ऐसे माहौल में कल्पना की जा सकती है कि कोई मन्त्री, चुपचाप त्याग-पत्र दे दे? इतना चुपचाप कि यह चुप्पी चौंेका दे। हैरत में डाल दे। न पीड़ित पक्ष माँगे, न विरोधी दल, न कोई यूनियन न सामाजिक संगठन, न कोई अखबार, न खुद मुख्य मन्त्री, न ही पार्टी का असन्तुष्ट गुट!
लेकिन हुआ है। एक ऐसा ‘चुपचाप त्याग-पत्र’ हुआ है। मध्य प्रदेश में हुआ है।
आगे कुछ जानने से पहले, इस कथा के नायक श्री श्यामसुन्दरजी पाटीदारजी के बारे में थोऽड़ा सा जान लीजिए। वे, मध्य प्रदेश के मन्दसौर जिले के छोटे से गाँव लासूर के देहाती-किसानी पृष्ठभूमि से आये, कानूनों के ज्ञाता, विद्वान् वकील थे। जिला मुख्यालयवाले नगर, भगवान पशुपतिनाथ की नगरी मन्दसौर में बस गए थे। वहीं वकालात करते थे। लेकिन बाद में वकालात छोड़कर मजदूरों-कामगारों की बेहतरी की भावना से राजनीति में आ गए थे। वे बरसों तक मन्दसौर विधान सभा क्षेत्र से विधायक रहे।
1984 का, लोक सभा का मध्यावधि चुनाव, असामान्य स्थितियों में हुआ चुनाव था। यूनियन कार्बाइड का भीषण गैस काण्ड हो चुका था। मरनेवालों की गिनती पर पूर्ण विराम नहीं लग रहा था। हर सुबह अखबारों में मौतों का आँकड़ा बढ़ रहा था। राजनीति या तो चौकड़ियाँ भूल भी रही थी और चौकड़ियाँ मार भी रही थी। अखबारों के लिए अपना मुखपृष्ठ संयोजित करना ‘जानलेवा’ काम बन गया था-गैस काण्ड को ़प्रमुखता दें या चुनावी खबरों को? दादा श्री बालकवि बैरागी मन्दसौर संसदीय क्षेत्र से काँग्रेस के उम्मीदवार थे। वे उस समय विधायक भी थे। मध्य प्रदेश में काँग्रेस की सरकार थी। अर्जुनसिंहजी मुख्य मन्त्री थी। मतदान तीन चरणों में होना था - 24, 27 और 28 दिसम्बर को।
मन्दसौर क्षेत्र का मतदान 27 दिसम्बर को हो चुका था। यह 28 दिसम्बर की शाम थी। हम सब, समीक्षाओं और अनुमानों की जुगाली कर रहे थे। डायलिंग वाले लेण्ड लाइन फोन, रेडियो और अखबार ही संचार-समाचार का माध्यम थे। शाम सात बजे आकाशवाणी के भोपाल-इन्दौर केन्द्र से प्रादेशिक समाचार बुलेटिन प्रसारित होता था। उस 28 दिसम्बर की शाम के प्रादेशिक समाचार बुलेटिन का पहला समाचार था - ‘प्रदेश के श्रम मन्त्री श्री श्यामसुन्दर पाटीदार ने त्याग-पत्र दे दिया है जिसे राज्यपाल ने स्वीकार कर लिया है।’ हम सब चौंके। लेकिन एक और इस बात ने हमें को चौंकाया कि समाचार सुन कर दादा नहीं चौंके। हमने पूछा - ‘आपने सुना?’ दादा ने सहज भाव से कहा -‘हाँ। सुना।’ हम फिर चौंके - ‘आपको अजीब नहीं लगा? आपको कारण मालूम है?’ उसी तरह सहज भाव से दादा ने जवाब दिया - ”कारण न तो किसी ने बताया और न ही मैंने पूछा लेकिन मुझे मालूम है। अजीब तो तब लगता यदि ‘भाई साहब’ स्तीफा नहीं देते।“ पाटीदारजी को हमारे इलाके में (आज भी) ‘भाई साहब’ कहा-पुकारा और जाना-पहचाना जाता है। हम सब भौंचक्के, दादा का मुँह देखने लगे। उसी शान्त भाव-मुद्रा में दादा ने कहा - ‘तलाश करो कि भाई साहब ने स्तीफा कब दिया। उन्होंने स्तीफा आज नहीं दिया होगा। पहले ही दे चुके होंगे।’ हम किससे और कैसे पूछते-तलाशते? हमारी पहुँच ही कितनी थी। हम ‘मियाओं’ की ‘दिल्ली’ तो दादा ही थे और वे ही हमसे तलाश करने की कह रहे थे! बात वहीं आई-गई हो गई।
पूरा किस्सा बाद में, बहुत बाद में मालूम हुआ।
यूनियन कार्बाइड कारखाने में गैस काण्ड हुआ था 2-3 दिसम्बर की सेतु-रात्रि (दरमियानी रात) में। कह सकते हैं, 3 दिसम्बर को। ‘भाई साहब’, 4 दिसम्बर को मुख्यमन्त्री अर्जुनसिंहजी के पास पहुँच गए। श्रम मन्त्री के पद से अपना त्याग-पत्र उन्हें थमाया। उन क्षणों में अर्जुनसिंहजी की स्थिति-मनस्थिति का अनुमान कर पाना अभी भी कठिन ही होगा। हर पल बढ़ता मौतों का आँकड़ा, जिस स्थिति में हर इन्तजाम कम और छोटा पड़ जाए, आदमी संज्ञा-शून्य होने की दशा में आ जाए, उस दशा में मरते लोगों को बचाने के इन्तजामों की चिन्ता, यूनियन कार्बाइड के कर्ता-धर्ता एण्डरसन को भगाए जाने का गम्भीर आरोप, बदहवासी की ऐसी घटाटोप दशा में, एक मन्त्री अपना स्तीफा सौंपने चला आए!
कुछ ही पलों का, वहाँ हुआ वार्तालाप कुछ ऐसा था -
‘यह समय नहीं है इस पर बात करने का। अभी जाइए। बाद में बात करेंगे।’
‘जी। बात बाद में करेंगे। आप यह (त्याग-पत्र) रख लीजिए।’
‘आपसे किसी ने माँगा?’
‘नहीं। किसी ने नहीं माँगा।’
‘तो फिर?।’ ‘मैं स्वीकार नहीं करता।’
‘वह आपका अधिकार है। आप जानें। मैं अपनी आत्मा की अनसुनी नहीं कर सकता। नैतिक जिम्मेदारी मेरी बनती है। मैं स्तीफा दे चुका। वापस नहीं लूँगा। आप अस्वीकार करेंगे तो भी वापस नहीं लूँगा।’
‘ठीक है। मैं रख रहा हूँ। लेकिन आप देख रहे हैं, चुनाव चल रहे हैं। आप इसकी (त्याग-पत्र की) कहीं चर्चा मत कीजिएगा। पार्टी को नुकसान हो सकता है।’
‘जी। ठीक है। आप निश्चिन्त रहिए।’
और, अपनी चिर-परिचित मुद्रा में, विनम्रता से करबद्ध नमस्कार कर, ‘भाई साहब’ लौट आए।
28 दिसम्बर की शाम, मतदान का अन्तिम दौर समाप्त हुआ और ‘भाई साहब’ का त्याग-पत्र स्वीकार करने की खबर आ गई।
31 मार्च 2002 को ‘भाई साहब’ का निधन हुआ। मरणोपरान्त उनके कागज-पत्तर खँगालते हुए उनका ‘यह’ त्याग-पत्र सामने आया। भाई साहब के ‘व्यक्तिगत नैतिक मूल्यों’ के बारे में दादा का अनुमान सौ टका सही निकला। 4 दिसम्बर 1984 की तारीखवाले इस त्याग-पत्र की इबारत है - ‘प्रिय अर्जुनसिंहजी, औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, श्रम मन्त्रालय का विषय है। न केवल मध्य प्रदेश वरन् देश में कल यूनियन कार्बाइड से विषाक्त गैस के रिसाव के कारण भोपाल में हुई त्रासदी अभूतपूर्व अपने प्रकार की है। उसका नैतिक दायित्व मुझ पर है। मुझे इस त्रासदी के लिए खेद है और मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। लोेकतन्त्र के उच्च आदर्शों के अनुरूप मुझे इस पद पर बने रहना उचित नहीं। अतः मैं अपना त्याग-पत्र प्रस्तुत कर निवेदन करता हूँ कि तत्काल प्रभाव से मुझे इस पद से मुक्त करने की कृपा करें। आपके सहयोग और मार्गदर्शन के लिए सदैव आभारी रहूँगा। भवदीय - श्याम सुन्दर पाटीदार।’
‘भाई साहब’ के इस त्याग-पत्र को, आज के जमाने में क्या कहा जाएगा?
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ऊपरवाले चित्र में अपनी पुत्री भारती, नाती दर्पण और नातिन दीप्ति के साथ ‘भाई साहब’। नीचेवाले चित्र में अपने बेटे दर्पण को ‘बर्थ-डे-केक’ खिलाते हुए दामाद भारत भूषण शुक्ला और दोनों को प्रसन्नवदन निहारते हुए ‘भाई साहब’।


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