‘नोटा’ बन गया ‘सोटा’: जीत गया तो फिर से होंगे चुनाव

यह किसी सपने के सच हो जाने जैसा है। 

हमारे मँहगे चुनाव मुझे देश में व्याप्त आर्थिक भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण लगते हैं। धनबली और बाहुबली लोग विधायी सदनों पहुँचकर हमारी तकदीरों से खेलते हैं। ‘इण्डिया’ के लोग ‘भारत’ की तकदीर बनाने का ठेका ले लेते हैं। वास्तविक जन प्रतिनिधि विधायी सदनों में पहुँच ही नहीं पाते।

इनसे मुक्ति पाने के लिए मुझे ‘नोटा’ प्रभावी, परिणामदायी हथियार अनुभव होता है। लेकिन उसका वर्तमान स्वरूप मुझे और क्षुब्ध कर देता है। इसका वर्तमान स्वरूप, उम्मीदवारों के प्रति मतदाताओं की नाराजी, असहमति तो जरूर प्रकट करता है लेकिन  किसी को जीतने से रोक नहीं पाता। अपनी इसी बात को लेकर मैं 05 अक्टूबर 2018 को, ‘नोटा’ को उम्मीदवार की हैसियत दिए जाने की बात कही थी। तब मुझे सपने में भी गुमान नहीं था कि डेड़ माह से भी कम अवधि में मेरी मुराद पूरी होने की शुरुआत हो जाएगी। कल, 13 नवम्बर को अचानक ही मुझे जानकारी मिली कि ‘नोटा’ को उम्मीदवार मान लिया गया है और यदि इसे सबसे ज्यादा वोट मिल गए तो वहाँ फिर से चुनाव कराया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने 27 सितम्बर 2013 को ‘नोटा’ का बटन, मतदान मशीन पर उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। लेकिन आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि किसी चुनाव में ‘नोटा’ को तमाम उम्मीदवारों से ज्यादा मत मिल जाएँ तब भी, (‘नोटा’ के बाद) सर्वाधिक मत हासिल करनेवाले उम्मीदवार को विजयी घोषित कर दिया जाए। याने, चूँकि ‘नोटा’ कोई उम्मीदवार नहीं है इसलिए वह जीत कर भी हार जाएगा और उसे मिले मत, निरस्त मत माने जाएँगे। 

लेकिन महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग (मरानिआ) इस स्थिति से एक कदम आगे बढ़ गया है। ‘मरानिआ’ के सचिव शेखर चन्ने के अनुसार अब (महाराष्ट्र में) किसी चुनाव/उप चुनाव में यदि ‘नोटा’ को सर्वाधिक मत मिले तो किसी भी उम्मीदवार को विजयी घोषित नहीं किया जाएगा और वहाँ (उस पद के लिए) फिर से चुनाव कराया जाएगा। श्री चन्ने के अनुसार यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। 

लेकिन यह आदेश फिलहाल महाराष्ट्र के समस्त नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों के चुनावों, उप चुनावों में ही लागू होगा।

श्री चन्ने के अनुसार, ‘नोटा’ के वर्तमान स्वरूप में मतदाताओं की नकारात्मकता अनदेखी रह जाती है इसलिए यह प्रावधान किया गया है। इसमें ‘नोटा’ को ‘काल्पनिक चुनावी उम्मीदवार’ (Fictional Electoral Candidate) माना जाएगा और यदि चुनावी उम्मीदवारों को इस ‘काल्पनिक चुनावी उम्मीदवार’ से कम मत मिले को कोई भी उम्मीदवार विजयी घोषित नहीं किया जाएगा और वहाँ (जिस पद के लिए यह चुनाव हुआ था, उस पद के लिए) फिर से चुनाव कराया जाएगा।

हालाँकि यह अधूरी जीत है किन्तु यह पूरी जीत की शुरुआत है। ‘मरानिआ’ का क्षेत्राधिकार चूँकि केवल राज्यस्तरीय निकायों तक सीमित है इसलिए उसने अपने क्षेत्राधिकार के मतदाताओं को यह ताकत दे दी। यह शुरुआत यहीं नहीं रुकेगी। यह ‘छूत की बीमारी’ की तरह फैलेगी ही फैलेगी। एक के बाद एक, अन्य राज्य भी अपने मतदाताओं को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए इस प्रावधान को लागू करेंगे और अन्ततः बात भारत निर्वाचन आयोग तक पहुँचेगी ही पहुँचेगी। इसमें देर लग सकती है लेकिन ऐसा होना तो तय हो गया है।

मतदाताओं को अधिक ताकतवर बनाने के लिए, उनकी नापसन्दगी को स्वीकृती दिलाने हेतु, चुनाव सुधारों के लिए काम कर रहे अनेक एक्टिविस्ट और एनजीओ, ‘नोटा’ का प्रावधान लागू होने के ठीक बाद से लगातार माँग कर रहे हैं कि किसी चुनाव में ‘नोटा’ को सर्वाधिक मत मिलने की दशा में वहाँ फिर से चुनाव तो कराया ही जाए, मतदाताओं के इंकार को स्वीकृती देते हुए, उस चुनाव में, ‘नोटा’ के जरिए खारिज किए गए तमाम उम्मीदवारों को फिर से उस चुनाव के लिए अयोग्य भी घोषित किया जाए।

हमारे राजनेता देश को और देश के लोगों को जिस मुकाम पर ले आए हैं उसके चलते यह सब होगा। होकर रहेगा। देश को मँहगे चुनावों से मुक्ति मिलेगी, एक औसत आदमी चुनाव लड़ सकेगा, वास्तविक जन प्रतिनिधि विधायी सदनों में नजर आएँगे। आर्थिक भ्रष्टाचार यदि समूल नष्ट नहीं भी हुआ तो भी वह न्यूनतम स्तर पर आएगा। राजनीतिक दलों के, दरियाँ-जाजम उठाने-झटकारनेवाले, झण्डे-डण्डे उठानेवाले मैदानी कार्यकर्ताओं की पूछ-परख होगी। ऐसी बातों की बहुत लम्बी सूची है। वे सब होंगी।

शुरुआत हो चुकी है। विधायी सदनों में बैठे तमाम नेता, अपने सारे मतभेद भुलाकर इसे रोकने में जुट जाएँगे। मुमकिन है, कुछ बरसों तक वे इसे रोक भी लें। लेकिन वे अन्ततः परास्त होंगे। वही ‘जनता-जनार्दन’ की जीत होगी।

अँधरे को प्रकाश की अनुपस्थिति कहते हैं। लेकिन वह तो एक प्राकृतिक स्थिति है। अँधेरा दूर करने के लिए उजाला करना पड़ता है। छोटे-छोटे जुगनू लगातार जूझ रहे हैं। हर रात की एक सुबह होती ही है। लेकिन वे इस भरोसे चुपचाप नहीं बैठेंगे। वे सुबह लाने तक रुकेंगे नहीं। चैन से नहीं बैठेंगे। वे सुबह लाकर ही मानेंगे।
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(यह पोस्ट मैंने, इण्डियन एक्सप्रेस के मुम्बई संस्करण में, दिनांक 13 नवम्बर 2018 को प्रकाशित समाचार के आधार पर लिखी है। इस समाचार की लिंक मुझे, ग्वालियरवाले श्री  विष्णुकान्त शर्मा Vishnukant Sharma की फेस बुक वॉल से मिली है।  श्री शर्मा की वॉल पर उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार वे, इस पोस्ट के लिखे जाने के समय तक, 28 नवम्बर को हो रहे विधान सभा चुनावों में ग्वालियर विधान सभा क्षेत्र 15 से प्रत्याशी हैं। 

मेरा अंग्रेजी ज्ञान बहुत कम है। मैंने, परम् सद्भाव और सदाशयता से, अपनी सूझ-समझ के अनुसार इस समाचार का यथासम्भव समुचित हिन्दी भावानुवाद किया है। समाचार का जो हिस्सा मुझे समझ नहीं पड़ा, वह मैंने छोड़ दिया है। मुझसे यदि कोई चूक हुई हो तो कृपया मुझे अविलम्ब सूचित कीजिएगा ताकि मैं खुद को सुधार सकूँ। मुझे प्राप्त समाचार लिंक यहाँ दे रहा हूँ।)