हाँ! सर! मैंने भी दिल खो दिया

यह तीस जून 2018 की शाम है। शाम के 6 बजनेवाले हैं। सुबह के अखबार अभी-अभी देखे और जी धक् से रह गया। उपाध्याय सर के उठावने का विज्ञापन नजर आया। उपाध्याय सर के उठावने की रस्म हुए एक घण्टा होने को आ रहा है। आजकल अखबार देखने को जी ही नहीं करता। इसीलिए अखबार अब देखे। सुबह ही देख लेता तो उतना दुःख तो नहीं ही होता जितना इस समय हो रहा है। कम से कम उठावने में तो शरीक हो जाता।

उपाध्याय सर याने श्री श्यामसुन्दरजी उपाध्याय। हम इन्हें इस नाम से नहीं जानते थे। हमारे लिए वे प्रोफेसर एस. आर. उपाध्याय थे। मूलतः देवास जिले के गाँव सतवास के रहनेवाले थे। इन्हें पहली बार 1965 में देखा था। रामपुरा कॉलेज में। वे वहाँ बॉटनी के प्रोफेसर थे। मैं बी. ए. का विद्यार्थी था। विषय और संकाय के लिहाज से मेरा, इनका कोई नाता नहीं था। लेकिन रामपुरा कॉलेज बहुत छोटा कॉलेज था। इस स्नातकोत्तर कॉलेज की, तीनों संकायों की छात्र संख्या ढाई सौ के आसपास थी। इससे अधिक छात्र संख्या तो, इन्दौर के किसी कॉलेज के एक विषय के, सभी सेक्शनों के पहले वर्ष के छात्रों की हो जाती होगी। इतनी कम छात्र संख्या की वजह से प्रत्येक प्रोफेसर, लगभग प्रत्येक विद्यार्थी को नाम से जानता-पहचानता था। लेकिन उपाध्यायजी से मेरे परिचय का यही एक कारण नहीं था।

उपाध्यायजी थे तो बॉटनी के प्रोफेसर लेकिन नाटक में उनकी भरपूर रुचि थी। गणित विभाग में थे प्रोफेसर जे. सी. मिश्रा। एकदम गंजे। बोलते बहुत कम थे लेकिन मोटे चश्मे से झाँकती उनकी बड़ी-बड़ी आँखें मानो हरदम बतियाती रहती थीं। वे भी नाटक-संगीत में खूब रुचि रखते थे। गाते भी बहुत अच्छा थे। आँखें मूँदकर, अपने आप में डूब कर वे जब सी. एच. आत्मा का गाया गीत ‘प्रीतम आन मिलो’ गाते थे तो लगता था साक्षात महादेव शान्त रस का पाठ कर रहे हों। मिश्राजी राजेन्द्रनगर (इन्दौर) में रहते थे। गए दिनों उनका भी निधन हो गया।

मुझे भी नाटकों और संगीत में रुचि थी। कॉलेज के वार्षिकोत्सव का भार मिश्राजी और उपाध्याय सर के जिम्मे रहता था। इसी कारण इनसे सम्पर्क बना और ऐसा बना कि उपाध्याय सर का घर मेरी सराय बन गया। मैं जब अपने छात्रावास में नहीं होता था तो फिर केवल उपाध्याय सर के यहीं होता था। मेरे घरवालों की तरह वे भी मुझे 'बब्‍बू' ही पुकारने लगे।

उपाध्याय सर से घरोपा इतना बढ़ा कि मेरी भाभीजी एक बार जब रामपुरा आईं तो उपाध्याय सर के यहीं रुकीं। एक बार उपाध्याय सर और ओम ठाकुर सर मेरे घर मनासा आए थे और रात रुके थे। ठाकुर सा’ब हमें हिन्दी पढ़ाते थे। वे मूलतः हैं तो सैलाना के लेकिन इन्दौर में (सुदामा नगर में) ही बस गए हैं। इन्दौर में उनकी गिनती हिन्दी साहित्यकारों की पहली पंक्ति में होती है। अभी 26 जून की शाम, श्री म. भा. हिन्दी साहित्य समिति द्वारा दादा श्री बालकवि बैरागी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में धर्मेन्द्र रावल के साथ ठाकुर सा’ब से भेंट हुई थी तो हम तीनों देर तक उपाध्याय सर की बातें करते रहे थे।

बॉटनी के प्रोफेसर और बी ए के विद्यार्थी का रिश्ता ऐसा रहा कि उपाध्याय सर की छोटी बहन कृष्णा के विवाह में शामिल होने के लिए मैं सतवास गया था। मैं अकेला नहीं था। जमनालाल (राठौर) के साथ गया था। जमनालाल और मैं कॉलेज में ‘जुगल-जोड़ी’ के रूप में पहचाने जाते थे।

उपाध्याय सर केवल मेरे ही नहीं, मुझ जैसे कुछ ‘बागड़बिल्लों’ के संरक्षक और पथप्रदर्शक थे। वे हमसे परेशान भी खूब रहते थे और हमें चाहते भी उतना ही थे। घरोपे के घनत्व का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वे जब हमे डाँटते तो मनोरमा भाभी हमें, सचमुच में अपने पीछे, अपनी ओट में लेकर, हमारा बचाव करते हुए उपाध्याय सर से झगड़ लिया करती थीं। उपाध्याय सर मन मसोस कर रह जाते और हम खुश होकर भाभी की चापलूसी में लग जाते। वे मखमली मिजाज के, बेहद सम्‍वेदनशील व्‍यक्ति थे।

एक बार कुछ लड़कों ने उपाध्याय सर के साथ बदतमीजी कर दी। वे मर्माहत हुए। कई दिनों तक दुखी रहे। इतने कि घोषणा कर दी - ‘मैं पप्पू को गुण्डा बनाऊँगा। वह एक-एक को निपटेगा।’ पप्पू उनका बेटा था-चार बहनों (अर्पिता, अर्चना, वन्‍दना और मंगला) का इकलौता भाई। बड़ा होकर पप्पू गुण्डा नहीं, कामयाब दन्त चिकित्सक बना। उसे डॉक्टर राघवेन्द्र उपाध्याय के नाम से पहचाना गया। इन्दौर में, टोरी कार्नर पर उसकी क्लीनिक थी। सर की चार बेटियों में से मुझे इस समय केवल उनकी बड़ी बेटी अर्पिता की याद है। वह हम सबकी ‘गुड्डी’ थी। बड़ी शान्त चित्त बच्ची थी वह। 

मुझे यह देख-देखकर मर्मान्तक दुःख और आश्चर्य होता रहा कि ईश्वर ने उपाध्याय सर जैसे सन्त, सात्विक, निष्कलुष, निश्छल, सर्वथा अहानिकारक आदमी को किस बात की, इतनी सजाएँ दीं? पहले तो उनसे हमारी भाभीजी को छीन लिया और फिर इकलौते बेटे राघवेन्द्र को। राघवेन्द्र का निधन इतना आकस्मिक, इस तरह हुआ कि जब मुझे खबर लगी तो लगा, मुझसे क्रूर मजाक किया जा रहा है। राघवेन्द्र उज्जैन में अपनी छोटी बहन का विवाह संस्कार निपटा कर लौटा ही था कि शायद एक सप्ताह के आसपास ही हृदयाघात से उसका अवसान हो गया। सर ने उसकी मृत्यु की खबर देनेवाला अन्तर्देशीय पत्र भेजा था तो देखकर, खोलने से पहले मुझे लगा था कि यह उज्जैन में, शादी में शामिल होने के लिए आभार-पत्र होगा। लेकिन मेरा दुर्भाग्य था कि वह पप्पू के निधन की सूचना थी।

पता नहीं ईश्वर उनसे इतना नाराज, कुपित क्यों रहा होगा? पप्पू के अवसान से पहले उपाध्याय सर अपनी ‘एक और सन्तान’ की जवान-मृत्यु का आघात झेल चुके थे। चूँकि इस ‘जवान मृत्यु’ की सूचना किसी को नहीं दी गई थी इसलिए इसकी आघात की जानकारी बहुत ही कम लोगों को रही होगी। 

यह 1965 से 1968 के कालखण्ड की ही बात है। उपाध्याय सर बताते रहते थे कि उनकी, बॉटनी की एक किताब आनेवाली है। उसके प्रूफ उनके पास डाक से आया करते थे। किताब इन्दौर में छप रही थी। उनका कोई जूनीयर साथी उस किताब का काम देख रहा था। कुछ महीनों बाद उन्होंने खुशी से चहकते-महकते खबर दी थी - ‘बब्बू! किताब छप गई है। कॉपी डाक से आ रही है।’ लेकिन डाक से कॉपी आई तो उपाध्याय सर की सारी खुशी हवा में उड़ गई। उनके उस जूनीयर साथी ने, उपाध्याय सर के साथ अपना नाम भी लेखक के रूप में दे दिया था। किताब देख कर उपाध्याय सर मुरझा गए थे। उस दिन कॉलेज नहीं जा पाए। उसके बाद हफ्तों तक अनमने रहे। पता नहीं, भाभी ने किस तरह उनकी उदासी हटाई।

उपाध्याय सर से मेरी अन्तिम मुलाकात 13 जनवरी 2017
को हुई थी। सुनील (बिरथरे) उनके बारे में मुझे बराबर खबर दिया करता था। उस दिन की मुलाकात का श्रेय भी सुनील को ही है। कनाड़िया रोड़ से आईपीएस एकेडमी के फार्मेसी विभाग तक की यात्रा मैंने एक स्कूटी से की थी। मैंने जब उनके पाँव छुए थे तो बहुत खुश भी हुए थे और विगलित भी। मेरे जाते ही मुझसे बात नहीं कर पाए थे। एक-डेड़ मिनिट बाद ही बोल पाए थे।

हम दोनों बड़ी देर तक रामपुरा को जीते रहे थे। आज के लोक-व्यवहार में आई कृत्रिमता (सिथेटिकनेस) से आहत थे। बड़ी पीड़ा से उन्होंने कहा था - ‘बब्बू! हमने दिमाग तो खूब पा लिए लेकिन दिल खो दिए।’ मैंने उस दिन उनके और सुनील के कुछ फोटू लिए थे। कहा था - ‘अपने ब्लॉग पर डालूँगा।’ लेकिन उपाध्याय सर वाला ब्लॉग लिखना हर बार टलता गया।

मैं जब भी इन्दौर पहुँचता हूँ तो इन्दौरी मित्रों के लिए बनाई गई ब्राडकास्ट लिस्ट पर खबर करता हूँ। 13 जनवरी 2017 के बाद मैंने जब-जब अपने इन्दौर पहुँचने की खबर की, तब-तब हर बार सुनील नाराज हुआ और उलाहना दिया - ‘अपनी इन्दौर यात्रा में आप अपने बुजुर्गों के लिए समय रखते हैं या नहीं?’ उसका इशारा उपाध्याय सर के लिए होता। मैं हँस कर रह जाता। सुनील को कैसे कहूँ कि मैं भी सत्तर पार कर चुका हूँ। बुजुर्ग की श्रेणी में आ गया हूँ। स्कूटर/स्कूटी पर इतनी लम्बी यात्रा करने में मुझे असुविधा होती है। लेकिन उपाध्याय सर की चिन्ता करते हुए सुनील मेरी इन हकीकतों की अनदेखी कर जाता।

आज जब उपाध्याय सर के उठावने का विज्ञापन देखा तो एक अपराध बोध मन में उभर आया। जो ब्लॉग जनवरी 2017 में, सर से मिलने के बाद आते ही लिख दिया जाना चाहिए था, वह आज लिख रहा हूँ। वह भी इसलिए कि अभी ही मुझे उपाध्याय सर के निधन की जानकारी हुई है। 

ब्लॉग तो लिखना ही था। लेकिन 2017 में लिख लेता तो उपाध्याय सर देख कर, पढ़ कर कितना खुश होते? इस खुशी से उनके चेहरे पर कितना उजास हो आता? उस उजास से मैं खुद कितना खुश होता? लेकिन अपनी यह खुशी तो मैंने ही खुद से छीन ली।

आपने सच कहा था सर! और लोगों की तरह आपके बब्बू नेे भी दिमाग पा लिया। दिल खो दिया।
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एक था कमाल कवि

दादा श्री बालकवि बैरागी को याद करते हुए, श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समित, इन्दौर ने 26 जून 2018 मंगलवार को, दादा पर केन्द्रित  दो आयोजन किए। पहले आयोजन में डॉ. श्री सरोज कुमार, श्री वेद प्रतापजी वैदिक और श्री सत्यनारायणजी सत्तन ने दादा से जुड़े अपने संस्मरण सुनाए। दूसरा आयोजन कवि सम्मेलन था जिसमें श्री सुरेन्द्र शर्मा, श्री सुल्तान मामा, श्री माणिक वर्मा, श्री मोहन सोनी, श्री सरोज कुमार, श्री सत्य नारायण सत्तन सहित कुल ग्यारह कवियों ने काव्य पाठ किया और दादा के संस्मरण सुनाए। यहाँ उल्लेखित सारे कवि वे हैं जिन्होंने दादा के साथ अनगिनत बार कवि सम्मेलन के मंच साझा किए।

दादा पर लिखी सरोज भाई की कविता खूब पसन्द की गई। यह कविता उन्होंने दो दिन पहले इन्दौर लेखक संघ की गोष्ठी में भी सुनाई थी जिस पर कवि श्री राजकुमार कुम्भज की टिप्पणी थी कि यह कविता स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम में शरीक करने योग्य है। 

28 जून को हम पति-पत्नी सरोज भाई से मिलने गए और उनकी वह कविता माँग कर लाए। वह कविता यहाँ प्रस्तुत है। कविता के पन्ने थामे, सरोज भाई ने दादा से जुड़ी खूब सारी बातें की। यहाँ दिया गया उनका चित्र उन्हीं क्षणों का है।

एक था कमाल कवि

एक था कमाल कवि,
नाम था बालकवि।
मूल नाम नन्दराम,
था मनासा मुकाम।

गरीबी में पला था,
कोयल सा गाता था।
गली-गली गाता था,
भीख माँग, खाता था।

माँ साथ होती थी,
किस्मत को रोती थी।
पिता स्वयम् तंग थे,
जन्म से अपंग थे।

गा-गा कर बडा हुआ,
पाँव पर खड़ा हुआ।
पढ़ने भी जाने लगा,
मंचों पर गाने लगा।

देश तब गुलाम था,
हो रहा संग्राम था।
गाँधी का जमाना था,
ये भी तो दीवाना था।

राजनीति भा गई,
कंग्रेसी हो गया।
और प्रजा-मण्डल के,
सपनों में खो गया।

गिरिवरसिंह भँवर और,
तोमर¹ को गुरु माना।
उनसे ही सीखा,
लिखना, लिखते जाना।

वह चुनाव भी लड़ा,
नेता बन गया बड़ा।
नेहले पर देहला था,
लेकिन कवि पहले था।

सदन में विधायक था,
बाहर कवि-गायक था।
स्वाभिमान का प्रतीक,
पारदर्शिता सटीक।

मन्त्री पद पाकर वह,
हवा में नहीं डोला,
अपनी निष्ठाओं की,
बोली वह नहीं बोला।

शून्य से उठा,
और शिखर चूमता रहा।
काजल के गलियारे,
बेदाग घूमता रहा।

कवियों में नेता था,
नेताओं में कवि था।
सर्वप्रिय, अजातशत्रु,
सज्जनता की छवि था।

मधुर, मालवी सपूत,
हिन्दी का उन्नायक।
चारण वह संस्कृति का,
जन-गण-मन का गायक।

कविताई पहले थी, 
नेताई बाद में।
वोटों से अधिक मजा,
आता था दाद में।

कविता ओजस्विनी,
कविता श्रंगार की।
कविता समझाइश की,
कविता ललकार की।

कविता में भाषण भी,
भाषण में कविता।
आत्मलीन, शान्त चित्त,
सारा जीवन कविता।

कहानियाँ गजब लिखीं,
हुआ नहीं आकलन।
कविताई सर्वव्याप्त,
संकल-दर-संकलन।

गद्य लिखा, पद्य लिखा,
भर दिए रजिस्टर।
लिख डाली आत्म-कथा,
‘मंगते से मिनिस्टर’।

लेकिन वह छपी नहीं,
मिला नहीं पब्लीशर²
लोग पढ़ नहीं पाए,
पढ़ी गई घर ही घर।

अब कोई भी छपवा दे,
एक काम हो जाए।
यह न हो कि वह लेखन,
रद्दी में खो जाए।

दोस्ती निभाता था,
यारों का यार था।
इस पल पुकारा,
उस पल तैयार था।

भाभी के जाने पर,
तनहाई, सन्नाटा।
एकाकी जीवन,
जैसे-तैसे काटा।

मृत्यु मिली भव्य, दिव्य,
सोता-सोता गया।
जिसने भी सुना,
चकित, रोता-रोता गया।

मंचों पर बालकवि,
टी. वी. पर बालकवि।
संसद में बालकवि,
सड़क पर बालकवि।

बालकवि!

बालकवि!!

चला गया बालकवि,
किस्से ही किस्से हैं।
किस्सों की सम्पत्ति में,
हम सबके हिस्से हैं।

मैं उसका मित्र रहा,
मुझे बहुत गर्व है।
बालकवि की चर्चा,
स्मृतियों का पर्व है।
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सरोज भाई का पता - 
मनोरम, 37 पत्रकार कॉलोनी, इन्दौर-452018
                        फोन - (0731) 2561919  मोबा. - 94066 22290

1 - स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी श्री नरेन्द्र सिंह तोमर, ग्राम पिवड़ाय (जिला-इन्दौर) जो स्वतन्त्रता संग्राम के दिनों में इकतारे पर गीत गा-गा कर लोक चेतना जाग्रत करते थे।

2 - इस किताब को छापने के लिए कम से कम तीन प्रकाशकों ने अपनी ओर से दादा से सम्पर्क किया था। लेकिन कानूनी दृष्टि से वे किताब के कुछ अंशों से असहमत थे। उन्होंने दादा से उन अंशों को विलोपित करने का आग्रह किया जिसे दादा ने स्वीकार नहीं किया। इसलिए, किताब को प्रकाशक तो मिले लेकिन उसे अविकल रूप से छापनेवाले प्रकाशक नहीं मिले।

काम याने काम, छुट्टी याने छुट्टी


बर्लिन से बब्‍बू को
पहला पत्र - पाँचवाँ हिस्सा

बड़े बालों का फैशन यहाँ भी आया था। तब एक नियम बनाया गया - चाहे जितने बड़े बाल रखो पर उन्हें साफ रखो और उनके कारण काम में बाधा नहीं पड़नी चाहिए। बस! बाल एक ही झटके में कट गए। गर्दन तक आ गये। सारे रोस्टोक में एक अकेले हमारे साथी श्री गुप्ता ही बेलबाटम पहने घूम रहे थे। यहाँ पतलून न चुस्त है न ढीला। बिल्कुल करीने से है। पुरुष भी भरपूर कद्दावर कद वाले हैं पर खुले बटन और नंगी छातियों का प्रदर्शन नहीं करते। उनके कुरतों के बटन सलीके से बन्द होते हैं।

दवाई की दुकानें यहाँ बाजार और गलियों में नहीं हैं कि चाहे जहाँ से, चाहे जो, चाहे जैसी दवाई खरीद ले। डॉक्टर हर एक के लिए पूरी मुस्तैदी से तैयार बैठा है। पश्चिम से एल. एस. डी. और मादक दवाइयों का रोग यहाँ नहीं आया। ऐसी दवाईयों का सेवन करने वाला सीधा सख्त कैद पाता है। शराब पीने पर प्रतिबन्ध नहीं है, पर पी कर बेवकूफी करने पर तत्काल जेल दे दी जाती है।

परिवार और पारिवारिक खर्च
बच्चे पैदा करने पर कोई रोक नहीं है। कम आबादी की यहाँ समस्या है। पर दो बच्चों से अधिक के माँ-बाप स्वयं ही लज्जा महसूस करते हैं। यदि 5 बच्चों से अधिक का परिवार हो तो मकान किराये में सरकार सबसीडी देती है। परिवार का हर सदस्य कमाता है। 450 मार्क याने भारतीय 1800 रुपयों से कम किसी की तनख्वाह नहीं है। किन्तु ऊपर वालों की तनख्वाह 2600 मार्क अर्थात 10400 भारतीय रुपयों तक है। तनख्वाहों में दुगुना और तिगुना तक फर्क है। शनिवार और रविवार को शहर और सड़कें इस तरह सुनसान मिलेंगी मानो कर्फ्यू लग गया हो। सब छुट्टियाँ मनाने कहीं न कहीं चले जाएँगे। पर सोमवार से शुक्रवार तक सारा देश तन तोड़ मेहनत करता है। 

कपड़ा बहुत मँहगा है। ओव्हरकोट भारतीय 1000 रुपये तक, मौजे 80 रुपये तक, टाई भारतीय 300 रुपये तक और पूरा सूट भारतीय 3000 रुपये तक पड़ता है। रेडियो, टीवी और कैमरे भी खूब मँहगे हैं। सामान्य कलम तक मँहगा है। सब्जियाँ और फल सस्ते हैं। 

रोटी नहीं खाई जाती। डबल रोटी और मांस डटकर खाया जाता है। एक ही जहाज हमें दिखाया गया जो प्रतिदिन भारतीय 20 लाख रुपयों की मछलियाँ पकड़ता है। बहुत बड़ा जहाज था। 6 करोड़ रुपये प्रतिमाह मूल्य की मछली एक ही जहाज पकड़ता है। ऐसे 72 जहाज अकेले रोस्तोक काउन्टी (प्रान्त) के पास हैं। हर कारखाने में शानदार केण्टीनें। हिन्द महासागर के सिवाय बाकी सब समुद्रों में रोस्तोक के जहाज मछली का शिकार करते हैं।

बिना सोवियत संघ के इस देश का काम एक दिन भी नहीं चल सकता है। इस बात को यह देश स्वीकार करता है। किसी भी विदेशी पर कोई नजर भीतर घूमने पर रखी जाने का कोई उदाहरण नहीं मिला। हम लोग बेरोकटोक हमारी मर्जी से भी खूब घूमते हैं- अकेले ही। हर तरह के प्रश्न उत्तरित होते हैं। कोई पुलिस दिखाई नहीं देती। हाँ, सोवियत सैनिक और ऑफिसर अवश्य दिखाई दे जाते हैं।


...तो फिर तो दूल्हा भिखारी हुआ?


‘आप जैसे हो वैसे के वैसे चले आइए। फौरन। मैंने अभी-अभी दादा का वो व्यवहार का पंचशील वाला ब्लॉग पढ़ा है। मेरे पास भी आपको सुनाने के लिए वैसी ही जोरदार बात है। दादा की ही। आप चले आओ। मैं आपही राह देख रहा हूँ।’ उधर से सुभाष भाई बोल रहे थे। उन्होंने मेरे लिए बोलने को कुछ रखा ही नहीं। सब कुछ तय कर चुके थे। मुझे जाना ही था।




सुभाष भाई रतलाम के, गिनती के उन लोगों में हैं जिन्हें मैं अपना संरक्षक मानता हूँ। उनकी कई बातों से मैं दुःखी होने की सीमा तक असहमत हूँ और वे भी मुझसे इतने ही दुःखी हैं। हम लोग आपस में खूब बहस, तर्क-वितर्क करते हैं। बात-बात पर असहमत होते हैं। और हर बार ‘तो तय रहा कि अपन असहमत हैं।’ वाले निष्कर्ष के साथ विदा लेते हैं। मैं पहुँचा तो देखा, वे और मंजुला भाभी कहीं बाहर जाने के लिए तैयार बैठे हैं। केवल मेरी प्रतीक्षा में रुके हुए हैं। 

आज उन्होंने कोई मनुहार नहीं की। अन्यथा, उनकी मनुहार ‘प्राणलेवा’ होती है। कभी किसी काम से उनके मोहल्ले में जाता हूँ तब, और कभी-कभी, बिना किसी बात, बिना किसी काम के उनसे मिलने का जी करता है तो मन को डाँट-फटकार कर रोक लेता हूँ। अब तक समझ नहीं पाया कि मेरे लिए अधिक कठिन क्या है - उनकी मनुहार को नकारना या उनकी मनुहार (न तो आवश्यकता हो और न ही पेट अनुमति दे रहा हो तब भी) मान लेना? मैं अनगिनत बार कह चुका हूँ - ‘आपकी, खाने-पीने की मनुहार से मुझे बहुत ही तकलीफ होती है। मत किया कीजिए।’ वे अनिच्छापूर्वक हाँ तो भर लेते हैं लेकिन अगली ही बार अपनी हाँ भूल जाते हैं। लेकिन आज मेरे मन की हो गई। उनके, कहीं और जाने की जल्दी ने मनुहार को सर ही नहीं उठाने दिया। 

मैं कुछ पूछूँ उससे पहले खुद ही बोले - “आपके छोटे बेटे तथागत की शादी में दादा से खूब सारी बातें करने मौका मिला। कोई घण्टा-सवा घण्टा उनके पास बैठा। वो तो अपनी ओर से नहीं बोले। लेकिन मेरी बातों के जवाब में बहुत बातें कहीं। उन्हीं मे से एक बात वह है जो उनके पंचशील के बराबर है। उसीके लिए आपको बुलाया।

“शादी की परम्पराओं की बात करते-करते ‘कन्यादान’ की बात आ गई। उनके चेहरे से लगा कि यह शब्द सुनकर ही उन्हें गुस्सा आ गया। तीखे तो नहीं बोले लेकिन नाराजी उनकी आवाज से साफ लग रही थी। बोले - “यह शब्द किसी गाली से कम नहीं है। यह शब्द हमारी, हँसती-खिलखिलाती बेटियों को निर्जीव वस्तु बनाकर रख देता है। यह शब्द हम पिताओं को, सारे पुरुषों को निर्दयी, निर्मम और क्रूर बना देता है। अरे! बेटी भी भला दान की जा सकती है? एक ओर तो हम बेटी को ‘पेट की आँत’ कहते हैं और दूसरी ओर ‘कन्यादान’ की बात करते हैं। हम कभी अपने पेट की आँत को किसी को दान में देते हैं?”

“दादा का गुस्सा साफ नजर आ रहा था। उनसे क्या कहता? क्या जवाब देता? चुपचाप उनका मुँह देखता रहा। वो आगे बोले - ‘कुछ भी बोलने से पहले हम सोचते भी नहीं। अरे! अगर लड़की को दान दे रहे हो वो जो घोड़ी पर बैठा तुम्हारे दरवाजे पर खड़ा है वो भिखारी है? वो क्या दान लेने के लिए मँगते की तरह तुम्हारे दरवाजे पर खड़ा है? जब हम अपनी बेटी का हाथ किसी के हाथ में देते हैं तो कहते हैं कि हमने बेटी देकर बेटा लिया। लेकिन यहाँ तो हमने बेटी देकर भिखारी, मँगता ले लिया! क्या हम किसी भिखारी को अपनी बेटी सौंप रहे हैं?’

सुभाष भाई बोले - “दादा की बात मुझे सौ टंच सही लगी। मैंने भी बेटी ब्याही है। मैंने भी कन्यादान किया है। लेकिन तब तो ऐसी कोई बात मेरे दिमाग में आई ही नहीं। आती भी कैसे? दादा से मुलाकात और यह बात तो अब हुई। बेटी के ब्याह के दो बरस बाद। यदि पहले दादा से यह सुन लेता तो कह नहीं सकता कि तब क्या करता लेकिन उस समय यह बात कानों में बराबर गूँजती रहती। 

“हम सब ठोक-बजाकर, सारा आगा-पीछा देखकर बेटी का रिश्ता तय करते हैं। बेटी को दान में तो नहीं देते। दान देने के बाद तो उस वस्तु पर हमारा न तो कोई हक रह जाता है न ही उससे हमारा कोई नाता-रिश्ता। लेकिन बेटी से हमारा नाता-रिश्ता जिन्दगी भर बना रहता है। उस पर हमारा हक भी बना रहता है और ब्याह के बाद वह हमारी जिम्मेदारी भी बनी रहती है। हम देख रहे हैं कि दुःख में बेटियाँ दौड़-दौड़ कर आती हैं और माँ बन कर अपने माँ-बाप की सेवा करती हैं। इसलिए दादा की यह बात तो सही है कि  बेटी को ब्याहते समय कन्यादान वाली बात पर हम सबको फिर से सोचना चाहिए। जमाना बदल रहा है। बदल गया है।  बेटियाँ भी अब अपना भला-बुरा खुद सोच रही हैं। अपने फैसले खुद ही ले रही हैं। उन्हें इस काबिल हम ही बनाते हैं। ऐसे में कन्यादान की बात अब सच्ची में गले नहीं उतरती।”

मेरे पास तो कहने के लिए कुछ था ही नहीं। वैसे भी मैं सुनने के लिए ही आया था। चुपचाप सुन लिया - सुभाष भाई से (और दादा से भी) सहमत होते हुए। 

सुभाष भाई के यहाँ से जब भी लौटता हूँ तो, भले ही उनका घर हो या दफ्तर, एक झटके में उठ कर नहीं आ पाता। दरवाजे पर दो-एक मिनिट रुक कर, बात कर ही लौट पाता हूँ। लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ। मैं उठता, उससे पहले वे और मंजुला भाभी उठ खड़े हुए। आज मुझसे पहले उन्हें जाना था। आज पहले वे निकले। उनके पीछे-पीछे मैं।

सुभाष भाई से मिली दादा की यह बात दादा का चिह्नित किया एक और शील है। मुझे लग रहा है कि दादा के ऐसे कुछ और शील मुझे मिलेंगे। सुभाष भाई जैसे ही अन्य श्रोताओं से।
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महिलाएँ: पूर्वी जर्मनी की और भारत की


'बर्लिन से बब्‍बू को'- पहला पत्र - चौथा हिस्सा

यूरोप शब्द से ही हमारे यहाँ स्वच्छन्द सेक्स का अर्थ लिया जाता है। पर इस देश में इतना घूमने के बाद अभी तक हम लोगों ने एक भी महिला शराब में धुत्त या अर्ध नग्न नहीं देखी। खुले गले या खुली पीठ के कपड़े नहीं देखे। सड़कों पर लिपटे-चिपटे जोड़े या युगल नहीं नजर आते। कहीं कोई चूमा चाटी का दृश्य नहीं दिखाई पड़ा। महिलाएँ इस देश में 56 या 58 प्रतिशत हैं। पुरुषों का प्रतिशत कम है। यह युद्ध का अभिशाप है। पर नारी के प्रति पर्याप्त आदर इस समाज में है। किसी भी महिला को गहनों से लदी-फँदी नहीं देखी। एकाध अँगूठी किसी की ऊँगली में है तो अच्छा, नहीं तो नहीं। नाक, कान, हाथ, गले पहुँची, टखने सब बिना गहनों के। पत्थरों या बारीक मोतियों की या फिर ऊलजलूल धातुओं या डोरों की मालाएँ इधर की कम उम्र की लड़कियाँ पहन लेती हैं। पर वे भी नहीं के बराबर। पुरुष कोई गहना नहीं पहनते। जीवन के हर क्षेत्र में नारी आगे है। ट्राम चलाना, बस चलाना, हवाई अड्डा, फैक्ट्री, स्कूल, होटल, घर, जहाज, खेत सब कुछ नारी पूरी दबंगता से सम्हालती है। स्कूलों में उनका साम्राज्य है। खुलकर सिगरेट पीना और भोजन के समय शराब और बीयर पीना उनके लिये सामान्य बात है। खूब ठठाकर हँसना, विनोद करना और जीवन को पूरी जिम्मेदारी और उमंग से जीना यहाँ की जीवन पद्धति है। समाजवाद से आगे बढ़कर अब यह देश साम्यवाद की ओर चल पड़ा है।

पूरे देश में निरक्षरता का कोई दाग नहीं है। हर व्यक्ति पढ़ा लिखा है। पढ़ाई पूरी मुफ्त है। रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और चिकित्सा सहज सुलभ है। शिक्षा और अस्पताल सबको फ्री है। बीमारी का डर इतना है कि यदि आप मात्र संकेत कर दें कि आज कुछ तबीयत गड़बड़ है, बस! आप सीधे अस्पताल पहुँचा दिये जायेंगे। आपकी जाँच पड़ताल कोई 10-12 डॉक्टर करेंगे और इतनी विकट करेंगे कि आपको वे हर तरह बीमार सिद्ध करके छोड़ेंगे। और अस्पताल से छुट्टी? आपकी मर्जी से नहीं। डॉक्टर कहेगा तब आप मुक्त होंगे। आप पर हजारों रुपये खर्च कर देंगे। साधारण सर्दी या जुकाम का इलाज भी यहाँ राष्ट्रीय स्तर पर होता है।

सौन्दर्य, प्रणय व विवाह पर मैं बहुत थोड़े से कुछ कहूँगा। नारी यहाँ प्रायः  गोरी चमड़ी वाली तो है ही पर न उसके पास उत्तेजक सौन्दर्य है न वह मादक व माँसल। स्वप्निल तो है ही नहीं। वह ललना, बाला, रमणी, रम्भा, सुन्दरी, रूपसी, रूपा, कमनीया या कोमलांगी नहीं है। ऐसा सौन्दर्य नहीं देखा कि देखते ही आग लग जाये। मेरा अनुमान है कि औरत तब ही औरत होती होगी जबकि वह या तो शादी करे या पुरुष के साथ संसर्ग करे या पिर बच्चा जने। इन तीन स्थितियों के सिवाय यहाँ औरत एक भरपूर पुष्ट शरीर और वर्कर है। ऊँचाद्व पूरा शरीर, बेहद मोटे नितम्ब और भरे पूरे स्तन, भद्दी मोटी पिण्डलियाँ और भागती सी चाल। निर्द्ंद्व, निस्संकोच और निश्चिन्त है यहाँ की नारी। पुरुष से किसी क्ष्ोत्र में पीछे नहीं। हर जगह आगे और तनाव रहित। खुद कमाती है, खुद पूर्णतया सुरक्षित है।

शादी भी, तलाक भी
विवाह अमूमन शनिवार को होता है। पहिले गिरजाघरों में होते थे पर समाजवादी समाज रचना में गिरजा का स्थान चुपचाप रजिस्ट्रार ने ले लिया। शादी के लिये नगरपालिका सादा समारोह करती है। धूमधाम वाली बात नहीं। 10-15 लोग कुल आमन्त्रित होते हैं। चार-चार, पाँच-पाँच माह पहले रजिस्ट्रार से तारीख माँगना होती है। पर यदि शनिवार का मोह नहीं हो तो फिर कभी भी शादी हो सकती है। शनिवार और रविवार यहाँ सम्पूर्ण छुट्टी के दिन होते हैं। इसलिये शादी में सुविधा होती है। पर गिरजाघर में भी शादी होती ही है। कैथोलिक ईसाईयों के गिरजे यहाँ प्रोटेस्टेण्ट ईसाईयों की तुलना में कम हैं और उन्हें उतना सामाजिक या शासकीय आदर भी प्राप्त नहीं है। प्रोटेस्टेण्ट चूँकि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सन्तुलन बनाते-बिगाड़ते हैं इसलिये उनका पूरा ध्यान रखा जाता है। तलाक यहाँ बहुत आसान है। मियाँ-बीबी की नहीं बनी तो अलग हो गये। कोई शिकायत नहीं। बच्चे यदि माँ के साथ हैं तो खर्चा पिता देगा और यदि पिता के साथ गये तो माँ खर्चा देगी।

सेक्स माने, फूहड़ता नहीं
उन्मुक्त प्रणय का कोई फूहड़ दृष्य अभी तक मैंने नहीं देखा पर एक स्कूल में प्रश्न का सीधा उत्तर आया कि कोई 20 प्रतिशत बच्चे अपने स्कूली जीवन में ही यौन सम्बन्ध या प्रणय व्यापार कर लेते हैं। फूहड़ता से यह देश स्वयं को कितना बचाता है इसका एक दिलचस्प उदाहरण अगली घटना है। शाम को कोई 6 बजे यहाँ बाजार सामान्यतः बन्द हो जाते हैं। दुकानों पर कोई लोहे के शटर या दरवाजे नहीं होते। दीवाल साईज के बड़े-बड़े शीशे भरपूर प्रकाश में सारी रात अपने भीतर की वस्तुओं को दर्शाते रहते हैं। न कोई चौकीदार न पुलिस। शो रूम की हर चीज इत्मीनान से देखते घूमो। ऐसे में हम लोगों ने देखा कि एक दुकान का पारदर्शी शीशा कपड़े से ढका हुआ है। पर्दे की तरह। हमारी उत्सुकता जागी। पास गये।  बगल के शीशे के भीतर झाँका। देखा कि 5-6 आदमकद नारी मूर्तियाँ बिलकुल नंगी खड़ी हैं। यह शो रूम रेडीमेड कपड़ों का था और ये मूर्तियाँ उसी समय उस दुकान में सजावट के लिए लाई गई थीं। उन्हें जब तक कपड़े नहीं पहिनाये जाते, तब तक शीशे से उनका नग्न प्रदर्शन इस देश की शान के खिलाफ होता। इसलिये बड़ा पर्दा डालकर नग्नता को ढँक दिया गया।

पहला पत्र: पाँचवाँ हिस्सा निरन्तर


‘बर्लिन से बब्बू को’ - पहला पत्र: तीसरा हिस्सा यहाँ पढ़िए।
‘बर्लिन से बब्बू को’ - पहला पत्र: पाँचवाँ हिस्सा यहाँ पढ़िए।


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ने भी इस पत्र काेे प्रकाशित किया है। इसे  यहाँ पढ़ा जा सकता है।


सत्ताओं से सवाल पूछना ही सच्ची राजनीति है

अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से सार्वजनिक रूप से सवाल करने और काम का हिसाब-किताब जानने की घटनाएँ बढ़ रही हैं। नेताओं-मन्त्रियों को मंच पर या तो चढ़ने ही नहीं दिया जा रहा या चढ़ गए तो बोलने नहीं दिया जा रहा। वे अपने मन की बात कहें उससे पहले लोग अपनी समस्याओं के समाधान के बारे में जवाब चाहते हैं। नेताओं को उल्टे पाँव लौटना पड़ रहा है। नेपानगर विधायक मंजू दादू, मण्डला के सांसद फग्गनसिंह कुलस्ते, खण्डवा सांसद नन्दकुमार सिंह चौहान, मुरैना सांसद अनूप मिश्रा, प्रदेश के नए-नए राज्य मन्त्री बालकृष्ण पाटीदार, देपालपुर विधायक मनोज पटेल, शहडोल सांसद ज्ञानसिंह, प्रदेश के खाद्य मन्त्री ओमप्रकाश धुर्वे से जुड़े ऐसे समाचार पढ़ने को मिले। 

ऐसे समाचार पढ़ कर अच्छा लगा। खुशी हुई। इसे व्यंग्य या तानाकशी मत समझिएगा। गम्भीरता से कह रहा हूँ, यह सब पढ़कर खुशी हुई। मुमकिन है, सारे मामलों में नेता गलत और लोग सही न हों। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि ये घटनाएँ राजनीतिक कारणों से नहीं हुईं। लोगों ने अपनी समस्याओं के बने रहने और नेता द्वारा चुनाव के बाद पलट कर न देखने पर नाराजी जताई। नेताओं से सवाल, हिसाब पूछनेवालों में नेताओं की पार्टी के ही लोग थे। लगभग प्रत्येक नेता ने इसे अपने विरोधियों की साजिश कह कर खारिज किया। लेकिन वे जानते थे कि सच क्या है।

यही वास्तविक राजनीति है - ‘अपने निर्वाचित प्रतिनिधि से सवाल पूछना, हिसाब माँगना।’ लेकिन दुर्भाग्य यह कि राजनीति के नाम पर इसे छोड़ कर बाकी सब कुछ हो रहा है। इसीलिए हम अपने ही चुने नेताओं से नफरत करते हैं। उन्हें गालियाँ देते हैं और राजनीति को सबसे गन्दी हरकत घोषित किए बैठे हैं। घोषित कर दिया है - राजनीति में भले लोगों के लिए जगह नहीं है। इसका विलोम सत्य है कि यदि कोई भला, सज्जन, ईमानदार आदमी चुनाव लड़ता है तो उसकी जमानत जप्त हो जाती है। मतदाता मुँह पर कहते हैं - ‘आप भले और ईमानदार आदमी हो। लेकिन आपको जीता कर क्या करेंगे सा’ब? आप तो हमारा कोई काम भी नहीं करा सकोगे।’ यह मैंने अपने कानों सुना। सन्देश साफ था - ‘अपनी ईमानदारी अपने पास रखिए। मेरा स्वार्थ सिद्ध कर सको तो वोट की बात करो।’ 

हमने दलगत राजनीति और सत्ता की राजनीति को राजनीति मान लिया है। यह गलत है। राजनीति सदैव ही शुद्ध, सात्विक और लोकहिताकरी होती है। लेकिन दलगत राजनीति सब मटियामेट कर देती है। सत्ता की राजनीति और कुछ नहीं, दलगत राजनीति का ही विस्तार है।

वास्तविक राजनीति, सत्य और नीति/नैतिकता की राजनीति होती है। गाँधी सत्य की राजनीति के पक्षधर थे और अनीति की राजनीति को पाप कहते थे।

निर्वाचित प्रतिनिधि ‘लोकसेवक’ होते हैं। जब तक विधायी सदन के सदस्य होते हैं, वेतन पाते हैं। ये ‘वेतनभोगी’ हैं। हम इन्हें चुनते हैं इसलिए इनके वेतन का भुगतान हम, जन सामान्य करते हैं। वे हमारे ‘वेतनभोगी सेवक’ हैं। उन्हें अपने स्वामियों के प्रति याने हम निर्वाचकों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। चुनाव जीतते ही, हमसे अपना वेतन लेनेवाला हमारा मालिक बन बैठता है। क्यों? क्योंकि हम अपने वोट की कीमत उससे पहले ही वसूल कर चुके हैं। हमारा यह भ्रष्ट आचरण ही राजनीति को गन्दी, घिनौनी बना देता है। 

यह राजनीति नहीं है। राजनीति होती है - ‘अनुचित का विरोध, प्रतिकार।’ लेकिन दलगत राजनीति इस ‘अनुचित’ की परिभाषा बदल देती है। दलगत राजनीति के चलते हमें ‘अपनेवाले का अनुचित’ कभी भी अनुचित नहीं लगता। हम ‘पार्टी लाइन’ के अन्ध समर्थक बन कर सारे भ्रष्टाचार, झूठ, अनैतिक कृत्य न केवल सहन करते हैं बल्कि उनका समर्थन भी करते हैं। जब ‘भ्रष्टाचार’, ‘उसका भ्रष्टाचार’ और ‘अपना भ्रष्टाचार’ की तराजू पर तुलने लगता है तो फिर सच की राजनीति तो कूड़ेदान में जानी ही है। हमने उसे वहीं फेंक दिया है और क्रन्दन कर रहे हैं। हम श्रेष्ठ पाखण्डी, श्रेष्ठ दोगले लोग हैं।

अपराध केवल अपराध होता है। ‘इसका’ या ‘उसका’ नहीं होता। लेकिन जब लालच, स्वार्थ और सुविधा के लिए पैमाने बदल लिए जाते हैं तो मण्डी में गुनाहगारों का ही मोल बढ़ेगा। 

अचानक ही एक आपबीती याद आ गई।

6 जून को राहुल गाँधी मन्दसौर पहुँचे थे। उसी दिन मैंने जो लिखा था वह सात जून को यहीं, ब्‍लॉग पर भी दिया था। मैंने लिखा था - ‘हर कोई जानता है कि राहुल सत्ता में नहीं है। वे तत्काल कुछ नहीं कर सकते। केवल ढाढस बँधा सकते हैं। यह भी सब जानते हैं कि नेता जितना कहता है, उतना कभी नहीं करता। फिर भी मृतकों के परिजन यदि घण्टों पहले पहुँच कर प्रतीक्षा करते हैं तो इसका एक ही मतलब होता है कि उनकी बात किसी ने सुनी नहीं। वे केवल अपने मन का गुबार निकालना चाहते थे। इसीलिए राहुल जब सामने आए तो उनसे लिपट कर रोने लगे। इन्हें शिवराज का काँधा मिल जाता तो ये राहुल के पास क्यों जाते?’ यह लेख मैंने फेस बुक पर भी दिया था। एक टिप्पणी आई - ‘हे राम ......विलाप ठीक है लेकिन कंधा तो ठीक होना चाहिए 70 साल में किसान की लंगोटी पूरी धोती नहीं बनी साहब।’ यह एक राजनीतिक टिप्पणी थी। मैंने जवाब दिया - ‘बहुत सही कहा। यह संयोग ही है कि इन 70 वर्षों में राज्य के मौजूदा शासकों के 15 वर्ष भी मौजूद हैं। हमने सरकार में बदलाव काहे के लिए किया - हालात में बदलाव के लिए या हालात के दोहराव के लिए?’ उधर से प्रतिप्रश्न आया - ‘क्या सत्ताएँ एक सी सूरत की नहीं होतीं? आपका उत्तर हाँ आता है तो अपने लिए आशीर्वाद मानूँगा और ना आता है तो मैं इस बहस से स्वयं को स्वतः अलग कर लूँगा।’ यह एक सशर्त टिप्पणी थी। जब बात अपनी जवाबदेही पर आए तो ‘आपने अपनी पत्नी को पीटना छोड़ा या नहीं?’ जैसे सवाल पूछना शुरु कर दो। जवाबदेही से मुँह चुराने का यही वह बिन्दु है जहाँ से राजनीति गन्दी और घिनौनी हो जाती है। मैंने जवाब दिया - ‘सत्ताएँ स्वयम् नहीं आतीं। हम उन्हें लाते हैं। जैसे हम हैं, वैसी ही सत्ताएँ हैं। यदि हमें सत्ताएँ एक सी लगती हैं तो यह हमारी राजनीतिक चेतना के स्वर्गवास की सूचना है। सत्ता केवल सत्ता होती है। लेकिन जब वह ‘हमारी’ और ‘उनकी’ में बदल जाती है तो निष्पक्ष दृष्टिकोण की अपेक्षा आत्म वंचना होती है। वस्तुपरक भाव से देखना आसान नहीं है। मैं यह कठिन काम करने की भरसक कोशिश कर रहा हूँ। मेरे लिए सत्ता केवल सत्ता है। चूँकि इसे मैं लाया हूँ इसलिए इसकी सेहतमन्दी मेरी जवाबदारी है। वही निभाने की कोशिश है। ‘वहाँ कौन है?’ इससे पहले मेरी चिन्ता है - ‘वहाँ, वह क्या कर रहा है।’ राजनीति, दलगत राजनीति और सत्ता की राजनीति में बड़ा भेद है। मैं राजनीति में विश्वास करता हूँ और सब इसमें विश्वास करें, इसे जरूरी मानता हूँ।’ इसका जवाब आना ही नहीं था। नहीं आया।

हमारी संसदीय लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली का आधार राजनीति है। हम सबको ‘राजनीतिक’ होना ही पड़ेगा। ‘राजनीतिक’ होने का अर्थ ‘राजीतिज्ञ’ होना नहीं हैं। 

राजनीतिक बनना, अपनी आजादी और लोकतन्त्र के प्रति  हमारी जिम्मेदारी है। राजनीति का मतलब है, अपने सेवकों से सवाल पूछना, उनको सौंपे गए काम का हिसाब माँगना और उनकी अनुचित बात/हरकत पर अंगुली उठाना, उन्हें नियन्त्रित करना। वे हमारे वेतनभोगी सेवक हैं। हमारे स्वामी नहीं। 

जिन लोगों ने नेताओं से सवाल पूछ कर अपनी राजनतिक जिम्मेदारी और भूमिका निभाई, उन्हें सलाम। ईश्वर करे, उनका यह आचरण संक्रमण की तरह पूरे देश में फैले।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे, भोपाल, 28 जून 2018

बहुत मँहगा है पूर्वी जर्मनी

'बर्लिन से बब्‍बू को' : पहला पत्र - तीसरा हिस्सा

एक प्राकृतिक विरोधाभास है यहाँ की धरती पर। यहाँ मिट्टी तो है पर धूल नहीं। न कोई गर्द और न कोई गुबार। कपड़े झाड़ने या झटकने की नौबत ही नहीं। जूतों पर ब्रश मार लो। पालिश बेशक 15 दिन में करो। धूप का तो प्रश्न ही त्यौहार की तरह पैदा होता है। पसीना कारखानों में बहता है। सामान्य दिनचर्या में नहीं। सूरज निकल आये तो लोग पुलकित हो उठते हैं। हमेशा बदराया मौसम रहता है।

दायें से चलिये

ट्राफिक नियम बिलकुल उलटे हैं। यहाँ बाँयें चलो वाली स्थिति नहीं है। सदा दायें चलो, कीप राईट। हम लोगों की आदत है बाँये चलने की। हमसे सड़कों पर झुण्ड के झुण्ड टकरा जाते हैं। कारें, बसें, ट्रामें सब दाहिने चलते हैं। फुटपाथों पर भी यही नियम लागू होता है। सड़कों पर पगडण्डी वाली प्रथा यहाँ कतई नहीं होती। आपको सड़क पार करनी है तो वहीं से कर सकेंगे जहाँ उसे पार करने के निशान बने हुए हैं। हम जिस तरह से कन्धे और शरीर रगड़ कर कहीं से भी रास्ता बना लेते हैं वैसा यहाँ असम्भव है। एक ही उदाहरण इसका पर्याप्त है। हमारे सहयात्री श्री शर्मा की नींद रात को कोई 3.30 बजे खुली। वे कमरे की खिड़की में खड़े हो गये। देखा कि दो कारें ट्राफिक के सिगनल पर खड़ी हैं। सारी सड़क सुनसान थी, पर सिगनल पर लाल बत्ती जल रही थी। जब तक हरी बत्ती नहीं जली, वे कारें वहीं खड़ी रहीं। सिगनल मिलते ही चल दी। अनुशासन का चरम होता है ऐसा क्षण। मेरे पाठक इस बात को गप मानेंगे। पर यह सच है कि इस देश में अभी तक हम लोगों ने एक भी कार या बस का हार्न नहीं सुना। कोई हार्न नहीं बजाता। 60-70 किलोमीटर फी घण्टे से कम कोई कार या बस चल ही नहीं सकती। हार्न का प्रयोग बहुत ही अधिक इमर्जेन्सी हो तो किया जाता है। हार्न की बात तो दूर रही पर रोस्तोक जैसे दो लाख की आबादी वाले शहर में कोई कुत्ता भौंकता नहीं सुना। कभी पशु की आवाज नहीं सुनी और न कहीं कोई हाथापाई, गाली-गलौच या कहासुनी का दृष्य ही देखा। अनुशासन के दूसरे उदाहरण हैं होटल और रेस्तराँ। भीतर जब तक कुर्सी खाली नहीं होती, लोग बाहर क्यू बनाए खड़े रहते हैं। कोई उतावलापन नहीं, कोई भीड़ वाली धक्का-मुक्की नहीं, कोई बेसब्री नहीं।

मुझे नाई बनना पड़ा

दिनचर्या हमारी बहुत टाईट है। सुबह 7 बजे से रात 10.30 बजे तक बराबर व्यस्त रहता है पूरा दल। जिन लोगों को बिस्तर में बड़े सबेरे चाय पीने की आदत भारत में थी वे यहाँ एक ही दिन में सुधर गये। कोई बेड टी यहाँ नहीं मिलती। नाश्ता भयंकर मिलता है। शाकाहारी और सामिष दोनों ही तरह के नाश्ता एवम् भोजन की व्यवस्था है। मक्खन, शहद, चीज, पनीर, दूध, दही और फल इतने शुद्ध, ताजा और स्वादिष्ट होते हैं कि बयान नहीं किया जा सकता। शाकाहारी लोगों को असुविधा अवश्य हो जाती है पर वैसी कोई बात नहीं है कि ‘अब क्या होगा?’ बीयर और शराब पानी के बदले पी जाती है। जो मेरी तरह बीयर और शराब भी नहीं लेते, उनके लिये फलों का रस मटके भर-भर कर मिल जाता है। पर जीवस्तर मँहगा और बहुत ऊँचा है। चाय यहाँ भारत और श्रीलंका से आती है। काफी बहुत पी जाती है। काफी का एक प्याला भारतीय हिसाब से 12 रुपयों से कम का नहीं होता। हमारा 3.75 रुपया या 4 रुपये यहाँ के एक मार्क के बराबर होते हैं। यदि मेरे नाश्ते का हिसाब लगाया जाय तो मैं प्रतिदिन सुबह नाश्ता में कोई 30 या 40 भारतीय रुपये तक खा जाता हूँ। दोपहर का भोजन अलग। शाम की चाय पीने का कोई रिवाज नहीं है। रात का खाना फिर भयंकर। खातिरदारी इतनी होती है कि खाते-खाते आदमी थक जाता है। मेरा अनुमान है कि हमारा हर एक सदस्य (शाकाहारी) प्रतिदिन कम से कम 100 रुपये तो खा ही जाता होगा। होटल के कमरे का किराया अलग। हाँ, धोबी या लाण्ड्री का नाम तक लेने की हिम्मत नहीं होती हमारी। एक कुरता, पायजामा धुलाकर लोहा (इस्तरी/प्रेस) करवाने का मतलब है 50-60 रुपये लग जाना। प्रवास में मैं अपने चड्डी बनियान खुद धोया करता हूँ। वह आदत यहाँ वरदान हो गई। कपड़े दो दिन तक सामान्यतया नहीं सूख पाते। एक दिन सोचा कि कटिंग बनवा लूँ। सैलून में पूछा तो ज्ञात हुआ कि बाल बनवाने पर भारतीय 30 रुपये खर्च हो जायेगा। मैं खुद ही अपने बाथरूम में कैंची-कंघा लेकर अपनी कटिंग बनाने पर जुट गया और हमारे मित्र देखते रह गये कि मैंने अपने बाल आराम से बना लिये। आदमी जब खुद बूट पालिश करके मोची नहीं हो जाता, तो अपने बाल बना लेने से नाई किस तरह हो जायेगा? खुद के कपड़े धोने से कौन धोबी हो जाता है?

पहला पत्र: चौथा हिस्सा निरन्‍तर




‘बर्लिन से बब्बू को’ - पहला पत्र: दूसरा हिस्सा यहाँ पढ़िए

‘बर्लिन से बब्बू को’ - पहला पत्र: चौथा हिस्सा यहाँ पढ़िए।


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तलाश किसी रोते हुए बच्चे की

बर्लिन से बब्‍बू को - पहला पत्र: दूसरा हिस्सा

पहली रात हम लोग बर्लिन के एक आधुनिकतम होटल ‘होटल स्ताद बर्लिन’ (बर्लिन का हृदय) में ठहराये गये। 37 मंजिले इस होटल की 29वीं मंजिल पर मैं कमरा नम्बर शून्य आठ में था। 2000 बिस्तरों वाले इस होटल को यहाँं का विशेष दर्जा दिया गया है। चार तरह के होटल होते हैं इस देश में। प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, तीसरी श्रेणी और सर्वोपरि विशेष श्रेणी। मेरे बापदादे भी ऐसे बिस्तरों पर नहीं सोये होंगे। हाँ तू, तेरे बच्चे और भतीजे सोयें तो मुझे खुशी होगी। इतने आरामदेह और नरमतम बिस्तरों पर सोना मेरे भाग्य में तो है, पर मुझे नींद नहीं आ पती है इन पर।

शायद तुझे पता नहीं होगा कि अगस्त 76 के अन्तिम सप्ताह में जब मैं विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिये मॉरीशस में था तब वहाँ धोती, कुर्ता और जाकेट पहने घूमता था। पर यहाँ बर्लिन और रोस्टोक की सड़कों पर मैं अकेला भारतीय हूँ जो चुस्त पायजमा, कुर्ता, जाकेट पहने घूमता हूँ। जब हम लोग बस में या होटल में होते हैं तब तो सब कुछ एयर कण्डीशन होता है इसलिये सामान्य कपड़ों से काम चल जाता है। पर ज्यों ही बस या होटल से बाहर निकले कि तेज हवा और दगाबाज सर्दी की लहरें चमड़ी के भीतर घुस जाती हैं। अच्छा हुआ जो मैं चेस्टर लेता आया। खादी के इस ओव्हरकोट ने जान बचा दी। वैसे मैं अपनी बसन्ती लुंगी, बसन्ती कुर्ता और ऊपर भगवा ऊनी शाल ओढ़े भी हर जगह घूम लेता हूँ। मुझे देखते ही ‘इन्डिया इन्दिया’ की आवाजें शुरु हो जाती हैं। हमारे व्यवस्थापक साथी डॉ. गुन्थर, श्रीमती रुथ, श्रीमती एन और दुभाषिये श्री क्लोफर खूब मजा लेते हैं।

कोई इस बात पर विश्वास नहीं करेगा कि इन चार दिनों में हमने एक साल से लेकर दस साल तक के सैकड़ों बच्चे देखे हैं पर एक भी बच्चा रोता हुआ नहीं देखा। हम लोग ढूँढ रहे हैं कि कोई बच्चा रोता हुआ मिल जाये। अविश्वसनीय लगता होगा पर यह सच है कि इस देश में पाँचवीं से सातवीं तक की कक्षाओं में यौन सम्बन्धी सारा पाठ्यक्रम पढ़ा दिया जाता है। यौनाचार बच्चों को फूहड़ता की तरफ तब नहीं धकेल पाता।

दूसरे विश्व युद्ध की तबाही का यह देश जीवित प्रमाण है। पर अटूट संकल्प शक्ति, दृढ़ निश्चय, उत्कृष्ट राष्ट्रीय चरित्र, अनुपम अनुशासन और महान नवनिर्माण का भी यह देश अद्भुत सम्मिश्रण है। भूख, गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद यहाँ कहानियों में भी स्थान नहीं पाते। तस्करी और काला बाजारी यहाँ 1945 से पूर्व की घटनाएँ हैं। देश बना 1945 में। हिटलर और नाजियों ने यातना शिविरों में जिन दो करोड़ लोगों को जीवित जला दिया और भून दिया उसमें इस देश के केवल 10 लाख तो बच्चे ही थे। महिलाएँ और जवान तथा बूढ़े अलग। सब कुछ कल्पनातीत है। यातना का अनुमान पुस्तकों से नहीं लग पाता। हम लोगों ने एक यातना शिविर को देखा। आज वह अजायबघर है। शिविर की दीवार के उस पार आज सोवियत सेना का शिविर है। पर जो कुछ भी मैं देख पाया उससे मेरी कलम से एक कविता, आँखों से आँसू और कलेजे से चीख एक साथ निकल पड़ी। वह कविता वहीं के विजिटर्स रजिस्टर में मैं छोड़ आया हूँ। बच्चों पर यह देश उतना ही ध्यान देता है जितना एक मुर्गी अपने अण्डे पर या एक गाय अपने वत्स पर। राजमहलों में जो सुविधा राज पुत्रों को नसीब नहीं होती वह यहाँ बच्चों को दी जाती है। वस्तुतः बच्चे पढ़ते हैं, पढ़ाये नहीं जाते। पाठ्यक्रम ही ऐसा होता है। एक 10 वर्षीय बालक ने जब अपनी कक्षा में हमारे दल के सदस्यों से हाथ मिलाकर ‘इन्दिरा गाँधी को अभिवादन’ कहा तो सारा दल मुग्ध रह गया। हर बच्चा उत्फुल्ल, ताजा और किलकता मिलता है। उसकी किलकारियों से ही आभास हो जाता है कि इस बच्चे का भविष्य सौ फीसदी सुरक्षित है।

पहला पत्र: तीसरा हिस्सा निरन्तर



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पूर्वी जर्मनी : कैसा है यह देश?

बर्लिन से बब्‍बू को - पहला पत्र: पहला हिस्सा

(इस अंश में - 'गुलाब बा' याने उस समय हमारे घर/मकान के रखवाले। 'पिया' याने मेरी भाभीजी, श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी। 'पप्‍पू' याने दादा का साला, घन सच्चिदानन्‍द बैरागी। 'गोर्की' याने दादा का छोटा बेटा, मेरा छोटा भतीजा।)

रोस्टोक (पूर्वी जर्मनी से)
8 सितम्बर 76
शाम 4 बजे।

प्रिय बब्बू,

प्रसन्न रहो,

किसी भी देश के बारे में इतनी जल्दी कुछ लिख देना अच्छी बात नहीं होती। कुल जमा 4 दिन हुए हैं मुझे यहाँ पहँचे। याने कि 4 दिनों में क्या कुछ देखा होगा? पर मैं जानता हूँ कि तू और तेरे आसपास के सभी साथी मित्र, मेरे परिचित और हितैषी, मेरे पाठक और श्रोता, मुझ पर श्रद्धा रखने वाले और मुझ से ईर्ष्या करने वाले अनुयायी और विरोधी सभी की दिलचस्पी इस बात में अवश्य होगी कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ,क्या कर रहा हूँ और यह देश कैसा है? यहाँ का जन-जीवन, संस्कृति, राजनीति और स्तर किस तरह का है? कई प्रश्न होंगे जो उत्तर चाहते होंगे। मेरे पत्र की प्रतीक्षा तुम सब लोगों को होगी।

मैं कहाँ से शुरु करूँ? एक गुबार सा मेरी कलम की नोक पर उतर कर रास्ता चाहता है। जी. डी. आर. (जिसे हम पूर्वी जर्मनी भी कहते हैं) एक यूरोपीय देश है और 1945 में हिटलर की पराजय के बाद यह देश अस्तित्व में आया। यह तो सर्व विदित है। आबादी यहाँ की कुल एक करोड़ 80 लाख है। पूर्वी बर्लिन इसकी राजधानी (आबादी 11 लाख) होती है। भारत का क्षेत्रफल इससे 33 गुना अधिक है। उधर बँटवारे में पश्चिम जर्मनी जो गया तो अपने साथ कोई सवा छः करोड़ की आबादी भी लेे गया। पश्चिम जर्मनी एक पूँजीवादी देश है। 100 फीसदी अमेरिकन प्रभुत्ववाला। जबकि जिस देश में मैं घूम रहा हूँ वह जी. डी. आर. (जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक) याने जर्मन समाजवादी गणतन्‍त्र अर्थात पूर्वी जर्मनी कहलाता है। यह वही देश है जिसके खिलाड़ियों ने अभी मान्ट्रियल ओलम्पिक की पदक तालिका में रूस के बाद सीधा दूसरा स्थान प्राप्त करके दुनिया को अवाक् कर दिया है। जिस समय मैं यह पत्र तुझे लिख रहा हूँ, यहाँ शाम के 4 बजे रहे हैं। भारत में इस समय रात के 8.30 बजे होंगे। मैं कल्पना कर रहा हूँ कि पिताजी सो गये होंगे। माँ गुलाब बा को हिदायतें दे रही होगी। पप्पू दुकान से लौट आया होगा। पिया रात का खाना खाने की तैयारी रही होगी। और गोर्की? वह पढ़ने का बहाना बनाते हुए रेडियो बजा रहा होगा। रहा सवाल तेरा, तो तू ‘दशपुर-दर्शन’ के लिए समाचारों को अन्तिम रूप दे रहा होगा।

4 अगस्त की सुबह 9 बजे भारतीय समय 4.30 बजे प्रातः हम सकुशल बर्लिन उतरे। शिष्ट मण्डल में कुल 14 मित्र हैं। इन 14 में से 5 लोग हम सीधे काँग्रेस से आते हैं। भू. पू. संसद सदस्या श्रीमती फूलरेणु गुप्ता (बंगाल) हमारे पूरे शिष्ट मण्डल की नेता हैं। शेष 4 में वर्तमान संसद सदस्य श्री दिनेश गोस्वामी (आसाम) श्री प्रफुल्ल गड़ई (महा सचिव, प्रदेश काँग्रेस उड़ीसा) श्री गुप्ता (भू. पू. सदस्य दिल्ली महा पालिका) और मैं हूँ। बाकी जो 9 मित्र हैं वे अलग-अलग स्थानों और निकायों से हैं। इस पूरे शिष्ट मण्डल का प्रवर्तन किया है भारत-जी. डी. आर. मैत्री संघ दिल्ली ने। दूसरों की तो मैं नहीं कहता पर मुझमें रुचि सीधे यहाँ वालों की थी। मेरा नाम पहला नाम था जिस पर इन्दिराजी ने सहमति दी ऐसा मुझे दिल्ली में बता दिया गया था। श्री के.एन. सेठ नामक एक पत्रकार किन्हीं अज्ञात कारणों से नहीं आ सके और चण्डीगढ़ के श्री बंसल पारिवारिक कारणों से ठहर गये। शेष सदस्य हैं प्रो. पाण्डेय (राजस्थान), श्री गोपाल प्रसाद (बिहार), श्री राव (आन्ध प्रदेश), श्री रेड्डी (रिटायर्ड जज मद्रास हाय कोर्ट), श्री श्रीधरन (दल के सचिव), श्री रामनाथन (बंगलौर के वकील), श्री खरसाटी (रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर, मेघालय), प्रो. श्री भट्टाचार्य (आसाम, राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक), श्री शर्मा (दिल्ली के एक रिटायर्ड प्राचार्य)। सभी सदस्यों की अपनी-अपनी योग्यता है।

इस दल में नेपाल के एक साथी और श्रीलंका के दो भाई भी यहाँ शामिल हो गये हैं। इन 17 सदस्यों को 4 सितम्बर से 22.9.76 तक का बिलकुल व्यवस्थित कार्यक्रम दे दिया गया है। याने अब भारत में मेरा आना 23-9-76 को या फिर 30-9 को ही सम्भव होगा। 23-9 से 27-9 तक के मेरे साहित्यिक कार्यक्रम उधर भारत में तय हैं। केवल 26-27-28 के कार्यक्रमों का पक्का प्रस्ताव मुझे दिल्ली में मिलना है। शायद मिल जाय। 23-24-25 एवम् 29 के मार्यक्रम मेरे तय हैं। और यदि 1-10 को मुझे दिल्ली बोलना ही पड़ा तो फिर मैं 3-10 को मनासा पहुँच पाऊँगा। खैर, ये सब बातें बात की हैं। बात यहाँ से चल रही थी-

पहला पत्र: दूसरा हिस्सा निरन्तर


बर्लिन से बब्‍बू को -  ब्‍लॉग पर प्रकाशन की भूमिका

बर्लिन से बब्‍बू को - पहला पत्र: दूसरा हिस्सा यहॉं पढिए

इण्‍टरनेट  पर सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय व समृद्ध ई-पत्रिका ‘रचनाकार’ 
ने भी इस पत्र काेे प्रकाशित किया है। इसे  यहाँ पढ़ा जा सकता है।



बर्लिन से बब्बू को: एक जिद का पूरी होना



 ‘बर्लिन से बब्बू को’ के बारे में मेरी यह बात तनिक लम्बी ही  होगी। कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि कृति के मुकाबले उसके निर्माण का ब्यौरा लम्बा हो जाता है। नाक पर नथनी भारी हो जाती है। कोई महत्वपूर्ण उल्लेख छूट न जाए इस भावना के अधीन अधिकाधिक जानकारियाँ, सन्दर्भ और नाम देने का मोह मैं छोड़ नहीं पा रहा हूँ। 


दादा श्री बालकवि बैरागी, सितम्बर 1976 में तत्कालीन पूर्वी जर्मनी की यात्रा पर गए थे। तब मैं मन्दसौर में, दैनिक ‘दशपुर दर्शन’ का सम्पादन कर रहा था। दादा की यह दूसरी विदेश यात्रा थी। इससे पहले वे मारीशस की यात्रा कर चुके थे और ‘धरती रामगुलाम’ की शीर्षक से उनकी मारीशस यात्रा के संस्मरण प्रकाशित हो चुके थे।

यात्रा के दौरान दादा संस्मराणात्मक पत्र मुझे लिखेंगे, यह शायद उन्होंने भी नहीं सोचा था। जाने से पहले उन्होंने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था। यह विचार उनके मन में निश्चय ही, यात्रा शुरु करते समय या पूर्वी जर्मनी में उतरने के बाद आया होगा। भारत लौटने के बाद भी उन्होंने इस बारे में कभी, कुछ नहीं बताया।

जब मुझे पहला पत्र मिला तो, मुझे अच्छा तो लगा लेकिन मैं चौंका भी था। इतना सब मुझे बताने का उनका क्या मकसद हो सकता है? पहले पत्र को मैंने दो-तीन बार पढ़ा और पढ़ते-पढ़ते मुझे लगा, दादा की भावना हो न हो लेकिन मेरी सोच-समझ पर उन्हें कहीं न कहीं यह विश्वास तो है कि मैं इन पत्रों को अपने तक ही सीमित नहीं रखूँगा। मेरे अनुमान की पुष्टि उनके तीसरे और चौथे पत्र में बड़े ही सहज भाव से होती है। उनका तीसरा पत्र पढ़ने के बाद अपनी सम्पादकीय सूझ-बूझ पर मेरा भरोसा बढ़ा ही।

इन पत्रों के प्रकाशन का निर्णय लेने में मैंने किसी से परामर्श नहीं किया। हाँ, यह तय किया कि इस प्रकाशन का निमित्त  और इससे मिलनेवाले यश का स्वामी ‘दशपुर दर्शन’ बने, ताकि उसकी आय और प्रसार में भी वृद्धि हो। एक सम्पादक यही तो चाहता है कि उसका अखबार अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे, अधिकाधिक पढ़ा जाए! इस मोह को कुछ और बातों ने ताकत दी। जैसे कि  मैं एक अखबार का सम्पादक हूँ, मेरे मालिक के पास छापाखाना है। मेरा मालिक दादा का अभिन्न मित्र है। दोनों एक ही पार्टी के सक्रिय, अग्रणी कार्यकर्ता हैं। आदि-आदि।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जैसा मैंने सोचा था। ‘दशपुर दर्शन’ के माध्यम से इन पत्रों के प्रकाशन का निर्णय जब मैंने अपने मालिक श्री सौभाग भाई को बताया तो उन्होंने मंजूरी तो दी लेकिन साफ कह दिया कि इसके लिए वे कोई आर्थिक वजन नहीं उठाएँगे। इस प्रकाशन का खर्च मुझे ही जुटाना होगा। मेरे लिए यह अत्यन्त दुसाध्य काम था। लगभग असम्भव। विज्ञापन जुटाने का गुण मुझमें आज तक नहीं आ पाया। एक क्षण लगा कि यह विचार ही छोड़ हूँ। लेकिन एक जिद मन में उभर आई - ‘पत्र तो छपेंगे।’ तब तक तीन पत्र आ चुके थे।

मैंने अपने गुरु (अब स्वर्गीय) श्री हेमेन्द्र कुमारजी त्यागी और कई मित्रों से विस्तार से बात की। अपनी भावना और सौभाग भाई की बात बताई। सबने पत्रों को बार-बार पढ़ा। अकेले में भी और सामूहिक रूप से भी। सबने कहा - ‘पत्र छपने चाहिएँ। छपेंगे। आगे बढ़ा जाए। जो होगा, देखा जाएगा।’  

सौभाग भाई ने बजट बताया और हम सब शुरु हो गए।

तीन पत्र हमारे हाथ में थे। पत्रों से यह तो लग रहा था कि दादा और पत्र लिखेंगे जरूर। लेकिन ‘कितने पत्र लिखेंगे?’, ‘लिखेंगे तो हम तक कितने पहुँचेंगे?’, ‘कब पहुँचेंगे?’,  ‘बादवाला पत्र तो मिल गया लेकिन उससे पहलेवाला नहीं मिला तो क्या करेंगे?’ जैसे सवालों का जवाब हममें से किसी के पास नहीं था। लेकिन तय हो चुका था - छापना है। 

प्रकाशन का नामकरण करने में न तो समय लगा, न ही कठिनाई हुई। सब कुछ साफ था - ‘दादा ने लिखे हैं। बर्लिन से लिखे हैं। बब्बू को (मेरा, घर का नाम बब्बू ही है) लिखे हैं। इसके बाद क्या सोचना! यही नाम हो सकता है - बर्लिन से बब्बू को।’ 

अखबार में पहली घोषणा से ही पाठकों में मानो बिजली का करण्ट दौड़ गया। पाठकों ने जताया कि उन्हें हमसे अधिक उतावली थी। लेकिन हमें धैर्य बरतना था। ऐसे नितान्त व्यक्तिगत और आत्मपरक पत्रों में सम्पादन की सामान्यतः न तो आवश्यकता होती है और न ही कोई गुुंजाइश। लेकिन जब वैयक्तिकता सार्वजनिकता से जुड़ती है तो फिर सम्पादन की आवश्यकता स्वतः पैदा हो जाती है। हम सौभाग भाई की ‘पेढ़ी’ का उपयोग कर रहे थे। यह हमारी जिम्मेदारी थी कि उन्हें कोई खरोंच न आए। 

किताब का अन्तरवर्ती मुख पृष्ठ
ये पत्र जब पुस्तकाकार में आए तो सम्पादक मण्डल में चार नाम छपे - त्यागीजी, राजा दुबे, विजय बैरागी और मैं। लोगों ने कभी मजाक में तो कभी तंज कसते हुए पूछा - ‘इसमें सम्पादन जैसा क्या था जो इतने लोगों को मेहनत करनी पड़ी? चलो करनी पड़ी तो भी बैरागी दादा के लिखे का सम्पादन! आप चारों उनसे अधिक विद्वान् हो गए?’ हमारे पास न तब जवाब था न मेरे पास अब जवाब है। बस! इतना ही कह पा रहा हूँ कि हाँ, सम्पादन की जरूरत थी। दादा के मूल पत्रों में उप शीर्षक नहीं थे। उप शीर्षक देना तय हुआ। सारे उप शीर्षक राजा दुबे ने दिए। 

पत्र छपने शुरु हुए तो पूरे जिले में मानो कोई छोटा-मोटा लोकोत्सव शुरु हो गया हो। लोगों ने इन्हें हाथों-हाथ लिया। प्रशंसाभरे, उत्साहवर्द्धक पत्रों का ढेर लग गया। कुछ इतना कि एक दिन खुद पोस्ट मास्टर सा’ब आकर बता गए - ‘आपके पत्रों के लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ रही है।’ हमारी प्रसार संख्या में भी यथेष्ठ बढ़ोतरी हुई। 

हमने पूरी सुविचारित योजना बनाकर ये पत्र पाठकों तक पहुँचाए। अखबार के साथ 8×5.5 इंच के आठ पेज का एक पन्ना छापते थे जिसे मोड़कर पुस्तकाकार दिया जा सकता था। कोशिश रहती थी कि जैसे-जैसे विज्ञापन मिलते जाएँ, वैसे-वैसे पन्ने देते जाएँ। ऐसा किया भी। लेकिन विज्ञापनों की प्रतीक्षा में पन्ने रोके नहीं। जब तक पत्र हमारे हाथ में आते रहे, पन्ने बराबर जारी करते रहे। तब ट्रेडल मशीन पर अखबार छपता था और चित्रों के ब्लॉक इन्दौर से बनवाने पड़ते थे। लेकिन इन दोनों कारणों से प्रकाशन नहीं रुका। पाठकों को प्रतीक्षा तब ही करनी पड़ी जब डाक की गड़बड़ के कारण  हमें पत्र नहीं मिले। लेकिन सन्तोष की बात यह रही कि दादा के भेजे सारे सात पत्र हमें मिल गए। एक पत्र हमें दादा के भारत लौटने के बाद मिला।

पत्र प्रकाशन में व्यवधान पर पाठकों की अधीरता भरे पत्र हमें (इन पत्रों के प्रकाशन के) अपने निर्णय पर आत्मसन्तोष प्रदान करते रहे।

अन्ततः सारे पत्र प्रकाशित हुए। आवरण पृष्ठों सहित पूरी किताब 108 पृष्ठों की बनी। हमें पूरे पृष्ठ के अठारह, आधे पृष्ठ के चौदह और चौथाई पृष्ठ के तीन विज्ञापन मिले। फिर भी आर्थिक सन्दर्भों में यह घाटे का ही सौदा रहा। लेकिन इनके प्रकाशन से उपजा आत्म सन्तोष मेरे लिए आज भी अमूल्य है। किसी भी प्रकाशन की यह मेरी पहली इच्छा और कोशिश थी जो साकार हुई। दादा को छापने का निमित्त बनने के सुख-सन्तोष का मोल तो मेरी मृत्युपर्यन्त अकूत ही रहेगा। 

हमने इस प्रकाशन का कोई समारोह नहीं किया। घर-घर में, पाठकों ने ही पुस्तक तैयार कर ली थी। हमने अपने लिए अतिरिक्त प्रतियाँ छपवाई थीं। अखबारी कागजवाली प्रतियाँ ज्यादा थीं। कुछ प्रतियाँ अच्छे, सफेद कागज पर थीं। यूँ तो हमने एक प्रति का मूल्य बीस रुपये रखा था लेकिन एक भी प्रति नहीं बिकी। सब मुफ्त में ही बँटी। कुछ इस तरह कि अच्छे, सफेद कागज पर छपी एक भी प्रति हमारे परिवार में ही उपलब्ध नहीं है। पुस्तक में प्रकाशित चित्रों को मैं ब्लॉग पर भी देना चाहता था लेकिन अखबारी कागजवाली प्रति पर छपे चित्रों में शकलें ही नजर नहीं आ रहीं। अच्छे, सफेद कागजवाली प्रति की तलाश खूब की। फेस बुक पर भी माँगी। लेकिन अब तक नहीं मिली। फिर भी, अखबारी कागज पर छपे तीन चित्र ऐसे मिल गए हैं जिनमें शकलें पहचान में आती हैं और जिन्हें कम खराब’ कहा जा सकता है। पुणेवाले डॉक्टर रतनलालजी सोनग्रा ने कहा है कि दादा ने इसकी एक प्रति उन्हें दी थी। वे उसे तलाश करेंगे। मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा हूँ उन्हें यह प्रति मिल जाए और यह प्रति अखबारी कागजवाली नहीं, अच्छे, सफेद कागजवाली हो। 

दादा के लोक सभा सदस्यतावाले काल में किसी प्रकाशक ने यह किताब ‘एक बैरागी बर्लिन में’ शीर्षक से छापी थी। लेकिन उसमें चित्र नहीं थे।

इन पत्रों को ब्लॉग पर प्रकाशित करने की तैयारी सितम्बर 2009 में ही हो गई थी। सबसे बड़ा काम था टाइपिंग का। भाई श्री पुरुषोत्तम लोहाना, सितम्बर 2009 में ही यह विकट काम कर चुके थे। उन्होंने अपना पारिश्रमिक भी अब तक नहीं लिया है। मैं चित्रों के मोह में उलझा रहा। खूब हाथ-पैर मारे। पर असफल ही रहा। कुछ तो कोशिशों के बाद की प्रतीक्षा, कुछ इधर-उधर और टटोलने का जतन और कुछ आलस्य। इन सबके चलते ब्लॉग पर प्रकाशन टलता रहा। दादा से जब भी बात की, उन्होंने सदैव ही निर्लिप्त भाव से कहा - ‘तू जाने और तेरा काम।’ लेकिन उनके जाने के बाद इन्हें ब्लॉग पर देते समय मेरे आँसू थम नहीं रहे। दादा इन्हें मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित देखते तो उन्हें अतिरिक्त प्रसन्नता ही होती और खूब होती। वे यकीनन बच्चों की तरह खुश होते। लेकिन उनकी यह खुशी मेरे भाग्य में नहीं रही। मैंने ही खुद से छीनी।

इन्हें पढ़ने से पहले कुछ बातों पर यदि ध्यान देंगे तो बड़ी कृपा होगी।

1975 से लेकर अब तक अन्तरराष्ट्रीय राजनीति और दशा में बदलाव आ गया है। तब जर्मनी विभाजित तथा। आज एक है। वहाँ की उस समय की राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक, सामाजिक नीतियाँ बदल गई हैं। ऐसे में इन पत्रों को किसी देश के आन्तरिक और/या अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के सन्दर्भों से जोड़ना समीचीन नहीं होगा। इन्हें लेखकीय  और पाठकीय दृष्टि से देखते हुए इनका आनन्द लेना बेहतर होगा। यात्रा के दौरान किसी देश के बारे में जानना, उसके नागरिकों, उसकी सामाजिकता, अपने देश के प्रति नागरिकों की भावना, वहाँ के मजदूर-किसान, उनका आचरण, महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों के साथ किया जानेवाला व्यवहार, वहाँ के जीवन मूल्य जैसे अनगिनत कारकों को टटोलना आदि बातें इन पत्रों की दर्शनीयता है। दो देशों के बीच सेतु का काम करनेवाले मैत्री संघों के कामकाज में दोनों देशों की राजनीतिक विचारधारा मुख्य आधार होती है। प्रतिनिधि मण्डलों के सदस्यों का चयन भी इन्हीं आधारों पर होता ही है। लेकिन जब कोई सदस्य कलमकार भी हो तब उसकी नजर और उसकी अभिव्यक्ति में सामंजस्य बैठाना चुनौती बन जाता है। कलमकार को केवल वही नहीं दिखता जो उसे दिखाया जाता है। जो उससे छुपाया जाता है, राजनयिक शिष्टाचार और सीमाएँ निभाते हुए वही सब उजागर करने का कौशल उसे बरतना पड़ता है। ये पत्र दादा की राजनीति और कलम की बेहतरीन जुगलबन्दी का बेहतरीन नमूना है - ऐसा मुझे तब भी लगता था और अब भी लग रहा है। 

इन पत्रों का आनन्द लेने के लिए या तो इनके काल में ठहरना पड़ेगा या फिर उसे साथ बनाए रखना पड़ेगा। वर्तमान से उनकी मुठभे शायद ‘बासमती भात में कंकर’ की स्थिति बना दे।

इस सबसे हटकर और इस सबसे पहले इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि अपने पूर्वनिर्धारित अति व्यस्त कार्यक्रम के बीच दादा ने ये पत्र कितनी कठिनाई, कितने परिश्रम से लिखे होंगे? इसके लिए उन्होंने अपनी, आहार-निद्रा जैसी दैनन्दिन चर्या के समय में ही कटौती की होगी। उनके लिखे वे मूल पत्र मेरे पास नहीं हैं। लेकिन एक भी पत्र में काटा-पीटी या ‘ओव्हर राइटिंग’ नहीं थी। दादा कभी भी ‘नोट्स’ बनाकर नहीं लिखते थे। ऐसे में बरबस ही यह बात मन में आती है कि लिखने से पहले किस तरह उन्होंने कागज से पहले ये पत्र अपने मन में लिखें होंगे? आज की पीढ़ी तो हाथों से इतना लिखने की कल्पना भी नहीं कर सकगी। भाई लोहानाजी ने एमएस वर्ड डाक्यूमेण्ट की, 65 पृष्ठों की जो फाइल मुझे दी है वह 25,423 शब्दों की, 23,08,760 केबी की है। 

ब्लॉग पर देते समय मैंने भी कुछ बदलाव किए हैं। पुस्तक में दिए सारे गीत हटा दिए हैं। ऐसा करना, इनकी पठनीयता में कहीं भी बाधक नहीं बना। दो वाक्य हटा दिए हैं। हमारे कुटुम्ब में, सर्वाधिक मानसिक तादात्म्य हम दोनों भाइयों में ही था। यह बात दादा खुद ही कहते थे। उसी आधार पर कह पा रहा हूँ कि मेरे इस दुस्साहसिक हस्तक्षेप पर दादा को कोई आपत्ति नहीं होती। इसके अतिरिक्त मैंने ‘प्रजातन्त्र’ को ‘लोकतन्त्र’ से विस्थापित कर दिया है। मेरा मानना है कि ‘प्रजा’ के आते ही ‘राजा’ अपने आप ही चला आता है। हम गणतान्त्रिक लोकतन्त्र में जी रहे हैं। राजा और प्रजा शब्द मुझे अवमाननाकारक लगते हैं। विश्वास करता हूँ कि मेरे इस हस्तक्षेप को पाठकों का भी स्वीकार मिलेगा।

इतना कुछ कहने के बाद भी लग रहा है कि काफी-कुछ कहना बाकी है। लेकिन अभी इतना ही। बस।

कल से  इन पत्रों को पढ़ि‍ए।
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‘बर्लिन से बब्बू को’ के कृपालु विज्ञापनदाता - 1. माइक्रो केमिकल्स (इण्डिया), मन्दसौर 2. संजय प्रिण्टर्स, मन्दसौर 3. पगारिया इंजीनीयर्स, नारायण गढ़ 4. अन्नपूर्णा टाकीज, मनासा 5. ठेकेदार किशन भाई वर्मा, नीमच 6. सन्तोषमल राजमल खाबिया मनासा/रामपुरा 7. रुलियामल लालचन्द अग्रवाल, नीमच 8. नरेन्द्र कुमार अग्रवाल एण्ड ब्रदर्स, पीपल्या मण्डी 9. रामगोपाल आशाराम मन्त्री, माहेश्वरी पूड़ी भण्डार, श्री राम लघु उद्योग, मनासा 10. दिलीप कुमार चिमनलाल बधवा, मनासा 11. दी जीवाजीराव शुगर कं. लि. दलौदा 12. ग्रामीण सेवा सहकारी समिति मर्या. चंदवासा 13. प्रकाशचन्द्र माँगीलाल हींगड़, सूरजमल बापूलाल हींगड़, मनासा 14. लक्ष्मी रेडियो एण्ड इलेक्ट्रिक कं., मनासा 15. दलित वर्ग संघ, मनासा 16. गाईड टेलर्स, मनासा 17. दुरग पुस्तकालय, मनासा 18. संकल्प (उदीयमान साहित्यकारों की संस्था), मनासा 18. प्रेस क्लब, मन्दसौर 19. नारायण एजेन्सीज, मन्दसौर 20. जीवनदास तुलसीराम पंजाबी, श्री लालजी बस सर्विस, मनासा 21. युवक काँग्रेस, बरखेड़ा राठौर (शामगढ़) 22. बटवाल ब्रदर्स, पीपल्या मण्डी 23. रमेशचन्द्र महेशचन्द्र अग्रवाल, मन्दसौर 24. बापूलाल जिनेन्द्रकुमार मानावत, जिनेन्द्रकुमार रमेशचन्द्र मानावत, मनासा 25. भवानीलाल नन्दलाल पामेचा, विजय ट्रेडिंग कं. मनासा, पामेचा वस्त्र भण्डार, पीपल्या मण्डी 26. भारत वॉच सर्विस, मनासा 27. अजीतकुमार बम्ब एण्ड कं., मनासा 28. मुस्लिम अंजुमन कमेटी, मनासा 29. सुरेश इलेक्ट्रिकल इण्डस्ट्रीज, नीमच 30. बीस सूत्री आर्थिक सहायता परिवार सहायक संस्था, मनासा 31. बंशीलाल धनोत्या एडव्होकेट, रतनलाल बम्ब एडव्होकेट, जिनेन्द्रकुमार मानावत, मनासा 32. राजस्थान खांडसारी शुगर मिल्स, माँडल (भालवाड़ा) 33. बापूलाल केशरीमल एण्ड कं., मनासा 34. विश्वनाथ राठी, एडव्होकेट, राठी इंजीनियर्स, मनासा 35. जय अम्बे इलेक्ट्रिक मोटर रिवाईण्डर्स, भाटखेड़ी (मनासा)


बर्लिन से बब्‍बू को - पहला पत्र : पहला हिस्‍सा 

यह पत्र और इन पत्रों की भूमिका, इण्टरनेट पर सर्वाधिक प्रसारित,लोकप्रिय व 
समृद्ध ई-पत्रिका ‘रचनाकार’ने भी प्रकाशित की है। इसे  यहाँ पढ़ा जा सकता है।



ईश्वर ने कहा -‘ऐसा ही लिखते रहो’

बीस जून बुधवार का लगभग पूरा दिन रोते-रोते ही बीता। दशा और मनोदशा कुछ ऐसी हो गई कि ‘सुबह सवेरे’ के लिए अपने स्तम्भ की सामग्री भी नहीं दे पाया। उल्लेखनीय बात यह रही कि रोने की शुरुआत दुःख से हुई और समापन सुख से। इसी कारण यह सब लिखने की स्थिति बनी।

दादा श्री बालकवि बैरागी के निधन पर अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए कृपालु अब भी आ रहे हैं। लेकिन वे प्रायः शाम/रात को आ रहे हैं। लेकिन बुधवार को यह आगमन सुबह से शुरु हो गया। ये सब  आत्मीय, अन्तरंग। परिजन समान। दादा को याद करते हुए लगभग सबके सब रोने लगे। मुझे तो उनसे पहले ही रोना आ गया। इनमें से एक बाबू भी रहा। वह अपनी अर्द्धांगिनी सुमिता के साथ आया था। उसकी दशा देख कर रोना कई गुना अधिक हो गया। वह पार्किंसन्स का मरीज हो गया है। वह देख नहीं पाता, स्पष्ट बोल नहीं पाता। अपने सारे कामों के लिए पराश्रित हो गया है। बाबू को मैंने सदैव दबदबे, रौब और एकछत्र शासक, नियन्त्रक की स्थिति, मुद्रा और दशा में देखा है। उसे ऐसी पराधीन दशा में देखना मेरे लिए मर्मान्तक पीड़ादायक होता है। मैं उससे आमने-सामने होने से बचता हूँ। लेकिन यह ऐसा प्रसंग था कि वह मुझ तक आने से खुद को रोक नहीं पाया। वह और सुमिता लगभग आधा घण्टा बैठे। लेकिन उसके जाने के बाद मैं अकेले में देर तक रोता रहा। ईश्वर सब पर कृपा करे।

लेकिन दिन ढलते-ढलते ईश्वर (यह ‘ऊपरवाला’ नहीं, धरती का, रतलाम में रहनेवाला ईश्वर है) आया तो उसकी बातों ने मानो चमत्कारी प्रभाव किया। वातावरण और मन हलका ही नहीं हुआ, विगलित और प्रफुल्लित कर गया। उसके जाने के बाद भी देर तक रोता रहा। लेकिन ‘उस’ रोने में  और ‘इस’ रोने में धरती-आकाश का अन्तर रहा। 

ईश्वर का उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग पर 24 दिसम्बर 2009 को
किया था। वह आलेख, साप्ताहिक उपग्रह के मेरे स्तम्भ ‘बिना विचारे’ में ‘छत्तीसवीं कौम’ शीर्षक से छपा था। ईश्वर ने ‘उपग्रह’ की प्रति अब भी सम्हाल रखी है। दस बरस से अधिक का वक्त हो गया है, बिजली से जुड़े मेरे सारे काम ईश्वर ही कर रहा है।

कोई दो बरस पहले वह आया था तो बातों-बातों में कहा था - ‘बाबूजी! आपके उस लेख ने मेरा बड़ा फायदा किया।’ मैंने ध्यान नहीं दिया था। यही माना था कि उस लेख का हवाला देकर लोगों ने उसकी प्रशंसा की होगी। लेकिन कुछ दिनों पहले उसने जब वही बात दोहराई तो मैंने पूछा - ‘कैसे? क्या फायदा हुआ?’ ईश्वर ने जवाब दिया - ‘बैंकवाले मेरा लोन पास नहीं कर रहे थे। मैंने आपका लेख बताया तो उन्होंने एक झटके में मेरा लोन पास कर दिया।’ मुझे अविश्वास और अचरज हुआ। भला बैंक का कोई अफसर किसी के लिखे के आधार पर लोन देता है? लिखे का ऐसा और इतना असर कैसे होने लगा! मैंने अविश्वास से देखते हुए कहा - ‘ऐसे नहीं। पूरी बात बता।’

ईश्वर ने जो कुछ कहा, वह लगभग इस तरह था -

“मैंने बैंक में लोन की अर्जी लगा रखी थी। बैंकवाले टल्ले दे रहे थे। मैं हर साल तीस-चालीस हजार का इनकम टैक्स भर रहा हूँ। अपने केदार वकील साब (रतलाम के अग्रणी प्रतिष्ठित आय कर सलाहकार श्री केदार अग्रवाल) के पास मेरी फाइल है। मैंने कहा कि मेरे गए पाँच-सात साल के इनकम टेक्स के सर्टिफिकेट देख लो। केदार सा’ब पूछ लो। लेकिन बैंकवाले मानने को तैयार नहीं। कहने लगे कि हम जानते हैं कि ऐसे सर्टिफिकेट कैसे बनते हैं। 

“बैंकवाले मेरी कोई बात सुनने को तैयार नहीं। और तो और, मेरी खेती के कागज भी देखने को तैयार नहीं। मैं कुछ भी कहूँ तो एक ही बात कहें - ‘इतनी बड़ी रकम यूँ ही दे दें?’ (ईश्वर ने लोन की रकम बताई तो मेरे भी हाथ-पाँव फूल गए। वह रकम मेरी तो सोच के भी बाहर थी। लोन की रकम और बैंक का नाम यहाँ जाहिर करने की इजाजत मेरा विवेक मुझे नहीं दे रहा।) जब मुझे लगा कि ये मुझे लोन नहीं देंगे और मुझे दूसरा बैंक देखना पड़ेगा तो मैंने कहा - ‘सिटी के बड़े-बड़े लोग मेरी और मेरे काम की बड़ाई करते हैं। मुझ पर लेख छापते हैं। और एक आप हो कि मुझ पर भरोसा ही नहीं करते!’

“मेरी बात बैंकवाले सा’ब को मजाक लगी। बोले - ‘अच्छा! अब तू इतना बड़ा आदमी हो गया कि तेरे पर लेख छपने लगे? जरा हम भी तो देखें कि किसने तेरा अभिनन्दन-पत्र छापा?’ मैंने कहा - ‘मुझे थोड़ा टाइम दो सा’ब! मैं घर से अखबार लाकर दिखाता हूँ।’

“मैं भाग कर घर आया। अखबार मैंने सम्हाल ही रखा था। निकाला और उल्टे पाँव बैंक पहुँचा और उनको अखबार पकड़ा दिया। उन्होंने अखबार देखा। उलटा-पलटा। सात बरस पुरान अखबार था बाबूजी! सा’ब ने आपका लेख पढ़ा। आपने तीन मिस्त्रियों के किस्से छापे थे। मेरा किस्सा सबसे पहला था। सा’ब ने ध्यान से पूरा लेख पढ़ा। फिर मेरी ओर देखा। उनकी तो नजरें ही बदल गई थी बाबूजी! खुश होकर बोले - ‘किसी मेकेनिक पर ऐसा लेख पहली बार देखा। जा! तेरा लोन पास किया।’ और बाबूजी! उन्होंने तो सच्ची में लोन पास कर दिया। एक झटके में। अब बताओ बाबूजी! आपके लेख से मेरा फायदा हुआ कि नहीं?”

ईश्वर जैसे-जैसे किस्सा सुनाता जा रहा था, वैसे-वैसे मेरी देह पर मानो चीटियों के रेंगने की गति बढ़ती जा रही थी। किस्से की वास्तविकता और बैंक अफसर के मन की बात ऊपरवाला ही जाने। मेरे सामने बैैठा धरतीवाला यह ईश्वर मुझे सचमुच में ऊपरवाला ईश्वर ही नजर आ रहा था। वह मेरे सामने, मेरी आँखों में आँखें डाल कर, मुझे ही सारी बात सुना रहा था और मैं बेभान, लगभग संज्ञा-शून्य बैठा था। वह कृतज्ञ और उपकृत भाव से मुझे देख रहा था। लेकिन मैं उसे नहीं देख पा रहा था। उसकी शकल धुँधलाती जा रही थी। मैं बोल नहीं पा रहा था। मुझे लग रहा था, मैं बुक्का फाड़कर रोने लगूँगा। मैं रोना नहीं चाहता था। कम से कम, उसके सामने तो नहीं ही। उसके सामने रोने में मुझे अपनी हेठी लग रही थी।

तनिक मुश्किल से मैंने खुद को संयत किया। याद आया, घर में बूँदी के लड्डू रखे हैं। मैंने डिब्बा उसके सामने बढ़ाया - ‘तेरी बात ने तबीयत खुश कर दी ईश्वर। ले! मुँह मीठा कर।’ उसने आज्ञाकारी भाव से लड्डू उठाया। तनिक संकोच से, लेकिन प्रमेपूर्वक खाया। मैंने उसे बिदा किया - ‘भगवान तुझ पर ऐसी ही कृपा बनाए रखे। लेकिन याद रखना! इसमें मेरा कुछ नहीं। यह तेरी मेहनत, तेरी ईमानदारी और मेरी भलमनसाहत का ही फल है। ऐसा ही बना रहना।’

विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर वह चला गया। मैं अन्दर आया। दरवाजा बन्द करते-करते मेरी रुलाई फूट पड़ी। उसे लगा, वह मेरी वजह से निहाल हो गया। लेकिन सच तो यह है कि वह साक्षात ईश्वर ही था जो मुझे निहाल कर गया।

मैं देर तक रोता रहा। रोना रुका तो विचार आने लगे। लगभग साठ-पैंसठ बरस से, अपने स्कूली दिनों से लिख रहा हूँ। दो-एक छुटपुट ऐसे प्रसंग आए थे जिनमें मेरे लिखने से कथा नायकों को सहायता मिली थी। लेकिन वह लापरवाही की उम्र थी। उन घटनाओं का नोटिस ही नहीं लिया। लेकिन इस घटना ने मुझे झकझोर दिया। 

मुझे लग रहा है, ईश्वर को लोन की पात्रता है, यह अनुभव तो बैंक अफसर को, ईश्वर के कागज देख कर, पहली ही नजर में हो गया होगा। लेकिन ईश्वर के रहन-सहन, उसके पास कोई सिफारिश न होना, उसकी अतिशय विनम्रता ने बैंक अफसर को आश्वस्त नहीं किया होगा। वह आँकड़ों से अलग और आगे बढ़कर ईश्वर की (लोन लौटाने की) विश्वसनीयता टटोल रहा होगा। मेरे लेख ने शायद उसे ईश्वर को भरोसेदार आदमी मानने की जमीन दे दी होगी। ईश्वर को लोन तो उसकी पात्रता और अधिकार के आधार पर ही मिला। लेकिन मेरे लिखे ने उसके लोन केस में वह उपलब्ध करा दिया जो कागजों में नहीं आ सकता था।

मैं प्रायः ही, ऐसी ‘छोटी-छोटी’ बातों को उठाता रहता हूँ। इसके पीछे मेरा यह सोच है कि जिसे हम ‘छोटी सी बात’ मान कर उपेक्षित कर देते हैं वह वस्तुतः छोटी नहीं होती। 

मुझे यह भी लगता है कि हमारे मन से प्रशंसा भाव तिरोहित होता जा रहा है। किसी की प्रशंसा करने में हमें अपनी हेठी लगती है। लगता है, हम छोटे हो जाएँगे। सम्भवतः इसी के चलते हम बुरी खबरों से घिर गए हैं। लगता है, दुनिया में अच्छाई, भलाई रही ही नहीं। जबकि ऐसा नहीं है।

धरतीवाले इस ईश्वर ने मेरे इसी सोच को ताकत दी। हम किसी के लिए सहायक हो जाएँ, यही बहुत बड़ी बात है। और यदि किसी के लिए उपयोगी हो जाएँ तो क्षणांश को ही सही, जीवन सफल और धन्य लगता है। मैं जीवन की इसी, क्षणांश की सफलता और धन्यता से खुश हूँ। 

धरतीवाले इस ईश्वर का काम तो होना ही था। मेरा लिखना तो बहुत ही छोटा निमित्त बना। ऊपरवाले ईश्वर ने मुझे यह निमित्त बना कर मुझ पर केवल कृपा ही नहीं की, सम्भवतः अपनी इच्छा भी जताई - ऐसा ही लिखते रहो।

मुझे यह इच्छा-पालन करना ही है।
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