हमारी हिन्दी: हम केवल चिन्ता करते हैं

हिन्दी दिवस पर मुख्य अतिथि बनने के, दो संस्थाओं के न्यौतों को अस्वीकार कर दिया। अब जी ही नहीं करता ऐसे आयोजनों में जाने का। सब कुछ खानापूर्ति, औपचारिकता, नकली, बनावटी लगता है। ऐसे आयोजनों में शामिल लोगों की हँसी और हिन्दी की दुर्दशा पर उनका विलाप-प्रलाप भी नकली, खुद से बोला जा रहा झूठ लगता है। हर कोई हिन्दी की दुर्दशा के प्रति क्षोभ और आक्रोश तो जताता है लेकिन जब खुद कुछ करने की बात आती है तो मानो लकवा मार जाता है।

अपने छुट-पुट शारीरिक कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भाई ओम चौरसिया के योग केन्द्र का लगभग नियमित लाभार्थी हूँ। जिस खेप में मैं जाता हूँ उसमें आठ-दस लोग हैं। तीन दिन पहले एक ने कहा - “हिन्दी की तो ऐसी-तैसी करके रख दी है लोगों ने। एक ने अपने मकान का नाम ‘माँ की दूआ’ लिखा है। उसे ‘दुआ’ और ‘दूआ’ का फर्क ही नहीं मालूम।” सब खुल कर हँसे। मैं चुप था। एक ने मुझे उकसाया - ‘कमाल है! आपने कुछ नहीं कहा! आपको तो सबसे पहले बोलना था।’ मैंने उसी से पूछा - ‘आपने अपने मकान पर नाम लिखवा रखा है?’ जवाब हाँ में आया। मैंने पूछा - ‘हिन्दी में लिखवाया है?’ कोई जवाब नहीं आया। मैंने कहा - ‘कोई बात नहीं। अब उसे हिन्दी में लिखवा लीजिए।’ तुरन्त जवाब आया - ‘ऐसे कैसे लिखवा लूँ? सीमेण्ट से लिखवा रखा है! हिन्दी में लिखवाने पर तो दो-चार हजार का फटका लग जाएगा।’ मैं चुप रहा। बाकी सब भी चुप रहे। शायद सबने ऐसा ही कुछ कर रखा होगा। मैंने पूछा - ‘चलो! कोई बात नहीं। लेकिन आप दस्तखत हिन्दी में करते हो?’ जवाब, झेंप भरे ‘नहीं’ में आया। मैंने कहा - ‘हिन्दी में दस्तखत करने में तो एक पैसे का भी फटका नहीं लगेगा। आप हिन्दी में दस्तखत करना शुरु कर दीजिए।’ इस बार अधिक झेंप भरा जवाब आया - ‘बहुत मुश्किल है। उसकी तो आदत ही नहीं।’ 

कभी किसी बोली के तो कभी किसी भाषा के विलुप्त होने की जानकारी आए दिनों विभिन्न स्तर के सर्वेक्षण देते हैं। पहले मुझे ये सच नहीं लगते थे। लेकिन अचानक ही अपने आसपास नजर गई तो इन सूचनाओं पर विश्वास करना पड़ा। मैं तीन परिवारों से चार बोलियों को लुप्त होते देख रहा हूँ। दो परिवार तो मेरे बेटों के ही हैं। बड़े बेटे का सुसराल निमाड़ अंचल में है। यह दम्पति अब न तो मालवी में बात करता है न ही निमाड़ी में। हिन्दी में ही बतियाता है। इनका बेटा (हमारा पोता) कभी निमाड़ी और/या मालवी बोली के बारे में शायद ही जान पाए। स्कूल में वह अंग्रेजी वातावरण में ही रहता है। इस परिवार से दो समृद्ध बोलियाँ बिदा हो रही हैं।

दूसरा परिवार मेरे छोटे बेटे के ससुराल का है। समधी दिनेशजी चौरसिया बृज पृष्ठभूमि के हैं और समधन रीनाजी पंजाबी पृष्ठभूमि की। इनकी बहू आरती मालवी पृष्ठभूमि की। कहने को यह परिवार तीन-तीन बोलियों से जुड़ा है लेकिन पूरा परिवार हिन्दी में ही संवाद करता है। इस परिवार में न तो बृज बोली जाती है, न पंजाबी न ही मालवी। 

तीसरा परिवार मेरे छोटे बेटे का है। वह मालवी पृष्ठभूमि का है। बहू नन्दनी (चौरसिया परिवार की बेटी) की अपनी कोई बोली नहीं रही। यह दम्पति भी हिन्दी में बात करता है। हम जब भी इनके पास जाते हैं तो नन्दनी, विस्फारित नेत्रों से हम पति-पत्नी को मालवी में बात करते देखती है। इन तीनों परिवारों की पृष्ठभूमि में सम्पन्न बोलियाँ हैं लेकिन अब एक भी बोली इन परिवारों नहीं रही। 

मैं यथा सम्भव मालवी में ही बात करने की कोशिश करता हूँ। मालवी में बात शुरु करते ही सामनेवाला ‘सहज’ से आगे बढ़कर ‘आत्मीय’ हो जाता है। आत्मीयता के साथ-साथ मिठास अपने आप चली आती है। रतलाम में तो मुझे हर बार मालवी में ही जवाब मिलता है लेकिन रतलाम से बाहर (मालवा में ही) ऐसा नहीं होता। इन्दौर में मेरा डेरा, बंगाली चौराहे के पास, सर्व सुविधा नगर में रहता है जबकि मेरे मिलनेवाले राजवाड़ा से आगे के इलाकों में। मुझे सिटी बस में यात्रा करना अच्छा लगता है। कनाड़िया सड़क से महू नाका और फिर उससे आगे वैशाली नगर तक मैं एक लघु भारत के साथ यात्रा कर लेता हूँ। मालवी तो बनी ही रहती है, भोजपुरी, अवधि, बुन्देली, पूरबी, मराठी, गुजराती भी खूब सुनने को मिलती है। कभी-कभार हिम्मत करके मैं बीच में, मालवी में ही कूद पड़ता हूँ। अपनी-अपनी बोली में बतिया रहे गैर मालवी लोग स्वाभाविक ही मुझे हिन्दी में जवाब देते हैं। लेकिन मालवी में बतिया रहे लोग भी हिन्दी में जवाब देते हैं। मेरी मन्दसौरी-रतलामी मालवी और इन्दौरी मालवी में उन्नीस-बीस का अन्तर है। इस उम्मीद में कि मुझे मालवी में जवाब मिलेगा, मैं बिना बात के बात बढ़ाने की कोशिश करता हूँ। लेकिन जवाब हिन्दी में ही आता है। हिन्दी भी अंग्रेजी चाशनी से लिपटी। 

बंगाली चौराहे का और तिलक नगर का सब्जी बाजार भी लघु भारत अनुभव होता है। वहाँ मालवी में भाव-ताव करता हूँ तो पहली बार तो हिन्दी में ही जवाब मिलता है। दूसरी बार में मालवी आ जाती है। लेकिन इन बाजारों में मालवी बोलनेवाले दुकानदार धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। लेकिन शास्त्री पुल पार करते ही बोलियों की विविधता छँट जाती है और मालवी सवाल का जवाब हर बार मालवी में ही मिलता है। यह दशा ठेठ वैशाली नगर तक बनी रहती है।

लेकिन व्यापारिक सन्दर्भों में ऐसा बिलकुल ही नहीं है। वहाँ अंग्रेजी ही अंग्रेजी है। दुकानों के नाम या उनके कागज-पत्तर, सब अंग्रेजी में। एक दुकान पर बड़ा मजा आया। दुकान का साइन बोर्ड अंग्रेजी की चौथी बारहखड़ीवाली लिपि में था। कलाकार ने मानो अपनी समूची प्रतिभा झोंक दी थी। संयोग से मुझे उसी दुकान में जाना पड़ा। दुकान के नाम और भीतरी व्यवस्था में बड़ा विरोधाभास था। दुकान में नजर आ रहे धार्मिक चित्र/प्रतीक, दुकान के नाम से कहीं भी मेल नहीं खा रहे थे। मैंने पूछा - “यह क्या? दुकान पर नाम तो ‘बाबूअली’ लिखवाया है और मूर्ति भगवान महावीर की!” दुकानदार चौंका। उसने बाहर आकर, दुकान से दूर जाकर, साइन बोर्ड पढ़ा। लौट कर तनिक चिन्ता से बोला - “आप ठीक कह रहे हो। मैंने लिखवाया तो ‘बाहुबली’ था। लेकिन आपने कहा तो मुझे भी ‘बाबूअली’ ही नजर आया। आज ही दुरुस्त करवाता हूँ।” मैंने कहा - ‘दुरुस्त करवा ही रहे हैं तो हिन्दी में लिखवा लेना। तब लोग गलत नहीं पढ़ेंगे।’ दुकानदार ने विनम्रता से धन्यवाद देते हुए कहा - ‘बिलकुल। अब हिन्दी में ही लिखवाऊँगा।’ इस घटना के अपने-अपने भाष्य किए जा सकते हैं। अपनी भाषा की उपेक्षा के खतरे असीमित होते हैं।

हिन्दी आज वहीं है जहाँ हम उसे ले आए हैं। हम इसकी दुर्दशा से दुःखी तो होते हैं किन्तु खुद कुछ नहीं करना चाहते। हिन्दी अखबारों ने हिन्दी का सर्वाधिक नुकसान किया है और किए जा रहे हैं। बची-खुची कसर, रोमन में हिन्दी लिखने का चलन पूरी कर रहा है। 

हिन्दी और अपनी बोलियों के प्रति यदि हमारा यही चाल-चलन रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम संकेतों और चिह्नों से ही खुद को व्यक्त करते नजर आएँगे। फेस बुक और वाट्स एप ने यह शुरुआत कर दी है। हमारी पीढ़ियाँ हमारी भाषाओं, बोलियों और लिपियों को संग्रहालयों में देखने-सुनने जाया करेंगी।

संस्कार, वे चाहे भाषायी हों या सांस्कृतिक, सदैव घर से शुरु होते हैं और उनका सार्वजनिक आचरण ही उन्हें पुष्ट, दृढ़ और हमारी पहचान बनाता है।
-----
दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 13 सितम्बर 2018