहा। तटस्थ होने की कोशिश में उसे कुछ नहीं सूझा तो मसर्रत साहब से पूछ बैठा, ‘किसी को बुलाऊँ, सर?’

मसर्रत साहब खीझकर बोले, ‘अब और किसको बुलवाना चाहता है? साल भर तक अब इस कमरे में किसी के आने की जरूरत नहीं है। जो भी आए, उसे धक्के.....।’  कहकर अपनी कुरसी से वे खड़े हुए। गाँधीजी के फोटो को देखकर उन्होंने तौबा की मुद्रा में दोनों कान पकड़े। अपने ही गालों पर दो तमाचे जड़े, बालों को नोचा, दीवारों को सुनाकर बोले, ‘या अल्लाह! तौबा! लानत है इस नौकरी पर। कैसे-कैसे जाहिल मेरी किस्मत में लिख दिए हैं तूने?’ और फिर धम्म से अपनी कुरसी में धँस गए।

वे इतने हताश हो चुके थे कि चपरासी पन्नालाल से ही कह बैठे, ‘तबादलों पर वापस बेन लगने वाला है, सरकार में किसी की सुनी जाती हो तो भाग-दौड़ करके इस पागल को यहाँ से कहीं बदलवाओ। पचास बार लिख चुका हूँ कि यह आदमी पागल हो चुका है। इससे मेरी जान छुड़ाओ, पर कोई सुनता ही नहीं है। अपनी रंगबाजी के लिए दूसरे मास्टर आए दिन इस पागल को मेरे कमरे में दाखिल कर देते हैं । कुछ कमजर्फ चाहते हैं कि इस बस्ती में किसी-न-किसी तौर पर हिन्दू-मुस्लिमवाला कमीना फसाद हो जाए। पन्नालाल! तुम मेरी क्या मदद कर सकते हो? कुछ करो, भाई!’

पन्नालाल बेचारा क्या करता? वह अपनी हस्ती को बढ़ता देखकर पल-दो पल के लिए फूलकर कुप्पा हो लेता। यह वैसा ही अवसर था।

पदक बाबू को लेकर मसर्रत खान साहब के सामने नई-नई मुसीबतें पेश आने लगीं। एक तो पदक बाबू इस बस्ती और शाला में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे आदमी। तीन-चार डिग्रियाँ उनके पास अलग-अलग विश्वविद्यालयों की, फिर वे खुद भी नहीं जानते हैं कि किस क्षण कौन सी भाषा बोलने लग जाएँगे, भाषाओं के विविध योग-प्रयोग करें, वहाँ तक तो ठीक है, पर न जाने कहाँ-कहाँ के श्लोक, कविताएँ, वाक्यांश, सूत्र संगत-असंगत न जाने कहाँ से कहाँ फिट कर दें, यह उनको भी पता नहीं रहता था। अर्थ के अनर्थ हो जाते और गलियों में झगड़े होते-होते समझदार लोगों के बीच-बचाव के कारण रह जाते।

रोज सवेरे स्नान- ध्यान तिलक-चन्दन के बाद पदक बाबू अपनी कपिला गाय को लेकर चराई के लिए चौंपे में छोड़ने जाते। अपने घर से गाँव के अन्तिम छोर तक चलते-चलते वे अपनी गाय से हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, गुजराती, मराठी, न जाने कौन-कौन सी भाषाओं में बातें करते। सामान्य लोगों का अनुमान था कि रात में सोते वक्त से लेकर प्रभात में उठते वक्त तक, और खासकर स्नान-ध्यान के समय तक पदक बाबू सामान्य ही रहते थे, पर ज्यों ही अपनी धोती पहनते, कुरता डालते, उसके ऊपर जैकेट पहनते और फिर नुकीली टोपी लगाकर आईने के सामने खड़े होते वैसे ही उनके भीतर विद्या का उफान उफन पड़ता। वे वहीं से बुदबुदाना, फिर बड़बड़ाना और आखिरकार ऊल-जुलूल बोलना शुरु कर देते थे। रास्ते भर मुहल्लों के लोग उनकी इस वाणी का आनन्द उठाते। ज्यों ही पता चलता कि पदक बाबू गाय लेकर आ रहे हैं त्यों ही मनचले लोग अपना काम छोड़-छाड़कर चबूतरियों पर आ जाते और कान लगाकर सुनते कि पदक बाबू गाय से क्या बातें कर रहे हैं। पदक बाबू गाय के पीछे से एकाएक उछलकर सामने आ जाते। गाय ठिठककर खड़ी हो जाती। वे घुटनों के बल गाय के सामने बैठ जाते, फिर प्रार्थना के स्वर में कहते, ‘हैलो मदर काऊ! आप सृष्टि-माता हैं। मैं आपका वत्स हूँ। सन्ध्या को यथासमय लौटने की कृपा करना। दिन भर कोई आवारागर्दी मत करना, अन्यथा आपकी सन्तति का अपयश होगा।’ और गाने लग जाते, ‘जाओ, पर सन्ध्या के संग लौट आना तुम, चाँद की किरन निहारते न बीत जाए रात’। फिर कहते, ‘ओ होली मदर! यू आर लवली। हूँ तमारे माटे प्रणय निवेदन करूँ छुँ, सेज की शिकन सँवारते न बीत जाए रात। लौट आओ माँग के सिन्दूर की सौगन्ध तुमको।’

लड़के-बच्चे खिलखिलाते, बहुएँ लम्बे घूँघटों को छोटा करतीं और बेतहाशा हँस पड़तीं। पदक बाबू की भाषा न गाय समझती, न बहू-बेटियाँ; पर एक दृश्य तो वैसा बन ही जाता था कि गलियों का सवेरा सही हो जाए।

एक दिन तो गजब हो गया। पदक बाबू स्कूल जाने के लिए घर से निकले, मुख्य मार्ग से गली में मुड़े। मन-ही-मन बुदबुदाते जा रहे थे कि सामने से पानी भरे बेवड़े माथों पर लिये घूँघटवाली तीन-चार बहुएँ उन्हें आती दिखाई दीं। पदक बाबू पर अपनी विद्या का दौरा पड़ गया। वह बीच रास्ते में घुटनों के बल उनके सामने बैठ गए। फिर हाथ पसारकर थिएटर की मुद्रा में शुरु हो गए, ‘किस पिपासु की पिपासा शान्त करने के लिए यह उपक्रम कर रही हो, सुभगे! तृषित को पहचानो। वह आपके समक्ष याचक मुद्रा में प्रस्तुत है।’ और दोनों हाथों की ओक माँडकर पानी पिलाने का आग्रह करने लगे।

बेचारी लड़कियों के होश उड़ गए, लाज-मर्यादा भूलकर एक चिल्लाई, ‘कमीने! बेवड़ा जो माथे पर मार दिया तो भेजा बाहर आ जाएगा।’ पर बात इतनी ही नहीं रही, अनायास बैठे-ही-बैठे पदक बाबू की नजर पड़ गई गली के मन्दिर के शिखर पर, जहाँ शिखर कलश के पास ही ध्वज-स्तम्भ पर एक मोर पक्षी बैठा-बैठा कूक रहा था। पनिहारिन रास्ता बनाएँ तब तक पदक बाबू ने अपने जीवन का अभी तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर दिया। उन्होंने आव देखा न ताव, अपनी धोती की काँछ पीछे से खोली। खुली काँछ को पीठ पर पूरा-का-पूरा सिर से ऊपर तक खींचा, धोती के उस पल्लू को दोनों हाथों से पीठ पर चौड़ाई में फैलाया और नर्तन करने लग गए घरों से पचासों नर-नारी निकलकर गली में एकत्र हो गए। बच्चे किलकारी भरकर तालियाँ बजा रहे थे। पदक बाबू बोले, “दूर हटो, मेरा मन-मयूर नाच रहा है। मैं नर्तन कर रहा हूँ। आषाढ़स्य प्रथम दिवसे-‘मेघदूतम्’ में यही हुआ था। मेरा यह कटिवस्त्र मयूर पंखों का पुंज है, राशि है। मयूर पंख फैल गए हैं।” बड़ी मुश्किल से सयानों ने उन्हें फिर से धोती पहनाई और स्कूल की तरफ चलता किया।

बात मसर्रत साहब तक भी पहुँची। उन्होंने लिपिक से कहकर तत्काल सारा मामला लिखकर वरिष्ठ कार्यालय तक लिखकर भेजा। पर दोपहर ढलते-ढलते मसर्रत साहब के सामने गाँव के नवयुवकों का एक शिष्टमण्डल आ धमका। वातावरण से डरे-सहमे मसर्रत साहब खौफ खा गए कि अब होगी तोड़-फोड़। पर उनके दीदे फटे रह गए, जब उस शिष्टमण्डल में शामिल कई नवयुवकों ने उनसे निवेदन किया, ‘मसर्रत साहब! कुछ ऐसी व्यवस्था कर दें कि पदक बाबू अपनी गाय छोड़ते समय और स्कूल आते-जाते समय प्रतिदिन एक ही गली से नहीं निकलें। वे रोज अलग-अलग गलियों से गुजरें, ताकि उनकी प्रबल मेधा का प्रदर्शन सारे गाँव में समान रूप से देखने को मिल सके।’

यह माँग सुनते ही मसर्रत खान बदहवास होकर खड़े हो गए। उन्होंने गाँधी बाबा की तसवीर के सामने हाथ जोड़े, अपने दोनों कान पकड़े, गालों पर तमाचे मारे और चीखे, ‘या अल्लाह! तौबा, रहम कर, हे भगवान। तुम कहीं हो भी या......। क्या हो गया है इस गाँव को?’ और सारा शिष्टमण्डल खिलखिलाता-हुआ बाहर निकल गया।

शिष्टाचार के नाते मसर्रत साहब उस शिष्टमण्डल को विदाई देने पीछे-के-पीछे बाहर आए तो देखते क्या हैं कि अपने बस्ते ले-लेकर बच्चे घर की ओर भाग रहे है। शोर उठ रहा था, ‘छुट्टी! छुट्टी!!’ वे लपककर बच्चों के आगे खड़े हो गए। उनको रोका। पूछा, ‘कहाँ हुई छुट्टी? चलो जाओ, अपनी क्लास में बैठो।’ बात की तह में जाने पर पता चला कि पदक बाबू ने क्लास में जाते ही बच्चों से कहा, “मेरे प्रिय बटुकों! हे मेरे शिष्यवृन्द! उच्चारित करो कि तुम आज मुझसे क्या पढ़ना चाहते हो? आज मैं तुम्हें धन्य कर दूँगा, निहाल कर दूँगा, मालामाल कर दूँगा। मैं कुबेर हूँ, मैं वृहस्पति हूँ, मैं गरुड़ हूँ, मैं परमहंस हूँ। ओ मानस के राजहंस! तुम भूल न जाना आने को। इस महान् विश्व में आज के ही दिन क्रूड आइल का आविष्कार हुआ था। जाओ सभी, ‘क्रूड आइल डे’ मनाओ! जाओ! छुट्टी।” और बच्चे ‘क्रूड आइल डे’ मनाने को भाग निकले।

थक-हारकर आखिर एक दिन मसर्रत खान ने गाँव के समझदार लोगों की बैठक बुलाई। उनसे निवेदन किया कि ‘बदनामी आपके गाँव की हो रही आपसे कुछ हो सकता हो तो आप करें, वरना आप लोग तुझे एक ज्ञापन दे दें ताकि मैं सारा मामला पुलिस को देकर पदक महाशय को मेडिकल के लिए भिजवा दूँ और चाहे इन्दौर बाण गंगा, चाहे जयपुर, चाहे बरेली चाहे आगरा, कहीं-न-कहीं इनका इलाज हो सके। भविष्य बिगड़ रहा है तो आपके बच्चों का बिगड़ रहा है। मैं सीधे-सीधे लिख दूँगा तो आप कहेंगे कि खान साहब से एक पागल भी नहीं पचा।’

बड़ी अवहेलना के भाव से गाँववालों ने कहा, ‘वो तो ठीक है, सर! पर पड़ा रहने दो। एक पागल के कारण गाँव में रौनक है। आपका क्या लेता है? क्यों परेशानी में पड़ते हैं आप? छोड़िए भी!’

मसर्रत खान के लिए यह उदासीनता नया झटका था। वे हतप्रभ थे। क्या हो गया है इस गाँव को? न अपने बच्चों की चिन्ता, न अपनी बहू-बेटियों की परवाह। एक पूरा गाँव तबाह हो रहा है और यारों को मनोरंजन की पड़ी है। वे बुरी तरह खीझ गए। वक्त की नजाकत को देखते हुए बोले कुछ नहीं और यह विचार-बैठक उठने को ही थी कि पदक बाबू आ धमके।

आते ही उन्होंने समवेत बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा, ‘इफ यू मीट ए फेअरी, डोण्ट रन अवे। शी विल नॉट वाण्ट टू हर्ट यू। शी विल वाण्ट टू ओनली प्ले विद यू।’ फिर पूछा, ‘समझे? नहीं समझे न? इस महान् कविता का अर्थ है-अगर कहीं तुम्हारी भेंट किसी परी से हो जाए तो उससे दूर मत भागो। डोण्ट रन अवे। वो तुम्हें कष्ट नहीं देना चाहेगी। वह केवल तुम्हारे साथ। खेलना चाहेगी।’ और आँखें मूँदकर बोलते चले गए, ‘मैं एक परी हूँ। मुझसे दूर मत भागो, प्यारे बच्चों! मैं तुम्हारे साथ खेलना चाहती हूँ।’ कहकर पदक बाबू फटाक से मुड़े और ‘ओ. के., टा-टा’ कहते हुए परिदृश्य से दूर हो गए।

मसर्रत साहब के लिए यह पराकाष्ठा थी। उनका बस चलता तो वे चीख-चीखकर रोते। पर हालात की मजबूरी थी। तब भी उनकी आँखों में आँसू छलछला आए। विचार-सभा कनखियों से एक-दूसरे को देखती हुआ खिसक ली। पर इस सबका चरम यह रहा कि तबादलों पर बेन लगने से पहले एक दिन की डाक में लिपिक ने जब डाक खोलकर मर्सरत खान साहब के सामने फैलाई तो वे पचास-साठ बार अपनी आँखों को मसलकर एक कागज को देखते रह गए। सचमुच यह तबादला आदेश ही था। विभाग ने तो उनकी नहीं सुनी, पर शायद भगवान ने उनकी सुन ली थी। यह तबादला आदेश खुद मसर्रत खान साहब के लिए था। इस गाँव से उनको कहीं दूसरे मिडिल स्कूल में रख दिया गया था।

उन्होंने गाँधीजी के फोटो को फिर से देखा। एक हलकी सी मुसकान उनके चेहरे पर खिल आई। उन्होंने पन्नालाल से कहा, ‘जाओ पन्नालाल! पदक बाबू को बुला लाओ।’

पन्नालाल चौंका, ‘क्या हो गया, सर? कोई खास बात?’

वे हँसे। बोले, ‘जाओ, जितना कहें उतना करो।’

पदक बाबू कमरे में आए। मसर्रत खान ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया, सामनेवाली कुरसी दी। बोले, ‘पदक बाबू! पहले मैं बोल लूँ, फिर आप बोलना। सरकार ने ऐसी व्यवस्था कर दी है कि मैं अब आपके सत्संग से वंचित रहूँगा। मेरा तबादला कर दिया गया है। इस स्कूल को आप सँभालना। सीनियरिटी के लिहाज से इस अमले में मेरे बाद अब आप ही यहाँ का चार्ज लेंगे।’ और लिपिक को देखकर बोले, ‘बड़े बाबू! चार्ज देने की सारी तैयारी कर लो।’

पदक बाबू न पहले कुछ समझते थे, न अब कुछ समझे । अपनी रौ में कहने लगे, ‘हे पार्थ! इस तरह शस्त्र मत फेंक। तू यह धर्मयुद्ध लड़। यह मेरा आदेश है।’ और बोले, ‘माननीय प्रधानाध्यापक महोदय! तब कृष्ण ने अर्जुन से कहा-त्वया चा पि मया चा पि। आप इसका मतलब समझे? जब भगवान कृष्ण ने देखा कि अर्जुन पर मानसिक कायरता का दौरा पड़ गय्ा है तो उन्होंने अर्जुन को ढाढस देते हुए कहा-‘हे अर्जुन! त्वया चा पि अर्थात् तू भी चाय पी ले और मया चा पि, मैं भी चाय पी लूँ। यानी खूब सोच ले, खूब समझ ले, चाहे तो कुछ उत्तेजक औषधि ले ले, पर यह युद्ध तो तुझे करना ही पड़ेगा। तू लड़, उठ, खड़ा हो जा।

मसर्रत खान ने दाँत पीसे, मन-ही-मन कुछ बुदबुदाए, फिर बोले, ‘मिस्टर पदक! तुम्हारे कारण शास्त्रों का मखौल हो रहा है। तुम्हारे कारण पीढ़ियाँ बरबाद हो रही हैं। तुम्हारे कारण सरकार, शासन, यह गाँव, बस्ती सब-के-सब बदनाम हो रहे हैं। तुम अपना उपचार क्यों नहीं करवाते? तुम्हारे घरवाले तुम्हें किस तरह बरदाश्त कर रहे हैं? मेस बस चलता तो....’

पदक बाबू एक क्षण भी विचलित नहीं हुए। कड़क आवाज में बोले, “मिस्टर खान! मुझसे बराबरी का व्यवहार करो। महाराजाधिराज पुरु की जगह मैं हूँ। आप इस समय वक्त के सिकन्दर हैं। आप भी हेडमास्टर और अब मैं भी हेडमास्टर।’ और उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के गाना शुरु कर दिया, ’ओ जानेवाले, हो सके तो लौट के आना।’ फिर कहा, ‘यह संसार असार है, बच्चा! न यहाँ कोई आता है, न यहाँ से कोई जाता है। सब लीलाधर की लीला है।’

पन्नालाल आज परेशान था। जब तक नया हेडमास्टर नहीं आए तब तक उसे पदक बाबू के मातहत ही काम करना है, यह सोचकर वह चुपचाप खड़ा रहा। पदक बाबू ने कमरे से निकलने के पहले आज की तारीख में

अपना अन्तिम वाक्य कहा, ‘पन्नालाल! राम झरोखे बैठकर सबका मुजरा लेत, जैसी जाकी चाकरी तैसा ताको देत।’ और मसर्रत खान की तरफ देखकर कह बैठे, ‘जाओ रानी! याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, तेरा यह बलिदान लाएगा स्वतन्त्रता अविनाशी।’

पदक बाबू कमरे से बाहर निकल रहे हैं। मसर्रत खान कुरसी छोड़ने के लिए कुरसी पर बैठ रहे हैं और पन्नालाल कभी इधर देख रहा है तो कभी उधर। 

-----


‘बिजूका बाबू’ की बीसवी कहानी ‘छात्र’ यहाँ पढिए।  


कहानी संग्रह के ब्यौरे -

बिजूका बाबू -कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली-110002
संस्करण - प्रथम 2002
सर्वाधिकर - सुरक्षित
मूल्य - एक सौ पचास रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली 

 


 

 

 

 

 

 


  


 


 

 

  

 

  

 


तीन कविताएँ ‘आसान’, ‘वही बीज’ और ‘दायित्व बोध’



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की तीन कविताएँ  


यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।



तीसवी कविता 
आसान

बहुत आसान है नारा लगाना
और भी आसान है वादा भुलाना
पर ये उससे भी आसान काम कर रहे हैं
वे आत्महत्या करके मर गये
ये इसी खुशी में मर रहे हैं।
---

इकतीसवी कविता 
वही बीज

इतना गरजे आशा के बादल
इतना बरसे विश्वास के मेघ
ऐसी तैयार हुई धरती
कि ढूँढे नहीं मिलती है मिसाल
पर बोवनी के वक्त फिर वही कमाल
कि मेड़-मेड़ पर
सलाह-मशविरे हो रहे हैं
बैशक तुम झोली में हाथ डालकर देख लो
वे फिर से निराशा बो रहे हैं।
----

बत्तीसवी कविता 
दायित्व बोध

कहते हैं
जब दायित्व आता है
तो तीर भी कमान बन जाता है।
झुक जाती है उसकी रीढ़
खो जाती हैं प्रखरता
बँध जाते हैं उसके बिन्दु
तन जाती है उसकी प्रत्यंचा
नपा-्तुला हो जाता है उसका घेरा
टंकार और लचक हो जाते हैं उसके गुण
तब जो हो निपुण
वो उसे कन्धे पर धारे
यूँ तो तीरन्दाज बहुत फिरते हैं
मारे-मारे ।
-----


संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















ओ दिनकरों के वंशधर



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की उनतीसवीं कविता 

यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को 
समर्पित किया गया है।


ओ दिनकरों के वंशधर!

जब अँधेरा मुँह चिढ़ाये
दिल जलाये दीप का
और घोंघे कर उठें
उपहास उजली सीप का,
तब बताओ
मोतियों के वंशधर! हम क्या करें?
और दिनकर के
दहकते वंशधर! हम क्या करें?

अंश उजले वंश का जब
तिलमिला कर जल उठे
और उसकी लौ लपट बन
तम जलाने को जुटे
उस समूचे रोष का ही
पुण्य यह उजियार है
मन्युमय उस दीप का
शायद यही आधार है।

मीत!
इस आधार को
इस मन्यु को आकाश दो।
युद्धरत हो तुम सतत्
ऐसा प्रबल आभास दो।
तुम विजेता हो, अजित हो, इष्ट हो
ऐसा कहो ललकार कर।
लिख चुका जय-गीत,
अब तुम
आ न जाना हार कर।
-----
 


रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
-----
 
 

 






















पहाड़ की प्रार्थना



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ 
की एकसौएकवी कविता


यह कविता संग्रह
पाठकों को समर्पित किया गया है।






पहाड़ की प्रार्थना
(स्व. पण्डित जवाहरलाल नेहरू के प्रति)

अब भारी हो जाती है
उनकी जबान
तुम्हारा नाम लेते हुए।
पहले जब वे
तुम्हें देते थे गालियाँ
तब चलती थी वह
बेलगाम-अथक-अनवरत्।

पर अब?
जब आई उन पर जिम्मेदारी
तुम्हारी ‘मृगछाला’ की
तब,
लेना तो चाहते हैं तुम्हारा नाम
पर लें कैसे?
मन ही मन
स्वीकारते हैं वे
अपनी इस क्षुद्रता को
लेकिन प्रकट में
हिला नहीं पाते
अपनी लकवा लगी जबान।

कल जब
प्रहार किया उन्होंने
तुम्हारे श्वेत कपोतों पर
लहूलुहान किया
तुम्हारे शान्ति कबूतरों को
नोचा तुम्हारे गुलाबों को
तब देखने लायक था
उनका शौर्य (?) से
दिपदिपाता चेहरा।

अपराध बोध से ग्रस्त
वे ढूँढ़ रहे थे
तुम्हारी तस्वीरें
शायद क्षमा याचना के लिए
लेकिन फिर ठिठक गए।
अतीत का बोल
अच्छे-अच्छों को
ठिठका देता है।

आज पहनी है उन्होंने
तुम्हारी जाकेट
कल पहनेंगे तुम्हागी अचकन
परसो सजायेंगे अपनी धड़कनों पर
तुम्हारा गुलाब
और दिखेंगे तुम जैसे।

लेकिन
उनका अभीष्ट है
तुम्हारे पंचशील को
’पंच लकड़ी’ देना
और उर्वरता खत्म कर देना
उन खेतों की
जिनमें तपस्या-रत् है
तुम्हारी चिता-भस्म।
वे खिसका देना चाहते हैं तुम्हें
तुम्हारे ’धु्रव-आसन’ से।
और जब
मैंने उन्हें समझाया
‘पागलों!
नदियाँ रोकी जी सकती हैं
बाँधी या मोड़ी जा सकती हैं
लेकिन खिसकाये नहीं जा सकते पहाड़।

’तुम पहाड़ के कन्धों पर बैठकर
देख सकते हो
निस्सीम क्षितिजों के पार
उसके सिर पर चढ़कर
बढ़ा सकते हो अपना कद
मिटा सकते हो अपना बौनापन
लेकिन उसे खिसकाना
असम्भव है।

अपनी क्षुद्रताओं पर
इतराना छोड़ो
ऋषि-मन से बैठो
ऋषि की मृगछाला पर
यश-लिप्सा में
अपनी लज्जा छिपाने के लिए
उसे यूँ मत ओढ़ो।

तब
मेरे समझाए को
स्वीकारते तो हैं वे
लेकिन उसे मानते हैं
मरे मन से।
ऐसे ही बुझे-बुझे
अभी-अभी लौटे हैं
वे ‘शान्ति वन’ से।
-----




जैसा कि दादा श्री बालकवि बैरागी ने ‘आत्म-कथ्य’ में कहा है, इस संग्रह ‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की कई रचनाएँ अन्य संग्रहों में पूर्व प्रकाशित हैं। इसलिए यहाँ, उन सब कविताओं को एक बार फिर से देने के बजाय उनकी लिंक यहाँ दी जा रही हैं। सम्बन्धित कविता की लिंक क्लिक करने पर कविता पढ़ी जा सकती है।

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अट्ठाईसवी कविता ‘हम हैं सिपहिया भारत के’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनतीसवी कविता ‘आह्वान’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तीसवी कविता ‘दो-दो बातें’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इकतीसवी कविता ‘गोरा-बादल’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बत्तीसवी कविता ‘मेरे देश के लाल हठीले’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तैंतीसवी कविता ‘हम बच्चों का है कश्मीर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौंतीसवी कविता ‘नई चुनौती जिन्दाबाद’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पैंतीसवी कविता ‘नये पसीने की नदियों को’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छत्तीसवी कविता ‘अन्तर का विश्वास’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सैंतीसवी कविता ‘मधुवन के माली से’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अड़तीसवी कविता ‘देख ज़माने आँख खोल कर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनचालीसवी कविता ‘छोटी सी चिनगारी ही तो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चालीसवी कविता ‘ऐसा मेरा मन कहता है’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इकतालीसवी कविता ‘काफिला बना रहे’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बयालीसवी कविता ‘माँ ने तुम्हें बुलाया है’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तरालीसवी कविता ‘रूपम् से’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चव्वालीसवी कविता ‘उमड़ घुमड़ कर आओ रे’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पैंतालीसवी कविता ‘मेघ मल्हारें बन्द करो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियालीसवी कविता ‘एक गीत ज्वाला का’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सैंतालीसवी कविता ‘जो ये आग पियेगा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अड़तालीसवी कविता ‘फिर चुपचाप अँधेरा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनपचासवी कविता ‘तरुणाई के तीरथ’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पचासवी कविता ‘अधूरी पूजा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इक्यावनवी कविता ‘अंगारों से’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बावनवी कविता ‘एक बार फिर करो प्रतिज्ञा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तरेपनवी कविता ‘अग्नि-वंश का गीत’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौपनवी कविता ‘चिन्तन की लाचारी’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पचपनवी कविता ‘कोई इन अंगारों से प्यार तो करे’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छप्पनवी कविता ‘इस वक्त’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सत्तावनवी कविता ‘उनका पोस्टर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अट्ठावनवी कविता ‘घर से बाहर आओ’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनसाठवी कविता ‘मरण बेला आ गई त्यौहार है’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की साठवी कविता ‘चलो चलें सीमा पर मरने’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इसठवी कविता ‘आई नई हिलोर’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बासठवी कविता ‘हौसला हमारा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तिरसठवी कविता ‘युवा गीत’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौंसठवी कविता ‘हिन्दी अपने घर की रानी’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियासठवी कविता ‘ज्ञापन: अतिरिक्त योद्धा को’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सड़सठवी कविता ‘बन्द करो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अड़सठवी कविता ‘क्रान्ति का मृत्यु-गीत’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उनसत्तरवी कविता ‘ठहरो’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सत्तरवी कविता ‘आस्था का आह्वान’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इकहत्तरवी कविता ‘समाजवाद’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बहत्तरवी कविता ‘रात से प्रभात तक’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तिहत्तरवी कविता ‘सीधी सी बात’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौहत्तरवी कविता ‘आत्म-निर्धारण’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पचहत्तरवी कविता ‘आलोक का अट्टहास’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियोत्तरवी कविता ‘माँ ने कहा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अठहत्तरवी कविता ‘महाभोज की भूमिका’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उन्यासीवी कविता ‘चिन्तक’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की अस्सीवी कविता ‘गन्ने! मेरे भाई!’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इक्यासीवी कविता ‘जीवन की उत्तर-पुस्तिका’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की बयासीवी कविता ‘पर्यावरण प्रार्थना’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की तिरयासीवी कविता ‘एक दिन’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की चौरियासीवी कविता ‘एक और जन्मगाँठ’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की पिच्यासीवी कविता ‘जन्मदिन पर-माँ की याद’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की छियासीवी कविता ‘पेड़ की प्रार्थना’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की सित्यासीवी कविता ‘रामबाण की पीड़ा’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इट्ठ्यासीवी कविता ‘पर जो होता है सिद्ध-संकल्प’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की उन्नब्बेवी कविता ‘उठो मेरे चैतन्य’ यहाँ पढ़िए

‘मैं उपस्थित हूँ यहाँ’ की इठ्यानबेवी कविता ‘वंशज का वक्तव्य: दिनकर के प्रति’ यहाँ पढ़िए




संग्रह के ब्यौरे -

मैं उपस्थित हूँ यहाँ: छन्द-स्वच्छन्द-मुक्तछन्द-लय-अलय-गीत-अगीत
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - डायमण्ड पॉकेट बुक्स (प्रा.) लि.
एक्स-30, ओखला इण्डस्ट्रियल एरिया, फेज-2, नई दिल्ली-110020
वर्ष - 2005
मूल्य - रुपये 95/-
सर्वाधिकार - लेखकाधीन
टाइप सेटिंग - आर. एस. प्रिण्ट्स, नई दिल्ली
मुद्रक - आदर्श प्रिण्टर्स, शाहदरा



रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।
 



























छात्र (श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की बीसवीं कहानी)

 

श्री बालकवि बैरागी के कहानी संग्रह ‘बिजूका बाबू’ की बीसवीं कहानी  


यह संग्रह, इन कहानियों के पात्रों को
समर्पित किया गया है।



छात्र

अब अगर किस्मत ही काली स्याही से लिखी गईं हो तो कोई क्या करे। तत्पर भाई का जब-जब साबका पड़ा, ऐसे ही लोगों से पड़ा। वैसे उनकी  दुनिया विद्यार्थियों की दुनिया रही। छात्र संसार में उन्हें हमेशा सम्मानित स्थान मिला। अगर यूनियनबाजी करते तो शायद वे एकछत्र छात्र नेता होते, ‘स्टूडेण्ट लीडर’ कहलाते। आड़े वक्त छात्रों के काम आना उनका व्यसन रहा। लेकिन इन दिनों में उनका अनुभव यह रहा कि छात्रों के सामने आड़ा वक्त ज्यादा आने लगा। कभी-कभी तो सारा-का-सारा दिन उन्हें इस ‘आड़े वक्त’ को ‘खड़ा वक्त’ बनाने में ही लगाना पड़ जाता है। एक आता है तो एक जाता है। पहला जाता है तो दूसरा आ जाता है। काम भी, उनके टेढ़े-मेढ़े।

एक तो विश्वविद्यालय वाले शहर में तत्पर भाई का निवास। फिर खुद का सामाजिक और राजनीतिक रुतबा। सबसे ज्यादा कष्टदायक बात यह कि तत्पर भाई ने किसी को ना कहना नहीं सीखा। उनके साथी मित्र उनकी इस आदत को लेकर न जाने कैसे-कैसे मजाक करते हैं। प्रचलित मजाक यह है कि अगर तत्पर भाई को भगवान ने कहीं लड़की बना दिया होता ये दस-बीस हजार लोगों का जीवन तबाह कर देते। तत्पर भाई हैं कि सारी बातों को हँसकर पी जाते हैं। किन्तु यदा-कदा वे ऐसे करिश्मे भी कर बैठते हैं कि बड़े-बड़े बीहड़ छात्र नेता तक अपनी दादागिरी भूलकर उनके पाँव पकड़ लेते हैं। छात्र नेताओं और छात्र संगठनों की दीम लगी खोखली नींव के हजार किस्से तत्पर भाई की जबान पर हैं। कभी-कभी तो वे खुद ही कह बैठते हैं कि ऐसी खोखली नींव पर छात्र राजनीति किस तरह छात्रों के भविष्य का स्वन-महल खड़ा कर सकेगी। पर तब भी वे अपनी सदाशयता और ‘आड़े वक्त को खड़ा वक्त’ बनाने की तत्परता से बाज नहीं आते। आखिर तत्पर भाई जो ठहरे! तब भी कल उन्होंने कमाल कर दिया।

दो नवयुवक छात्र नेता उनके किसी सुपरिचित सज्जन का अनुशंसा-पत्र लेकर तत्पर भाई के सामने खड़े हो गए। तत्पर भाई ने पत्र पढ़ा। दोनों नवयुवकों को सादर बैठाया। उनका चाय-नाश्ता करवाया। फिर विस्तार से परिचय पूछा। दोनों को भरपूर आत्मीयता से अपनापन दिया। मन-ही-मन सोचा कि अगर ये फिल्म या किसी टी. वी. सीरियल में ट्राई करते तो हीरो या साइड हीरो अवश्य बनाए जाते। पर उन्होंने अनुशंसा-पत्र की गम्भीरता को देखते हुए उनसे कोई छेड़-छाड़ नहीं की। वे सीधे काम की बात पर आ गए।

‘हाँ तो हीरो! तुम्हारी सूचना पक्की है कि तुम्हारी कॉपियाँ यहीं आई हुई हैं?’ तत्पर भाई का प्रश्न था।

‘जी सर! हमारी सूचना पक्की है। कॉपियाँ यहीं हैं और जायसवाल सर आपके अच्छे मित्र ही नहीं, आपसे उपकृत भी हैं। वे आपका कहा टालेंगे

नहीं। हमारे भविष्य का सवाल है। अगर कुछ नम्बर बढ़ जाएँगे तो...।’ दोनों में से एक बोला। दूसरा अपनी कमीज पर पड़ी सलवटों को ठीक करता हुआ जीन्स की जेब से कंघा निकालक़र अपने बालों में लच्छे डालता तत्पर भाई की बैठक में लगे शीशे का उपयोग करता रहा।

‘चलो, जायसवालजी से बात कर लेते हैं।’ और तत्पर भाई उठ खड़े हुए।

यह सुनते ही दोनों चौंक गए।

‘सर! आप तो फोन कर दीजिए। जायसवाल सर से हम मिल लेंगे।’ एक बोला।

‘नहीं भाई! जो कुछ होना है, वह तुम्हारे सामने ही होना है। चलो, वक्त बरबाद मत करो।’ तत्पर भाई की तत्परता ने दोनों को कुछ सोच में डाल दिया।

और तत्पर भाई आधे घण्टे के भीतर ही जायसवालजी के घर पहुँच गए।

जायसवालजी को कुछ भी नया नहीं लगा। वे समझ गए कि यह नम्बर बढाने का चक्कर है। समय के सत्य से वे भलीभाँति परिचित थे। उन्होंने केवल दोनों छात्रों से उनके विश्वविद्यालय का नाम पूछा। फिर परीक्षा केन्द्र का नाम पूछा। फिर स्वयमेव ही कह दिया, ‘हाँ। आपकी कॉपियाँ मेरे पास हैं। अभी उन्हें जाँचना शुरु नहीं किया है। बताइए अपने रोल नम्बर?’

दोनों ने अपने-अपने रोल नम्बर बताए।

जायसवाल सर ने एक बण्डल की तरफ इशारा किया, ‘उठाओ और निकालो अपनी-अपनी कॉपी।’

दोनों ने अपनी-अपनी कॉपी निकाली। तत्पर भाई देखते रहे। कॉपियाँ निकालकर वे जायसवाल सर को देने लगे। जायसवाल सर ने तत्पर भाई से कहा, ‘भाई! देख लो इन कॉपियों को। मेरी अपनी नौकरी दाँव पर लग ही रही है। खुद ही जाँच कर नम्बर दे दो। शेष मेरी जिम्मेदारी।’

दोनों खुश। तत्पर बाबू पानी-पानी। पर वे बात को पेंदे तक समझ गए। उन्होंने कॉपियों के पन्ने देखे। मुश्किल से एकाध सवाल का उत्तर लिखने की कोशिश की गई थी। शेष सारी कॉपी कोरी पड़ी थी।

तत्पर भाई ने दोनों से उनके राजनीतिक दलों की जानकारी ली। दोनों अलग-अलग राजनीतिक दलों के छात्र नेता थे।

तत्पर भाई ने अपना खुद का कलम एक छात्र को दिया। जायसवाल सर से एक कलम माँगकर दूसरे हीरो को दिया। बण्डल पर जो प्रश्नपत्र था वह दोनों के सामने रखा। पुस्तकों की अलमारी की तरफ इशारा किया। पूरी गम्भीरता से कहा, ‘हीरो! सामनेवाली अलमारी से इन सवालों के उत्तरवाली तुम्हारी कोर्स बुक्स रखी हैं। मैं तुम लोगों के भोजनादि की व्यवस्था करवाता हूँ। चाय-पानी यहाँ मिल जाएगा। जायसवालजी के सामने बैठो। पुस्तकें लो। प्रश्नपत्र यह रहा। पूरे छह घण्टों का समय आप लोगों को मैं देता हूँ। अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में अपने हाथ से सही उत्तर लिख दो। मार्किंग तुम्हारे सामने हो ही जाएगा। शाम की ट्रेन से अपने घर के लिए निकल जाना। समझ गए!’

जायसवाल सर चुप।

 दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। अपनी कॉपियों को देखा। फिर एक-दूसरे को देखा। कभी जायसवाल सर को तो कभी तत्पर भाई की तरफ देखकर फिर से एक-दूसरे को देखा। कमरे में सन्नाटा गहरा गया।

एक बोला, ‘हम बड़ी उम्मीद से आए थे, सर।’

‘आप तो हमें टाल रहे हैं, सर!’ दूसरा बोला।

तत्पर भाई ने धीरे से पूछा, ‘आप हम दोनों में से किससे कह रहे हैं? जिससे भी कह रहे हों उसकी आँखों में आँखें डालकर कहो। हमें पता तो चले कि आपको कौन टाल रहा है!’

‘खैर सर! हम जा रहे हैं, पर आप यह अच्छा नहीं कर रहे हैं।’ एक बोला।

तत्पर भाई ने एक सुझाव और रखा, ‘अच्छा! चलो! ऐसा करते हैं कि सवालों के जवाब जायसवाल सर बोल देंगे, तुम अपने हाथ से लिख तो दो।’

‘अब छोड़िए भी, सर! यही सब करना होता तो हम आपके पास क्यों आते!’ पता नहीं दोनों में से कौन बोला।

न किसी ने धन्यवाद दिया, न किसी ने धन्यवाद लिया।

दोनों उठकर बैठक से बाहर होने लगे।

‘ना! ना!! ऐसे नहीं। अपनी कॉपियों को वापस उसी बण्डल में बाँधकर वहीं रख दो, जहाँ से तुमने उठाया था।’

दोनों मेधावी छात्रों ने जब उस बण्डल को बाँधना शुरु किया तो तत्पर भाई को लगा जैसे वे अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों और छात्र संगठनों की गतिविधियों का बण्डल बाँध रहे हैं।

तत्पर भाई ने एक बार फिर काली स्थाही से लिखी किस्मत को पढ़ने की कोशिश की।

-----

‘बिजूका बाबू’ की उन्नीसवी कहानी ‘पुल पर एक शाम’ यहाँ पढिए।

‘बिजूका बाबू’ की इक्कीसवी/अन्तिम कहानी ‘विकृत’ यहाँ पढिए।



कहानी संग्रह के ब्यौरे -

बिजूका बाबू -कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली-110002
संस्करण - प्रथम 2002
सर्वाधिकर - सुरक्षित
मूल्य - एक सौ पचास रुपये
मुद्रक - नरुला प्रिण्टर्स, दिल्ली 

 


 

 

  

 


हे! लोकदेव नेहरू



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की उनतीसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


हे! लोकदेव नेहरू

महक रही है और अधिकतम
गन्ध तुम्हारे प्रिय गुलाब की
शान्ति-कपोत तुम्हारे अनथक
उड़ते जाते हैं अनन्त में
पुनर्प्रतिष्ठा प्रजातन्त्र को देता है
ऊर्जित नव-यौवन
स्वप्न-सेतु नित उभर रहे हैं
अनजाने अभिनव क्षितिजों पर
भेद गरीबी औ’ दरिद्र का
अभी-अभी समझा है हमने
पूरे युग के बाद समझ में
आये हो तुम ।
पूरे युग के बाद समझ में
आया है उत्सर्ग तुम्हारा
प्रश्नों की आँखों में आँखें
डाल चुकी है जलती पीढ़ी
आस्थामय सम्पूर्ण चेतना
आज वचन देती है तुमको
जिस मिट्टी में बोये तुमने
प्राण स्वयं के
उस मिट्टी से जो उभरेगा
वह होगा संस्कार तुम्हारा।
लोकदेव!
यदि देख सको तो आज देख लो
कितना अनुशासित-पुष्पित है
उपवन पर उपकार तुम्हारा।
-----
  
  

संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















‘वामन’ शास्त्रीजी ने विराटता और विनम्रता से बैरागीजी की अहमन्यता को शालीनता से क्षमा किया

मूल आलेख से पहले, कृपया इसकी अन्‍तर्कथा पढ़िए

आदमी की संस्कारशीलता उसके सार्वजनिक आचरण से प्रकट होती है। ‘कुर्सी’ अच्छे-अच्छों का ‘दिमाग खराब कर देती है।’ सिंहासनारूढ़ होकर विनम्र, शालीन और संस्कारवान बने रहना असम्भव नहीं तो दुसाध्य तो होता ही है। आदमी की संस्करशीलता ऐसे ही समय में परीक्षारत रहती है। इस अग्नि परीक्षा में सफल वही होता है जिसके रक्त-मज्जा में, अभावों से संघर्षों की अनुभूतियाँ और शोषित-पीड़ित मानवता की वेदनाभरी आवाजें प्रवाहित हो रही हों। देश के प्रधान मन्त्री जैसे शीर्षस्थ पद पर बैठा आदमी कितना विनम्र और शालीन हो सकता है या कि होना चाहिए, यह घटनाक्रम इसका एक सुन्दर और प्रेरक उदाहरण है। आज के समय और सन्दर्भ में तो यह प्रसंग अविश्वसनीय ही लगेगा। ‘ऐसे’ प्रधान मन्त्री की तो अब हम, कल्पना भी शायद ही कर पाएँ।     

मैं, इस प्रसंग के आधिकारिक विवरण की तलाश में था। दादा श्री बालकवि बैरागी से यह घटनाक्रम एकाधिक बार सुनने के अवसर आए तो जरूर किन्तु हर बार, किसी न किसी व्यवधान के कारण दादा की बात अधूरी रह गई। पूरी बात जानने के लिए मैंने जब भी दादा से आग्रह किया तब ‘छोड़ यार! यह कोई बड़ी बात नहीं।’ कह कर दादा ने मेरी जिज्ञासा पर विराम लगा दिया।

गए दिनों, दादा की एक रचना तलाशते हुए, अचानक ही, राजस्थान साहित्य अकादमी की वेब साइट पर, श्री ग्यारसीलालजी सैन का यह संस्मरण मिल गया। मेरी एक जिज्ञासा, अनायास ही पूरी हो गई। मैंने फौरन ही ग्यारसीलालजी से बात की। यह संस्मरण मूलतः ‘मधुमति’ पत्रिका के फरवरी 2017 के अंक में छपा था। ग्यारसीलालजी ने ‘मधुमति’ का अंक दादा को भेजा था तो जवाब में दादा ने भावाकुलता से ओतप्रोत पत्र से जवाब दिया था। ग्यारसीलालजी की यह बात सुनकर मैंने दादा के इस पत्र के बारे में जानना चाहा तो बोले कि दादा का वह पत्र उनके पास सुरक्षित है। मेरे आग्रह पर ग्यारसीलालजी ने वह पत्र भी उपलब्ध करा दिया। उस पत्र ने समूचे प्रसंग को आधिकारिकता और प्रामाणिकता प्रदान कर दी।ग्यारसीलाजी का आलेख तथा दादा का उपरोल्लेखित पत्र यहाँ प्रस्तुत है। 

इसे पढ़ते हुए, कृपया एक बात ध्यान में रखिएगा। कवि सम्मेलनवाले उस काल-खण्ड में पूरा देश पाकिस्तान पर विजय के अभूतपूर्व गर्वित भाव से विजयोल्लास में डूबा हुआ था। ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा जनमानस पर छाया हुआ था। ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कोष’ के लिए पूरे देश में धन-संग्रह अभियान चल रहा था। यह अभियान पूरी तरह से गैर-सरकारी था। गाँवों-कस्बों-शहरों में विभिन्न संगठन-संस्थाएँ अपने-अपने स्तर पर धन संग्रह कर रही थीं। उस दौर के कवि सम्मेलनों मे दादा ने भी अपने स्तर पर यह अभियान चला रखा था। कविता पाठ के दौरान वे, अपने कुर्ते/शर्ट की झोली बनाकर श्रोताओं से राष्ट्रीय सुरक्षा कोष के लिए दान माँगते थे। हर जगह उन्हें अपेक्षातीत रकम मिलती थी। दिल्लीवाले इस कवि सम्मेलन में भी दादा ने यही किया था। यहाँ संग्रह के सारे रेकार्ड टूट गए थे। लोगों ने इतने नोट दिए थे कि ‘झोलियाँ’ भर गई थीं। दादा ने उन्हीं झोलियों में से, ‘लबालब अंजुरी भर नोट’ शास्त्रीजी को भेंट किए थे। सैनीजी के इस आलेख का मूल शीर्षक कुछ और था। मैंने इसे बदल कर, दादा के एक वाक्‍य को ही शीर्षक बना दिया है। - विष्णु बैरागी।
-----

‘वामन’ शास्त्रीजी ने विराटता और विनम्रता से
बैरागीजी की अहमन्यता को शालीनता से क्षमा किया
ग्‍यारसीलाल सैन


श्रोताओं से प्राप्त रकम, सांकेतिक रूप से, शास्त्रीजी को भेंट करते हुए दादा श्री बालकवि बैरागी। इस चित्र के सन्दर्भ में दादा हर बार कहते थे - ‘शास्त्रीजी के हाथों में इतने नोट, इससे पहले या बाद में कभी नहीं देखे गए।’ यह चित्र दादा की पोती रूना (रौनक बैरागी) ने अपने संग्रह से उपलब्ध कराया है।

लाल किले पर होने वाले कवि सम्मेलनों में सदैव बुलाये जाने वाले बैरागी जी का एक अनूठा  प्रसंग मेरी जानकारी में है। 

दिल्ली प्रादेशिक हिन्दी सम्मेलन के सर्वेसर्वा पण्डित श्री गोपालप्रसाद व्यास ने दिल्ली के एक श्रेष्ठ सभागार में प्रधान मन्त्री लाल बहादुर शास्त्री के मुख्य आतिथ्य में कवि सम्मेलन का आयोजन किया। सन् 1965 का युद्ध पाकिस्तान हार चुका था, पूरे देश में उत्साह व उमंग का वातावरण था, हमारे समाचार पत्र हमारी सेना के शौर्य से रंगे पडे़ थे, पाक के टूटे टैंक भारतीय नगरों के चौराहों पर सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखे जा रहे थे। 

उन दिनों बैरागीजी की दो कविताओं का बहुत बड़ा हल्ला था। एक थी ‘जब कि नगाड़ा बज ही गया है सरहद पर शैतान का, तो नक्शे पर से नाम मिटा दो पापी पाकिस्तान का’। और दूसरी थी ‘दो दिन और बनाए रखते इस बलिदानी दौर को, लगे हाथ निपटा ही देते पिण्डी और लाहौर को’। ये तेवर इनकी अनुभूतियो के वे तेवर थे जो शब्दों से कविता में ढल गये और वक्त की आवाज बन गये। जमाने ने देखा कि कलम के कण्ठ में भी स्वर होता है जो चिंगारियों की शक्ल में निकलता है।

कवि सम्मेलन का सभागार खचाखच भरा था, शास्त्री जी पधार चुके थे, व्यासजी संचालन कर रहे थे। इन्हें इनके क्रम पर पुकारा गया। शास्त्रीजी,  नेहरूजी के जमाने से बैरागीजी से भली-भाँति परिचित थे। शास्त्रीजी ने परिचित नजरों से बैरागीजी को देखा। बैरागीजी ने उन्हें प्रणाम किया। तभी व्यास जी ने आदेश दिया - “हाँ बैरागी! ‘लगे हाथ’ हो ही जाये।” और बैरागीजी ने अपनी शैली में दहकते शोलों को शब्दों में ढालते हुए स्वर उठाया ‘दो दिन और बनाए रखते उस बलिदानी दौर को, लगे हाथ निपटा ही देते पिण्डी और लाहौर को’। सारा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से, रुपयों की वर्षा से, भारत माता की जय से, जय जवान जय किसान, तक जा पहुँचा।

बैरागीजी अपनी कविता के चौथे छन्द तक पहुँचे ही थे कि एक कर्मचारी, अपनी सरकारी वेशभूषा में चाय की ट्रे लिए मंच की ओर बढ़ा। बैरागीजी की एकाग्रता भंग हो गई। वे लगभग उत्तेजित होकर चीखे - ‘मैं खून की बात कर रहा हूँ और आप चाय लेकर घुस आये! यह चाय जिसके लिए भी लाये हो, कवि सम्मेलन के बाद पिला देना।’ चाय वाला वापस लौट गया। सभागार में फिर जय-जय व जिन्दाबाद के नारे। कविता समाप्ति पर सारे नोट राष्ट्रीय सुरक्षा कोष के लिए शास्त्रीजी को सौंप कर प्रणाम किया। वंस मोर होता रहा।

अगले दिन बैरागीजी को मेरठ में कवि सम्मेलन पढ़ना था। मेरठ से लौट कर, दो दिन बाद बैरागीजी आकर व्यास जी से मिले। आशीर्वाद देते हुए व्यासजी बोले - ‘जिस चाय को तूने दुत्कार कर वापस करवा दी थी, पता है वह चाय किसके लिए थी? वह चाय भारत के प्रधान मन्त्री शास्त्री जी के लिए थी।’ कहकर व्यासजी ने एक पत्र बैरागीजी को थमा दिया। पत्र शास्त्रीजी का था जो व्यासजी को सम्बोधित था। लिखा था - ‘कल वाला कवि सम्मेलन बहुत सफल रहा। आपको और कवियों को बधाई। कवि सम्मेलनों के मंच का अनुशासन मैं नहीं जानता था इसलिए मैं अच्छा श्रोता नहीं बन पाया। मेरे कारण आपको और कवियों को जो असुविधा हुई उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।’ नीचे शास्त्री जी के हस्ताक्षर थे।

बैरागीजी ने बताया - ‘मैं अपराध बोध से मर रहा था और व्यासजी आँसू पोंछ रहे थे। वामन अपनी विराटता और विनम्रता से मेरी अहमन्यता को शालीनता से क्षमा कर रहा था।’ 
-----

इस प्रसंग के सन्‍दर्भ में, श्री ग्यारसीलालजी सैन के नाम दादा का पत्र


-----

श्री ग्यारसीलालजी सैन : 1937 में, राजस्थान के झालावाड़ कस्बे में, 1937 में जन्मे श्री ग्यारसीलालजी सैन, ग्रन्थ समीक्षक के रूप में हाड़ौती-मालवा के सुधि सहित्यकारों में सादर पहचानेे जाते हैं। सम्भाग स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में आपके 125 से अधिक निबन्ध, ललित निबन्ध, समीक्षाएँ एवम् कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। राजस्थान शासन के पुलिस विभाग में विभिन्न पदों पर सेवाएँ देते हुए, 30 प्रशंसा-पत्रों एवम् नकद पुरुस्कार से पुरुस्कृत होकर, 1995 में पुलिस अधीक्षक कार्यालय कोटा (सिटी) अधीक्षक पद से सेवा निवृत्त हुए। 1995 में ही नगर परिषद् चुनाव में पार्षद निर्वाचित हो, 2000 तक के लिए वित्त कमेटी के अध्यक्ष चुने गए। 1997 में अमरीका की ‘बायोग्राफिकल इंन्स्टीट्यूट ऑफ नार्थ केरोलिना’ द्वारा ‘फाइव थाउजण्ड पर्सनालिटीज ऑफ द वर्ल्ड’ में शामिल किए गए। ‘मेन ऑफ द ईयर महाप्रज्ञ जैन सन्त’ सम्मान से विभूषित। प्रान्तीय और राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न सांस्कृतिक-साहित्यिक-सेवा संगठनों/संस्थाओं द्वारा सम्मानित। प्रकाशित कृतियाँ - ‘ट्रवेल पिक्चर्स’ (महाराजा राणा भवानीसिंह की, 1940 में 30 यूरोपीय देशों की यात्रा का हिन्दी अनुवाद), ‘अभिव्यक्ति का आत्मदान’ (निबन्ध, समीक्षा संग्रह) तथा काव्य संग्रह ‘कोमल-किसलय’। ‘हिस्ट्री, कल्चर एण्ड एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ झालावाड़ स्टेट’ का हिन्दी अनुवाद प्रकाशनाधीन है। वर्ष 1998 से ‘सुधाकर साहित्य समिति’ के अध्यक्ष हैं। 85वें वर्ष की अवस्था में चल रहे ग्यारसीलालजी, स्वस्थ-चुस्त-दुरुस्त बने हुए हैं और स्वतन्त्र लेखन, अध्ययन एवम् समाज सेवा में सक्रिय हैं। मोबाइल नम्बर 91666 96587 पर आपसे बात की जा सकती है। डाक का पता - पुराने पोस्ट ऑफिस के पास, मंगलपुरा, झालावाड़ (राजस्थान) 326001. 
-----