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ईश्वर से

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की अड़तीसवीं/अन्तिम कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



ईश्वर से

जमींदार......!
ओ अविनाशी जमींदार....!
ओ अगम, अगोचर जमींदार.....!
उठ, जाग जरा, सुन समाचार
तेरी उस अलख जगीरी के
जिसका केवल नाम मात्र का मालिक है तू।

पट्टे, खसरे और खतौनी में है तेरी इन्द्राज
पर सचमुच जिसको हाँक-जोतकर बोते हैं तेरे हाली
नौकर-चाकर, मव्वाली 
हाँ, हाँ ये हैं समाचार
तेरी उस उर्वर धरती के
जिसमें आज तोड़ते दम हैं
तीन अरब अनबोले पौधे ।

कुछ को खाद नहीं मिल पाया
कुछ को मिला नहीं पानी
कहीं अचानक ओले बरसे
कुछ कुँपलाई नई कोंपलें
बेमौसम लू में झुलसानी
कहीं दाह पड़ गया शीत में
कुछ को पाला मार गया
कहीं मवेशी रखवाले का
बिना बाड़ और बिन बागड़ की तेरी खेती
भर-भर पेट डकार गया ।

जमींदार!
ओ अविनाशी जमींदार!
यह ठकुरसुहाती नहीं,
शिकायत नहीं, नहीं फरियाद है
मैं कवि हूँ
या कि पड़ौसी हूँ तेरा
इसीलिए कहता हूँ
तेरी जागीरी बरबाद है

उठ जाग स्वयं कर रखवाली
खुद मेहनत कर, युग बदल गया
शुक्र, चन्द्र, मंगल से आगे
पाँच तत्व का कुटिल कीट यह
हँसते-गाते निकल गया,
अब धरती उसकी जो जोतेगा
तू अपनी भी कुछ चिन्ता कर
मैं आखिर और कहे देता हूँ
चाहे फिर तू जी या मर

अब तेरे सारे खेत बदलने वाले हैं शमशान में
फिर मत कहना कच्ची फसलें
क्यों आई खलिहान में।
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‘दो टूक’ की सैंतीसवीं कविता ‘लिलहारे गोद दे रे लाल तिकोना’ यहाँ पढ़िए 


संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


लिलहारे गोद दे रे लाल तिकोना


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
दो टूक’ की सैंतीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



लिलहारे गोद दे रे लाल तिकोना
(परिवार नियोजन पर, लोक-धुन और लोक शैली पर आधारित एक और गीत।)

लाल तिकोना
देखे मेरा सलौना
लिलहारे गोद दे रे लाल तिकोना!

                    -1-

पहिला फूल बाग में खिला तो मैं खिली
दूसरा खिला तो मुझे गुदगुदी चली
चूम भी न पाई मैं तो इनकी पँखुरियाँ
कसमसाने लग गई है तीसरी कली

इस फागन के खातिर कर दे
लौनी-लौनी बहियाँ पे लाल बिछौना
लिलहारे गोद दे रे लाल तिकोना!

                    -2-

पाँच देव, चार धाम गोदना नहीं
चाँद-सूरज, राम-श्याम गोदना नहीं
फूल या त्रिशूल नहीं कोई चकोरी
हाँ, हाँ मेरे ‘उनका’ नाम गोदना नहीं

तीन लकीरों के तार मिला कर
बीच में उँडेल दे सिंदूर का दौना
लिलहारे गोद दे रे लाल तिकोना!

                    -3-
 
कर रहा है हाय! क्यों तू इतना अचम्भा
कह रहा है लाल किला, कह रही गंगा
खेत कुएँ और ये खलिहान कह रहे
कह रहा है आज मुझसे मेरा तिरंगा

मोल लगा मत, देर लगा मत 
आज तो लगा दे रे लाल डिठौना
लिलहारे गोद दे रे लाल तिकोना!
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


अजन्मे शिशु की याचना

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की छत्तीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



अजन्मे शिशु की याचना
(परिवार नियोजन पर एक मुक्त-छन्द रचना।)

ओ मेरे अनजाने बापू!
ओ मेरी अनजानी जननी!
मुझे कल्पना में ही रखो
अभी अजन्मा ही अच्छा हूँ
सदा तुम्हारा ही बच्चा हूँ
मुझे विवश मत करो कि
मैं पलने में आऊँ।

मेरा मन बेहद निराश है
मेरा धीरज टूट गया है
जहाँ पड़ा हूँ, वहीं ठीक हूँ
मुझे अजन्मा ही रहने दो
ओ मेरी अनजानी जननी!
ओ मेरे अनजाने बापू!

जो भी मेरे भाई-भगिनी
भले एक, दो या कि तीन हों
उनको पालो, उनको पोसो
तुम उनको परवान चढ़ाओ
उन्हें योग्य संस्कार दिला कर
खूब पढ़ाओ
उन्हें देश का दर्द बताना
पूज्य शहीदों की राहों पर
उन्हें लगाना
मुझे अजन्मा ही रहने दो
जहाँ पड़ा हूँ वहीं ठीक हूँ
ओ मेरे अनजाने बापू!
ओ मेरी अनजानी जननी!
मुझे कल्पना में ही रखो।
 
मुझे जनम देकर भी बापू
क्या पाओगे?
देख रहा हूँ समझ रहा हूँ
मुझको सब कुछ सूझ रहा है
मेरी बँधी मुट्ठियाँ ज्यों ही
पहली-पहली बार खुलेंगी
माँ उन पर चुम्बन दे उससे पहले ही
कुछ बद्तमीज मेरे हाथों में
एक-आध झण्डा दे देंगे
ईंट या कि पत्थर दे देंगे
एक-आध डण्डा दे देंगे
मुझे कहेंगे,
खिड़की तोड़ो, शीशे फोड़ो
आग लगाओ, क्रान्ति जगाओ
या फिर डामर का डब्बा देकर के
हुकुम करेंगे
अमुक-अमुक भाषा को पोतो
और अगर मैंने ‘ना’ की तो
तुम खुद सोचो, क्या गुजरेगी
इसीलिए कहता हूँ बापू! 
मुझे अजन्मा ही रहने दो
जहाँ पड़ा हूँ वहीं ठीक हूँ
ओ मेरे अनजाने बापू!
ओ मेरी अनजानी जननी!
मुझे कल्पना में ही रखो

जननी! तुम आँसू लाती हो?
मेरे लिए बहुत व्याकुल हो?
माफ करो माँ!
मुझको सब-कुछ सूझ रहा है
खुली आँख से देख रहा हूँ
मैं यदि आया भी तो जननी!
मेरा पहला बोल उगेगा
उससे पहले ही कुछ घातक
मेरे रतनारे ओठों पर
सड़े, गले, गन्दे नारे जड़ देंगे
और मुझे लाचार करेंगे
कण्ठ खोलकर उनको चीखूँ।
भरी भीड़ में शामिल दीखूँ।
उस दिन तुम ज्यादा रोओगी
बोलो! क्या सुख से सोओगी?
माँ, मुझसे यह नहीं बनेगा
मुझे अजन्मा ही रहने दो
मुझे कल्पना में ही रक्खो
ओ मेरे अनजाने बापू!
ओ मेरी अनजानी जननी!
जहाँ पड़ा हूँ वहीं ठीक हूँ।

इसका मतलब यह मत लेना
मुझको भारत से नफरत है
मेरा भी मन रोता है माँ!
उस धरती पर जनमूँ मैं भी
जिस धरती पर देही पाने
देव, फरिश्ते तक रोते हैं
लेकिन मेरे प्यारे बापू!
मुझ कपूत का जो दुखड़ा है
पहले उस पर गौर करो तुम
मुझे अजन्मा ही रहने दो।
क्या मैं उस धरती पर आऊँ    
‘सुजला’, ‘सुफला’ दो शब्दों का
पावन मतलब
सात समन्दर पार लदे बन्दरगाहों पर
ढूँढ़ा जाता है?
जहाँ पुष्ट बाँहों में फँसा पेट भी
भीख या कि कर्ज लाकर खाता है।
क्या मैं उस धरती पर आऊँ
जिसके यौवन के पंजों में
धरती की छाती चीरे वो
हल ना होकर
वे अखबार रहा करते हैं
जिनमें छपी हुई होती हैं
परदेशी कर्जे की खबरें?
जहाँ कान खुश होते हैं
वे खबरें सुन कर
‘फलाँ देश ने आज हिन्द को
मदद करी है स्वीकृत?’
मुझे अजन्मा ही रहने दो
मुझे कल्पना में ही रक्खो
ओ मेरे अनजाने बापू!
ओ मेरी अनजानी जननी!
मैं अभी अजन्मा ही अच्छा हूँ
सदा तुम्हारा ही बच्चा हूँ

मुझसे नहीं सहा जाएगा
जब मुझको भी कहा जाएगा
चलो! कोयना या बिहार के
पीड़ित श्रम को लूट खाएँ हम
सरहद को कट-पिट जाने दो
झूठे या थोथे नारे पर
टूट जाएँ हम।
मुझे अजन्मा ही रहने दो
मुझे कल्पना में ही रक्खो
ओ मेरे अनजाने बापू!
ओ मेरी अनजानी जननी!
मुझे विवश मत करो कि
मैं पलने में आऊँ।

वैसे भी दायित्व आप पर बहुत बड़ा है
मुझ से पहले ही आँगन
सारा-का-सारा भरा पड़ा है
मुझको ईश्वर का वरदान न मानो
अपने क्षुद्र असंयम के धब्बे से
उस गरीब को दाग नहीं दो
पतझर के पंजों में फँसी हुई
बगिया को आग नहीं दो।
बुद्धि, विवेक, ज्ञान सबके सब
साथ नहीं दे पाते हैं तो 
द्वारे पर विज्ञान खड़ा है
इस युग का भगवान खड़ा है।
उसको पूर्ण समर्पण कर दो
कंचन काया अर्पण कर दो
उससे अभय दान लेकर के
अपने युग की पीर हरो तुम
मुझ कपूत को क्षमा करो तुम।

मुझको इतना-भर बतला दो
मेरा पलना कहाँ बँधेगा?
कहाँ जगह है?
किसका दूध मिलेगा मुझको?
डब्बे का?
वो भी परदेसी?
माँ की चुसी शुष्क छाती में
ना तो दूध और ना लोहू
पहले वाले अधनंगे हैं
अधभूखे हैं,
उनका दर्द बँटाऊँ या फिर
उनका दुःख बढ़ाऊंँ मैं?
समाधान का इच्छुक याचक
घोर समस्या की संज्ञा लेकर
कैसे भू पर आऊँ मैं?
मुझे अजन्मा ही रहने दो
ओ मेरे अनजाने बापू!
ओ मेरी अनजानी जननी!
मुझे कल्पना में ही रक्खो
अभी अजन्मा ही अच्छा हूँ
सदा तुम्हारा ही बच्चा हूँ।
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


ननदी का गीत

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की पैंतीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



ननदी का गीत
(परिवार नियोजन पर, लोक-धुन और लोक शैली पर आधारित एक गीत। इस गीत पर डाक्यूमेण्टरी भी बनी थी। नृत्यांगना मीना टी. ने ननदी की भूमिका निभाई थी।)

ओ भाभी! ओ भाभी!!
ओ भाभी मेरी ओ......!! 
तू चौथा पलना मत बाँध अँगना
बिक जाएगा भाभी तेरा कँगना
चौथा पलना मत बाँध अँगना...
     
                -1-

भैया तो मेरा दीवाना है भाभी
किसने कहा वो सयाना है भाभी
मेरे भैया के सपनों की रानी है तू
उससे तो ज्यादा सयानी है तू
उस पगले की बातों में मत लगना
बिक जाएगा भाभी तेरा कँगना
चौथा पलना मत बाँध अँगना..... 

                -2-

एक कहे बुआ, औ’ एक फूफी,
तीसरे का झगड़ा बाकी है यूँ भी
चौथा लड़ेगा तो मर जाऊँगी
मैं रूठ भी गई तो किधर जाऊँगी
मुश्किल है मेरे ही हाथ रंगना
बिक जाएगा भाभी तेरा कँगना
चौथा पलना मत बाँध अँगना..... 
 
                -3-

आई तो चन्दा सी गोरी थी तू
दूध धुली रेशम की डोरी थी तू
यूँ डोरी में गाँठें न डाल भाभी
तेरे दरपन को होगा मलाल भाभी
बड़ा मुश्किल है दरपन से रूप ठगना
बिक जाएगा भाभी तेरा कँगना
चौथा पलना मत बाँध अँगना....

                -4-

एक दो या ज्यादा से ज्यादा भाभी तीन
काहे बसाती है अँगना में चीन
तू भी सुखी और वे भी सुखी
कुम्हलाए ना मेरी सूरज-मुखी
तेरी बगिया को पतझर से दूर रखना
बिक जाएगा भाभी तेरा कँगना
चौथा पलना मत बाँध अँगना.....

                -5- 

भाभी तेरी ननदी की सीख मान ले
मानी नहीं तो ये ठीक जान ले
जी भर के तुझको सताऊँगी मैं
तेरे कमरे में बिस्तर लगाऊँगी मैं
फिर रोना-तड़पना और खूब बकना
बिक जाएगा भाभी तेरा कँगना
चौथा पलना मत बाँध अँगना.....
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


मंगल-दीप जले

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की चौंतीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



मंगल दीप जले

मंगल दीप जले
धरा पर मंगल दीप जले।

ज्योतित हो मावस का मानस
पावन पुण्य फले
धरा पर मंगल दीप जले।

कलुष कटे जन-गण के मन का
बोझ बँटे हर तरुवर तृण का
आलोकित हो हर घर-आँगन
तम का दम्भ ढले
धरा पर मंगल दीप जले।

मानिक मोती की हो बरखा
सोने का हल हो हलधर का
सुजला-सुफला भारत माँ की
वरदा कोख फले
धरा पर मंगल दीप जले।

कट जाए अपयश की कारा
यश उपजाएँ श्रम के द्वारा
अपना गजरथ अपने पथ पर
अपने आप चले
धरा पर मंगल-दीप जले।

युग की सब पीड़ा पी जाएँ
मनु का सब सन्ताप मिटाएँ
भुज भर भेंट लिए अम्बर से
धरती की सुध लें
धरा पर मंगल-दीप जले।

नव किरणों का अभिवादन हो
संकल्पों का प्रतिपादन हो
साधन को, आराधन अर्पित
युग परिताप टले
धरा पर मंगल-दीप जले।
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


आतप में झुलसा वन

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की तैंतीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



आतप में झुलसा वन  

आतप में झुलसा वन
तृण-तृण कँगनाया
हिरना अकुलाया

मेड़ों की कजराई छूट गई ढेलों पर
मौसम का जूड़ा है अधभूखे बैलों पर
मोर भगे मेड़ों से
अध नंगे पेड़ों से, जेठा टकराया
हिरना अकुलाया
  
सामन्ती सूरज का पाकर उकसावा
चिपट गया छप्पर से किरनों का लावा
बौरों की भीड़ जुड़ी
टेसू की नींद उड़ी, पानी पथराया
हिरना अकुलाया

ऊँघ रही अमराई सन्नाटा आगे
सूरज को सरकावे कौन जरा आगे
तिनकों की आम सभा
चुप्पी का दाँव लगा, सबको बहकाया
हिरना अकुलाया
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


केरल से करगिल घाटी तक

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की बत्तीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



केरल से करगिल घाटी तक

केरल से करगिल घाटी तक,
गौहाटी से चौपाटी तक
सारा देश हमारा

जीना हो तो मरना सीखो
गूँज उठे यह नारा
सारा देश हमारा

लगता है ताजे लोहू पर,जमी हुई है काई
लगता है फिर भटक गई है, भारत की तरुणाई
काई चीरो ओ! रणधीरो
ओ जननी की भाग्य लकीरों
बलिदानों का पुण्य मुहूरत, आता नहीं दुबारा
जीना हो तो मरना सीखो,गूँज उठे यह नारा
सारा देश हमारा...

घायल अपना ताजमहल है, घायल गंगा मैया
टूट रहे हैं तूफानों में, नैया और खिवैया
तुम नैया के पाल बदल दो
तूफानों की चाल बदल दो
हर आँधी का उत्तर हो तुम, तुमने नहीं विचारा
जीना हो तो मरना सीखो, गूँज उठे यह नारा
सारा देश हमारा...

कहीं तुम्हें परबत लड़वा दें, कहीं लड़ा दे पानी
भाषा के नारों में गुम है, मन की मीठी वाणी
आग लगा दो इन नारों में
इज्जत आ गई बाजारों में
कब धधकेंगे सोये सूरज, कब होगा उजियारा
जीना हो तो मरना सीखो, गूँज उठे यह नारा
सारा देश हमारा...

संकट अपना बाल सखा है, इसको गले लगाओ
क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे, मिल कर बोझ उठाओ
भाग्य भरोसा कायरता है
कर्मठ देश कहाँ मरता है
सोचो तुमने इतने दिन में, कितनी बार हुँकारा
जीना हो तो मरना सीखो, गूँज उठे यह नारा
सारा देश हमारा...
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


गोवा की स्मृतियाँ

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की इकतीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



गोवा की स्मृतियाँ

गोआनी मुछआरों की रोमानी जिन्दगी।
सागर की लहरों पर मनमानी जिन्दगी।।
हिचकिचा के फँसती हुई मछली किसी जाल में।
बहुत याद आएगी मुझको भोपाल में।।

तुलसी के चौरे के आस-पास क्रॉस ये।
लोहे पर मिट्टी का बढ़ता विश्वास ये।।
नारियल को देख रहीं अपलक सुपारियाँ।
जाने क्या लिख गई रेत पर कुमारियाँ।।
ताल नहीं, गढ़ा है ये गुईयाँ के गाल में।
हाय राम! भूलूँगा कैसे भोपाल में।।
  
मछली और सोम की गन्ध है बाजार में।
फेरी का प्रणय-पत्र उत्तरित है कार में।।
काजू के छिलकों पर ओठों की छाप है।
पाँच मिनट बारिश और पाँच मिनट साफ है।।
गिरजा भी गुम है, मन्दिर के ख्याल में।
तरस-तरस जाऊँगा, इसको भोपाल में।।

सूरज की सोनाली, चाँद की रुपालियाँ।
माँज रहीं साँझ-सुबह घर-घर में थालियाँ।।
ब्याह दी है बेटियाँ, सह्याद्रि को वरुणेश ने।
हरियाली जुए में हारी मंगेश ने।।
पगलाई प्रकृति यहाँ, सोलहवें ही साल में।
प्राण मेरा लेगी हाय राम! जाकर भोपाल में।।

नयन-नयन सपन और शुचिता की छाँव है।
धानों की मेड़ों पर, सपनों का गाँव है।।
कटहल के तने टिके, किसको अवकाश है।
सूरज की अँजुलि से छहरता प्रकाश है।।
पछुवा बेहाल हुई आखिर उस पाल में।
कैसे छुपाऊँगा, यह सब भोपाल में।।
   
घाटियों में गुम है जो, शायद वे गीत हैं।
हाँ, हाँ, वो कोकणी का छन्द मेरा मीत है।।
अपनी प्यास प्रेयसी की खोज में अधीर है।
मेरे गाल पर भी इसने खींच दी लकीर है।।
कण्ठ में रखूँ या इसे, बाँध लूँ रूमाल में।
चूमूँगा जाकर के इसको भोपाल में।।
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


लगे, फिर श्रम की थाप लगे


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की तीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



लगे, फिर श्रम की थाप लगे

फलें सृजन के स्वर फसलों में
युग यौवन उमगे
लगे, फिर श्रम की थाप लगे।
   
प्यास बुझे प्यासी धरती की
कोख फले बन्ध्या परती की
माटी का मन सुबरन करने
हल का सारा आलस हरने
        नई चेतना लेकर युग का
        गोरखनाथ जगे
        लगे, फिर श्रम की थाप लगे।

सिसको मत भूखे खलिहानों
पीढ़ी का पौरुष पहिचानो
मानिक मोती फिर बरसेंगे
सौ-सौ स्वर्ग तुम्हें तरसेंगे
        सजग सहोदर हैं मेहनत के
        लोहित-लाल सगे
        लगे, फिर श्रम की थाप लगे।

आओ हम कुछ ऐसा कर दें
नये स्वेद का सागर भर दें
लाज रखें नव-तरुणाई की
कालिख धो दें अरुणाई की
        नवल-भैरवी के राते-रंग
        युग के गीत रँगे
        लगे, फिर श्रम की थाप लगे।
                        -----
 



संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


आखिर तुमने भी ठुकराया

 
 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की उनतीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



आखिर तुमने भी ठुकराया

भला करे भगवान तुम्हारा
आँखों को फिर धनी बनाया
आखिर तुमने भी ठुकराया

दोष नहीं है तनिक तुम्हारा
मैं ही हूँ किस्मत का मारा
पत्थर को इन्सान समझकर
लो मैंने भी किसे पुकारा

इससे ज्यादह क्या करते तुम
ठोकर दी और धरम निभाया
आखिर तुमने भी ठुकराया


तुम्हें बधाई खूब रुलाओ
मेरा हर सपना सुलगाओ
ये तो सब यूँ ही चलता है
तुम अपना त्यौहार मनाओ

नालायक हैं सपन मेरे
नाहक तुमको रोष दिलाया
आखिर तुमने भी ठुकराया


बहुत कठिन है मन समझाना
बहते छालों को सहलाना
इससे ज्यादह और कठिन है
इन नयनों की याद भुलाना

मेरा यह गौरव क्या कम है
कुछ तो काम तुम्हारे आया
आखिर तुमने भी ठुकराया
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


घन बालाएँ केश बिखेरे

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की अट्ठाईसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



घन बालाएँ केश बिखेरे

रत्नाकर की राज-सुताएँ
करती हैं उत्पात घनेरे
घन बालाएँ केश बिखेरे

पाकर के ऊषा की आहट
इधर-उधर से आकर नटखट
उलट लाज के सारे घूँघट
लिपट-लिपट जाती सूरज से
निर्वसना ही साँझ-सवेरे
घन बालाएँ केश बिखेरे

भरी दुपहरिया लरज-लरज कर
झूम-झूम कर गरज-गरज कर
लोक-लाज को बरज-बरज कर
मनु-श्रद्धा के कर्मांचल में
कर जाती हैं सौ-सौ फेरे
घन बालाएँ केश बिखेरे

मत पूछो संध्या की बतियाँ
पुरवा को दे-देकर पतियाँ
निठुर ठगारी ये सूरतियाँ
ना जाने किस प्रियतम के हित
चुनती हैं नित लाल कनेरें
घन बालाएँ केश बिखेरे

और रात को देकर ताले
बजा-बजा नूपुर मतवाले
छलका-छलका रस के प्याले
बेसुध कर देतीं चन्दा को
कस-कस कर बाँहों के घेरे
घन बालाएँ केश बिखेरे 
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


मत इतनी वासन्ती रोलो

 
 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की सत्ताईसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



मत इतनी वासन्ती रोलो

थोड़ा सा संयम भी रखो
केसर धीरे-धीरे घोलो
मत इतनी वासन्ती रोलो

गदरी-गदरी हो गई बगिया
रूपम् हुई अरूपम् अँगिया
सतरँग चूनर नवरँग हो गई
फिर भी दिखी न पचरँग पगिया

मेरा रोम-रोम रंग डाला
अपना मन भी तनिक भिंजोलो
मत इतनी वासन्ती रोलो


ये कैसी पिचकारी मारी
ऊमर हो गई भारी-भारी
लाख जनम कर दिए गुलाबी
क्या मरजी है और तुम्हारी

कब ये सारा ऋण उतारेगा
इतनी भी नमती मत तोलो
मत इतनी वासन्ती रोलो


ये कोयल ये भ्रमर निगोड़े 
आ जाते हैं दोड़े-दौड़े
ना जाने क्या-क्या गाते हैं
सुधि के नीरज सभी झिंझोड़े

मुझसे तो सब बिखर गए हैं
अब ये मोती तुम्हीं पिरोलो
मत इतनी वासन्ती रोलो
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


यह किसने रास रचाया

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की छब्बीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



यह किसने रास रचाया

बिखर गया यह किसका कुंकुम
किसने मधु छलकाया
यह किसने रास रचाया

बहका-बहका वन लगता है
महका-महका मन लगता है
उमग उठे आँखों के डोरे
तरसा-तरसा तन लगता है
   
सुधियों की अमिया बौराई
हर सपना पगलाया
यह किसने रास रचाया


मलय पवन पाती क्या लाया
किसने किसको कहाँ बुलाया
क्यों पलाश ने पाँख पसारी
मधुकर को किसने ललचाया

रंग सुरंग रँगे सब किसने
कौन चितेरा आया
यह किसने रास रचाया


वसुधा के सिंगार सुहावन
पुण्य सरिस हर कोंपल पावन
गीत, अगीत सभी सुर लय से
कण-कण एक मुदित वृन्दावन

एकाकार हुए लगते हैं
ब्रह्म, जीव और माया
यह किसने रास रचाया
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


दिन वासन्ती

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की पचीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



दिन वासन्ती

दिन वासन्ती, रात वसन्ती
युग का पुण्य प्रभात वसन्ती

                -1-

पनघट-पनघट रस की बातें
ऋतुराजा की चढ़ी बारातें
दिशा-दिशा से बरस रही हैं
रँग-रस की बरसात वसन्ती
दिन वासन्ती रात वसन्ती
युग का पुण्य प्रभात वसन्ती

                 -2-

बगिया लीपे किरण किशोरी
हाँ, हाँ उस सूरज की छोरी
ऋतु-कुँवरी सरवर में उतरी
लेने को जलजात वसन्ती
दिन वासन्ती रात वसन्ती
युग का पुण्य प्रभात वसन्ती

                -3-

भँवरे गाएँ, कोयल बोले
कोंपल ने सब घूँघट खोले
बगिया-बगिया होने लग गए
यौचन के उत्पात वसन्ती
दिन वासन्ती रात वसन्ती
युग का पुण्य प्रभात वसन्ती
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























 


ये फागुन और याद तुम्हारी

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की चौबीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



ये फागुन और याद तुम्हारी

अँखियाँ हुईं घटा की सखियाँ
पीड़ा की पनिहारी
ये फागुन और याद तुम्हारी

000

शरद धुला अम्बर का आँगन
धरती के कण-कण पर फागन
हर मधुकर के अधर उजागर
हर कलिका की साध सुहागन

मेरी साधें अपराधिन-सी
देखें अलख अटारी
ये फागुन और याद तुम्हारी

000

मादकता किसने बिखराई
बहक गई सारी अमराई
चीर दिया दिल हर टेसू का
नहीं समाती है अरुणाई

वेणु सुनाई पड़ती है पर
पूजे किसे पुजारी
ये फागुन और याद तुम्हारी

000

सारी दुनिया देती ताने
तुम भी आज बने अनजाने
किसके आगे दुखड़ा रोऊँ
मेरी बस मेरा मन जाने

खूब दिया रे देने वाले
तेरी भी बलिहारी
ये फागुन और याद तुम्हारी
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।

 




















कब से तुमको नहीं निहारा

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की तेईसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



कब से तुमको नहीं निहारा      

कब से तुमको नहीं निहारा
साँसों ने सौगन्धें दे-दे
कितनी बार पुकारा
कब से तुमको नहीं निहारा

वन, उपवन, खग, मृग से पूछा
पथ भटके इस जग से पूछा
स्वयं तुम्हारे पद-चिह्नों की
चिर-परिचित सौरभ से पूछा

अम्बर भी अनुमान न पाया
लीलाधाम तुम्हारा
कब से तुमको नहीं निहारा


पूछा अपने उन्मन मन से
पूछा सपनों के बचपन से 
पलकों की पायल से पूछा
पूछा हर घायल बन्धन से
  
हर तोरन से लुटकर लौटा
प्रेरा प्रश्न कुँआरा
कब से तुमको नहीं निहारा


धरती की काया फगुनाई
रस-ऋतु की राधा पगलाई
मेरा ही अन्तःनुर सूना
कलप रहे कुन्तल कजराई

प्राणों के पाहुन आओ भी
कब से खुला किवारा
कब से तुमको नहीं निहारा
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























झर गए पात

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
दो टूक’ की बाईसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



झर गए पात

झर गए पात, 
बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी
झर गए पात.....

            -1-

नव पल्लव के आते-आते
टूट गए सब के सब नाते
राम करे इस नव पल्लव को
पड़े नहीं, यह पीड़ा सहनी
झर गए पात, बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी

            -2-

कहीं रंग है? कहीं राग है
कहीं चंग है, कहीं फाग है
और धूसरित पात-नाथ को
टुक-टुक देखे शाख विरहनी
झर गए पात, बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी

            -3-

पवन पाश में पड़े पात ये
जनम-मरण में रहे साथ ये
‘वृन्दावन’ की श्लथ बाँहों में
समा गई ऋतु की ‘मृगनयनी’
झर गए पात, बिसर गई टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।























लोहिया के प्रति

 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की इक्कीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



लोहिया के प्रति
(डा. राममनोहर लोहिया की मृत्यु पर एक रचना)

ओ बगावत की प्रबल उद्दीप्त
पीढ़ी के जनक!
हम तुम्हें कितना जीएँगे
कह नहीं सकता
न जाने क्या समझकर
आँख मूँद चल दिए हो तुम
हलाहल जो बचा है
हम उसके कितना पिएँगे
कह नहीं सकता!

तुम्हें देखा, तुम्हें परखा
तुम्हें भुगता, तुम्हें समझा
तुम्हें हर रोज पढ़ते हैं
तुम्हारा ढंग अपना कर
कभी हम बात करते हैं
तो वे मूरख समझते हैं कि लड़ते हैं!
मुबारक हो उन्हें उनकी समझ!!

नई भाषा, नई शैली
नए रोमांच के सर्जक!
तुम्हारी हर अदा भरसक सहेजेंगे
अमानत है, 
शिराओं में तुम्हारे स्वप्न
ऐसे छलछलाते हैं कि
हर बेजान गुम्बज को
हमारे स्वप्न से गहरी शिकायत है
मुबारक हो उन्हें उनकी शिकायत!

तुम्हारा ‘वाद’ क्या समझूँ
तुम्हारी जिद, तुम्हारा ढंग प्यारा है
शुरु जो कर गए मेरी जवानी के भरासे कर
सुझे वो जंग प्यारा है।
यकीं रखो कि अन्तिम फैसला होगा वही
जो तुमने चाहा था
तुम्हारा हौसला झूठा नहीं होगा
भले ही टूट जाऊँ मैं, मेरी काया
मेरी रग-रग
मगर संकल्प जो तुमने दिया
टूटा नहीं होगा!

जवानी आज समझी है
कि तुम क्या थे,
तुम्हें जो दर्द था
वह हाय! किसका था।
तुम्हारा अक्खड़ी लहजा
तुम्हारी फक्कड़ी बातें
तुम्हारी खुश्क-सी रातें
न समझो इस लहू ने टाल दी हैं
या कि सदियाँ भूल जाएँगी
न अपना प्राप्य तुमको दे सके हम सब
मगर उसको तुम्हारी
धूल पाएगी!!

करोड़ों उठ गए वारिस
तुम्हारी एक हिचकी पर
कहीं विप्लव कुँआरा
या कि ला-औलाद मरता है?
हमारी धमनियों के तुम
मसीहा थे, मसीहा हो
सुनो!
तुमको बगावत का हर एक क्षण
याद करता है!!
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।

 




















मेरे देश! शकुन ले


 श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘दो टूक’ की बीसवीं कविता 

यह संग्रह दा’ साहब श्री माणक भाई अग्रवाल को समर्पित किया गया है।



मेरे देश! शकुन ले
(स्व. लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु पर एक रचना)

सूरज, चाँद, सितारों की छाती पर सदा-सदा जो लहराता है
वही हमारा अमर तिरंगा
हाय रे! एक बार फिर अकुलाया है
जो इसको थामे निकला था
गंगा की धरती से तनकर
वही हमारा वामन इसको
कफन बना
ललिता के द्वारे
चिर निद्रा में लीन लिपटकर आया है।
जमुना के पावन तीर!
तुम्हारी भी क्या किस्मत है?
बापू, चाचा, लालबहादुर
सबके रथ तुम तक आकर के ठहर गए चुपचाप स्वयं ही,
आजादी के तीन कुम्भ जुड़ गए
तुम्हारे महलों में
कौन पाप मेरी पीढ़ी का फूटा जो
भटक रहा है सारा यौवन आँसू के इन मेलों में?

कल तक लोहू पीने वाले मेरे भारत!
आज अमन की खातिर थोड़ा विष भी पी ले
आँसू पोंछ उठा फिर माथा
इन बदले परिवेशों में जी ले।
ताशकन्द ने अमन दिया है
बेशक हमसे बहुत लिया है।
जो भी हुआ बड़ा वैसा है
लेकिन कोई बात नहीं
लालबहादुर की अरथी को  
मिल जाए कन्धा अयूब का
ये भी कम सौगात नहीं है।
कन्धा! 
वो भी दायाँ कन्धा
बेटों से पहिले बैरी का कन्धा ।
मेरे देश! शकुन ले
कर प्रणाम उस हस्ताक्षर को
जो ललिता के भव्य भाल की बिंदिया के बदले पाया है
मेरा मन तुझसे पहिले अकुलाया है।

ओ अयूब के दाएँ कन्धे!
तूने मेरे महाबली का सिर चूमा है
मैं, मेरा घाव भरा मन, मेरे जलते गीत
अमन के सारे सपने
तुझपर न्यौछावर करता हूँ।
मेरे पनघट, मेरे मन्दिर, मेरे गिरजे, मेरी मस्जिद
मेरी महफिल और चमन ये सारे मेरे
माँग रहे हैं तुझसे वादा सिर्फ यही
कि, हमने अपने हाथों से अपना सूरज तोड, तुझे सौंपे हैं
दो टुकड़े
ये दुनिया जिनको पाकिस्तान कहा करती है
उन टुकड़ों को मेरे खण्डित महासूर्य से, लालच में आकर
जलवा मत देना
किसी गैर से लेकर के फिर टूटी बन्दूकें
अपने पर रख माँ पर गोली चलवा मत देना।
सैंतालीस करोड़ अमन के बन्दे हम
दुआ माँगते हैं कि तुम्हारे ऊपरवाली गर्दन
तनी रहे, कुछ खम न हो,
फिर हाथ हमारा छोटे भाई पर उठे नहीं, और
ताशकन्द से जमना तक की राहों पर
और भले कुछ हो
पर मातम ना हो।
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संग्रह के ब्यौरे
दो टूक (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
पहला संस्करण 1971
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - छः रुपये
मुद्रक - रूपाभ प्रिंटर्स, शाहदरा, दिल्ली।
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यह संग्रह हम सबकी रूना ने उपलब्ध कराया है। रूना याने रौनक बैरागी। दादा स्व. श्री बालकवि बैरागी की पोती। राजस्थान प्रशासकीय सेवा की सदस्य रूना, यह कविता यहाँ प्रकाशित होने के दिनांक को उदयपुर में, सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर कार्यरत है।