ये पण्डित डुबो देंगे धर्म को

बिच्छू पण्डित का बड़ा दबदबा है। आतंकित रहते हैं लोग उनसे। लेकिन उनके बिना काम नहीं चलता। मुहूर्त निकालने-साधने और अनुष्ठान, धार्मिक, मांगलिक प्रसंगों के क्रिया-कर्मों में न तो कोई समझौता करते हैं न ही यजमान या उसके परिजनों का हस्तक्षेप स्वीकार करते हैं। बुरी तरह से डाँट देते हैं। किसी का लिहाज नहीं करते और न ही जगह, मौका देखते हैं। परशुराम के अवतार हो जाते हैं। कहते हैं - ‘धर्म के मामले में कोई समझौता नहीं चलेगा।’  उनके इस स्‍वभाव के कारण ही लोगों ने उनका यह नामकरण किया  है। बिच्छू पण्डित की उपस्थिति का मतलब ही है कि सब कुछ मुहूर्त में और शास्त्रानुसार, विधि-विधान से पूरा होगा। लोग उनसे डरते हैं लेकिन अपने काम उन्हीं से कराते हैं। यजमानी ही उनकी रोजी-रोटी है। दक्षिणा जरूर यजमान की श्रद्धा अनुसार होती है लेकिन अपना पारिश्रमिक खुद ही तय करते हैं।  

अर्चेन्द्र बड़ा भगत है बिच्छू पण्डित का। भगत नहीं, अन्ध-भगत है। उसे भी लग रहा है कि लोग धर्म विमुख हो रहे हैं और सनातन धर्म रसातल में जा रहा है। इसे बचाना जरूरी है। वह इसी काम में लगा रहता है। 

एक दिन अर्चेन्द्र के पिता ने घर पर ब्राह्मण-भोज आयोजित करने की भावना प्रकट की। अर्चेन्द्र ने फौरन हाँ भरी और कहा - ‘ब्राह्मण भोज से एक दिन पहले घर पर यज्ञ-हवन करा लेते हैं और ब्राह्मण-भोजवाले दिन, भोजन से पहले किसी विद्वान् ब्राह्मण का एक व्याख्यान भी करा लेते हैं।’ पिताजी निहाल हो गए। विचार को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी और छूट अर्चेन्द्र को दे दी।

व्याख्यान आयोजनों में उपस्थिति को लेकर अर्चेन्द्र के अनुभव बहुत अच्छे नहीं थे। यह उपक्रम किसी तिथि या प्रसंग से जुड़ा हुआ तो था नहीं। सो, उपस्थिति अधिकाधिक रहे, इस लक्ष्य से अर्चेन्द्र ने तय किया, घर पर किया जानेवाला हवन शनिवार को और व्याख्यान तथा भोजन रविवार को। 

अपनी योजना लेकर अर्चेन्द्र बिच्छू पण्डित के पास पहुँचा। पूरी बात सुनकर पण्डितजी ने पंचांग खोला। पन्ने पलटे। कभी कागज पर लिख कर तो कभी अंगुलियों पर, कोई बीस-बाईस मिनिट तक गणना की और घोषणा की - ‘शनिवार को तो हवन सम्भव ही नहीं।’ अर्चेन्द्र आसमान से धरती पर आ गिरा। उसने बिच्छू पण्डित को समझाने की कोशिश की कि न तो कोई मंगल आयोजन है न ही कोई मुहूर्त साधना है। बस! हवन मात्र करना है। सुबह न हो तो शाम को कर लेंगे। कोई फर्क नहीं पड़ता। बिच्छू पण्डित ने कुपित नेत्रों से अर्चेन्द्र को देख और एक के बाद एक कई ग्रहों और योगों का हवाला देते हुए कहा कि जिस शनिवार की बात अर्चेन्द्र कर रहा है उस शनिवार को तो हवन करने का सोचा भी नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि बहुत ही आवश्यक है तो शनिवार से पहलेवाले गुरुवार को हवन कराया जा सकता है। सुन कर अर्चेन्द्र पशोपेश में पड़ गया। हवन गुरुवार को याने व्याख्यान शुक्रवार को और शुक्रवार तो अच्छा-भला कामकाजी दिन! सुननेवाले कैसे आएँगे? व्याख्यान तो फ्लाप हो जाएगा! उसने बिच्छू पण्डित से चिरौरी की - ‘गुरु! जरा एक बार और ध्यान से देख लो! कोई रास्ता निकलता हो।’ सुन कर बिच्छू पण्डित आपे से बाहर हो गए। मानो अर्चेन्द्र को धक्के देकर फेंक देंगे, कुछ इस तरह कहा - ‘तू तो मुझे जानता है! मैं धरम के काम में समझौता नहीं करता। फौरन निकल जा यहाँ से।’

बिच्छू पण्डित का स्वभाव जानता था अर्चेन्द्र। इसलिए उसने बुरा नहीं माना। मरी-मरी आवाज में कहा - ‘ठीक है गुरु! गुरुवार को हवन करवा देना।’ बिच्छू पण्डित खुश हो गए। हवन की पूरी रूपरेखा और पारिश्रमिक की रकम तय कर अर्चेन्द्र लौट आया। पिताजी को बताया। हवन गुरुवार को हो या शुक्रवार को। पिताजी को कोई फर्क नहीं पड़ना था। 

पूरा खाका अर्चेन्द्र के मन में शुरु से ही साफ था। व्याख्यान हेतु विद्वान् ब्राह्मण से उसने पहले की कच्ची बात कर रखी थी। तारीख तय होते ही बात पक्की कर दी। ताबड़तोड़ निमन्त्रण पत्र छपवाए। फोन और वाट्स एप पर सबको खबर कर दी। अपनी व्यवस्थाओं को लेकर वह पहले ही क्षण से निश्चिन्त था। अब उसने पूरा ध्यान, व्याख्यान में अधिकाधिक उपस्थिति पर केन्द्रित कर दिया। 

वह इसी काम में लगा था कि वह हो गया जिसने अचेन्द्र के विश्वास के वट-वृक्ष को जड़ सहित उखाड़ दिया।

जिस गुरुवार को हवन होना तय हुआ था, उससे पहलेवाले रविवार को बिच्छू पण्डित का फोन आया। वे कह रहे थे कि शनिवार को हवन सम्भव है। अर्चेन्द्र चाहे तो वे शनिवार को हवन करा देंगे। अर्चेन्द्र उलझन में पड़ गया। बात तो उसके मन की थी लेकिन कमान से तीर छूट चुका था। अब बदलाव मुमकिन नहीं था। अर्चेन्द्र ने कहा - ‘अब तो कुछ नहीं हो सकता गुरु! निमन्त्रण बँट गए, हलवाई और भोजन की जगह तय हो गई। लेकिन यह गुंजाइश कैसे निकल आई गुरु? उस दिन तो आपने साफ कह दिया था कि शनिवार को कोई हवन ही नहीं हो सकता। अब कैसे हो गया?’ बिच्छू पण्डित ने ‘वो ऐसा है। वो वैसा है! वो उस दिन उधर ध्यान नहीं गया।’ जैसे जवाब दिए। लेकिन अर्चेन्द्र के गले नहीं उतरी। उसने कहा - ‘गुरु! आपसे ऐसी चूक हो ही नहीं सकती। आपने तो उस दिन आधे घण्टे तक पंचाग उल्टा-पुल्टा था और ढेर सारी गणनाएँ की थीं। आधा घण्टा कम नहीं होता गुरु! कोई गुंजाइश होती तो आप बता देते। कोई दूसरा पंचाग तो नहीं देख लिया?’ जवाब में सफाइयाँ देने की रौ में बहकर बिच्छू गुरु ने एक बात ऐसी कह दी कि अर्चेन्द्र चेतनाविहीन, जड़ हो गया। बिच्छू पण्डित ने कहा - ‘ये सब तो देखने में मैं चूका ही लेकिन अभी-अभी खबर मिली कि उस शनिवार को मैंने बड़नगर में जो हवन कराने की हाँ भर रखी थी, वह प्रोग्राम केंसल हो गया है। अब मैं शनिवार को फ्री हूँ। चाहो तो शनिवार को हवन करा लो।’

अर्चेन्द्र को काटो तो खून नहीं। उसके जी में आया कि फोन में ही हाथ डालकर बिच्छू गुरु की गर्दन मरोड़ दे। कोई ग्रह और कोई कुयोग आड़े नहीं आ रहा था। उस दिन उन्हें बड़नगर जाना था इसलिए उस शनिवार को हवन का होना ही निषिद्ध कर दिया! सारा मामला बिच्छू पण्डित के पारिश्रमिक का था। वे धरम के काम में समझौता नहीं करते लेकिन अपने पारिश्रमिक की मोटी रकम के लिए धरम की बलि चढ़ा सकते हैं। अर्चेन्द्र तो समझ रहा था कि सनातन धर्म ही उनका धर्म है। लेकिन अब वे ही बता रहे हैं कि उनका धर्म तो उनके पारिश्रमिक की रकम है। अर्चेन्द्र ने खुद पर काबू किया। यह कह कर फोन बन्द कर दिया कि हवन तो गुरुवार को ही होगा। वे समय पर आ जाएँ।

गुरुवार को हवन और शुक्रवार को व्याख्यान तथा भोजन हो गया। अर्चेन्द्र की मेहनत रंग लाई। उपस्थिति उसकी अपेक्षानुरूप ही रही। पिताजी प्रसन्न हुए। उनकी आत्मा तृप्त हुई उन्होंने अर्चेन्द्र को खूब आशीष दिए।

यह सब मुझे सुनाने अर्चेन्द्र आया था। बहुत गुस्से में था। बिच्छू पण्डित को भारी-भारी गालियाँ दे रहा था। मैं बार-बार उसे समझाऊँ और वह हर बार पटरी से उतर जाए। कोई बीस-पचीस मिनिट बैठ कर (और बिच्छू पण्डित का वाचिक दाह संस्कार कर) लौटा। जाते-जाते कह गया - ‘ये स्साले पण्डित! इन्हें न भगवान पर भरोसा न ही भाग्य पर। अपने पुरुषार्थ पर भी भरोसा नहीं। जब बिच्छू गुरु ही ऐसा करें तो बाकी की क्‍या बात करें? ये करेंगे धरम की रक्षा? ये तो धरम को बेच खाएँगे। डुबो देंगे सनातन धर्म को।’

मैं क्या कहता? कहता भी तो किससे? अर्चेन्द्र तो जा चुका था।
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(इस प्रसंग के दोनों पात्र जीवित हैं और रतलाम में ही हैं। अर्चेन्द्र की सुरक्षा और बिच्छू पण्डित के कोप के भय से नाम बदल दिए हैं। भय यह भी रहा कि बिच्छू पण्डित मुझ पर मानहानि का मुकदमा न लगा दें। इन दिनों ऐसे मुकदमों का मौसम जो आया हुआ है। )