बालकवि बैरागी: एक नायाब इंसान


 प्रभाकर श्रोत्रिय

शीर्ष स्थानीय पदों पर बैठकर कैसे अहंकारविहीन रहा जा सकता है, यह सीखना हो तो बैरागीजी जैसे उदाहरण कम मिलेंगे। वे मध्य प्रदेश में मन्त्री रहे हैं, केन्‍द्र में मन्त्री स्तरीय और सांसद रहे हैं। देश की अनेक नीति निर्धारिक समितियों में रहे हैं, लेकिन उनसे मिलकर किसी आत्मीय को यह बोध नहीं हो सकता कि वह बालकवि से कमतर है। यह एक ही गुण बड़प्पन कहने के लिए काफी है।

बालकवि को सहजता और सहदयता की यह शिक्षा जीवन की व्यावहारिक पाठशाला में मिली है। उन्होंने इसे अपने जीवन में अनायास ही उतार लिया है। वे अपना अतीत और संघर्ष भूले नहीं हैं। प्रायः कहा जाता है कि संभ्रान्त संस्कार मनुष्यों को अपने बड़प्पन में सहज बनाते हैं, परन्तु घोर दरिद्रता में बचपन बिताकर, कई तरह के उत्पीड़नों और शोषणों से गुजर कर जो मनुष्य यश, पद या धन पाता है, वह आमतौर पर अपनी वृत्ति में बहुत कठोर और संकीर्ण हो जाता है। बैरागी ने अपने जीवन में सक्रिय रूप से इस वृत्ति का प्रत्याख्यान किया है। उन्होंने अपने जीवन की तमाम नकारात्मक स्थितियों को सकारात्मक बनाया है। स्मृति उनके यहाँ गन्धवान होकर आई है। सौ. भाभी भी ठीक उनकी तरह अनुराग, स्नेह और सहजता से भरी हैं। दोनों को मैंने हर स्थिति में प्रसन्न देखा है।

मैं बैरागी से अपने विद्यार्थी काल से परिचित हूँ। वे तभी एक लोकप्रिय कवि हो गए थे। मेरी और उनकी आयु में कोई दस वर्षों का अन्तर है, परन्तु उनके लिए जैसे यह अन्तर कोई अन्तर ही नहीं है। इसके अलावा मेरी और उनकी प्रवृत्तियों में भी अन्तर है-वे भीतर की तरह बाहर भी खुले हैं-जबकि मेरे द्वार अन्दर की ओर हैं। एकान्तिकता, मौन और शायद विशिष्टता का बोध भी मेरे भीतर है। फिर भी बालकवि के स्नेह ने मुझे बाँधा है और अपने से एक आकर्षक भिन्नता के कारण मैं उनकी ओर दिलचस्पी और विस्मय से देखता हूँ। दूरियाँ पाटने का एकमात्र श्रेय बैरागी को है। ऐसा लगता है कि जैसे किसी समवयस्क और कभी-कभी अपने से छोटे किसी मित्र के पास आए हों। उनकी सार-संभाल और चिन्ता भी वैसी ही है। मैंने उन्हें एक जनकवि के रूप में यश की सीढ़ियाँ चढ़ते देखा है। एक मन्त्री, एक सांसद और एक अनुभव सम्पन्न व्यक्तित्व के रूप में उन्होंने मुझे हमेशा इस कदर आकृष्ट किया है कि मैं उनके भीतर कोई दुर्गुण ही नहीं देख पाता और जब भी कोशिश करता हूँ, तो मुझे अपने ही दुर्गुण दिखाई देते हैं। उनके आचरण और व्यवहार में कभी कोई अन्तर नहीं आया। जीवन के लगभग 50 साल का सम्बन्ध शायद कुछ गोपनीय नहीं रहने देता। मैंने देखा कि बालकवि जैसे-जैसे भरते गए, वे अधिक आर्द्र, उदार और गहन हुए हैं, अपनी तमाम विशेषताओं में।

मेरे लिए अकल्पनीय था कि बैरागी मुझे अपनी कोई पुस्तक भेंट (समर्पित) करते। मेरे और उनके बीच साहित्यिक मेल शायद ही मिल सका हो। फिर भी उन्होंने अपनी एक पुस्तक श्री वेदप्रताप वैदिक के साथ मुझे भी भेंट (समर्पित) की है। वैदिकजी से तो बैरागीजी का जो अनुराग है, वैसा कम मित्रों के बीच होता होगा। वे रात-दिन, सुख-दुःख के साथी रहे हैं, इसलिए उन्हें पुस्तक भेंट (समर्पित) करना तो समझ में भी आता है, पर मुझ जैसे एकान्तिक, इकहरे आदमी को भेंट (समर्पित) करते हुए उन्होंने यह जरूर लिख ही दिया कि इनमें से कोई मेरी पुस्तक नहीं पढ़ेगा। ऐसे अपाठकों या कुपाठकों को पुस्तक भेंट करना अतिरिक्त उदारता नहीं तो क्या है? वैसे यह भी सही है कि मैंने और वैदिकजी ने उनके बाद के वाक्य को सही नहीं होने दिया या शायद उनकी कविता पुस्तक ने हम लोगों को ही गलत साबित कर दिया। बैरागीजी जानते हैं कि ‘प्रभाकर भाई’ उन अल्प परिचित, अल्पसंख्यकों की श्रेणी में आते हैं, जिनका मंचों से और लोकप्रियता से परहेज होता आया है। बावजूद इसके उन्होंने अपने प्यार में कोई कोताही नहीं की। वैसे यह प्रगाढ़ता यदि अनुत्तरित रह गई हो तो इसके लिए मैं ही अपने को अपराधी मानूँगा।

यह ठीक है कि साहित्य के तथाकथित आभिजात्य ने मुझे उनके साहित्य से दूर रखा और उनसे हार्दिक प्रेम करने और आदर करने के बावजूद मेरे संकुल मुख से कभी उनकी कविताओं की प्रशंसा नहीं निकली, हालाँकि उनके गद्य को मेरे मन ने अकसर सराहा है। इतना सहज और बहता हुआ, लोक की तरलता में भीगा हुआ गद्य कम ही देखने को मिलता है। 

इसका यह अर्थ नहीं कि उनकी प्रभावशाली, ओजस्वी कविताओं ने मुझे रोमांचित नहीं किया हो। और मैं यह भी मानता हूँ कि कवि सम्मेलन साहित्य के निरन्तर सहायक अभियान रहे हैं। वे गहन साहिल तक पहुँचाने वाले पुल हैं। तथाकथित गम्भीर साहित्य लिखने वालों को पाठक और वाचक उपलब्ध कराने का श्रेय कवि सम्मेलन के कवियों को देना चाहिए। पर यहीं हमारे बहुत से मानक रचनाकार चूक गए हैं। उल्टे उन्होंने कवि सम्मेलनों के विपरीत, आत्मघाती वातावरण भी बनाया है। आज कवि सम्मेलनों की जो दुर्दशा हुई है, उसमें इन रचनाकारों की भूमिका का नोटिस लिया जाना चाहिए। बालकवि बैरागी कवि सम्मेलनों के उस उज्ज्वल दौर के कवि हैं, जब मंचों पर ऐसे तमाम कवि एकत्र होते थे, जो पढ़े भी जाते थे और सुने तो जाते ही थे। बालकवि के गीतों का प्रवाह, ओज और माधुर्य, बल्कि उनसे उत्पन्न एक अपील हजारों हजार श्रोताओं को एक साथ मुग्ध करती रही है। आज वे कवि सम्मेलनों की दुर्गति से स्वयं भी बहुत क्षुब्ध होते हैं।

बैरागी भले कितने ही पदों पर रहते आए हों, वे मूल रूप से कवि हैं, अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व में। वे कभी-भी कहीं भी अपने इस रूप को बिसार नहीं पाते। यदि कोई उनके राजनीतिक जीवन में कवित्व की उपस्थिति पर शोध करे तो एक बड़ा ही सुन्दर तथ्य निकल कर आएगा।

बैरागीजी की स्मृति विलक्षण है। उम्र के आठवें दशक में भी यह स्मृति उनके साथ यथावत बनी हुई है। देश-विदेश के अनगिनत संस्मरण उनके पास हैं। वे अपने मिलनेवाले सैकड़ों लोगों को अपने नाम और पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ जानते हैं। उनके संस्मरणों को सुनना बड़ा ही रोचक अनुभव है। इन्हें वे अपने कवित्व और फक्कड़पन के समावेश से, घटित से अधिक मार्मिक बना देते हैं। बालकवि जीवन के प्रति खुले, लेकिन गम्भीर व्यक्ति हैं। उन्होंने बहुत पढ़ा और उससे ज्यादा गुना है। ज्ञान को अनेक स्रोतों से प्राप्त कर सकने की प्रतिभा उन्हें प्राप्त है। उनके परिचयों और परिचित संसार के आयाम इतने विस्तृत और विविध हैं कि देखते ही बनता है। प्रधानमन्त्री से लगाकर पान वाले तक उनका संचार है। मैंने उनसे कई बार कहा कि वे अपने संस्मरण लिपिबद्ध कर लें या करवा लें, पर अपने प्रति लापरवाही उनमें अपने गुरु शिवमंगल सिंह सुमन की तरह ही है। उनकी एक पुस्तक ‘मंगते से मिनिस्टर’ न जाने कहाँ गुम हो गई या नष्ट हो गई। ऐसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित होती तो अनेक लाचारों, दुखियारों को आत्मबल और प्रेरणा मिलती।

बातें मन में पैदा होती ही जाती हैं। उनसे एक मुलाकात का ब्यौरा दिया जाए तो वह एक लेख के कलेवर से बड़ा ही होगा। ऐसे में मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि बैरागी जैसे कवि हदय और सहिष्णु, गम्भीर और निरभिमान, खुले, खिले तथा एक नितान्त योग्य, लोकप्रिय व्यक्ति और कवि का मिलना दुर्लभ है। उनसे परिचय और सान्निध्य मैं अपने लिए सौभाग्य मानता हूँ।

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(प्रभाकरजी अब हमारे बीच नहीं हैं। 78 वर्ष की आयु में, दिनांक 15 दिसम्बर 2016 को, दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उन्‍होंने अन्तिम सॉंस ली।)

पुस्तक में उपलब्ध, प्रभाकरजी का पता -
ए-601, जनसत्ता सहकारी आवास
सेक्टर-9, वसुन्धरा, गाजियबाद-201012






नंदा बाबा: फकीर से वजीर
ISBN 978.93.80458.14.4
सम्पादक - राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक - सामयिक बुक्स,
          3320-21, जटवाड़ा, 
    दरियागंज, एन. एस. मार्ग,
    नई दिल्ली - 110002
मोबाइल - 98689 34715, 98116 07086
प्रथम संस्करण - 2010
मूल्य - 300.00
सर्वाधिकार - सम्पादक
आवरण - निर्दोष त्यागी


यह किताब मेरे पास नहीं थी। भोपाल से मेरे छोटे भतीजे गोर्की और बहू अ. सौ. नीरजा ने उपलब्ध कराई।  

 


बालकवि बैरागी : कीचड़ में रहकर कमलवत विदेहता

ख्यात प्रगतिशील, जनवादी कवि शिव कुमारजी अर्चन का  निधन  अभी-अभी,  
05 जुलाई 2022 को हो गया। दादा को लेकर उनकी ये बातें, ‘नंदा बाबा: फकीर से वजीर’ पुस्तक में मिलीं।

कहावत है कि नया मुल्ला प्याज ज्यादा खाता है। उन दिनों अपना भी यही हाल था। कविता लिखने का नया-नया शौक चर्राया था तथा पढ़ने का भी। गीतधर्मी होने के कारण मुझे छन्दमय रचनाएँ अधिक रुचती थीं। यह सत्तर के दशक का पूर्वार्द्ध था। उन दिनों कवि सम्मेलनों की धूम थी और जनमानस में ऐसी व्याप्ति थी कि कवि सम्मेलन के नाम से हजारों-हजार श्रोता कविता का रसपान करने दूर-दराज से आते थे और भोर की किरण तक कविताओं का छक कर आनन्द लिया करते थे। बालकवि बैरागी उन दिनों काव्य मंचों का चर्चित एवं स्थापित नाम था। कवि सम्मेलन में उनका होना सफलता की गारण्टी माना जाता था। उन्हें सुनने की मन में बहुत लालसा रहती थी, लेकिन ऐसा सुयोग नहीं मिल पा रहा था। इसी बीच उनका काव्य संकलन ‘दो टूक’ पढ़ने में आया, जिसमें राजनीतिक, सामाजिक, ओज और प्रेमपरक रचनाएँ संकलित थीं। इस संकलन ने मेरी प्यास कुछ और बढ़ा दी। इसका समाहार शायद पचहत्तर-छिहत्तर में आयोजित सीधी कवि सम्मेलन में हुआ। उस कवि सम्मेलन में नीरज, काका, निर्भय, बैरागीजी, अनवर मिर्जापुरी, शम्सी मीनाई जैसे दिग्गज कवि आमन्त्रित थे। उसमें मैं भी एक नौसिखिया युवा कवि के रूप में बुलाया गया था। दिग्गजों के बीच कविता पाठ करने के नाम से ही मेरे पसीने छूट रहे थे। मुझे याद है कि मेरी इस मनोदशा को भाँपकर उन्होंने मेरी हिम्मत बढ़ाई थी और मंच पर भी और कविताएँ सुनाने का आग्रह किया था। सम्मेलन में छोटे कद के बैरागीजी का प्रभाव बहुत बड़ा था। खादी की धोती और खादी के ही सफेद कलफदार कुर्ते में उनका व्यक्तित्‍व सबसे अलग था। पतली कलफदार आवाज में उनकी ‘कोई इन अंगारों से प्यार तो करे’, ‘लगे हाथ निपटा ही देते पिण्डी और लाहौर का’”, ‘नवी उमरिया नवी डगरिया’ जैसी कविताओं ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया था। कवि सम्मेलन के बाद उन्होंने मेरे काव्यपाठ की सराहना की। आशीष दिया तथा और अच्छा लिखने की प्रेरणा भी दी। अमूमन मंच के बड़े कवि ऐसा कम ही करते हैं। इसके बाद तो कई काव्य मंचों पर उनका सान्निध्य मिला। उनका स्नेह अबाध रूप से मुझ पर बरसता रहा।

दो-चार काव्य मंचों पर तो मेरे काव्य पाठ से पहले उन्होंने श्रोताओं से मुझे विशेष रूप से सुनने का आग्रह तक किया। बैरागीजी अक्सर काव्य मंचों पर अपनी दीनता, अपने संघर्ष और भिक्षाटन की बात कहते थे, जो मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता था। मुझे याद है एक बार मैंने उनसे इस बारे में पूछा था कि आप ऐसा क्यों बार-बार कहते हैं। क्या श्रोताओं की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए या उनका मन जीतने के लिए? इस पर उनका दिया हुआ उत्तर मुझे आज तक याद है। उन्होंने कहा था-श्रोताओं का मन जीतने के लिए तो मेरी कविताएँ ही काफी हैं। मैं अपने संघर्ष के दिनों को बार-बार इसलिए याद करता हूँ कि मैं भूल न जाऊँ कि मैं किस जमीन से आया हूँ और ये सत्ता मेरे साहित्य पर हावी न हो जाए। यह सुनकर मुझे दो टूक की भूमिका का स्मरण हो आया, जिसमें उन्होंने लिखा था ‘मन्त्रीपद अस्थाई मामला है, अतः अपना स्थायी पता ही दे रहा हूँ।’ 

कीचड़ में रहकर सदैव कमलवत रहने की इस विदेहता को प्रणाम ही किया जा सकता है।

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पुस्तक में उपलब्ध अर्चनजी का पता -
70, प्रियदर्शिनी, ऋषि वैली,
ई-8 गुलमोहर एक्सटेंशन,
भोपाल-462039



नंदा बाबा : फकीर से वजीर
ISBN 978.93.80458.14.4
सम्पादक - राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक - सामयिक बुक्स,
          3320-21, जटवाड़ा, 
    दरियागंज, एन. एस. मार्ग,
    नई दिल्ली - 110002
मोबाइल - 98689 34715, 98116 07086
प्रथम संस्करण - 2010
मूल्य - 300.00
आवरण - निर्दोष त्यागी



यह किताब मेरे पास नहीं थी। भोपाल से मेरे छोटे भतीजे गोर्की और बहू अ. सौ. नीरजा ने उपलब्ध कराई।  

 


एलआईसी की मूल्यवान परिसम्पत्ति


यह कमलेश है। पूरा नाम कमलेश मालवीय। भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की मेरी शाखा, रतलाम-2 में सहायक शाखा प्रबन्धक (विक्रय) है। इस पद का अंग्रेजी संक्षिप्त नाम यूँ तो ‘एबीएमएस’ (असिस्टण्ट ब्रांच मेनेजर, सेल्स) होता है लेकिन लोक-प्रचलित, लोक-स्वीकृत नाम ‘एबीएमएस’ है। सो, कमलेश हमारा ‘एबीएम’ है।

कल, 03 जुलाई को कमलेश की (शायद 32वीं) जन्म वर्ष गाँठ थी। मैं, यदि कल यह पोस्ट लिख देता तो शायद सबके लिए अधिक सुखद होता। त्यौहार भी हो जाता और रस्म अदायगी भी। वैसे, हकीकत यह है कि पोस्ट अप्रेल के दूसरे सप्ताह में ही लिख देनी थी। किन्तु गए कुछ बरसों से मैं ‘आलस्य का मुकाम’ बना हुआ हूँ। अपने मालवा में बासी दशहरा भी मनाते हैं और बासी ईद भी। मान लिया जाए कि मैं, कमलेश की बासी वर्ष गाँठ मना रहा हूँ। देर आयद, दुरुस्त आयद। 

एबीएम किसी भी शाखा में ‘गुप्त सरस्वती’ की तरह होता है। नये बीमे कराने में एजेण्टों की सर्वाधिक मदद एबीएम ही करता है। जो एजेण्ट किसी विकास अधिकारी से सम्बद्ध नहीं होते (जिन्हें ‘डायरेक्ट एजेण्ट’ कहा जाता है) उनसे काम (नये बीमे) करवाना और उनकी कठिनाइयाँ दूर करना, सबकी सीधी जिम्मेदारी एबीएम की होती है। मेरी शाखा में डायरेक्ट एजेण्टों की संख्या डेड़ सौ से कम नहीं होगी। याने, कमलेश, मेरी शाखा की सबसे बड़ी एजेण्ट-टीम का प्रभारी है। लेकिन एबीएम को इतने सारे काम करने होते हैं कि एबीएम की दशा ‘पीर, बवर्ची, भिश्ती, खर’ जैसी हो जाती है। कहा जा सकता है कि शाखा प्रबन्धक/प्रभारी ‘शाखा-रथ’ का सारथी होता है तो एबीएम, रथ की धुरी। 

‘वित्त से जुड़ी तमाम संस्थाओं/संस्थानों की तरह एलआईसी की वार्षिक लेखा बन्दी भी 31 मार्च को होती है। अधिकांश संस्थाओं/संस्थानों में 31 मार्च को रतजगा होता है। बैंकों में यह लेखाबन्दी पहली अप्रेल को होती है। लेकिन एलआईसी की लेखाबन्दी अप्रेल के पहले सप्ताह तक चलती है। नये बीमों के लिए आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में जिन ग्राहकों के बीमा प्रस्ताव पूरे नहीं हो पाते, उन ग्राहको से प्राप्त रकम, हम बीमा एजेण्ट 31 मार्च तक जमा कर देते हैं। बाद में दस्तावेज जुटा कर उनके बीमा प्रस्तावों का निपटारा होता है। इसलिए, मार्च के दूसरे सप्ताह से लेकर अप्रेल के पहले सप्ताह तक, एलआईसी के दफ्तरों में किसी कारखाने जैसा वातावरण बना रहता है।

मोदी सरकार द्वारा एलआईसी का आईपीओ लाने के विरोध में एलआईसी के सारे कर्मचारी 28 मार्च सोमवार और 29 मार्च मंगलवार को हड़ताल पर थे। इससे पहले शनिवार-रविवार को दफ्तरों में छुट्टी थी। ‘मार्च एण्डिंग’ के मौसम में लगातार चार दिनों तक किसी वित्तीय संस्थान में काम ठप्प हो जाने से स्थिति कितनी कठिन हो जाती होगी, इसकी कल्पना ही की जा सकती है।

बीमा प्रस्तावों को  टाइप (की-इन) करना तनिक असामान्य काम होता है। ऐसा नहीं है कि फार्म देखते गए, फटाफट टाइप करते गए और काम खतम। एक फार्म को टाइप करने में प्रत्येक फार्म के पन्ने पाँच-सात बार पलटने पड़ते हैं। जिन बीमा प्रस्तावों में चिकित्सा परीक्षण होते हैं, उन्हें टाइप करने में सामान्य से अधिक समय लगता है। चूँकि मामला ‘जोखिम सुरक्षा’ (रिस्क कवरेज) का होता है, इसलिए इसमें भरपूर सावधानी और यथेष्ठ कौशल आवश्यक होता है। ‘हर कोई’ यह काम नहीं कर पाता। मेरी शाखा में भाई मुकेश जैन (धाकड़) और भाई प्रदीप गुणावत इस मामले में ‘विशेषज्ञ’ हैं।

शनिवार 26 मार्च और रविवार 27 मार्च को जब दफ्तर की छुट्टी थी, कमलेश तब भी बीमा प्रस्ताव ‘की-इन’ कर रहा था। सोमवार, 28 मार्च को दफ्तर में सन्नाटा था। कमलेश, फार्मों और कम्प्यूटर से जूझ रहा था। भोजनावकाश में घर जाने के लिए दफ्तर की सीढ़ियाँ उतर ही रहा था कि अचानक सन्तुलन गड़बड़ा गया और वह लुड़कता हुआ, पहली सीढ़ी से अन्तिम सीढ़ी पर आ गया। गिनती के लोग मौजूद थे। उन्होंने और शाखा प्रबन्धक अरविन्दजी सावन्त ने कमलेश को सम्हाला। फौरन अस्पताल ले गए। भाग्य अच्छा था कि हाथों-हाथ कमलेश की देखभाल शुरु हो गई। जाँचें हुईं तो तसल्ली की बात यह रही कि बाँये हाथ में बहुत ही मामूली टूट-फूट हुई है। सबसे ज्यादा तसल्ली इस बात की रही कि ‘कम्पाउण्ड फ्रेक्चर’ नहीं था। डॉक्टर ने आवश्यक मरहम-पट्टी की, कुछ दवाइयाँ सुझाईं और ‘कम्पलीट रेस्ट फॉर वन वीक’ की हिदायत के साथ कमलेश को घर भेज दिया।

अब कल्पना कीजिए कि ऐसी दशा में आप-हम या कोई सामान्य कर्मचारी होता तो क्या करता? सीधी सी बात है, डॉक्टर का कहा मान कर सीधे घर जाता और बिस्तर पकड़ लेता। लेकिन कमलेश ने सबको हैरान कर दिया। खुद तो वाहन चला नहीं सकता था। सो बोला - ‘मुझे घर छोड़ दीजिए। भोजन करके खबर करता हूँ। लेने आ जाइएगा।’ सबने समझाया। डॉक्टर की हिदायत का हवाला दिया। कहा - ‘भाई मेरे! तुम्हारे बिना एलआईसी का काम ठप्प नहीं हो जाएगा। घर पर रहो। आराम करो। पूरी तरह ठीक हो जाओ तो काम पर लौट आना।’ लेकिन कमलेश ने किसी की, कोई बात नहीं सुनी। बोला - ‘पहले से फार्मों का ढेर पड़ा है। एम्पलाई दो दिनोे की हड़ताल पर हैं। सारे एजेण्ट अपने-अपने प्रपोजल कम्पलीट होने की राह देख रहे हैं। मैं सीरीयस नहीं हूँ। फ्रेक्चर बाँये हाथ में हुआ है। काम तो दाहिने हाथ से करूँगा!’ 

और कमलेश ने किसी की नहीं सुनी। भोजन करते ही काम पर लौट आया। और ऐसा भी नहीं कि शाम पाँच बजे तक ही काम किया हो! देर रात तक काम करता रहा। और केवल उस एक दिन ही नहीं, लेखाबन्दी के अन्तिम दिन तक फार्म की-इन करता रहा। मोटा अनुमान है कि इस समयावधि में कमलेश ने लगभग तीन सौ फार्म की-इन किए होंगे।

अपने अनुभव और अध्ययन के आधार पर मैंने कर्मचारियों को तीन श्रेणियों में बाँट रखा है - पहली श्रेणी के कर्मचारी ‘काम’ करते हैं। वे ‘दस से पाँच’ में बँधकर नहीं रहते। कोशिश करते हैं कि कल के लिए कम से कम काम बचे। घड़ी की सुइयाँ इन कर्मचारियों की नजरों को तरसती हैं। दूसरी श्रेणी के कर्मचारी ‘नौकरी’ करते हैं। वे समय पर आते हैं। दिन भर अपना काम निपटाते हैं और समय पर कागज-पत्तर समेट कर घर चले जाते हैं। तीसरी श्रेणी के कर्मचारी न तो काम करते हैं न ही नौकरी। वे पूरे वेतन की पेंशन लेते हैं। उनकी सबसे बड़ी चिन्ता, समय पर लॉग-इन/गुड मार्निंग करना होती है। यह काम करके वे दिन भर के लिए मुक्त हो जाते हैं। घड़ी की सुइयाँ उन्हें सदैव रुकी हुई लगती हैं। ऐसे कर्मचारी अपना दिन कैसे बिताते हैं, यह अपने आप में स्वतन्त्र निबन्ध का विषय है।

लेकिन कमलेश ने मुझे सोचने को मजबूर कर दिया। कमलेश (और, निश्चय ही कमलेश अकेला ऐसा कर्मचारी नहीं होगा। उन तमाम कर्मचारियों) के लिए कौन सी श्रेणी बनाऊँ? ऐसे कर्मचारी किसी भी संस्थान के लिए अत्यधिक मूल्यवान परिसम्पत्ति होते हैं। दुःखद यह है कि इनके काम का समुचित मूल्यांकन कभी नहीं होता। सरकारी/अर्द्ध सरकारी संस्थानों में घोड़ों और गधों में (चाह कर भी) अन्तर नहीं किया जा सकता। न तो पहली श्रेणी वालों को अतिरिक्त लाभ दिए जाते हैं न ही तीसरी श्रेणी वाले दण्डित किए जाते हैं। किन्तु ‘सुखद आश्चर्य’ यह कि पहली श्रेणी के कर्मचारी इस बात से भी दुखी नहीं होते। 

इन सारी बातों के बीच कमलेश को देखकर मन को बड़ी ठण्डक मिलती है। ‘मैं कमलेश के साथ काम रहा हूँ’ यह विचार अतिरिक्त सुख देता है। 

प्रिय कमलेश को बहुत-बहुत बधाइयाँ और अकूत शुभ-कामनाएँ। मुझ जैसे तमाम लोगों को तुम पर गर्व है प्रिय कमलेश! खूब मेहनत करो, खूब तरक्की करो। खूब यशस्वी बनो। 

मेहनत के सुफल मिलते ही मिलते हैं। कमलेश को भी मिलेंगे ही।

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तनिक दूर से काम करता नजर आ रहा कमलेश।


शाखा प्रबन्धक अरविन्दजी सावन्त और कमलेश। 


अब कहाँ जाऊँ?

वह 1962 का साल था। ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ और ‘पंचशील’ की भावना को धता बताते हुए, भारत की पीठ में छुरा भोंकते हुए चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। थोपे गए इस युद्ध में भारत रास्त हुआ था। चीन ने अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया था। इस, सर्वथा अनपेक्षित, आकस्मिक हमले से पूरा देश हतप्रभ और आक्रोशित था। प्रधान मन्त्री जवाहर लाल नेहरू को गहरे सदमे में थे। संसद गरमाई हुई थी। सांसद उबल रहे थे। विपक्ष हंगामा किए हुए था। चीन के कब्जे से अपनी जमीन मुक्त कराने की माँग मानो दसों दिशाओं में गूँज रही थी। खुद को सम्हालने के लिए संघर्षरत, अवसादग्रस्त नेहरू लोक सभा के जरिये पूरे देश को सांत्वना और भरोसा दिलाने के लिए जूझ रहे थे। बात को हलका करने की कोशिश में कह बैठे कि अक्साई चिन में तिनके के बराबर घास भी नहीं उगती। नेहरू ने कह तो दिया लेकिन समूचा सदन भड़क उठा। विपक्ष तो आक्रामक हुआ ही किन्तु नेहरू की कल्पना के सर्वथा विपरीत, उनके मन्त्री मण्डल के सदस्य महावीर त्यागी, नेहरू की इस बात के विरोध में सबसे पहले आगे आ गए। नेहरू को अपना गंजा सर बताते हुए पूछा - ‘यहाँ भी कुछ नहीं उगता! इसे कटवा दूँ? किसी और को दे दूँ?’ नेहरू अकबका गए। कोई उत्तर देते नहीं बना। अगले दिन के अखबारों में महावीर त्यागी मुख पृष्ठ पर छाए हुए थे। स्वतन्त्र भारत के इतिहास में यह सम्भवतः पहला प्रसंग था जब किसी मन्त्री ने अपने ही प्रधान मन्त्री को ऐसी दुविधाजनक दशा में ला खड़ा किया था।

इस ऐतिहासिक प्रसंग के बाद नेहरू और त्यागीजी के सम्बन्धों को लेकर अटकलोे के पहाड़ खड़े हो गए थे। लेकिन दोनों की आत्मीयता और मैत्री भाव पर रंच मात्र भी खरोंच नहीं आई। इसका दस्तावेजी प्रमाण मिला, नेहरू के निधन के बाद, नेहरू को याद करते हुए लिखे, त्यागीजी के इस लेख में। यह लेख रतलाम से प्रकाशित हो रहे साप्ताहिक उपग्रह के, वर्ष 1965 के गणतन्त्र दिवस विशेषांक में छपा था। मुझे यह लेख श्री ललित भाटी (ए-105, एलिट अनमोल, बिचोली मार्ग, इन्दौर-452018, मोबाइल नम्बर 98270 08628) से मिला है। लेख के साथ दिया गया चित्र, नेहरू मेमोरीयल म्यूजियम एण्ड लायब्रेरी में संग्रहित है जो मैंने गूगल से लिया है।

अब कहाँ जाऊँ?

- महावीर त्यागी
केन्द्रीय पुनर्वास मन्त्री, भारत सरकार

भगवान सर्वव्यापक है इसका विश्वास तो सभी को है पर अनुभव शायद ही किसी को हो। आज अपने 44 वर्ष के साथी और नेता के निधन के समय मुझे अपने जीवन में पहली बार अनुभव हुआ कि व्यापकता का वास्तविक अर्थ क्या है। आज 18 दिन हो गए दाह कर्म किये, पर मन की तली में (गहराई में) वह मुस्कुराती, शरमाती, धमकाती और उकसाती सूरत अभी तक ऐसी समाई हुई है कि भुलाई नहीं जाती। जब भी कोई समस्या सामने आती है, तो पुरानी आदत के अनुसार अनायास जवाहरलाल से मिलने, टेलीफोन करने या चिट्ठी लिखने की प्रवृत्ति होती है, फिर जागृत बुद्धि कहती है ‘पागल’।

‘व्यापक’ के अर्थ है ‘छवि का प्रसार’। जैसे माँ के मन पर उसका बच्चा व्याप्त रहता है उसी प्रक्रार जवाहरलाल नेहरू भी अपने साथियों के मन पर छाए हुए हैं। शरीर तो नष्ट हो गया है पर उसकी परछाईं (फोटो) तो हमारे हृदयों पर छाप लगाए बैठी है। जब तक हम लोगों के ये दिल (उनकी निगेटिव प्लेट) जिन्दा हैं, जवाहरलाल जिन्दा है।

पर यह क्या बात है कि मुझे उनकी मरने को खबर से जितना धक्का लगा, उससे कहीं अ्रधिक दुःख उनकी दाहक्रिया से लौटने पर हुआ और संगम में अस्थि प्रवाह करने के बाद उससे भी अधिक। ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं, दुख बजाय कम होने के बढ़ता ही जाता है।

महात्मा गाँधी ने इस अन्धकारमय भारत की सेवा के लिए हजारों-लाखों व्यक्तियों को प्रेरणा देकर स्वतन्त्रता प्राप्त की और जैसे दीपावली में दीपमालाएँ सजाई जाती हैं, ‘दीप’ ने इसी तरह भारत के कोने-कोने में अपने अनुयायियों को प्रहरी बना कर रखा था। दीेपावली के बल्व रूप में हक सब दमक रहे थे कि आज जवाहरलाल के निधन से हमारा प्रकाश स्रोत (पावर हाउस) उखड़ गया और सारे बल्ब बुझ गए। पर चूँकि फ्यूज नहीं हुए थे इसलिए हमने फौरन ही श्री लाल बहादुर शास्त्री को अपना प्रकाश-स्रोत बना लिया और फिर से टिमटिमाने लगे। यदि जनता का पूरा सहयोग प्राप्त रहा तो आशा है हम फिर अपनी पुरानी शक्ति प्राप्त कर लेंगे और जी भर के अपने कर्तव्यों का पालन कर सकेंगे ।

मुझे पूरी तरह याद है कि खिलाफत-आन्दोलन के समय एक बार जवाहरलाल बिजनौर आए। उन दिनों मैं जिला काँग्रेस कमेटी का मन्त्री था। साथियों की एक टोली के साथ काँग्रेस के मेम्बर बनाने और ‘तिलक स्वराज्य फण्ड’ के लिए चन्दा इकट्ठा करने के लिए बजार से निकले तो एक दुकान के सामने जवाहरलालजी ने अपना कुर्ता फैलाकर भिक्षुक के रूप में चन्दा माँगा। लोगों ने धड़ाधड़ रुपए और पैसे फेंक कर चरण छूना शुरु कर दिया-‘मोतीलाल का बेटा हमारी दूकान पर भीख माँगे!’ लोग पागल बन गए। इसी तरह रायबरेली और प्रतापगढ़ के जिले में धोती-चप्पल पहने गांव-गाँव किसान अ्रान्दोलन के सिलसिले में पैदल सफर को निकले थे। वे दिन याद करके मन को धक्का लगता है। भगवान फिर से वही देश-भक्ति और सेवा-भाव का उत्साह जागृत कर दें।

कांग्रेस में शायद अकेला मैं ही उनका एक पुराना साथी ऐसा रह गया था कि जिसके साथ वह खुली डाँट-डपट कर लेते थे। असल बात यह थी कि हम थे तो एक हो थैली (गाँधी परिवार) के चट्टे-बट्टे। पर वे विलायत के पढ़े हुए थे और मे ठेठ देहाती। हम में से जो खुशामद के द्वारा काम निकालने वाले थे उनका काम तो हो जाता था पर मुझे पता है कि जवाहरलाल के दिल में उनकी खाक भी कदर नहीं थी। वह उनको ‘छोटा आदमी’ कहते थे। जैसे खाने के बाद इलायची या पान खा लेते हैं, ऐसे ही, दिन भर की थकावट के बाद यदि कोई अपनी आँख देखी बातों पर उनकी खुशामद न करके किसी दूसरे से सुनी हुई प्रशंसा की चर्चा करे तो शौक से सुन लेते थे। एक आदत और थी। वह यह कि यदि आप उनके किसी साथी या मित्र की बुराई करें तो चाहे वह सच्ची क्यों न हो, वह जानबूझ कर कहा करते वे-‘मैं उनको आपसे ज्यादा जानता हूँ। आपको ऐसी फजूल की बातें नहीं करनीं चाहिए।’ मुझसे हर तरह की कच्ची-पक्की बात हो जाती थी क्योंकि वह मुझे ‘बेवकूफ’ मानते थे और बेवकूफ आम तौर पर ईमानदार होते हैं।

कश्मीरी गाल 

एक बार, जब मैं सुरक्षा संगठन मन्त्री था, हम सब काँग्रेस पार्दी के लोग होली खेलने जवाहरलालज़ी के घर पर गये। होली का त्यौहार तो प्रेम के हुर्रे बिखेरने का होता है, इस दिन सब खता माफ समझी जाती है। सब लोग जवाहरलालजी के मुँह पर हरा, पीला, लाल गुलाल लगा कर गले मिल रहे थे। पन्तजी भी वहीं खड़े थे। जब मेरा नम्बर आया तो गुलाल मलने के बाद गले मिलते हुए मैंने जवाहरलाल की, लम्बी सी चुमकारीदार चुम्मी काट ली। प्राइम मिनिस्टर के गालों को चूमना कोई आसान काम था?

सब साथी हक्के-बक्के से रह गए। उनकी बचपन की आदत, अपने रंगे मुँह को रूमाल से पोंछते हुए बोले ‘यह क्या बद्तमीजी है? मुँह जूठा कर दिया!’ मैंने कहा “माफ़ कीजिए, कश्मीरी गाल हिन्दुस्तान भर में इसी काम आते हैं। सबने ‘होली है’ कह कर मजाक उड़ा ली। ऐसे थे वे लाल-लाल गाल, गाली-गुस्सा तो करते थे, पर चूमने वालों को बड़े चाव से चुमकार कर अपने पास बिठा लेते थे ।

जेबकतरा

उसी पेन से लिख रहा हूँ कि जो जवाहरलालज़ी की जेब से चुराई थी। कमजोरी बहुत आ गई थी। काँग्रेस पार्लियामेण्ट्री पार्टी को बैठक उन्हीं के घर पर हुई। उनके चेहरे को देख कर सब सुस्त से पड़ गये थे। ऐसा लगा, हमारी इस मौन अवस्था, को देख कर इनके मन में, बुरा

असर पड़ेगा। बस, मैं उठकर उनके नजदीक की कुर्सी पर जा बैठा। वह सामने, गलीचे पर बैठे हुए मित्रों के उतरे हुए चेहरों को देख रहे थे कि मैंने लम्बा हाथ बढ़ा कर उनकी जेब में जो सुन्दर सा बाल पेन लगा था, खेंच कर अपनी जेब में सजा लिया। उन्होंने हँसते हुए कहा ‘यह क्या?’ मैंनेे कहा ‘जेब कतरेपन का अभ्यास कर रहा हूँ। उन्होंने कहा ‘तुम इस आर्ट में सफल नहीं हो सकते। जेब ऐसे काटनी चाहिए कि किसी को पता न चले। तुम तो डकैती के योग्य हो।’ फिर भी मैंने कहा ‘पार्टी की राय है कि आप को ज्यादा काम नहीं करना चाहिए। जब तक आपके हाथ में कलम रहेगा आराम नहीं कर सकोगे। इसलिए, जिसकी जेब, उसी का कलम।’ वे बोले, ‘अच्छा भाई लड़ते क्यों हो! ले लो।’ मैंने कलम हाथ से लेकर कहा “शर्म नहीं आती? भारत के प्रधान और यह चवन्नी वाली कलम?’ (जर्मनी का विल्सन रजिस्टर) था)।  बोले-‘काँग्रेस सदस्य भी तो सब चवन्नी वाले कहलाते है!’

घड़ी का मुकदमा

इसी तरह 1952 में जब मैं रेवेन्यू एण्ड एक्सपेण्डीचर का मिनिस्टर था तो आए दिन किसी मिनिस्ट्री के खर्चे की स्वीकृति देने में मतभेद हो जाने पर मुझे केबिनेट में जाना पड़ता था। एक दिन मैं तीन मिनिट देर करके पहुँचा तो जवाहरलाल बोले ‘मिनिस्टर होते हुए भी समय की पाबन्दी नहीं करते।’ मैंने कहा-‘अपने होम मिनिस्टर डॉ. काटजू से पूछो कि उन्होंने लोक सभा से निकलते ही मेरी जेब से घड़ी छीन कर अपनी जेब में रख ली ओर ले गए। मैं बिना घड़ी के रह गया। फिर समय की पाबन्दी कैसे करूँ?’ बोले-‘अच्छा। मैं तुमको एक घड़ी दूँगा।’ 

दो महीने बीत गये पर घड़ी नहीं मिली। एक दिन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में किसी समारोह के अवसर पर चाय दी। काफी भीड़ थी। मैंने जवाहरलालजी का हाथ पकड़कर कहा-‘जरा राजेन्द्र बाबू तक चलो।’ सामने खड़ा करके वोला-‘राष्ट्रपतिजी! एक दावा (मुकद्दमा) महावीर त्यागी बनाम पं. जवाहरलाल वल्द पं. मोतीलाल नेहरू आपकी अदालत (न्यायालय) में पेश है।’ जवाहरलाल बोले-‘मुकदमे से पहले आपस में समझौता नहीं हो सकता?’ मैंने कहा-‘नहीं। मेरा दावा है कि हजूर के होम मिनिस्टर एक कश्मीरी सज्जन हैं कि जिन्होंने पार्लियामेण्ट में मेरी जेब से घड़ी निकाल ली। जब एक दिन मुझे केबिनेट जाने में देर हो गई तो दूसरे कश्मीरी, आपके प्रधान मन्त्री ने मुझे एक घड़ी देने का वायदा किया। पर आज दो महीने हो गए घड़ी नहीं मिली!” जवाहरलाल ने राष्ट्रपति के सामने गर्दन झुकाकर कहा-‘आई प्लीड गिल्टी।’ राजेन्द्र बाबू ने हँस कर कहा-‘अब तो तुम्हारी डिग्री हो गई। अगर घड़ी नहीं मिली तो कुर्की करा सकते हो।’ अगले ही दिन जवाहरलाल ने बुला कर एक घड़ी निकाल कर मेरे हाथ रख दी और बाले-“जानते हो, यह किसकी है? यह ‘भूतनी’ ने मुझे भेंट की थी।” मैंने पूछा ‘भूतनी कौन?’ तो बोले-“भूल गये? प्रान्तीय काँग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी में तुमने कहा था कि मेरे सिर पर ‘भूतनी’ सवार हो गई है।” 20-25 वर्ष पहले  की कही तीखी बात उन्हें अभी तक याद थी! बात असल में यह थी कि चेंकाईशेक उन दिनों चीन के नेता थे, और चीन की क्रान्ति में उनका बड़ा हाथ था। हम लोग अपने देश के स्वतन्त्रता संग्राम में लगे थे। मैडम चांकाईशेक भारत आई तो हम लोगों ने उनका बहुत स्वागत किया था। उस दिन प्रदेश काँग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी में पण्डित जवाहरलाल आधा घण्टा तक मैडम चांकाईशेक के ही किस्से सुनाते गये। और भी कई विषयों पर विचार करना था। मैं मन्त्री था इसलिये झुंझलाहट आ गई। सो, मैंने जोर से कहा ‘और भी बहुत आवश्यक बातों पर विचार करना है। यह मैडम चांकाईशेक भूतनी की तरह तुम्हारे सिर पर सवार हो गई है कि इसी के किस्सों में सारा समय खो दिया।’ पन्तजी, बालकृष्ण शर्मा, आचार्य नरेन्द्र देव और टण्डनजी आदि सब ठट्ठा मार कर हँस पड़े और जवाहरलाल भी हक्के-बक्के से होकर मुस्करा दिये। घड़ी लेते हुए मैंने कहा-‘जब मैडम चांकाईशेक तुम्हारे मन से उतर गई तो उसकी घड़ी मेरे हिस्से में आई।” घड़ी बहुत कीमती है। अभी मेरे पास सुरक्षित है।

काणे को काणा कहना ठीक नहीं

मरने से सवा महीने पहिले एक टेलीफोन आया-‘आज शाम के 5 बजे आ जाओ। प्रधान मन््त्री मिलना चाहते हैं।’ मेरे नाती (अनिलकुमार-11 वर्ष ) ने कहा-‘पापा, तुम्हें मिनिस्ट्री दे तो मत लेना।’ मैंने पूछा ‘क्यों न लू?’ तो बोला-“जब अच्छे लोगों ने कामराज प्लान में मिनिस्ट्री छोड़ दी तो तुम्हारे लिए मिनिस्ट्री ठीक नहीं।’ अपने नाती की समझ पर मैं बहुत खुश हुआ।’

पाँच बजे प्राइम मिनिस्टर के घर पहुँचा तो आधे घण्टे काश्मीर आदि को बातें करने के बाद बोले-“हाँ। मुझे तुमसे खास बात यह कहनी थी कि पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों की समस्या बहुत जटिल होती जा रही है, अब तुम केबिनेट में आ जाओ और इस काम को संभालो।’ मिनिस्ट्री से निकले 7 वर्ष हो चुके थे। फिर भी दिल के बुझे हुए कोयले भड़क उठे। मित्रों से कहा करता था कि मिनिस्ट्री करने की इतनी इच्छा नहीं कि जितनी मिनिस्ट्री के न्यौते को ठुकराने की है। बस! एकदम अपने नाती की बात दोहरा दी। खूब हँसे और बोले-‘उमा के लड़के ने ऐसा कहा? तो तुम मेरी बात मानोगे या उस बच्चे की?’ आपस में हम एक-दूसरे को ‘तुम’ कहकर बोलते थे। मैंने कहा-‘जवाहरलालजी! बीमारी के कारण तुम्हारा दिमाग कमजोर पड़ गया है क्या? अच्छा खासा पार्टी का काम चला रहा हूँ। क्या तुम्हारी केबिनेट, पार्टी से भी अधिक महत्व की है? लोग मुझे क्या कहेंगे?’ उन्होंने कहा-‘मैं बताऊँ क्या कहेंगे? लोग कहेंगे कि यह बड़ी लम्बी-लम्बी बात करते थे। जब इम्तिहान का वक्त आया तो बुजदिलों की तरह पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।’ मैंने कहा-‘लोग तुम्हें भी तो कहेंगे कि क्योंकि लम्बी-लम्बी बात करता या इसलिए ही मिनिस्टर बना कर इसका मुँह बन्द कर दिया।’ बोले-‘यह हो सकता है। पर कुछ लोग ऐसा भी कहेंगे कि देखो! जवाहरलाल कितना उदारचित्त है कि अपने नुक्तेचीन के लिए भी जगह रखता है।’ मैंने पूछा-‘क्या तलाक हो चुकने के बाद भी मियाँ-बीबी शादी कर सकते है?’ बोले-‘हाँ। बदचलन हो तो कर सकते हैं।’ मैंनें कहा-‘फिर तो दोनों ही बदचलन हुए ना?’ बोले-‘बेवकूफी की बातें करोगे तो फिर सुननी पड़ेगी।’ मैंने कहा-“अब आये हो ठिकाने पर। आज 42 वर्ष हुए, सन् 1922 में जब लखनऊ जेल की 6 नम्बर बैरक में तुम हम लोगों को फ्रेंच पढ़ाया करते थे, और हम तुम्हें ‘वरगू मास्टर’ कहा करते थे, तो एक दिन किसी शब्द का उच्चारण कई बार बताने पर भी मैं ठीक न कर सका था तो तुमने मुझे ‘डेमफूल’ कहा था और फिर सन् 1924 तक अपने सब साथियों को ‘तुम बड़े चुगद हो’ कहा करते थे। फिर एकदम चुगद कहना बन्द कर दिया और मुझे ‘बेवकूफ’, ‘बद्तमीज’, ‘अनमेनरली’ और ‘अनकूथ’ कहा करते थे। जब आपका डिफेन्स मिनिस्टर था तो भी कई बार बेवकूफ, बदतमीज कहते थे। अब मिनिस्ट्री से हटाते ही हम ‘श्री त्यागीजी’ और ‘मिस्टर त्यागी’ हो गये हैं। अब तो मुझे ‘आप’ कहकर पुकारते हो। मेरा-तुम्हारा रिश्ता बदल गया है जवाहरलालजी। अब मैं तुम्हारी केबिनेट में कैसे आ सकता हूँ?” मुस्कराते हुए बोले-‘तो क्या तुम्हें बेवकूफ कहलाना पसन्द था?’ मैंने कहा-‘हाँ। उसमें मुहब्बत और प्यार की बू आती थी।’ बहुत हँसे और मस्त आँखें मेरी आँखों में डालकर बड़े प्यार से मुस्कराते हुए बोले-‘भाई मुझे माफ करना। मैंने तुम्हें बेवकूफ कहना इसलिए बन्द कर दिया था कि सचाई की मजाक अच्छी नहीं होती है। काणे को काणा नहीं कहना चाहिए।’ फिर क्या था! मुशायरे (कवि सम्मेलन) का मजा आ गया। दोनों हँसी में ऐसे तन्मय हो गये कि सारी शिकायतें दूर हो गईं। फिर वे बोले-‘अब तो बेवकूफ कह दिया! अब तो मान जाओ!’ मैंने उनसे आज्ञा चाही कि मैं श्री लालबहादुर से सलाह कर लूँ। तो बोले-‘जरूर कर लो। पर कभी फिर यह न कहो कि मैंने बात छिपा ली। मैं लालबहादुर से सलाह कर चुका हूँ।’ अगले दिन मैं जानबूझ कर लालबहादुर शास्त्री के पास नहीं गया। फिर उन्होंने टेलीफोन किया तो गया और जाते ही मैंने कहा-‘क्यों भाई! मेरे साथ मुन्शीपना कर गये ना? मुझे खबर भी नहीं की और फँसवा दिया जवाहरलाल के जाल में?’ बोले-‘बात तो बहुत दिनों से चल रही थी, पर बिना जवाहरलाल जी की आज्ञा के मैं जिक्र कैसे करता?’ फ़िर बुलावा आया तो मैंने जवाहरलालजी से कहा कि श्री मेहरचन्द खन्ना के पास दो बड़े-बड़े विभाग होते हुए भी वह भी मिनिस्टर ऑफ स्टेट रहे और मुझे उनका आधा काम देकर केबिनेट मिनिस्टर बनाओगे तो उन्हें तुमसे शिकायत होगी। बोले-‘यह तुम ठीक कहते हो। पर अब तो मैं तुम्हें निमन्त्रित कर चुका।’ मेरे यह कहने पर कि ‘क्या यह निमन्त्रण सरकारी विज्ञप्ति है? मेरा इतना भी एतबार नहीं?’ मेरे कन्धे पर हाथ रखकर बोले-‘भाई! माफ करना। मेरा मतलब यह नहीं था। तुम्हारी बड़ी उदारता है। अब मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। तुम पार्टी-संगठन का कार्य करो। मैं इस काम में पूरी तरह सहयोग करूँगा। मिनिस्टी खतम। हम-एक दूसरे से हाथ मिलाकर विदा हो गए।

तीसरे दिन फिर बुलाया और बोले-‘मैंने उस बात पर फिर गौर किया। खन्ना को क्या शिकायत हो सकती है? क्या वह नहीं जानते कि हमारी पार्टी में मेरे बाद तुम सबसे सीनियर काँग्रेसमेन हो? इसके अलावा मैं पुनर्वास विभाग के साथ कुछ पिछड़े हुए क्षेत्र शामिल करके इसकी शक्ल बदल दूँगा। अब मंजूर कर ला।’ मैंने कहा-‘अच्छा। पर सुझाव और है कि मुझे खन्नाजी का पार्लियामेण्ट्री सेक्रेटरी बना दो और अखबारों में छपवा दो कि इसे मिनिस्ट्री के लिए आमन्त्रित किया था। इसने मिनिस्ट्री स्वीकार न करके पार्लियामेण्ट्री सेक्रेटरी होना मंजूर किया।’ बड़े खुश हुए और बोले-‘इससे देश में तुम्हारी ख्याति तो बढ़ेगी ही, काँग्रेस और सरकार की शान भी ऊँची उठेगी। पर मुझे तो विभाग अलग करना है, और कोई विभाग पार्लियामेण्ट्री सेक्रेटरी के सुपुर्द नहीं हो सकता।’ 

इस तरह दस दिन तक बातें चलीं। आखिर 16 अप्रेल को मिनिस्ट्री की शपथ दिला दी। पर मुझे यह क्या पता था कि यह मिनिस्ट्री मुझे वसीयत के रूप में दी जा रही है। ‘पुनर्वास’ मेरे सुपुर्द करके स्वयं स्वर्गवास कर गए। 

जब मेरे नगर देहरादून जा रहे थे मैंने अपना कलकत्ते का प्रोग्राम छोड़कर देहरादून जाना चाहा तो मुझे ‘बेवकूफ’ कह दिया और हिदायत कर दी कि कलकत्ते में शरणार्थियों के साथ-साथ मुस्लिम बस्तियों का भी दौरा करना और मुझे सब हाल बताना। वे आए और दिन निकलने से पहले ही बेहोश हो गए। उन्हें रिपोर्ट न दे सका।

अब कहाँ जाऊँ?

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बाबा! बहुत रुलाया था आपने

आज दादा श्री बालकवि बैरागी की पाँचवीं पुण्य तिथि और चौथी बरसी है। पत्रकारिता में ‘प्राधिकार’ (अथॉरिटी) की हैसियत प्राप्त, मध्य प्रदेश के सुपरिचित पत्रकार डॉक्टर राकेश  पाठक (ग्वालियर) ने दादा की मृत्यु के चौथे ही दिन, 16 मई 2018 को अत्यन्त आत्मीय भावाकुलता से दादा को याद किया था। राकेशजी का नयनजलसिक्त यह संस्मरण और चित्र मुझे karmveer.org से प्राप्त हुआ है। साभार प्रस्तुत है। 




बाबा कहते थे -

‘झर गए पात..
बिसर गयी टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी।’

लेकिन बाबा मैं आज करुण कथा जग से कहूँगा। कहूँ भी क्यों नहीं? कितना रुलाया था आपने हम सबको! 

सन 2006 की बात है। नवभारत में सम्पादक रहने के दौरान कोसोवो (पूर्व युगोस्लाविया) गया था। यूएन मिशन की रिपोर्टिंग करने बाद मैं नईदुनिया में सम्पादक बना तब इस यात्रा पर किताब छपी।

ग्वालियर में मेरी इस पहली किताब ‘काली चिड़ियों के देश में’ (यूरोप का यात्रा वृत्तांत) के विमोचन समारोह में आप मुख्य अतिथि थे। वरिष्ठ साहित्यकार चित्रा मुदगल, भाषाविद् प्रो. सत्येन्द्र शर्मा और वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल साथ मंचासीन थे। कवि मित्र पवन करण संचालन कर रहे थे।

‘पहलौठी’ किताब का विमोचन था सो बहुत उमंग थी। पवन ने औपचारिकताएँ पूरी की ही थीं कि आपने अचानक माइक थाम लिया। जोर से डाँटते हुए कहा - ‘राकेश!’ (सब सन्न रह गए। मुझे कुछ समझ नहीं आया।) फिर आपने कहा - ‘तेरी किताब का विमोचन है। तू मंच पर बैठा है और माँ सामने श्रोताओं में? जा! माँ को लेकर ऊपर आ।’

मैं माँ को लेकर आया। मंच पर बैठाया।

बाबा फिर दहाड़े - ‘और उसे भी लेकर आ जिसके बिना तू अधूरा है। बहूरानी को भी मंच पर साथ बैठा।’ मैं प्रतिमा (अब स्मृतिशेष) को लेकर आया।

बाबा ने मेरे ही हाथों माँ और पत्नी का स्वागत कराया। फिर भरपूर नेह से बोले - ‘बेटा राकेश! इन दोनों के बिना तू ये किताब लिख ही नहीं सकता था।

बाबा ने अपने भाषण में जो कुछ कहा वो सबको आँसुओं के समन्दर में डुबा देने को काफी था।

बाबा हर रचना लिखते समय कागज पर सबसे पहले ‘माँ  शब्द लिखते थे। अपनी माँ को याद कर उन्होंने अपने ‘भिखमंगे’ या ‘मंगते’ होने की बात बताई। (ये उनकी माँ का आशीष ही है कि उन्होंने ‘मातृ दिवस’ को प्रस्थान किया) बाबा कहते - ‘हम लोग भिखारी नहीं भिखमंगे थे।’ कहते, ‘भिखारी फिर भी थोड़ा अच्छा शब्द है मैं तो भिखमंगा था। हमारी माँ ने हमें बनाया। सँवारा।’ वे खुद को माँ का सृजन कहते थे।

बाबा ने पूरी जिन्दगी माँग कर ही कपड़े पहने। अपने पैसे से कपड़े नहीं खरीदे। कहते थे - ‘माँग कर पहनता हूँ ताकि भूल न जाऊँ कि मैं मंगता हूँ।’ (बाबा की बहुचर्चित किताब का नाम - ‘मंगते से मिनिस्टर तक’ है।) बाबा सांसद, मन्त्री सब रहे लेकिन अपनी जमीन से हमेशा जुड़े रहे।

बोली लगवा कर 25 हज़ार में बिकवाई किताब-

विमोचन समारोह में बाबा ने एक प्रति पर मेरे और सभी अतिथियों के दस्तखत करवाये। फिर खड़े होकर कहा कि - ‘ये किताब वैसे तो सौ रुपये की है लेकिन मैं इसकी नीलाम बोली लगवा रहा हूँ। इसकी जो सबसे ज्यादा कीमत अदा करेगा उसे ये किताब मिलेगी। ये रकम गरीब बच्चों की पढ़ाई में खर्च होगी।’

सभागार में होड़ लग गई। देखते-देखते किताब की बोली हजारों में पहुँच गई।

आखिर में नगर निगम की जनसम्पर्क अधिकारी आशा सिंह ने 25 हज़ार रुपयों की बोली लगाई। उन्होंने रुँधे गले से कहा - ‘ये किताब मैं ही खरीदूँगी।’ सारे सभागार में आँसुओं का सैलाब आ गया। बाबा, चित्रा मुदगल और हम सब रो रहे थे।

बाबा ने रोते हुए कहा- ‘इस बेटी के आँसुओं से ज्यादा मूल्यवान कुछ नहीं हो सकता। अब 25 हजार से ज्यादा भी कोई बोली लगाएगा तो किताब नहीं दूँगा।’ बाबा ने मंच पर बुलाकर आशा सिंह को किताब की प्रति भेंट की।

आप बहुत याद आओगे बाबा।

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जबरिया मुसलमान बनाने का विरोध किया औरंगजेब ने

 भाईचारे का इतिहास - पाँचवीं/अन्तिम कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)


भाईचारे का इतिहास - पहली कड़ी यहाँ पढ़िए 

भाईचारे का इतिहास - दूसरी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - तीसरी कड़ी यहाँ पढ़िए

भाईचारे का इतिहास - चौथी कड़ी यहाँ पढ़िए


नफरत की जो चिंगारी आज फैलाई जा रही है वह मुगलों के शासन काल में नहीं थी। 

गुरु अर्जुन देव ने अमृतसर में 1588 में एक तालाब खुदवाया और एक मन्दिर की आधार शिला एक मुसलमान भक्त मियाँ पीर (बाला पीर) ने रखी थी। सुलतान जैनुल आबदीन ने अमरनाथ और शारदा देवी मन्दिर में यात्रियों की सुविधा के लिए कई भवन बनवाए थे। नजीबाबाद के पठानों ने 1780 ईस्वी में अपने शायन के दौरान तीर्थयात्रियों के लिए बड़े-बड़े भवन बनवाए थे। दिल्ली के सम्राट मोहम्मद शाह ने बोधगया (बिहार) के महन्त को एक बड़ी जायदाद देने का फरमान जारी किया था। 

गुरु अर्जुन देवजी

औरंगजेब ने इलाहाबाद में महेश्वरनाथ मन्दिर के पुजारी की रकम देकर सहायता की थी। इसी तरह बलभद्र मिश्र, जादव मिश्र और गिरधर को भी धन दिया था। मुलतन के तुलई मन्दिर के एक पुजारी कल्याण दास को भी सैंकड़ों रुपये अनुदान दिया था। बाद में सुल्तान मुहम्मद मुराद बक्ष ने उज्जैन के मन्दिर में दीपक जलाने के लिए चार सेर घी हर माह देने का फरमान जारी किया था। दक्षिण के अनेक मन्दिरों के लिए भी अनुदान देने के फरमान जारी किए गए थे।

औरंगजेब पर एक आरोप यह भी है कि वह लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाता था। सबूत बताते हैं कि ऐसा नहीं था। एक सबूत यहाँ पेश है। औरंगजेब के पिता शाहजहाँ ने बनघेरा के राजा इन्द्रमन को कैद कर लिया था। औरंगजेब ने इन्द्रमन को आजाद करने की सिफारिश शाहजहाँ से की।

शाहजहाँ ने शर्त लगाई कि अगर इन्द्रमन मुसलमान बन जाए तो उसे छोड़ा जा सकता है। औरंगजेब ने इस शर्त को ठीक नहीं माना। उसने अपनेपिता की इस शर्त का विरोध किया। औरंगजेब का यह विरोध-पत्र अदब-ए-आलमगीरी में सुरक्षित है।

भारत की गुलामी का दौर सही मायने में अंग्रेजों के शासन से ही शुरु होता है। मुगल विदेशी थे मगर यहाँ आने के बाद वे यहीं के होकर रह गए। एन्होंने जो कमाया, यहाँ की जनता पर, यहीं खर्च किया। यहाँ की दौलत को लूट कर देश से बाहर नहीं ले गए।

मुगलों ने न यहाँ का धर्म बिगाड़ा, न भाषा बिगाड़ी, न संस्कृति, न खान-पान, पहनावा बिगाड़ा। इस देश से उन्हें कितना प्यार था इस की झलक अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की इन पंक्तियों से मिलती है 

है कितना बदनसीब जफर दफन के लिए
दो गज जमीं भी न मिली कुए यार में

1857 में आजादी की पहली लड़ाई में आजादी के दीवानों ने बहादुरशाह जफर को ही अपना राजा माना था। बहादुरशाह जफर का देशप्रेम देखिए कि उसके जवान बेटों के सर कलम कर उसे पेश किए गए और उसने उफ् तक न किया। बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों ने रंगून जेल में डाल दिया। कैदी बना यह बादशाह भारत में दफन होना चाहता था मगर वह भी उसे नसीब न हो सका

बादशाह बहादुरशाह जफर

इस बादशाह की पहले से तैयार की गयी खाली कब्र आज भी महरौली में मौजूद है। जिन अंग्रेजों ने हमारा खान-पान-पहनावा और भाषा तक हम से छीन ली और जिन्होंने भारत को भिखारी बना को दिया, उनके खिलाफ ये साम्प्रदायिक लोग एक शब्द बोलना भी पसन्द नहीं करते। दरअसल अंग्रेजों ने दोनों धर्मों के बीच विष-बीज बोने के लिए इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना शुरु कर दिया। साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाले आज अंग्रेजों की इसी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। वे भी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर चलते थे। ये भी उसी नीति पर चल रहे हैं। आज इतिहास की सही जानकारी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है। 

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(पहला चित्र गुरु अर्जुन देवजी, दूसरा चित्र बादशाह बहादुर शाह जफर। 
दोनों चित्र गूगल से साभार।)

शिवाजी की सेना में हजारों मुसलमान सैनिक, मुगलों के साथ मराठा सरदार

भाईचारे का इतिहास - चौथी कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)


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भाईचारे का इतिहास - दूसरी कड़ी यहाँ पढ़िए

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शाहजहाँ के बाद गद्दी पर बैठे औरंगजेब और शिवाजी की लड़ाई को भी साम्प्रदायिक ताकतें हिन्दू-मुस्लिम की लड़ाई बना कर पेश करती हैं। यह लड़ाई भी हिन्दू-मुस्लिम की न हो कर एक मराठा सरदार शिवाजी की राजा औरंगजेब से बगावत थी। इस बगावत में कई मुसलमान शिवाजी के साथ, तो कई हिन्दू शिवाजी के खिलाफ लड़े थे।

औरंगजेब ने शिवाजी से लड़ने के लिए राजा जय सिंह को भेजा था। जय सिंह की सेना में दो हजार मराठा घुड़सवार और सात हजार पैदल सिपाही, नेताजी पालकर की कमान में शिवाजी के विरुद्ध लड़ रहे थे। शिवाजी की सेना में दिलेर खाँ ने मुगल सेना के छक्के छुड़ा दिये थे। शिवाजी की सेना में भी हजारों मुसलमान घुड़सवार और पैदल सैनिक थे। यही नहीं, शिवाजी के मुंशी भी काजी खाँ थे। औरंगजेब और शिवाजी की लड़ाई हिन्दू-मुसलमानों की लड़ाई तो थी ही नहीं। यह मुगलों-मराठों की लड़ाई भी नहीं थी। बहुत से इज्जतदार मराठा सरदार हमेशा मुगलों की सेना में रहे। सिंद खेड़ के जाधव राव के अलावा कान्होजी शिर्के, नागोजी माने, आवाजी ढल, रामचन्द्र और बहीरजी पण्ढेर वगैरह मराठा सरदार, मुगलों के साथ रहे थे।


शिवाजी

राजा, राजा होता था, हिन्दू या मुसलमान नहीं। शिवाजी ने जब मुगलों के व्यापार केन्द्र सूरत पर हमला किया तो शिवाजी के सैनिकों ने वहाँ चार दिनों तक हिन्दू व्यापारियों के साथ जमकर लूटपाट की। सूरत के मशहूर व्यापारी वीरजी बोरा थे जिनके अपने जहाज थे। उस समय उनकी सम्पत्ति अस्सी लाख रुपये थी। शिवाजी के सैनिकों ने वीरजी बोरा को भी जमकर लूटा। औरंगजेब ने सूरत की सुरक्षा के लिए सेना भेजी। उसने तीन साल तक व्यापारियों से चुंगी न वसूल करने का हुक्म भी जारी कर दिया।

औरंगजेब ने अनेक ब्राह्मणों व जैनों को जायदाद के लिए स्थायी पट्टे भी जारी किए थे। औरंगजेब के ये फरमान आज भी सुरक्षित हैं। बनारस में गोसाई माधव दास, गोसाई रामजीवन दास और पालीताना में जैन जौहरी सतीदास का भी ऐसे ही फरमान दिए गए थे।

अकबर के जमाने में हिन्दू मनसबदारों की संख्या केवल 32 थी। जहाँगीर के जमाने में यह 56 हो गई। औरंगजेब के जमाने में यह बढ़कर 104 हो गई थी। इससे यह साबित होता है कि औरंगजेब को हिन्दुओं से कोई बैर नहीं था। दरबार में और सेना में हिन्दुओं की भर्ती बिना किसी भेदभाव के की जाती थी। 

मुगल शासन का यह समय हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का एक सुनहरा समय था। आज स्वार्थी लोग इस सुनहरे इतिहास पर कालिख पोतना चाहते हैें।

यही वह समय था जब कबीरदास ने पाखण्डों के लिए हिन्दू पण्डितों और मौलवियों, दोनों को लताड़ा था। आज की तरह किसी मौलवी की हिम्मत, कबीरदास के खिलाफ फतवा जारी करने की नहीं हुई, न ही कोई पण्डित, कबीरदास को दण्ड दे सका।

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(चित्र गूगल से साभार)


सलीम के विद्रोह में सलीम के साथ थे हिन्दू-मुसलमान

 भाईचारे का इतिहास - तीसरी कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)



अकबर के बेटे सलीम के विद्रोह में भी हिन्दू-मुसलमान दोनों सलीम के साथ थे। ओरछा के सरदार बीर सिंह देव ने अबुल फजल को मार दिया था। जिस पर गुस्सा  होकर अकबर ने बीर सिंह देव को मारने का फरमान जारी कर दिया। तब सलीम ने बीर सिंह देव का साथ दिया और उसे बचा लिया था। यही नहीं, अकबर की मृत्यु के बाद जब सलीम, जहाँगीर के नाम से गद्दी पर बैठा तो उसने बीर सिंह देव को अपने दरबार में ऊँचा ओहदा भी दिया। 


जहाँगीर (सलीम)

जहाँगीर के शासन में जब बीकानेर के पाँच हजारी मनसबदार राम सिंह ने विद्रोह किया तो इसे दबाने के लिए अम्बर के राय जगन्नाथ कछवाहा को भेजा गया। इसी तरह उड़ीसा के राजा पुरुषोत्तम दास को हराने के लिए टोडरमल के पुत्र कल्याण सिंह को भेजा गया था।

गलती करने पर जहाँगीर किसी मौलवी के साथ भी रियायत नहीं करता था। जहाँगीर ने मूर्खतापूर्ण उपदेश देने पर शेख इब्राहीम बाबा को चुनार में और शेख अहमद बाबा को ग्वालियर की कैद में डाल दिया था। जहाँगीर के दरबार में चित्रकार बिशनदास और हिन्दी विद्वान जदरूप गोसाई तथा राम मनोहर लाल को काफी सम्मान मिला हुआ था।

जहाँगीर ने हिन्दुओं को मन्दिर बनाने की पूरी छूट दी थी। उन्हें बिना कोई कर अदा किए धार्मिक यात्राएँ करने की छूट भी दी थी। इस तरह जहाँगीर को किसी भी हालत में साम्प्रदायिक नहीं कहा जा सकता। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘भारत की खोज’ में, जहाँगीर को आधा मुगल और आधा राजपूत बताया है।


शाहजहाँ

जहाँगीर के बाद शाहजहाँ ने भी हिन्दू-मुसलिम एकता की मशाल को जलाए रखा। शाहजहाँ के समय कमलाकर भट्ट ने ‘निर्णय सिन्धु’ की रचना की। कवीन्द्राचार्य ने ऋगवेद की व्याख्या लिखी, नित्यानन्द ने ज्योतिष शास्त्र के ग्रन्थ लिख। पण्डित जगन्नाथ ने दारा शिरोह और आसफ खान की प्रशंसा में कविताएँ लिखीं। हिन्दू विधि-विधान के लेखक मित्र मिश्र भी शाहजहाँ के ही समय में फले-फूले थे।

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(दोनों चित्र गूगल से साभार।)


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राणा, राज्य-रक्षा के लिए और अकबर राज्य-विस्तार के लिए लड़े

 भाईचारे का इतिहास - दूसरी कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)


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साम्प्रदायिक लोग अकबर को भी मुसलमान और राणा प्रताप को हिन्दू बना कर पेश करते हैं। अकबर ने धर्म के नाम पर खड़ी की गयी दीवारों को तोड़ा था। उसने राजपूत कुल में शादी की थी। उसने ‘दीन-ए-इलाही’ नाम से नया धर्म चलाने की भी कोशिश की थी। राणा प्रताप के नाम पर राजनीति करने वालों ने अकबर को भी नहीं बख्शा। 


अकबर

असलियत यह है कि राणा प्रताप अपने राज्य की रक्षा के लिए लड़ रहे थे और अकबर अपने राज्य के विस्तार के लिए। न राणा प्रताप का मकसद हिन्दू धर्म की रक्षा करना था, और न ही अकबर का मकसद इस्लाम की रक्षा करना था। अगर ऐसा होता तो राणा प्रताप के साथ मुसलमान न होते और अकबर के साथ हिन्दू न होते।


महाराणा प्रताप

अकबर की सेना का सेनापति राजा मान सिंह था। राणा प्रताप की सेना के आगे हकीम खान सूर अपने आठ सौ घुड़सवारों के साथ चल रहा था। इस लड़ाई को हिन्दू-मुसलमान की लड़ाई कहना इतिहास का मजाक उड़ाना है।


राजा मान सिंह 

अकबर ने हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए बहुत कुछ किया था। अकबर ने गाय के मांस पर पूरा तरह पाबन्दी लगा दी थी। यही नहीं, जो हिन्दू किसी कारण से मुसलमान बन गये थे उन्हें फिर से हिन्दू बनने की इजाजत दे दी थी।

अकबर ने नवरत्नों में राजा टोडरमल, बीरबल और तानसेन जैसी हस्तियाँ थीं। अकबर की सेना में राजा मान सिंह का पुत्र जगत सिंह, राय रैयन (विक्रमादित्य द्वितीय), राय लौन करण, रामचन्द्र बघेल, बाथ का राजा आदि प्रमुख सेनापति थे।

अकबर ने संस्कृत ग्रन्थों के अरबी और फारसी में अनुवाद की परम्परा भी शुरु कराई। अकबर ने उस समय की हिन्दी को बढ़ावा दिया था। अकबर ने बीरबल को कविराज की उपाधि दे रखी थी । राजा भगवान दास, राजा मान सिंह, अब्दुरहीम खानखाना अकबर के दरबारी हिन्दी कवि थे। दरबार के बाहर तुलसीदास,  सूरदास, नाभाजी, केशव और नन्ददास आदि कवियों ने अकबर के समय ही कविता की थी। गोपाल भट्ट नामक कवि को भी अकबर के दरबार में पूरी इज्जत मिली थी।

(सभी चित्र गूगल के सौजन्य से साभार।)

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किसी राजा ने कभी धर्म युद्ध नहीं लड़ा

भाईचारे का इतिहास - पहली कड़ी

(डॉक्टर महरउद्दीन खाँ का यह लेख, भोपाल से प्रकाशित ‘मध्यप्रदेश लोक जतन’ के, दिनांक 1 जून 2001 के पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुआ था।)


धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों की हर समय यह कोशिश रहती है कि भारत के इतिहास को साम्प्रदायिक बनाकर पेश किया जाए। बाबर-राणा सांगा की लड़ाई हो या अकबर-महाराणा प्रताप की या शिवाजी और औरंगजेब की। ये लोग राणा सांगा, महाराणा प्रताप और शिवाजी को हिन्दू बनाकर पेश करते हैं तथा बाबर, अकबर और औरेंगजेब को मुसलमान बना कर। सही बात तो यह है कि राजा, राजा होता था, उसकी सेना में हिन्दू-मुसलमान सभी होते थे। जब राजा को मौका मिलता था, वह हिन्दू-मुसलमान सभी के साथ लूटमार करते थे। मन्दिर ज्यादा इसलिये लूटे जाते थे कि वहाँ सोना-चाँदी और धन जमा होता था। मस्जिदों में ऐसा कुछ न पहले होता था, न अब होता है। राजाओं का काम अपने राज्य का विस्तार करना होता था। उनके रास्ते में जो भी आता था, वह उन का दुश्मन होता था। अगर राजाओं का धर्म से कुछ लेना-देना होता तो कोई हिन्दू राजा किसी हिन्दू राजा पर हमला नहीं करता और न ही कोई मुसलमान राजा किसी मुसलमान राजा पर हमला करता। साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाले लोग राजाओं को भी धर्म का रखवाला बना कर पेश करते हैं। राजाओं का काम ज्यादा से ज्यादा इलाका अपने कब्जे में करना होता था। वे ज्यादा से ज्यादा टैक्स वसूल करके अय्याशी करना चाहते थे।


राणा सांगा

औरंगजेब

किसी राजा ने कभी धर्मयुद्ध नहीं लड़ा। अगर किसी राजा के बारे में ऐसा कहा जाता है तो वह झूठ है। धार्मिक स्थानों को तोड़ने की बात है तो पहले न तो ईंट भट्टे थे न सीमेण्ट के कारखाने और न पत्थर तराशने के कारखाने। एक स्थान का मलबा दूसरे में प्रयोग करना आम बात थी। धार्मिक रंग देकर अपनी राजनीति करने वालों की पता चाहिए कि राजतन्त्र का बदला लोकतन्त्र में नहीं लिया जा सकता।

यहाँ एक बात बड़ी मजेदार है कि साम्प्रदायिक ताकतों का इतिहास बाबर से शुरु हो कर औरंगजेब पर खत्म होता है। फिर मुस्लिम लीग के जन्म से देश के बँटवारे पर खत्म हो जाता है। बाबर से पहले का समय इनके इतिहास का विषय नहीं है, न ही अंग्रेजों की गुलामी और उनके द्वारा दी गयी गुलामी की निशानियाँ इनके इतिहास में हैं।

हम बाबर से शुरु करते हैं।

बाबर

बाबर के साथ लड़ाई में राणा सांगा अकेला नहीं था। हसन खाँ मेवाती और महमूद लोदी भी उसके साथ थे। इब्राहीम लोदी का भाई सुल्तान अहमद लोदी भी बाबर से लड़ने के लिए राणा के झण्डे के तले आ गया था। इस तरह से बाबर के खिलाफ लड़ाई में उस समय भारत के हिन्दू और एकजुट थे।

बाबर के बाद उसका बेटा हुमायूँ राजा बना। शेरशाह के हमले के समय ब्रह्माजीत गौड़ उसका पीछा कर रहा था उस समय अटेल के राजा वीरभान ने हुमायूँ को नदी पार कराई थी। वीरभान ने अपनी सहायता की भावना से यह काम किया था। अगर उसमें हुमायूँ के धर्म के बारे में कोई गलत विचार होता तो वह उसे वहीं खत्म कर सकता था। 

हुमायूँ 

हुमायूँ जब अमरकोट पहुँचा तो राजपूतों और जाटों की सेना ने उसे भरपूर मदद पहुँचाई थी। हुमायूँ ने जब अमरकोट छोड़ा तो उसकी बेगम हमीदा बानो गर्भवती थी तथा पूरे दिन से थी। इसलिए उसने बेगम को वहीं राजपूत स्त्रियों के पास छोड़ दिया। यहीं पर हुमायूँ के जाने के तीन दिन बाद अकबर का जन्म हुआ था। अमरकोट के राजा ने हुमायूँ की बेगम की देखभाल अपनी बेटी की तरह की थी।

(सभी चित्र गूगल के सौजन्य से साभार।)

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गुल से लिपटी रही तितली

आज दादा श्री बालकवि बैरागी का 93वाँ जन्म दिन और 92वीं जन्म वर्ष-गाँठ है। उनके प्रेमी-प्रशंसक उन्हें आत्मीयता और श्रद्धा-प्रेम से याद कर रहे हैं। याद करनेवालों में कलमकार भी हैं और राजनीतिकर्मी भी। 

दादा की राजनीति आजीवन काँग्रेस-प्रतिबद्धता की रही। काँग्रेस की आन्तरिक राजनीति के चलते उन्हें जिस भी हाल में रहना पड़ा,सदैव प्रसन्नतापूर्वक रहे। कभी, कोई शिकायत नहीं की। जब भी किया, पार्टी का बखान और पार्टी के प्रति कृतज्ञता, आभार ही प्रकट किया। वे साहित्य को अपना धर्म और राजनीति को अपना कर्म कहते थे। अपने ‘धर्म और कर्म’ की शुचिता और पावनता की रक्षा और निर्वाह उन्होंने आजीवन, अत्यन्त सावधानीपूर्वक किया। अनजाने में भी दोनों का घालमेल नहीं होने दिया। अपने बारे में वे सदैव कहते थे - “मै ‘काँग्रेसी कवि’ हूँ, ‘काँग्रेस का कवि’ नहीं।” इस बारीक अन्तर को लोग समझें या नहीं, इसकी परवाह किए बिना वे अपना जीवन जीते रहे।

राजनीतिक निष्ठा और प्रतिबद्धता से जुड़ा उनका एक प्रसंग मुझे गए कई दिनों से बराबर याद आ रहा है।   

चुनाव में उम्मीदवारी को लेकर घमासान मचना आम बात है। जिसे उम्मीदवारी मिल जाती है, उसके यहाँ वसन्त आ जाता है और जिसे नहीं मिलती वह खुद को पतझड़ में पाता है। पतझड़ में वसन्त लाने की ललक, लोभ-मोह में आदमी पार्टियाँ बदल लेते हैं। कल जिसे डायन कहते नहीं थकते थे उसी पार्टी को आज माँ कह कर लहालोट हो जाता है। आत्मा, नैतिकता, लोकलाज जैसे मूल्य, अवैध सन्तानों की तरह त्याग दिए जाते हैं। सत्ता की सम्भावनाओं के वीरान में अकेले रहना अब शायद ही किसी को भाता हो। निष्ठा और प्रतिबद्धता का निर्वाह अब या तो लाचारी में किया जाता है या लालच में। आत्मा और नैतिकता के आधार पर विरले ही ये मूल्य निभा रहे हैं।

1967 से 1972 तक दादा विधायक रहे। इस काल में 1969 से 1972 तक वे मध्य प्रदेश के सूचना प्रकाशन राज्य मन्त्री रहे। 1972 के विधान सभा चुनावों में उन्हें उम्मीदवारी नहीं मिली। शायद ही कोई विश्वास करे, उम्मीदवारी की भागदौड़ और प्रतियोगिता में दादा कभी नहीं रहे, कभी ‘केम्पेनिंग’ नहीं किया। उनके लिए जब भी किया, उनके नेताओं ने किया। 

सो, 1972 में जब उन्हें उम्मीदवारी नहीं मिली तो हजारों-हजार बातें चलीं। लेकिन ‘बातों’ के इस गुबार में दादा बराबर चुप्पी साधे रहे। 

इसी बीच, मार्च 1972 में, ‘दिनमान’ के एक अंक में दादा की दो कविताएँ छपीं तो काँग्रेस की आंचलिक राजनीति में एक, छोटा-मोटा तूफान सा आ गया। ‘दिनमान’ उस समय ‘राजनीतिक बजट’ का ‘प्राधिकार’ (अथॉरिटी) माना जाता था। उसमें जगह पाना ‘बड़ी’ और ‘प्रतिष्ठा’ की बात होती थी। श्री सर्वेश्वर दयाल सक्सेना सह सम्पादक थे। दादा की ये दो कविताएँ सर्वेश्वरजी की टिप्पणी सहित निम्नानुसार छपी थीं -

आक्रोश का सन्दर्भ: 

असत्य से हम व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों से जुड़े होने के कारण भी टकराते हैं और निजी स्वार्थों से जुड़े होने के कारण भी। इसलिए सत्य कहने, विरोध करने और जूझने-टकराने का मूल्य उस सन्दर्भ से ही लगाया जाता है। एक मुद्दा चुनाव का है, जिसे टिकिट नही मिलता उसे गुस्सा आता है। जिसकी जबान चलती है वह बकता-झकता है। जिसकी कलम चलती है वह उसे दौड़ाता है।  बालकवि बैरागी को चुनाव टिकिट नहीं मिला। उन्होंने एक पत्र के साथ कुछ कविताएँ भेजीं। दो यहाँ दी जा रही हैं जो उनके रचनात्मक आक्रोश को एक दिलचस्प पहलू प्रदान करती है:

“मध्यप्रदेश के सूचना प्रसारण राज्य-मन्त्री का चोला उतरने पर कविसम्मेलनों में घूम रहा हूँ। ‘जहाज का पंछी’ या ‘लौट के बुद्धू’ जो भी कहें। ‘दिनमान’ के लिए इस पत्र के साथ छोटी-छोटी कविताएँ (कुछ एडहॉक कविताएँ) भेज रहा हूँ। नीमच से भागलपुर तक के प्रवास में थर्ड स्लीपर में जो बातें मुसाफिर इन दिनों करते हैं वही प्रेरणा है। इस प्रकार की ये पहली कविताएँ हैं जो इंदिरा जी के एक अनुयायी द्वारा लिखी जा रही हैं। मैं कल, आज और कल उनके पीछे था, हूँ और रहूँगा। लोग कैसी कैसी बातें करते हैं कि क्या कुछ कहें और उत्तर दें!”

                (1)

व्यंग्य कर के कहने लगे त्यागी जी
‘कहिए बैरागी जी!
चला गया न मन्त्रीपद?
छिन गयी न विधायकी?
और करो काँग्रेस की भाँडगिरी
चापलूसी और गायिकी?
मरोड़ दी न मिसिरजी ने घेंटी
कत्ल हो गए न श्यामाचरण?
आ गए न सेठी?
अच्छे भले चल रहे थे
मरे राजनीती में
कुर्सी के लालच में
फँस गए न फजीती में-’
मैंने उनके कानों से मुँह सटाया
कन्धा दबाया
आँख मारी और समझाया
“गुरु! मौसम शानदार है
भाव ऊँचे दिख रहे हैं
‘गाय बछड़े’ वालों के
छिलके भी काजू के भाव बिक रहे हैं।
बैठा नहीं रहूँगा यूँ ही
काजू न सही मूँगफली तो हूँ ही
जुलूस में सबसे आगे हो लूँगा
गला फाड़ कर जय बोलूँगा
बड़ा भरोसा है मेरा
जवाहरलाल की बेटी में
कभी तो रहम खाएगी
और घुसेड़ देगी किसी
एडहॉक कमेटी में।”

                (2)

चुनाव लड़ने वालो!
तुम किसी भी पार्टी में क्यों न हो
ले जाओ नया नारा
इतना लगाओ, इतना लगाओ
कि फट जाए आसमान सारा
‘इन्दिरा गाँधी जिन्दाबाद
बाकी दुनिया मुर्दाबाद।’

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जैसा कि मैंने कहा ही है, इन कविताओं ने काँग्रेस की आन्तरिक राजनीति में तूफान सा ला दिया। दादा के प्रतिद्वन्द्वी काँग्रेसियों ने इन कविताओं को इन्दिरा-विरोधी और इन्दिराजी का अपमान घोषित कर, दादा को काँग्रेस से निष्कासित करने का अभियान शुरु कर दिया। कुछ ही महीनों चला यह अभियान यद्यपि अन्ततः ‘चाय की प्याली में तूफान’ की गति को ही प्राप्त हुआ लेकिन वे कुछ महीने मन्दसौर जिले की काँग्रेस की राजनीति के बड़े ही तनाव भरे महीने रहे। 

जिला काँग्रेस पर दादा के प्रतिद्वन्द्वी गुट का कब्जा था। दादा तो अपने कवि सम्मेलनी दौरों पर रहते थे। वे पत्रकारों के लिए सहज उपलब्ध नहीं रह सकते थे। संचार साधन बहुत ही सीमित थे। लेकिन प्रतिद्वन्द्वी तो, चौबीसों घण्टे, यहीं के यहीं थे। सो, स्थानीय अखबारों में प्रतिदिन एक न एक सुर्खी बनी रहती थी। दादा की अनुपस्थिति में दादा के समर्थक, प्रेमी अपनी क्षमतानुसार मोर्चा बचाने के लिए ‘युद्ध-रत’ थे। दोनों खेमों की फौज, ‘खुद राजा से अधिक राजा के प्रति वफादार’ की भावना से आमने-सामने थे। लेकिन दादा पर इस अभियान का कोई प्रभाव नजर नहीं आता था। वे जब भी आते, अपने प्रेमियों से कहते - “क्यों अपना वक्त बर्बाद कर रहे हो? कुछ नहीं होना-जाना। तुम सब यहाँ मरने-मारने पर उतारू हो। जबकि ‘ऊपरवालों’ को इस बात की हवा भी नहीं है। घर-गृहस्थी लेकर बैठे हो! बाल-बच्चे पालने हैं कि नहीं? अपना-अपना काम करो भाई!”

दादा की ऐसी बातें सुन-सुन कर दादा के समर्थक पशोपेश में पड़ जाते - ‘यहाँ हम जी-जान से भिड़े हुए हैं और दादा हैं कि हमें ही हड़का रहे हैं?’ इसी मनोदशा में, झुंझलाए कुछ प्रेमियों को दादा ने एक बार घेर लिया और ‘आर-पार’ की लड़ाई की बात करने लगे। एक ने तमक कर कहा - ‘आप बड़े नेता हो। आप तो अपना काम चला लोगे। लेकिन जब आप ही (काँग्रेस में) नहीं रहोगे तो हमारी तो दुर्गति हो जाएगी। हमें कौन बचाएगा?’

दादा को शायद इस बात का अनुमान रहा होगा। उन्होंने कहा - ‘देखो! मेरा तो जनम ही काँग्रेस में हुआ है। मैं जन्मा भी काँग्रेस में और मरूँगा भी काँग्रेस में।’ थोड़ा रुक कर बोले - ‘मुझे काँग्रेस से निकालनेवालों से मेरा नाम लेकर कहना कि हो सकता है कि वे मुझे काँग्रेस से निकाल दें। लेकिन मेरे अन्दर, मेरी आत्मा में जो काँग्रेस है, है उनकी या किसी हिम्मत कि उसे निकाल दे?’ 

दादा की बात सुनकर उनके सारे प्रेमी चुप हो गए। अपना जाना-पहचाना ठहाका लगा कर बोले - “उन्हें मेरी ओर से यह शेर सुना देना -

‘गुल से लिपटी हुई तितली को गिराओ तो जानूँ,
हवाओं, तुमने दरख्तों को गिराया होगा।’

 मुझे काँग्रेस से निकालनेवालों को कोई काम ही नहीं है। सब फुरसतिये हैं। लेकिन यार! तुम तो कामकाजी लोग हो! किसके चक्कर में अपना वक्त खराब कर रहे हो? मैंने अपने कवि सम्मेलन बन्द कर दिए क्या? कहीं, कुछ भी होना-जाना नहीं है। अपना-अपना और काँग्रेस का काम करो भैया! काँग्रेस का काम है देश बनाना। यह, बहुत बड़ा काम है। इसी में जुट जाओ।”

दादा के प्रेमियों ने भारी और बुझे मन से, अत्यधिक अनिच्छापूर्वक दादा का कहा माना। लेकिन इसके बाद हुआ वही जो दादा ने कहा था। कहीं, कुछ भी नहीं हुआ। पत्ता भी नहीं खड़का। 

यह तो 1972 की बात थी। लेकिन जमाने ने देखा - तितली अपने गुल से ही लिपटी रही। अपनी अन्तिम साँस तक।

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दल बदलना याने माँ की कोख बदलना


दादा श्री बालकवि  बैरागी ने नियमित रूप से डायरी कभी नहीं लिखी। किन्तु सन् 2004 मेंअकस्मात ही उन्होंने प्रकट किया कि उन्होंने सन् 2001 की, पूरे 365 दिनों की डायरी लिखी है। भोपाल में ‘दुष्यन्त स्मारक’ वाले श्री राजुरकर राज ने यह डायरी, ‘पड़ाव प्रकाशन, भोपाल’ से मई 2004 में, ‘बैरागी की डायरी’ शीर्षक से प्रकाशित की है।यहाँ प्रस्तुत अंश उसी डायरी से, दादा के वक्तव्य से लिया गया है।

दादा, जून 1999 से जून 2004 तक, संसद के उच्च सदन, राज्य-सभा के सदस्य रहे। जैसा कि अपनी इस डायरी में दादा ने ही कहा है, इस डायरी लेखन की जानकारी, दादा के सिवाय किसी को भी नहीं थी। और तो और मेरी भाभीजी श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी को भी नहीं।

अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ पूरी करने के लिए नेताओं द्वारा राजनीतिक निष्ठा बदलने के, हतप्रभ करनेवाले इस लज्जाजनक समय में दादा की ये बातें अविश्वसनीय ही लगेंगी। 

मैं प्रायः कहता रहता हूँ कि प्रत्येक आदमी की एक कीमत होती है और हर आदमी खरीदा जा सकता है। किन्तु यदि भिखारी भी धार ले कि उसे नहीं बिकना है तो उसे कुबेर भी नहीं खरीद सकता।

दादा के वक्तव्य का यह अंश इस बात का एक छोटा सा प्रमाण है।

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अनायास ईश्वरीय वरदान की तरह श्रीमती सोनिया गाँधी ने जून 998 में मध्यप्रदेश के राजनीतिक परिवेश की आशाओं और अनुमानों में एक नया पृष्ठ जोड़ते हुए मुझे संसद के राज्य-सभा सदन में सदस्य चुनवाकर बैठा दिया। पूरे छः वर्षाे के लिए। 

सन् 1945 से इन पंक्तियों के लिखने तक मैं काँग्रेस कार्यकर्ता के तौर पर तिरंगा हाथ में थामे अपना जीवन जी रहा हूँ। ईश्वर ने मुझे कलम थमाकर एक सर्वथा भिखमंगे (शत-प्रतिशत मँगते) परिवार में जन्म दिया। माँ ने मुझे टूटने से बचाया। आजन्म अपाहिज और लाचार बाप का मैं जेठा बेटा। पूर्णतः माँ का निर्माण। मैं खुद कहता रहा हूँ - ‘गरीब के घर में बच्चा पैदा नहीं होता-हमेशा बूढ़ा ही पैदा होता है।’ सो वही मैं। होश आने पर मैंने कहा - ‘साहित्य मेरा धर्म है, राजनीति मेरा कर्म।’ धर्म और कर्म के बीच की क्षीण-सी रेखा को मैंने न लाँघा, न मिटाया। मान-सम्मान, अपमान, पुरस्कार, तिरस्कार, प्यार, प्रताड़ना, उतार-चढ़ाव, सिंहासन-आसन-निरासन, पद-अपद, जो भी मिला, सभी को प्रभु का प्रसाद मानकर ठहाकों के साथ चलता रहा। काँग्रेस की राजनीति में न कभी मचला, न कभी फिसला, न कभी बहका, न कभी बिका। मुझे खरीदने बड़े-बड़े धनी, राजे-महाराजे, रानियाँ-महारानियाँ अपने-अपने समय पर पूरी निर्लज्जता से पधारे। मेरे अभावों, मेरी गरीबी और मेरे संघर्षाें के खुले आकाशी तम्बू में मुझे ठहाका लगाते देख, पानी-पानी होकर लौट गये। आजादी की लड़ाई में मैंने नाखून भी नहीं कटाया किन्तु श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने मुझे मध्य-प्रदेश में दो बार मिनिस्टर बनवाया। एक बार संसदीय सचिव बनवाया। श्री राजीव गाँधी ने मुझे मन्दसौर जैसे विकट क्षेत्र से लोकसभा में चुनवाया और श्रीमती सोनिया गाँधी की अहेतुकी कृपा के कारण इस समय राज्यसभा का एक मुखर कॉँग्रेसी सदस्य हूँ। जी हाँ, मेरे कार्यकाल के पूरे छः वर्ष इसी 29 जून 2004 को पूरे होने जा रहे हैं। दलबदल और आस्था बदल जैसे कलंक मुझ पर कभी नहीं लगे। दलबदल पर मैंने एक टिप्पणी कर दी-‘पता नहीं लोग माँ की कोख कैसे बदल लेते हैं?’ कुछ लोग भौंचक सुनते रहे। श्रोताओं ने उन लोगों की तरफ ठहाका मारकर व्यंग्य से देखा।

अभी-अभी, लोक-सभा के चुनावी मौसम में एक महानुभाव मुझ टटालने पधारे। उन्हें लगा, बैरागीजी की राज्य-सभा टर्म खत्म हो रही है। लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं। ये पार्टीवालों को चुनाव लड़वा रहे हैं, ख़ुद नहीं लड़ रहे हैं। मध्य-प्रदेश में काँग्रेस केे पास विधानसभा में संख्या बल इतना भी नहीं है कि कोई एक सदस्य राज्यसभा में पार्टी ला सके। तब फिर ये क्या करेंगे? मुझसे पूछ बैठे - ‘आप अपने बारे में क्या सोच रहे हैं? कहीं किसी द......ल.......ने.......ता..... वेता से बात हुई या हम.......।’ मैं तैयार बैठा था। उनका वाक्य पूरा हो उससे पहले ही बोला - ‘मैं अपने बारे में सोच रहा हूँ कि मेरे मरने के बाद मेरे आँगन में से मेरी लाश को जलाने के लिये कुत्ते अपने आँगन में लिये नहीं चले जायें। बचाना। अपने उत्तराधिकारियों से कह रहा हूँ।’ उनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई।

मैंने रहीम को पढ़ा है। महाकवि ने लिखा है-

सर सूखे, पंछी उड़े, औरे सरन समाहिं।
दीन मीन बिनु पंख के, कहु रहीम कँह जाहिं।।

दलबदल की राजनीति पर मैं यह दोहा चस्पा करता हूँ। तालाब का पानी सूखने पर उसके किनारे के हरे-भरे वृक्षों पर किलोलें करने वाले पंछी दूसरे तालाबों के किनारों पर चले जाते हैं, लेकिन उस सूखते तालाब की मछलियाँ तड़प-तड़प कर उसी तालाब में जान दे देती हैं पर तालाब नहीं छोड़तीं। पंख मछली के पास तैरने के लिए होते हैं। पंख पक्षियों के पास उड़ने के लिए होते हैं। मेरा और आस्था-बदल दलबदलुओं का यही फासला है। वे हरियाली की तलाश में कहीं भी जा सकते हैं। मुझे इसी तालाब में जान देनी है।

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