एकोऽहम्

‘जातिगत आरक्षण का विरोध करनेवालों को सस्नेह अर्पित'

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इन दिनों फेस बुक पर मेरी खूब पिटाई हो रही है। कारण है - जातिगत आरक्षण को लेकर की जा रही मेरी प्रस्तुतियाँ। देश भर में, देहातों में, जातिगत ...
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सिंहस्थ से भयभीत

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एक से पन्द्रह मई के बीच, दो दिनों के लिए उज्जैन जाना है लेकिन घबराहट अभी से बनी हुई है। नहीं। न तो सिंहस्थ का पुण्य-लाभ लेना है न ही महाका...
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कौन किस पर गर्व करे?

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यह अभी-अभी, सप्ताह भर पहले की बात है। एक जन समारोह में एक केन्द्रीय राज्य मन्त्री ने दूसरे केन्द्रीय राज्य मन्त्री की उपस्थिति में, भारत स...
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उधार की जिन्दगी : एक बार फिर

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1991 के अप्रेल से मैं उधार की जिन्दगी जी रहा हूँ - मित्रों की दी हुई जिन्दगी। तब मैं चरम विपन्नता की स्थिति में आ गया था। मैं पत्राचार क...
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कीर्तिमानी चीनी झूठ

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चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग आज भारत आ रहे हैं। भारतीय सीमा में चीनी अतिक्रमण और चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय सैनिकों की घेराबन्दी किए ज...
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दोनों अनाथ

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“क्यों? केवल बच्चे ही क्यों? अब तो बूढ़े भी अनाथ हो गए हैं। नहीं?” मेरी उत्तमार्द्ध ने कह तो दिया लेकिन कहते ही खुद ही हक्की-बक्की भी हो ...
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विजय में बदली जा सकती है हिन्दी की पराजय

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विजय में बदली जा सकती है हिन्दी की पराजय - डॉक्टर जयकुमार जलज (ख्यात भाषाविद् जलजजी का यह आलेख 14 सितम्बर 2003 को नईदुनिया ...
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हिन्दी : अपनों के अत्याचार

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  हिन्दी का रास्ता आसान नहीं रह गया है। इसे दोहरा संघर्ष करना पड़ रहा है - चतुर, चौकन्ने अंग्रेजीपरस्तों से और अपने ही असावधान, आलसी, क्रू...
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अब भगतसिंह की बारी है?

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गाँधी और भगतसिंह को परस्पर विरोधी की तरह चित्रित/निरूपित किया जाता है। लेकिन सचाई इसके ठीक विपरीत है। दोनों ही एक दूसरे के मुक्त-कण्ठ प्...
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सरकारी दफ्तर में जाने से पहले

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सरकारी दफ्तर में जाने से पहले - मुकेश नेमा (मुकेश भाई को आप यहॉं पढ चुके हैं।) मैं कोई उपदेश नहीं दे रहा। मैं तो फकत बस इतना ही...
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ग्राहक सेवा याने सीनाजोर कृतघ्नता

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यह एक बीमा कम्पनी और उसके ग्राहक के बीच का एक मामला मात्र नहीं है। यह मामला है - ‘ग्राहक ही भगवान है’ की भारतीय संस्कारशीलता और ‘ग्राहक ...
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बीबीयों की सराय?

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22 अगस्त की अपराह्न मैंने फेस बुक पर, अपनी दीवाल पर निम्नांकित टिप्पणी लिखी - “आज ‘दूरदर्शन नेशनल’ पर दोपहर में, ‘बाम्बे टाकिज’ कार्...
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विष्णु बैरागी
कुछ भी तो उल्लेखनीय नहीं। एक औसत आदमी जिसे अपने जैसे सड़कछापों की भीड़ में बड़ा आनन्द आता है। ‘मैं अपने घर का स्वामी हूँ लकिन यह कहने के लिए मुझे मेरी पत्नी की अनुमति की आवश्यकता होती है।’ - पूरी तरह अपनी पत्नी पर निर्भर। दो बच्चों का बाप। भारतीय जीवन बीमा निगम का पूर्णकालिक एजेण्ट। इस एजेन्सी के कारण धनपतियों की दुनिया में घूमने के बाद का निष्कर्ष कि पैसे से अधिक गरीब कोई नहीं। पैसा, जो खुद अकेले रहने को अभिशप्त तथा दूसरों को अकेला बनाने में माहिर। मेरा पता - ‘मित्र-धन’, 02 पत्रकार कॉलोनी, पोस्ट बॉक्स नम्बर-19, रतलाम - 457001 (मध्य प्रदेश) मोबाइल नम्बर - 098270 61799
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