एकोऽहम्
ब्लॉगवाणी याने शुद्ध सोने के गहने नहीं बनते
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वह दशहरे की शाम थी। जबलपुर से भाई गिरीश बिल्लोरे बोल रहे थे। दशहरे के अभिनन्दन और बधाइयाँ ऐसे दे रहे थे मानो शोकान्तिका पढ़ रहे हों। मुझे अचर...
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एक जरूरी किताब
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गोविन्द ने पूछा तो बस यही था - ‘एक किताब दूँ? बुरा तो नहीं मानेगा?’ कोई किताब देने से पहले, ऐसा पूछने का क्या मतलब? फिर , गोविन्द ने जिस तरह...
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वह लौह पुरुष: यह लौह पुरुष
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मैं चाह कर भी ‘आडवाणी’ के साथ ‘जी’ नहीं लगा पा रहा हूँ। अब तक मैं उनसे असहमत, उनसे रुष्ट, उन पर क्रुद्ध रहता रहा। उनका ‘दुराग्रह’ मुझे कभी न...
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बहुत रोई आभा
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बांयें से -श्रीमती द्विवेदी, श्रीमती सुमित्रा रावल, चि. समन्वय, चि. आभा, धर्मेन्द्र रावल, श्री द्विवेदी। सात मई की सुबह इन्दौर पहुँचा तो माल...
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तो, यह है अपना वास्तविक राष्ट्रीय चरित्र
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राष्ट्र और धार्मिक आस्थाओं की बलिवेदी पर अपने प्राण न्यौछावर कर देने की हमारी दम्भोक्तियों की पोल खुल गई है। प्रथमतः तो हमने ऐसी दुहाइयाँ दे...
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भारतीय लोकतन्त्र पर 'संघ' की अकृपा
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भाजपा से जसवन्तसिंह के निष्कासन पर केन्द्रित समाचारों और विश्लेषणों के घटाटोप ने मुझे तनिक परेशान किए रखा। वास्तविकता की बारीक किन्तु तीखी क...
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पहली श्रद्धांजलि मेरे लिए
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उन्नीस अगस्त की सवेरे-सवेरे ही जी कसैला हो गया। एक समाचार तब से लेकर अब तक मन-मस्तिष्क से हट ही नहीं रहा है। वाराणसी से घर लौटते हुए उन्नीस ...
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मरी गायों को दुहने वाले
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अब तक तो मुझे सन्देह ही था किन्तु अब मुझे आकण्ठ विश्वास हो गया है संघ के विहिप, बजरंग दल जैसे आनुषंगिक संगठनों का गौ-प्रेम, पाखण्ड और प्रदर...
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अन्तिम यात्रा/उठावना/शोक निवारण से पहले चक्का जाम
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मेरे कस्बे में, गए कोई दस दिनों में चार घटनाएँ ऐसी हो गईं जिनमें लोगों ने डाक्टरों के साथ हाथापाई, धक्कामुक्की और मारपीट कर दी। इनमें तीन प्...
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आज से चार दिन वाराणसी में
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यदि सब कुछ सामान्य रहा तो, जिस क्षण यह सूचना मेरे चिट्ठे पर प्रकाशित हो रही होगी उस समय मैं मेरी जीवन संगिनी सहित वाराणसी पहुँच चुका होऊँगा।...
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‘ये’ निषेध हमारे चरित्रहीन होने के प्रमाण पत्र
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जब-जब भी लड़कियों/महिलाओं पर ऐसे ‘शील रक्षक’ प्रतिबन्ध लगते हैं तब-तब, हर बार मुझे लगता रहा है मानो मुझे चरित्रहीन, दुराचारी, कामुक, परस्त्री...
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कुटुम्बी/रक्त सम्बन्धी याने मृत्यु की प्रतीक्षा में आतुर
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24 अप्रेल की सवेरे कोई साढ़े आठ बजे कोमल का फोन आया - ‘मामा साहब! गणपति स्थापना कर रहे हैं। पधारिए.’ मैंने उसे बधाई दी और कहा कि पूर्व निर्धा...
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नागरिकता से दूर
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तेरह अगस्त। आधा दिन बीतने को है। तरेंसठवाँ स्वाधीनता दिवस अब छत्तीस घण्टों से भी कम दूरी पर है। मैं खुद को टटोल रहा हूँ और पा रहा हूँ कि निर...
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मैं अकेला बैठा हूँ
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राखी पर मैं घर में अकेला ही बैठा हूँ। पत्नी तो हिम्मत करके मायके चली गई है किन्तु मैं उसके जैसा हिम्मतवाला नहीं हो सका। हर साल की तरह इस साल...
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लोकतन्त्र के मदारी
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चुनाव के दिनों में ‘असामान्य ही सामान्य’ हो जाता है शायद। कहने वाले और सुनने वाले, दोनों ही इसके शिकार हो जाते हैं। शाश्वत सत्य की तरह स्थाप...
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5 लाख का बीमा लेना है। योजना और किश्त रकम बताएं
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पौड़ी गढ़वाल से प्रदीपजी ने पूछा है - ‘मुझे 5 लाख का बीमा कराना हो तो छःमाही किश्त कितनी होगी और कौन सी स्कीम सबसे अच्छी होगी?’ इस प्रश्न का उ...
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किसकी कथा है यह?
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कह नहीं सकता कि यह कथा सागर बाबू की है अथवा नहीं। किन्तु वे इस कथा के जनक-सूत्र अवश्य हैं। यह उनका वास्तविक नहीं, काल्पनिक नाम ही है। श्र...
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