पुल के नीचे वकील सा’ब

शरारत करने में गोपाल पूरी तरह ‘समाजवादी’ था। शरारत
की गम्भीरता और घनत्व के लिहाज से सबको समान रूप से ‘उपकृत’ करता था। अन्तर होता था केवल शरारत की शैली पर। यह शैली सामनेवाले की उम्र के हिसाब से तय होती थी। अपने से छोटों को लड़ियाते-हड़काते तो हमउम्रों से उन्मुक्त खिलन्दड़पने से तो वरिष्ठों से पूरा लिहाज पालते हुए। शर्त यही होती कि शरारत करने काबिल बात उसकी जानकारी में आ जाए। उसकी शरारत से लोग ‘त्रस्त और मस्त’ रहते थे। जिनसे शरारत न की उन्हें शिकायत रहती - ‘गोपाल मेरी ओर देखता ही नहीं।’ जो ‘उपकृत’ हो गया वह कहता - ‘बदमाश ने आज लपेटे में ले लिया। लेकिन यार! कुछ भी कहो, मजा आ गया।’ उसकी सजा में मजा आता था और मजे के लिए लोग उसकी सजा का इन्तजार करते थे।

एक दिन बम सा’ब भी इसी दशा को प्राप्त हो गए। 

बम सा’ब मनासा के वकीलों की पहली पीढ़ी में शामिल अग्रणी वकील थे। आज से ठीक बाईस बरस पहले, 68 वर्ष की उम्र में उनका अवसान हुआ। उस जमाने में सम्भवतः सबसे मँहगे वकीलों में से एक। मनासा से दो किलोमीटर दूर बसे गाँव भाटखेड़ी के मूल निवासी बम सा’ब का पूरा नाम रतनलाल बम था। फर्राटेदार अंग्रेजी में वकालात करते थे लेकिन काला कोट उतारते ही मूल मालवी स्वरूप में आ जाते थे। तब वे हिन्दी से एक सीढ़ी नीचे उतर कर मालवी में ही बतियाते। मस्तमौला और यारबाज मिजाज के। खुलकर हँसना, ठहाके लगाना उन्हें अलग पहचान दिलाता था। उनका यह मिजाज उन्हें यथेष्ट लोकप्रिय बनाए हुए था। 

एक दिन सुबह-सुबह गोपाल, बम सा’ब के घर पहुँच गया। बगल में मुंशी की डायरी दबाए। डायरी में एक अखबार फँसा हुआ। असमय गोपाल को आया देख बम सा’ब का माथा ठनका। मूँदड़ा वकील सा’ब का मुंशी सुबह-सुबह बम वकील सा’ब की इजलास में क्यों और कैसे? लेकिन गोपाल केवल मुंशी तो था नहीं! जरूर कोई खास बात है। यह खास बात क्या हो सकती है? यह गोपाल है! कुछ भी कर सकता है। इसी उहापोह और उत्सुकता भाव से बम सा’ब ने पूछा - ‘आज हवेराँ ई हवेराँ यें कें?’ (आज सुबह-सुबह ही इधर किधर?’)

चिन्ता भाव से, नीची नजर किए, गम्भीर स्वर में गोपाल ने सवाल किया - ‘आप, वटे, पुल के नीचे कई करी रिया था?’ (आप, वहाँ, पुल के नीचे क्या कर रहे थे?)’

बम सा’ब चौंके। मानो बिजली का करण्टदार नंगा तार छू गया हो, कुछ इस तरह चिहुँक कर बोले - ‘कशो पुल?’ (कौन सा पुल?)

नजरें नीची किए, शान्त संयत स्वर में गोपाल ने जवाब दिया - ‘उई’ज, जणीके नीचे आप मल्या।’ (वही, जिसके नीचे आप मिले।)

कस्बे के नामी वकील को एक मुंशी ने सुबह-सुबह उलझा दिया। तनिक झुंझलाकर बम सा’ब ने प्रति प्रश्न किया - ‘कशो पुल ने कूण मल्यो?’ (कौन सा पुल और कौन मिला?)
पूर्वानुसार ही निस्पृह, शान्त स्वर में गोपाल का जवाब आया - ‘मने कई मालम? मल्या आप अणी वास्ते पुल की तो आप ई जाणो।’ (मुझे क्या मालूम। मिले आप। आप ही जानो कि कौन सा पुल?) 

बम सा’ब का धीरज छूट गया। तनिक डपटते हुए बोले - ‘देख! हवेराँ-हवेराँ टेम खराब मत कर। साफ-साफ वता! कशो पुल? कूण मल्यो? थार ती कणीने क्यो?’ (देख! सुबह-सुबह टाइम खराब मत कर। साफ-साफ बता! कौन सा पुल? कौन मिला? तुझसे किसने कहा?)

तनिक भी विचलित हुए बिना, बम सा’ब की चिन्ता करते हुए, नजर नीची बनाए रखते हुए पूरी विनम्रता और आदर भाव से गोपाल ने जवाब दिया - ‘टेम खराब नी करी रियो। आपकी फिकर वेईगी। अणी वास्ते अई ग्यो। पुल की तो आप जाणो, काँ के मल्या आप। और म्हारा ती के कूण? यो तो अखबार में छप्यो।’ (टाइम खराब नहीं कर रहा। आपकी फिकर हो गई। असलिए आ गया। पुल के बारे में आप जानो। मिले आप। और मुझसे कहे कौन? ये तो अखबार में छपा है।) कहते हुए गोपाल ने, बगल में दबी डायरी में खुँसा अखबार बम सा’ब के सामने फैला दिया। 

बम सा’ब ने अखबार पर नजरें दौड़ाईं। उन्हें ऐसा कुछ नजर नहीं आया जो गोपाल के सवाल से जुड़ सके। अब उन्हें गुस्सा आ गया। फटकारते हुए बोले - ‘कई देखूँ अणी में? थारा वड़ावा का फूल? अणी में तो कई नी।’ (क्या देखूँ इसमें? तेरे पुरखों के अस्थि अवशेष? इसमें तो कुछ भी नहीं?)

‘म्हारा वड़ावा का फूल नी। ध्यान ती देखो। साफ-साफ लिख्यो हे के आप पुल के नीचे मल्या।’ (मेरे पुरखों के अस्थि अवशेष नहीं। ध्यान से देखिए। साफ-साफ लिखा है कि आप पुल के नीचे मिले)’ कहते हुए गोपाल ने एक समाचार पर अंगुली टिका दी।

बम सा’ब ने समाचार देखा। दो कॉलम में छपे समाचार का शीर्षक था - ‘पुल के नीचे बम मिला’। पल भर में वकील से दुर्वासा बन गए। चेहरा लाल-भभूका हो गया। अखबार गोपाल के मुँह पर फेंक कर बोले - ‘का ऽ रे गोपाल्या? थने चोबीस ई घण्टा रोर ई रोर हूजे? हवेर देखे ने हाँज, छोटो देखे न बड़ो, थने तो बस रोर करवा को मोको मलनो चईये। चल भाग!’ (क्यों रे गोपाल! तुझे चौबीसों घण्टे मजाक ही सूझता है? सुबह हो या शाम, यह भी नहीं देखता कि किससे मजाक कर रहा है, तुझे तो बस! मजाक करने का मौका मिलना चाहिए। चल! भाग!) 

मानो गोपाल को पता था कि बम सा’ब ऐसा ही करेंगे, कहेंगे, कुछ इसी तरह, मानो खतरी कर रहा हो, पूर्व मुद्रा और स्वरों में बोला - ‘मतलब के वटे, पुल के नीचे आप नी था। आप नी मल्या वटे! यो ई ज केई रिया आप?’ (याने कि पुल के नीचे आप नहीं थे। आप नहीं मिले वहाँ। यही कह रहे हैं आप?)’ 

मानो धनुष भंग प्रसंग पर लक्ष्मण ने विश्वामित्र को ‘टी ली ली’ कहते हुए अंगूठा दिखा दिया हो, कुछ उसी दशा और मुद्रा में बम सा’ब गरजे - ‘फेर! हमज में नी अई री? जावे के लप्पड़ टिकऊँ?’ (फिर! समझ में नहीं आ रहा? जाता है कि झापट टिकाऊँ?)

विन्ध्याचल की तरह अडिग और नतनयन गोपाल ने, अखबार की घड़ी करते हुए ठण्डे स्वर में अर्जी लगाई - ‘मूँ तो जऊँगा ई ज। पण आप अखबारवारा ने नोटिस जरूर देई दो के आगे ती अणी तरे से साफ-साफ लिखे के बम को मतलब बम वकील सा’ब नी है। ताकि लोग चक्कर में नी पड़े। जदी म्हारा हरीको भण्यो-लिख्यो आदमी चक्कर में पड़ी सके तो बिचारा कम भण्या ने अंगूठा छाप तो जादा घबरई जावेगा। अबार तो मूँ ई ज आयो हूँ। पण अशो नी वे के हाँज तक म्हारा हरीका दस-बीस लोग और अई जा। वा। मूँ जई रियो। आपने तकलीफ वी। माफी दीजो। राम-राम।’ (मैं तो जाऊँगा ही। लेकिन आप अखबारवाले को नोटिस जरूर दे देना कि भविष्य में साफ-साफ लिखे कि बम का मतलब बम वकील साब नहीं है। ताकि लोग भ्रमित न हों। जब मुझ जैसा पढ़ा-लिखा आदमी भ्रमित हो गया तो बेचारे अल्प शिक्षित, निरक्षर लोग तो अधिक घबरा जाएँगे। ठीक है। अभी तो मैं जा रहा हूँ लेकिन ऐसा न हो कि शाम तक मुझ जैसे दस-बीस लोग और आ जाएँ। मैं जा रहा हूँ। आपको तकलीफ दी। माफ कर दीजिएगा। नमस्कार।)

और गोपाल उसी तरह चला आया जिस तरह गया था। मानो उसने कुछ भी नहीं कहा। कुछ भी नहीं किया। कुछ भी नहीं हुआ। उधर बम सा’ब ज्वालामुखी बने, गुस्से में काँपते बम सा’ब हतप्रभ, निरीह मुद्रा मे उसे जाते देखते रहे।  


पता नहीं, देश में कहाँ, कौन सा बम कौन से पुल के नीचे मिला होगा। लेकिन गोपाल के हत्थे चढ़कर वह बम, बम वकील साहब के लिए तो सचमुच ही मानो अणु बम बन गया। यह करिश्मा गोपाल ही कर सकता था। उसी ने किया भी। मनासा में एकमात्र वही तो था जो यह कर सकता था।

लेकिन किस्से का महत्वपूर्ण अंश अभी शेष है। बम सा’ब की मृत्यु के बाईस बरस बाद यह किस्सा मुझे कैसे मालूम हुआ? अर्जुन ने बताया कि उसी दोपहर में, खुद बम सा’ब ही बार रूम में यह किस्सा सुना रहे थे - ठहाके लगाते हुए।
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