हमारा कृष्ण तो वहीं, कहीं....

बहुत लम्बा/बड़ा है दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख। किन्तु मुझे आकण्ठ विश्वास है कि आपने यदि पढ़ना शुरू कर दिया तो अन्तिम शब्द तक पढ़ने के बाद ही अगली साँस ले पाएँगे। 

दादा की कविताओं और गद्य में एक अघोषित प्रतियोगिता चलती रहती है। दादा का ‘कहन’ जबरदस्त है। दादा की कविताएँ यदि सम्मोहित करती हैं तो इस ‘कहन’ के चलते उनका गद्य लुभाता है। 

इस लेख में दादा की भाषा का लालित्य देखते ही बनता है। दादा आपको जहाँ एक ओर, राधाष्ठमी के उत्सव पर, वृन्दावन के बाँकेबिहारीजी के मन्दिर के प्रांगण में जुड़े भक्त समुदाय में शामिल होने की अनुभूति करा देते हैं और अनजाने में ही आप ‘राधे! राधे!!’ का जयघोष करने पर विवश कर देते हैं वहीं दूसरी ओर, लेख के अन्तिम छोर पर पहुँचते-पहुँचते प्रेमाश्रु से सराबोर भी कर देते हैं।

साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ के 16 सितम्बर 1991 में छपा यह लेख, जीरन (नीमच) वाले प्रिय विवेक मेहता ने बड़ी चिन्ता और आत्मीयता से उपलब्ध कराया है।

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हमारा कृष्ण तो वहीं, कहीं....

-बालकवि बैरागी


बात उन दिनों की है जब मैं संसद में वो था-क्या कहते हैं जिसे-सांसद यानी कि लोक सभा सदस्य था।

सुशील ‘पिया’ ने एक सात्विक दुराग्रह किया कि छोटा-मोटा साधन जुटा कर कम-से-कम एक बार तो ‘राधाष्टमी’ हम लोग वृन्दावन में कर ही लें। ब्रज में बसनेवाले हमारे कई मित्र समय-समय पर कहा भी करते थे कि भारतीय श्रद्धा का आधार यदि देखना हो तो मुझे राधाष्टमी का पर्व एक बार अवश्य ही वृन्दावन में स्वयं देखना चाहिए। कुल मिला कर हम दोनों जीव एक-दो दिन का समय निकाल कर वृन्दावन जा ही पहुँचे। जाना तो वहाँ बार-बार हुआ है पर राधाष्टमी पर्व का यह पहला अवसर था। लोकश्रद्धा का ज्वार तो ब्रज के कटिबन्ध से ही उमड़ता दिखाई देने लगा था। खैर, वृन्दावन में पहुँच कर पहले एक निजी अतिथिशाला में हम लोगों ने डेरा डाला। अतिथिशाला के प्रबन्धक मुझे पहचानते थे। नाम से तो परिचित थे ही, शायद कभी-कभार मिल भी चुके थे। कोई असुविधा नहीं हुई। भीड़ के अपने ठाठ थे। वृन्दावन की हर गली जन-सागर की लहरों में डूबती-उतराती नजर आती थी। शाम होते-होते तो लोकश्रद्धा और लोकसागर का अनन्त उफान देख कर मन मुग्ध हो गया। सुशील ‘पिया’ की आँख में कृष्ण-करुणा के आँसू और होठों पर सूर-सेवा के अटपटे बोल तैरने लगे। सोचने की शक्ति प्रायः समाप्त हो गई थी। देखते ही रहो। भीड़ में खड़े हो गए तो फिर उसकी लहरों पर ही आपको किसी तट का सहारा मिले तो मिले वरना बस ‘राधे...राधे’ के श्रद्धा सरोवर में गोते खाते रहिए। न तन की सुध, न मन का बोध। रोशनी, बैण्ड, लाउडस्पीकर, ढोल, मृदंग, नगाड़े, ताल, करताल, तुरही, बाँसुरी, झाँझ, डफली और भी न जाने किस-किस तरह के देसी और परदेसी वाद्य और लोकवाद्य अपना अन्तस खोलकर, सुरों का संसार सिरज रहे थे। भारत के दूर-सुदूर और पास-अतिपास यानी कि हर कोने से आए कृष्णभक्त अपने-अपने रंग-बिरंगे परिधानों में तन-मन की सुध बिसराए नाचते-गाते, कुकते-हूकते सारे वृन्दावन को स्वर्ग बनाए हुए विभोर भावालोक के विधाता लग रहे थे। हृदय था कि ओठों तक आ रहा था-आँसू थे कि अविरल, अथाह थे। अपरिचित, अनजाने श्रद्धालुओं के हाथ कन्धों पर थे और हमारे हाथ न जाने किनके कन्धों पर जा टिके थे।

उस अव्यक्त अनुभूति से अभिभूत वह रात मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा। बाँके बिहारी के दर्शनों का बखान कैसे करूँ और कब तक करूँ? जब नटखट नन्दलाल, नटनागर का विराट दर्शन मन्दिर के बाहर ही वैसा कुछ हो चुका था कि चेतना चहचहाना बिसार चुकी थी। मन्दिर का भीतरी आँगन दर्शन-मुद्रा का अनुपम और अगम उदधि लगता था। कोई अपने ठाकुर से बतिया रहा था तो कोई राधे मैया की चिरौरी कर रहा था। कोई उसे मना रहा था तो कोई पटा रहा था। राधे के प्रति श्रद्धापूर्ण ईर्ष्या का आह्लादमय स्वर यहाँ से वहाँ तक ठाठें मार रहा था। श्रद्धा, करुणा, विरह, व्याकुलता, विह्वलता, विकलता और विवशता के बोल समूचे आकाश में तैर रहे थे-‘राधे तू बड़ भागनि कौन तपस्य कीन, तीन लोक के नाथ जो, सो तेरे आधीन।’ और, ‘राधे! राधे! श्याम से मिला दे, मुझको भी राधा बना ले नन्दलाल’ जैसे रस घोल रहे थे। ‘नन्द, जसोदा जमुना मैया-जय गोवर्धन राधे मैया-जय गोकुल के धेनु चरैया-जय हलधर के दाऊ भैया’ के रोमांचित दर्शक या तो दुपट्टों, पल्लुओं से अपने प्रेमाश्रु पोंछ रहे थे या हाथों को आसमान तक ऊँचा उठा-उठा कर जय-जयकारा कर रहे थे। कहते हैं, वृन्दावन में पूजा, प्रार्थना, अर्चना, आराधना, आरती और अनहद सभी गड्डमड्ड हो कर मात्र सेवा के अभिन्न उपांग होकर रह जाते हैं। ‘तुलसी और सेवा’ वृन्दावन का मुख्य भाव है। वृन्दावन में कोई मोक्ष नहीं माँगता। वहाँ जा कर हर कोई माँगता है - पुनर्जन्म। और वह भी उसी सेवास्थली में। वहाँ के कुंज-निकुंज लोगों का जन्म-जन्मान्तर भुला देते हैं और याद भी दिला देते हैं। बड़े-बड़े मोक्षकामी वहाँ जाकर अपनी मोक्ष कामना भूल जाते हैं। सारा वृन्दावन ‘ठाकुर सेवा’ का एक लौकिक किन्तु अलौकिक संसार बन कर श्रद्धालुओं के प्राणों में समा जाता है।

मन करता है, यहीं मर जाएँ। मन करता है, यहीं जीवित रहें। जी करता है, श्याम के बिना जीवन अकारथ है। जी करता है, यहाँ आ कर जनम सफल हो गया। अकारथ और सकारथ का अद्भुत संगम है वृन्दावन। प्रेमाकुलता का यह आलम है कि यदि मर्यादा आड़े नहीं आए और सेवारत मुख्य पुजारीजी पल-दो पल को गर्भ का चबूतरा छोड़ दें तो माखनचोर पर मरनेवाले मन्दिर के भीतरवाली मूर्तियों का दर्शन भूल-भाल कर उस मूर्ति को झपट्टा मार कर उठा लें और उसे अपने कलेजे से लगाए-लिपटाए ‘कान्हा...कान्हा...’ करते वृन्दावन से निकल भागें। मन बावरा हो जाता है। प्राण छटपटाने लगते हैं। साँस, निसाँस में बदल जाती है। पूजाएँ अपने-आप प्रार्थना में परिवर्तित हो जाती हैं। समर्पण, सेवा का आचार्य बन बैठता है। निराकार के उपासक वृन्दावन में सदेह, साकार सशरीर कृष्ण का स्पर्श करने को उतावले हो जाते हैं। पता नहीं उस मिट्टी में इतना सम्मोहन प्रकृति ने कैसे और क्यों, कहाँ से डाल दिया है? जब-जब  ब्रज मे विचरण किया, मुझे लगा कि यहाँ कृष्ण अवश्य हुआ होगा। हुआ क्या होगा, वह अभी भी यहीं-कहीं घूमता-फिरता आता होगा और मैं उसे देख पाऊँगा। उससे मिल सकूँगा। वह बोलेगा, बात करेगा, बतियाएगा। हाल-हवाल पूछेगा। समाचार देगा-लेगा। कभी नहीं लगा कि वह  हजारों साल पहले हुआ था। लगता है, यहीं-कहीं, लुकाछिपी खेल रहा होगा। रूठ-मनौवल चल रही होगी। महारास का थका-हारा, किसी कदम्ब के नीचे अपनी बाँह का सिरहाना लगा कर थोड़ी-सी थकान उतार रहा होगा-थोड़ा ठहर लें, आता ही होगा। शायद ग्वालों ने घेर रखा होगा। हो सकता है, गोपियों ने रार मचा रखी हो, बाँसुरी को लेकर बहस चल रही होगी। उधर से छूटे तब तो इधर आए ना! ऐसे ही विचार मन को मथते रहते हैं। वृन्दावन में जाकर प्रतीत होता है कि यह कृष्ण-प्रेम का नाभि-क्षेत्र है इसी पर उसने कस कर पीताम्बर बाँध रखा है। कनुप्रेम का पगा प्राणी उसी कसावट के बन्धन को वहाँ महसूस करता है। हारी हुई साँसों का हीरामन हल्ला मचा-मचाकर कहता है-‘और कसो मेरे कनु! इस कसावट को और कसो।’ चेतन, अचेतन हो जाता है। अथ-श्लथ हो जाता है। कनु के कटिबन्ध का एक ही बन्धन, पीताम्बर की एक ही गाँठ जनम-जनम के बन्धन ढीले कर देती है। अगर यह एक गाँठ लग गई तो फिर सारी गाँठें अपने-आप खुल जाती हैं। ब्रह्म-गाँठ तक अपने आप खुल कर राधा की लट की तरह श्याम की उंगलियों में उलझ-उलझ कर फिसलने लगती है, एक अपूर्व सुख, जो आदमी को अवाक् कर दे...ऐसा ही लगा उस रात वृन्दावन में, कम-से-कम मुझे।

दूसरे दिन हल लोगों ने जन-सागर का उतार देखा। मंगला के दर्शन करके लोग जो बिखरने-बहने शुरू हुए तो तो दूसरी शाम आते-आते सारी गलियाँ सहज हो गईं। जन-जमना इठला जरूर रही थी पर उसकी उत्तालता कूलों में सिमट आई। कगारों और छारों का अटाव ठहर गया। घूमना-फिरना आसान हो गया। वातवरण में श्रद्धा और सेवा की सुवास अब भी भरपूर थी। इस शाम मैंने पूज्य आचार्य प्रवर श्री गोपालजी स्वामी को सूचना दी कि मैं सपत्नीक वृन्दावन में हूँ और राधाष्टमी की तल्लीनता में अभी तक तन्मय हूँ। कल मंगला के दर्शन करके हम लोग मथुरा स्टेशन से अपने गन्तव्य के लिए गाड़ी पकड़ना चाहते हैं। एक तो वे स्वयं दर्शन दे दें और दूसरा, मथुरा स्टेशन तक पहुँचाने का दायित्व ले लें। उनकी मुझ पर शुरू से कृपा रही है। वे हरिहितवंशजी के रक्त और वंश से सीधे जुड़े हुए एक शालीन साधु पुरुष हैं। सस्मित तो हैं ही, वृन्दावन में उनका जो सम्मान है, वह प्रीतिकर है। प्रसन्नता होती है। लौटकर उनका समाचार मिला कि वे शाम को प्रसाद भेज रहे हैं और समय निकाल कर स्वयं भी पधार रहे हैं। आसपास के लोगों को आश्चर्य हुआ जब उन्हें यह देखने को मिला कि मुझ जैसे अकिंचन को दर्शन देने वे स्वयं वृन्दावन के अतिथिगृहों में छानबीन करते घूम रहे हैं। यह भेंट मेरे लिए गौरवमयी थी।

वृन्दान में हम लोग यह तीसरा दिन शुरू करनेवाले थे। स्नानादि से पिवृत्त होकर मंगला के दर्शन किए और अपनी लकुटी-कमरिया सँभाली। सुशील ‘पिया’ ने सामान की पुटलिया बाँधी। अतिथिगृह के एक अनुचर ने सन्देश दिया कि नीचे कार आ गई है, ड्रायवर प्रतीक्षा कर रहा है। गए दो दिनों में एक परिवार और भी हमारा सहयात्री बन चुका था। उसे भी मथुरा आना था। पौ फटने को थी। आचार्य प्रवर श्री गोपालजी गोस्वामी से सुशील का एक आग्रह यह भी था कि वे ड्रायवर को यह संकेत दे दें कि हम लोग मथुरा में पहले जमुनाजी का दर्शन करेंगे। उसके बाद भगवान द्वारकाधीशजी का जो भी दर्शन उस समय होनेवाला होगा, वह करेंगे और फिर स्टेशन जाएँगे। हो सकता है कि दर्शन बेला में घड़ी-अधघड़ी का समय ज्यादा निकालना पड़े तो वह हमें इतनी सुविधा जरूर दे दें। रेल पकड़ने की हमें कोई जल्दी नहीं है। मित्र परिवार को आगरा जाना था और हमें रतलाम की दिशा में। हमारे पास पर्याप्त रेलें थी। हमें इस बात से बड़ा सन्तोष मिला कि आचार्य प्रवर ने ड्रायवर को सबकुछ भलीभाँति समझा दिया था। वह सन्नद्ध था।

ड्रायवर मुझे पहली नजर में ड्रायवर नहीं लगा। नहाया-धोया, साफ-सुथरा, सफेद रेशमी कुरते में एक मझोले कद का गोरा शरीर, सुँती हुई नाक, कन्धों पर घने, काले, लहराते केश, सलीके से खाया हुआ पान, आँखों में सुरमा, चौड़े प्रशस्त ललाट पर रक्त चन्दन और आसपास कुंकुम की रक्ताभा। सफेद और झक्क मलमली धोती। कन्धे पर किनारीदार स्कन्ध-वस्त्र, कण्ठी और कलाई पर बढ़िया मॉडल की घड़ी। जितना सुघर और राधाबरन ड्रायवर, उतनी ही काली-कलूटी, चरमराती, भडभड़ाहट करती एम्बेसेडर कार। फाटक पकड़ कर बैठना जरूरी। मालवा की मिट्टी के ब्रज में ही रह जाने की पूरी सम्भावना। अगली सीट पर ड्रायवर के पास मित्रवर और उनके पास फाटक पकड़ कर बैठा मैं। पिछली सीट पर सुशील और उसके साथ मित्र का परिवार-उनकी बेटियाँ, एक बेटा तथा पत्नी। ठसाठस।

वृन्दावन को बिदा कर हमने ‘राधे-राधे’ कहा और मैंने ड्रायवर से पूछा, ‘आपका नाम?’ वह गियर बदलने में लग गया। कोई ध्यान उसने मेरे सवाल पर नहीं दिया। मेरा दूसरा सवाल था, ‘कार आपकी है या कि किसी दूसरे मालिक की?’ उसने सुरमई आँखों से मुझे गहरे तक घूरा और बोला, ‘मैं ड्रायवर हूँ। बस।’

सुशील ने पीछे से मेरे कन्धे पर दबाव देकर मुझे चौकन्ना करने की कोशिश की। शायद कहती थी, ‘मत छेड़ो।’ आसमान पूरा खुल चुका था। सूरज बिलकुल अपनी ड्योढ़ी से बाहर आ चुका था। उसका जलाल जलने लगा था। दस-पाँच किरणें ही ड्रायवर की कनपटी पर पड़ी थीं कि वह पसीना-पसीना हो गया। मुझे लगा, शायद तीखे मसालेवाला पान खा रहा होगा। हममें से किसी को पसीना नहीं हो रहा था पर हमारा बृजवासी ड्रायवर पसीने के रेलों को पोंछने लगा।

मथुरा में उसने द्वारकाधीशजी के मन्दिर से जरा-सी दूर कार पार्क कर दी। हम लोग उतर कर अपनी-अपनी खिड़की के शीशे चढ़ाने लगे। उसने हमें रोका और कहा, ‘यह काम मैं कर लूँगा। आप अपनी सुविधा से अपना काम कीजिए।’ वह शीशे चढ़ाने लगा। मैंने उससे कहा, ‘हम लोग दर्शन करने जा रहे हैं। समय निकाल कर आप भी दर्शन कर लेना। फिर यहीं मिलना।’ उसने शीशे की चरखी को रोका और मुझे सिर से पैर तक देखा। कुछ नहीं बोला। उधर का शीशा चढ़ाकर वह पिछले शीशे चढ़ाने के लिए पिछले फाटक की तरफ गया। मैंने फिर उससे कहा,  ‘देखना भैया! आप दर्शन में ज्यादा समय मत लगाना। हाँ, दर्शन जरूर कर लेना। हम लोग आते हैं।’ उसने फिर बिना बोले मेरी ओर देखा और अपने काम में लग गया। सुशील ने मेरी बाँह पकड़ी। चलने का संकेत। मुख्य मार्ग पर दर्शनार्थियों का रेला चला जा रहा था। शायद जल्दी ही पट खुलनेवाले थे। सोचा, चलो जमुनाजी के दर्शन बाद में कर लेंगे। चलने से पहले मैंने फिर ड्रायवर से कहा, ‘गुरु! चूकना मत। दर्शन अवश्य कर लेना।’

भगवान श्री द्वारकाधीशजी के दर्शन कर हम लोगों ने जमुनाजी का दर्शन किया। चालीस-पचास मिनट लगे होंगे।

ड्रायवर ने गाड़ी स्टार्ट की और हम मथुरा रेल्वे स्टेशन के लिए चल पड़े।

बाजार पार करके हम मुख्य द्वार से निकले और गाड़ी ने बस स्टैण्ड के पासवाली गली में मोड़ लेकर स्टेशन का रास्ता लिया। मैंने ड्रायवर से पूछा, ‘भैया! दर्शन तो आराम से हो गए ना?’ उसने फिर गियर बदल कर, पान का पीक थूकने के लिए अपनी खिडकी से मुँह बाहर निकाला और गाड़ी आगे बढ़ा दी। रास्ते में एक रेल्वे क्रासिंग पड़ती है। फाटक पार करने पर मैंने पुनः ड्रायवर से पूछने की कोशिश की, ‘भैया! आपने न तो अपना नाम बताया और न ही यह बताया कि मथुरा में आपने दर्शन कर लिए या नहीं? क्या मैं पूछ सकता हूँ कि....’

बस। जैसे कोई पटाखा फूट पड़ा। उसने ब्रेक लगाया। गाड़ी रोकी। एक पाँव गाड़ी के भीतर और दूसरा जमीन पर टिका कर, दाँत भींचते हुए मुझसे पूछा, ‘क्या आप ही बालकवि बैरागी हैं,’

‘हाँ।’

‘क्या आप एम. पी. हैं,’

‘हाँ।’

‘क्या आप गोपालजी महाराज के मेहमान हैं?‘

‘हाँ।’

‘अब आप यह भौंकना, यह बकबक बन्द करेंगे या नहीं? दर्शन...दर्शन...दर्शन....आपने सबेरे से यह सब क्या हल्ला मचा रखा है?’

मेरे और सहयात्रियों के होश उड़ गए। मैं खुद समझ नहीं पाया कि यह इतना लाल-पीला क्यों हो रहा है।

मैंने अपनी देहाती मासूमियत से फिर पूछा, ‘देवता! मैंने और तो कुछ आपसे कहा नहीं! पहले भी यही कहा था और अब भी मेरी यही जिज्ञासा है कि आपने मथुरा में भगवान द्वारिकाधीश के दर्शन....’

और मुझे आभास हुआ कि अब वह मेरी जान ले लेगा। कार खड़ी थी और हम सब तनाव में थे। सुशील का सारा सात्विक आग्रह एक लावे में पिघलता लग रहा था। क्या करने चले थे और क्या हो रहा था! 

हमने हाथ जोड़ कर ड्रायवर को बैठाया। कहा, ‘अच्छा दादा! अब चलो स्टेशन। जब आपका मन माने तब अपने गुस्से का कारण बता देना। नहीं तो हम लोग आपके बृज का यह वजन अपने कलेजे पर बाँध कर लिए चले जाएँगे।’

स्टेशन बहुत दूर नहीं रह गया था। दो-एक मिनट भर ही दूर था। मैंने देखा कि वह गाड़ी चलाते-चलाते अपने दुपट्टे से आँसू पोंछता जा रहा है। करीब-करीब रुँआसा हो गया। मैंने उसकी पीठ सहलाई, ‘भाई! हमारे कारण आप क्यों अपने मन पर बोझ बाँधते हो? गाली देना हो तो गाली दे दो। मारपीट करना हो तो तमाचा जड़ दो पर अपना मन हलका कर दो वरना हमारी तो यात्रा ही....’

उसने गाड़ी की रफ्तार कुछ कम की। बोला, ‘साहब! गोकुल-वृन्दावन में मुझ जैसे लोग भी आपको कभी मिल जाएँगे। मेहरबानी करके हम लोगों से कभी मत कहिएगा कि मथुरा में दर्शन कर लो।’

मैं चकित! मेरे रोम-रोम में सन्नाटा छा गया। 

वह करीब-करीब रुँधे कण्ठ से बोल रहा था, ‘साहब! जब तक यह कन्हैया बच्चा था, हम गोकुल-वृन्दावनवालों ने इसे सँभाला। सगे माँ-बाप ने इसे छोड़ दिया तो हमारी जसोदा मैया ने उसे कलेजे से लगाया। अपनी छाती का दूध पिलाया। हमारे आँगन में इसने जो भी किया, हमने उसे अपनी तपस्या की तरह माना। हमारी गगरिया फोड़ता रहा, माखन चुराता रहा, हमें नचाता रहा। हम इसके इशारों पर नाचते रहे। इसका हर नखरा हमने सहा। जरा-सा बड़ा हुआ और मथुरा आया, मामा के यहाँ। सगे माता-पिता के पास। भूल गया हमारी गलियों को, भूल गया नन्द बाबा को। भूल गया जसोदा मैया को। भूल गया ग्वाल-बालों को। मनसुखा इसे याद नहीं रहा। राधा, हमारी गायें, हमारे कुंज-करील, हमारी लता-पत्तियाँ, हमारी लहरें, हमारी निश्छल श्रद्धा सबको यह चोर यहाँ आकर भूल गया। इसको राज की एक कुर्सी क्या नजर आ गई, यह सिंहासन क्या दिखाई पड़ा, यह यहीं अटक गया! हम गोकुल-वृन्दावनवाले इस सिंहासनारूढ़ राजा का कोई दर्शन-वर्शन नहीं करते। जो राजा हो गया, उससे हमें क्या लेना-देना? हमारा कृष्ण तो जमुना के उस पार वहीं कहीं....’

हम सभी की मनःस्थिति का अनुमान आप स्वयं लगा पा रहे होंगे। उसके पास तो आँसू पोंछने को स्कन्ध-वस्त्र भी था। हम तो बस! बहे जा रहे थे। न कुछ बोल पा रहे थे, न कुछ समझ पा रहे थे।

स्टेशन के मैदान में उसने कार रोकी। कुलियों ने हमारी कार को सामान के लालच में घेर लिया। वह कार से उतरा। मैं भी उतरा। मैंने अपने भीतर के संसद सदस्य को धक्का देकर ‘स्व’ से बाहर निकाला और सीधा उस ड्रायवर के चरणों में अपना माथा रख दिया-इस श्रद्धा की जय हो! राधे मैया की जय हो!! जय गोकुल-वृन्दावन!!! मन का सारा कल्मष धुल चुका था। सुशील आँसू पोंछ रही थी। कुली सामान निकाल रहे थे, गाड़ी की पूछ रहे थे। मैं ड्रायवर को सिर से पैर तक निरख रहा था। कभी नहीं भूल पाऊँगा मैं श्रद्धा के उस सुधा-सावन को।

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अपनी-अपनी रेपुटेशन है


दादा श्री बालकवि बैरागी के लेखन का यह रंग भी है।

साप्ताहिक धर्मयुग के, 4 मई 1980 के अंक के पृष्ठ 41 पर प्रकाशित यह कतरन, वर्तमान में आदीपुर (कच्छ-गुजरात) में रह रहे प्रिय विवेक मेहता ने यह  कतरन भेजी है।

पढ़िए और दादा को याद करते हुए आनन्द लीजिए।

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रंग और व्यंग्य : बालकवि बैरागी के संग







Û  थ्री व्हीलर ऑटो रिक्शावाले ने अपनी ऑटो रिक्शा के सारे पर्दे, तीनों व्हील, गार्ड और सामनेवाला शीशा वगैरह निकाल कर ठीक पीछे लिख दिया - ‘जीनत अमान, सत्यं शिवमं सुन्दरम् में।’


Û  ‘विवाह के बाद वहीं एक कवि सम्मेलन भी है कृपया अवश्य पधारें।’ एक कवि ने अपने विवाह का आमन्त्रण देते हुए कई मित्रों को लिखा।

    सुरेन्द्र शर्मा ने उत्तर भेजा, ‘विवाह की बधाई, परन्तु मैं उस कवि सम्मेलन में नहीं आ पाऊँगा। उसका कारण यह है कि मैं शोक-गीत नहीं लिखता हूँ।’


Û  ‘पप्पू! तुममें सोने की तमीज भी नहीं है। रात को जब सोते हो, तो पूरब-पश्चिम सोते हो। पर जब सुबह उठते हो तो उत्तर-दक्षिण मिलते हो। कितनी बुरी बात है?’ माँ ने बेटे को डाँटा।

    ‘मैं तो मम्मी! जहाँ-का-तहाँ सोता हूँ। कल ही मास्टरजी ने हमको समझाया है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर निरन्तर घूमती रहती है।’ 

    पप्पू ने माँ को चुप कर दिया।


Û  हरियाणा के एक कवि सम्मेलन में पहुँचते ही सुरेन्द्र शर्मा ने संयोजक से धोबी के लिये चिल्ल-पों मचायी। संयोजक ने धोबी को बुलवाया। सुरेन्द्र शर्मा ने अपने पेटीनुमा सूटकेस में से कोई अठारह-बीस कपड़े निकाले और धोबी को शाम तक बढ़िया धो कर लाने का निर्देश दिया।

    संयोजन समिति के एक सदस्य ने एक-के-बाद-एक कपड़ों को गिनते हुए सुरेन्द्र शर्मा से पूछा, ‘भाभीजी के कपड़े नहीं लाये क्या? लगे हाथ वे भी धुलवा लेते।’


Û  प्रहलाद एण्ड पार्टी के मालिक-संचालक प्रहलाद ने सुरेन्द्र शर्मा की दवाइयों की फैक्ट्री के काउण्टर पर, प्रतिदिन होनेवाली चोरियों को एक झटके में रुकवा दिया।

    कहीं से ढूँढकर एक भैंगा सेल्समेन प्रहलाद भाई नेकाउण्टर पर बैठा दिया। चोरियाँ तत्काल बन्द हो गईं। जो भी काउण्टर पर आता है, समझता है कि यह सेल्समेन उसी की तरफ देख रहा है।


Û  कविवर शैल चतुर्वेदी ने पाँच-छह बार टैक्सी का किराया, सुरेन्द्र शर्मा से यह कह कर दिलवा दिया उनके पास केवल सौ रुपये का एक नोट ही है। अन्ततः सुरेन्द्र शर्मा खीज गए। उस बार भी जब वे टैक्सी से उतरे, शैलजी फौरन बोले, ‘मेरे पास सौ का नोट है।’

    जब सुरेन्द्र चालीस-पचास खर्च कर चुके तो उनके सब्र का बाँध टूट गया। ज्यों ही शैल भाई ने पूछा, ‘सुरेन्द्र! अगला प्रोग्राम क्या है?’

    सुरेन्द्र ने तपाक से उत्तर दिया, ‘अब सबसे पहला प्रोग्राम है, आपके सौ के नोट को तुड़वाना।’


Û  आखिर कविवर सुरेन्द्र शर्मा ने एक सेकण्ड हेण्ड मरक्यूरी डॉज कार खरीद ही ली। अपने मित्र जगमोहन जिन्दल को कार की खूबियाँ गिनाते हुए सुरेन्द्र ने कहा, ‘यही कोइ आठ-दस हजार रुपया खर्च जरूर आएगा, पर गाड़ी ए-वन हो जायेगी।’

    गाड़ी की खस्ता हालत पर भरपूर नजर डालते हुए जगमोहन बोले, ‘अरथी पर भले ही लाख रुपये खर्च कर लो, आखिर में तो उसे फूँकना ही पड़ेगा।’


Û  अपनी-अपनी रेपुटेशन है। मंचों पर काव्य-पाठ कर के हजारों श्रोताओं को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देनेवाले सुरेन्द्र शर्मा अपने घर में यदि हल्का-सा मुस्कुरा भी देते हैं तो उनकी पत्नी पूछ बैठती है, ‘क्या बात है? क्या तबीयत खराब है?’

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नन्दराम से बालकवि तक

 

(अपनी आयु के 60 वर्ष पूरे करने के प्रसंग पर बकलम खुद)


दादा श्री बालकवि बैरागी की आज छियानवेवीं जन्म तारीख और पिच्यानवेवी जन्म वर्ष-गाँठ है। दादा हम सबके बीच होते तो आज अपनी उम्र के 96वें बरस में प्रवेश कर रहे होते।

दादा का समूचा लेखन आज भी एक जगह उपलब्ध नहीं है। खुद के लिखे को सहेजने के प्रति वे सदैव उदासीन रहे। कहते थे - ‘यह क्या बात हुई कि अपना लिखा खुद आप सहेजें? बात तो तब है जब जगत-दुनिया आपका लिखा सहेजे।’ 

उनके लिखे हुए को संग्रहित करने के लिए मैं अपने स्तर पर भरसक कोशिश कर रहा हूँ। दादा के चाहनेवाले मेरी इस कोशिश को भरपूर मदद कर रहे हैं। इसी क्रम में प्रिय विवेक मेहता ने अत्यन्त चिन्तापूर्वक और कृपापूर्वक, दादा का यह लेख मुझे उपलब्ध कराया। आदीपुर (कच्छ/गुजरात) में निवासरत विवेक मूलतः जीरन (नीमच) का निवासी है और देश के प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री मंगल मेहता का छोटा बेटा है। विवेक खुद भी अच्छा कलमकार है। अपने यशस्वी पिता के लिखे को सहेजने की उसकी कोशिशें प्रेरक और प्रणम्य हैं।

यह लेख, दैनिक भास्कर के साप्ताहिक साहित्यिक परिशिष्ट ‘रसरंग’ के 10 फरवरी 1991 के अंक में प्रकाशित हुआ था।

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(आज मन्दसौर जिले का छोटा सा कस्बा मनासा, शायद इस बात से अनभिज्ञ है कि बरसों पहले उन सँकरी गलियों में भीख माँगनेवालाएक अबोध बच्चा इस दस फरवरी को सम्माननीय कवि और राजनीतिज्ञ के रूप में  अपने संघर्ष भरे जीवन के साठ बरस पूरे करने जा रहा है। बालकवि बैरागी की, साठ पड़ावों की इस संघर्ष-यात्रा को ‘भास्कर’ का नमन। शुभ-कामनाएँ कि वे दीर्घायु हों। इस महत्वपूर्ण अवसर पर स्वयम् बैरागीजी ने यह लेख हमारे आग्रह पर विशेष रूप से लिखा है।)

प्रश्नों का पहाड़ सामने  है - आयु के साठ साल पूरे होने पर यह एक सहज स्थिति है कि मित्र लोग अपने-अपने मन की बातें पूछें-स्वजन अपनी जिज्ञासाओं का समाधान माँगें। परिजन अपने सवालों की रंगोली माँडें - जीवन से जुड़े लोग अपना रसरंग उलीचें - इसी समीकरण में से निकल रहा हूँ मैं। समय कितनी जल्दी बीतता है? सब कुछ कल-परसों घटित हुआ-सा लगता है - बिना किसी जोर-जबरदस्ती के, अपनी सहज स्मरण शक्ति के बल पर मैं आराम से अपनी साढ़े चार-पाँच बरस की आयु से ही सहेजी हुई यादें, परत-दर-परत खोल कर बोल सकता हूँ। कदम-कदम, मुड़-मुड़ कर देखता हूँ तो सारा कुछ परियों की कहानी जैसा लगता है।

आत्मकथा लिखने या कहने का यह क्षण नहीं है। समय मेरे पास तो बहुत है, पर आपके पास इतना नहीं है कि मुझ जैसे एक अदना आदमी की जिन्दगी के बारे में ऊलजलूल पढं़े या सुनें। तब भी लोग पूछते ही हैं। दो-एक सवालों तक के तो मैं उत्तर वैसे भी लिख कर दे देता हूँ। पर विस्तार में जाता बैठूँ तो बेशक हाथ तो नहीं काँपता है, पर मन काँप जाता है। नाहक ही आपको क्यों कष्ट दूँ? 

इस परिवार के सबसे पहले बेटे के तौर, माँ के पेट में मैं ही आया। गरीबी, विपन्नता, कंगाली और अभावों का वो आलम मैंने देखा और विरासत में पाया कि बस पूछिए ही मत! माँ की हिम्मत और छत्र-छाया नहीं होती तो आज का यह बैरागी मिट्टी में मिल गया होता। जन्मजात विकलांग, अपाहिज लूले-लँगड़े और नाकरा पिता की कितनी मार खाई मेरे अबोध किन्तु कमाऊ बचपन ने, और कितनी मार सही मेरी माँ ने? उफ्! गरीबी का आलम यह कि माँ अपने बच्चों के नाम तक भूल गई। पैदा किए पूरे बारह किन्तु दवा के अभाव, कुपोषण और गरीबी के कारण आठ दम तोड़ गए। दो भाई, दो बहिनें बचीं। पर उनके सुख भी विधाता को नहीं पचे। लोकगीत कहते हैं कि विधाता, मनुष्य के ललाट पर अपने लेख लिखता है। ललाट पर इसलिए कि जिसके ललाट पर लिखा हुआ है, वह, वह खुद नहीं पढ़ सके। तार्किक कहते हैं कि अगर खुद नहीं पढ़ सकते हो तो विज्ञान ने दर्पण खोज लिया है। शीशा देख कर अपने-अपने लेख पढ़ लो। पर अगर दर्पण को माध्यम बनाओ तो लिखा हुआ उल्टा सामने आता है। पहली बात तो यह कि पढ़ ही नहीं सकते। अगर पढ़ने की कोशिश करो तो उलटा पढ़ो। इस ‘उलट लिपि’ को सीधा करके पढ़ने में ही आदमी के कई जन्म निकल जाते हैं। तब फिर मार्क्स कहता है कि न तो ललाट पर, न ही हाथ पर कोई लकीरें होती हैं। मनुष्य चाहे जो कर सकता है। जरा-सा आगे बढ़ कर सुनो, सोचो, पढ़ो और गुनो। भारतीय अध्यात्म भी यही कहता है। विचित्र सी गाँठ है कि मार्क्स और भारत का अध्यात्म, इस मुकाम पर एक साथ हँसते-खिलखिलाते मनुष्य से बातें करते हैं। पल्ले पड़ने जैसा प्रसंग है। संघर्ष को सान मिलती है। माँ का अद्भुत आँचल रोशनी भी देता है और धार भी। वह गरीबी का नया भाष्य करती है। गरीबी और दरिद्रता का फर्क समझाती है। लोकगीतों का अमृत प्रति-पल पिलाती है। बचपन को खिलौनों से नहीं, खेल-भवना से बहलाती है। कदम-कदम पर सिर सहलाती है। धूल-मिट्टी से नया परिचय करवाती है। इस आवेग की आग में से तपकर जो निकलता है वह कालान्तर में बनता है - बालकवि बैरागी। बनता क्या, कहलाता है। उसकी संज्ञा ‘नन्दरामदास’ गुम जाती है। मनासा जैसे सुदूर और प्रवास साधनों से कटे-छँटे छोटे से कस्बे में रहकर सारे देश को यह प्राणी सरस्वती के पटवारी की तरह तीन-चार बार घूम लेता है। देश के साथ विदेश के भी दो-एक चक्कर लगा लेता है। संसद में बैठता है, विधान सभा में बोलता है। दो बार मन्त्री बनता है। एक बार संसदीय सचिव भी रह लेता है। सम्मान सहित अपमानित भी होता है और अपमान सहित सम्मानित भी। साहित्य को कविता के माध्यम से और राजनीति को कांग्रस के मंच से अनवरत-अकम्प और अह्लड़ता के साथ जीता है। अभावों को सहोदर और समस्याओे को सुहागिन मानकर उनकी आँखों में आँख डालता, उन्हें पालता-संभालता है। भगवान ने कलम बाँए हाथ में दी और तिरंगा दाहिने हाथ में। इस विसंगति में भी वह संगति बैठाता है। अपनी मातृ-संस्था में वह घोषित वामपंथी बनकर देश की पाढ़ियों के संघर्षों का डाकिया बनता है। उसे भान है कि आग और पानी का सही सन्तुलन ही बादल कहलाता है।

कई-एक कुम्हारों ने मिलकर इस मटके को आकार दिया है। नाम गिनाने लगूँ तो कई पेड़ कटवा कर कागज बनवाने पड़ जाएँगे। भगवान का दिया, उसके पास सब-कुछ इसलिए नजर आता है कि उसके पास कुछ था ही नहीं। शून्य से शुरू होनेवाले के हाथ में एक का अंक भी बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। यही हाल मेरा है। क्या नहीं दिया प्रभु ने मुझे? सब कुछ नहीं तो भी बहुत-कुछ, कुछ भी नहीं तो भी कुछ-न-कुछ। यह ‘कुछ-न-कुछ’ ही मेरे लिए ‘सब कुछ’ है। दो वर्ष पहले उसने माँ छीन ली। बिना माँ के बार-बार उदासियाँ आती हैं। 83 बरस के बड़े और आजीवन निश्चेष्ट जीवन जीनेवाले पिता के पास घड़ी-अध-घड़ी रोज बैठकर आशीर्वाद लेने की कोशिश करता हूँ। लगता है, ऊर्जा अनुपस्थित है। ममता सूख गई है। आशीषों का मेघ निरन्तर गरजता है। समय-समय पर बरसता भी है। यहाँ से वहाँ तक बदलाव। आज से करीब सत्तर वर्ष पहले जिस आँगन में केवल नाबालिग पिता और अबोध बालिका जैसी माँ छूटी थी, वह सारा आँगन हरा-भरा है। कल तक के अनाथ पिता के सामने उनकी चार पीढियाँ चहचहा रही हैं। अगर वह सुख है तो राज-सुख और समाज-सुख इन सभी ने देखा और भोगा। अगर वह मात्र सुविधा है तो उस सुविधा का इनमें कोई गुलाम नहीं। तिनका-तिनका चोंच में दबाकर कण्ठ में प्यास के काँटों को सहती चिड़िया की तरह जिस सात्विक, सक्रिय सहधर्मिणीने इस निराकार घर को आकार दिया, वह सुशील पिया 38 सालों से मेरी धूप को सह रही है। दो जवान बेटे, दोनों की सोना-रूपा सद्गृहिणी बहुएँ-पोतियाँ और पोता। सगा भाई विष्णु, उसकी पत्नी वीणा और मुझे ताऊजी कहनेवाले दो बेटे - वल्कल और तथागत। देश भर में इस छोर से उस छोर तक फैला पड़ा शुभेच्छाओं का विशाल परिवार। जागरूक पाठक, चौकन्ने श्रोता। भाषा को संस्कारशील तराश देनेवाले सम्पादक बन्धु, नमस्कार नहीं लेने और नहीं देने पर रूठने, मचलने और क्रुद्ध तक होनेवाले साथी-संगाती। आड़े वक्त काम आनेवाले मित्र। नरसिंह मेहता का मामेरा भरनेवाले साँवलिया सेठ जैसे आबरू बचाने और बढ़ानेवाले भाई लोग। मेरे काम-धाम, आचरण, भाषा और व्यवहारपर गहरी नजर रखनेवाले हितैषी, हितकारी। याने कि सब-कुछ दिया है प्रभु ने मुझे। छोटी-बड़ी 23 पुस्तकें छापे से बाहर और कम से कम एक दर्जन पाण्डुलिपियाँ तैयार हो सकें, इतने लिखे-बिखरे पृष्ठ। दो-एक विद्यार्थी शोध करते हुए और दो लघु शोध कर भी चुके। आदर-आलोचना, अनादर, अनासक्ति, अवरोध, अभिन्न, अनर्गल, अनाघात, अनायास और अटाटूट। कितना दे दिया है दाता ने? जो लिखो, वह छपे और जो बोलो वह रेकार्ड हो जाए! विकसित विज्ञान का वैभवशाली युग - बीसवीं सदी का यौवन और बुढ़ापा। 21वीं सदी का गर्भकाल। कितना कुछ जी रहा हूँ? कितना भोग रहा हूँ? अपना अतीत भूल नहीं जाऊँ इसलिए आज भी कपड़े माँग कर पहनता हूँ। दोस्तों को आभास भर हो जाए कि बैरागी के पास कपड़े नहीं रहे होंगे, तो वे चुपचाप जुगाड़ कर देते हैं। भगवान ने मुझे अगर कविता न दी होती तो क्या यह सब, इतना कुछ मुझे मिला होता? कदापि नहीं। सवाल यह पैदा होता है कि मालवी ने मुझे इतना सब दिया। हिन्दी ने - माँ हिन्दी ने - जन्म सुधार दिया, पर बदले में मेरा क्या योगदान है? क्या अवदान है? सपाट उत्तर है - शून्य। मैं भाषा से आज तक लेता ही लेता रहा। शब्दकोश को एक शब्द भी नहीं दे सका। इतना लिखा, पर मन की बेचैनी नहीं मिटी। इतना पढ़ता हूँ पर छटपटाहट कम नहीं होती। रह-रहकर सूर, मीरा, तुलसी, कबीर, गालिब, रहीम, रसखान, जायसी, दिनकर, निराला, महादेवी, भवानी भाई, सुमनजी, भारतीजी की पुस्तकें हाथ में आ जाती हैं। साहित्य और संस्कृति की ठेठ आखिरी दीवार से पीठ सटा कर बैठता हूँ तो वाल्मीकी और वेदव्यास की गोद का आसरा मिला लगता है। रामविलास दादा नहीं रहे वरना किसी अपने के कन्धे परसिर रखकर मन हलका कर लेता। प्रो. पी. डी. शर्मा नहीं मिलते तो जैसे-तैसे मेट्रिक पास वाला सर्टिफिकेट ही मेरा एकमात्र अकादमिक धन हुआ होता। पी. डी. दादा ने इण्टर पास करवाया। फिर मिले चिन्तामणिजी उपाध्याय। अपने पास रखकर उन्होंने एम. ए. करवाया। डॉ. सुमन का आशीर्वाद नहीं होता तो आज कहीं का नहीं होता। कौन देता अटेण्डेंस? कौन देता फीस के पैसे? कैसे भरे जाते परीक्षाओं के फॉर्म? कौन करता मेरे भीतर दिनानदिन जवान होते जा रहे अल्हड़ बैरागी की नादान लापरवाहियों की रखवाली? यह वह मोड़ है जिस पर खड़ा होकर मैं कुँवर गिरिवरसिंह भँवर, नरेन्द्रसिंह दादा तोमर, आनन्दराव दादा दुबे, पण्डित कृष्णकान्त दुबे, मदनमोहन व्यास, हरीश निगम, सुल्तान मामा, भावसार बा, मोहन सोनी, शिव चौरसिया, रमेश गुप्ता ‘चातक’, चन्द्रसेन विराट, रामनारायण दादा उपाध्याय, पण्डित श्रीकान्त जोशी, भागवत्रत्न पण्डित मदनलालजी जोशी, पण्डित श्याम सुन्दरजी व्यास, प्यारे भाई रमेश मेहबूब, नरहरि पटेल, नगेन्द्र आजाद, कुमार गन्धर्व, राजेन्द्र माथुर, राहुल बारपुते, पयाम वासिफ, बशरुद्दीनजी ‘आरिज’, महाराज कुमार रघुवीरसिंहजी, दिनकर सोनवलकर, सरोजकुमार, पुखराज भाभी, स्व. प्राणवल्लभ गुप्त, दादा शिवशंकरजी जोशी, पन्नालाल बा’ नायाब और चूड़ामणि पण्डित सूर्यनारायणजी व्यास, श्याम दादा परमार, बसन्तीलाल बम जैसे महिमामण्डित व्यक्तित्वों और व्यक्तियों को दसों दिशाओं में मुँह करके दण्डवत् प्रणाम करता हूँ। ये, वे  कुछ ही नाम हैं जिन्हें लिखकर मैं अपना मन हलका कर रहा हूँ। अगर देशव्यापी वन्दनीय नाम लिख्ना शुरू करूँगा तो बहुत असहज हो जाऊँगा। विनम्रता मेरे जीवन का सहज आधार है, मेरी मूल सम्पत्ति है। उसे खोना मैं कदापि पसन्द नहीं करूँगा।

बेशक, आपकी रुचि मेरी राजनीति पीठिका में भी होगी। लिख कर सनद कर रहा हूँ कि मेरे राजनीतिक निर्माता का नाम है- माणकलाल अग्रवाल, जो आजकल रतलाम में निवास करते हैं। पूर्व सांसद हैं। यही वह आदमी है जिसने एक यायावर-याचक को मात्र 13 वर्ष की उम्र में रामपुरा नगर की धूल में से उठाया और उसे एक मिनस्टिर में परिवर्तित कर दिया। एक नहीं, दो-दो बार। भैया मिश्रीलालजी गंगवाल का पवित्र जीवन मेरे लिए कसौटी है। उनके दिए संस्कार सदैव मुझे झकझोरते रहते हें। उनके विदेह व्यक्तित्व ने ही मुझे सिखाया कि तुम राजनीति में रहो पर रजानीति तुम में नहीं रहे। बात को मैंने आगे बढ़ाया कि मैं कुर्सियों पर गया हूँ, पदों पर बैठा हूँ पर मैंने कुर्सी और पद को खुद पर नहीं बैठने दिया। साहित्य मेरा धर्म है, राजनीति मेरा कर्म। मैं साहित्य से राजनीति में नहीं गया। जिस आदमी ने नौ बरस की उम्र में अपना लिखा चहचहा लिया और जिसे मात्र तेरह बरस की उम्र में तिरंगा झण्डा थमा दिया गया हो, वह यहाँ पहले था या वहांँ पहले, यह फैसला आप ही कर लें। धर्म-कर्म की इस पावक-सरिता के दोनों तटों पर मुझे अग्नि-आचमन करना पड़ता है। मैं, वह पूरी निष्ठा और पूजा-भाव से कर रहा हूँ। यह किसी पर मेरी मेहरबानी या मेरा अहसान नहीं है। शराब पीनेवाला शराब पीता है तो बोतल पर अहसान नहीं करता। एक शाकाहरी, निर्व्यसनी और सात्विक जीवन जितना खुला जिया जा सकता है, वैसा मैं जी रहा हूँ। शिकायत किसी से नहीं - कृतज्ञ सभी का हूँ। काया में कोई रोग नहीं है और बत्तीस के बत्तीस दाँत अपने श्रोताओं-पाठकों तथा सम्पादकों की कृपा से आज तक तो सही सलामत हैं। ऊर्जा, सर्जना और सक्रियता का मतलब इस आयु में ज्यादह कशिश के साथ पल्ले पड़ता है। 17-18 घण्टे रोज काम करता हूँ। करने को बहुत कुछ है, होता-जाता कुछ है नहीं। ऋतुएँ मुझ पर भी असर डालती हैं, काल मुझे भी चबा रहा है। आवेग मुझे भी उत्तेजित और आन्दोलित करते हैं। भूख, भावना और भावुकता के मतलब मैं भी समझता हूँ। नैतिकता, मूल्यवत्ता और आदर्शों के अर्थ मैंने नए नहीं गढ़े हैं किन्तु एक सनातन रिक्तता मुझे पल-पल आभासित होती है। तब भी मैं आशावादी और आशावान हूँ। रात-दिन अँधेरों से लड़ रहा हूँ। और हाँ, एक बात आप जरूर सुन लें कि अँधेरे से लड़ने का ठेका केवल सूरज, चाँद, सितारों, जगमग करते झाड़-फानूसों और जीवन्त मोमबत्तियों या दीयों ने ही नहीं ले रखा है। अँधेरे की नींद हराम करने के लिए एक जुगनू ही काफी होता है। मैं अपने आप को वह जुगनू घोषित करता हूँ - मेरी पीठ पर यह जलती हुई रोशनी मुझे प्रभु ने दी है। सनद यह भी करता हूँ कि मैं इस रोशनी का अपमान नहीं होने दूँगा। इससे ज्यादा आज के दिन बालकवि बैरागी आपसे क्या कहे? जो भी प्रभु का जुगनू हो, वह मुझे अपना सहोदर समझे। सार्थकता और सफलता के बीच खड़ा होकर मैं कह रहा हूँ कि जीवन निरर्थक नहीं है। ठहाका लगाईए और बीती को बिसार कर, जीवन को नए सिरे से जीना शुरू कीजिए। आकाश उजला और अनन्त है। क्षितिज स्वर्णिम है। धरती की ममता मरी नहीं है।

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