पहली बार सुना ऐसा इंकार

‘हलो!’

‘हलो।’

‘प्रियम्वदजी बोल रहे हैं?’

‘जी हाँ! मैं प्रियम्वद बोल रहा हूँ।’

‘नमस्कार प्रियम्वदजी। मैं रतलाम से विष्णु बैरागी बोल रहा हूँ।’

‘ओह! विष्णुजी! नमस्कार! नमस्कार!! कहिए!

‘आप मुझे अकार 46 की कितनी प्रतियाँ उपलब्ध करा सकते हैं?’

‘आप कहें उतनी। लेकिन आपको क्यों चाहिए?’

‘अपने कुछ मित्रों को भेंट देने के लिए। दरअसल इस अंक में अटल तिवारी का लेख मुझे बहुत अच्छा लगा। मैं उसे, पत्रकारिता से जुड़े अपने कुछ मित्रों को पढ़वाना चाहता हूँ।’

‘माफ करें विष्णुजी। अकार मुफ्त वितरण के लिए नहीं है।’

‘मुफ्त नहीं। प्रतियों का मूल्य मैं चुकाऊँगा।’

‘जी। आप चुकाएँगे। वे नहीं, जिन तक यह पहुँचेगा। आप जिसे भी भेजना चाहते हैं, उन्हें अकार का अता-पता दे दीजिए। लेख के बारे में उन्हें बता कर अकार की सिफारिश कर दीजिए और अंक का मूल्य भेजने के लिए कह दीजिए। हम डाक खर्च लिए बिना उन्हें अंक उन्हें भेज देंगे।’

‘भुगतान वे करें या मैं करूँ, आपको क्या फर्क पड़ता है? आपको तो आपके पैसे मिल रहे हैं!’

‘जी। हमें तो हमारे पैसे मिल रहे हैं लेकिन आप उन्हें जबरिया पढ़ा रहे हैं, वह भी मुफ्त में। हम इसके खिलाफ हैं।’

‘मुझे थोड़ी अजीब लग रही है आपकी बात।’

‘सही कहा आपने। अजीब लग ही रही होगी क्योंकि ऐसी बात सामान्यतः कोई सम्पादक-प्रकाशक नहीं करता। आप जिसे भी अकार का यह अंक भेजना चाह रहे हैं वे कितने भी गरीब हों लेकिन इतने भी नहीं कि पचास रुपये भी खर्च न कर सकें। हमारे (हिन्दीवाले) लोग, घर से निकल कर, दुकान पर जाकर, दो हजार का जूता खरीद लेते हैं लेकिन हिन्दी की किसी किताब या पत्रिका के लिए घर से निकल कर पोस्ट ऑफिस/बैंक जाकर पचास रुपये चुकाने को तैयार नहीं। हम इस मानसिकता से न तो सहमत हैं न ही इसे बढ़ावा देते हैं।’

‘..............’

‘हलो! विष्णुजी! सुन रहे हैं?’

‘जी। सुन रहा हूँ।’

‘पता नहीं आपने ध्यान दिया या नहीं, अकार बिना विज्ञापन के छप रहा है। आसान नहीं है ऐसा करना। हम करने की कोशिश में लगे हुए हैं। हम इसे लेखकों, पाठकों का प्रकाशन बनाना चाहते हैं। हम तो इसे इनका को-आपरेटिव बनाना चाहते हैं। उनका सहकारी स्वामित्व चाहते हैं। अकार के प्रत्येक अंक में अकार के बैंक खाते के ब्यौरे दिए रहते हैं। हमें सहयोग राशि भी चाहिए और कीमत चुका कर पढ़नेवाले भी। इसलिए विष्णुजी! क्षमा करें! इस अंक की प्रतियाँ तो हैं  किन्तु आपको नहीं भेजेंगे।’

‘ठीक है।’

यह ‘ठीक है।’ कहते समय मेरी आवाज में रंच मात्र भी निराशा या गुस्सा नहीं था। ताजगी अनुभव की मैंने अपनी आवाज में। जब से सूझ-समझ (अब, वह जैसी भी है) आई है तब से पहली बार ऐसा इंकार सुना। यह इंकार, हिन्दी के आकाश में गूँजे, गरजे। इस इंकार को समूचा हिन्दी समुदाय बाहुपाश में ले। इस तरह कि छूट न पाए। वहीं कैद रह जाए ताकि फिर किसी प्रियम्वद को ऐसा इंकार उच्चारित करने का अवसर नहीं मिले। जितने लिखने, छपनेवाले हों उसके सौ-हजार गुना खरीद कर पढ़नेवाले हों।

‘अकार’ के सम्पर्क ब्यौरे - अकार प्रकाशन,           
15/269, सिविल लाइंस, कानपुर-208001. 
ई-मेल:akarprakashan@gmail.com 
फोन - 0512 2305561, मोबा. नम्बर - 098392 15236  
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(जिन मित्रों को अकार का यह अंक भेजना चाह रहा था, उन सबको अब इस ब्लॉग पोस्ट की लिंक भेज रहा हूँ।)

5 comments:

  1. अनमोल और अनुपम
    ह्रदय से स्वागत

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    1. धन्‍यवाद रमाकान्‍तजी।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-05-2017) को
    "मुद्दा तीन तलाक का, बना नाक का बाल" (चर्चा अंक-2634)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. मुझे विस्‍तारित करने के लिए बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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  3. बहुत अच्छा और सच्चा लगा ये इनकार

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.