श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’
की सैंतीसवीं/अन्तिम कविता
‘रेत के रिश्ते’
की सैंतीसवीं/अन्तिम कविता
यह कविता संग्रह
श्री पं. भवानी प्रसादजी मिश्र को
समर्पित किया गया है।
हर बरस तम से लड़ाई
हर बरस तम से लड़ाई
हर बरस यह दीप-माला
हर बरस हर पल अँधेरा
हर बरस इक पल उजाला।
किन्तु फिर भी ये बधाई
किन्तु फिर भी ये बताशे
लग रहे हैं रस्म केवल
लग रहे हैं बस तमाशे।
क्या कहें इस आत्म-सुख को!
धन्य है यह नष्ट पीढ़ी
कह रहा अन्याय जिसको
‘अधमरी, अति भ्रष्ट पीढ़ी।’
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रेत के रिश्ते - कविता संग्रह
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - साँची प्रकाशन, बाल विहार, हमीदिया रोड़, भोपाल
प्रथम संस्करण - नवम्बर 1980
मूल्य - बीस रुपये
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल
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