तोड़ दो यह बाँध


दादा की यह कविता इसलिए तनिक अनूठी है कि यह उनके किसी संग्रह में नहीं है किन्तु यू ट्यूब पर इसके ढेरों वीडियो उपलब्ध हैं। इतने वीडियो, उनकी और किसी कविता के उपलब्ध नहीं हैं। 


                                            जब धरा पर धाँधली
                                            करने लगे पागल अँधेरा।
                                            और मावस धौंस देकर
                                            छीन ले तुमसे सवेरा।
                                            तब तुम्हारा हार कर, 
                                            यूँ बैठ जाना
                                            बुजदिली है, पाप है
                                            आज की इन पीढ़ियों का
                                            बस यही सन्ताप है।

                                            अब भी समय है
                                            आग को अपनी जलाओ।
                                            बाट मत देखो सुबह की
                                            प्राण का दीपक जलाओ।

                                            मत करो परवाह
                                            कोई क्या कहेगा
                                            इस तरह तो वक्त का दुश्मन
                                            सदा निर्भय रहेगा।

                                            सब्र का यह बाँध तुमने
                                            पूछ कर किससे बनाया?
                                            वह कौन है जिसने तुम्हें
                                            इतना सहन करना सिखाया?

                                            तोड़ दो यह बाँध
                                            बहने दो नदी को।
                                            दाँव पर खुद को लगा कर
                                            धन्य कर दो इस सदी को।
                                                        -----

महल से नीचे पधारो

 

बालकवि बैरागी

महल से नीचे पधारो, देश फिर वन्दन करेगा
फिर वही अर्चन करेगा, और अभिनन्दन करेगा
महल से नीचे पधारो.....

00000

बहुत दिन पहले कहा था, फाँस गहरी गड़ रही है
नाव डगमग हो रही है, औ’ भँवर में पड़ रही है
घाव बहने लग गये हैं, ओज सब ढलने लगा है
बेबसी बढ़ने लगी है, हर रुँआ जलने लगा है
किन्तु तुमने मुँह सिकोड़ा, औ’ मुझे दी गालियाँ
और सत्ता की सुरा की, खूब ढाली प्यालियाँ

किन्तु अब मेरा कहा, फरमान बनने जा रहा है
अब सिकोड़ो नाक-भौंह, वो काल सिर पर आ रहा है

इसलिए फिर कह रहा हूँ,
महल से नीचे पधारो.....

00000

आग में रख दो, कमीनी कुर्सियों को तोड़ दो
हद से ज्यादह हो गया है, मेनका को छोड़ दो
संगठन सब सड़ गया है, कोढ़ कितनी गल रही है
तुम समझते हो कि गाड़ी, पटरियों पर चल रही है
आँख तो खोलो जरा, , देखो हकीकत और है
महल जो तुमने बनाया, किस कदर कमजोर है

पुण्य जितना था पुराना, सब भुना कर खा गये हो
तुम कहाँ पर जा रहे थे, औ’ कहाँ पर आ गये हो

इसलिए फिर कह रहा हूँ
महल से नीचे पधारो.....

00000

ये महल, ये कुर्सियाँ, गर देश है तो सब रहेंगे
बात कुछ नीची हुई तो, सब बुरा तुमको कहेंगे
इस तरह इन आँधियों में, तुम अड़े कैसे रहोगे?
पाँव ही जब तोड़ लोगे, फिर खड़े कैसे रहोगे?
अफसोस! सत्ता के नशे में, किस कदर तुम खो गये हो
सौ नरक बस जायें, इतने पाप तुम खुद कर गये हो

मैं कसम से कह रहा हूँ, अब सहा जाता नहीं है
क्या कहूँ? कैसे कहूँ, कुछ भी कहा जाता नहीं है

इसलिए फिर कह रहा हूँ,
महल से नीचे पधारो.....

00000

किस कदर तुम हो गये हो, दूर इस आवाम से
कर रही हैं पीढ़ियाँ थू-थू तुम्हारे नाम से
उफ! शहीदों का चमन, सारा उजड़ता जा रहा है
तुम बनाने जा रहे हो, पर बिगड़ता जा रहा है
हज्म तक होता नहीं है, पेट इतने भर लिये
यादवों से हाल तुमने, आप अपने कर लिये

वरदान जनने थे तुम्हें, तुम श्राप जनते जा रहे हो
तुम पतन के दूसरे पर्याय बनते जा रहे हो

इसलिए फिर कह रहा हूँ,
महल से नीचे पधारो.....

00000

आज भी विश्वास मेरा, तुम बहुत हो काम के
तुम बदल सकते हो नक्शे, आज फिर आवाम के
पर जरा नीचे पधारो, और पश्चात्ताप कर लो
फिर नई ताकत जुटाओ, देश का विश्वास लो

आस्था का देश है यह, सौ गुना फिर पाओगे
यह मुहूरत टल गया तो, देखना पछताओगे

इसलिए फिर कह रहा हूँ,
महल से नीचे पधारो.....
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झुँझनू (राजस्थान)
19 अगस्त 1963 

पाँच बाल-कविताएँ

बालकवि बैरागी


एक

गोरे-गोरे चाँद में धब्बा,
दिखता है जो काला-काला।
उस धब्बे का मतलब हमने,
बड़े मजे से खोज निकाला।
वहाँ नहीं है गुड़िया-बुढ़िया,
वहाँ नहीं बैठी है दादी।
अपनी काली गाय, सूर्य ने
चन्दा के आँगन में बाँधी।
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दो

शाम ढले पंछी घर आते।
अपने बच्चों को समझाते।
अगर नापना हो आकाश।
पंखों पर करना विश्वास।
साथ न देंगे पंख पराए।
बच्चों को अब क्या समझाए!
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तीन

बड़े सवेरे सूरज आया।
आकर उसने मुझे जगाया।
कहने लगा, ‘बिछौना छोड़ो,
मैं आया हूँ, सोना छोड़ो!’
मैंने कहा, ‘पधारो आओ।
जाकर पहले चाय बनाओ।
गरम चाय के प्याले लाना।
फिर आ करके मुझे जगाना।
चलो रसोईघर में जाओ।
दरवाजे पर मत चिल्लाओ।’
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चार

नदियाँ होतीं मीठी-मीठी,
सागर होता खारा।
मैंने पूछ लिया सागर से,
यह कैसा व्यवहार तुम्हारा?
सागर बोला, सिर मत खाओ।
पहले खुद सागर बन जाओ।
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पाँच

ईश्वर ने आकाश बनाया।
उसमें सूरज को बैठाया।
अगर नहीं आकाश बनाता!
चाँद-सितारे कहाँ सजाता?
कैसे हम किरणों से जुड़ते?
ऐरोप्लेन कहाँ पर उड़ते?
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ये बाल-कविताएँ, भोपालवाले श्री मनोज जैन ‘मधुर’ (मोबाइल नम्बर 93013 37806) की फेस बुक वाल पर ‘वागर्थ’ समूह से, रतलामवाले मेरे प्रिय आशीष दशोत्तर (मोबाइल नम्बर 98270 84966/96303 34034) ने उपलब्ध कराईं। दोनों का बहुत-बहुत आभार।




दिल्ली अलोनी हो गई बाबू सा’ब!

बालकवि बैरागी

26 जुलाई को इस बार फिर दिल्ली पहुँच गया। ठीक एक महीने बाद। इस बार काम का बोझ ज्यादा रहा। कुछ सरकारी काम काज कुछ गैर सरकारी मित्र मिलन। पूरे चार दिन दिल्ली में बीते। इससे पहले संजयजी की शवयात्रा मे शामिल होने गया था। अत्यन्त उदास और हताश अवसर था। भोपाल में रहकर सोचता था कि शायद दिल्ली की उदासी कुछ टूटी होगी। पर दिल्ली आकर देखा तो मन और उदास हो गया। उदासी बिलकुल नहीं टूटी है। हर तरफ एक गहरा विषाद और अव्यक्त बेचैनी है।

ठीक है कि प्रधान मन्त्री ने सरकारी काम-काज करना शुरु कर दिया है, पर उनसे जो भी भेंट करके आता है वह विगलित हो जाता है। मैं तो इस बार उनके सामने जाने का साहस भी नही जुटा पाया। अब वे ‘शुद्ध माँ’ हो गई हैं। उनका मातृत्व इस उम्र में आकर अत्यधिक व्यापक और समष्टिगत हो गया है। बारीक पर्यवेक्षण करने वाले लोग ऐसा ही कहते है। पुत्र शोक ने उनकी कोमलता को एक प्रकट एव स्पष्ट आत्मीयता दी है। अपना दुःख दर्द लेकर ? मिलने जाने वाले लोग उनके सामने जाकर सब कुछ भूल जाते हैं। मालवा के किसान नर-नारियों का एक समूह गंगा यात्रा जाते समय इन्दिराजी से मिलने का कार्यक्रम बना बैठा। सदा की तरह वे सबसे भेंट करने लॉन में आईं। सैंकड़ों लोग अपनी पीड़ा पोंछने आए थे। मालवा के इस समूह ने ज्यों ही इन्दिराजी को देखा, करीब-करीब एक ही साथ सबके-सब फूट पड़े। रोते-बिलखते बाहर निकले। पढ़े-लिखे लोग भी आँखें पोंछते हुए ही बाहर आते हैं। जवाहरलाल नेहरू जैसे पिता, कमलाजी जैसी माँ, फीरोज गाँधी जैसे पति और संजय जैसे पुत्र के शोक में डूबी इन्दिराजी को नजर भर देखने का साहस जुटाना अब बहुत श्रम साध्य हो गया है। माँ और पति के सिवाय शेष दोनों मृत्युओं ने इन्दिराजी के सामने राजनीतिक समीकरण ध्वस्त कर दिए हैं। नए समीकरण बैठाना बिलकुल नई तपस्या जैसा श्रम है। वे यदा-कदा हँसती भी हैं पर हँसी की खनक के पीछे पीड़ा का अपार सागर हहराता लगता है।

स्टेशन से मध्य प्रदेश भवन जा रहा हूँ। कारवाला मारे बारिश के बदहवास-सा है। भगवान जाने कौनसा रूट उसने लिया। घनघोर बारिश में भाँय-भाँय करती घनी, छायादार सड़क पर एकाएक वह कार रोकता है। एक क्षण बाद ही वापस गियर लगा देता है। मैंने पूछा क्या हुआ भैया! उसका उत्तर मुझे भीतर, गहरे तक झकझोर देता है। कहता है- ‘दिल्ली अलोनी हो गई सा’ब।’ मै अपने दाहिने वाला शीशा साफ करता हूँ। तूफानी बारिश के पार नजर गड़ाता हूँ। देखता हूँ तो उदासी और घनी हो जाती है। वही 12 विलिंगडन क्रीसेंट। संजयजी का बंगला। न जाने क्या क्या दिमाग में कौंध जाता है। जब-जब इस बंगले के सामने से निकला, तब-तब हजारांे की भीड़। नारों का शोर। जवानों की उमंग और एक ज्वाला का आभास। आप मानें या नहीं मानें पर यह सच है कि मैंने संजयजी को कभी जीते जी नहीं देखा। उनका शव दर्शन ही किया। मन्दसौर की 1977 की एक चुनावी सभा मे मैं उनकी प्रतीक्षा में कोई सवा चार घण्टे अनवरत बोलता रहा। 50 हजार लोगांे की भीड़ उनकी प्रतीक्षा में मुझे सुनती रही। मैं मंच से उतरा तब तक मुझे नहीं बताया कि वे नीमच से ही वापस लौट गए हैं। मन्दसौर आए ही नहीं। अवसर उसके बाद भी कई बार आए, पर उनकी व्यस्तता को देखते हुए मैं ही दूर-दूर रहा। उनको बताने लायक मेरे पास कोई समस्या थी ही नहीं। कारवाला मेरी तन्द्रा तोड़ता है ‘साब! क्या मर्द पट्ठा था! दिल्ली का नमक खत्म हो गया। संजय की एक प्यार भरी दहशत थी सब पर। सब लुट गया सा’ब! आज कल गले में कौर नहीं उतरता।’

प्रदेश की खाद्यान्न और वितरण समस्या को लेकर इस बार कई महत्वपूर्ण लोगों से मिला। बात सबने की, पर थोड़ी-थोड़ी देर में हर संजीदा आदमी दूर क्षितिज पर देखता-सा लगा। मैंने अदेखे संजय के बारे में जगह-जगह कहा था, ‘श्रीमती इन्दिरा गाँधी व्यक्ति नहीं, इस देश की भावना है और संजय गाँधी हमारी सम्भावना है। लोग-बाग सम्भावना और भावना दोनों पर प्रहार करने पर तुले हुए हैं। और अब हमें फिर नई सम्भावना का निर्माण करना होगा। हमारे पास केवल भावना बची है। सम्भावना को प्रभु ने हमसे चकमा देकर छीन लिया।’

संजय पर मेरी कलम कभी नहीं चली। मेरी कविताओं में वे आज से 15 वर्ष पूर्व एक जगह कहीं आए थे। कहीं मैंने लिखा था, ‘जिस दिन राजू-संजू को खुद केसरिया पहिनाएगी’ ऐसी ही पंक्ति थी। तब वे मात्र 10 वर्ष के थे। उन्हें संजू कहा या लिखा जा सकता था। शनैः-शनैः वे विकसित होते गए। उनके कदम दृढ़ और पंजे सशक्त हुए। उनके जबड़ों पर एक भिंचाव आता गया। उनकी आँखों में सपने जवान हुए। उनका प्रभा मण्डल विस्तीर्ण हुआ और हमारी सम्भावना हो गए। पर आज! ‘दिल्ली अलोनी हो गई, बाबू सा’ब।’

कई राज-नेता मिले। कुछ चिन्तित, कुछ अचिन्तित। दो एक संवेदनशील लोग तो उस शव-यात्रा के बाद से आज तक बीमार चल रहे हैं। एक से मैं मिला भी। विचित्र-सा रिक्तता का बोध हो रहा है। शून्य को तोड़ने की कोशिश में लोग क्षुब्ध होकर खुद टूट रहे हैं। राजीव भाई या श्रीमती मेनका गाँधी का बिलकुल नया सिलसिला सुगबुगाहट ले रहा है। दूकानों और दफ्तरों में संजयजी के बड़े-बड़े फोटो और कैलेण्डर इस उदासी को और भी गहरा कर देते हैं। अब गाँधी-दर्शन की तरह ‘संजय - राष्ट्र का सपूत’ जैसी फोटो प्रदर्शनी, छोटी-बड़ी रेलों में लगाकर सारे देश में घुमाई जाए, यह तैयारी शुरु हो गई है। पण्डित कमलापतिजी त्रिपाठी इसकी तैयारी हेतु निर्देश देते देखे गए।

दिल्ली से वापसी पर जब मध्य-प्रदेश भवन छोड़ता हूँ तो पहले दिन वाली कार के बदले दूसरी कार मिलती है। तीन मूर्ति के पास में नार्थ एवेन्यू का रास्ता लेते समय मैं विलिंगडन क्रीसेंट की तरफ एक उदास नजर दौड़ाता हूँ। बारिश नहीं है। बदराया मौसम जरूर है। सूनी सड़क पर 12 नम्बर कोठी के बाहर घने पेड़ों की छाँह में एक गुमटी पर संजयजी की कई तस्वीरें विभिन्न मुद्राओं में लगी हुई दूर से ही दिखाई पड़ती हैं। यह गुमटी तब भी थी। अब भी है और शायद कल भी रहेगी। उस दिन वाले ड्राइवर के शब्द शिराओं से झनझनाते हैं-‘दिल्ली अलोनी हो गई बाबू सा’ब!’

स्टेशन पर अखबारों के ताजे सायंकालीन संस्करण खरीदता हूँ। आदत के अनुसार पहले देखता हूँ। फिर बन्द कर देता हूँ। फिर पृष्ठ उलटता पलटता हूँ। एक साप्ताहिक का मुख ? पृष्ठ पूरी सजधज से कहता है, ‘छोटे भैया के बाद बड़े भैया आ रहे हैं।’ राजीव गाघी की एक गम्भीर तस्वीर भी छपी हुई है। 

कौन कह सकता है कि कल क्या होगा। दिल्ली में इस बार काम तो बहुत हुआ पर मन नहीं लगा। 

लगता भी कैसे? 

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‘नईदुनिया’, इन्दौर में 10-08-1980 को प्रकाशित यह लेख, देवासवाले श्री ओमजी वर्मा (मोबाइल नम्बर 93023 79199)ने उपलब्ध कराया।


नेपथ्य का सच

 

बालकवि बैरागी

मेरी पगडण्डी पर बिछाने के लिए
उन्होंने बेरी से बबूलों तक,
कैर से करौंदियो तक से
उधार लिए काँटे
और बड़ी सावधानी से
मेरे रास्ते में बिछाए,
फिर मन ही मन मुस्काए
पर वे परिचित नहीं थे
आजन्म नंगे, मेरे पाँवों की सख्ती से।
मेरी एड़ियों और पगतलियों की
                                    बेलिहाज, फौलादी चोटों से।

जब धूल में मिल गए
उधार के काँटे
तब वे चिढ़े बेरी पर,
गुस्साए बबूलों पर,
खीजे कैर पर,
कोसने लगे करौंदियों को,
गरियाते रहे काँटों को।

अपनी प्रयोगशालाओं में
परीक्षण करने ले गए
मेरी पगडण्डी की धूल को।

पूछा मैंने उनकी परेशानी का सबब
तो लाल होकर बोले -
तुम्हारे लिए हमने छोड़ा राज-पथ
चले तुम्हारी राह पर
कर्जदार बने न जाने किस-किस के
और तुम इतने काँटों पर चलकर भी
न रोए, न सिसके।

कहीं-कहीं तुम्हारी पगडण्डी
अचानक काट देती है
हमारे राज-पथ को।
उन चौराहों पर कहीं तुम
रोक न दो हमारे राज-रथ को।

नेपथ्य का सच यह है कि
हमारा सारथी तुम्हें पहचानता है।
तुम्हारे पाँवों की सख्ती का लोहा मानता है।

हमें उतार कर, कहीं बैठा न ले तुम्हें
अपने राज-रथ में।
इसलिए, जहाँ से भी लाना पड़े
लाएँगे हजार तरह के काँटे
और बिछाएँगे तुम्हारे पथ में।

यह हमारी लाचारी है।
पता नहीं क्यों, हमारा राज-पथ
तुम्हारी पगडण्डी का आभारी है।
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यह कविता, रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक उपलब्ध कराई।

‘चरित्रवानों की सूची में शामिल करने के लिए तुम्हें अपना नाम भी नहीं सूझा?’


(श्री राजशेखर व्यास के संस्मरण संग्रह ‘याद आते हैं’ में यह संस्मरण, ‘यह संस्मरण नहीं, मरण है’ शीर्षक से संग्रहीत है। संस्मरण के साथ दिया गया, श्री राजे शेखर व्यास को सम्बोधित, दादा श्री बालकवि बैरागी का पत्र इस संस्मरण की समूची भूमिका है।) 



उस दिन बालकवि ’दा कुछ उदास और अनमने लगे।  बालकवि ’दा यानी हमारे कवि-सांसद, पूर्व मन्त्री बालकवि बैरागी! मैंने इससे पहले उन्हें कभी परेशान नहीं देखा था। जब मिले, हँसते, मुसकुराते, अट्टहास करते और समस्याओं को चिन्दी-चिन्दी बिखेरते। सहज मन बालकवि बैरागी सिर्फ कवि ही नहीं, महान् मनुष्य, चिन्तक और विचारक भी हैं।


राजनीति और राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर वे एक संवेदनशील कवि हैं। देश की दशा से चिन्तित थे। अटलजी की अस्वस्थता के समाचार से विचलित, उनके घुटनों के दर्द से बेचैन! अपने रोग, अपनी परेशानियाँ, विसंगतियाँ तो होती ही हैं। बात करते-करते यादों में खो गए। कहने लगे, “हमने भी एक ‘सर्वदलीय सरकार’ बनाई थी।” मैं चौंका - ‘सर्वदलीय सरकार’ और आपने? बोले, “सिर्फ मैंने ही नहीं, ‘श्री माँ’ ने भी बनाई थी, आज से तीस बरस पहले। तब मैं मध्य प्रदेश का पर्यटन मन्त्री था और दक्षिण भारत में डॉ. कर्णसिंह ने देश के सभी प्रदेशों के पर्यटन मन्त्रियों की एक सभा बुलाई थी।

सभा खत्म हुई तो सभी का मन हुआ अरविन्द आश्रम चलें, ‘श्री माँ’ के दर्शन करें।

बात तब की है जब पाण्डिचेरी आश्रम की अधिष्ठात्री ‘श्री माँ’ ने महासमाधि नहीं ली थी। यद्यपि वे जीर्ण चल रही थीं पर वे दर्शन देती थीं और मिलनेवालों के लिए समय निकाला करती थीं।

एक बार विभिन्न राजनीतिक दलों के कुछ नेता ‘श्री माँ’ के पास पधारे। दर्शन करने की लालसा और आशीर्वाद की प्यास उनको वहाँ तक ले गई थी। अपनी बीमारी के बावजूद ‘श्री माँ’ ने उनको समय दिया।

चर्चा के दौरान नेताओं ने ‘श्री माँ’ के सामने देश की तत्कालीन स्थिति का विवेचन करते हुए ‘श्री माँ’ से सवाल किया; “माँ! यह कितने दिन तक चलेगा? किस तरह यह नाव पार लगेगी? निराशा और अनैतिकता तथा भ्रष्टाचार एवं पाखण्ड का यह साम्राज्य ‘श्री अरविन्द भूमि’ पर कब तक ताण्डव करता रहेगा? शासन आज अपने सारे अर्थ खो चुका है, सत्ता निरर्थक होे गई है, पीढ़ी भटक गई है। नेता झुक गए हैं, व्यापारी लालची हो गए हैं, गरीब अनाथ और कलाकार करुण हो गए हैं। इस ढलान पर लुढ़कता हुआ देश कब वापस अपने भारतीय चरित्र को प्राप्त कर सकेगा? क्या आज का सत्तालोलुप नेतृत्व इस सबको इसी तरह निरीह होकर देखता रहेगा या कभी राजदण्ड का उपयोग भी करेगा?”

प्रायः सभी जिज्ञासुओं की यही मनोभूमि थी। शब्द और स्वर में भिन्नता थी पर उनकी चिन्ता का दायरा यही सब समेटे हुए था।

‘श्री माँ’ उनको गम्भीर होकर सुनती रहीं....सुनती....रहीं.....सुनती रहीं। करीब-करीब सब बोल चुके, तब ‘श्री माँ’ के होंठ एक हलकी सी दिव्य मुसकराहट के साथ हिले, उनमें कम्पन हुआ, उनकी आँखों में एक तेजस्विता चमकी और वे मुखर हुईं -

‘भारत मेरी मातृभूमि नहीं। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मेरा यहाँ कुछ नहीं है। भारत से अलग करके मैंने अपने आपको कभी नहीं देखा। पर तुम सब लोग राजनीति में काम करते हो, सरकारें बनाते हो, बिगाड़ते हो, कुर्सियों और पदों को शोभित करते हो। मैं यही पूछती हूँ कि जिस बिन्दु पर तुम्हें चिन्तन करना है, उस पर तुम चिन्ता लेकर आश्रम तक कैसे आ गए? खैर। सुनो! किसी भी देश को नेता या व्यक्ति नहीं चलाता। उसे चलानेवाले तत्त्व का नाम है ‘चरित्र’। एक क्षण के लिए तुम कल्पना करो कि दिल्ली का शासन तुम्हारे हाथ में आ जाए, वर्तमान व्यवस्था बदल जाए और तुमको अपने मन की सरकार बनाने का अवसर मिल जाए, तब तुम क्या करोगे?’

“हम ‘सर्वदलीय सरकार’ बनाएँगे।” एक ने उत्तर दिया। ‘श्री माँ’ ने फिर एक दिव्य मुसकान के साथ कहना शुरु किया, “बहुत अच्छी बात है कि मिल-जुलकर देश को चलाने की भावना तुममें है। चलो, ‘सर्वदलीय सरकार’ बनाने के लिए केन्द्र का ‘छाया मन्त्रि मण्डल’ बनाने का पूर्वाभ्यास करो। कम-से-कम एक दर्जन ऐसे नामों की सूची बनाओ जिन नामों पर सारे देश की सहमति हो जाए, जिन पर राष्ट्रीय चरित्र के मामले में उँगली नहीं उठाई जा सके। इतने बड़े देश का काम चलाने के लिए कोई बारह व्यक्ति तो लगेंगे ही न?”

एक उतावले सज्जन ने तत्काल कलम ली और वे ‘छाया मन्त्रि मण्डल’ के लिए ‘समग्ररूपेण सहमत सूची’ बनाने को उद्यत हो गए। वे बोले, ‘जी हाँ, श्री माँ, मैं नाम दे देता हूँ।’

’श्री माँ’ तटस्थ होकर उनकी ओर इस तरह देखने लगीं मानो कोई माँ अपने बच्चों का खेल देख रही हो। सूची बनने लगी। शिष्टमण्डल का हर सदस्य अपनी राय देने लगा। चिन्तातुर लोग चिन्तन पर आ गए। उनको लगता था कि आज भारत के उद्धारकों की अन्तिम सूची बनकर तैयार हो जाएगी।

पहला नाम आया श्री जयप्रकाश नारायण का। उल्लसित भाव से सबने उस नाम को सर्वाेपरि लिख लिया। दूसरा नाम एक-दो क्षणो में विनोबाजी का उछला। किसी ने प्रतिवाद नहीं किया। तीसरे नाम पर सिर खुजाया जाने लगा। धीरे से कोई बोला - ‘अटलजी का नाम लिख लो।’ हलकी सी कसमसाहट के साथ वह नाम भी लिख लिया गया। चौथा नाम आया कामराजजी का। किसी ने कहा - ‘प्रतिक्रियावादी है।’ पर बात फिर भी सहमति पर आ गई। पाँचवा नाम लॉटरी की तरह निकला मोरारजी भाई का।  तब तक बात व्यंग्य पर आ चुकी थी। फिर भी कहा गया - ‘जिद्दी होने के बावजूद उनकी राष्ट्रीयता और नैतिकता पर उँगली नहीं उठ सकेगी। लिख लो।’ अब हो गए पाँच। सात फिर भी चाहिए।

‘श्री माँ’ ने बन्द पलकें एक पल को उघाड़ीं, बनती हुई सूची पर दृष्टिपात किया और फिर आँखें मूँद कर बैठ गईं।  बड़ी कठिनाई से किसी ने छठवाँ नाम बोला एस. ए. डांगे का। तभी किसी ने आपत्ति की -‘कम्युनिस्ट हैं।’ तत्काल दूसरे ने जवाब दिया - ‘सबसे अच्छी बात यह है कि कम्युनिस्ट कभी चरित्र की बात नहीं नहीं करते। उनका वाद एक अन्तरराष्ट्रीय वाद है। इसलिए उनके सामने अन्तरराष्ट्रीय चरित्र का पक्ष प्रबल होता है। फिर भी डाँगे साहब का नाम लिख लो। भारत के सन्दर्भ में वे भारतीय पहले होंगे, कम्युनिस्ट बाद में।’

इन छह नामों के बाद बात जो फँसी तो कलम चली ही नहीं। सब बहस में उलझ गए। सातवाँ नाम मिल ही नहीं रहा था।

‘श्री माँ’ ने बहस को रोका और पूछा - ‘कितने हुए? हो गए एक दर्जन?’

नेतागण निराश होकर बोले, ‘मदर! बड़ी कठिनाई से आधा दर्जन नाम तय हुए हैं। आगे कुछ सूझता नहीं है।’

और तब ‘श्री माँ’ के चेहरे पर अवसाद की रेखाएँ उभर आईं। वे आर्द्र हो उठीं। कहने लगीं - ‘ऐसा नहीं है कि इस देश में चरित्रवान लोगों का अकाल पड़ गया है। करोड़ों लोग हैं, जो उदात्त राष्ट्रीय चरित्र के मालिक हैं। पर तुममें से कोई उन्हें जानता तक नहीं और जिन्हें तुम जानते हो, उनके पास चरित्र नहीं है। कैसी विडम्बना है! (तब 50 करोड़) आज 100 करोड़ से अधिक की आबादीवाले इस महान् देश के पास एक दर्जन लोग भी नहीं हैं, जो चारित्रिक भाव-भूमि पर इस देश को चला सकें! जिन्हें राजनीति में काम करनेवाले तुम जैसे लोग भी जानो। कभी तुमने चरित्रवानों को भीड़ में अपना नायक ढूँढने की कोशिश की है? जिनके पास चरित्र नहीं है, तुम लोग उनकी जय-जयकार करते फिर रहे हो, और जिनके पास चरित्र है, उनका तुम नाम तक नहीं जानते! क्या अधिकार है तुम्हें इस देश की दशा पर आँसू बहाने का?’

और करीब-करीब निढाल-सी होकर ‘श्री माँ’ ने कहा, ‘तुम्हारा चिन्तन शुरु हुआ या नहीं, यह मैं नहीं जानती, पर तुमने मेरे सामने चिन्ता का द्वार खोल दिया है। मेरे बच्चों! ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। हमारा देश संसार का सिरमौर देश बने, पर मेरी आँख का आँसू आज इसलिए चिन्तित है कि इस सूची में तुम लोग जयप्रकाश और विनोबा का नाम लिखते हुए तनिक भी नहीं झिझक रहे हो। तुम्हें पता है इनकी उम्र क्या है? ये लोग सत्तर को पार कर गए! देश को चलानेवाला चरित्र तुम अतीत में ढूँढ़ रहे हो! तुमने भविष्य में चरित्र ढूँढ़ने की कभी कोशिश की? वर्तमान से कभी पूछा तुमने कि तेरे चरित्र को क्या हो गया है?’

एक क्षण को ‘श्री माँ’ फिर विराम लेकर गहरी साँस छोड़ते हुए फूट पड़ीं - ‘मुझे दुःख है कि तुममें से किसी एक तक को अपना खुद का नाम भी इस काबिल नहीं लगा कि वह इस सूची में रख दिया जाता। ओफ्!’

उस शिष्टमण्डल में सभी राजनीतिक दलों के, तरह-तरह के राजनेता थे। सब जमीन देख रहे थे। किसी को यह तक पता नहीं चल सका कि ‘श्री माँ’ कब उठकर दूसरे कमरे में चली गईं।

कहते-कहते बालकवि ‘दादा’ रुक गए। कण्ठ अवरुद्ध हो गया, आँखें भीग आईं, “कौन जानेगा इतने बरस पहले ‘सर्वदलीय सरकार’ की बात ‘श्री माँ’ के सामने भी आई तो थी। वह सपना भी आज सच हो गया है। मगर कैसा सच? आज हम 50 से 100 करोड़ हो गए हैं। कहाँ है वह चरित्र?”

मैं भी डबडबाई आँखों से उस ‘चरित्र’ को खोजता रहा।

कभी आपसे मिले तो कहिएगा, देश भी उसे खोज रहा है!

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