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स्नेह के कस्तूरी-मृग

‘कॉमरेड’ याने श्री रमेश प्रसाद सक्सेना। रतलामी थे। सन् 2008 से भोपाली बने बैठे हैं। रतलाम में लायब्रेरियन थे। पढ़ने-लिखने की लत जन्मना रही। लायब्रेरियन होने ने इस लत को परवान चढ़ा दिया। म. प्र. तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के ऐसे किंवदन्ती पुरुष जिसने ‘घर फूँक तमाशा’ कर, संगठन को सदैव दिया ही दिया। संगठन के लिए किए गए हुए प्रत्येक हवन में, हर बार अपने हाथ जलाए। इतने कि म. प्र. तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ की रतलाम जिला इकाई का इतिहास जब भी लिखा लाएगा, उनके विरोधी भी उनका उल्लेख करने को मजबूर होंगे। ‘कॉमरेड’ जब तक नौकरी में रहे, रतलाम जिले की ‘क्लास थ्री यूनियन’ के ‘पर्याय’ से कोसों आगे बढ़कर ‘दो जिस्म, एक जान’ की तरह रहे। 

मुझसे एक-दो नहीं, साढ़े दस बरस से अधिक बड़े हैं। इस मार्च में मैं अपने जीवन का 76वाँ बरस पूरा कर लूँगा और सितम्बर में वे अपना 87वाँ बरस पूरा कर लेंगे। लेकिन उम्र का यह अन्तर मुझे तभी महसूस होता है जब मैं उन्हें उनकी जन्म वर्ष-गाँठ पर बधाई देता हूँ। यह उनका ‘कॉमरेडी करिश्मा’ ही है कि वे उम्र का अन्तर अनुभव होने ही नहीं देते - केवल मुझे ही नहीं, मुझ जैसे हर एक को।

अपने पुराने कागजात खँगालते हुए मुझे उनका, सोलह बरस से अधिक पुराना, एक पत्र और जवाब में लिखा मेरा पत्र मिल गए। दोनों पत्र यूँ तो नितान्त निजी हैं लेकिन पत्रों को पढ़ते-पढ़ते लगा कि इनमें सकारात्मक सार्वजनिकता भी है। इसीलिए दोनों पत्र यहाँ दे रहा हूँ। (अपने पत्र में कॉमरेड द्वारा की गई मेरी मुक्त-कण्ठ प्रशंसा ने भी मेरे अवचेतन को इसके लिए उकसाया ही होगा।)

कॉमरेड लम्बे अरसे से गम्भीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। जिस जीवट से वे बीमारियों से दो-दो हाथ कर रहे हैं, वह अद्भुत, अनूठा, अविश्वसनीय और ऊर्जादायी, प्रेरणादायी है। उनकी जगह मैं होता तो, यह पोस्ट लिखने के लिए शायद ही जीवित रह पाता। 

मेरी बातें आपको कोरी गप्प की तरह अविश्वसनीय लग सकती हैं। आप चाहें तो उनसे मोबाइल नम्बर 98275 33869 पर मेरी बातों की पुष्टि कर लें।

(दोनों पत्रों का अनूठापन यह है कि ये स्थानीय हैं। याने, हम दोनों ने रतलाम में ही रहते हुए एक-दूसरे को पत्र लिखे।) 

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कॉमरेड का पत्र, मेरे नाम -

प्रिय श्री विष्णुजी,

सादर नमन।

नहीं जानता, आपको कैसा लगेगा सम्बोधन ‘विष्णुजी’। मुझे अच्छा लगा और महसूस किया अपने आपको, आपके अधिक सन्निकट। अपनापन लगा उक्त सम्बोधन में।

आपका प्रेषित ‘जन्म दिन’ (वर्ष-गाँठ) सन्देश प्राप्त हुआ। उत्तर दे रहा हूँ एक दीर्घावधि अन्तराल के पश्चात्। बधाई सन्देश मेरे अन्तरतम को इतना पुलकित कर गया कि मैं लिख कर व्यक्त नहीं कर सकता। और वह भी प्रथम बार। सच मानिये, बहुत ही आनन्ददायी क्षण था वह जब आपके बधाई सन्देश का लिफाफा खोल कर पढ़ा। आपको इसके लिए साधुवाद एवं धन्यवाद।

आप जैसे मुखर वक्ता, सटीक टिप्पणीकार, संवेदनशील साथी के सानिद्य में खुशी के चन्द लमहे जीवन भर की धरोहर हो जाती है। मैं अपने आप को अत्यधिक गौरवान्वित एवं धनी व्यक्ति मानता हूँ, आप जैसा मित्र-सखा, दोस्त को पा कर।

आपसे बस यही अनुरोध है विष्णुजी कि आप यह स्नेह बनाये रखें। मैं तो प्रयास करूँगा ही कि इस स्नेह-धागे को मजबूत करता रहूँ।

विष्णुजी! मेरी जिन्दगी मेरे दोस्तों की ही देन है। इसमें जितनी भी अच्छाइयाँ हैं उसमें कहीं न कहीं, किसी न किसी दोस्त की छवि अंकित है। उन्हीं छवियों से प्रेरणा लेकर मैं आगे बढ़ा हूँ। सोचता हूँ, आपका सानिद्य पाकर मुझमें और मेरी वृत्तियों में, सोच में परिष्कार होगा।

अथर्व वेद और वेद व्यास (विष्णु पुराण) के उदाहरण मेरे लिए काफी प्रेरणादायी हैं। वैसे, मेरा भी प्रयास यही रहा है -

‘हम सबसे ऊपर हैं, व्योम झुकाने को,
हम सबसे नीचे हैं, नींव उठाने को,
हम सबसे आगे हैं, पाँव दुखाने को,
हम सबसे पीछे हैं, पाँव पुजाने को।

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गमों की आग में आँसू उबाल कर देखो।
खिलेंगे रंग, जरा डाल कर देखो।
तुम्हारे दिल की जलन भी जरूर कम होगी।
किसी के पाँव से काँटा निकाल कर देखो।

और अन्त में -

‘प्रसन्नता तो चन्दन है,
उसे, दूसरे के माथे पर लगाईये,
आपकी उंगलियाँ तो
अपने आप,
महकने लगेंगी।’

आपको पुनः धन्यवाद। मंगल कामनाएँ।

आपका अपना,
रमेश सक्सेना।





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मेरा पत्र, कॉमरेड के नाम -


29 सितम्बर 2006

माननीय श्रीयुत सक्सेना साहब,

सविनय सादर नमस्कार,

जितना अनपेक्षित आपको मेरा भेजा बधाई पत्र रहा होगा, उतना ही अनपेक्षित मेरे लिए आपका (बिना तारीख वाला और 28 सितम्बर 2006 को पोस्ट किया) पत्र रहा। पत्र क्या है, आनन्द-कोष है। पत्राचार का सुख ऐसे ही पत्रों से अनुभव किया जा सकता है। अभागे हैं वे लोग जो पत्राचार से दूर (और उसमें भी, आपसे पत्राचार से दूर) बैठे हैं।

मेरा घर का नाम ‘बब्बू’ है और मित्र मुझे ‘विश्न्या’ पुकारते हैं। ऐसे में ‘विष्णुजी’ तो बहुत-बहुत भारी है - चींटी पर पंसेरी जैसा। त्राहिमाम्! त्राहिमाम्! वैसे, आप मुझे दे ही तो रहे हैं, कुछ ले तो नहीं रहे! आपकी दी हुई हर चीज, हर बात सर माथे पर।

आपने चाहा भी तो क्या चाहा? वही ‘स्नेह’, जिसकी तलाश में मैं अहर्निश लगा रहता हूँ। आपका पत्र पढ़कर लगा कि यह ‘जीवन तत्व’ हममें से प्रत्येक के पास है लेकिन हम सब उससे बेखबर हैं और शायद इसीलिए मैं आपमें ‘स्नेह’ देखता हूँ और आप मुझमें। गोया, हम सब ‘कस्तूरी मृग’ हैं। आपके पत्र ने मुझमें छिपी उस बात से रु-ब-रु करा दिया जिसकी तलाश मैं खुद से बाहर कर रहा हूँ। आपने नया विचार दे दिया। इसका उपयोग मैं अपनी सुविधा से कर लूँ - यह अनुमति मुझे दीजिएगा। आपसे हुई इस प्राप्ति के लिए कोटिशः आभार। आप बहुत ही बढ़िया आदमी हैं और इसीलिए बहुत ही बढ़िया बात, अनजाने में ही आपने मुझे दे दी है। आपके पत्र से लगा कि ‘स्नेह’ भी ‘सुरसती के भण्डार’ की तरह ही है - ‘ज्यों खरचे, त्यों-त्यों बढ़े’ वाला। लेकिन, हम ‘स्नेहाकांक्षी’ तो बने रहते हैं और भूल जाते हैं कि हमें ‘स्नेहदाता’ भी बने रहना चाहिए। अरे! कॉमरेड! आपने बहुत ही बढ़िया बात मुझे थमा दी है। आपको जन्म-दिन की  बधाई भेजने का इतना शानदार-जानदार, अमूल्य प्रतिसाद मिलेगा - यह तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। कॉमरेड सक्सेना जिन्दाबाद। आप अपने लिए नहीं, हम लोगों के लिए जुग-जुग जीएँ और सदैव पूर्ण स्वस्थ बने रहें - ईश्वर से यही याचना है।

आपने बहुत ही सुन्दर काव्य पंक्तियाँ मुझे उपलब्ध कराई हैं। आपकी इस पूँजी का उपयोग मैं अपनी दुकानदारी बढ़ाने में करूँगा। इस हेतु अतिरिक्त धन्यवाद।

‘मैं तो प्रयास करूँगा ही कि इस स्नेह को मजबूत करता रहूँ’ - आपका यह आश्वासन जिन्दगी जीने के लिए ललक पैदा करता है। इसमें इतना और जोड़ लीजिएगा कि यदि कभी मैं प्रमादवश भी अनपेक्षित व्यवहार कर बैठूँ तो भी कृपया अपना स्नेह मुझे प्रदान करते रहिएगा।

कृपा बना रखिएगा। परिवार में सबको मेरी ओर से सादर, यथायोग्य अभिवादन अर्पित कीजिएगा।

स्नेहाकांक्षी,
विष्णु बैरागी

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‘उन्होंने’ मनवा दिया वेलेण्टाइन-डे

ईको कराने के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा में, अस्पताल में बैठे हुए हम पति-पत्नी।


मुझे हिन्दू-विरोधी माननेवाले और इसी कारण, मेरी खिंचाई करने का, मुझ पर व्यंग्योक्तियाँ कसने का कोई मौका न छोड़नेवाले ‘वे’ अभी-अभी (याने, लगभग रात साढ़े आठ बजे) गए हैं। ‘वे’ मुझसे कभी खुश नहीं होते।

आते ही, अपने स्वभावानुसार शुरु हो गए -

‘कैसे मनााया आज वेलेण्टाइन-डे?’

“आप अच्छी तरह जानते हैं कि मैं ये ‘डे-वे’ नहीं मनाता। मेरा भरोसा नहीं है इन ‘डे-वे’ में।”

‘तो फिर क्या किया आज दिन भर?’

“पत्नी की कुछ मेडिकल जाँचें करानी थीं। ‘ब्लड सेम्पल’ देने के लिए सुबह-सुबह ही लेबोरेटरी पहुँच गया था। टेक्नीशियन लगभग दस बजे आया।”

‘फिर?’

‘पत्नी डाइबिटिक है। भूखा रहने पर उसे परेशानी होने लगती है। ब्लड सेम्पल देने में बहुत देर हो गई थी। उसने सुबह से चाय भी नहीं पी थी। सो, उसे चाय-पोहा का नाश्ता कराने ले गया।?’

‘क्यों? बाजार का नाश्ता क्यों कराया? घर आकर नाश्ता नहीं कर सकते थे?’

‘मजबूरी थी। उसका ईसीजी भी कराना था।’

‘फिर?’

‘फिर क्या? ईसीजी के लिए लाइन लगी हुई थी। प्रतीक्षा करनी पड़ी। नम्बर आया तब तक साढ़े बारह बज गए।’

‘इसीजी करा कर तो घर आ गए होंगे?’

‘नहीं। नहीं आ सकता था।’

‘क्यों?’

‘क्योंकि सी टी स्केन और ईको भी कराना था?’

‘सी टी स्केन और ईको भी? इतनी सारी जाँचें एक साथ? क्यों?’

‘मजबूरी थी। डॉक्टर ने कहा था।’

‘क्या हो गया भाभीजी को?’

‘वह लम्बी कहानी है। फिर कभी, बाद में बताऊँगा।’

‘ठीक है। तो, सी टी स्केन और ईको हो गया?’

‘नहीं।’

‘क्यों?’

‘मेरा मतलब है, दोनों जाँचें नहीं हुई। केवल सी टी स्केन हो सका।’

‘क्यों? ईको क्यों नहीं हुआ?’

‘डॉक्टर ने शाम पाँच बजे का वक्त दिया।’

‘अच्छा। लेकिन सी टी स्केन तो हो गया?’

‘हाँ। सी टी स्केन हो तो गया लेकिन उसकी रिपोर्ट मिलने में दो घण्टे लग गए।’

‘दो घण्टे? इतना समय तो नहीं लगता रिर्पोटिंग में?’

‘हाँ। लगता तो नहीं लेकिन सी टी स्केन की प्लेटें यहाँ से, मेल पर अहमदाबादवाले डॉक्टर को भेजी जाती हैं। उनके सामने अपनी प्लेटों का नम्बर आने पर वो रिपोर्टिंग करते हैं और यहाँ भेजते हैं। उसके बाद रिपोर्ट का प्रिण्ट-आउट निकल पाता है। इसी में इतनी देर हो गई।’

‘फिर?’

‘इस सब में करीब ढाई बज गए। घर आए। भूख भी लग गई थी और थोड़ीऽसी थकान भी आ गई थी। भोजन किया और सो गया।’

‘फिर?’

‘करीब चार बजे उठा। हाथ-मुँह धोए। पत्नी ने चाय बनाई। यह सब करते-करते पौने पाँच बज गए। अस्पताल के लिए निकल गए। पत्नी को सब्जी लेनी थी। रास्ते में सब्जी ली।’

‘इस बार तो काम फटाफट हो गया होगा। ईको में तो वैसे भी कम्पेरेटिवली कम टाइम लगता है।’

‘नहीं। फटाफट नहीं हुआ। हमारा नम्बर चौथा था। हमारा नम्बर आते-आते साढ़े-छह, पौने सात बज गए।’

‘चलो! आखिरकार सारी जाँचें एक ही दिन में हो गईं। अच्छा हुआ। फिर?’

‘फिर क्या? पत्नी, आते ही सब्जी साफ करने लगी। मैंने धनिया साफ किया। साफ करके काटा। हाथ धोकर निकला ही था कि आप आ गए। बस।’

‘याने आज का पूरा दिन आपने भाभीजी की सेवा में समर्पित कर दिया?’

‘इसमें सेवा और समर्पण की कौन सी बात है। यह तो मेरा ही काम था। अरे! मेरी पत्नी की जाँचें मैं नहीं कराऊँगा तो और कौन कराएगा?’

‘अरे! याने कि आपने तो सच्ची में वेलेंटाइन-डे मना लिया!

‘मैंने वेंलेण्टाइन-डे मना लिया? कैसे?’

‘कैसे क्या? वेलेण्टाइन-डे पर और क्या करते हैं? यही तो करते हैं! प्रेम-प्रदर्शन! एक्सप्रेशन ऑफ लव एण्ड अफेशन टुवर्ड्स योर वेलेण्टाइन।’

‘लेकिन मैंने तो ऐसा कुछ भी नही किया। मेरी पत्नी की डॉक्टरी जाँचें करानी थीं। वही कराईं! इसमें वेलेण्टाइन-डे बीच में कहाँ से आ गया?’

‘अरे! आज का पूरा दिन आपने अपनी भाभीजी की चिन्ता करने में लगाया। उनकी सारी जाँचें कराईं। उनकी डाइबिटीज का ध्यान रखते हुए उन्हें भूखा नहीं रहने दिया। उन्हें नाश्ता कराया। और तो और, घर आने के बाद भी सब्जी-धनिया साफ करने में उनकी मदद की। यह उनके प्रति प्रेम प्रदर्शन ही तो है! आप भले कितना ही कहो कि आप ये डे-वे नहीं मनाते। लेकिन आज तो आपने सच्ची में वेलेण्टाइन-डे मना लिया।’

‘याने कि आप कह रहे हैं कि अपनी पत्नी की चिन्ता कर, उनकी जाँचें कराने में अपना पूरा दिन खपा कर, धनिया साफ कर के, काट कर मैंने उनके प्रति अपना प्रेम जताया है?’

‘हाँ। मैं यही तो कह रहा हूँ!’

‘याने कि आप कह रहे हैं कि वेलेण्टाइन-डे पर अपने प्रिय के प्रति प्रेम जताया जाता है?’

‘हाँ। सही तो!’

‘तो फिर आप, अपने प्रिय के प्रति प्रेम जताने का विरोध क्यों करते हैं? और सच बात तो यह है कि आप विरोध नहीं करते। केवल विरोध करने के लिए विरोध करने का पाखण्ड करते हैं। देखिए ना! मैं न तो ऐसे डे मनाता हूँ न ही आज मैंने वेलेण्टाइन-डे मनाया। लेकिन आपने जबरन मुझसे वेलेण्टाइन-डे मनवा दिया।’

‘......................’

“भई! आपने खुद ही साबित कर दिया है कि आप मूलतः प्रेमी व्यक्ति हैं। वेलेण्टाइन-डे को प्रेम जताने का दिन मानते हैं। खामखाँ क्यों प्रेम के विरोध में खुद को धोखा दे रहे हैं! मेरी मानें तो सीधे घर जाएँ। वेलेण्टाइन-डे बिलकुल न मनाएँ। प्रेम का कौन खास नहीं होता। हर दिन प्रेम का दिन होता है। जाते हुए, रास्ते में कहीं से गुलाब का एक फूल खरीद लीजिएगा। अपनी श्रीमतीजी को दीजिएगा। ‘आई लव यू’ बिलकुल मत कहिएगा। आपकी चुप्पी ही आपके प्रेम का इजहार करेगी। और यदि आपने सच में ऐसा कर लिया तो विश्वास कीजिएगा कि आप खुद को सम्हाल नहीं पाएँगे - हिचकियाँ ले-ले कर रोना शुरु कर देंगे और ये प्रेमाश्रु आपकी आत्मा की निर्मलता शतुगणा कर देंगे।”

‘वे’ कुछ नहीं बोले। चुपचाप उठे। उनकी कोरें भीग आई थीं। चुपचाप ही मुझे नमस्कार किया। और मुझसे नजरें चुराते हुए विदा हो गए।

‘वे’ चले गए हैं। अब मैं रो रहा हूँ। रोते-रोते ही यह पोस्ट लिख रहा हूँ - बड़ी मुश्किल से। लेकिन सच मानिए, रोते-रोते भी निहाल हो रहा हूँ।

प्रेम होता ही ऐसा है।
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अब तुम मिलना स्सालों!

आपने वह किस्सा जरूर पढ़ा/सुना होगा जिसमें चार ठग मिल कर एक किसान के बछड़े को, अलग-अलग जगह, बकरा बता-बता कर उसका बछड़ा हड़प लेते हैं। इस किस्से को याद रखते हुए ही मेरी यह बात पढ़िएगा।

शारीरिक श्रम के मामले में बहुत ही आलसी हूँ। इतना कि यदि कभी जामुन के पेड़ की छाँव में लेटना पड़े तो मनोकामना होगी कि जामुन, सीधा मेरे मुँह में टपके, कोई और चबा ले, मुझे स्वाद आ जाए और गुठली भी कोई और ही थूक दे। आलसियों की कोई प्रतियोगिता हो तो छोटा-मोटा पुरुस्कार तो जीत ही सकता हूँ।

ऐसे में, जब भी पैदल चलता हूँ तो ‘मेरा भला चाहनेवाले’ टोकने लगते हैं - ‘बहुत तेज चलते हो। अब जवान नहीं रह गए हो। बुढ़ा गए हो। धीरे-धीरे चला करो। तेज-तेज चलते हुए ऐसे लगते हो जैसे गेंद लुड़क रही है। लुड़कती गेंद खुद पर काबूू नहीं रख पाती। सड़क पर इधर-उधर लुड़क सकती है। नाली में गिर सकती है।’ आलसीपने की वजह से यूँ तो पैदल चलना ही भूल गया हूँ। लेकिन जब भी पैदल चलने की कोशिश करता हूँ, ऐसी नसीहतें मिल जाती हैं।

कॉलेज में पढ़ते समय एनसीसी में भर्ती हुआ था। सेना के रिटायर्ड सुबेदार रामसिंह और हवलदार पूनाराम हमारे ‘उस्ताद’ थे। बताया करते थे कि ‘तेज चल’ में सामान्य टुकड़ी की गति 120 कदम प्रति मिनिट होती है और गोरखा टुकड़ी की गति 180 कदम प्रति मिनिट। सो, तब से ही तेज चलने की आदत तो बनी तो सही लेकिन वह अब तक बनी हुई है-यह मैं बिलकुल नहीं मानता। उम्र के पचहत्तर बरस पूरे कर लिए हैं। बेशक मन न तो बूढ़ा होता है न ही थकता है। लेकिन शरीर के साथ तो ऐसा बिलकुल नहीं होता। इसलिए, भाई लोग जब-जब मुझे तेज चलने पर ‘बड़े प्रेम से समझाते-दुलराते’ हैं तो मैं हँस कर रह जाता हूँ। लेकिन हर बात की एक हद होती है। सो, कभी-कभी लगने लगता है - ”इतने सारे लोग, अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग जगह पर जब एक ही बात कह रहे हैं तो ‘कुछ’ तो सचाई होगी।“ और मैं झाँसे में आ ही गया। मानने लगा कि मैं और लोगों के मुकाबले तेज चलता हूँ। 

लेकिन कल शाम गजब हो गया। 

कल शाम, ‘झाँसे में आया हुआ’, अपने-आप में मगन, मैं, अपनी ‘तेज चाल’ से, अच्छा-भला चला जा रहा था। खूब खुश-खुश कि भई लोग एकदम झूठ तो नहीं ही बोलते हैं। कि अचानक वह हो गया जो नहीं होना था। या कहिए कि वह हो गया जो एक न एक दिन तो होना ही था।

हुआ यह कि मुझसे भी अधिक बूढ़ी एक महिला, मेरे पीछे से आई और सरपट चाल से चलती हुई, पल भर ही में, मुझे पीछे छोड़ती हुई मुझसे आगे, ‘ये ऽ जा-वो ऽ जा!’ सड़क लगभग सुनसान। न तो कोई आवा-जाही न ही वाहनों की भरमार। ले-दे कर हम दो ही पद-यात्री। मुझे पार कर आगे निकली महिला को मैं ठिठक कर देखने लगा। पता ही नहीं लगा कि मैं कब रुक गया। मैं सनाका खा गया और हुआ यह कि मुझे, मुझे पीछे छोड़ कर जाती हुई उस महिला की पीठ पर मेरे उन सारे हितैषियों की शकलें नजर आने लगीं जो मेरी फिक्र में दुबले होते रहने का भरोसा मुझे दिलाते रहते हैं।

इसके बाद पूछिए मत कि मेरा मन कैसा-कैसा हुआ और अपने हितैषियों को मैंने कैसे-कैसे याद किया। बस! एक ही बात की तसल्ली रही कि जब मैं ‘कुछ भी कर गुजरने’ की मनोदशा में था तब, मुझे लड़ियाने-दुलराने वाले मेरे तमाम हितैषियों में से वहाँ कोई नहीं था। अच्छा हुआ कि वे सब और मैं तथा दोस्त और दोस्ती बची रह गई।

भगवान ऐसे दोस्त सबको मिलें जो मुगालते में रख कर दोस्तों को सुखी जीवन का उपहार देते हैं और मुगालते दूर करके हकीकत से वाकिफ भी बनाए रखते हैं।

दोस्ती जिन्दाबाद!

(अब तुम मिलना स्सालों! तुम सबने, अनायोजित रूप से मेरे मजे लिए। अब मैं एक-एक को निपटाऊँगा। तुम सबकी ऐसी गत बनाऊँगा कि सारी दुनिया तुम्हारे मजे लेगी। दोस्ती एक फर्ज है। यकीन मानो! पूरी शिद्दत और पूरी ईमानदारी से निभाऊँगा।)

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अब कहाँ जाऊँ?

वह 1962 का साल था। ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ और ‘पंचशील’ की भावना को धता बताते हुए, भारत की पीठ में छुरा भोंकते हुए चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। थोपे गए इस युद्ध में भारत रास्त हुआ था। चीन ने अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया था। इस, सर्वथा अनपेक्षित, आकस्मिक हमले से पूरा देश हतप्रभ और आक्रोशित था। प्रधान मन्त्री जवाहर लाल नेहरू को गहरे सदमे में थे। संसद गरमाई हुई थी। सांसद उबल रहे थे। विपक्ष हंगामा किए हुए था। चीन के कब्जे से अपनी जमीन मुक्त कराने की माँग मानो दसों दिशाओं में गूँज रही थी। खुद को सम्हालने के लिए संघर्षरत, अवसादग्रस्त नेहरू लोक सभा के जरिये पूरे देश को सांत्वना और भरोसा दिलाने के लिए जूझ रहे थे। बात को हलका करने की कोशिश में कह बैठे कि अक्साई चिन में तिनके के बराबर घास भी नहीं उगती। नेहरू ने कह तो दिया लेकिन समूचा सदन भड़क उठा। विपक्ष तो आक्रामक हुआ ही किन्तु नेहरू की कल्पना के सर्वथा विपरीत, उनके मन्त्री मण्डल के सदस्य महावीर त्यागी, नेहरू की इस बात के विरोध में सबसे पहले आगे आ गए। नेहरू को अपना गंजा सर बताते हुए पूछा - ‘यहाँ भी कुछ नहीं उगता! इसे कटवा दूँ? किसी और को दे दूँ?’ नेहरू अकबका गए। कोई उत्तर देते नहीं बना। अगले दिन के अखबारों में महावीर त्यागी मुख पृष्ठ पर छाए हुए थे। स्वतन्त्र भारत के इतिहास में यह सम्भवतः पहला प्रसंग था जब किसी मन्त्री ने अपने ही प्रधान मन्त्री को ऐसी दुविधाजनक दशा में ला खड़ा किया था।

इस ऐतिहासिक प्रसंग के बाद नेहरू और त्यागीजी के सम्बन्धों को लेकर अटकलोे के पहाड़ खड़े हो गए थे। लेकिन दोनों की आत्मीयता और मैत्री भाव पर रंच मात्र भी खरोंच नहीं आई। इसका दस्तावेजी प्रमाण मिला, नेहरू के निधन के बाद, नेहरू को याद करते हुए लिखे, त्यागीजी के इस लेख में। यह लेख रतलाम से प्रकाशित हो रहे साप्ताहिक उपग्रह के, वर्ष 1965 के गणतन्त्र दिवस विशेषांक में छपा था। मुझे यह लेख श्री ललित भाटी (ए-105, एलिट अनमोल, बिचोली मार्ग, इन्दौर-452018, मोबाइल नम्बर 98270 08628) से मिला है। लेख के साथ दिया गया चित्र, नेहरू मेमोरीयल म्यूजियम एण्ड लायब्रेरी में संग्रहित है जो मैंने गूगल से लिया है।

अब कहाँ जाऊँ?

- महावीर त्यागी
केन्द्रीय पुनर्वास मन्त्री, भारत सरकार

भगवान सर्वव्यापक है इसका विश्वास तो सभी को है पर अनुभव शायद ही किसी को हो। आज अपने 44 वर्ष के साथी और नेता के निधन के समय मुझे अपने जीवन में पहली बार अनुभव हुआ कि व्यापकता का वास्तविक अर्थ क्या है। आज 18 दिन हो गए दाह कर्म किये, पर मन की तली में (गहराई में) वह मुस्कुराती, शरमाती, धमकाती और उकसाती सूरत अभी तक ऐसी समाई हुई है कि भुलाई नहीं जाती। जब भी कोई समस्या सामने आती है, तो पुरानी आदत के अनुसार अनायास जवाहरलाल से मिलने, टेलीफोन करने या चिट्ठी लिखने की प्रवृत्ति होती है, फिर जागृत बुद्धि कहती है ‘पागल’।

‘व्यापक’ के अर्थ है ‘छवि का प्रसार’। जैसे माँ के मन पर उसका बच्चा व्याप्त रहता है उसी प्रक्रार जवाहरलाल नेहरू भी अपने साथियों के मन पर छाए हुए हैं। शरीर तो नष्ट हो गया है पर उसकी परछाईं (फोटो) तो हमारे हृदयों पर छाप लगाए बैठी है। जब तक हम लोगों के ये दिल (उनकी निगेटिव प्लेट) जिन्दा हैं, जवाहरलाल जिन्दा है।

पर यह क्या बात है कि मुझे उनकी मरने को खबर से जितना धक्का लगा, उससे कहीं अ्रधिक दुःख उनकी दाहक्रिया से लौटने पर हुआ और संगम में अस्थि प्रवाह करने के बाद उससे भी अधिक। ज्यों-ज्यों दिन बीतते जाते हैं, दुख बजाय कम होने के बढ़ता ही जाता है।

महात्मा गाँधी ने इस अन्धकारमय भारत की सेवा के लिए हजारों-लाखों व्यक्तियों को प्रेरणा देकर स्वतन्त्रता प्राप्त की और जैसे दीपावली में दीपमालाएँ सजाई जाती हैं, ‘दीप’ ने इसी तरह भारत के कोने-कोने में अपने अनुयायियों को प्रहरी बना कर रखा था। दीेपावली के बल्व रूप में हक सब दमक रहे थे कि आज जवाहरलाल के निधन से हमारा प्रकाश स्रोत (पावर हाउस) उखड़ गया और सारे बल्ब बुझ गए। पर चूँकि फ्यूज नहीं हुए थे इसलिए हमने फौरन ही श्री लाल बहादुर शास्त्री को अपना प्रकाश-स्रोत बना लिया और फिर से टिमटिमाने लगे। यदि जनता का पूरा सहयोग प्राप्त रहा तो आशा है हम फिर अपनी पुरानी शक्ति प्राप्त कर लेंगे और जी भर के अपने कर्तव्यों का पालन कर सकेंगे ।

मुझे पूरी तरह याद है कि खिलाफत-आन्दोलन के समय एक बार जवाहरलाल बिजनौर आए। उन दिनों मैं जिला काँग्रेस कमेटी का मन्त्री था। साथियों की एक टोली के साथ काँग्रेस के मेम्बर बनाने और ‘तिलक स्वराज्य फण्ड’ के लिए चन्दा इकट्ठा करने के लिए बजार से निकले तो एक दुकान के सामने जवाहरलालजी ने अपना कुर्ता फैलाकर भिक्षुक के रूप में चन्दा माँगा। लोगों ने धड़ाधड़ रुपए और पैसे फेंक कर चरण छूना शुरु कर दिया-‘मोतीलाल का बेटा हमारी दूकान पर भीख माँगे!’ लोग पागल बन गए। इसी तरह रायबरेली और प्रतापगढ़ के जिले में धोती-चप्पल पहने गांव-गाँव किसान अ्रान्दोलन के सिलसिले में पैदल सफर को निकले थे। वे दिन याद करके मन को धक्का लगता है। भगवान फिर से वही देश-भक्ति और सेवा-भाव का उत्साह जागृत कर दें।

कांग्रेस में शायद अकेला मैं ही उनका एक पुराना साथी ऐसा रह गया था कि जिसके साथ वह खुली डाँट-डपट कर लेते थे। असल बात यह थी कि हम थे तो एक हो थैली (गाँधी परिवार) के चट्टे-बट्टे। पर वे विलायत के पढ़े हुए थे और मे ठेठ देहाती। हम में से जो खुशामद के द्वारा काम निकालने वाले थे उनका काम तो हो जाता था पर मुझे पता है कि जवाहरलाल के दिल में उनकी खाक भी कदर नहीं थी। वह उनको ‘छोटा आदमी’ कहते थे। जैसे खाने के बाद इलायची या पान खा लेते हैं, ऐसे ही, दिन भर की थकावट के बाद यदि कोई अपनी आँख देखी बातों पर उनकी खुशामद न करके किसी दूसरे से सुनी हुई प्रशंसा की चर्चा करे तो शौक से सुन लेते थे। एक आदत और थी। वह यह कि यदि आप उनके किसी साथी या मित्र की बुराई करें तो चाहे वह सच्ची क्यों न हो, वह जानबूझ कर कहा करते वे-‘मैं उनको आपसे ज्यादा जानता हूँ। आपको ऐसी फजूल की बातें नहीं करनीं चाहिए।’ मुझसे हर तरह की कच्ची-पक्की बात हो जाती थी क्योंकि वह मुझे ‘बेवकूफ’ मानते थे और बेवकूफ आम तौर पर ईमानदार होते हैं।

कश्मीरी गाल 

एक बार, जब मैं सुरक्षा संगठन मन्त्री था, हम सब काँग्रेस पार्दी के लोग होली खेलने जवाहरलालज़ी के घर पर गये। होली का त्यौहार तो प्रेम के हुर्रे बिखेरने का होता है, इस दिन सब खता माफ समझी जाती है। सब लोग जवाहरलालजी के मुँह पर हरा, पीला, लाल गुलाल लगा कर गले मिल रहे थे। पन्तजी भी वहीं खड़े थे। जब मेरा नम्बर आया तो गुलाल मलने के बाद गले मिलते हुए मैंने जवाहरलाल की, लम्बी सी चुमकारीदार चुम्मी काट ली। प्राइम मिनिस्टर के गालों को चूमना कोई आसान काम था?

सब साथी हक्के-बक्के से रह गए। उनकी बचपन की आदत, अपने रंगे मुँह को रूमाल से पोंछते हुए बोले ‘यह क्या बद्तमीजी है? मुँह जूठा कर दिया!’ मैंने कहा “माफ़ कीजिए, कश्मीरी गाल हिन्दुस्तान भर में इसी काम आते हैं। सबने ‘होली है’ कह कर मजाक उड़ा ली। ऐसे थे वे लाल-लाल गाल, गाली-गुस्सा तो करते थे, पर चूमने वालों को बड़े चाव से चुमकार कर अपने पास बिठा लेते थे ।

जेबकतरा

उसी पेन से लिख रहा हूँ कि जो जवाहरलालज़ी की जेब से चुराई थी। कमजोरी बहुत आ गई थी। काँग्रेस पार्लियामेण्ट्री पार्टी को बैठक उन्हीं के घर पर हुई। उनके चेहरे को देख कर सब सुस्त से पड़ गये थे। ऐसा लगा, हमारी इस मौन अवस्था, को देख कर इनके मन में, बुरा

असर पड़ेगा। बस, मैं उठकर उनके नजदीक की कुर्सी पर जा बैठा। वह सामने, गलीचे पर बैठे हुए मित्रों के उतरे हुए चेहरों को देख रहे थे कि मैंने लम्बा हाथ बढ़ा कर उनकी जेब में जो सुन्दर सा बाल पेन लगा था, खेंच कर अपनी जेब में सजा लिया। उन्होंने हँसते हुए कहा ‘यह क्या?’ मैंनेे कहा ‘जेब कतरेपन का अभ्यास कर रहा हूँ। उन्होंने कहा ‘तुम इस आर्ट में सफल नहीं हो सकते। जेब ऐसे काटनी चाहिए कि किसी को पता न चले। तुम तो डकैती के योग्य हो।’ फिर भी मैंने कहा ‘पार्टी की राय है कि आप को ज्यादा काम नहीं करना चाहिए। जब तक आपके हाथ में कलम रहेगा आराम नहीं कर सकोगे। इसलिए, जिसकी जेब, उसी का कलम।’ वे बोले, ‘अच्छा भाई लड़ते क्यों हो! ले लो।’ मैंने कलम हाथ से लेकर कहा “शर्म नहीं आती? भारत के प्रधान और यह चवन्नी वाली कलम?’ (जर्मनी का विल्सन रजिस्टर) था)।  बोले-‘काँग्रेस सदस्य भी तो सब चवन्नी वाले कहलाते है!’

घड़ी का मुकदमा

इसी तरह 1952 में जब मैं रेवेन्यू एण्ड एक्सपेण्डीचर का मिनिस्टर था तो आए दिन किसी मिनिस्ट्री के खर्चे की स्वीकृति देने में मतभेद हो जाने पर मुझे केबिनेट में जाना पड़ता था। एक दिन मैं तीन मिनिट देर करके पहुँचा तो जवाहरलाल बोले ‘मिनिस्टर होते हुए भी समय की पाबन्दी नहीं करते।’ मैंने कहा-‘अपने होम मिनिस्टर डॉ. काटजू से पूछो कि उन्होंने लोक सभा से निकलते ही मेरी जेब से घड़ी छीन कर अपनी जेब में रख ली ओर ले गए। मैं बिना घड़ी के रह गया। फिर समय की पाबन्दी कैसे करूँ?’ बोले-‘अच्छा। मैं तुमको एक घड़ी दूँगा।’ 

दो महीने बीत गये पर घड़ी नहीं मिली। एक दिन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में किसी समारोह के अवसर पर चाय दी। काफी भीड़ थी। मैंने जवाहरलालजी का हाथ पकड़कर कहा-‘जरा राजेन्द्र बाबू तक चलो।’ सामने खड़ा करके वोला-‘राष्ट्रपतिजी! एक दावा (मुकद्दमा) महावीर त्यागी बनाम पं. जवाहरलाल वल्द पं. मोतीलाल नेहरू आपकी अदालत (न्यायालय) में पेश है।’ जवाहरलाल बोले-‘मुकदमे से पहले आपस में समझौता नहीं हो सकता?’ मैंने कहा-‘नहीं। मेरा दावा है कि हजूर के होम मिनिस्टर एक कश्मीरी सज्जन हैं कि जिन्होंने पार्लियामेण्ट में मेरी जेब से घड़ी निकाल ली। जब एक दिन मुझे केबिनेट जाने में देर हो गई तो दूसरे कश्मीरी, आपके प्रधान मन्त्री ने मुझे एक घड़ी देने का वायदा किया। पर आज दो महीने हो गए घड़ी नहीं मिली!” जवाहरलाल ने राष्ट्रपति के सामने गर्दन झुकाकर कहा-‘आई प्लीड गिल्टी।’ राजेन्द्र बाबू ने हँस कर कहा-‘अब तो तुम्हारी डिग्री हो गई। अगर घड़ी नहीं मिली तो कुर्की करा सकते हो।’ अगले ही दिन जवाहरलाल ने बुला कर एक घड़ी निकाल कर मेरे हाथ रख दी और बाले-“जानते हो, यह किसकी है? यह ‘भूतनी’ ने मुझे भेंट की थी।” मैंने पूछा ‘भूतनी कौन?’ तो बोले-“भूल गये? प्रान्तीय काँग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी में तुमने कहा था कि मेरे सिर पर ‘भूतनी’ सवार हो गई है।” 20-25 वर्ष पहले  की कही तीखी बात उन्हें अभी तक याद थी! बात असल में यह थी कि चेंकाईशेक उन दिनों चीन के नेता थे, और चीन की क्रान्ति में उनका बड़ा हाथ था। हम लोग अपने देश के स्वतन्त्रता संग्राम में लगे थे। मैडम चांकाईशेक भारत आई तो हम लोगों ने उनका बहुत स्वागत किया था। उस दिन प्रदेश काँग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी में पण्डित जवाहरलाल आधा घण्टा तक मैडम चांकाईशेक के ही किस्से सुनाते गये। और भी कई विषयों पर विचार करना था। मैं मन्त्री था इसलिये झुंझलाहट आ गई। सो, मैंने जोर से कहा ‘और भी बहुत आवश्यक बातों पर विचार करना है। यह मैडम चांकाईशेक भूतनी की तरह तुम्हारे सिर पर सवार हो गई है कि इसी के किस्सों में सारा समय खो दिया।’ पन्तजी, बालकृष्ण शर्मा, आचार्य नरेन्द्र देव और टण्डनजी आदि सब ठट्ठा मार कर हँस पड़े और जवाहरलाल भी हक्के-बक्के से होकर मुस्करा दिये। घड़ी लेते हुए मैंने कहा-‘जब मैडम चांकाईशेक तुम्हारे मन से उतर गई तो उसकी घड़ी मेरे हिस्से में आई।” घड़ी बहुत कीमती है। अभी मेरे पास सुरक्षित है।

काणे को काणा कहना ठीक नहीं

मरने से सवा महीने पहिले एक टेलीफोन आया-‘आज शाम के 5 बजे आ जाओ। प्रधान मन््त्री मिलना चाहते हैं।’ मेरे नाती (अनिलकुमार-11 वर्ष ) ने कहा-‘पापा, तुम्हें मिनिस्ट्री दे तो मत लेना।’ मैंने पूछा ‘क्यों न लू?’ तो बोला-“जब अच्छे लोगों ने कामराज प्लान में मिनिस्ट्री छोड़ दी तो तुम्हारे लिए मिनिस्ट्री ठीक नहीं।’ अपने नाती की समझ पर मैं बहुत खुश हुआ।’

पाँच बजे प्राइम मिनिस्टर के घर पहुँचा तो आधे घण्टे काश्मीर आदि को बातें करने के बाद बोले-“हाँ। मुझे तुमसे खास बात यह कहनी थी कि पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों की समस्या बहुत जटिल होती जा रही है, अब तुम केबिनेट में आ जाओ और इस काम को संभालो।’ मिनिस्ट्री से निकले 7 वर्ष हो चुके थे। फिर भी दिल के बुझे हुए कोयले भड़क उठे। मित्रों से कहा करता था कि मिनिस्ट्री करने की इतनी इच्छा नहीं कि जितनी मिनिस्ट्री के न्यौते को ठुकराने की है। बस! एकदम अपने नाती की बात दोहरा दी। खूब हँसे और बोले-‘उमा के लड़के ने ऐसा कहा? तो तुम मेरी बात मानोगे या उस बच्चे की?’ आपस में हम एक-दूसरे को ‘तुम’ कहकर बोलते थे। मैंने कहा-‘जवाहरलालजी! बीमारी के कारण तुम्हारा दिमाग कमजोर पड़ गया है क्या? अच्छा खासा पार्टी का काम चला रहा हूँ। क्या तुम्हारी केबिनेट, पार्टी से भी अधिक महत्व की है? लोग मुझे क्या कहेंगे?’ उन्होंने कहा-‘मैं बताऊँ क्या कहेंगे? लोग कहेंगे कि यह बड़ी लम्बी-लम्बी बात करते थे। जब इम्तिहान का वक्त आया तो बुजदिलों की तरह पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।’ मैंने कहा-‘लोग तुम्हें भी तो कहेंगे कि क्योंकि लम्बी-लम्बी बात करता या इसलिए ही मिनिस्टर बना कर इसका मुँह बन्द कर दिया।’ बोले-‘यह हो सकता है। पर कुछ लोग ऐसा भी कहेंगे कि देखो! जवाहरलाल कितना उदारचित्त है कि अपने नुक्तेचीन के लिए भी जगह रखता है।’ मैंने पूछा-‘क्या तलाक हो चुकने के बाद भी मियाँ-बीबी शादी कर सकते है?’ बोले-‘हाँ। बदचलन हो तो कर सकते हैं।’ मैंनें कहा-‘फिर तो दोनों ही बदचलन हुए ना?’ बोले-‘बेवकूफी की बातें करोगे तो फिर सुननी पड़ेगी।’ मैंने कहा-“अब आये हो ठिकाने पर। आज 42 वर्ष हुए, सन् 1922 में जब लखनऊ जेल की 6 नम्बर बैरक में तुम हम लोगों को फ्रेंच पढ़ाया करते थे, और हम तुम्हें ‘वरगू मास्टर’ कहा करते थे, तो एक दिन किसी शब्द का उच्चारण कई बार बताने पर भी मैं ठीक न कर सका था तो तुमने मुझे ‘डेमफूल’ कहा था और फिर सन् 1924 तक अपने सब साथियों को ‘तुम बड़े चुगद हो’ कहा करते थे। फिर एकदम चुगद कहना बन्द कर दिया और मुझे ‘बेवकूफ’, ‘बद्तमीज’, ‘अनमेनरली’ और ‘अनकूथ’ कहा करते थे। जब आपका डिफेन्स मिनिस्टर था तो भी कई बार बेवकूफ, बदतमीज कहते थे। अब मिनिस्ट्री से हटाते ही हम ‘श्री त्यागीजी’ और ‘मिस्टर त्यागी’ हो गये हैं। अब तो मुझे ‘आप’ कहकर पुकारते हो। मेरा-तुम्हारा रिश्ता बदल गया है जवाहरलालजी। अब मैं तुम्हारी केबिनेट में कैसे आ सकता हूँ?” मुस्कराते हुए बोले-‘तो क्या तुम्हें बेवकूफ कहलाना पसन्द था?’ मैंने कहा-‘हाँ। उसमें मुहब्बत और प्यार की बू आती थी।’ बहुत हँसे और मस्त आँखें मेरी आँखों में डालकर बड़े प्यार से मुस्कराते हुए बोले-‘भाई मुझे माफ करना। मैंने तुम्हें बेवकूफ कहना इसलिए बन्द कर दिया था कि सचाई की मजाक अच्छी नहीं होती है। काणे को काणा नहीं कहना चाहिए।’ फिर क्या था! मुशायरे (कवि सम्मेलन) का मजा आ गया। दोनों हँसी में ऐसे तन्मय हो गये कि सारी शिकायतें दूर हो गईं। फिर वे बोले-‘अब तो बेवकूफ कह दिया! अब तो मान जाओ!’ मैंने उनसे आज्ञा चाही कि मैं श्री लालबहादुर से सलाह कर लूँ। तो बोले-‘जरूर कर लो। पर कभी फिर यह न कहो कि मैंने बात छिपा ली। मैं लालबहादुर से सलाह कर चुका हूँ।’ अगले दिन मैं जानबूझ कर लालबहादुर शास्त्री के पास नहीं गया। फिर उन्होंने टेलीफोन किया तो गया और जाते ही मैंने कहा-‘क्यों भाई! मेरे साथ मुन्शीपना कर गये ना? मुझे खबर भी नहीं की और फँसवा दिया जवाहरलाल के जाल में?’ बोले-‘बात तो बहुत दिनों से चल रही थी, पर बिना जवाहरलाल जी की आज्ञा के मैं जिक्र कैसे करता?’ फ़िर बुलावा आया तो मैंने जवाहरलालजी से कहा कि श्री मेहरचन्द खन्ना के पास दो बड़े-बड़े विभाग होते हुए भी वह भी मिनिस्टर ऑफ स्टेट रहे और मुझे उनका आधा काम देकर केबिनेट मिनिस्टर बनाओगे तो उन्हें तुमसे शिकायत होगी। बोले-‘यह तुम ठीक कहते हो। पर अब तो मैं तुम्हें निमन्त्रित कर चुका।’ मेरे यह कहने पर कि ‘क्या यह निमन्त्रण सरकारी विज्ञप्ति है? मेरा इतना भी एतबार नहीं?’ मेरे कन्धे पर हाथ रखकर बोले-‘भाई! माफ करना। मेरा मतलब यह नहीं था। तुम्हारी बड़ी उदारता है। अब मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। तुम पार्टी-संगठन का कार्य करो। मैं इस काम में पूरी तरह सहयोग करूँगा। मिनिस्टी खतम। हम-एक दूसरे से हाथ मिलाकर विदा हो गए।

तीसरे दिन फिर बुलाया और बोले-‘मैंने उस बात पर फिर गौर किया। खन्ना को क्या शिकायत हो सकती है? क्या वह नहीं जानते कि हमारी पार्टी में मेरे बाद तुम सबसे सीनियर काँग्रेसमेन हो? इसके अलावा मैं पुनर्वास विभाग के साथ कुछ पिछड़े हुए क्षेत्र शामिल करके इसकी शक्ल बदल दूँगा। अब मंजूर कर ला।’ मैंने कहा-‘अच्छा। पर सुझाव और है कि मुझे खन्नाजी का पार्लियामेण्ट्री सेक्रेटरी बना दो और अखबारों में छपवा दो कि इसे मिनिस्ट्री के लिए आमन्त्रित किया था। इसने मिनिस्ट्री स्वीकार न करके पार्लियामेण्ट्री सेक्रेटरी होना मंजूर किया।’ बड़े खुश हुए और बोले-‘इससे देश में तुम्हारी ख्याति तो बढ़ेगी ही, काँग्रेस और सरकार की शान भी ऊँची उठेगी। पर मुझे तो विभाग अलग करना है, और कोई विभाग पार्लियामेण्ट्री सेक्रेटरी के सुपुर्द नहीं हो सकता।’ 

इस तरह दस दिन तक बातें चलीं। आखिर 16 अप्रेल को मिनिस्ट्री की शपथ दिला दी। पर मुझे यह क्या पता था कि यह मिनिस्ट्री मुझे वसीयत के रूप में दी जा रही है। ‘पुनर्वास’ मेरे सुपुर्द करके स्वयं स्वर्गवास कर गए। 

जब मेरे नगर देहरादून जा रहे थे मैंने अपना कलकत्ते का प्रोग्राम छोड़कर देहरादून जाना चाहा तो मुझे ‘बेवकूफ’ कह दिया और हिदायत कर दी कि कलकत्ते में शरणार्थियों के साथ-साथ मुस्लिम बस्तियों का भी दौरा करना और मुझे सब हाल बताना। वे आए और दिन निकलने से पहले ही बेहोश हो गए। उन्हें रिपोर्ट न दे सका।

अब कहाँ जाऊँ?

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सच : सामना नहीं, साथ

(आज, अचानक ही या लेख सामने आ गया। मेरे ब्लॉग गुरु श्री रवि रतलामी द्वारा प्रकाशित/सम्पादित, हिन्दी की सम्भवतः प्रथम ई-पत्रिका ‘रचनाकार’ में, जुलाई 2009 में यह लेख छपा हुआ नजर आया। याद नहीं आ रहा कि इसे मैंने ‘रचनाकार’ के लिए ही लिखा था या रविजी ने मेरे ब्लॉग से लिया था। बहरहाल, इसे पढ़कर लगा कि इसे एक बार फिर जाहिर किया जाए। सो, आंशिक सम्पादन/संशोधन के बाद इसे फिर से दे रहा हूँ।)

कई बीमा-मित्रों के कहने पर ‘सच का सामना’ कार्यक्रम के दो अंक देखे। एक अंक अभिनेता यूसुफ हुसैन वाला और एक अंक विनोद कांबली वाला। मैं न तो रोमांचित हुआ और न ही असहज। सच को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में कितनी कठिनाई और असहजता होती है, यह अवश्य देखा।

‘सच’ की आवश्यकता, अपरिहार्यता, महत्व, पावनता आदि को लेकर अब तक जो कुछ भी कहा जा चुका है वह सब भी हमें कम लगता है। फिर भी सच का साथ हमें कम ही पसन्द आता है। दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेज़ों द्वारा बरते जा रहे रंगभेद, नस्लभेद और अमानवीय शोषण के विरुद्ध अपने अभियान के दौरान गाँधी ने ‘ईश्वर ही सत्य है’ कहा था। किन्तु उन्हीं गाँधीजी ने भारत लौट कर जब उन्हीं अंग्रेज़ों के विरुद्ध अभियान चलाया तो उन्होंने ईश्वर और सत्य को परस्पर स्थानापन्न करते हुए कहा - ‘सत्य ही ईश्वर है।’ समूचा विश्व साक्षी है कि गाँधी ने अपने ईश्वर को केवल उच्चारा नहीं, अपनी सम्पूर्णता में अंगीकार उसे आजीवन जीया। गाँधी मनुष्येतर कुछ भी नहीं थे। वे हाड़-माँस के, ‘ढाई पसली’ वाले सामान्य मनुष्य ही थे। किन्तु ‘सत्य के संग’ ने उन्हें अनोखा और अद्वितीय बना दिया।

यह यदि ‘सत्य की विशेषता’ है तो ‘सत्य का खतरा’ भी। सच का साथ जोखिम भरा है और जोखिम उठाना हमारी फितरत में नहीं। इसीलिए हम पूरी सत्य निष्ठा से, सच से परहेज करते हैं। यह अलग बात है कि अन्ततः हमारे झूठ की कलई खुलती ही है और तब हमें जो नुकसान होता है वह उस नुकसान से कहीं अधिक होता है जो सच बोलने पर होता।

कोई माने न माने, यह सौ टका सच है कि हमारा लोक जीवन और लोक व्यवहार झूठ के सहारे ही चल रहा है। इसीलिए बात करते समय हमें बार-बार सौगन्ध खानी पड़ती है और ‘सच कह रहा हूँ’ या ‘सच मानिएगा’ जैसे जुमले प्रयुक्त करने पड़ते हैं। इतना सब करने के बाद भी हमें सन्देह बना ही रहता है कि सामने वाले ने हमारी बात को सच माना या नहीं। वस्तुतः यह सन्देह सामने वाले पर नहीं, अपने आप पर ही होता है क्यों कि हम भली प्रकार जानते हैं कि हमने सच नहीं कहा।

सच केवल सच होता है। वह सदैव ‘पूर्ण’ होता है। आंशिक या आधा-अधूरा नहीं होता। बरसों पहले मैंने, राजस्थान के शब्द-पुरुष वरेण्य कन्हैयालालजी सेठिया की एक कविता पढ़ी थी। कुल जमा दो पंक्तियों की। प्रत्येक पंक्ति में बस, दो-दो शब्द। आप भी पढ़िए -

झूठ सफेद
सत्य रंगहीन

इन चार शब्दों में सच का और हम मनुष्यों का समूचा चरित्र बखान कर दिया गया है।

सच का कोई रंग नहीं होता। वह पारदर्शी होता है। वह आवरण का काम नहीं करता। किन्तु हम मनुष्यों को जीवन में रंगीनी भी चाहिए और आवरण भी। हम ‘होने’ में नहीं, ‘दिखने’ में विश्वास करते हैं। जाहिर है, सच तो हमारे काम आ ही नहीं सकता। किन्तु इसे विसंगति कहिए या विचित्रता या कि हमारी विवशता कि सच के बिना भी हमारा काम नहीं चल सकता। सो, हम सब सच को या तो सुविधानुरूप वापरते हैं या फिर मजबूरी में। गाँधी के लिए सत्य उनकी प्रकृति था और हमारे लिए मजबूरी। ‘मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी’ जैसा मुहावरा इसीलिए लोक प्रचलन में आया होगा।

सच के साथ कठिनाई यह है वह अजर-अमर है। वह कभी नष्ट नहीं होता। वही स्थायी है। चूँकि वह समूची सृष्टि में समान रूप से विद्यमान है, इसलिए वह कहीं आता-जाता भी नहीं। जाना तो हमेशा झूठ को ही पड़ता है। कभी गधे के सिर से सिंग की तरह तो कभी सरपट भाग कर। यद्यपि झूठ के पाँव होते ही नहीं।

सच तो हमारा जीवनाधार है। हमारे वेदों/उपनिषदों की प्रारम्भिक प्रार्थनाएँ भी ‘असत्य से सत्य की ओर’ जाने के लिए की गई हैं। सच तो यह है कि झूठ से हमें क्षणिक और तात्कालिक सुख भले ही मिल जाए किन्तु वास्तव में वह आत्म भ्रम ही है। ‘जीवन-आनन्द’ तो सच में ही है। हम सारी दुनिया को धोखा दे सकते हैं, खुद को नहीं। जाहिर है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति सत्य का वाहक तो है किन्तु सच से परहेज करने की कोशिश करते हुए। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे कि खिजाब लगाए कोई व्यक्ति अपने बालों के काला होने का भ्रम पैदा करते हुए भली भाँति जानता है कि सारी दुनिया जानती है कि उसके बाल काले नहीं हैं।

हमारे ऐसे ही, झूठ आधारित सामान्य लोक व्यवहार के कारण सच को भयानक माना जाने लगा है। इतना भयानक कि उसका सामना करने के लिए हमें अत्यधिक साहस की आवश्यकता होती है।

मनुष्य तो पैदा ही सच के साथ हुआ है। सच तो उसका सहोदर है। भला उससे क्या घबराना? क्या डरना? इसलिए भलाई तो इसी में है कि जब हम सच को साथ ले कर पैदा हुए हैं तो जीवन में भी उसके हाथ में हाथ डाल कर चलें। तब, उसका सामना करने की नौबत ही नहीं आएगी।

सत्य व्यक्ति को निर्भय ही नहीं, ताकतवर भी बनाता है। किन्तु जैसा कि मैंने कहा है, सत्य के अपने खतरे भी हैं। यह आदमी को विशिष्ट ही नहीं पूजनीय तक तो बना देता है किन्तु अकेला भी कर देता है। वह सबसे अलग, शिखर पर अवश्य दिखाई देगा किन्तु सब जानते हैं कि शिखर पर आपको एकान्त ही मिलता है और शिखर पर प्राण वायु की भी कमी होती है। सो, सच बोलने वाले की तारीफ सब करेंगे, उसे समारोहों में बुला कर सम्मानित भी कर देंगे किन्तु न तो उसके पास बैठेंगे और न ही उसे अपने पास बैठाएँगे।

सो, ‘सच का सामना’ कार्यक्रम का सच यही है। कार्यक्रम के सवाल अटपटे और असहज करने वाले अवश्य हैं किन्तु प्रत्येक व्यक्ति ने (वह पुरुष हो या स्त्री) अपने जीवन में कम से कम एक बार अपने जीवन साथी से मुक्ति की बात अवश्य सोची होगी। प्रत्येक व्यक्ति ने कम से कम एक बार दुराचार की कामना अवश्य की होगी। प्रत्येक व्यक्ति ने यथासम्भव वर्जनाएँ तोड़ी ही होंगी। हममें से अधिकांश इसलिए चरित्रवान बने हुए हैं कि उन्हें या तो चरित्रहीन होने के अवसर नहीं मिले और यदि अवसर मिले तो वे साहस नहीं कर पाए। अपवाद सब जगह होते हैं। किन्तु अपवाद अन्ततः सामान्य नियमों की ही पुष्टि करते हैं।

कार्यक्रम के सवालों को मैंने ध्यान से सुना और मेरी हँसी छूट गई। सवाल होता है - ‘क्या आपने कभी......?’ सवाल में यह ‘कभी’ ही महत्वपूर्ण है। प्रश्न आपके आपवादिक व्यवहार को आपका सामान्य व्यवहार निरूपित नहीं करता। किन्तु सामना करने वाला यही मान कर चलता है कि उसका आपवादिक आचरण ही उसका सामान्य आचरण मान लिया जाएगा। हम सब सामान्य मनुष्य हैं किन्तु मजे की बात यह है कि हर कोई अपने आप को सबसे अलग, अनूठा और ‘अपनी किस्म का इकलौता’ दिखाना चाहता है। इस दिखावे के चक्कर में ही झूठ की तिजोरियाँ भर ली जाती हैं। 

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आखिरी उम्र में सुधार

सीखने और सुधरने की कोई उम्र नहीं होती। यह बात कल, 02 अक्टूबर 2019 को मुझ पर लागू हो गई।

02 अक्टूबर जलजजी (डॉक्टर जयकुमारजी जलज) की जन्म तारीख है। कल वे 85 वर्ष के हो गए। उनके प्रति अपनी शुभ-कामनाएँ, सद्भावनाएँ प्रकट कर उन्हें बधाइयाँ देने, उनका अभिनन्दन करने के लिए हम कुछ लोग उनके निवास पर पहुँचे। जलजजी का कमरा, उनके मन जैसा बड़ा नहीं है। फलस्वरूप, उनका कमरा छोटा पड़ गया। हम कोई बीस-बाईस लोग थे। मेरे सिवाय बाकी सब, जलजजी के लिए ‘कुछ न कुछ’ लेकर पहुँचे थे। सब पहले जलजजी के पाँव पड़े और फिर टूट पड़े, अपना ‘कुछ न कुछ’ उन्हें अर्पित करने। ‘सबसे पहले मैं’ की होड़ लग गई। लगा, कमरे की दीवारें चार-चार फीट पीछे सरक जाएँगी। मैं बाहर निकल, आँगन में आ खड़ा हुआ। कुछ देर बाद कुछ लोग और बाहर आ गए। इनमें चाँदनीवालाजी, सूबेदारसिंहजी भी थे। बाहर खड़े हम सब फुरसत में थे। बिना बात की बात चल पड़ी। एक आवाज आई - ‘पता नहीं क्यों जलजजी ने ललितपुर की बजाय रतलाम पसन्द किया?’ जलजजी मूलतः ललितपुर (उत्तर प्रदेश) के ही हैं। सवाल मुझे समझ में नहीं आया। मैंने प्रतिप्रश्न किया - ‘क्यों ललितपुर में क्या खास बात है?’ जवाब दिया सूबेदारसिंहजी ने - ‘है ना खास बात! आपने वह कहावत नहीं सुनी?’ ‘कौन सी कहावत?’ मैंने पूछा। सूबेदारसिंहजी ने कहावत सुनाई -

झाँसी गले ही फाँसी,
दतिया गले का हार।
ललितपुर ना छोड़िए,
जब तक मिले उधार।।

सुनते ही मैंने कहा - ‘आप गलत कह रहे हैं। सही कहावत यह है -

झाँसी गले की फाँसी,
दतिया गले का हार।
लश्कर कभी ना छोड़िए,
जब तक मिले उधार।।’

मेरा यह कहना था कि एक के बाद एक कई लोग मुझ पर टूट पड़े। सूबेदारसिंहजी की जड़ें उत्तर प्रदेश में हैं। चाँदनीवालाजी दो बरस ललितपुर रह चुके हैं। कुछ और लोग ऐसे थे जो मूलतः उत्तर प्रदेश से थे। 

जलजजी का जन्मोत्सव तो एक तरफ रह गया और ‘ललितपुर-लश्कर’ की अच्छी खासी बहस छिड़ गई। मैं अकेला लश्कर पर अड़ा हुआ था और वे सब ललितपुर का नगाड़ा बजा रहे थे। किसी ने प्रेम से, किसी ने आदर से, किसी ने झल्लाते हुए तो किसी ने मेरी खिल्ली उड़ाते हुए मुझे समझाने की कोशिश की लेकिन मैं मानने को तैयार नहीं हुआ। नहीं माना सो नहीं ही माना।

इस बीच जलजजी सहित सब लोग आँगन में आ गए। अपनी-अपनी आवश्यकता और इच्छानुसार हम सबने जलजजी के साथ फोटू खिंचवाए। प्रीती भाभीजी ने सबका मुँह मीठा कराया और हम सब, एक बार फिर जलजजी को प्रणाम कर अपने-अपने मुकाम पर लौट आए।

लेकिन मैं अकेला नहीं लौटा। ललितपुर और लश्कर मेरे साथ-साथ चले आए। सब लोगों ने जिस तरह एक स्वर से कहावत में ललितपुर बताया था, उसने मेरे आत्म विश्वास को डगमगा दिया। मैं बरसों तक ग्वालियर, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड जाता रहा हूँ। कभी एक दिन तो कभी दो दिन रुकता रहा हूँ। वहाँ भी यह कहावत कई बार सुनी लेकिन हर बार लश्कर ही सुना। कुछ मराठीभाषी मित्रों/परिचितों से बात हुई तो उन्होंने भी लश्कर की उल्लेखित किया। मैंने अपने जीवन में, इस कहावत में एक बार भी ललितपुर का नाम नहीं सुना। हर बार लश्कर ही सुना।

मैंने सबसे पहले वीरेन्द्रसिंहजी भदौरिया को फोन किया। वे ग्वालियर निवासी हैं। वे व्यस्त थे। बोले कि थोड़ी देर बाद फोन करेंगे। फिर मैंने महेन्द्र भाई कुशवाह को फोन लगाया। वे दो वर्ष तक भास्कर के ग्वालियर संस्करण के स्थानीय सम्पादक रह चुके हैं। उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। मैंने बुन्देलखण्ड अंचल के अपने एजेण्ट मित्रों को फोन लगाया। जवाब ने मुझे धरती पर ला पटका। सबका एक ही जवाब था - ललितपुर। फिर मैंने गूगल खंगाला। वहाँ के सारे परिणामों में ललितपुर ही मिला। थोड़ी देर में भदौरियाजी का फोन आया। उन्होंने भी ललितपुर की ही पुष्टि की।

मुझे हैरत हुई। अपने गलत होने पर नहीं, इस बात पर हुई कि इस कहावत को मैंने कई बार, अलग-अलग जगहों पर प्रयुक्त किया और सुना। लेकिन एक बार भी किसी ने ललितपुर का नाम नहीं लिया नहीं। किसी ने मुझे नहीं टोका। क्या वे सब भी मेरी जैसी ही स्थिति में थे/हैं?

शाम को मैंने चाँदनीवालाजी को पत्र लिख कर धन्यवाद दिया कि उन्होंने मुझे सुधार दिया।

सच ही है - सीखने/सुधरने की कोई उम्र नहीं होती। मैं गवाह नहीं, उदाहरण हूँ।
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जलजजी और प्रीती भाभी के साथ हम लोग

जलजजी के साथ चाँदनीवालाजी

दोनों चित्र श्री नरेन्द्रसिंह पँवार के सौजन्य से। चित्र उन्हीं ने लिए इसलिए वे नजर नहीं आ रहे। 

पटाखों और फुलझड़ियों से ही नहीं होती दीपावली

जिन्दगी के पनघट पर घटनाओं की रस्सियों से बने अनुभूतियों के अमिट निशान हमारी धरोहर और जीवन पाथेय बन जाते हैं। तब चीजें, बातें एक नया अर्थ, नई उपयोगिता हासिल करने लगती हैं। दीपावली को लेकर कुछ ऐसा ही मेरे साथ गए कुछ बरसों से हो चला है। लेकिन मुझे यह भ्रम नहीं कि ऐसा केवल मेरे साथ ही हुआ, हो रहा होगा। विश्वास करता हूँ कि मैं ऐसे अनगिनत लोगों की भीड़ का सबसे अन्तिम, सबसे छोटा हिस्सा ही हूँगा। 

बचपन में बताए, समझाए गए, दीपावली के सारे अर्थ एक के बाद एक, बदल गए। अब दीपावली केवल लंका विजय के बाद राम की अयोध्या वापसी का या तीर्थंकर महावीर के निर्वाण का या फिर नई फसल के आने का त्यौहार नहीं रह गई। पहले समझाया जाता था - दीपावली खुशियों का, खुशियाँ मनाने का त्यौहार है। लेकिन अकेली खुशी भी खुश नहीं हो पाती। खुशी को भी खुश होने के लिए संगाती चाहिए। संगाती भी ऐसा जो हमारी खुशी को अपनी खुशी मानने को तैयार हो सके। कोई दुखी आदमी भला हमारी खुशी में कैसे शरीक हो सकता है? लिहाजा, अपनी खुशी का आनन्द लेने के लिए हमें किसी खुश आदमी की ही जरूरत होती है। तब ही समझ आया कि खुश होना ही पर्याप्त नहीं है। अपने आसपास के लोगों का खुश होना भी बराबरी से जरूरी है। इसलिए, यदि वे खुश नहीं हैं तो उन्हें खुश करने, खुश रखने की भावना उपजी होगी। तब ही अनुभव हुआ होगा कि लोगों को खुश रखना ही सबसे बड़ी खुशी होती है। तब ही दीपावली का नया भाष्य सामने आया - दीपावली खुशियों का त्यौहार तो है जरूर लेकिन उससे पहले, खुशियाँ बाँटने का त्यौहार है। यह पवित्र भावना मन में उपजते ही त्यौहार मन जाता है। तब हम खुशियों की खेती करने लगते हैं। खुशियाँ बोते हैं और खुशियों  की फसल काटते हैं।

खुशी कोई वस्तु तो है नहीं कि बाजार से खरीद लें! वस्तुएँ खुशी दे सकती हैं लेकिन घावों पर मरहम नहीं लगा पातीं। कुछ लोगों के लिए वस्तुएँ खुशी का सबब होती हैं। लेकिन कुछ इनसे अलग होते हैं। उन्हें कुछ दिए बिना भी खुशी दी जा सकती है, यह प्रतीति कुछ बरस पहले मुझे अचानक ही हुई। तब से, हर बरस मेरी दस-बीस दीवालियाँ मन रही हैं। 

बीमे के धन्धे के कारण मैं सभी वर्गों, श्रेणियों, धर्मों, जातियों के लोगों से मिलता हूँ। इन सबसे मिलने पर बार-बार वह बात याद आती है कि सुख, खुशी और सुविधाओं, सम्पन्नता का कोई रिश्ता नहीं है। मुझे महलों में दुःखी, असन्तुष्ट, क्षुब्ध लोग मिलते हैं तो झोंपड़ियों में परम प्रसन्न, सुखी, सन्तुष्ट लोग। 

एक परिवार में मुझे, जिसका बीमा करना था उसकी प्रतीक्षा करनी थी। परिवार में उसके बूढ़े पिता ही फुरसत में थे। उनसे बतियाने लगा। शुरु में तो वे कन्नी काटते रहे। कुछ-कुछ भयभीत होकर। लेकिन जल्दी ही खुल गए। उन्हें कोई कमी नहीं थी। कोई कष्ट नहीं था, किसी से कोई शिकायत नहीं थी। उनकी सारी जरूरतें पूरी हो रही थीं और अपेक्षानुरूप देखभाल भी। लेकिन उनसे बात करने की फुरसत किसी को नहीं थी। मुझे घण्टे भर से अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ी। तब तक वे न जाने कहाँ-कहाँ की बातें करते रहे। मेरे काम की एक भी बात नहीं थी। लेकिन मैं हाँ में हाँ मिलाते हुए सुनता रहा। बीमा करानेवाला लौटा तो उन्होंने आश्चर्य से कहा - ‘अरे! तू इतनी जल्दी आ गया? काम अधूरा छोड़ कर तो नहीं आ गया?’ मुझे अपना काम निपटाना था। मैं उठने लगा तो मेरी बाँह पकड़ कर बोले - ‘आज कितने दिनों में कोई मेरे पास बैठा। आज मैंने खूब बातें कीं। आज तो आपने मेरी दीवाली कर दी।’ यही वह घटना थी जिसने मुझे पहली बार  दीवाली का नया भाष्य दिया था। मेरी गाँठ से कुछ नहीं गया। लेकिन वे बुजुर्ग परम प्रसन्न थे। उसके बाद से तो मैं ऐसी स्थितियों की तलाश करने लगा।

एक परिवार में अब मैं नियमित रूप से जाता हूँ। परिवार के सबसे वृद्ध सज्जन अपंग तो नहीं हैं लेकिन ज्यादा चल-फिर नहीं सकते। मुझे देखते ही खुश हो जाते हैं। उनके पास भी आधा-पौन घण्टा गुजार लेता हूँ। उन्हें परिवार से तो नहीं लेकिन जमाने से शिकायतें हैं। उन्हें दुनिया में कुछ भी अच्छा होता नजर नहीं आता। मैं उनसे कभी सहमत नहीं हो पाया किन्तु कभी असहमति भी नहीं जताई। मैं लौटता हूँ तो कहते हैं कि मैं तनिक जल्दी-जल्दी मिलने आया करूँ। मैं परिहास करता हूँ - ‘आप जमाने को गालियाँ देते हो। क्या गालियाँ सुनने के लिए आऊँ?’ वे कुम्हला जाते हैं। कहते हैं - ‘मैं तो ऐसा ही हूँ। लेकिन आप आते रहो। आप मेरी बातें सुन लेते हो। मुझे खुशी होती है।’

एक परिवार की वृद्धा से मेरी दोस्ती हो गई है। दो मुलाकातों में तीन हफ्तों से अधिक का अन्तराल न हो यह चेतावनी उन्होंने दे रखी है। मेरी खूब खातिरदारी करती हैं। पौन घण्टा तो मुझे रुकना ही होता है उनके पास। अपनी इकलौती बहू की खूब बुराई करती हैं। मैं टोकता हूँ - ‘इतनी तो सेवा करती है बेचारी आपकी! फिर भी बुरी है?’ वृद्धा का जवाब होता है - ‘सब दिखावा करती है। आप बहुओं को नहीं जानते। बहू कुछ भी कर ले, है तो परायी जायी।’  पौन घण्टे के इस बुराई-पीरीयड में बहू दो-तीन बार आकर पानी, चाय-नाश्ता रख जाती है। आते-जाते हँसती रहती है। लौटता हूँ तो वृद्धा मुझे भर-पेट असीसती हैं। कहती हैं - ‘आप आते हो तो मेरा आफरा (अजीर्ण) झड़ जाता है।’ बहू मुझे छोड़ने के लिए बाहर तक आती है। कहती है - ‘आप आते रहिए। मेरे पीहर में तो कोई है नहीं और ससुरालवाले वाले आते-जाते नहीं। बई (सासू माँ) ने सबसे झगड़ा कर रखा है। बई को मेरी बुराई करने में बड़ा सुख मिलता है। मेरी बुराई इनकी बीमारी की दवा है। आपसे कह देती हैं तो इनकी तबीयत ठीक रहती है।’

ये तो गिनती के नमूने हैं। ऐसे कई लोगों से मैंने घरोपा बना लिया है। मैं बीमा एजेण्ट। मेरा काम बातें करना। ऐसे मामलों में मुझे सुनना होता है। सुन लेता हूँ। हर जगह से लौटने में बड़ी सुखानुभूति होती है। लगता है, देव पूजा करके या यज्ञ में समिधा-आहुति डाल कर आ रहा हूँ। इन लोगों की खुशी देखते ही बनती है। सचमुच में अवर्णनीय। ऐसी हर आहुति के बाद लगता है, मैंने दीवाली मना ली है। 

बिना पटाखे फोड़े, बिना फुलझड़ियाँ छोड़े, आदमी के मन और आत्मा को खुशियों और उजास से भर देनेवाली ऐसी दीवालियाँ आप-हम सब, जाने-अनजाने साल भर मनाते हैं लेकिन कभी ध्यान नहीं देते हैं। अब ध्यान दीजिएगा तो खुशी कम से कम दुगुनी तो हो ही जाएगी। बच्चन की मधुशाला तो ‘दिन को होली, रात दीवाली’ मनाती है। लेकिन खुशियों की यह मधुशाला तो दिन-रात, चौबीसों घण्टे, बारहमासी दीवाली मनाती है।  
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‘सुबह सवेरे’ (भोपाल) ने मेरी इस पोस्ट को सम्पादित रूप
में अपने दीपावली 2018 के अंक के मुखपृष्ठ पर जगह दी। 




संस्कृति और परम्पराओं की सदानीरा गुप्त सरस्वती

सावन के भरे-भरे, अपनी सम्पूर्णता से फट कर धरती को लील जाने को उतावले बादल की तरह वे आए और मानो अपने शरीर और आत्मा की पूरी ताकत लगा कर बोले - ‘मैं अकेला रो नहीं पा रहा हूँ। मुझे अपने पास बैठ कर रो लेने दें।’ और मानो प्रलयकारी उद्वेलन कर रही अथाह जलराशि ने सारे तटबन्ध तोड़ दिए। मैं कुछ कहूँ, कुछ पूछूँ, उससे पहले ही, खड़े-खड़े ही फफक-फफक कर रोने लगे। उन्हें बैठाने के लिए मैं उठा तो, उसी तरह रोते-रोते, मुझे बाहों में भींच लिया। अनिष्ट की आशंका से मेरे होश उड़ गए थे। मेरे दोनों जबड़े भिंच गए। जबान तालू से चिपक गई। मैं बोल नहीं पा रहा था। लगा, मैं मूर्च्छित हो जाऊँगा। खुद को गिरने से बचाने के लिए मैंने उन्हें जकड़ लिया। वे मुझसे सहारा लेने आए थे लेकिन मेरा सहारा बने हुए थे। नहीं बता सकता कि कितनी देर हम इस दशा में खड़े रहे।

वे उद्वेगमुक्त हुए तब तक मैं भी तन्द्रा उबरा। ताँबे की तरह तपते उनके चेहरे पर आँसू ठहर नहीं पा रहे थे। मेरे बनियान का दाहीने कन्धेवाला हिस्सा तर-ब-तर होकर पीठ को भीगो रहा था। उन्होंने मुझे छोड़ा और मैंने उन्हें। मेरी ओर देखे बिना ही वे बोले - ‘घबराने या डरने की कोई बात नहीं है। लेकिन अभी-अभी मेरे साथ जो हुआ, उसने मुझे बिखेर दिया। अकेले रह पाना मुश्किल हो गया। इसलिए, जैसा था, वैसा ही चला आया।’ तब मैंने देखा, वे नंगे पाँव ही आए थे। तब भी मेरे बोल नहीं फूटे। अपने दोनों हाथ मेरे कन्धों पर रख, मुझे लगभग धकेलते हुए बोले - ‘बैठिए।’ मैं मन्त्रबिद्ध दशा में बैठ गया। उन्होंने मुझे मौका ही नहीं दिया। खुद ही पूरी बात बता गए।

उनके पोते के ब्याह के बाद यह पहली नवरात्रि थी। अन्तिम दिन, नवमी को उनकी कुलदेवी की पूजा होती है। पोता और बहू कोई ढाई सौ किलो मीटर दूर नौकरी पर हैं। श्राद्ध पक्ष समाप्त होता उससे पहले ही उन्होंने दोनों से खरी-पक्की कर ली थी। वे तो चाहते थे कि पोता और बहू अष्ठमी को ही उनके पास पहुँच जाते। बहू को तो छुट्टी की कोई समस्या नहीं थी लेकिन पोता नौकरी में तनिक महत्वपूर्ण स्थिति में था। उसे थोड़ी कठिनाई आ रही थी। उसने पूरी कोशिश भी की। लेकिन ऐसा सम्भव नहीं हो पा रहा था। तय हुआ कि दोनों ‘लाड़ा-लाड़ी’ नवमी की सुबह नौ बजे तक आ ही जाएँगे। उनकी खुशी पूरे मुहल्ले में बही जा रही थी। उनकी दशा देख-देख उनकी पत्नी हँसे जा रही थी - ‘बावले हो गए हैं ये तो!’ पोते की पसन्द तो उन्हें खूब मालूम थी, बहू की पसन्द के बारे में पहले पोते से, फिर खुद बहू से और बाद में बहू की माँ से भी पूछताछ कर ली। बस! केवल एक दिन बाद, परसों ही, नई कुल-लक्ष्मी जोड़े से, पहली बार अपने परिवार की कुलदेवी की पूजा करेगी। इस कल्पना ने उन्हें बहू से भी छोटा बना दिया था। तैयारियों के लिए वे किसी मृग छौने की तरह कुलाँचे भर रहे थे। लेकिन उन्हें पता नहीं था कि ऊपरवाले ने कुछ और ही तय कर लिया है।

शाम कहिए या रात, कोई साढ़े सात बजे पोते का फोन आया। उसकी आवाज से साफ लग रहा था, वह झुंझलाया हुआ है - ‘दादाजी! सब गड़बड़ हो गया है। अभी-अभी कम्पनी के हेड ऑफिस से मेल आया है। दीवाली से पहले की सारी छुट्टियाँ केन्सल हो गई हैं। केवल मेरी नहीं। हम सबकी। हम सब गुस्से में हैं और लोकल हेड से झगड़ रहे हैं। लेकिन उसकी हालत तो हमसे भी ज्यादा खराब है। हम तो उससे कह रहे हैं लेकिन वो किससे कहे? उसे तो हमारी और ऊपरवालों की, सबकी सुननी है। इसलिए दादाजी! मैं तो नहीं आ सकूँगा। हाँ! आपकी लाड़ी जरूर आ जाएगी।’ पोते की बात पूरी होते-होते वे मानो निश्चेतन हो गए-किसी सूखे ठूँठ की तरह। इस तरह बोले मानो कोई और उनसे कहलवा रहा हो - ‘ठीक है लाला! मैं तुम्हारी दादी से बात कराता हूँ।’ लेकिन पत्नी से कहने की जरूरत ही नहीं हुई। वे पास ही खड़ी थीं। झुंझलाहट में पोता इतनी जोर से बोल रहा था कि दादी को सब कुछ बिना कोशिश के ही सुनाई दे गया। दादी की दशा तो और ज्यादा खराब थी। मरे हाथों से फोन लिया और मानो सबकी मुश्किल आसान कर रही हों, कुछ इस तरह से बोलीं - ‘ठीक है लाला! प्राइवेट कम्पनियों की नौकरियाँ तो ऐसी ही होती हैं। जब छुट्टी मिले तभी त्यौहार। बहू को मत भेजना। पूजा तो तुम दोनों से जोड़े से ही होनी थी। अकेली आकर क्या करेगी? उसे वहीं रहने देना। अगले बरस देखेंगे। तुम दोनों हिलमिल कर, मजे से दशहरा मनाना। रावण दहन देखने जाना और लौट कर फोन करना।’ 

उधर दादी ने मोबाइल बन्द किया और इधर दादाजी की छाती मानो अब फटी कि तब फटी। कुछ भी सूझ-समझ नहीं पड़ी और मेरे पास आ गए। 

रात के नौ बजने को हैं। गली सुनसान हो गई है। श्रीमतीजी पड़ौस में, देवी-भजन में गई हैं। घर में सन्नाटा है। हम दोनों एक दूसरे की धड़कनें सुन रहे हैं। मैं अब सामान्य हो, उन्हें ढाढस बँधाने की कोशिश कर रहा हूँ - ‘हो जाता है कभी-कभी ऐसा। बच्चों का तो कोई दोष नहीं। वे तो आना चाहते थे। लेकिन मजबूरी है। यही मान लें कि ईश्वर यही चाहता था और ईश्वर बुरा तो कभी नहीं करता! इसमें भी उसने सबका कुछ भला ही सोचा होगा।’ मन के भारीपन ने कमरे पर भी कब्जा कर लिया था। मैंने परिहास किया - ‘वैसे भी उन दोनों के हिसाब से अच्छा ही हुआ। यहाँ आते तो आप दोनों बूढ़ों के बीच फँस जाते। बूढ़ों के साथ दशहरे की रेलमपेल और भीड़-भाड़ का मजा नहीं ले पाते। वहाँ दोनों पंछियों की तरह फुदकते-चहकते हुए मेले का मजा लेंगे।’ सुनकर वे मुस्कुरा दिए। बोले - ‘समझा रहे हैं मुझे? चलिए! मैं समझ गया। आपकी बात मान ली।’ फिर रुक कर, लम्बी साँस लेकर बोले - ‘लेकिन विष्णुजी! हम कहाँ आ गए हैं? अपने बच्चों को ऊँची-ऊँची पढ़ाई करवा कर हमने इनका नुकसान तो नहीं कर दिया? और केवल उनका ही क्यों? हमने अपन सबका नुकसान नहीं कर दिया? ठीक है कि बच्चों की तनख्वाहें अच्छी हैं। अच्छी जिन्दगी जी रहे हैं। लेकिन इसकी कीमत कुछ ज्यादा ही नहीं चुका रहे? अब देखिए! बेटा बेंगलोर में है। आ नहीं सकता। लेकिन लाला? ये तो ढाई सौ किलो मीटर है दूर है! लेकिन ये ढाई सौ किलो मीटर भी बेंगलोर के बराबर हो गए! सोचा था, इस बच्ची को कुलदेवी के बारे में कुछ मालूम पड़ेगा। अपने परिवार की परम्परा के बारे में, अपनी संस्कृति के बारे में कुछ जानेगी। इसके मायके में अष्ठमी पूजन होती है और हमारे यहाँ नवमी। दोनों कुलों के नैवेद्य अलग-अलग हैं। इस अन्तर को  जानेगी, समझेगी। शादी के बाद अपनी इस पहली कुलदेवी-पूजा को आजीवन याद रखेगी। लेकिन यह सब हमारे हाथों से छिन गया! अब देखिए ना! त्यौहार है और हम तीन जगह बिखरे हुए हैं। हर पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को परम्पराएँ इसी तरह तो सौंपती हैं! संस्कृतियाँ इसी तरह तो अनवरत, अविरल प्रवाहमान होती हैं! यदि ऐसा ही होता रहा तो हमारी अगली पीढ़ियाँ तो खाली हाथ लिए बैठी रह जाएँगी? ऐसा ही चलता रहा तो कहीं ऊँची तनख्वाहों के पेकेज ही हमारी परम्परा तो नहीं बन जाएँगे? हम अपनी जिस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और गर्वीली परम्पराओं की दुहाई देते हैं वह सब हमारे सामने ही, हमारे हाथों ही तो नष्ट नहीं हो जाएँगी?’ 

मैं उलझन में था। उनकी बात मानने को जी नहीं कर रहा था लेकिन जो कुछ उनके साथ अभी-अभी घटा था उससे भी तो आँखें नहीं फेरी जा सकती थीं। किन्तु मेरे आशावाद ने मेरा हाथ थामा। मैंने कहा-“संस्कृति और परम्पराएँ तो सदानीरा गुप्त सरस्वती की तरह निरन्तर प्रवाहमान रहती हैं। मेरा मन कहता, इस बरस न आ पाने को वह एक अवसर की तरह लेगी। उसका फोन भाभीजी के पास आता ही होगा। वह सारी जानकारी लेकर अपनी गृहस्थी में, अपनी कुलदेवी का पहला पूजन कर ही लेगी। संस्कृतियाँ और परम्पराएँ तो ‘लोक संजीवनी’ से बनती-चलती हैं।” सुनकर मानो उनमें प्राण संचरित हो गए। उछलकर बोले - ‘ओह! भगवान करे वैसा ही हो जैसा आपने कहा।” और मैं उनकी कुछ मनुहार करूँ, उससे पहले ही, उठते हुए बोले - ‘अरे! मैं किस हालत में चला आया? चलता हूँ। श्रीमतीजी परेशान हो रही होंगी।’ और जैसे अस्तव्यस्त आए थे, वैसे ही अलमस्त लौट गए।
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ईश्वर ने कहा -‘ऐसा ही लिखते रहो’

बीस जून बुधवार का लगभग पूरा दिन रोते-रोते ही बीता। दशा और मनोदशा कुछ ऐसी हो गई कि ‘सुबह सवेरे’ के लिए अपने स्तम्भ की सामग्री भी नहीं दे पाया। उल्लेखनीय बात यह रही कि रोने की शुरुआत दुःख से हुई और समापन सुख से। इसी कारण यह सब लिखने की स्थिति बनी।

दादा श्री बालकवि बैरागी के निधन पर अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए कृपालु अब भी आ रहे हैं। लेकिन वे प्रायः शाम/रात को आ रहे हैं। लेकिन बुधवार को यह आगमन सुबह से शुरु हो गया। ये सब  आत्मीय, अन्तरंग। परिजन समान। दादा को याद करते हुए लगभग सबके सब रोने लगे। मुझे तो उनसे पहले ही रोना आ गया। इनमें से एक बाबू भी रहा। वह अपनी अर्द्धांगिनी सुमिता के साथ आया था। उसकी दशा देख कर रोना कई गुना अधिक हो गया। वह पार्किंसन्स का मरीज हो गया है। वह देख नहीं पाता, स्पष्ट बोल नहीं पाता। अपने सारे कामों के लिए पराश्रित हो गया है। बाबू को मैंने सदैव दबदबे, रौब और एकछत्र शासक, नियन्त्रक की स्थिति, मुद्रा और दशा में देखा है। उसे ऐसी पराधीन दशा में देखना मेरे लिए मर्मान्तक पीड़ादायक होता है। मैं उससे आमने-सामने होने से बचता हूँ। लेकिन यह ऐसा प्रसंग था कि वह मुझ तक आने से खुद को रोक नहीं पाया। वह और सुमिता लगभग आधा घण्टा बैठे। लेकिन उसके जाने के बाद मैं अकेले में देर तक रोता रहा। ईश्वर सब पर कृपा करे।

लेकिन दिन ढलते-ढलते ईश्वर (यह ‘ऊपरवाला’ नहीं, धरती का, रतलाम में रहनेवाला ईश्वर है) आया तो उसकी बातों ने मानो चमत्कारी प्रभाव किया। वातावरण और मन हलका ही नहीं हुआ, विगलित और प्रफुल्लित कर गया। उसके जाने के बाद भी देर तक रोता रहा। लेकिन ‘उस’ रोने में  और ‘इस’ रोने में धरती-आकाश का अन्तर रहा। 

ईश्वर का उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग पर 24 दिसम्बर 2009 को
किया था। वह आलेख, साप्ताहिक उपग्रह के मेरे स्तम्भ ‘बिना विचारे’ में ‘छत्तीसवीं कौम’ शीर्षक से छपा था। ईश्वर ने ‘उपग्रह’ की प्रति अब भी सम्हाल रखी है। दस बरस से अधिक का वक्त हो गया है, बिजली से जुड़े मेरे सारे काम ईश्वर ही कर रहा है।

कोई दो बरस पहले वह आया था तो बातों-बातों में कहा था - ‘बाबूजी! आपके उस लेख ने मेरा बड़ा फायदा किया।’ मैंने ध्यान नहीं दिया था। यही माना था कि उस लेख का हवाला देकर लोगों ने उसकी प्रशंसा की होगी। लेकिन कुछ दिनों पहले उसने जब वही बात दोहराई तो मैंने पूछा - ‘कैसे? क्या फायदा हुआ?’ ईश्वर ने जवाब दिया - ‘बैंकवाले मेरा लोन पास नहीं कर रहे थे। मैंने आपका लेख बताया तो उन्होंने एक झटके में मेरा लोन पास कर दिया।’ मुझे अविश्वास और अचरज हुआ। भला बैंक का कोई अफसर किसी के लिखे के आधार पर लोन देता है? लिखे का ऐसा और इतना असर कैसे होने लगा! मैंने अविश्वास से देखते हुए कहा - ‘ऐसे नहीं। पूरी बात बता।’

ईश्वर ने जो कुछ कहा, वह लगभग इस तरह था -

“मैंने बैंक में लोन की अर्जी लगा रखी थी। बैंकवाले टल्ले दे रहे थे। मैं हर साल तीस-चालीस हजार का इनकम टैक्स भर रहा हूँ। अपने केदार वकील साब (रतलाम के अग्रणी प्रतिष्ठित आय कर सलाहकार श्री केदार अग्रवाल) के पास मेरी फाइल है। मैंने कहा कि मेरे गए पाँच-सात साल के इनकम टेक्स के सर्टिफिकेट देख लो। केदार सा’ब पूछ लो। लेकिन बैंकवाले मानने को तैयार नहीं। कहने लगे कि हम जानते हैं कि ऐसे सर्टिफिकेट कैसे बनते हैं। 

“बैंकवाले मेरी कोई बात सुनने को तैयार नहीं। और तो और, मेरी खेती के कागज भी देखने को तैयार नहीं। मैं कुछ भी कहूँ तो एक ही बात कहें - ‘इतनी बड़ी रकम यूँ ही दे दें?’ (ईश्वर ने लोन की रकम बताई तो मेरे भी हाथ-पाँव फूल गए। वह रकम मेरी तो सोच के भी बाहर थी। लोन की रकम और बैंक का नाम यहाँ जाहिर करने की इजाजत मेरा विवेक मुझे नहीं दे रहा।) जब मुझे लगा कि ये मुझे लोन नहीं देंगे और मुझे दूसरा बैंक देखना पड़ेगा तो मैंने कहा - ‘सिटी के बड़े-बड़े लोग मेरी और मेरे काम की बड़ाई करते हैं। मुझ पर लेख छापते हैं। और एक आप हो कि मुझ पर भरोसा ही नहीं करते!’

“मेरी बात बैंकवाले सा’ब को मजाक लगी। बोले - ‘अच्छा! अब तू इतना बड़ा आदमी हो गया कि तेरे पर लेख छपने लगे? जरा हम भी तो देखें कि किसने तेरा अभिनन्दन-पत्र छापा?’ मैंने कहा - ‘मुझे थोड़ा टाइम दो सा’ब! मैं घर से अखबार लाकर दिखाता हूँ।’

“मैं भाग कर घर आया। अखबार मैंने सम्हाल ही रखा था। निकाला और उल्टे पाँव बैंक पहुँचा और उनको अखबार पकड़ा दिया। उन्होंने अखबार देखा। उलटा-पलटा। सात बरस पुरान अखबार था बाबूजी! सा’ब ने आपका लेख पढ़ा। आपने तीन मिस्त्रियों के किस्से छापे थे। मेरा किस्सा सबसे पहला था। सा’ब ने ध्यान से पूरा लेख पढ़ा। फिर मेरी ओर देखा। उनकी तो नजरें ही बदल गई थी बाबूजी! खुश होकर बोले - ‘किसी मेकेनिक पर ऐसा लेख पहली बार देखा। जा! तेरा लोन पास किया।’ और बाबूजी! उन्होंने तो सच्ची में लोन पास कर दिया। एक झटके में। अब बताओ बाबूजी! आपके लेख से मेरा फायदा हुआ कि नहीं?”

ईश्वर जैसे-जैसे किस्सा सुनाता जा रहा था, वैसे-वैसे मेरी देह पर मानो चीटियों के रेंगने की गति बढ़ती जा रही थी। किस्से की वास्तविकता और बैंक अफसर के मन की बात ऊपरवाला ही जाने। मेरे सामने बैैठा धरतीवाला यह ईश्वर मुझे सचमुच में ऊपरवाला ईश्वर ही नजर आ रहा था। वह मेरे सामने, मेरी आँखों में आँखें डाल कर, मुझे ही सारी बात सुना रहा था और मैं बेभान, लगभग संज्ञा-शून्य बैठा था। वह कृतज्ञ और उपकृत भाव से मुझे देख रहा था। लेकिन मैं उसे नहीं देख पा रहा था। उसकी शकल धुँधलाती जा रही थी। मैं बोल नहीं पा रहा था। मुझे लग रहा था, मैं बुक्का फाड़कर रोने लगूँगा। मैं रोना नहीं चाहता था। कम से कम, उसके सामने तो नहीं ही। उसके सामने रोने में मुझे अपनी हेठी लग रही थी।

तनिक मुश्किल से मैंने खुद को संयत किया। याद आया, घर में बूँदी के लड्डू रखे हैं। मैंने डिब्बा उसके सामने बढ़ाया - ‘तेरी बात ने तबीयत खुश कर दी ईश्वर। ले! मुँह मीठा कर।’ उसने आज्ञाकारी भाव से लड्डू उठाया। तनिक संकोच से, लेकिन प्रमेपूर्वक खाया। मैंने उसे बिदा किया - ‘भगवान तुझ पर ऐसी ही कृपा बनाए रखे। लेकिन याद रखना! इसमें मेरा कुछ नहीं। यह तेरी मेहनत, तेरी ईमानदारी और मेरी भलमनसाहत का ही फल है। ऐसा ही बना रहना।’

विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर वह चला गया। मैं अन्दर आया। दरवाजा बन्द करते-करते मेरी रुलाई फूट पड़ी। उसे लगा, वह मेरी वजह से निहाल हो गया। लेकिन सच तो यह है कि वह साक्षात ईश्वर ही था जो मुझे निहाल कर गया।

मैं देर तक रोता रहा। रोना रुका तो विचार आने लगे। लगभग साठ-पैंसठ बरस से, अपने स्कूली दिनों से लिख रहा हूँ। दो-एक छुटपुट ऐसे प्रसंग आए थे जिनमें मेरे लिखने से कथा नायकों को सहायता मिली थी। लेकिन वह लापरवाही की उम्र थी। उन घटनाओं का नोटिस ही नहीं लिया। लेकिन इस घटना ने मुझे झकझोर दिया। 

मुझे लग रहा है, ईश्वर को लोन की पात्रता है, यह अनुभव तो बैंक अफसर को, ईश्वर के कागज देख कर, पहली ही नजर में हो गया होगा। लेकिन ईश्वर के रहन-सहन, उसके पास कोई सिफारिश न होना, उसकी अतिशय विनम्रता ने बैंक अफसर को आश्वस्त नहीं किया होगा। वह आँकड़ों से अलग और आगे बढ़कर ईश्वर की (लोन लौटाने की) विश्वसनीयता टटोल रहा होगा। मेरे लेख ने शायद उसे ईश्वर को भरोसेदार आदमी मानने की जमीन दे दी होगी। ईश्वर को लोन तो उसकी पात्रता और अधिकार के आधार पर ही मिला। लेकिन मेरे लिखे ने उसके लोन केस में वह उपलब्ध करा दिया जो कागजों में नहीं आ सकता था।

मैं प्रायः ही, ऐसी ‘छोटी-छोटी’ बातों को उठाता रहता हूँ। इसके पीछे मेरा यह सोच है कि जिसे हम ‘छोटी सी बात’ मान कर उपेक्षित कर देते हैं वह वस्तुतः छोटी नहीं होती। 

मुझे यह भी लगता है कि हमारे मन से प्रशंसा भाव तिरोहित होता जा रहा है। किसी की प्रशंसा करने में हमें अपनी हेठी लगती है। लगता है, हम छोटे हो जाएँगे। सम्भवतः इसी के चलते हम बुरी खबरों से घिर गए हैं। लगता है, दुनिया में अच्छाई, भलाई रही ही नहीं। जबकि ऐसा नहीं है।

धरतीवाले इस ईश्वर ने मेरे इसी सोच को ताकत दी। हम किसी के लिए सहायक हो जाएँ, यही बहुत बड़ी बात है। और यदि किसी के लिए उपयोगी हो जाएँ तो क्षणांश को ही सही, जीवन सफल और धन्य लगता है। मैं जीवन की इसी, क्षणांश की सफलता और धन्यता से खुश हूँ। 

धरतीवाले इस ईश्वर का काम तो होना ही था। मेरा लिखना तो बहुत ही छोटा निमित्त बना। ऊपरवाले ईश्वर ने मुझे यह निमित्त बना कर मुझ पर केवल कृपा ही नहीं की, सम्भवतः अपनी इच्छा भी जताई - ऐसा ही लिखते रहो।

मुझे यह इच्छा-पालन करना ही है।
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