एकोऽहम्

साकार होती एक लोक कथा

›
प्रायः प्रत्येक अंचल में पाई जानेवाली लोक कथा का ‘वृद्ध पुरुष संस्करण’, (यदि सब कुछ वैसा ही सामान्य बना रहा है जैसा इस क्षण है तो) अपनी पू...
3 comments:

‘नागरिक’ को मिल गया नल कनेक्शन

›
न तो गुस्सा न ही शिकायत। न ही उपहास। बात कोई अनूठी भी नहीं। ऐसा केवल रतलाम में ही नहीं हुआ। सब जगह होता होगा। लिखने का भी कोई मतलब नहीं...
2 comments:

कमरे में दुनिया और बाजार में अकेलापन

›
कल शाम जब उपाध्यायजी से मिलने गया तब तक कल्पना भी नहीं थी कि मैं यह सब लिखूँगा। नहीं, ‘लिखूँगा’ कह कर ठीक नहीं कर रहा। यहाँ ‘लिखना पड़ेगा...
2 comments:

एक आदमी के दो एड्रेस प्रूफ दीजिए

›
यह ‘बाबू राज’ का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसकी शिकायत भी नहीं की जा सकती क्योंकि सुननेवाला कोई नहीं है। मामला भारत सरकार के एक उपक्रम के कार...
6 comments:

बात जरूर कर, लेकिन ‘यूँ ही’ मत कर

›
रतलाम में होता हूँ तो अखबार पढ़ने का मन नहीं होता। लेकिन जब इन्दौर में होता हूँ तो अखबार की तलाश रहती है। काम-धाम कुछ रहता नहीं। फुरसत ही फ...
3 comments:

जरा तलाश करना! इन्हें आप्टे साहब मिले?

›
फेस बुक पर अचानक ही यह तस्वीर नजर आई। कुछ दिन पुरानी है। फिल्मी दुनिया के कुछ लोग प्रधान मन्त्री मोदी से मिलने गए थे। उसी समय की तस्वी...
7 comments:

‘राज’ की नहीं, ‘राज्य’ की चिन्ता करें

›
‘दोनों में डिफरेंस ही क्या है? दोनों एक ही तो हैं अंकल!’ सुनकर मैं चौंका भी और हतप्रभ भी हुआ।  यह 25 जनवरी की अपराह्न है। सत्तरवें गणत...
1 comment:

खाता-बही यहाँ जिन्दा है

›
सुरेश भाई को इस तरह देख कर झटका लगा। विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं इक्कीसवीं सदी में यह देख रहा हूँ। याद नहीं आता कि ऐसा दृष्य इससे पहले...
2 comments:

बस्तर से घिरे जीजाजी

›
जीजाजी ने मुझे जोर का धक्का दिया, बहुत धीरे से। प्रेमपूर्वक। आनन्ददायक।  जीजाजी याने विनायकजी पोतनीस। सुभेदार परिवार के दामाद। हमारी न...
3 comments:

बोहरा सा’ब नहीं मिलते तो.....

›
मैं सचमुच में बड़भागी हूँ जो मुझे बोहरा सा’ब मिल गए। वे क्या मिले, मुझे जीवन-पाथेय मिल गया। वे नहीं मिलते तो पता नहीं कि मैं ‘हाथ का सा...
4 comments:

कॅरिअर और परिवार के सन्तुलन का विकट संघर्ष

›
जीवन अपनी गति से चलता रहता है लेकिन कुछ क्षण ठहरे हुए रह जाते हैं। एक नवम्बर की उस शाम के कुछ मिनिट अब तक ठहरे हुए हैं। आध्या का कुम्हलाया...
6 comments:

ये समझ रहे हैं, रामजी इनके भरोसे हैं

›
26 नवम्बर सोमवार की दोपहर। चुनाव प्रचार अपने चरम पर है। भाजपा और काँग्रेस के उम्मीदवार रैलियों के जरिये, कस्बे के प्रमुख बाजारों में मतदात...
2 comments:
‹
›
Home
View web version

मैं .....

My photo
विष्णु बैरागी
कुछ भी तो उल्लेखनीय नहीं। एक औसत आदमी जिसे अपने जैसे सड़कछापों की भीड़ में बड़ा आनन्द आता है। ‘मैं अपने घर का स्वामी हूँ लकिन यह कहने के लिए मुझे मेरी पत्नी की अनुमति की आवश्यकता होती है।’ - पूरी तरह अपनी पत्नी पर निर्भर। दो बच्चों का बाप। भारतीय जीवन बीमा निगम का पूर्णकालिक एजेण्ट। इस एजेन्सी के कारण धनपतियों की दुनिया में घूमने के बाद का निष्कर्ष कि पैसे से अधिक गरीब कोई नहीं। पैसा, जो खुद अकेले रहने को अभिशप्त तथा दूसरों को अकेला बनाने में माहिर। मेरा पता - ‘मित्र-धन’, 02 पत्रकार कॉलोनी, पोस्ट बॉक्स नम्बर-19, रतलाम - 457001 (मध्य प्रदेश) मोबाइल नम्बर - 098270 61799
View my complete profile
Powered by Blogger.