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निकम्मा (‘मनुहार भाभी’ की बाईसवीं/अन्तिम कहानी)



श्री बालकवि बैरागी के
प्रथम कहानी संग्रह
‘मनुहार भाभी’ की बाईसवीं/अन्तिम कहानी




निकम्मा  

सारा मित्र-मण्डल इस वात पर चकित था कि आखिर वल्लभ दादा ने एक असम्भव को सम्भव में कैसे बदल दिया? 

यह तो सभी जानते थे कि वल्लभ दादा अपनी धुन के पक्के थे और बीहड़ में भी रास्ता बनाने की कला में माहिर थे। पर विलीन बाबू के व्यक्ति को लेकर सभी आश्वस्त थे कि इस मोर्चे पर वल्लभ दादा जरूर मात खा जाएँगे। किन्तु वैसा हुआ नहीं और सफलता आज वल्लभ दादा के सामने साकार हो रही थी।

सरकार के सूचना अधिकारी बनकर जब से वल्लभ दादा जिले में आए थे, पत्रकारों में एक नई उमंग आ गई थी। एक तो वे हँसमुख, दूसरे गम्भीर और तीसरे, आज तक जितने भी सूचना अधिकारी आए, उन सबसे ज्यादा अनुभवी। उनकी टोपी में कई तुर्रे लगे हुए थे। सहज इतने कि सभी को सुलभ। सुलझे हुए इतने कि कलेक्टर साहब तक अपनी प्रशासकीय गुत्थियाँ सुलझाने में वल्लभ दादा के भरोसे निश्चिन्त। सरकार का काम समर्पित निष्ठा से करना और यार-दोस्तों के काम आना।

प्राथमिकता देकर पत्रकारों को, चाहे वह कैसा भी पत्रकार हो, वल्लभ दादा उसे बराबरी पर बैठाकर बात करते थे। उनके आने से सरकार की छवि तो बनी ही पर सूचना विभाग के जिला अधिकारी की छवि भी विशेष उभरकर सामने आई। जहाँ-जहाँ भी वल्लभ दादा रहे, वहाँ उन्होंने तो यश कमाया ही, सरकार को भी यश दिया और जिले के सभी अधिकारियों के परिवार भी आश्वस्त रहे। वल्लभ दादा का व्यंिक्तत्व और कार्यशैली सचमुच अनूठी थी। यह सब होने के बावजूद मित्र-मण्डल को पक्का भरोसा था कि विलीन बाबू वाले मामले में वल्लभ दादा भी चकरी खा जाएँगे। पर वैसा हुआ नहीं। परिणाम ठीक उल्टा निकला। वल्लभ दादा विजेता थे और विलीन बाबू जैसा आदमी आज वल्लभ दादा की चरखी पर चढ़कर चकरघिन्नी खा रहा था।

सचाई यह है कि जिला मुख्यालय का सारा पत्रकार परिवार विलीन बाबू के मारे तंग हो चुका था। वे किसी भी कारण से पत्रकार नहीं ये पर उनके पास ‘साप्ताहिक प्रवंचना’ नाम का अख़बार था। विलीन बाबू ही उसके मुख सम्पादक थे। चाहे उसकी दस कॉपी प्रति सप्ताह छपे, पर वह छपता जरूर था। चूँकि उसमें सम्पादकीय नहीं होता थीं, इसलिए  उस अखबार की वकत यहाँ से वहाँ तक रत्ती भर भी नहीं थी। ऐसा भाई लोग अक्सर विलीन बाबू से खुलकर कह भी दिया करते थे। विलीन बाबू का तर्क होता था कि पत्रकारिता और कविता से किसी डिग्री का क्या रिश्ता? हाँ, अगर ‘प्रवंचना’ पर पीत पत्रकारिता का कलंक लगा हो तो बताओ! चाहे जो करना पड़े पर प्रेस का बिल एक रुपए से लेकर एक लाख रुपए का भी है तो वह चुकाते तो विलीन बाबू ही हैं न!

विलीन बाबू पत्रकार कितने बड़े हैं और कैसे हैं, इस बहस को छोड़ भी दिया जाए तो उनके बारे में बहुत कुछ जाने बिना आप वल्लभ दादा की विजय का महत्व नहीं समझ सकेंगे।
आधी उम्र होने आई पर विलीन बाबू ने आज तक कोई काम या धन्धा नहीं किया। उनकी थीसिस बहुत सरल सी थी। वे कहते थे, ‘माँ-बाप ने पैदा किया, मैं पैदा हो गया। उन्होंने शादी की, मैंने अपना कौमार्य विलीन कर दिया। माँ-बाप चले गए, मैं भी चला जाऊँगा। उन्होंने सरकारी पाठशाला में पढ़ाने की कोशिश की, मैं वहाँ गया। फेल होने का जहाँ तक सवाल है मैं नहीं, वे ही फेल हुए। जब उनको पता था कि मैं पास होने वाला नहीं हूँ, तब फिर मुझे सीधा जीवन की पाठशाला में भेजना था। सरकारी शालाओं में से निकले लोग आज कहाँ पर क्या कर रहे हैं, आप अपने आप देख लो। तब भी जितना मैं वहाँ कर सका, मैंने किया। नाम किसी का डुबोया नहीं। भगवान ने एक बेटा दिया और फिर एक बेटी भी। मैं जैसे-तैसे दोनों को पाल ही रहा हूँ। माना कि इस काम में मेरी सहधर्मिणी की भूमिका विशेष है। अगर वो आज नर्स नहीं होती तो बच्चे पालना हम लोगों के लिए कठिन था। पर ‘प्रवंचना’ साप्ताहिक के मुख्य सम्पादक की पत्नी एक सड़ी सी, सरकार की तीन कौड़ी की नौकरी कर रही है, यह गौरव सरकार को मैंने दिया ही है, उससे लिया तो नहीं! अब बेटा जवान होगा तो अपने लायक लड़की ढूँढ़ ही लेगा और लड़की के लिए यह पक्का मान लीजिएगा कि वह कुँआरी नहीं मरेगी। भारत वह देश है जहाँ कुर्सी और कन्या कहीं कुँआरी नहीं रहती। इन दोनों चीजों के लिए तपस्या और तिकड़म करनेवाले लोगों की देश में कमी नहीं है।

जब-जब विलीन बाबू धाराप्रवाह होते, तब-तब उनके आसपास बैठे हर स्तर के पत्रकार सन्नाटे में आ जाते थे। विलीन बाबू खुद जानते थे कि उनके बारे में मित्र-मण्डल में राय क्या है। अक्सर वे यह कहते भी थे कि मेरी पीठ पर सभी मुझे निकम्मा कहकर मेरा अपमान करते, मेरा मखौल उड़ाते है। पर पत्रकारों के इतने बड़े इस रेवड़ में में अकेला वह पत्रकार हूँ जिसके पास चाहे कहने-भर को ही सही पर अपना खुद का अखबार है। अपना मालिक मैं स्वयं हूँ। शेष आप सभी केवल संवाददाता हैं। या तो किसी बनिए के नौकर हैं या फिर किसी संस्थान या फर्म के। बात थी भी सच। लोग जब चुप्पी लगा जाते तो विलीन बाबू कहते, ‘चलो! सबके सब परास्त हो गए हो, करो हमारी सेवा।’ और फिर वही होता कि जिसके भी यहाँ बैठक जमी हुई होती, वही चाय-समोसे करता। अपना हिस्सा विलीन बाबू पूरे आत्म-सम्मान के साथ खाते। एक डकार लेते। चाय का प्याला अपने पड़ोस में बैठे किसी बड़े पत्र के स्तरीय संवाददाता के ठीक सामने बाले स्टूल पर रखते। दूसरे पड़ोसी मित्र से अपने ब्राण्ड की सिगरेट माँगते। तीसरे से माचिस लेते और सुलगाकर खड़े हो जाते। सारा मित्र-मण्डल देखता रह जाता।

बैठक से बाहर आते ही विलीन बाबू अपनी बेहद पुरानी सायकल पर पैडल मारते और ‘साप्ताहिक प्रवंचना’ का मालिक शान से चल पड़ता। इस शान को सँवारने में विलीन बाबू को बहुत परिश्रम करना पड़ा था। सायकल तो उनको उनकी शादी के समय ससुराल से, यूँ कहिएगा कि एक तरह से दहेज में ही मिली थी। उसी को वे आज तक काम में लेते आ रहे थे। पर अपनी दिनचर्या को विलीन बाबू ने जिस तरह व्यवस्थित किया था, उसका कोई जोड़ आपको नहीं मिलेगा।

इस जिला मुख्यालय की आबादी एक लाख के आसपास चल रही थी। विलीन बाबू ने बड़ी कारीगरी से अपनी डायरी में उन साठ-सत्तर लोगों के नाम-पते नोट कर लिए थे जिनके यहाँ वे महीने में केवल एक दिन या तो सुबह के भोजन के समय जा निकलते थे या फिर शाम के। ऐसा ही क्रम उन्होंने अपनी डायरी में शाम-सुबह की चाय का भी बना रखा था। यह संख्या कभी सौ-सवा सौ से ज्यादह नहीं बढ़ी। उनका मुख्य लक्ष्य होता था-या तो चाय या फिर नाश्ता या फिर भरपेट भोजन। गणित हमेशा विलीन बाबू के पक्ष में ही रहा। एक का नम्बर महीने-सवा महीने में आता था। कभी-कभी उनमें क्रम-भंग के कारण हेरफेर भी हो जाता पर वे उपकृत सभी को करते थे। बख्शते किसी को भी नहीं। उनके हाथ में ताजा अंक की दो-तीन प्रतियाँ होतीं। एक प्रति वे उस परिवार मैं उपहार स्वरूप अवश्य छोड़ देते। इस समीकरण को देखते हुए उन्हें ‘प्रवंचना’ की प्रति सप्ताह पचास प्रतियाँ भी नहीं छपवानी पड़ती थीं। पर चार पेज का यह छोटा सा साप्ताहिक उनका हजार सवा-हजार रखने में सहायता कर ही देता था। दोपहर के बाद वे नियम से चले जाते थे सूचना विभाग के मुख्यालय में। वल्लभ दादा वहाँ झेलते ही क्या, ढोते तक थे। विलीन बाबू का सबसे बुरा दिन रहा करता था रविवार। छुट्टी का यह दिन फिर वे किसी न किसी तरह क्रम-भंग करके तीन-चार परिवारों में बाँट लेते थे। तब एक परिवार उस दिन वल्लभ दादा का होता ही था। वे चूँकि अपने घर से बहुत दूर तबादले पर थे, सो जाते भी कहाँ?

मित्र-मण्डल ने वल्लभ दादा पर यह भार डाला कि किसी तरह विलीन बाबू से  उनका और उनके शहर का पीछा छुड़ाने की व्यवस्था कर देें। यह एक चुनौती थी। विलीन बाबू पकड़ में आने वाले थे नहीं और वल्लभ दादा छोड़नेवाले लोगों में बिलकुल नहीं थे। उनके सामने स्तरीय पत्रकारिता का सवाल अलग था। विलीन बाबू के बारे में शहर में तरह-तरह की चर्चाएँ जिस तरह से होती थीं, उससे गम्भीर पत्रकारिता पर तो ऊँगली उठती ही थी। और इसी ऊहापोह में एक दिन मानसिक अस्तव्यस्त विलीन बाबू वल्लभ दादा की सँडासी की पकड़ मे फँस गए।

‘आपके लिए मेरे पास एक पूरे दस साल का यशस्वी प्रोजेक्ट है विलीन बाबू!’ कहते हुए वल्लभ दादा ने दो समोसों से भरी प्लेट आगे सरकाकर चाय की प्याली भी पेश कर दी। विलीन बाबू दस साला प्रोजेक्ट का नाम सुनते ही जमीन पर आ गए। चौंककर बोले, ‘आप मेरे सच्चे हितैषी हैं। आपका कहा मेरे लिए ऋषि-वचन होगा। हुक्म कीजिएगा।’

‘देश की आज की हालत आप देख ही रहे हैं। ऐसे में आप जैसा सम्पादक, विचारक, लेखक, चिन्तक और खासकर जमीन से जुड़ा हुआ मैदानी आदमी घर में ही बैठा रहे तो आखिर देश चलेगा कैसे? कभी आपने अपनी ऊर्जा और तेजस्विता के बारे में सोचा है विलीन बाबू? आपको कहाँ पैदा होना था और आप कहाँ पैदा हो गए! आपको कहाँ पत्रकारिता करनी थी और आप किस नरक में उलझ गए? रोज आप जिन लोगों के बीच उठते-बैठते और खाते-पीते हैं, क्या वे आपके नाखून तक भी पहुँचने के योग्य हैं? क्या बराबरी है आपकी और उनकी!’

विलीन बाबू लम्बी साँस छोड़ने लगे। जिन्दगी में यह पहला आदमी मिला था जिसने उनको समझा था। वे विनम्र होकर बोले, “आप वह दस साला प्रोजेक्ट मुझे दे दीजिए। मैं आपको निराश नहीं करूँगा। मुझे उसके लिए चाहे जो करना पड़े मैं करूँगा। अगर देश का काम है तब तो आप समझ लो कि विलीन देशमाता के लिए संसार तक से विलीन होने को तैयार हैं। हुक्म कीजिए।’

“करना आपको कुछ नहीं है। बस इस नारकीय नगर को, आपका खून रात-दिन पीनेवाले इन कीट-पतंग तुल्य तथाकथित मित्रों को दस साल के लिए एक ही झटके में छोड़ कर समूचे देश को जगाने के लिए अलख जागरण की यात्रा पर निकल पड़ना चाहिए। आपकी वाणी और आपकी ऊर्जा देश को नया चेतना संसार सिरजकर उपहार में देगी। आप भारत माता की सेवा करनेवाले सच्चे सपूत साबित होंगे। आपके कारण यह भी सिद्ध जाएगा कि भारत माता सचमुच ‘रत्न-प्रसूता’ है।” हालाँकि पहलेवाले दो समोसों में से विलीन बाबू ने अभी तक एक ही खाया था पर वल्लभ दादा ने दो समास और उसमें परोस दिए ।

विलीन बाबूके लिए यह खुराक हर तरह से ज्यादह थी। वे कुछ सोचने लगे। वल्लभ दादा यही क्षण विलीन बाबू से छीनने का गुणा-भाग मन ही मन कर रहे थे। बोले - ‘कलेक्टर साहब से मेरी सारी बात हो चुकी है। नगर के कुछ कद्रदान और आपके भक्त आपको नई सायकल भेंट कर रहे हैं। कल के अखबार आपकी तस्वीरों के साथ आपकी जीवनी छाप रह हैं। परसों सुबह सारे जिले के बड़े से बड़े अधिकारी एक समारोह करके आपको तिलक-नारियल- शाल अर्पण करेंगे। सायकल भेंट होगी, उस पर आगे जो बोर्ड लगेगा, उसका मैटर कलेक्टर साहब खुद तैयार कर रहे हैं। पूरे दस साल का आपका प्रवास चार्ट तैयार किया जा रहा है । देश का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहाँ कि कोई कलेक्टर, कोई विधायक, कोई सांसद, कोई तहसीलदार, कोई पटवारी, कोई समाजसेवी, कोई छोटा-बड़ा क्लब, कोई संस्था वगैरह नहीं हो। सभी को यहाँ से सूचना भेजने की अनौपचारिक जिम्मेदारी कलेक्टर साहब ने मुझ पर डाली है। यह काम पहली किस्त में मुझे करना है और अगर साल-दो साल में यहाँ से मेरा तबादला हो गया तो मेरे बाद यहाँ जो भी अधिकारी आएगा, यह उसका काम होगा। यह प्रवास प्रोजेक्ट सरकार को सौंपने पर भी विचार चल रहा है। पर ये सारी बातें बहुत बाद की हैं। भ्रमण कार्यक्रम में आप अपने हिसाब से फेर-बदल कर सकते हैं पर इसकी सूचना अपने घर के साथ-साव यहाँ जिला मुख्यालय को भी देते रहिएगा ताकि उस सबकी जानकारी प्रचार और पब्लिसिटी के द्वारा देश को मिलती रहे । दिल्ली में राष्ट्रपति जी, उपराष्ट्रपति जी, प्रधान मन्त्रीजी और हजारों वी.आई.पी. आपकी वाणी का लाभ लेंगे। प्रदेशों की राजधानियों में राज्यपाल, मुख्य मन्त्री, मन्त्रि-मण्डल के साथी और हर जगह छोटे-बड़े अखबारों से जुड़े लोग, फिर गाँव-गाँव सांस्कृतिक संघ और पंचायतें। यानी कि देश में आप ऐसी लहर बनाकर व्यापेंगे कि आपका मखौल उड़ानेवाले ये टटपूँजिए मारे जलन के हाय-हाय नहीं कर पड़ें तो मेरा नाम वल्लभ नहीं।’

यूँ कहकर वल्लभ दादा अपनी जगह से उठे और पास की आलमारी खोलकर उसमे से एक अलबम निकालकर विलीन बाबू के बिल्कुल पास आ बैठे। उस बड़े से अलबम का पहला ही पृष्ठ वल्लभ दादा ने खोला तो विलीन बाबू की आँखें फटी की फटी रह गईं। उस पृष्ठ पर विलीन बाबू के युवा काल का एक खूबसूरत सा फोटो करीने से चिपका हुआ था। वल्लभ दादा ने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया - ‘इसका सारा खर्च कलेक्टर साहब ने खुद किया है। शेष सारे पृष्ठ इसलिए खाली रखे हैं कि यह अलबम आपको सायकल के साथ ही भेंट किया जाएगा ताकि आप जगह-जगह महत्वपूर्ण लोगों के साथ अपने फोटो निकलवा कर पब्लिसिटी के लिए अपने पास रख सके।

विलीन बाबू के हाथ की चाय ठण्डी हो चुकी थी। समोसे जस के तस पड़े थे। अपनी यादों में वे शायद सायकल पर पैडल मारते हुए किसी स्वप्नलोक की यात्रा कर रहे थे। उन्होंने छोटा-सा सवाल किया, ‘मुझे क्या करना है?

एक मुक्का टेबुल पर मारते हुए वल्लभ दादा ने उनसे कहा, ‘बस यही वह मुकाम है जहाँ आपको ध्यान रखना है। आपको करना बस यही है कि परसों तक यह बात किसी से कहनी नहीं है। अपनी घरवाली से भी नहीं, बच्चों से भी नहीं। कल जब अखबारों में सब कुछ छपेगा तब लोगों को अपने आप मालूम पड़ जाएगा। आपके आवास  पर बधाई देनेवालों का ताँता लगेगा। आप मुस्कुराते हुए फूलहार स्वीकार कर लीजिएगा। अगर आप फूट गए तो परसों सुबह तक लोग इस प्रोजेक्ट को लँगड़ी मार सकते हैं। कान से जरा से कच्चे हैं हमारे कुछ लोग। वे लोग इसके आर्थिक पक्ष पर विचार करने लग जाएँगे। साफ लग रहा है, इस यात्रा में आपको गाँव-गाँव नकद राशि भी मिलने की सम्भावना है। ऐसा नहीं हो कि प्रोजेक्ट आपकी जरा-सी लापरवाही से ध्वस्त हो जाएँ। पूरे 48 घण्टे तक आपको इस योजना को इस तरह सँभालना है जैसे एक गर्भवती सद्गृहिणी अपनी कोख में अपना वंश-पल्लव सँभालती है। आप बस चुप्पी लगा लीजिए। मैं कलेक्टर साहब से बात करता हूँ।’

विलीन बाबू उठने लगे तो वल्लभ दादा ने उनके हाथ में उनकी ब्राण्ड की सिगरेट का पूरा पैकेट थमा दिया। गम्भीर मुद्रा में विलीन बाबू उठ खड़े हुए। उन्होंने वल्लभ दादा के पाँव छुए। कहने लगे, ‘आपका एहसान मैं जीवन-भर नहीं भूलूँगा आपने मेरे जीवन का रास्ता ही बदल दिया है। मैं आज्ञा लेता हूँ।’

उनको गले से लगाते हुए वल्लभ दादा ने कहा, ‘इस ससुरालवाली सायकल पर आप बस अन्तिम बार सवारी कर लो। इसके बाद इसे दस साल के लिए सम्भाल कर रखने का निर्देश, परसों विदा होते समय अपने स्वागत भाषण में दे दीजिएगा। हम लोग कोशिश करेंगे कि इस सायकल को पुरातत्त्व वाले अपने जिला संग्रहालय में रख लें। वापस आकर आप चाहें तो लिखा-पढ़ी करके इसे ले लेना या फिर यह राष्ट्र की सम्पत्ति हो ही जाएगी। आपको अग्रिम बधाई।’

और विलीन बाबू जिला सूचना मुख्यालय से विदा हो गए।

आगे कहानी बहुत छोटी-सी है। विलीन बाबू से पीड़ित दोस्तों ने तत्काल चन्दा किया। एक ब्राण्ड न्यू सायकिल खरीदी। यात्रा का बढ़िया बोर्ड लिखवाया। रात भर यहाँ-वहाँ भागकर फोन-फून करक दूसरे दिन के अखबारों में विज्ञापन मैनेज किए। तरह-तरह के विशेषण और अलंकारों के साथ विलीन बाबू का जीवन-वृत्त छपने की व्यवस्था की। अगले दिन वाले -समारोह के शामियाने और फूलहार की व्यवस्था की। अखबारों में विज्ञापन आने के बाद सारा दिन विलीन बाबू के घर पर तरह-तरह के लोगों को भेजकर फूलहार और गुलदस्तों के साथ बधाइयाँ देने वालों की लिस्ट बनाकर उनको सावधान किया। रहस्यमय चुप्पी की हरएक ने कसम खाई। जैसे-तैसे एक महीने के भ्रमण का चार्ट बनाया। उस बोगस परिपत्र का मसविदा बनाया जो कि इस यात्रा को लेकर सारे देश में प्रसारित किया जाने वाला था। स्थानीय और प्रादेशिक पब्लिसिटी की व्यवस्था की। कलेक्टर साहब को समझा-बुझाकर विदाई-समारोह में मुख्य अतिथि बनने के लिए सहमत किया। श्रीमती विलीन को इस विदा बेला में आश्वस्त करने के लिए एक हजार रुपयों का चन्दा अलग से किया। दस सालों तक ‘प्रवंचना’ का काम कौन देखे और विलीन बाबू का मानस-पुत्र यह अखबार बन्द नहीं होने देने का वादा कौन करेगा, यह तय किया। विदाई समारोह के निमन्त्रण पत्र किस संस्था के नाम से छपेंगे। इसकी सावधानी बरती। सीधा-सा गणित था कि अगर आज चार-पाँच हजार रुपया सालाना पड़ता है। यानी कि पचास रुपया खर्च करके पूरे दस साल तक की राहत मिलती है तो यह खर्च कुल मिलाकर पाँच सौ रुपया महीना भी नहीं हुआ। दो रुपए रोज से भी कम में एक प्रोजेक्ट सफल हो रहा है। सौदा घाटे का नहीं है। विलीन बाबू के बीवी-बच्चे क्या करेंगे, इसके लिए एक ‘विलीन हितैषी सभा’ का नियमन करके, समय-समय पर सुविधा, बाल-बच्चों को प्रवास के दौरान पड़ावों पर ले जाकर मिलवाने और दो-एक दिन साथ रखवाने का आश्वासन तैयार किया गया। यानी कि भाई लोग रात-भर इसी काम में लगे रहे।

दूसरे दिन सारा शहर अखबार देखकर भाैंचक था। विस्तार से विलीन बाबू की यात्रा के समाचार शहर से निकलने वाले सभी अखबारों में थे। एक-दो में विलीन बाबू का फोटो भी था। प्रदेश के बड़े शहर से आने वाले एकाध बड़े अखबार ने भी इस समाचार को प्रमुखता से छापा। विलीन बाबू की पत्नी और बच्चे अचकचाए, परेशान, सारे दिन बधाई देने वालों को देखते रहे। समय का अन्तराल देखकर पत्नी ने पूछा भी सही कि पूरे दस साल का मामला है। यह क्या कर रहे हो?

विलीन बाबू वल्लभ दादा को दिए गए वचन के अनुरूप चुप थे। छोटा सा उत्तर देते रहे - ‘मालूम पड़ जाएगा। जरा तसल्ली रखो। यह छोटा सा सवाल नहीं है। घर-परिवार क्या होता है? सारा देश मेरा घर है।’ पत्नी ने माथा ठोक लिया।

तीसरे दिन निर्धारित समय पर विलीन का विदाई समारोह बहुत ही शानदार ढंग से सम्पन्न हुआ। सारा पैंतरा नपातुला था। कहीं, कोई चूक नहीं हुई। यारों ने विलीन बाबू को फूलमालाओं से लादकर इतने फोटो निकलवाए कि विलीन बाबू निहाल हो गए। आधा दर्जन फोटो विलीन बाबू की पत्नी के साथ, उनके, अकेले के अलग से खिंचवाए गए, ताकि वक्त जरूरत काम आएँ। कुंकुम तिलक लगाया गया। नारियल, शाल, सायकल और तरह-तरह की भेंटंे। एक से एक आला भाषण, विलीन बाबू गद्गद। दोस्त लोग अश्-अश्। शहर के हजारों लोग समारोह के साक्षी। तरह-तरह की बातें विलीन बाबू के लिए। कोई उन्हें ‘शहर की शान’ कह रहा है, कोई ‘मिट्टी का सच्चा सपूत’ तो कोई ‘गुदड़ी का लाल’, किसी को उनमें ‘विश्व सायकल चैम्पियन’ नजर आ रहा है तो कोई ‘त्यागी-बैरागी’ और ‘संन्यासी’ तथा ‘ब्रह्मचारी’ से उनकी तुलना कर रहा है। कुछ लोग बतियाते सुनाई पड़े, “देखो! यार लोग इसे ‘निकम्मा’ और ‘रोटीराम’ कहकर मजाक उड़ाया करते ये। पर आखिर देश की चिन्ता में सारे शहर में एक ही पट्ठा निकला!” तभी तरह-तरह के नारे लगने लगे। ‘विलीन बाबू जिन्दाबाद!’, ‘भारत माता की जय!’,  ‘शहर का सपूत अमर रहे!’ यानी कि तरह-तरह के नारे। नारों में एक मरा-मरा सा नारा उछला, ‘वल्लभ दादा जिन्दाबाद’। विलीन बाबू ने सायकल पर पैडल मारना चाहा, पर दौड़कर वल्लभ दादा ने उनको गले से लिपटाते हुए बाँहों में भर लिया। खींचते हुए भीड़ से जरा-सा एक तरफ ले जाकर विलीन बाबू के कान में फुसफुसाए - ‘यात्रा संभल कर करना। तबीयत का ध्यान रखना। समाचार बराबर देते रहना, इधर की चिन्ता मत करना, वक्त-वक्त पर प्रेस नोट इधर भी भेजना और हाँ, यह कलेक्टर जरा टेढ़ा आदमी है। इसकी चपेट से दूर रहना। दस साल से पहले अगर आपने इस यात्रा को भंग कर दिया तो जो यहाँ कलेक्टर आएगा, वह तो आप पर मुकदमा चलाएगा ही, पर यह जहाँ भी रहेगा, वहाँ कुछ न कुछ करेगा जरूर। तो यह यात्रा दस के बदले ग्यारह बरस की कर लेना।’ और विलीन बाबू की पीठ सहलाते हुए भरी-भरी आँखों से वल्लभ दादा ने यात्रा की सफलता की शुभ-कामना देते हुए विलीन बाबू को सायकल पर चढ़ा दिया। 

मित्र-मण्डल चकित था कि आखिर वल्लभ दादा ने असम्भव को सम्भव में कैसे बदल दिया!
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मनुहार भाभी - कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - नीलकंठ प्रकाशन, 1/1079-ई, महरौली, नई दिल्ली-110030
प्रथम संस्करण 2001
मूल्य - 150/- रुपये
सर्वाधिकार - लेखक
मुद्रक - बी. के. ऑफसेट, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032



रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक, अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।
  

जीत गया भई जीत गया (‘मनुहार भाभी’ की इक्कीसवीं कहानी)



श्री बालकवि बैरागी के
प्रथम कहानी संग्रह
‘मनुहार भाभी’ की इक्कीसवीं कहानी




जीत गया भई जीत गया  

काना बा जब तक जिए, कुछ न कुछ वैसा करते रहे जिसका कोई अन्दाज भी नहीं लगा सकता था। हमेशा वे ऊलजलूल रहे। लोग आज भी कहते हैं कि उनकी आत्मा आज जहाँ भी है, वहाँ भी काना बा वैसा ही कुछ ऊटपटाँग कर रहे होंगे। उनके हमजोली आपस में मिलते ही ‘जय रामजी की’ बाद में करते हैं ‘जय काना बा की’ पहले करते हैं। गाँव में एक तरह से उनके क्रिया-कलाप, किंवदन्ती बनते जा हैं। यह अलग बात है कि उनके नाम पर लोग और भी न जाने क्या-क्या लिख-लिखा रहे हैं। पर काना बा थे एक मजेदार और जिन्दादिल आदमी। अपनी

धुन में मगन। गाँव का कोई परिन्दा तक ऐसा नहीं बचा, जिसको काना बा ने कभी न कभी छेड़ा नहीं हो। छोटा हो या बड़ा, बहिन हो या बेटी, सास या बहू, वहाँ का हो या बाहर का, काना बा की फेंट में कम से कम एक बार तो सभी को आना पड़ा ही होगा। वे गाँव के लिए जरूरी थे। उनके बिना न तो गाँव का सवेरा होता था, न गाँव की शाम पड़ती थी। लोग कहते थे कि इतना संजीवन आदमी पूरे सौ बरस जिएगा। पर शायद भगवान को भी काना बा की जरूरत अपने यहाँ ज्यादा थी, उसने काना बा को शास्त्र में लिखी उम्र से तीस बरस पहले ही उठा लिया।

इस जमाने में सत्तर बरस की उम्र भी भला कोई उम्र होती है? साठ-पैंसठ तक तो इन दिनों माथा भी नहीं दुखता। काना बा तो आखिर एक ठहाकेबाज आदमी थे। पता नहीं वे कैसे इतनी जल्दी मर गए?

बहुत सादा लिबास था काना बा का। घुटनों तक धोती, बदन पर आधी आस्तीन वाली लट्ठे की बण्डी और सिर पर सफेद उलझी-उलझी आँटेदार पगड़ी। कन्धे पर एक अँगोछा, पाँवों में अपनी गली के कारीगर का बनाया ठेठ लोकल जूता। दस-बीस दिनों में काना बा एक दिन शंकर काका से हजामत बनवा लेते। न छोटी न बड़ी, पर मूँछें रखते जरूर। मरद का मूँछ से रिश्ता वे न जाने किन-किन दोहा-चौपाइयों से जोड़ते और आज के सफाचट छोरों को छेड़ते। आल-औलाद कुछ थी नहीं। छोटी-मोटी खेती कर-करा लेते और दोनों डोकरे-डोकरी चैैन से जिन्दगी काटते। सारे गाँव से हँसते-बोलते जन-जीवन को सहज बनाए रखते थे। काना बा के जाने के बाद गाँव में एक कमी जरूर पैदा है। डोकरी अकेली रह गई और सुखदेव की होटल हमेशा के लिए सूनी हो गई। दस-बीस मिनट लेट चाहे हो जाएँ, पर काना बा के चाहने वाले कहते थे-‘काना बा एक्सप्रेस आएगी जरूर’ और आस-पास वालों को छेड़ते-छटकाते काना बा आ ही जाते। भाई लोग काना बा को चाय पिलाते तो कभी जिद करके उनसे पी लेते। लोग जब उनसे पीते तो कहते, ‘अपने बाप का माल उड़ा रहे हैं।’ और जब उनको पिलाते तो कहते, ‘आखिर बूढ़ा बाप है। सेवा तो करनी ही होगी। बेचारे के है ही कौन जो चाय की भी पूछे?’

काना बा मजाक में शामिल होते, न वे किसी का बुरा मानते न कोई उनकी बात का बुरा मानता। बस एक छगन चौधरी ही इस गाँव में ऐसा था, जिसका काना बा से अबोला हो गया। लोगों का कहना है कि उसमें भी काना बा का कोई कसूर नहीं है। छगन चौधरी ने काना बा को जो काम सौंपा था, वह उन्होंने पूरी निष्ठा से किया। फिर भी अगर छगन चौधरी टेढ़ा होता है और मुँह फुलाता है तो यह छगन चौधरी की गलती है। काना बा को मरते दम तक इस बात का मलाल था कि छगन चौधरी ने काना बा को गलत समझा। काना बा के शब्दों में ‘यह छगन मुझसे बिना किसी बात के लिए के फिरंट है। भगवान जानता है, कि मैंने कोई बेईमानी नहीं की। भला मुझे क्या तो छगन से लेना और क्या किशन का देना! न कोई मेरा दबैल, न मैं किसी की रखैल। मेरे लिए सभी बराबर हैं। अगर छगन मुझे वैसा नहीं कहता तो मैं वैसा करता भी नहीं। भगवान सब जानता है। न्याय वही करेगा।’ गाँव के लोगों ने भी हजार बार छगन को समझाया पर छगन है कि काना बा को गालियाँ दिए ही जा रहा है। काना बा मरते-मर गए पर छगन को समझा नहीं सके। एक यही मलाल काना बा को अपने मन में पाल कर मरना पड़ा।

काना बा के शब्दों में बात कोई बहुत बड़ी भी नहीं थी। गाँव ने इस घटना का तरह-तरह से चटखारा लिया।  किशन भाई तो इस घटना के बाद काना बा का भगत हो गया। रोज काना बा से किशन भाई का यही आग्रह रहता था कि काना बा अपना एक फोटो उसे दे दें, ताकि वह अपने घर में लगाकर काना बी की उपासना करता रहे।

मामला बहुत छोटा-सा था। ग्राम पंचायत का चुनाव था और काना बा के वार्ड से छगन चौधरी और किशन भाई पंच पद के लिए खड़े हो गए। कुल मिलाकर दो ही उम्मीदवार थे। साफ-सुथरा वार्ड था और वोटों का गणित भी खुल्ला खेल फर्रूखाबादीे था। हार-जीत एक या दो वोट से ही होने वाली थी। अपनी-अपनी जगह दोनों के वोट पक्के थे। काना बा के पास दो वोट थे। एक अपना खुद का और दूसरा डोकरी माँ का। छगन चौधरी ने डोकरी माँ से अपने सिर पर हाथ रखवा गंगाजली उठवा ली थी कि उनका वोट हर हालत में छगन चौधरी के हाथी पर मुहर लगा कर उसी को मिलेगा। सारा दारोमदार काना बा के वोट पर था। छगन चौधरी काना बा की तलाश में खेत, काँकड़ और आसपास के खलिहान तक देख आया था। उसे डर था कि कहीं ऐसा न हो कि किशन भाई काना बा के पाँव पड़ ले और नाव तैरा ले जाए। अगर काना बा ने किशन की नाव पर छाप लगा दी तो यह बात पक्की थी कि छगन चौधरी का हाथी बैठ जाएगा। सारा कबाड़ा हो जाएगा। और संजोग देखिए कि सुखदेव की होटल पर काना बा को एक ही साथ दोनों ने घेर लिया। काना बा ने दोनों की बात सुनी और अपना फैसला सुनाया, ‘देखो भैया! तुम्हें तो पंचायत की कुर्सी का चस्का लगा हुआ है पर मेरे लिए तो यह चनाव घर-गिरस्ती की टूटन और जुड़न का मुद्दा बन गया है। डोकरी से मेरी बात हो गई है। अपना वोट....’ और काना बा अपनी बात पूरी करें, तब तक छगन चौधरी ने काना बा के पाँव पड़ते हुए निवेदन कर ही दिया कि ‘काना बा, आप हाथी पर छाप लगाकर वोट मुझे दे देना।’

किशन भाई के लिए अब करने को कुछ बचा नहीं था। वह समझ गया कि काना बा और डोकरी का पैक्ट हो गया है। काना बा के दोनों वोट उसके खिलाफ जाएँगे। छाप हाथी पर ही लगेगी।

काना बा ने छगन चौधरी को उठाया और कहा-‘देख छगन! हम डोकरे-डोकरी ने साथ जीने और साथ मरने की कसम खा रखी है। इस वोट के लिए हम अपना एका नहीं तोड़ेंगें। सुन भाई किशन! तू अपना दूसरा कोई बन्दोबस्त कर ले। काना बा के भरोसे तेरी नाव तरेगी नहीं। काना अपनी छाप हाथी पर लाएँगे और वोट छगन को ही देंगे। इसमें खोटा मानने की बात नहीं है। काना बा लल्तो-चप्पो वाला आदमी नहीं है। जो कुछ कहना है, वह खुल्लमखुल्ला। क्यों भाई! ठीक है कि नहीं?’ काना बा ने होटल में बैठे सभी लोगों से पूछा। काना बा के केरेक्टर को सभी जानते थे। बूढ़े ने जो कह दिया वह जरूर कर देगा। सभी ने मजाक किया, ‘जीत गया भई जीत गया। हाथी वाला जीत गया!’ काना बा ने रोका, ‘ठहरो! पहले वोट पड़ जाने दो। चल किशन! आज की चाय तेरी तरफ से हो जाए। ऐसा खरा आदमी भी तुझे नहीं मिलेगा, जो मुँह पर कह रहा है कि तेरी नाव में मैं नहीं बैठूँगा।’ 

छगन चौधरी आश्वस्त हो गया और किशन भाई ने सभी को चाय पिला कर सुखदेव की डायरी में उधारी चढ़वा ली। काना बा चल दिए। लोग भी इस तरह बिखर गए, मानो मुख्य अतिथि किसी समारोह से चल दे और सारा सरंजाम अबेरने वाले भी नहीं मिलें। सुखदेव अपने पंखे को चलाने लग गया।

ऐन चुनाव के दिन छगन चौधरी ने काना बा को प्रणाम करने का एक चांस और लिया। काना बा के पास जाकर उसने अपना नकली मत-पत्र थमाया और खूब समझा दिया कि हाथी ऊपर है, और नाव नीचे। आप हाथी पर छाप लगाकर वोट मुझे दे दें। भगवान आपका भला करेगा और मैं गाँव की सेवा ईमानदारी से करूँगा।’ काना बा ने नकली मत-पत्र को उलट-पलट कर देखा।

छगन चौधरी ने काना बा को फिर समझाया, ‘भीतर आपको मत-पत्र मिलेगा, वह हूबहू ऐसा ही होगा।’ उम्मीदवार कुल दो हैं, इसलिए ज्यादह लफड़ा भी नहीं है। आपका आशीर्वाद मिल जाएगा तो इस पंचायत का सरपंच मैं ही बनाया जाऊँगा।

सारी गोटियाँ फिट बैठ चुकी हैं।’ और छगन चौधरी दूसरे मतदाताओं से सम्पर्क करने चला गया।

बेईमानी का कोई सवाल ही नहीं था। काना बा ने पहले डोकरी को भेजा, डोकरी माँ ने अपना वोट डाला। फिर काना बा भीतर गए। चुनाव अधिकारीजी से मत-पत्र लिया, सील ली। बूथ के भीतर गए। छाप लगाकर बाहर आए और जैसा सभी ने डाला वैसा अपना वोट पेटी में डालकर बाहर आ गए। उन्होंने छगन चौधरी को ढूँढ़ा पर पता चला कि वह दूसरे वोटरों को लेने पास के खेतों और कुओं पर गया है।

दोपहर वाली बस से काना बा और डोकरी दोनों तीन-चार दिनों के लिए शिप्रा-स्नान के लिए रवाना हो गए।

शाम को मत-पेटी खुली। वोटों की गिनती हुई । हाथी और नाव दोनों को बराबर-बराबर वोट मिले। न एक कम न एक ज्यादा। यह भी इसलिए हुआ कि छगन का एक वोट रद्द हो गया। इस बात पर बहुत हो-हल्ला हुआ, पर बात कानूनी थी, और जो मत-पत्र रद्द हुआ वह रद्द होने वाला ही था। छगन चौधरी जीती-जिताई बाजी हारने की आशंका में उदास था। किशन की आँखों में नई चमक थी। चुनाव अधिकारी ने नियमानुसार लॉटरी डालकर फैसला करने की घोषणा की। दोनों के नाम की पुर्जियाँ बनाई गईं और पाँच बरस के अबोध बच्चे से उठवाई गईं। नियम था कि जिसके नाम पर पर्ची बच्चा उठा ले, वह हारा हुआ माना जाएगा। जो पर्ची नीचे रह जाएगी जीता हुआ घोषित होगा। दोनों के कलेजे धक-धक कर रहे थे - ‘हे भगवान! बच्चा कहीं मेरी पर्ची न उठा ले!’ पर आखिर जीतना तो किसी एक को ही था।

बच्चे ने जो पर्ची उठाई वह छगन चौधरी के नाम की थी। छगन चौधरी हार गया। चुनाव अधिकारी ने नियमानुसार किशन भाई को विजयी पंच घोषित कर दिया। पंचायत चुनाव का पहला दौर निर्विघ्न सम्पन्न हो गया। उस वार्ड में हाथी हार गया और नाव जीत गई। छगन चौधरी के घर में स्यापा छा गया। मातम में सारा परिवार डूब गया। गाँव में कहावत बन गई कि डूबती नाव इस तरह तैर जाती हैं। हारा हुआ आदमी गोटी में जीत गया। इसको कहते हैं राजयोग और भाग्य की बात। भाग्य बली तो गोटी खुली।

पाँचवें दिन हनुमानजी के मन्दिर के पास ही बस-स्टैंड पर काना बा डोकरी के साथ उतरे। डोकरी को उन्होंने घर भेजा और चुनाव का समाचार लेने तथा अपनी हाजिरी गाँव में लिखाने के लिए वे सीधे सुखदेव होटल पर खड़े हो गए। चलना ही कितना था? मुश्किल से पचास कदम का फासला था। गाँव में हल्ला मच गया,  ‘काना बा आ गए, काना बा आ गए’ काना बा ने बेंच पर अपना आसन ग्रहण किया, तब ही भागा-भागा, लपका-लपका किशन भाई वहाँ पहुँचा और काना बा के पाँवों में गिर पड़ा- ‘काना बा, आपकी जय हो, आपका आशीर्वाद मुझे मिल गया।’ मेरे लायक सेवा बताइए ।

बात यहाँ तक पहुँच चुकी थी कि पंचों के चुनाव के बाद तीसरे ही दिन सरकार ने सभी पंचों की बैठक बुलाकर ग्राम पंचायत के सरपंच का चुनाव भी करवा दिया था और किशन भाई उसमें सरपंच चुन लिए गए थे। यह भी पता चला कि कल ही किशन भाई को तहसीलदार साहब सरपंच का चार्ज दिलवाने के लिए आने वाले हैं।

गाँव के मनचले लोग घर से किसी तरह खींच-खाँच कर छगन चौधरी को भी होटल पर ले आए, ‘कब तक घर में बैठे रहोगे चौधरी साहब! यह चुनाव है। परजातन्तर में हार-जीत होती रहती है। चलो बाहर निकलो। काना बा याद कर रहे हैं।’ काना बा का याद करना सुनकर छगन चौधरी ने पाँव माँडे। बाहर आया और जैसे-तैसे सिर नीचा करके होटल पहुँचा। काना बा के दोनों वोट डंके की चोट पर उसे जो मिले थे।

आते ही छगन चौधरी ने कहा, ‘काना बा एक वोट से अपना कबाड़ा हो गया। अगर एक वोट खारिज नहीं होता तो आज किशन भाई सरपंच नहीं होता। आपका यह सपूत इस पद पर आपको मिलता। लगता है आपके आशीर्वाद में कोई कमी रह गई। लेकिन आप भी क्या करते? आपने तो दोनों वोट हाथी को दिए ही हैं!’

काना बा ने ढाढस बँधाते हुए कहा, ‘मन छोटा करने की बात नहीं है। तुम हारे नहीं हो। एक ही वोट का मामला है तो लो आपका एक वोट। हाथी पर छाप लगा-लगाया बिल्कुल मेरा वोट।’ और काना बा ने अपनी पगड़ी की उलझी आँटों में सँभालकर रखा गया अपना असली मत-पत्र फैलाकर पंचों के सामने रख दिया।

छगन चौधरी के दीदे फटे के फटे रह गए। वह चीख पड़ा, ‘काना बा! ये क्या किया आपने? इस वोट को पेटी में क्यों नहीं डाला?’

बहुत ही सहज भाव से काना बा बोले, ‘आपने ही तो कहा था, कि हाथी पर छाप लगाना और वोट मुझे दे देना। यदि आप ऐसा नहीं फरमाते तो काना बा ने कोई भाँग खा रखी थी, जो इस वोट को इतना सँभालकर रखता और शिप्रा तीरथ करा कर वापस सँभालकर लाता? तीरथ से सीधा आया हूँ, भगवान और मेरा राम अपने बीच में है। भरी जाजम पर आपका वोट आपको दे रहा हूँ। कल तहसीलदार साहब पधारें तो यह वोट उनको दे देना और आपके वोटों में शामिल करवा कर गिनवा देना। मरूँ-मरूँ क्यों करते हो? अब तो जीत गए आप?’ और किशन भाई की तरफ मुँह करके बोले, ‘किशन्या, कल तू चारज मत लेना। मेरा वोट असली है। अगर उसी दिन छगन मुझे मिल जाता तो मैं यह वोट इसको देकर शिप्रा के लिए निकलता। पर यह मिला नहीं, मैंने अपनी पगड़ी में वोट को सँभालकर रख लिया। वोट आखिर परजातन्तर है। इसको जेब में तो रखना चाहिए नहीं। नेहरूजी ने कहा था कि वोट बहुत पवित्र चीज है। मैंने पूरे पाँच दिनों तक इसे माथे पर चढ़ा कर पगड़ी में सँभाला है।” लोग ठहाके लगा रहे थे, छगन दाँत पीस रहा था। किशन किलकारियाँ भर रहा था। सुखदेव की भट्टी का पंखा थम गया था।

सुखेदव ने पूछा, ‘काना बा, आप इस वोट को बाहर लाए कैसे? पेटी में आपने क्या डाला? यह चकमा दिया कैसे?’

‘लो तुम लोग इसे चकमा कहते हो? अरे मैंने कितना बड़ा खेल खेला, अपने वचन को निभाने के लिए! वो जो मत-पत्र छगन मुझे समझाने के लिए दे गया था, उस पर इसका हाथी तो था पर किशन की नाव नहीं थी। पेटी में तो मैंने वही पुर्जा डाल दिया था। इन सरकार के लोगों की आँखों में धूल झोंकने में लगता क्या है! मैं दस बार वैसा कर सकता हूँ। कागज के जैसा कागज था। मैंने वह डाल दिया। अगर छगन यूँ नहीं कहता कि हाथी पर छाप लगाकर वोट मुझे देना तो मैं इतनी चतुराई करता ही क्यों? आखिर डोकरी ने हाथी पर छाप लगा कर वोट पेटी में डाला कि नहीं? तुम सभी लोगों ने अपने-अपने वोट डाले कि नहीं? क्या मुझे नहीं पता था कि वोट कहाँ डाला जाता है? आज तक वोट डालता आया ही हूँ! कोई नया काम तो नहीं है! आज तक इतनी ऊमर ली है।’ काना बा का भाषण जारी था। सभी झूम रहे थे। वे चालू रहे, ‘बोलो भाई! उस दिन आप सभी यहाँ थे। आखिर छगन ने मुझी से क्यों कहा कि छाप लगा कर वोट मुझे देना? तुम सभी से वैसा क्यों नहीं कहा? इस छगन के मन में चोर था। मुझ पर भरोसा नहीं था।’

छगन का मन हुआ कि सामने से एक पत्थर उठा लाए और खुद अपना करम ठोक ले। वह जीता हुआ हार गया था। उसने काना बा के हाथ से वोट लिया। लिया क्या, करीब-करीब छीना और सुखदेव की भट्टी पर रख कर पंखा चला दिया। मत-पत्र जलकर राख हो गया। काना बा ने पूछा, ‘अरे! अरे! छगन्या! ये क्या करता है? क्या ये तेरे काम का नहीं है?’

दाँत पीसता हुआ, जबड़े भींचता हुआ, छगन चौधरी बोला- ‘मेरे बाप बराबर हो इसलिए आपको जेल जाने से बचाने के लिए ऐसा कर रहा हूँ। कल अगर तहसीलदार ने यह मत-पत्र देख लिया तो सीधे छः महीने के लिए ताड़ियों में बन्द कर दिए जाओगे। कोई जमानत देनेवाला नहीं मिलेगा। बड़े आए वोट देने वाले!’ इसी बीच सुखदेव का सुर उछला, ‘हाँ काना बा! आज चाय पियोगे कि पिलाओगे? बोलो क्या इच्छा है?’ ‘आज की चाय छगन के नाम पर होगी। छगन ही पिलाएगा।’

छगन का मन हल्का हो गया, सरेआम प्रमाणित हो गया था कि वह सचमुच में हारा नहीं था। काना बा अगर उसे शब्दशः नहीं लेते तो वह जीता-जिताया था। सभी ने देखा कि किशन भाई चुप से हो गए हैं। जो चमक उनके चेहरे पर थोड़ी देर पहले थी, वह कम होती जा रही है। उन्होंने काना बा से कहा-‘काना बा आज की चाय मेरी तरफ से हो जाए, मेरे खाते में लिख लेगा सुखदेव।’

‘नही! नही!’ काना बा बोले, ‘आज काना बा तीर्थ से आए हैं, अपन आज हाथी पर ही बैठेंगे। क्यों छगन, ठीक है ना? लगाओ रे लगाओ, अब तो छगन चौधरी के जीतने का नारा लगाओ’, काना बा जोर से बोले-‘जीत गया भई जीत गया’ नारे को पूरा किया किशन भाई ने, वह बोला, ‘हाथी वाला जीत गया’। गाँव में सहजता वापस लौट आई। 

काना बा जब तक जिए ऐसे ही ऊटपटांग काम करते रहे। गाँव को आज उनकी सख्त जरूरत है। आप किसी से भी पूछ देखें। कहता तो छगन भी यही है।

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मनुहार भाभी - कहानियाँ

लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - नीलकंठ प्रकाशन, 1/1079-ई, महरौली, नई दिल्ली-110030
प्रथम संस्करण 2001
मूल्य - 150/- रुपये
सर्वाधिकार - लेखक
मुद्रक - बी. के. ऑफसेट, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032



रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक, अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।

 


बाइज्जत बरी (‘मनुहार भाभी’ की बीसवीं कहानी)



श्री बालकवि बैरागी के
प्रथम कहानी संग्रह
‘मनुहार भाभी’ की बीसवीं कहानी




बाइज्जत बरी  

हाईकोर्ट में बरामदे में कोई खास चहल-पहल नहीं थी, होती भी कैसे? कौन-सा इतना बड़ा मामला था? आए दिन इस तरह के मामले आते रहते हैं और अपराधियों को छोड़ा जाता है। गवाह पुख्ता मिलने पर सजा के लायक जो होते हैं, उनको सजाएँ होती रहती हैं। कुछ वकीलों की आवाजाही, कुछ जूनियरों का आना-जाना और कुछ मुंशियों की भाग-दौड़, हर फैसले के साथ यही कुछ गहमागहमी हो जाती है और लोग आते-जाते रहते हैं। हाँ, कोई बहुत ही जरूरी या महत्व का मामला हो तो कुछ भीड़-भड़क्का हो जाता है। पक्षकारों के हेतु-मुलाकाती या नाते-रिश्तेदार जुट जाते हैं और तारीख-पेशी बढ़ने के साथ ही अपने-अपने वकीलों से आगे की समझ लेकर अपना-अपना रास्ता ले लेते हैं। आज भी वैसा असहज कुछ भी नहीं था। गए दो सालों से एक हत्या का मामला चल रहा था, उसका फैसला होना था, यहाँ-वहाँ कभी-कभार एकाध आवाज सुनाई पड़ जाती थी और पूछताछ करके लोग बरामदे की भीड़ अपने आप कम कर देते थे।

पानी काकी जरूर गुमसुम थी और रह-रहकर आकाश देखकर कुछ न कुछ बुदबुदा उठती थी। लगता है कि वह भगवान से प्रार्थना कर रही है। उसके वकील का जूनियर आते-जाते पानी काकी को तसल्ली देता और कहता -‘चिन्ता मत कर पानी काकी! वकील साहब ने अपनी सारी जिन्दगी की पढ़ाई दाँव पर लगा दी है। तुम्हारा काशी छूट जाएगा, छूट ही नहीं जाएगा, वह बाइज्जत बरी होकर कल तक जेल से बाहर आ जाएगा। तुम तो वकील साहब की फीस और मेरा ईनामतैयार रखो। पानी काकी खुश होने की कोशिश करती और फिर कुछ न कुछ बुदबुदा पड़ती।

‘छोटे साहब, आप खुशखबर तो दो, बाकी सब तो मैं करूँगी ही। कोर्ट का दस्तूर पाई-पाई चुकाकर जाऊँगी, मेरा काशी एक बार बाहर आ जाए.......।’ और इसके साथ उसके मुँह से लम्बी साँस से छूटा ‘हे भगवान!’ का निराश बोल निकल पड़ता था।

कहावत है रॉँड का बेटा साँड हो जाता है। काशी के साथ भी यही हुआ। पानी काकी भरी जवानी में रॉँड हो गई। गोद में इकलौता बेटा छोड़कर काशी के बाप ने दम तोड़ दिया। बीमारी मामूली सी थी, पर गाँव-देहात में किसी के पल्ले नहीं पड़ी और पानी काकी जलती जवानी और दो बरस का किलकता काशी गोद में लिए, अर्थी के आसपास फेरे उबरने को धाड़ मारकर खड़ी हो गई थी। तब से आज तक पानी काकी बराबर अपने पाँवों पर ही खड़ी रही थी। उलटे फेरे लेते समय ही उसने मन में अपने राम को राजी लिया था कि काशी के सहारे जिन्दगी काट लेगी। उसने जमाने की कमीनगी से अपनी जिन्दगी को बचाया। पति के बाप-दादों के जमाने से चली आ रही खेती को सम्हाला और कुत्तों-कमीनों से ज्यादा हरामी रिश्तेदारों से अपने सुहाग की सौंपी हुई अचल सम्पदा की रक्षा की। यहाँ-वहाँ मजदूरी कर-कर के वह काशी को भविष्य के लिए तैयार करती रही। जैसे-जैसे काशी बड़ा होता गया, पानी काकी बूढ़ी होती गई। उसके दिन खेतों में और रातें गाँव के मन्दिरों-देवरों में जागरण के गीत गाते कटे। अपने सत से वह कभी नहीं डिगी। दुनिया के लोभ-लालच उसे इधर से उधर हलका-सा टल्ला भी नहीं दे सके। पानी काकी गाँव की नाक बनकर अपनी पहचान बना चुकी थी। गाँव के पास वाले कस्बे के मदरसे में उसने काशी को थोड़ा बहुत पढ़ाया भी। काशी से उसको पूरी उम्मीद थी कि वह अपने बाप का नाम, अपनी माँ का दूध और गाँव की मिट्टी का जस ऊँचा उठाएगा। देवी-देवताओं के मन्दिरों पर गाए गए रतजगे के गीतों पर पानी काकी को पूरा भरोसा था। वे किसी ऐरे-गैरे के नहीं, ठेठ सन्तों के लिखे गीत थे। काशी के कानों में वे गीत बरसों से पड़ रहे थे।

बीस बरस काशी अपने लिए अपनी माँ के द्वारा किए गए ताप और तपस्या की कहानियाँ जब सुनता, तो उसे लगता था कि उसका जीवन अगर माँ के काम नहीं आया तो वह बट्ठड़ है और उसे धिक्कार है। उसे गर्व होता था कि वह पानी काकी का जाया है। व्यवहार में वह विनम्र और बोलचाल में लिहाज वाला माना जाता था। मदरसे में उसके मास्टर उससे खुश रहते थे। किसी तरह की कोई शिकायत काशी की नहीं थी।

पानी काकी ही क्या, गाँव के किसी परिन्दे तक को भरोसा नहीं हुआ, जब गाँव में समाचार यह आया कि जिले के एक नामी-गिरामी अफीम स्मगलर की, पाँच किलो अफीम ले जाते हुए काशी पकड़ा और पकड़े जाते समय हुई छीना-झपटी में दूसरे गिरोह का एक आदमी मारा गया, जिस पर शक था कि वह पुलिस का आदमी हैं। इस मुखबिर की हत्या का इल्जाम काशी पर आया और काशी को पुलिस नेे पकड़कर हवालात में बन्द कर दिया है।  पानी काकी की आँखों में लाल-पीले बादल उतर आए। वह समाचार के सत्य को सह नहीं सकी और बेहोश हो गई। बात सच थी। काशी पकड़ा गया था। 

इस गिरफ्तारी के बाद पानी काकी से कई लोगों ने कहा था कि उन्हें तो बहुत दिनों से पता था कि काशी आए दिनों, किलो-दो किलो माल सायकल पर यहाँ से वहाँ लाता-ले-जाता है और उससे अपना रोज-खर्चा चलाता है। वह इस इलाके का भरोसे का ‘केरियर’ है। आसपास के दो-एक नवयुवक और भी ‘केरियर’ का यह काम करते हैं और अपनी रोटी खाते-कमाते हैं। यह कोई गुनाह नहीं है, गुनाह वो जो पकड़ में आ जाए। कहते हैं कि काशी पर पुलिस की नजर तो बहुत शुरु से थी पर उसकी शराफत के आगे सभी उसे बचा लेते थे। उस पर किसी भी हाकिम ने हाथ नहीं डाला। वह एक ‘शरीफ केरियर’ माना जाता था। माल देने और माल लेने वालों को कभी काशी पर अविश्वास नहीं हुआ। ठहराए हुए पैसों से काशी को दस-पाँच रुपए ज्यादा ही मिल जाते थे। अगर इस केस में हत्या का रगड़ा नहीं होता तो काशी पर कोई भी हाथ नहीं डालता।

पानी काकी इस चोट से करीब-करीब टूट गई थी। गाँव में उसकी इज्जत का पानी उतर चुका था। मुकदमे के लिए लोग पैसा लगाने को तैयार नहीं थे, पर सभी की नजर पानी काकी की जमीन पर थी। काकी थी कि इस कुकर्म के कुकर्मी को बचाने के लिए बाप-दादा की जमीन बेचने को तैयार नहीं थी।

पानी काकी की इस जिद की रक्षा राम ने की। जिसका माल लेकर काशी जा रहा था, उसका आदमी पानी काकी के पास आया और चुपचाप कह गया कि चिन्ता की कोई बात नहीं। काकी अपना मनपसन्द वकील कर ले और मुकदमा दम-खम से लड़े। पाई-पैसों की चिन्ता नहीं करे। बेटा वह बेशक पानी काकी का था, पर आदमी सेठ का था।

एक पल को पानी काकी को लगा कि देखो इस खोटे धन्धे का ईमान! गन्दे लोगों के पास इतना चरित्र होता है, यह पानी काकी के लिए चौंकाने वाली बात थी। एक तरफ दुनिया है कि काकी की जमीन खाने पर तुली है दूसरी तरफ अनदेखा और अनजाना सेठ है कि अपने आदमी को बचाने के लिए थैली खोल कर बैठा है। इतना ही नहीं, पानी काकी को उसने यह भी कहलवाया कि जब तक काशी जेल से नहीं आ जाता, तब तक काकी का सारा खर्चा भी सेठ ही देगा, काकी किसी तरह की चिन्ता नहीं करे। सेठ सामने तो आएगा नहीं, पर काकी की पीठ पर से हाथ हटाएगा भी नहीं। मामला ऊँची से ऊँची कोर्ट तक लड़ने की तैयारी कर ले, सेठ का आदमी चुपचाप आकर काकी को रकम देता रहेगा। सवाल धन्धे और विश्वास का है। काशी करोड़ का है। अगर वह फँस गया है सेठ ने यह माना है कि सेठ खुद या उसका अपना बेटा फँस गया है।

पानी काकी ने खुद को समेट कर अपने जीवन को नए सिरे से जीना शुरु किया। सेठ के आदमी को काकी ने धन्यवाद देकर अपने खुद के लिए किसी भी तरह की सहायता लेने से मना कर दिया। वह भगवान से डरने वाली एक सती माँ थी। भगवान ने उसे इकलौता बेटा दिया है और उसके सामने अभी सारा रँडापा काटने के लिए पड़ा है। बुरा पैसा वह अपने काम में नहीं लेगी। यह पैसा कोई गौमाता का गोबर नहीं है, जिससे वह अपना आँगन लीप ले। रहा सवाल कोर्ट में मुकदमा लड़ने का, सो सेठ जाने और उसका वकील। काशी छूट कर आ गया तो ठीक और नहीं भी आया तो भगवान की मरजी। अपनी मेहनत-मजदूरी वह कर लेगी। अपने पेट की चिन्ता उसे न कल थी, न आज है। आबरू का पानी हो गया, सो हो ही गया है। और पानी काकी भाग्य के नाम पर सब कुछ लिखकर मन्दिर के जागरणों में जाने-आने लगी। उसने अपनी दिनचर्या सहज जीने की नई कोशिश की। समाज ने पानी काकी की डोर को जहाँ से टूटी थी, वहीं से जोड़ने में कोई हीला-हवाला नहीं किया। साल भर तक मामला सेशन कोर्ट में चला और जैसा कि होता है, अपराधी को साँस खत्म होने तक फाँसी की सजा सुना दी गई। मामला काशी की तरफ से हाईकोर्ट में चला गया, अपील हो गई। 

आज उसी हत्या के मामले का फैसला होना था। दो साल मुकदमा यहाँ चला। काशी ने ये तीन साल न्यायालयीन जेल में निकाले। तारीख-पेशी पर जब हथकड़ी-बेड़ी में काशी लाया जाता तो एक नजर पानी काकी उसकी सेहत पर डाल लेती। वार-तेवार जेलों में जाकर उससे एकाध चक्कर मिल आती और अपने दिनों का जोड़-बाक़ी करती रहती। उम्र उसकी दिनानुदिन कम होती जा रही थी। जागरण में गीत-भजन गाते समय उसके सुर में कम्पन जरूर पैदा हुआ था, पर सुर टूटा नहीं था। कभी-कभार उसे एक रोशनी जैसा कौंध कर सन्देश देता था कि तेरा काशी आ जाएगा। और हाइकोर्ट में कुछ तो पानी काकी का भाग्य, कुछ वकील साहब की मेहनत, कुछ गवाह-पुरावा, कुछ बहस और कुछ काशी की किस्मत, कुल मिलाकर जज साहब ने कोर्ट उठने के समय फैसला सुनाया कि ‘साक्ष्य के अभाव में काशी को बाइज्जत बरी किया जाता है।’ काशी ने फैसला सुना और धन्यवादी नजर से न्यायाधीश महोदय की ओर देखा। उसकी फिसलती हुई नजर अनायास पानी काकी पर भी पड़ी औेर काशी की आँखों से आँसू बह निकले। 

इन तीन सालों में काशी कितना बदल गया था! उसने भरे इजलास में मना किया था कि हत्या उसने नहीं की थी और जो माल पकड़ा गया, वह उसका नहीं था, न उसके पास से पकड़ा गया था। पुलिस ने उसे रंजिश में बन्द किया है। यह बयान एक जमा-जमाया और रटा-रटाया बयान था। हर अपराधी यही कहता है। कहते हैं कि जेल में जाना तो आसान है, पर जेल से निकलना बहुत कठिन है। तरह-तरह की खानापूरियाँ, तरह-तरह की औपचारिकताएँ, यह कागज, वह कागज, इसका सर्टिफिकेट, उसका प्रमाण-पत्र, यह ले, वह दे, करते-करते, पूरा एक सप्ताह लगा काशी को बाहर आने में। 

बड़ी जेल के दरवाजे पर पानी काकी और गाँव के दो-चार साथी-संगाती काशी के लिए खड़े थे। कहते हैं कि उस भीड़ में सेठ का आदमी भी कोई न कोई था जरूर। काशी बाहर आया और आते ही माँ से लिपट गया। पानी काकी ने अपने आँचल में काशी का सिर छिपाकर उसे सीने से लगाया। खूब रोया काशी और किसी के चुपाए, चुप नहीं हो सकी पानी काकी।

किसी ने कहा, ‘अभी एक पत्थर और पड़ा है रास्ते में। पुलिस इस मामले को दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में ले जाएगी।’ तभी एक अनजाने आदमी ने कहा, ‘अब क्या होना-जाना? जो फैसला यहाँ हो गया है, वही वहाँ भी समझो।’ यूँ कहकर वह आदमी दूसरी तरफ बढ़ लिया। कहने वालों ने कहा कि यही सेठ का आदमी था। जब तक काशी वापस घर नहीं पहुँचता सेठ का आदमी उसके लिए धन-साधन जुटाए चलता रहेगा।

पूरे तीन साल और एक सप्ताह बाद काशी गाँव में आया था। सूरज ढलने को था। पानी काकी ने सबसे पहले उसे बड़े मन्दिर जाकर देव-दर्शन कर आने को कहा।

पाँच-पच्चीस लोगों का हुजूम काशी के आसपास  ही चल रहा था। सब उसे तरह-तरह की नजर से देख रहे थे। कोई बोल रहा था तो कोई अनमनेपन से ही साथ में चल रहा था। सभी काशी के अपने थे पर उसे सब कुछ पराया लग रहा था। वही गाँव, वही गाँव की होटल, वही गली, वही मुहल्ला, पर काशी को लगा कि कुछ भी उसका नहीं है। दरवाजों पर खड़ी, उसकी मुँह-बोली भाभियाँ और काकियाँ, बुआएँ, बहिनें सभी उसे ऐसी नजर से देख रही थीं, जिसका कि वह आदी नहीं था। न वह किसी से बोला न कोई उससे। चुपचाप मन्दिर गया और दर्शन करके अपने घर पहुँचा। माँ ने कहा-‘नहा ले काशी, फिर खाना परोस देती हूँ।’ काशी नहाने की तैयारी में लगा और पानी काकी ने चूल्हें में लकड़ियाँ लगाकर खाना बनाने की शुरुआत की। 

काम की उमंग, काकी का उल्लास पता नहीं चूल्हे से उठे धुएँ के पहले ही गुबार में गायब हो गया। अपने सगे बेटे के लिए वह खाना बना रही थी पर उसे आज लगा ही नहीं कि एक माँ अपने पेट की आँत के लिए खाना पका रही है। पानी काकी ने थाली लगाई, नहाकर काशी चूल्हे के पास उसी तरह खाने के लिए आ बैठा, जिस तरह तीन साल पहले बैठा करता था।

पता नहीं अनायास काकी को क्या हुआ। उसने थाली उठाई और काशी से कहा-इधर दरवाजे के बाहर आ जा बेटा! आगे-आगे पानी काकी और पीछे-पीछे काशी। पानी काकी ने दरवाजे के बाहर बाएँ हिस्से पर जमीन को अपने आँचल से साफ किया, काशी को बैठने का इशारा किया। काशी कुछ समझ नहीं पाया। वह वहीं खड़ा रहा। पड़ोस-मुहल्ले के दो-चार लोग यूँ ही इकट्ठे हो गए। माँ के हाथ में थाली है और बेटा खड़ा-खड़ा देख रहा है।

‘काशी बेटा! थाली पकड़।’ पानी काकी ने पुचकारते हुए कहा। काकी की आँखें छलछला रही थीं। काशी ने थाली पकड़ी। काकी ने ढलते सूरज को अपने ढालिए से देखते हुए कहा, “बेटा! अन्न देवता की थाली तेरे हाथ में है। मेरी आँखों में आँखें डालकर एक बार कह दे कि तू बेकसूर है। मैं तेरी माँ हूँ, ये देख मेरा ऑँचल, आज आँसू ही नहीं, दूध से भी गीला है। तू मौत के मुँह से वापस आया है, मेरे काशी! पर किसी एक माँ का एक जवान बेटा दुनिया से चला भी गया है। कोरट की बात कोरट में खत्म हो गई। माँ की कोरट भगवान की कोरट से बड़ी होती है। जो भी बोलना हो, मेरी आँखों में आँखें डालकर बोल दे बेटा! मैं मान लूँगी। लेकिन तेरी पलक भी अगर झपकती है तो मेरा दूध सूख जाएगा। वहाँ जज साहब बोले जरूर थे कि तुझे बाइज्जत बरी किया है। पर बेटा! वहाँ तो बस ‘बरी’ हुआ है। ‘बाइज्जत बरी’ तो तुझे यहाँ होना है। तेरे हाथ में अन्न भगवान है और तू माँ की कोरट में खड़ा है। बेटा! यह मेरे दूध का सवाल है। बोल तेरा मन देवता आज जो भी बोल देगा पानी काकी उसे मान लेगी। मुझे भरोसा है बेटा कि मेरा दूध झूठ नहीं बोलेगा। सूरज नारायण अपने घर जा रहे हैं और तेरे हाथ में अन्न की थाली है और सामने माँ।” 

काशी आँसुओं से तर हो चुका था, हाथ की थाली छूटने को थी। बोलने की कोशिश में वह बस माँ-माँ ही कह पा रहा था। काशी के हाथ की थाली पानी काकी ने अपने हाथ में ली, काशी को सहारा दिया। काकी ने देखा कि काशी की पलकें ऊपर उठ नहीं रही हैं, वह बोल नहीं पा रहा है।

पानी काकी ने काशी को वहीं जमीन पर बैठाया, उसके सिर पर हाथ फिराते हुए कहा- “तेरी नजरें माँ से मिल नहीं पा रही हैं। कोई चोर तेरी आँखों में उतर आया है। कोई बात नहीं बेटा! जब तक मैं यहाँ हूँ, जब भी तुझे भूख लगे रोटी माँग लेना। पर बेटा! अब तुझे खाना खाने के लिए बैठना चूल्हे से दूर, दरवाजे के पास इसी जगह पड़ेगा! आते-जाते लोग देख तो लें कि एक ‘बाइज्जत बरी’ आदमी माँ की कोर्ट में किस तरह की सजा भुगत रहा है?” कहकर पानी काकी चूल्हा सँभालने अन्दर चली गई।

काशी ने काँंधे का गमछा मुँह में ठूँसा। शायद वह अपनी निकलती हुई चीख को रोकने की कोशिश कर रहा था। थाली में दाल की कटोरी और ताजी रोटी पर काशी के आँसू टप-टप गिर रहे थे। रास्ते आने-जाने वाले लोग एक पल को वहाँ ठिठकते और फिर आगे बढ़ लेते।
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कहानी संग्रह के ब्यौरे

मनुहार भाभी - कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - नीलकंठ प्रकाशन, 1/1079-ई, महरौली, नई दिल्ली-110030
प्रथम संस्करण 2001
मूल्य - 150/- रुपये
सर्वाधिकार - लेखक
मुद्रक - बी. के. ऑफसेट, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032



रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक, अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।
 



 
 

भला आदमी (‘मनुहार भाभी’ की उन्नीसवीं कहानी)



श्री बालकवि बैरागी के
प्रथम कहानी संग्रह
‘मनुहार भाभी’ की उन्नीसवीं कहानी




भला आदमी  

आदमी को भला होना चाहिए पर इतना भला भी नहीं होना चाहिए कि नींद ही हराम हो जाए। डॉ. कमल इसी पछतावे में आज सो नहीं पा रहे थे। कभी इस करवट तो कभी उस करवट। पर नींद थी कि काया से दूर भागी चली जा रही थी।

जब से डॉ. कमल ने इस शहर में अपना क्लीनिक खोला है तब से आसपास के चार-चार, पाँच-पाँच सी किलोमीटर दूर-दूर तक के बीमार अपनी-अपनी बीमारियों को लेकर अपने रिश्तेदारों के साथ यहाँ पहुँचने लगे हैं। भगवानजी ने डॉ. कमल के हाथ में यश की लकीर भरपूर लम्बी और गहरी दे रखी है। उनका अस्पताल बीमारों से लदालद भरा रहता है। जूनियर डॉक्टर, नर्सें, दाइयाँ, कम्पाउण्डर, वार्ड बॉय और सफाई कामगार मशीन की तरह मरीजों को देखते और परिचर्या करते रहते हैं। क्लीनिक के आसपास छोटे-बड़े दुकानदारों ने अपनी-अपनी गुमटियाँ लगा कर अच्छी-खासी रोटी कमाने का सिलसिला बना लिया है। सामने वाले खुले मैदान की पटरी पर इन दस-पाँच दुकानदारों ने अपने बाजार का नाम ही कमल रख लिया है। इतना यश, इतनी प्रसिद्धि और इतनी लोकप्रियता पाने के बाद डॉक्टर कमल को किसी तरह का दम्भ नहीं था। न वे प्रमादी थे न बड़बोले। अपने काम को भगवान का काम मान कर बिना किसी लोभ-लालच के करते। उन्हें अपने आप से ज्यादा अपने माता-पिता और पहली कक्षा से डॉक्टरी तक की पढ़ाई करानेवाले अपने शिक्षकों, प्रोफेसरों गुरुओं का ध्यान रहता था। जितनी लम्बी फेहरिस्त उनके पास डिग्रियों की थी उतने ही वे ईश्वर भीरु और विनम्र थे। अपना जन्म नगर छोड़ कर उन्होंने अपने जीवन-यापन के लिए इस शहर को चुना, इससे ही इस शहर के भद्र नागरिक अपने आपको गौरवान्वित मानते थे। वे भगवान को धन्यवाद देते थे कि उसने डॉक्टर को यहाँ बसने की सद्बुद्धि दी वर्ना भला इतना भला आदमी और इतना सफल डॉक्टर भला सात समन्दर पार किसी भी दूर देश में जाकर अपनी महारत दिखा देता तो आज उसके वारे-न्यारे हो जाते। पर डॉक्टर  कमल हैं कि उन्होंने अपने देश से बाहर जाने का सोचा भी नहीं। पॉँच-पाँच सौ किलोमीटर दूर तक के लोग डॉक्टर कमल के कारण अपनी सेहत का सुरक्षित मानें इससे अधिक और भला क्या चाहिए? उनकी भलमनसाहत, उनकी सादगी, उनकी ईश्वर-भक्ति, उनकी नियमितता और उनकी शफाकत के किस्से किंवदन्तियों का स्थान ले चुके थे। शहर में किसी के यहाँ कोई साथी-संगाती मित्र-मुलाकाती या नाते-रिश्तेदार आते तो नगर-निवासी बड़े गौरव के साथ उन्हें डॉ. कमल के क्लीनिक तक केवल इस कारण घुमाने लाते थे कि डॉक्टर कमल को एक नजर देख सकें। बड़ी शान से लोग अपने मेहमानों को कहते थे, देखिए वो हैं हमारे डॉक्टर कमल। डॉक्टर अपने काम से काम रखते। लोग उन्हें दूर या पास से देखते और सम्मान दर्शा कर चले जाते।

आज रात ऐसे डॉक्टर को नींद नहीं आ रही थी। वे जानते थे कि केवल भलमनसाहत ने उनकी नींद फुर्र कर दी है। अस्पताल में रात का राउण्ड लेकर मरीजों को दवा वगैैरह की ताकीद करके डॉक्टर कमल ने रात का ड्यूटी चार्ट देखा। स्टाफ को सावधान किया। नर्सों को निर्देश दिए और करीब दस-सवा दस बजे हमेशा की तरह डॉक्टर कमल क्लीनिक के पास वाले अपने आवास में आराम करने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ गए। रात की ड्यूटी वाले जूनियर डॉक्टर ने डॉक्टर कमल को ऊपरी मंजिल के दरवाजे तक छोड़ा। शुभ रात्रि कह कर अभिवादन किया।

हमेशा की तरह डॉक्टर ने अपने जूनियर को हिदायत दी कि रात-बिरात कोई भी पेशेन्ट आए तो बिना किसी झिझक के घण्टी बजाकर उन्हें जगा लिया जाए। ऐसा नहीं हो कि कोई मरीज तड़पता रहे और मैं सोता रह जाऊँ। बीमार के बहाने भगवान हमें पुकारता है इस बात को याद रखना। डॉक्टर कमल का यह वाक्य सनातन था। वे प्रायः इसको दुहराया करते थे और रात को जो भी उन्हें ऊपर तक छोड़ने जाता था उससे यह बात कहना भूलते नहीं थे। ज्यों ही यह वाक्य पूरा होता कि डॉक्टर को ऊपर तक छोड़ने आने वाला शुभ रात्रि कह कर सीढ़ियाँ उतर उतर जाता था।

बैठक का कमरा पार करके डॉ. कमल अपने शयन-कक्ष में पहुँचे। टाई की गाँठ खोली। उसे खूँटी पर टाँगा। मौजे उतार कर पलंग पर धँस से गए। पास वाले पलंग पर दोनों बेटे-रिद्धि कुमार और सिद्धि कुमार-गहरी नींद सो रहे थे। दोनों पर डॉक्टर ने एक पिता की वात्सत्य-भरी नजर डाली। लम्बी साँस ली और पत्नी को आवाज लगाने ही वाले थे कि तह किया हुआ नाइट-सूट हाथ में लिए उनकी पत्नी लतिका सामने आकर खड़ी हो गई। ‘लो, कपड़े बदल लो, फ्रेश हो लो। खाना तैयार है। बच्चे अपना होम वर्क करके अभी-अभो सोए हैं। जरा देर तो उन्होंने रास्ता देखा कि आप आ जाएँ, आपसे चुहल करें पर.....।’
 
‘मेरा खाना खाने का मन नहीं है यार.....तुम खा लो। मैं तब तक......।’ 

मर्द का मन मापने में औरत को एक पल भी शायद ही लगता हो। फिर, लतिका जैसी सहधर्मिणी से भला क्या तो छिपता औेर कैसे छिपता!

लतिका अपने आप में एक मिसाल थी। रामजी ने जोड़ा भी, सोच-समझ कर ही बनाया था। एक भरे-पूरे घर की बहू, एक यशस्वी डॉक्टर की पत्नी, दो भाग्यशाली बच्चों की ममतामयी माँ और अपनी गहस्थी के प्रति एकदम जागरूक। बात-बात में हँँसती-खिलखिलाती। ओंठों पर लिपस्टिक की जगह मुस्कान का लेप लिपटाती लतिका ने जिस तरह अपने सुहाग डॉक्टर कमल के जीवन में बारहों मास बसन्त बना रखा है उसके तो क्लबों और परिवारों में उदाहरण दिए जाते थे। शहर में डॉक्टर तो पचासों थे पर अकेले डॉक्टर कमल और लतिका का जोड़ा वह जोड़ा था जिसके फोटो यार-दोस्तों और कमल बाजार की दुकानों में देवी-देवताओं की जगह लगे हुए थे। लोग जितनी चर्चा डॉक्टर कमल की करते थे उतनी ही लतिका की भी करते थे। कहने वाले तो यहाँ तक कहते थे कि डॉक्टर कमल की जिन्दगी में जब से लतिका आई है, देख लो कितना कुछ बदल कर परिवार कहाँ से कहाँ पहुँचा है! एक-एक का पग-फेरा है साहब! 

किस्से लतिका की हँसी के मशहूर थे। कड़वी से कड़वी और कसैली से कसैली बात को लतिका कुछ इस तरह से मिठास की तरफ मोड़ देती थी कि लोग खिलखिला पड़ते थे। और तो और, किसी मौत-मरण में भी अगर लतिका दिलासा देने या मातमपुर्सी करने पहुँच जाती थी तो घर-परिवार वाले एकदम रोना-धोना बन्द कर देते थे। मन ही मन सब समझ जाते थे कि अब कहीं न कहीं से खिलखिलाहट बिखर जाएगी और दस-पाँच मिनिट में ऐसा होता ही था। बात जब कभी डॉक्टर कमल तक आती थी तो हल्के से उलाहने के तौर पर यदा-कदा डॉक्टर अपनी ओर से भी लतिका से कह बैठते थे कि ‘यार! मरने वालों को कम से कम रोने तो ढंग से दे। जहाँ जाती है बस अपनी ही फसल उगा कर आ जाती है।’ और लतिका बहुत गम्भीर हो कह बैठती-‘यार डॉक्टर! इसी बात पर हो जाए एक ठहाका....।’.और सारा कमरा खिखिलाहटों से भर जाता था।

पर आज डॉक्टर कमल सचमुच अनमने थे। न खाना खाने में मन लग रहा था न गले में फँसी फाँस को निकाल पा रहे थे। इतना सा ही बोले - ‘सो लेने दे यार! कोशिश करता हूँ कि नींद आ जाए।’ और डॉक्टर कमल बिस्तर पर लेट गए। 

यह लतिका के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और जीवन जीने के जीवटदार उपक्रम को चुनौती थी। लतिका यूँ परास्त हाने वाली नहीं थी। डॉक्टर कुछ कहते उससे पहले ही अपनी शैली में पूछा-‘अस्पताल में सब ठीक हैं?’ डॉक्टर बोले, ‘हाँ।’ ‘आपकी तबीयत?’ उत्तर था - ‘बिलकुल ठीक।’ ‘किसी दाई-नर्स का कोई विशेष लफड़ा?’ लतिका ने सवालिया नजरों से डॉक्टर की ओर देखा। वह बराबर मुस्कराए जा रही थी। ‘हिश्त।’ डॉक्टर का छोटा-सा झिड़की भरा जवाब कमरे में तैर गया।  ‘वो एम.बी.बी.एस. के चौथे और पाँचवें साल वालियाँ तो आज मन-महल में नहीं थिरकने लगी हैं?’ कमरा खिलखिलाहटों से भर गया।’ ‘यार लतिका, क्यों यहाँ-वहाँ की गोटियाँ फिट कर रही है।’ डॉक्टर ने बात सँभाली। ‘तब फिर करो ऐसा डॉक्टर बाबू कि आधा चम्मच पिसी हल्दी डालकर गुनगुना गरम दूध पी लो। हल्दी एण्टीबॉयोटिक भी है और एण्टीडायबिटीक भी। इससे पेट के विकार दूर हो जाते हैं और जब पेट साफ रहता तो मेडिकल वाले कहते हैं कि दिमाग हल्का हो जाता है। अपने प्रोफेसरों का पढ़ाया अपने पर ही लागू कर लो यार! आप तो जानते ही हो कि सेहत के लिए नींद जरूरी है।’ लतिका हँसे जा रही थी। डॉक्टर कमल के चेहरे से लग रहा था कि खीज रहे हैं। लतिका ने एक सवाल और दागा, ‘चलो डाक्टर सच-सच बताआ! माथे पर छत सलामत है?’ जवाब मिला, ‘हाँ।’ ‘बच्चे सेहतदार और सुखी हैं।?’ डॉक्टर ने रिद्धि कुमार और सिद्धि कुमार को सरसरी नजर से देखकर कहा, ‘हाँ।’ ‘सिर माथे किसी का कर्जा तो नहीं है?’ ‘बिल्कुल नहीं।’ ‘नए मकान और प्लाट की रजिस्ट्री हो गई।?’ ‘हाँ, हाँ यार, सब हो-हुआ गया।’ डॉक्टर झल्ला कर बोले। ‘तब फिर कमल कुमारजी खरे! खर्राटे भर कर सोते क्यों नहीं हो? दिन आराम से कट गया। कल की कल देखी जाएगी। अपनी रात क्यों ख़राब कर रहे हो?’ और डॉक्टर का सिर सहलाती हुई मीठी-सी पुचकार पुचकारती लतिका बोली, ‘देखो देवता! अपन ने तो कोई अफड़ा-लफड़ा करके अपने हाथ में दिया नहीं है। सुना करते थे कि लीला माँ और विमल दादा का कोई बेटा है-कमल कुमार। भला लड़का है। डॉक्टरी-वाक्टरी की पढ़ाई कर रहा है। नवल और निर्मल जैसे लड़के अपने को देवर के तौर पर मिलेंगे। विमल दादा जैसा ससुर और लीला माँ जैसी सास मिलेगी। बस, तुलसी माता को एक दीपक जला दिया और माथा पल्लू से ढाँक लिया। अब यह गाँठ लग गई है जनम-जनम की। अगर अपने होते हुए अपने सुहाग की एक रात भी आराम से नहीं कटी तो यार! लानत है इस लतिका की लन्तरानियों पर।’

‘चलो! पहले अपने मन की गाँठ खोल दो और अपन जैसा अपने से बोल दो, और गरमा-गरम रोटी-चपाती खा-खुवाकर चैन की नींद सो लो। पूरा पौन घण्टा आपने लतिका जैसी लहलहाती पर्सनालिटी का नष्ट कर दिया है। हँसो, वर्ना फिर गुदगुदी चलेगी और कमरे में भागते फिरोगे।’

डॉक्टर कमल के घुटने टिक गए। बोले, ‘यार! यूँ देखो तो बात कुछ भी नहीं है और वैसे देखो तो सोसायटी में किरकिरी हो गई है। तकलीफ मुझे यह है  कि इस मामले  में मेरा साथ मेरी बीबी तक ने नहीं दिया।’ 

लतिका को झटका लगा। वैवाहिक जीवन तो खैर ठीक है पर अपने ही समूचे जीवन में लतिका ने वैसा कभी कुछ नहीं किया या सोचा तक नहीं कि जिससे कि किसी का अपमान हो या किसी का मान मरे। संयत होकर लहराती हुई बोली -‘यार! अब बता भी दो कि कौन-सी लाटरी खुल गई है जो धमाके पर धमाके होते चले जा रहे हैं।’ डॉक्टर कमल ने लम्बी साँस छोड़ी। पतलून की जेब में से लिफाफा निकाला। भीतर वाला कागज बाहर निकाल कर लतिका को थमाते हुए बोले-‘यार! यह गृह सचिव महोदय का पत्र आज ही मिला है। मैंने एक रिवाल्वर का लायसेंस माँगा था। वह नामंजूर हो गया है। सभी जानते थे कि मेरा लायसेंस अवश्य मिल जाएगा। पर एक अदने से हैड कांस्टेबल ने ऐसी कलम मार दी कि सारा किया-कराया चौपट हो गया। दुख इस बात का है कि डॉ. कमल की पत्नी भी इस हैड साहब के साथ रही। रोना इसी बात का है।’ लतिका तब भी सहज ही सुनती रही।

डॉक्टर कमल ने मन की गाँठ खोली, ‘हुआ यह कि अपना आवेदन जाँच-पड़ताल, पूछ-परख और मेरे चरित्र के सत्यापन आदि के लिए यहाँ आया। यह सरकार का नियम है। एक दिन क्लब में अपने पुलिस आफिसर नायडू साहब ने मुझसे कहा था कि वे अपनी रिपोर्ट के लिए पुलिस थाने के लिए हैड साहब बिदेसरी को अपने यहाँ भेजेंगे। हैड साहब कुछ पूछताछ करेंगे। अपना शेरा लगाएँगे। रपट ऊपर जाएगी और सारा काम रूटीन का है। आपका लायसेंस बन जाएगा। और उठते-उठते नायडू साहब ने कहा था कि वैसे तो कोई जरूरी नहीं पर आज के जमाने को देखते हुए हैड साहब को एक पचास का नोट जरूर थमा देना। बस, कोई विशेष बात तो है नहीं।’ डॉ. कमल बोलते जा रहे थे, ‘अब बताओ लतिका!  जब मैं किसी से गैर-वाजिब पैसा लेता नहीं हूँ तो भला ये पचास रुपये कैसे दे देता? मैंने साफ मना कर दिया था कि पचास रुपये तो क्या, पचास पैसे भी नहीं दूँगा। मेरे सामने ही उन्होंने बिंदेसरी हेड साहब को बुलाया। अपनेवाले कागज थमाए और जल्दी ही अपनी रिपोर्ट देने को कह दिया। हैड साहब ने सेल्यूट हम दोनों को किया था और बस! मैं अपने काम में लग गया। नतीजा सामने है। आज जब यह कागज मिला तो मैं नायडू साहब से मिलने गया। उन्होंने फाइल मेरे सामने रखी। इतना औेर पूछा कि बिंदेसरी को आपने पचास रुपए दिए थे या नहीं। मैंने मना कर दिया कि उसके बाद न तो बिंदेसरी मुझसे मिले न उन्होंने मुझसे कोई पूछताछ ही की। हाँ, वे चार-पाँच बार अस्पताल में आए जरूर थे। आए दिन सरकार वाले और न जाने कहाँ-कहाँ के लोग अस्पताल में आते रहते हैं। दुआ-सलाम सभी से होती है। मैंने उसकी चक्करबाजी को उस हिसाब से लिया ही नहीं।’

लतिका पूरी अल्हड़ता से चहक उठी-‘अरे हाँ, हेड साहब तो मुझसे भी पूछताछ कर गए हैं। पास-पड़ोस वालों से भी उन्होंने तरह-तरह के सवाल किए। आपके कई मरीजों और उनके साथ वालों से भी उन्होंने जानकारियाँ लीं। सारी बात का मतलब एक ही था कि डॉक्टर कमल कैसे आदमी है? उनका किसी से कोई रगड़ा-झगड़ा तो नहीं है? उनके बाल-बच्चे सुरक्षित तो हैं ना? वगैरह-वगैरह। सभी ने एक ही तरह की बात कही कि डॉक्टर कमल बेहद भले आदमी हैं। उनके कारण सारी बस्ती शान से जी रही है। न उनका किसी से रगड़ा-झगड़ा। उनकी जान को या उनके कारण किसी की जान को भला क्या खतरा हो सकता है? उनके कारण कोई दुखी नहीं है। सभी से उनका भाईचारा है। भगवान ऐसी भलमनसाहत सभी को दे। वे हैं तो सभी तरफ सुख-शान्ति है। मैंने भी यही सब कहा था। हमारा भला किस से बैर-बनाव हुआ या रहा? ऐसा सुखी संसार किसे मिलता है। भगवान की कितनी दया है हम पर!’

डॉक्टर साहब ने माथा ठोक लिया, ‘बस यही सब तो हैड साहब ने अपनी रिपोर्ट में लिख कर सारा कूड़ा कर दिया है। सरकार का कहना है कि ऐसे भले आदमी को आखिर किसी बन्दूक, रिवाल्वर या पिस्तौल की जरूरत कैसे हो सकती हैं। अगर हैड साहब को इस घर से पचास रुपए मिल जाते तो....।’

लतिका ने डॉक्टर कमल का वाक्य पूरा नहीं होने दिया। बोली, ‘तो क्या वो आपको लुच्चा-लफंगा लिख देते? चलिए मैं अभी यह नायडू साहब को टेलीफोन करके कह देती हूँ। आपसे नया आवेदन ले लें और मेरा बयान उसमें शामिल करें कि मेरा पति जिसका कि नाम डॉक्टर कमल कुमार खरे है निहायत बदमाश, नालायक, क्रूर, कुटिल, लफंगा और सिरफिरा है। मैं दस्तखत करके दे दूँगी।’

डॉक्टर के दीदे फटे रह गए। वे सिर से पाँव तक लतिका को देखते रहे। लतिका थी कि खिलखिलाए जा रही थी। कह पड़ी, ‘यार डॉक्टर बाबू! इस सड़ी-सी बात के कारण श्रीमान की नींद हराम हो गई? चलो आराम से सो जाओ। पहले भर पेट खाना खाओ। रोज की तरह बादाम मिला दूध छानो। बच्चों को सहलाओ। मन और मूड हो तो लतिका मैडम की सेवा करो या सेवा लो। शरीफ मर्द की तरह पेश आओ। धन्यवाद दो बिंदेसरी हेड साहब को कि पुलिस में  होते हुए उन्होंने सचाई लिख दी। नहीं मिला लायसेंस तो नहीं मिला। इसमें मुँह लटकाने वाली कौन-सी बात हो गई। अगर यही सचाई है तो मैं कल सुबह अपने नौकर के हाथ बिंदेसरी हेड साहब के घर मिठाई का डिब्बा और पचास नहीं पूरे सौ रुपए का नोट भेजूँगी और उनका आभार मानूँगी। उनकी कृपा है कि मेरे बच्चे भले आदमी की औलाद बने रह गए। इस जमाने में भले मानस का सर्टिफिकेट और वह भी पुलिस से मिल जाए! सब विमल दादा और लीला माँ का पुण्य मानो। वर्ना तो......’

लतिका ने अनायास एक मोमबत्ती जलाई और सरकारी कागज मय लिफाफे के उसकी लौ पर रख दिया। कागज भभका और पूरे कमरे में डॉ. कमल की भलनसाहत का उजाला और दोनों पति-पत्नी की खिलखिलाहटें भर गईं।

दोनों सोने की तैयारी कर ही रहे थे कि दरवाजे पर किसी ने घण्टी का बटन दबाया। डॉक्टर ने दरवाजा खोला। वार्ड ब्वाय खड़ा था, ‘डॉक्टर साहब, जल्दी चलिए। एक सीरियस पेशन्ट आया है।’

लतिका ने अर्द्धरात्रि की ताजगी से कहा-‘जाओ मेरे भले मानस! अपनी भलमनसाहत की परीक्षा दो। बीमार के बहाने भगवान ने आवाज दी है।’

और भला मानस अस्पताल के लिए अपने कमरे की सीढ़ियाँ उतर गया।
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‘मनुहार भाभी’ की बीसवीं कहानी ‘बाइज्जत बरी’ यहाँ पढ़िए।


कहानी संग्रह के ब्यौरे

मनुहार भाभी - कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - नीलकंठ प्रकाशन, 1/1079-ई, महरौली, नई दिल्ली-110030
प्रथम संस्करण 2001
मूल्य - 150/- रुपये
सर्वाधिकार - लेखक
मुद्रक - बी. के. ऑफसेट, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032


रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक, अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।
  


दखल (‘मनुहार भाभी’ की अठारहवीं कहानी)



श्री बालकवि बैरागी के
प्रथम कहानी संग्रह
‘मनुहार भाभी’ की अठारहवीं कहानी




दखल 

आए दिन भाभी समय-असमय झल्लाने लगती थीं। उनकी यह खीज सारे परिवार पर भारी पड़ती। जिस दम वे शुरु होतीं बस होती ही रहतीं। किसी की हिम्मत नहीं थी कि उन्हें टोक दे। एक तो घर में वे सब से बड़ी, फिर सारे दिन वे इस परिवार के लिए इतना खटती थीं कि हर कोई उनकी अवहेलना करने का विचार भी मन में नहीं ला सकता था। एक-एक के लिए एक-एक चीज और एक-एक बात का ध्यान रखना भाभी की दिनचर्या का खास हिस्सा था। इस घर को बसाने, बनाने और आकार देने में ये अकेली लेकिन सब से आगे थीं। भाभी कही जाती थीं लेकिन थीं तो माँ!

अमूमन बड़े सवेरे पाँच बजे के आसपास वे उठ जातीं । उठकर धरती माता को प्रणाम करतीं। अपने इष्ट देवता का नाम लेतीं। दोनों हथेलियाँ मसल कर प्रभु का नाम लेतीं। फिर सामने दीवार पर लगी देवी-देवताओं की तस्वीरों को प्रणाम करतीं। कमरे की झिलमिल रोशनी में ही बिस्तर को समेटतीं। उसकी चादरें ठीक करतीं और बस अपनी प्रातःकालीन चर्या से निवृत्त होने के निमित्त स्नानघर में घुस जातीं। कुल्ला, दतौन, हाथ-मुँह आदि से निपट कर करीब-करीब ताजा-सी लगने वाली भाभी सबसे पहले देखतीं कि परिवार के कितने सदस्य जागे हैं और चाय वगैरह के लिए उन्हें पतीली में कितना पानी रखना है। अजीब-सा नियम वह भी था भाभी का कि वे पतीली को चूल्हे पर रखते ही, सीधे जा कर आईने के सामने खड़ी हो जाती थीं और अपने ललाट पर लगी सुहाग बिन्दी को देख कर  हल्के से मुस्करातीं। उसे ठीक करतीं और फिर काम में लग जातीं।  यह वह समय होता जब सारे घर में ही नहीं आसपास के सारे घरों में जगार होने लगती। पिछवाड़े के नलों पर उधर वाली गृहिणियाँ पानी भरने के लिए बर्तन-घड़े माँजने लगतीं और नलों से जैसे-तैसे दबाव के साथ बहते पानी की आवाजों के साथ ही भोर-वार्ताएँ शुरु हो जातीं। चूँकि महिलाएँ दूर-दूर खड़ी बतियाती थीं सो कुछ ऊँचे सुर में बोलना जरूरी होता ही था। और बस यहीं से भाभी की झल्लाहट चल पड़ती। बाबूजी, बहूजी और पोते-पोती नीचे आकर अपने-अपने कप सँभालते और भाभी के हाथ से चाय लेने की प्रतीक्षा करते। तब तक तो भाभी भड़ाक से पिछला दरवाजा बन्द कर चुकी होतीं। औरतों की आवाजें उधर से ही तो आती थीं सो कुछ ऊँचे सुर में बोलना जरूरी होता ही था। और बस यहीं से भाभी की झल्लाहट चल पड़ती। औरतों की आवाजें उधर से ही तो आती थीं न?

भाभी की तकलीफ यह थी कि बस्ती कितनी शोरगुल से भरी पड़ी है। अच्छा यह होता कि वे किसी गाँव में जा बसी होतीं। बच्चों के पास रहने की ललक ने सारा सत्यानास कर दिया। वैसे भाभी की बातों में वजन अवश्य था। जैसे वे जब तल्ख होकर कहतीं कि ‘अजीब शहर है यह। बड़े सवेरे मुँह झाँकरे एक के बाद एक मन्दिरों पर जोर-शोर से लाउडस्पीकर बजने लग जाना भला कैसे अच्छा लग सकता है? अगर बजाना ही हो तो एक मन्दिर पर बजा लो। सारे शहर में भगवान जी सुन लें और अपना काम करें। लेकिन यह मन्दिर-मन्दिर होड़ लगी हुई है। उसने सारा सवेरा तहस-नहस कर दिया है। एक का राग दूसरे में घुस जाता है। पहले की आरती दूसरे की वन्दना में उलझ कर न जाने कैसा मन कर देती है? न सुनने में अच्छा न समझने में भला। राम जाने कौन-सी कम्पीटीशन मची हुई है इन भगवानों में?’ अपने आवेश को कुछ उतार पर लाने के बाद वे फिर बाबूजी से पूछतीं, ‘इन मस्जिद वालों को क्या हो गया है? सुबह-सुबह एक मस्जिद का सायरन बजता है और लगते ही दूसरी का भी शुरु हो जाता है। एक पर अजान शुरु हुई नहीं कि दूसरी पर नमाज के लिए अजान लगने लग जाती है। अरे भाई! एक ही अजान पर उठकर अपनी-अपनी मस्जिद में क्यों नहीं चले जाते हो? बात तो वो की वो है। मन्दिरों पर तो आरतियाँ और वन्दनाएँ अलग-अलग हैं। यह बात समझ में आती है। लेकिन अजान तो एक की एक ही लगनी है। फिर अलग-अलग लाउड स्पीकर और अलग-अलग अजानदार! क्या एक के जगाए दूसरा नहीं जागेगा? मस्जिदें दस हो सकती हैं पर अजान तो वो की वो है न! उधर वालों ने भगवान को तंग कर रखा है। इधर वालों ने अजान पर अजान गूँध कर रख दी।’

बाबूजी चाय पीते-पीते भाभी को समझाते, ‘भागवान! क्यों इस माथापच्ची में पड़कर कच-कच करती रहती है? अपना नहाओ-धोओ और पूजा-पाठ करके राम का नाम लो। न जाने कहाँ-कहाँ दिमाग लगाए झल्लाती रहती हो!’

और भाभी पल भर भी माफ नहीं करतीं - ‘अब मेरे पास दिमाग है तो मैं लगाती हूँ। किसी के पास नहीं हो तो क्या लगाए? अब सुन लो! एक के बाद एक करके इस कॉलोनी में ये ब्रेड बेचनेवाले लड़के कितने चक्कर लगाते हैं? किसी ने गिने? एक.....दो....तीन....चार....पाँच....। मैं तो गिनते-गिनते अधमरी हो गई। जिसको भी लेनी होती है वह पहले ही फेरे में ले लेेता है। लेकिन ये हैं कि गला फाड़ते हुए गली को चीरे जा रहे हैं।

गला और गली वाली बात पर बच्चे हँस देते। भाभी जरा साँस लेतीं। फिर लगता कि उनके गले में अभी कई वाक्य फँसे पड़े है जो निकलने का रास्ता टटोल रहे हैं। यह वह समय होता जब बहू स्नानघर से निकल कर रसोई की तरफ आती थी। बहू आते ही पहले बाबूजी के और फिर भाभी के पाँव छूती। माथे पर पल्ला डाले बहू को इस तरह पाँव छूते देखते ही भाभी के खीज-भरे शब्द पीछे खिसक जाते और एक ही साथ कई आशीषें बरस पड़तीं। फिर थोड़ा-सा चिढ़ते हुए हुए अपने आप से कह पड़तीं, “क्या जमाना आ गया है? अब इसे यूँ भी नहीं कह सकती कि ‘दूधो नहाओ पूतों फलो’! आँचल में दूध तो है लेकिन जितने थे वे आ चुके थे। अब रखा ही क्या है?” और सलज्ज चुपचाप चाय के बर्तन समेटने लग जातीं।

भाभी फिर शुरु हो जातीं, “जब तक बहू, तू सब्जियाँ नहीं खरीदेगी तब तक ये सब्जीवाले  यहीं चक्कर लगाते मरेंगे। जो भी लेना हो वह पहले ही फेरेे में ले लेना वर्ना सारी दोपहरी ये लोग तंग करेंगे। इन मरों को न तो सब्जियों के नाम ही पूरी तरह मालूम हैं, न ये बेचना ही जानते हैं। टमाटर को ‘टमेटा’ बोलेंगे और पालक को जाने किस तरह ‘पालकी’ बोल कर चिल्लाएँगे।......भई! मैं तो इस कालोनी में मर गई।”

जैसे-जैसे दिन चढ़ता और दिनचर्या आगे बढ़ती, भाभी पर झल्लाहट का दौरा भी तेज होने लगता। नहा कर पूजा-पाठ से निपटते-निपटते वे पहले ही भविष्यवाणी कर बैठतीं, ‘देखना! मैं अभी से कह रही हूँ वो बर्तनवाली आज नहीं आएगी। जहाँ दो पैसे ज्यादह मिलेंगे वहाँ राख लेकर बैठ जाती है। इनको कितना ही घर जैसा रखो, ये रहेंगे वो के वो।’ बाबूजी फिर समझाते, ‘भली मानस! उनकी अपनी भी परेशानियाँ हो सकती हैं। अगर वो नहीं भी आए तो हल्ला करके क्या मिल जाएगा? बहू है, तुम हो और मैं भी हूँ। अपने ही जूठे बर्तन मलने में कौन सी शर्म लगती है?’ 

बाबूजी का कहा पूरा होता तब तक तो भाभी बरस पड़तीं, ‘हाँ! मेरा नरक पक्का करके ही दम लोगे। अब मेरी थाली आप माँजने बैठ जाएँगे तो.....हे राम! मरद जात को अक्कल दे प्रभु!’ और यह सुनते-सुनते बाबूजी ‘अक्कल’ खरीदने बाहर निकल जाते। भाभी इसी बीच बहू से कहतीं, ‘देखा बहू! बर्तनवाली को छतरी तान कर छाया-छाया में ही लिवाने पधार गए हैं तेरे ससुरजी!’

भोजन करने के बाद भाभी जब आराम करने को होतीं तो ठीक उसी समय पड़ोस वाला सुनील अपना टेप रेकार्डर फुल वाल्यूम पर लगा कर कपड़ों पर इस्तरी करने लग जाता। भाभी बिस्तर पर पड़ी-पड़ी बिफरती रहतीं। बहू जानती थी कि भाभी सुनील को कुछ नहीं कहेंगी। और यह भी जानती थीं कि सुनील दस-पाँच मिनिट भाभी को चिढ़ाने के लिए ही यह शरारत करता है। लेकिन सुनील का टेप रेकार्डर ठण्डा पड़ते-पड़ते मूँगफली के ठेले वाला और उससे सौ-पचास गज पीछे ही ‘बुड्ढी के बाल’ वाला आ पहुँचता। सारी कालोनी टेप रेकार्डरों के कर्कश हो-हल्ले से भर जाती। भाभी एकाध मिनट दाँत पीसतीं और जबड़े भींच कर तकिए से सिर लगाने की कोशिश करतीं।  हल्ले का यह रेला गुजरता कि भाभी की चिन्ता अपने आरोह तक पहुँच जाती। बिजली के बल्ब की ओर देखते-देखते वह कमरे की दीवारों से कहने लगतीं, ‘अब इस राँड के कोयले होंगे। छिनाल भला एक जगह कैसे टिकेगी? रण्डो! तू आज मत जाना। इसे अपना ही घर मान ले और यहीं टिक कर रह जा।’ यह सब भाभी का बिजली से उवाच होता।

सख्त चिढ़ थी भाभी को टी.वी. पर आने वाली कार्टून फिल्मों से। बच्चे जब-जब कार्टून फिल्में देखते भाभी घायल शेरनी की तरह दहाड़ने लग जातीं। जब बच्चे कहते कि, ‘भाभी! ये फिल्में यूरोप-अमेरिका की हैं’ तो भाभी हैरान होकर पूछतीं, ‘राजा भैया! क्या उनके देशों में कोई राम-लछमन नहीं होते? क्या वहाँ सीता माता नहीं हैं? क्या वहाँ के देवी देवता खर्च हो गए? न कोई सूरत न कोई शक्ल। सवेरे से साँझ तक तुम लोग इन टेढ़ी-मेढ़ी शक्लों की उछलकूद देखकर क्या सीख रहे, हो?’ और हाथ जोड़ कर बिजली से प्रार्थना करतीं, ‘हे बिजली माता! तू चली जा, थोड़ा चैन पड़े इन चूहे-बिल्लियों से। क्या तो इनमें देखने को है और क्या समझने को? लेकिन चिपके पड़े हैं इस गन्दगी से! हजारों रुपए खर्च करके अच्छे भले घर में यह गटर घुसेड़ ली। पता नहीं कब कौन भगीरथ पैदा होगा और कब कोई गंगा लाएगा? सारी उम्र अपने बच्चों को इस गटर में कीड़ों की तरह जीते देखना भी मेरे ही भाग में लिखा था। हे विधाता! तेरा खोज जावे।’ बच्चे समझ जाते कि भाभी कुछ ज्यादह ही तैश में आ गई हैं। टी.वी. बन्द करके कामों में लग जाते।

और शाम को पाँच बजे से लेकर रात के आठ-नौ बजे तक भाभी का कष्ट दूसरी तरह का होता। एक का स्कूटर आ रहा है तो दूसरे का जा रहा है। उसकी सायकल आई तो इसकी गई! स्टेशन की सवारियाँ लेकर टेम्पो आया और पास वाले दरवाजे पर खड़ा हो गया। उसकी जानलेवा आवाज बन्द ही नहीं हुई कि पीछे से गाँव जानेवाला कोई ट्रेक्टर आकर माँग रहा है। सड़क इतनी सजीव हो जाती कि भाभी करीब-करीब निर्जीव जैसी होकर आँखें मूँद लेतीं। आसपास के मन्दिरों के लाउडस्पीकर फिर आरतियाँ बजाने लगते। इसी बीच बज उठती टेलिफोन की घण्टी। बहूजी लपकतीं रिसरवर उठाने को। भाभी कहतीं , ‘इस मरे की दुम उखाड़ कर रख दे एक तरफ। फेंक दे बाहर.....।’

रात को खाना खाने सारा परिवार एक साथ बैठता। भाभी जानती थीं कि यह समय वह है जब कि दिन भर का थका-माँदा परिवार चैन से खाना खाकर सोने की तैयारी में होता है। लेकिन बाबू जी, बहूजी और बच्चे जानते थे कि खीज पर पुछल्ला लगेगा जरूर। खाना खाते-खाते भाभी बाबूजी से कहतीं, ‘मेरा मन करता है कि मैं कुछ दिन मुन्ना के पास चली जाऊँ। वह वहाँ अकेला है। उसको मदद भी हो जाएगी और इस रोज-रोज की किच-किच से मेरा पिण्ड भी छूट जाएगा। इस बस्ती में हम लोग न तो अपनी जिन्दगी जी सकते हैं न अपनी मौत मर सकते हैं। रात-दिन की भाँय-भाँय। पता नहीं आप लोग इस नरक में इतने मजे से कैसे जी लेते हैं? मैं तो अधमरी हो गई। जिन्दगी के हर पल में कितना दखल है यहाँ? मुन्ना को फोन कर दो। वह आकर मुझे अपने साथ ले जाए। यहाँ आप हो, बहू है, बच्चे हैं, बच्चों की परीक्षाओं के बाद सभी वहाँ रह लेंगे.....। बाबूजी शान्त-चित्त होकर भाभी को सुन लेते। फिर एक ही वाक्य बोलते-‘किसी भी डाल पर घोंसला बना लो चिड़िया रानी! पंछियों की चहल-पहल हर पेड़ पर होनी ही है। मुन्ना जिस शहर में रहता है वह शहर तुम्हारी इस बस्ती और इस कालोनी से पचास गुना ज्यादा बड़ा है। वहाँ पैदल चलने के लाले पड़ रहे हैं। अभी यहाँ हम लोगों के सामने जो कुछ बोल रही हो हम सुन तो रहे हैं। वहाँ बोलोगी तो शायद कोई सुन भी नहीं पाएगा। वहाँ चौबीस घण्टे गुजारना भी मुश्किल है महारानी! जरा मुन्ना से पूछ तो ले?’ हार कर भाभी कहतीं, ‘भई।! इतना दखल कैसे सहा जाए?’

परिवार सोने के लिए अपने-अपने बिस्तरों पर जाता कि तभी पड़ोस में सुनील का टेप रेकार्डर बजने लगता और भाभी कहतीं, ‘सवेरा होने दे सुनील! देखती हूँ कि कल तेरे ये ढोल-मँजीरे कैसे बजते हैं?’
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कहानी संग्रह के ब्यौरे

मनुहार भाभी - कहानियाँ
लेखक - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - नीलकंठ प्रकाशन, 1/1079-ई, महरौली, नई दिल्ली-110030
प्रथम संस्करण 2001
मूल्य - 150/- रुपये
सर्वाधिकार - लेखक
मुद्रक - बी. के. ऑफसेट, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032



रतलाम के सुपरिचित रंगकर्मी श्री कैलाश व्यास ने अत्यन्त कृपापूर्वक यह संग्रह उपलब्ध कराया। वे, मध्य प्रदेश सरकार के, उप संचालक, अभियोजन  (गृह विभाग) जैसे प्रतिष्ठापूर्ण पद से सेवा निवृत्त हुए हैं। रतलाम में रहते हैं और मोबाइल नम्बर 94251 87102 पर उपलब्ध हैं।