हमारी हिन्दी: हम केवल चिन्ता करते हैं

हिन्दी दिवस पर मुख्य अतिथि बनने के, दो संस्थाओं के न्यौतों को अस्वीकार कर दिया। अब जी ही नहीं करता ऐसे आयोजनों में जाने का। सब कुछ खानापूर्ति, औपचारिकता, नकली, बनावटी लगता है। ऐसे आयोजनों में शामिल लोगों की हँसी और हिन्दी की दुर्दशा पर उनका विलाप-प्रलाप भी नकली, खुद से बोला जा रहा झूठ लगता है। हर कोई हिन्दी की दुर्दशा के प्रति क्षोभ और आक्रोश तो जताता है लेकिन जब खुद कुछ करने की बात आती है तो मानो लकवा मार जाता है।

अपने छुट-पुट शारीरिक कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भाई ओम चौरसिया के योग केन्द्र का लगभग नियमित लाभार्थी हूँ। जिस खेप में मैं जाता हूँ उसमें आठ-दस लोग हैं। तीन दिन पहले एक ने कहा - “हिन्दी की तो ऐसी-तैसी करके रख दी है लोगों ने। एक ने अपने मकान का नाम ‘माँ की दूआ’ लिखा है। उसे ‘दुआ’ और ‘दूआ’ का फर्क ही नहीं मालूम।” सब खुल कर हँसे। मैं चुप था। एक ने मुझे उकसाया - ‘कमाल है! आपने कुछ नहीं कहा! आपको तो सबसे पहले बोलना था।’ मैंने उसी से पूछा - ‘आपने अपने मकान पर नाम लिखवा रखा है?’ जवाब हाँ में आया। मैंने पूछा - ‘हिन्दी में लिखवाया है?’ कोई जवाब नहीं आया। मैंने कहा - ‘कोई बात नहीं। अब उसे हिन्दी में लिखवा लीजिए।’ तुरन्त जवाब आया - ‘ऐसे कैसे लिखवा लूँ? सीमेण्ट से लिखवा रखा है! हिन्दी में लिखवाने पर तो दो-चार हजार का फटका लग जाएगा।’ मैं चुप रहा। बाकी सब भी चुप रहे। शायद सबने ऐसा ही कुछ कर रखा होगा। मैंने पूछा - ‘चलो! कोई बात नहीं। लेकिन आप दस्तखत हिन्दी में करते हो?’ जवाब, झेंप भरे ‘नहीं’ में आया। मैंने कहा - ‘हिन्दी में दस्तखत करने में तो एक पैसे का भी फटका नहीं लगेगा। आप हिन्दी में दस्तखत करना शुरु कर दीजिए।’ इस बार अधिक झेंप भरा जवाब आया - ‘बहुत मुश्किल है। उसकी तो आदत ही नहीं।’ 

कभी किसी बोली के तो कभी किसी भाषा के विलुप्त होने की जानकारी आए दिनों विभिन्न स्तर के सर्वेक्षण देते हैं। पहले मुझे ये सच नहीं लगते थे। लेकिन अचानक ही अपने आसपास नजर गई तो इन सूचनाओं पर विश्वास करना पड़ा। मैं तीन परिवारों से चार बोलियों को लुप्त होते देख रहा हूँ। दो परिवार तो मेरे बेटों के ही हैं। बड़े बेटे का सुसराल निमाड़ अंचल में है। यह दम्पति अब न तो मालवी में बात करता है न ही निमाड़ी में। हिन्दी में ही बतियाता है। इनका बेटा (हमारा पोता) कभी निमाड़ी और/या मालवी बोली के बारे में शायद ही जान पाए। स्कूल में वह अंग्रेजी वातावरण में ही रहता है। इस परिवार से दो समृद्ध बोलियाँ बिदा हो रही हैं।

दूसरा परिवार मेरे छोटे बेटे के ससुराल का है। समधी दिनेशजी चौरसिया बृज पृष्ठभूमि के हैं और समधन रीनाजी पंजाबी पृष्ठभूमि की। इनकी बहू आरती मालवी पृष्ठभूमि की। कहने को यह परिवार तीन-तीन बोलियों से जुड़ा है लेकिन पूरा परिवार हिन्दी में ही संवाद करता है। इस परिवार में न तो बृज बोली जाती है, न पंजाबी न ही मालवी। 

तीसरा परिवार मेरे छोटे बेटे का है। वह मालवी पृष्ठभूमि का है। बहू नन्दनी (चौरसिया परिवार की बेटी) की अपनी कोई बोली नहीं रही। यह दम्पति भी हिन्दी में बात करता है। हम जब भी इनके पास जाते हैं तो नन्दनी, विस्फारित नेत्रों से हम पति-पत्नी को मालवी में बात करते देखती है। इन तीनों परिवारों की पृष्ठभूमि में सम्पन्न बोलियाँ हैं लेकिन अब एक भी बोली इन परिवारों नहीं रही। 

मैं यथा सम्भव मालवी में ही बात करने की कोशिश करता हूँ। मालवी में बात शुरु करते ही सामनेवाला ‘सहज’ से आगे बढ़कर ‘आत्मीय’ हो जाता है। आत्मीयता के साथ-साथ मिठास अपने आप चली आती है। रतलाम में तो मुझे हर बार मालवी में ही जवाब मिलता है लेकिन रतलाम से बाहर (मालवा में ही) ऐसा नहीं होता। इन्दौर में मेरा डेरा, बंगाली चौराहे के पास, सर्व सुविधा नगर में रहता है जबकि मेरे मिलनेवाले राजवाड़ा से आगे के इलाकों में। मुझे सिटी बस में यात्रा करना अच्छा लगता है। कनाड़िया सड़क से महू नाका और फिर उससे आगे वैशाली नगर तक मैं एक लघु भारत के साथ यात्रा कर लेता हूँ। मालवी तो बनी ही रहती है, भोजपुरी, अवधि, बुन्देली, पूरबी, मराठी, गुजराती भी खूब सुनने को मिलती है। कभी-कभार हिम्मत करके मैं बीच में, मालवी में ही कूद पड़ता हूँ। अपनी-अपनी बोली में बतिया रहे गैर मालवी लोग स्वाभाविक ही मुझे हिन्दी में जवाब देते हैं। लेकिन मालवी में बतिया रहे लोग भी हिन्दी में जवाब देते हैं। मेरी मन्दसौरी-रतलामी मालवी और इन्दौरी मालवी में उन्नीस-बीस का अन्तर है। इस उम्मीद में कि मुझे मालवी में जवाब मिलेगा, मैं बिना बात के बात बढ़ाने की कोशिश करता हूँ। लेकिन जवाब हिन्दी में ही आता है। हिन्दी भी अंग्रेजी चाशनी से लिपटी। 

बंगाली चौराहे का और तिलक नगर का सब्जी बाजार भी लघु भारत अनुभव होता है। वहाँ मालवी में भाव-ताव करता हूँ तो पहली बार तो हिन्दी में ही जवाब मिलता है। दूसरी बार में मालवी आ जाती है। लेकिन इन बाजारों में मालवी बोलनेवाले दुकानदार धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। लेकिन शास्त्री पुल पार करते ही बोलियों की विविधता छँट जाती है और मालवी सवाल का जवाब हर बार मालवी में ही मिलता है। यह दशा ठेठ वैशाली नगर तक बनी रहती है।

लेकिन व्यापारिक सन्दर्भों में ऐसा बिलकुल ही नहीं है। वहाँ अंग्रेजी ही अंग्रेजी है। दुकानों के नाम या उनके कागज-पत्तर, सब अंग्रेजी में। एक दुकान पर बड़ा मजा आया। दुकान का साइन बोर्ड अंग्रेजी की चौथी बारहखड़ीवाली लिपि में था। कलाकार ने मानो अपनी समूची प्रतिभा झोंक दी थी। संयोग से मुझे उसी दुकान में जाना पड़ा। दुकान के नाम और भीतरी व्यवस्था में बड़ा विरोधाभास था। दुकान में नजर आ रहे धार्मिक चित्र/प्रतीक, दुकान के नाम से कहीं भी मेल नहीं खा रहे थे। मैंने पूछा - “यह क्या? दुकान पर नाम तो ‘बाबूअली’ लिखवाया है और मूर्ति भगवान महावीर की!” दुकानदार चौंका। उसने बाहर आकर, दुकान से दूर जाकर, साइन बोर्ड पढ़ा। लौट कर तनिक चिन्ता से बोला - “आप ठीक कह रहे हो। मैंने लिखवाया तो ‘बाहुबली’ था। लेकिन आपने कहा तो मुझे भी ‘बाबूअली’ ही नजर आया। आज ही दुरुस्त करवाता हूँ।” मैंने कहा - ‘दुरुस्त करवा ही रहे हैं तो हिन्दी में लिखवा लेना। तब लोग गलत नहीं पढ़ेंगे।’ दुकानदार ने विनम्रता से धन्यवाद देते हुए कहा - ‘बिलकुल। अब हिन्दी में ही लिखवाऊँगा।’ इस घटना के अपने-अपने भाष्य किए जा सकते हैं। अपनी भाषा की उपेक्षा के खतरे असीमित होते हैं।

हिन्दी आज वहीं है जहाँ हम उसे ले आए हैं। हम इसकी दुर्दशा से दुःखी तो होते हैं किन्तु खुद कुछ नहीं करना चाहते। हिन्दी अखबारों ने हिन्दी का सर्वाधिक नुकसान किया है और किए जा रहे हैं। बची-खुची कसर, रोमन में हिन्दी लिखने का चलन पूरी कर रहा है। 

हिन्दी और अपनी बोलियों के प्रति यदि हमारा यही चाल-चलन रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम संकेतों और चिह्नों से ही खुद को व्यक्त करते नजर आएँगे। फेस बुक और वाट्स एप ने यह शुरुआत कर दी है। हमारी पीढ़ियाँ हमारी भाषाओं, बोलियों और लिपियों को संग्रहालयों में देखने-सुनने जाया करेंगी।

संस्कार, वे चाहे भाषायी हों या सांस्कृतिक, सदैव घर से शुरु होते हैं और उनका सार्वजनिक आचरण ही उन्हें पुष्ट, दृढ़ और हमारी पहचान बनाता है।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 13 सितम्बर 2018

नोटबन्दी: इसमें देश कहीं नहीं था

नोटबन्दी की विफलता का बचाव करते हुए वित्त मन्त्री अरुण जेटली सच ही कह रहे थे कि नोटबन्दी का मकसद यह देखना नहीं था कि बन्द किए गए नोटों में से कितने नोट वापस आएँगे। यह कहते हुए वे यह भी कह रहे थे कि आठ नवम्बर 2016 की रात को, नोटबन्दी की घोषणा करते हुए प्रधान मन्त्री मोदी झूठ बोले थे कि नोटबन्दी का लक्ष्य  आतंकवाद, नकली मुद्रा, काले धन और भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना था। आँकड़े और जमीनी वास्तविकताएँ बता रही हैं कि जेटली ही सच्चे हैं, प्रधान मन्त्री नहीं। नोटबन्दी का लक्ष्य देश की बेहतरी नहीं था।

तब, क्या था नोटबन्दी का लक्ष्य?

वही, जो मेरे एक सीए मित्र ने मुझे, नोटबन्दी की घोषणा के अगले दिन, नौ नवम्बर को बताया था। 

सरकारों की आर्थिक नीतियों/निर्णयों का राजनीतिक भाष्य करने के शौकीन इन सीए मित्र ने कहा था ‘यह नोटबन्दी राजनीति है बैरागीजी! जोरदार राजनीति। मुद्दा यूपी का चुनाव है। यूपी में सपा, बसपा, काँग्रेस सबकी खाट खड़ी हो गई है। भाजपा सबका सूपड़ा साफ कर देगी।’ मुझे बात न तो समझ पड़ी थी न ही इसे राजनीतिक कदम मानने को तैयार हुआ था। मेरा विश्वास रहा है कि राजनीतिज्ञ कितना ही टुच्चा, घटिया, झूठा, दम्भी हो, पार्टी या राजनीति के लिए देश को तो दाँव पर कभी नहीं लगाएगा। नोटबन्दी के बाद फैली अफरा-तफरी, अपना ही पैसा पाने के लिए तड़पते, तरसते, करुण क्रन्दन करते, अपनी बेटियों के हाथ पीले करने के लिए पाई-पाई को मोहताज हो गए, पैसों के अभाव में ईलाज हासिल न करने से मर गए लोगों को, बैंकों के सामने लाइन में लगे मरते लोगों को देख-देख कर, उनके बारे में सुन-सुन कर, पढ़-पढ़ कर भी मैं नोटबन्दी को राजनीतिक फैसला मानने को कभी तैयार नहीं हुआ। फिर, ‘संघ’ और भाजपा तो ‘दल से पहले देश’ की दुहाई देते हैं! ये भला अपने राजनीतिक लाभ के लिए देश को दाँव पर कैसे लगा सकते हैं?

लेकिन धीरे-धीरे सामने आई, आती रही वास्तविकताओं से मोह भंग होने लगा। सरकार द्वारा जारी किए गए, दो हजार के जाली नोट तो नोटबन्दी की अवधि में ही काश्मीर में आतंकियों से बरामद हो गए। आठ नवम्बर को नोटबन्दी की घोषणा हुई और नवम्बर समाप्त होते-होते ही 155 बड़ी आतंकी घटनाएँ हो गईं। 2017 में ये बढ़कर 184 हो गईं और 31 जुलाई 2018 तक 191 घटनाएँ हो गईं। आतंकियों के हाथों हमारे जवानों का मरना जारी रहा।

भ्रष्टाचार के मामले में हमारी दशा तो बद से बदतर हो गई। ट्रांसपरेंसी इण्टरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, भ्रष्टाचार के मामले में, 2017 में दुनिया के 175 देशों में हमारा स्थान 79वाँ था जो 2018 में 81वाँ हो गया। 

जाली नोटों के मामले में, आतंकवादी हमें असफल साबित कर ही चुके थे। देश में भी ‘कलाकारों’ ने हमें धूल चटा दी। सरकारी रिपोर्टों के अनुसार 2016-17 में देश में 2000 के 638 नकली नोट बरामद हुए थे। 2017-18 में यह संख्या बढ़कर 17,929 हो गई। 

काले धन के मामले में तो न केवल सरकार की बल्कि हमारे देश की, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जोरदार किरकिरी हो गई। बन्द किए नोटों के मूल्य के 99.3 प्रतिशत नोट वापस आ गए! सरकारी आँकड़ों के मुताबिक केवल 10,270 हजार करोड़ रुपये ही वापस नहीं आए। लेकिन इस रकम को भी पूरी तरह काला धन नहीं कह पा रहे क्योंकि नेपाल-भूटान में अभी भी हमारे पुराने नोट चल रहे हैं। नौ दिसम्बर 2016 को सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को अपना अनुमान बताया था कि नोटबन्दी से तीन से चार लाख करोड़ रुपयों के नोट वापस नहीं आएँगे। अब जेटली कह रहे हैं कि नोटबन्दी का लक्ष्य यह देखना नहीं था कि कितने नोट वापस आएँगे। सच यही है। नोटबन्दी का लक्ष्य यह नहीं था।

वापस आए नोटों की संख्या का समाचार 30 अगस्त को सामने आया तो मेरे ज्ञान-चक्षु खुले। मैंने उन सीए मित्र को फोन लगाया। वे बाहर थे। मैंने पूछा - ‘आपने कैसे कहा था कि नोटबन्दी का मुद्दा यूपी चुनाव हैं?’ वे बोले - ‘मुझे पता था, आप फोन करोगे ही करोगे। अभी बाहर हूँ। सोमवार रात को आऊँगा। मंगलवार को बात करेंगे।’

बड़ी ही आकुलता में बीते मेरे ये पाँच दिन। मंगलवार (4 सितम्बर) की सुबह, उन्हें फोन किए बिना ही उनके यहाँ पहुँच गया। वे उठे-उठे ही थे। खुलकर हँसते हुए अगवानी की। मुझसे रहा नहीं जा रहा था। बैठते-बैठते ही पूछताछ शुरु कर दी। और जोर से हँसते हुए बोले - ‘अरे! इतनी भी क्या जल्दी? इस उमर में ऐसी बेकरारी शोभा नहीं देती। सब बताता हूँ। बैठिए तो सही!’ 

उनके मुताबिक राजनीति उनका विषय नहीं है न ही इसमें उन्हें दिलचस्पी है। सीए होने के कारण सरकार की आर्थिक नीतियों/निर्णयों पर उनकी नजर रहती है। इसीलिए इन नीतियों/निर्णयों के राजनीतिक प्रभावों का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं। नोटबन्दी के राजनीतिक आयाम भी इसी तरह देखने की कोशिश की थी। नोटबन्दी की घोषणा के ‘टाइमिंग’ से उन्होंने अनुमान लगाया और यह मात्र संयोग ही रहा कि कड़ियाँ एक के बाद एक, कुछ ऐसी जुड़ती गईं कि उनका अनुमान  सही निकला।

उन्होंने सविस्तार पूरी कहानी सुनाई। मौजूदा सरकार में अब सीबीआई इकलौता तोता नहीं रह गया। संवैधानिक संस्थाएँ एक के बाद एक ‘तोता-दशा’ प्राप्त करती जा रही हैं। सो, यूपी के चुनावों का पूरा खाका सरकार के पास था ही। आठ नवम्‍बर की रात को नोटबन्दी की घोषणा के कारण जेब में पड़ा पैसा अप्रभावी-अनुपयोगी हो गया। बैंकों से लेन-देन की सीमा लगा दी गई। 27 दिसम्बर को, बसपा के पार्टी फण्ड में जमा 104 करोड़ रुपयों की जाँच शुरु कर दी गई। 17 जनवरी को यूपी विधान सभा चुनाव घोषित हो गए। मँहगी रैलियाँ हों या साधन-संसाधन, हर मामले में भाजपा ही भाजपा थी। भाजपा के 30 से अधिक हेलिकाफ्टर उड़ रहे थे। बाकी पार्टियों के पास 10 भी नहीं थे। ‘आपको याद होगा, तब अखबारों में भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए खरीदी गई, पार्टी के रंग और चुनाव चिह्नवाली सैंकड़ों मोटर सायकिलों के फोटू छपे थे। ये सब नोटबन्दी से पहले ही खरीद ली गईं थीं।’ 12 मार्च को यूपी विधान सभा चुनाव परिणाम आए। भाजपा ने सबका सूपड़ा साफ कर दिया। इसके ठीक अगले ही दिन, 13 मार्च को चुनाव आयोग ने घोषणा की कि बसपा के पार्टी फण्ड के 104 करोड़ रुपयों के मामले में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई। और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि 13 मार्च को,  यूपी विधान सभा चुनाव परिणाम घोषित होने के अगले ही दिन, रिजर्व बैंक ने बैंकों से रकम निकासी सीमा पर लगाया प्रतिबन्ध हटा लिया।
उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए खरीदी गई मोटर सायकिलों 
का ऐसा ही चित्र उन दिनों अखबारों में छपा था।  यह चित्र फेस बुक से 05 सितम्बर को लिया गया है।  


सीए मित्र की बातें सुनते-सुनते मुझे भी कुछ बातें याद आने लगीं। नोटबन्दी के बाद दिल्ली के मुख्य मन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने एक चैनल पर बैंकों के आँकड़े दिए थे जिनके मुताबिक 2016 की, जुलाई-सितम्‍बर वाली दूसरी तिमाही में बैंकों में जमा धन, पूर्व वर्षों की इसी  समयावधि के मुकाबले कई गुना अधिक था। केजरीवाल का दावा था कि नोटबन्दी की पूर्व सूचना मिलने के बाद भाजपा ने ही यह धन जमा कराया था। यह भी याद आया कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अध्यक्षतावाले सहकारी बैंक में बहुत बड़ी संख्या में (सम्भवतः भारत के किसी भी सहकारी बैंक में सबसे ज्यादा) पुराने नोट जमा किए गए थे। यह भी याद आया कि स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा धन में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह याद आते-आते जेटली का वह वक्तव्य भी याद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि स्विस बैंकों में भारतीयों का जमा धन सारा का सारा काला धन नहीं कहा जा सकता।     

पूरी कहानी सुनते-सुनते मुझे, अपने स्कूली दिनों में पढ़े हुए, कर्नल रंजीत के जासूसी उपन्यास याद आ गए। जिसे सारा देश राष्ट्र सेवा मान रहा था, अपना ही पैसा पाने के लिए, लाइनों में लगे, एड़ियाँ रगड़ते-रगड़ते मर गए लोगों के परिजनों को सीमा पर शहीद हुए जवान याद दिलाए जा रहे थे, वह सब झूठ, छलावा था! इस सबमें देश कहीं नहीं था! देश के लिए राजनीति थी या राजनीति के लिए देश को काम में ले लिया गया! 

मैं आर्थिक मामलों का जानकार नहीं। लेकिन नोटबन्दी की विभीषिका एक सच है। उस पर, ‘कर्नल रंजीत’ की तरह मेरे इन सीए मित्र का दिया यह ब्यौरा! जहाँ चश्मदीद गवाह न हों, दस्तावेजी सबूत न हों, वहाँ परिस्थितिजन्य साक्ष्य बोलते हैं। 

तो क्या ‘दल से पहले देश’ वाला मुहावरा उलट दिया गया था? जेटली यही तो नहीं कह रहे थे?
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 06 सितम्बर 2018



पुलिसवाले तो पैसे लेते हैं सर! देते नहीं

लोकोक्तियाँ एक दिन में नहीं बनतीं। पीढ़ियों के अनुभवों
का निचोड़ होती हैं लोकोक्तियाँ। प्रत्येक लोकोक्ति के अपवाद जरूर मिल जाएँगे लेकिन इस बात का क्या कीजिए कि अपवाद सदैव सामान्य नियमों की ही पुष्टि करते हैं। ऐसी ही एक लोकोक्ति है - ‘पुलिस वालों की न दोस्ती अच्छी न दुश्मनी।’ सारी दुनिया की छोड़ दीजिए, अनेक पुलिसवालों को यह लोकोक्ति उच्चारते हम सबने सुना होगा - कभी परिहास में तो कभी चेतावनी की तरह। लेकिन सबके अपने-अपने अनुभव होते हैं। पुलिसवालों को लेकर मेरे भी अनेक अनुभव हैं। लोकानुभवों पर सवाल उठाए बिना कह पा रहा हूँ, मेरे ये सतरंगी अनुभव सुखद अधिक रहे हैं। दुःखद अनुभव अपवाद ही रहे।

हम बीमा एजेण्टों को कभी-कभार दफ्तर की प्रक्रियाओं के जुर्माने भुगतने पड़ते हैं। कभी हँस कर तो कभी दुःखी होकर हम लोग ये जुर्माने कबूल कर लेते हैं। लेकिन कभी-कभी स्थिति होती है कि जुर्माना हमारी सामान्य सामर्थ्य से बाहर हो जाता है। तब प्रक्रिया में चूक करनेवाले कर्मचारी पर बन आती है और जुर्माना उसे चुकाना पड़ता है। लेकिन तब ऐसी स्थिति में  एजेण्ट प्रायः ही स्वैच्छिक स्तर, प्रसन्नतापूर्वक उस कर्मचारी के जुर्माने में आंशिक भागीदारी कर लेता है।

जुर्माने की यह स्थिति तब बनती है जब दफ्तर की किसी चूक के कारण किसी पालिसीधारक को अधिक भुगतान कर दिया जाता है। विशेषतः पॉलिसी के अन्तिम/परिक्वता भुगतान के समय। यह जानकारी ऑडिट के समय सामने आती है। ऑडिट पार्टियाँ चार-पाँच दिनों के लिए आती हैं। ऑडिट चलने के दौरान ही ये गलतियाँ मालूम हो जाती हैं। यदि ये गलतियाँ ऑडिट रिपोर्ट में शामिल हो जाएँ तो दफ्तर की ‘रेटिंग’ बिगड़ जाती है। इसलिए दफ्तर की कोशिश होती है कि ऑडिट रिपोर्ट बनने से पहले, अधिक भुगतान की गई ऐसी रकम जमा करा दी जाए। चूँकि पॉलिसी पूरी हो चुकी होती है इसलिए अपना भुगतान मिलने के बाद ग्राहक द्वारा अपनी ओर से, दफ्तर से सम्पर्क करने की सम्भावनाएँ पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं। कानूनी प्रक्रिया तो यह है कि दफ्तर उस ग्राहक को पत्र लिख कर अधिक भुगतान की गई रकम वापस जमा करने के लिए कहे। लेकिन  पत्र लिखने में ही इतना समय लग जाता है कि ऑडिट पार्टी के लौटने का दिन आ जाता है। तब, सम्बन्धित एजेण्ट से मदद का ‘आग्रह’ किया जाता हैै। हमारे काम की प्रकृति ही ऐसी है कि हम एजेण्टों को कुछ न कुछ ‘पाप’ करने ही पड़ते हैं। कुछ तो ऐसे ‘पापों’ का अपराध बोध और कुछ यह कि दफ्तर से काम तो रोज-रोज पड़ता है। थोड़ी राहत यह कि यह रकम सामान्यतः एजेण्ट की ‘सहन शक्ति की सीमा’ में होती है। सो एजेण्ट प्रायः ही अपनी जेब से यह रकम जमा कर देते हैं और ऑडिट रिपोर्ट में दफ्तर की रेटिंग बिगड़ने से जाती है।

ऐसा ही एक मामला मेरे ग्राहक का सामने आया। लेकिन रकम थी - पूरे साढ़े सात हजार रुपये। मेरी भी सहन शक्ति से बाहर और बाबू की सहन शक्ति से भी। लेकिन, रकम जमा करने के लिए मुझसे कहे कैसे? एक तो मैं मेरी शाखा का सबसे पुराना एजेण्ट। दूसरा सबसे बूढ़ा एजेण्ट भी। तीसरा, मेरा ‘पत्थर मार’ स्वभाव। चौथा और सबसे बड़ा कारण - मैं रतलाम से बाहर और मेरी वापसी, ऑडिट पार्टी की वापसी के बाद। तनिक हिम्मत जुटाकर, बहुत ही हिचकिचाते हुए सम्बन्धित कर्मचारी ने मुझे फोन किया। रकम सुनकर मैंने अविलम्ब इंकार कर दिया। मेरी ओर से मामला खत्म हो गया।

लौटा तो मालूम हुआ कि यह वसूली ऑडिट रिपोर्ट में शामिल कर ली गई थी। सम्बन्धित कर्मचारी से मिला तो वह दोहरा घबराया हुआ। केवल रकम के आँकड़े से ही नहीं, ग्राहक के कारण भी। ग्राहक, एक सेवा निवृत्त पुलिस उप अधीक्षक। एक तो पुलिसवाला, ऊपर से डिप्टी एसपी! कर्मचारी ने जुर्माने को अपनी नियती मान लिया। 

लेकिन तभी सहा. प्रशासकीय अधिकारी ने दखल दिया। उन्हें लगा कि रकम तय करने में ऑडिटर ने चूक की है। उनके हिसाब से यह रकम ढाई हजार होनी थी। उन्होंने अपने हिसाब से गणना के ब्यौरे ऑडिट विभाग को भेजे। विभाग ने अपनी चूक मानी और वसूली साढ़े सात हजार से ढाई हजार पर आ गई। हम सबकी सहानुभूति कर्मचारी के साथ थी। उसने घपला तो किया नहीं था! मैंने ग्राहक का नाम पूछा। (तब तक मुझे केवल रकम बताई गई थी, ग्राहक का नाम नहीं।) नाम सुनकर मैं बल्लियों उछल पड़ा। वे मेरे अच्छे मित्र निकले। मैं उन्हें तब से जानता हूँ जब वे उप निरीक्षक (सब इंस्पेक्टर) थे। नाम है - श्री ए. पी. तोमर। रेकार्ड में श्री अनंग पाल सिंह तोमर और दुनियादारी में श्री आनन्द पाल सिंह तोमर। वे खण्डवा में हैं। बहुत ही शानदार आदमी। उनसे बात किए बिना ही मैंने सबको भरोसा दिला दिया कि वे रकम लौटा देंगे। कर्मचारियों ने अविश्वास और हैरत से कहा - ‘लौटा देंगे! आप कैसे कह रहे हैं? आपने बात कर ली उनसे?’ मैंने बताया कि वे ऐसे आदमी हैं जिनसे बात किए बिना ही उनकी ओर से वादा किया जा सकता है। और अधिक अविश्वास और अचरज से मित्रों ने पूछा - ‘क्या बात कर रहे हैं आप? वो पुलिसवाले हैं! पुलिसवाले तो पैसे लेते हैं सर! देते नहीं।’ मैंने हँस कर, उसी बेफिक्री से कहा - ‘आप सच कह रहे हैं। लेकिन मैं भी सच कह रहा हूँ। तोमर सा‘ब मेरे कहते ही पैसे लौटा देंगे।’ सुनकर सब खुश तो हुए लेकिन विश्वास किसी को नहीं हुआ। मानो चुनौती दे रहे हों, कुछ इस तरह बोले - ‘देखते हैं सर!’

मैंने उसी क्षण तोमर सा‘ब को फोन लगाया। पूरी बात बताई और कहा - ‘एलआईसी ऑफ इडिया के नाम पर ढाई हजार का चेक भिजवा दीजिए।’ तोमर सा‘ब ने जवाब दिया - ‘मैं ब्लेंक चेक भेज रहा हूँ। रकम आप भर लेना और मुझे फोन पर बता देना।’ मैंने पूछा - ‘चेक कब तक भेज देंगे?’ उधर से जवाब आया - ‘अब आज तो नहीं भेज पाऊँगा। लेकिन कल पक्का भेज दूँगा। स्पीड पोस्ट से। भेजने का काम मेरा। आप तक पहुँचाने का काम पोस्ट ऑफिस का।’ धन्यवाद देकर मैंने फोन बन्द कर दिया। मुझे घेरे हुए कर्मचारी मित्रों ने अविश्वास से पूरा संवाद सुना।

डाक वितरण व्यवस्था की मौजूदा दशा के आधार पर मेरा अनुमान था कि चेक आने में सात दिन तो लग ही जाएँगे। लेकिन मेरे अनुमान को ध्वस्त करते हुए डाक विभाग ने चौथे ही दिन चेक पहुँचा दिया। चेक लेकर मैं दफ्तर पहुँचा तो सबने उस चेक को हाथ में ले-ले कर दुनिया के आठवें अजूबे की तरह देखा।

सम्बन्धित कर्मचारी गद्गद और विह्वल था। वह मुझे बार-बार धन्यवाद दिए जा रहा था। मैंने रोका और पूछा - ‘अब बोलो! क्या राय है? पुलिसवाले पैसे देते हैं कि नहीं?’ उसने छूटते ही, बिना विचारे (विदाउट थॉट) मासूमियत से जवाब दिया - ‘सर! वो आपको देते हैं। सबको नहीं।’

यह जवाब, लाजवाब था। जोर का ठहाका लगा। सब इस ठहाके में शरीक थे। मैं भी।
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खुद पर हँसने का हासिल

दो दिन मैं खूब हँसा। किसी और पर नहीं, खुद पर ही।  लेकिन खुल कर नहीं। कुछ इस तरह कि हँसी दिखाई भले ही दे लेकिन सुनाए किसी को नहीं।

केमरा मुझे बचपन से ही अपनी गिरफ्त में लिए हुए है। छुपाए जाने वाले इश्क की तरह। कभी धन की कमी तो कभी वक्त की। यूँ तो जिन्दगी आसान ही बनी रही किन्तु इतनी भी नहीं कि दुनिया को भूल कर केमरा थाम लूँ। हाँ, लेकिन यह जरूर हुआ और लगातार होता रहा कि जब-जब जिन्दगी ने मौका दिया, केमरे को सहला लिया।

आग्फा क्लिक-III मेरा पहला केमरा था। बड़ी ही मुश्किलों में खरीदा था। लेकिन एक तो उससे जुड़े रीलों, रीलों की धुलाई, फोटुओं की बनवाई के खर्चों ने दिमाग दुरुस्त कर दिया और दूसरे, बाल-बच्चेदार बैरागी को जिन्दगी ने तनिक अधिक व्यस्त कर दिया। 

लेकिन चार बरस पहले अचानक ही केमरा खरीदने की मरोड़ें उठने लगीं। खुद को ही कोई कारण और औचित्य नजर नहीं आ रहा था केमरा खरीदने का। महीनों तक द्वन्द्व चलता रहा। इस बार यह द्वन्द्व बुद्धि और विवेक के बीच नहीं, मन और विवेक के बीच था। बुद्धि जब-जब भी बीच में आई, मन ने झिड़क दिया। विवेक समझाता रहा लेकिन मानना तो दूर, मन तो सुनने को ही तैयार नहीं हुआ। मन इतना बदमाश बना रहा कि किसी और से पूछने, सलाह लेने से भी रोके रखा। कम से कम चार महीनों तक यह बेकली, बेचैनी बनी रही। और अन्ततः, अपनी जेब पर डाका डाल कर निकान डी 5100 केमरा खरीद ही लिया। चैन तो पड़ा लेकिन अचानक ही अपराध बोध भी मन पर हावी हो गया। दशा यह हो गई कि किसी को केमरा बताना/दिखाना तो दूर, किसी को सूचना देने की भी हिम्मत नहीं रही। वैसे भी रतलाम में बात करूँ, रास्ता पूछूँ भी किससे? दुनिया भर में रतलाम का नाम रोशन करनेवाले ख्यात केमरा कलाकार देवेन्द्र भाई शर्मा मुझ पर आदरभरा स्नेह रखते थे। केमरा लेकर, रात के अँधेरे में उनसे मिला। वे बड़े खुश हुए। खूब तारीफ की, हिम्मत बँधाई और प्रेरित किया। कुछ प्रारम्भिक निर्देश दिए। तय हुआ कि अगले रविवार को मुझे उनके पास बैठना है। लेकिन वे भी उलझे रहे और मैं भी। और वह रविवार कभी नहीं आया। अब आएगा भी नहीं।

केमरा, बेग में ही बन्द पड़ा रहा। फरवरी 2016 में अण्डमान गया तो केमरा साथ ले गया। वहाँ ढेर सारे फोटू लिए। परिजनों और कुछ मित्रों को दिखाए। सबने तारीफ ही की। लेकिन मन की झेंप रत्ती भर भी कम नहीं हुई। आत्म विश्वास तो कभी रहा ही नहीं था।

एक दिन अखबार से अचानक ही मालूम हुआ कि रोटरी
क्लब प्राइम के सहयोग से, रतलाम का सृजन केमरा क्लब, 30 अगस्त से 01 सितम्बर के बीच, ख्यात अन्तरराष्ट्रीय केमरा कलाकार श्री चित्रांगद कुमार की तीन दिवसीय फोटो प्रदर्शनी और दो दिवसीय वर्क शॉप आयोजित कर रहा है। समाचार ने मन को उकसाया और मैं अपना केमरा लटका कर पहुँच गया। चित्रांगदजी का भारी-भरकम नाम तो पहले से ही सुना हुआ था, कुछ महीनों पहले जब देवेन्द्र भाई की स्मृति में एक आयोजन हुआ था तब महावीरजी वर्मा ने उनसे परिचय भी कराया था।  

पहली शाम तो प्रदर्शनी के उद्घाटन में ही बीत गई। चित्रांगदजी से औपचारिक बातें हुईं। मैंने वर्क शॉप में शामिल होने की इच्छा जताई। उन्होंने अत्यधिक गर्मजोशी से मुझे सहमति दी। वर्क शॉप का समय बताया अगले दिन दोपहर तीन से पाँच बजे।

तय समय पर मैं पहुँचा। आयोजकों के अलावा लगभग पचास बच्चे जुटे हुए थे। तीस बरस से अधिक उम्र का शायद ही कोई बच्चा रहा होगा। सबने मुझे अजूबे की तरह ही देखा। मेरे हौसले पस्त हो गए। लेकिन मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ता हुआ बना रहा। कुर्सियाँ लगभग सारी भर गई थीं। मैं सबके पीछेवाली कुर्सी पर बैठा। (सबसे आगेवाली कुर्सी मिलती भी तो भी मैं वहाँ बैठने की हिम्मत तो नहीं ही जुटा पाता।) उसके बाद से ही खुद पर हँसने का सिलसिला शुरु हो गया।

चित्रांगदजी ने बात शुरु की तो कुछ ही पलों में सारे बच्चे उनसे जुड़ गए। मेरी स्थिति बड़ी विचित्र थी। एक तो उम्र। दूसरे, मुझे वैसे भी थोड़ा कम सुनाई देता है। तीसरे, सबसे पीछे बैठना। चौथे, तेज गति से चल रहे पंखों से उपज रही सरसराहट का शोर। पाँचवें, सभागार की कम ऊँचाई और खिड़कियाँ कम होने से आवाज का गूँजना। छठवें, चित्रांगदजी का तेजी से बोलना। और इन सबसे आगे बढ़कर, मेरी, विषय की ज्ञान-शून्यता। सारे बच्चे तकनीक और तकनीकी ज्ञान से लैस। उनकी बातें, उनकी शब्दावली मेरे लिए तो ‘काला अक्षर, भैंस बराबर’ थी। पहले ही पल मैं ‘गूँगा-बहरा दर्शक’ की बन कर रह गया। उधर, चित्रांगदजी ने मुझसे कुछ पूछा तो मैंने कानों पर हाथ रखकर इशारा किया - ‘मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा।’ उन्होंने बुला कर अपने पास बैठा लिया। अब मुझे सुनाई तो सब दे रहा था लेकिन ‘केमरा’, ‘लेंस’, ‘आब्जेक्ट’, ‘क्लिक’ जैसे शब्दों के सिवाय कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। उम्र के लिहाज से मेरी दशा ‘बछड़ों के बीच बूढ़ा बैल’ और ज्ञान के लिहाज से ‘स्नातक कक्षा में घुस आया पहली का छात्र’ जैसी थी। अपनी यही दशा मुझे खुद पर हँसाए जा रही थी। लेकिन अजीब बात यह रही कि वहाँ से भागने का विचार पल भर भी मन में नहीं आया।

दूसरे, अन्तिम दिन चित्रांगदजी ने अपने खींचे विभिन्न चित्रों के जरिए काफी-कुछ समझाया। एक बच्ची को मॉडल बनाकर प्रकाश व्यवस्था/प्रबन्धन  समझाई। मुझसे भी एक फोटू क्लिक करवाया। लेकिन समझ के मामले में मेरी दशा में कोई अन्तर नहीं आया। मुझे लगा तो बहुत अच्छा लेकिन सूझ-समझ कुछ नहीं पड़ा। मैं वहाँ बराबर बना रहा। मेरी झेंप लगभग समाप्त हो गई - यह सबसे बड़ा हासिल रहा मेरे लिए।

कल शाम, वर्क शॉप से लौटते समय, देवेन्द्र भाई के बेटे हरीश के जरिए चित्रांगदजी को आज सुबह की चाय मेरे साथ पीने के लिए न्यौत कर आया था। हरीश उन्हें तो लाया ही, सृजन केमरा क्लब के संस्थापकों में से एक (और रतलाम के पुराने केमरा कलाकार) श्री कमल उपाध्यायजी को साथ लेकर आया। कोई घण्टा भर हम लोग बैठे। मैंने, अण्डमान में खींचे फोटू उन्हें दिखाए। वे चुपचाप देखते रहे। उनकी चुप्पी मुझे भयभीत बनाए  रही। सूर्योदय श्रृंखला का एक चित्र देखकर जब उन्होंने सहसा ‘वाह!’ कहा तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरा डर एकदम छू हो गया। सारे फोटू दिखाने के बाद मैंने पूछा - ‘मैं आगे बढ़ूँ या केमरे को ताला लगा दूँ?’ उन्होंने कहा - ‘नहीं! नहीं!! आप रुकिए नहीं। आगे बढ़िए। बाहर निकलिए।’ 

उनकी इस बात ने मेरा हौसला और आत्म विश्वास बढ़ाया है। मैं सृजन केमरा क्लब का सदस्य बन रहा हूँ। झेंप तो समाप्त हो ही गई है। आत्म विश्वास भी बढ़ा है। 

दो दिन खुद पर हँसने का यह हासिल बुरा नहीं। 
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वर्क शॉप के कुछ चित्र दे रहा हूँ। इतने चित्र एक साथ देने का मौका पहली बार आया है। इसलिए इन चित्रों का न तो को सिलसिला है न ही सलीका।














खुशबू का एक आकुल- व्‍याकुल झोंका

पहला समाचार - अहमदाबाद (गुजरात) के गुडलक वेरल मार्केट में कामकाज करनेवाले इमरान शेखाणी का दस वर्षीय बेटा अमान शेखाणी ‘चिड़िया बचाओ’ अभियान में लगा हुआ है। नारोल इलाके में मीराणा डम्पिंग साइट है। कुछ बरसों पहले तक वहाँ चार-पाँच चिड़ियाएँ नजर आती थीं। अब वहाँ लगभग डेड़ सौ चिड़ियाएँ चहचहाती नजर आती हैं। यह अमन का ही करिश्मा है। तीन बरस की, नासमझी की उम्र से अमन इस अभियान में लग गया था। चिड़ियाओं को कुत्ते-बिल्लियों से बचाने से उसने शुरुआत की थी। कोई चिड़िया मर जाती है तो अमन उसका अन्तिम संस्कार करता है। चिड़ियाओं के प्रति उसका यह प्रेम देख लोगों ने उसे मुफ्त में घोंसले देने शुरु किए। अमन इन्हें लोगों तक पहुँचाता है। नारोल इलाके की सिटीजन मेमन कॉलोनी, सिटीजन नगर, मुबारक नगर सोसायटी में ऐसे घोंसले नजर आते हैं। अब लोग घोंसले लेने के लिए अमन के पास आते हैं।

दूसरा समाचार - महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के केलवाद गाँव के उद्धव गाडेकरे के हेयर सेलून पर यदि कोई फौजी जवान आता है तो उद्धव चाँदी के उस्तरे से, अत्यन्त आदरपूर्वक उसकी शेविंग करता है। वह भी मुफ्त। देश की रक्षा हेतु सीमाओं पर तैनात सैनिकोे के प्रति सम्मान जताने का, उद्धव का यह अपना तरीका है। ‘बेटी बचाओ अभियान’ को भी वह अपने तरीके से प्रोत्साहित करता है। सन्तान के रूप में इकलौती बेटी के पिता की शेविंग भी वह मुफ्त में करता है।

तीसरा समाचार - केन्द्रपाड़ा (उड़ीसा) निवासी सरोजकान्त बिस्वाल का विवाह था। बिस्वाल ने अनूठा दहेज माँगा। उसने फ्रीज-कूलर, वाहन जैसी चीजों के बजाय तुलसी के एक हजार एक पौधे माँगे। समूचा विवाह आयोजन धन्य हो गया। 

चौथा समाचार - कानपुर निवासी डॉक्टर माही तलत सिद्दीकी ने हिन्दी में एम. एम. किया है। पण्डित बद्रीनारायण तिवारी ने उन्हें रामचरित मानस की एक प्रति भेंट की। ‘मानस’ पढ़ते-पढ़ते डॉक्टर माही ने अनुभव किया कि इस ग्रन्थ की अच्छी बातें अन्य सम्प्रदायों तक पहुँचाई जानी चाहिए। सद्विचारों को व्यापक करने की इसी भावना के अधीन उन्होंने लगभग डेड़ बरस के अथक परिश्रम से ‘मानस’ का उर्दू स्वरूप तैयार कर भाईचारे और साम्प्रदायिक सौहार्द्र का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। 

पाँचवाँ समाचार - पलवल (हरियाणा) के पास के कूलवाली गाँव के सित्यासी वर्षीय चन्द्रपाल और उनकी, छियासठ वर्षीया पत्नी रूपवती चार बेटों के माँ-बाप हैं। दोनों की बड़ी इच्छा थी - हरिद्वार तीर्थयात्रा करने की। बेटों (बंसीलाल, राजू, महेन्द्र और जगपाल) को मालूम हुआ तो वे कलियुग के श्रवण कुमार बन गए। चारों भाइयों ने अपने बूढ़े माता-पिता को काँवर में बैठाकर, कन्धों पर बैठाकर हरिद्वार यात्रा करवाई। 

छठवाँ समाचार - पाकिस्तान के कराची के एक मन्दिर में स्कूल चलता है जिसमें हिन्दुओं के बच्चे पढ़ते हैं। इनकी शिक्षक है - अनम आगा। वह हिजाब पहनकर आती है। बच्चे ‘जय श्रीराम’ कह कर उसका अभिवादन करते हैं और वह ‘अस्सलाम वाल-ए-कुम’ कह कर। वह प्रतिदिन सारे बच्चों से हाथ मिलाती है। बच्चों की और शिक्षिका की गर्मजोशी और मुहब्बत रास्ते चलते लोगों का भाव विह्वल कर देती है। 

सातवाँ समाचार - नहीं। यह समाचार नहीं है। अतीत का एक पन्ना है। इन्दिरा गाँधी प्रधान मन्त्री थीं। जवाहरलाल नेहरू पर वृत्त चित्र बनाने के लिए उन्होंने, किंवदन्ती फिल्म-पुरुष सत्यजीत राय से आग्रह किया। राय ने असमर्थता जताई। बात आई-गई हो गई। कुछ समय बाद, अपनी विदेश यात्रा के लिए विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराने के लिए राय ने  अर्जी लगाई। नेहरू पर फिल्म बनाने पर राय का इंकार अफसरों को याद था। इन्दिराजी को खुश करने की मनोदशा के अधीन अफसरों ने राय की अर्जी खारिज कर दी। यह बात इन्दिराजी तक पहुँची। वे नाराज हुईं और व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप कर राय को विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराई।

आठवाँ समाचार - यह भी समाचार नहीं है। यह, गाँधी के नाम नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का वह पत्र है जो उन्होंने 6 जुलाई 1944 को सिंगापुर से लिखा था। इस पत्र में नेताजी ने अपने ‘महात्माजी’ के प्रति आदर प्रकट करते हुए, जापान जाने के अपने निर्णय का औचित्य प्रतिपादित किया है। 

ये सारे समाचार, सारी घटनाएँ मेरे यहाँ लिखने से पहले ही अखबारों में छप चुकी हैं। जगजाहिर हैं। लेकिन पहले दिए गए 6 समाचार मुझे, मेरे अंचल के अखबारों में छपने से कई-कई दिनों पहले मिल गए थे। मुझे उपलब्ध करानेवाले थे - अहमदाबाद निवासी श्री केशवचन्द्र एम. शर्मा। 

मैं केशवजी को, उनके बारे में कुछ नहीं जानता। उनकी शकल भी नहीं देखी है अब तक। दादा ने अपने एक लेख में उनका, पते सहित उल्लेख किया था। अपनी कुछ जिज्ञासाओं का समाधान पाने के लिए, कोई चार महीना पहले मैंने केशवजी को पत्र लिखा था। तब से सम्पर्क बना हुआ है। अपने एक पत्र में उन्होंने अपनी आयु 69 वर्ष बताई है। एक पत्र में उन्होंने संकेत दिया है कि वे प्रिण्टिंग प्रेस के व्यवसाय से सम्बद्ध हैं। बस! इतना ही मुझे मालूम है। 

मेरे पहले पत्र के बाद उनके पत्र और फोन आने लगे। वे बड़े प्रेम-भाव से बात करते। अपने पत्रों के साथ वे गुजराती, हिन्दी अखबारों में छपे, समाचारों की कतरनें भेजते हैं। यहाँ दिए समाचार मुझे इसी तरह केशवजी से मिले हैं। जब मैंने कहा कि मुझे गुजराती नहीं आती। तो वे गुजराती में छपी कतरनों के साथ उनके हिन्दी भावानुवाद लिख कर भेजने लगे। इस बीच दादा का निधन हो गया। वे अधिक प्रेमल हो गए। 

इस तरह समाचार भेजने का प्रयोजन उनसे साफ-साफ पूछने की हिम्मत नहीं कर सका। ‘घुमा फिरा कर’ टटोला तो मैं अवाक् रह गया। केशवजी का स्वभाव है - अच्छी बातों को यथासम्भव, अधिकाधिक व्यापक, अधिकाधिक प्रसारित करना। बुरी बातों को फैलाना नहीं पड़ता। उन्हें तो अनगिनत पंख मिल जाते हैं। लेकिन अच्छी बातें उपेक्षा, अनदेखी की शिकार हो जाती हैं। इसलिए अच्छी बातों को व्यापक किया जाना चाहिए। 

केशवजी का जब भी फोन आता है तो मैं साँस रोक कर उन्हें सुनने की कोशिश करता हूँ। मुझे उनकी बातों में एक अकुलाहट, विकलता अनुभव होती है। देश के मौजूदा वातावरण पर बात करते-करते उनकी आवाज रुँधती लगती है मुझे। एक बार भी ऐसा नहीं हुआ जब उन्होंने गाँधी को याद न किया हो। गए दिनों, अत्यधिक कारुणिक स्वरों मे उन्होंने कहा - ‘हमें गाँधी चाहिए। लेकिन हम अब गाँधी कहाँ से लाएँ? गाँधी तो एक ही हुआ जो अपना काम कर गया। बचे हैं हम। लेकिन हम गाँधी नहीं हो पा रहे। हो भी नहीं सकते।’ 

मैं उनसे कुछ नहीं पूछता। हिम्मत ही नहीं होती। लेकिन मुझे लगता है, ऐसा सम्पर्क वे और लोगों से भी बनाए हुए होंगे। अच्छी बातें आगे बढ़ाना उनका व्यसन लगता है मुझे। जैसा वे करते हैं, वैसा मैं एक बार भी नहीं कर पाया। रेल से रतलाम आए यात्री का सामान ऑटो में छूट गया। ऑटो चालक (‘जब्बार’ नाम याद आ रहा है मुझे उस ऑटो चालक का) को नजर आया तो लौटाने गया। ऐसे ही कुछ अच्छे समाचार मेरी आँखों से भी गुजरे हैं। लेकिन एक की भी कतरन केशवजी को नहीं भेज पाया। अपनी ही नजरों में शर्मिन्दा होता हूँ मैं। लगता है, मेरी सम्वेदनाएँ भोथरी हो गई हैं। मौजूदा हालात पर मुझे गुस्सा तो आता है लेकिन केशवजी से सम्पर्क में आने के बाद लगता है, मेरा यह गुस्सा एक अपराध है। गुस्सा अन्ततः हिंसा को ही जन्म देता है। और हिंसा तो पाप का मूल है। मौजूदा दौर के हालात को गुस्से, नफरत, हिंसा से नहीं बदला जा सकता। अहिंसा और प्रेम ही एकमात्र साधन हैं और सम्वेदनाएँ इनका मूल हैं। 

अनदेखे, अनजान केशवजी से मैं पाठ पढ़ने का जतन कर रहा हूँ। हम यदि कुछ अच्छा नहीं कर सकते तो अच्छा करनेवालों की पालकियाँ तो ढो ही सकते हैं। हम खुद खुशबू नहीं बन सकते तो खुशबू के वाहक झोंके तो बन ही सकते हैं।

मुझे केशवजी ऐसा ही झोंका लगते हैं। खुशबू का एक आकुल-व्‍याकुल झोंका।
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(केशवजी का चित्र मुझे आसानी से, पहली ही बार में नहीं मिला। मुझे अतिरिक्त प्रयत्न करने पड़े। ) 

भारत: धनाढ्यों द्वारा नियन्त्रित धार्मिक गरीबों का देश

पाटीदार समुदाय की कुलदेवी है उमिया देवी। ‘विश्व उमिया धाम मन्दिर’ निर्माण हेतु गत दिनों अहमदाबाद में सम्पन्न हुई बैठक में पाटीदार समाज ने केवल तीन घण्टों में 150 करोड़ रुपये जुटा लिए। याने प्रति मिनिट 84 लाख रुपये। मुम्बई के दो पटेल भाइयों ने इक्यावन करोड़ रुपये देने की घोषणा की। यह, इस बैठक में घोषित की गई सबसे बड़ी रकम है। पूरी परियोजना एक हजार करोड़ रुपयों की है। यदि यही गति और मनोदशा बनी रही तो शेष 6 बैठकों में समूची परियोजना की रकम जुटा ली जाएगी। यह वही पाटीदार समाज है जिसे आरक्षण दिलाने के लिए हार्दिक पटेल संघर्षरत हैं। ऐसे आँकड़ों पर हार्दिक कहते हैं कि पाटीदार समुदाय में गरीबों की संख्या अधिक है। ऐसी आर्थिक हैसियतवाले पाटीदार तो गिनती के ही हैं। हार्दिक सच ही कहते होंगे।

एक समुदाय के एक मुनि का देहावसान हो गया। उनकी अर्थी में कन्धा देने की बोलियाँ लगीं। सबसे आगे, दाहिना कन्धा देने से शुरु हुई बोलियाँ खत्म हुईं तो कुल रकम आठ करोड़ हुई। उल्लेखनीय बात यह रही कि एक के बाद एक, ये सारी बोलियाँ एक ही भक्त के नाम पर खत्म हुईं। एक व्यक्ति तो अर्थी उठा नहीं सकता! निश्चय ही इस भक्त ने, कन्धे देने का अपना अधिकार अन्य भक्तों को देने का सौजन्य बरता होगा।

दिल्ली के एक साई भक्त ने गए दिनों शिरड़ी पहुँच कर, डेड़ किलो वजन का सोने का हार साई बाबा को चढ़ाया। इस हार का मूल्य बयालीस लाख रुपये आँका गया। यह हार साई बाबा की मूर्ति को भिन्न-भिन्न उत्सवों-प्रसंगों पर ही पहनाया जाएगा। 

अखबारों में छपे ऐसे समाचार पढ़ते-पढ़ते हर बार उक्ति याद आ जाती है - ‘भारत, निर्धनों का धनाढ्य देश है।’ लगता है, इस उक्ति में सुधार किया जा सकता है - ‘भारत, धनाढ्यों द्वारा नियन्त्रित धार्मिक गरीबों का देश है।’

हम पाँच-सात ‘मूर्ख मित्र’ जब भी मिल बैठते हैं तो चकित भाव से ऐसे समाचारों पर चर्चा करते हैं। सामूहिक धर्म का सामाजिक अवदान हमें अब तक समझ नहीं आया। जाति आधारित आरक्षण का विरोध करते हुए आर्थिक आरक्षण की बात कही जाति है। कहा जाता है कि हर जाति, समुदाय में आर्थिक पिछड़े लोग हैं। लेकिन धर्म के नाम पर जब, कुछ ही घण्टों में जुटाए जानेवाले ऐसे भारी-भरकम आँकड़े सामने आते हैं तो सहसा ही मन में विचार आता है - अपनी ही जाति, अपने ही समुदाय के आर्थिक पिछड़ों की याद इन लोगों को क्यों नहीं आ पाती? शिक्षा, अवसर, रोजगार जैसे आधारभूत जीवनदायी उपक्रम अपने ही समुदाय के वंचितों, उपेक्षितों को उपलब्ध कराने में इनकी रुचि क्यों नहीं हो पाती?

प्रख्यात भाषाविद्, कवि-साहित्यकार डॉक्टर जय कुमार जलज के यहाँ बैठा था। वे किसी से बात कर रहे थे। मैं मूक श्रोता था।  बातों ही बातों में जलजी ने बताया, एक सन्त-मुनि से उन्होंने कहा कि उनके (सन्त-मुनि के) समाज के अनेक युवा लड़के/लड़कियाँ मुम्बई, पुणे, बेंगलुरु, चैन्ने, हैदराबाद जैसे विभिन्न महानगरों में नौकरीपेशा बने हुए हैं। वहाँ वे अकेले रहते हैं और स्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं कि वे चाहकर भी अपने परिवार की धार्मिक परम्पराएँ नहीं निभा पाते। समाज के धनाढ्य लोग यदि मन्दिरों-मठों पर धन लगाने के बजाय, अपने ही समुदाय के ऐसे बच्चों के लिए समुचित आवास व्यवस्था उपलब्ध करा दें तो न केवल बच्चों को ‘परदेस’ में ढंग-ढांग का ठिकाना मिल जाएगा बल्कि, परिवार से दूर रहनेवाले वे बच्चे अपने परिवार/समुदाय की खान-पान, पूजा-पाठ, देव/मन्दिर-दर्शन जैसी पारम्परिक धार्मिकता से भी जुड़े रहेंगे। जलजजी का सुझाव था कि यह व्यवस्था निःशुल्क न हो। बच्चों से ‘नो प्रॉफिट-नो लॉस’ आधार पर भुगतान लिया जाए। जलजी ने सन्त-मुनि से आग्रह किया कि वे (सन्त-मुनि)  उनके समाज के धनाढ्य लोगों से ऐसा करने का आग्रह करें। सुनकर सन्त-मुनि ने विचार की प्रशंसा तो की किन्तु कहा कि उनका काम केवल धर्मोपदेश देना है, ऐसा आग्रह करना, ऐसी सलाह देना नहीं। जलजी की बात सुनकर मैं खुद को रोक नहीं पाया। पूछ बैठा कि वे सन्त-मुनि किस समाज/समुदाय के थे। जलजी ने हँसते हुए जवाब दिया - ‘वे मेरे समुदाय के भी थे आपके समुदाय के भी। साधु, सन्त, मुनि किसी विशेष जाति, समाज, सम्प्रदाय के नहीं होते। वे तो समग्र मनुष्य समाज के होते हैं।’

दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिनों तक चलनेवाले इन धार्मिक आयोजनों/समारोहों पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। हजारों आबाल-वृद्ध नर-नारी इनमें प्रतिदिन शामिल होते हैं। अपने अमूल्य मानव श्रम के अनेक घण्टे इनमें खपाते हैं। लेकिन बदले में पाते क्या हैं - यह समझना हर बार कठिन ही हुआ। श्रद्धा और आस्था के तर्क हर बार ऐसी जिज्ञासाओं को ‘चिर-कुमारी’ बनाए रखते हैं। ऐसा एक बार नहीं, अनेक बार हुआ है कि प्रवचनों से लौटते हुए लोगों से मैंने, सोद्देश्य पूछा - ‘कैसा लगा आपको?’ उत्तर मिला - ‘बहुत सुन्दर व्याख्यान था महाराजजी का।’ मैंने पूछा - ‘क्या कहा महाराजजी ने?’ जवाब मिला - ‘यह तो याद नहीं। लेकिन बहुत सुन्दर व्याख्यान दिया महाराजजी ने।’ यह जवाब देते समय उनकी प्रसन्नता देखते ही बनती थी।

मुझे सामूहिक धर्म की एक ही उपयोगिता अनुभव हुई - दुःखी आदमी अपना दुःख भूल जाता है। अपने असफल प्रयत्नों की समीक्षा से बचने में, ऐसी भीड़, आदमी की बड़ी मदद करती है। वह अपने आसपास अपने ही जैसे अनेक असफलों को देख शायद राहत पाता है - ‘मैं अकेला ही ऐसा नहीं हूँ।’ अपने समान ही दूसरों को असफल, अधूरा, व्यथित, पीड़ित देख-देख कर उसे अपना दुःख कम अनुभव होने लगता होगा। पिछले जन्म के कर्म-फल भुगतने की भयानक कथाएँ सुनते-सुनते, अपना अगला जन्म सुधारने की सोचते हुए वह अपना कष्टदायक वर्तमान भूल जाता होगा। यही उसके लिए बड़ी राहत होती होगी। इसके अतिरिक्त और कोई व्यक्तिगत प्राप्ति मुझे तो नजर नहीं आती।

लेकिन इन्दौर के राजनेताओं द्वारा आयोजित धार्मिक समारोहों में जरुर कुछ व्यक्तिगत प्राप्तियाँ मैंने देखी हैं। वहाँ महिलाओं को साड़ियाँ, घरु उपयोग के बर्तन, स्वादिष्ट-मँहगी मिठाई के डिब्बे व्यक्तिगत स्तर पर मिल जाते हैं। लेकिन इनमें से ऐसा कुछ भी नहीं जो आदमी की जिन्दगी सँवार दे। ऐसे सामूहिक धार्मिक आयोजन मुझे तो, आदमी को जड़ होने की सीमा तक यथास्थितिवादी बनाते लगते हैं। कभी-कभी तो, पीछे ले जानेवाले भी लगते हैं। धर्म तो मनुष्य की आत्मोन्नति का श्रेष्ठ उपकरण है। यह व्यक्ति को कर्मठ, पुरुषार्थी बनता है। किन्तु सामूहिक धर्म तो मुझे आदमी को अकर्मण्य, भाग्यवादी बनाता अनुभव होता है। 

राजनीति ने इस स्थिति में ‘कोढ़ में खाज’ जैसा ही काम किया है। लोगों की धार्मिकता राजनेता के लिए सोने का अण्डा देनेवाली मुर्गी है। धार्मिक भीड़ नेता को वोट-धन से मालामाल करती है। भोपाल के एक नेता गए दो-तीन बरसों से, अपने विधान सभा क्षेत्र में ‘सामूहिक रक्षा बन्धन’ मना रहे हैं। पूछा जा सकता है कि यह ‘भ्रातृ भाव’ केवल अपने क्षेत्र की महिलाओं तक ही सीमित क्यों? इसका एक ही जवाब है - ‘यह भ्रातृ-भाव नहीं, वोट-भाव है।’ 

धर्म और राजनीति के घातक घालमेल को वाजिब ठहरानेवालों की कमी नहीं है। ये सब चतुर लोग हैं। इनका धर्म पूरी तरह से ‘सोद्देश्य और स्वार्थप्रेरित’ होता है। तनिक ध्यान से देखिए। धर्म-यात्राएँ, यज्ञ, कथा आयोजित करानेवाला नेता रक्षा बन्धन तो सामूहिक मनाता है, लेकिन लक्ष्मी पूजन सदैव अकेला ही करता है। अपने घर की लक्ष्मी पूजा में अपने एक भी मतदाता को शामिल नहीं करता। 

लक्ष्मी व्यक्तिगत है। बाकी सब सामूहिक है। यही धर्म है।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 30 अगस्त 2018

पहरुए! सावधान रहना



हम आजादी का बहत्तरवाँ जलसा मना रहे हैं। बच्चे-बच्चे के मन में आजादी की खुशी और उल्लास की रोशनी महसूस होनी चाहिए। लेकिन नहीं हो रही। यह रोशनी मुट्ठी भर हाथों में कैद नजर आ रही है। लोगों की आँखों में डर और दहशत छायी हुई है।  

विधायी सदनों में दागियों, अपराधियों की बढ़ती उपस्थिति से सर्वोच्च न्यायालय चिन्तित है। आज से नहीं, बरसों से। इन्हें इन सदनों से बाहर बनाए रखने के उपाय तलाश करने के लिए सरकार से लगातार कह रहा है। सरकारें मना नहीं करतीं। लेकिन उपाय भी नहीं करतीं। इन पर रोक लगाने के लिए कानून जरूरी है। कानून विधायी सदनों में बनते हैं जहाँ वे ही लोग बैठे हैं जो सर्वोच्च न्यायालय के लिए चिन्ता का विाय बने हुए हैं। यह आशावाद का चरम बिन्दु है - चीलों से, गोश्त की सुरक्षा की उम्मीद की जा रही है। ये लोग जनता की सुरक्षा और न्याय दिलाने के लिए कानून बनाते हैं। ये ऐसे ही कानून बनाते हैं जो इन्हें सुरक्षित रख सकें। ये ही देश की वास्तविक जनता हैं।

विधायी सदनों में अरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है। देहातियों, किसानों, मजदूरों की उपस्थिति इन सदनों में कम होती जा रही है। आँकड़े बताते हैं कि 165 अरबपति पुनर्निवाचित हुए हैं। ये अरबपति लोग देश के गरीबों की बेहतरी की नीतियाँ बनाते हैं। ‘गरीब’ की अपनी-अपनी परिभाषा है। अरबपति आदमी के लिए करोड़पति गरीब होता है। आँकड़े कहते हैं कि देश की बाईस प्रतिशत सम्पदा पर देश के एक प्रतिशत लोगों का कब्जा है। एक अन्य सर्वेक्षण कहता है कि देश की 78 प्रतिशत दौलत, देश के तीन प्रतिशत लोगों की तिजोरियों मे जमा है। गरीबों की चिन्ता में दुबले हुए जा रहे हमारे इन निर्वाचित ‘जनप्रतिनिधियों’ को खेत, खेती, किसान फूटी आँखों नहीं सुहाते। खेती की जमीन इनकी आँखों में खटकती है। खेती में जमीन बेकार ही खपाई जा रही है। इस जमीन पर भारी कारखाने लगाए जा सकते हैं।

साफ नजर आ रहा है, देश और समाज की प्राथमिकताएँ बदल दी गई हैं। समाजवादी सामाजिक की रचना, सामाजिक जुड़ाव, सर्वधर्म समभाव, अन्तिम आदमी की बेहतरी जैसी बातें तो अब हाशिये से भी धकेली जा रही हैं। नफरत की दुकानें सजी हुई हैं। दलितों, शोषितों, वंचितों से जीने का अधिकार छीना जा रहा है। गर्मी के मौसम में तीन दलित युवक सार्वजनिक कुए के ठण्डे पानी में तैरने उतर गए तो सवर्णों की गरमी के शिकार हो गए। तीनों की सार्वजनिक पिटाई कर दी गई। एक दलित ने ठाकुरों की तरह मूँछें रख लीं तो उसकी मूँछें नोच ली गईं और अधमरा कर दिया गया। दलित अपनी शादियों का जलसा नहीं रचा सकते। उनकी बारातें पुलिस रक्षा में निकलती हैं। उनके लिए मन्दिरों के दरवाजे बन्द हैं। नजर बचाकर कोई अन्दर चला गया तो भक्त उसकी वह दशा करते हैं भगवान भी उसे बचा नहीं पाता। बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की हत्या अब सामान्य घटना होती जा रही है। हो भी क्यों नहीं? सत्ता के पहरुए, बुद्धिजीवियों को एक लाइन में खड़ा कर, गोलियों से भून देने की बात खुले आम कहते हैं। भ्रष्टाचार के गवाहों को दिनदहाड़े सड़क पर कुचला जा रहा है। देख सब रहे हैं लेकिन चुप हैं।

सब कुछ बदला जा रहा है। नई परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं। ‘राष्ट्र’ को परे धकेल दिया गया है और ‘राष्ट्रवाद’ परोसा जा रहा है। जिन कामों, बातों से देश बनता है, वे सब काम और बातें ‘वर्जित सूची’ में डाली जा रही हैं। जिन्होंने देश से गद्दारी की, वे लोगों की वफादारियों के प्रमाण-पत्र जारी कर रहे हैं। भारत माता की महाआरतियाँ हो रही हैं लेकिन भारत की माताएँ देहातों में नंगी घुमाई जा रही हैं। ‘एक शाम - भारतमाता के नाम’ के आयोजन होते हैं लेकिन भारत माँ के बेटों को सड़कों पर घेरकर मार दिया जाता है। संविधान और कानून की दुहाइयाँ दी जाती हैं लेकिन भीड़तन्त्र, उच्छृंखलता और जंगल के कानून को मान्यता दी जाती है। 

हमने आजादी का मोल नहीं जाना। आज भी नहीं जान पा रहे हैं। कहते हैं, मुफ्त की चीज की कदर नहीं होती। रक्त क्रान्ति के बिना शायद ही किसी देश को आजादी मिली हो। इतिहास देखें तो लगता है, हमें आजादी बहुत ही सस्ते में मिल गई। खून हमने भी बहाया, प्राणोत्सर्ग हमने भी किया, अनगिनत नौजवानों ने अपने सपने इस देश पर कुरबान कर दिए, माँओं ने अपने बेटे, बहनों ने भाई और सुहागनों ने सिन्दूर गँवाया। लेकिन फिर भी दूसरे देशों के मुकाबले हमने बहुत कम कीमत चुकाई। शायद इसीलिए हमने अपनी आजादी का मोल नहीं समझा। हमने आजादी को केवल अधिकार मान लिया और भूल गए कि यह हमारी जिम्मेदारी भी है। 

सात अगस्त 1942 को, भारत छोड़ो आन्दोलन प्रस्ताव पर बोलते हुए गाँधी ने गिनती के वाक्यों में काफी-कुछ कह दिया था - ‘स्वतन्त्रता प्राप्त करते ही आपका काम खतम नहीं हो जाएगा। हमारी कार्ययोजना में तानाशाहों के लिए कोई जगह नहीं है।......अगर आप सच्ची आजादी पाना चाहते हैं तो आपको मेल-जोल पैदा करना होगा। ऐसे मेल-जोल से ही सच्चा लोकतन्त्र पैदा होगा।’ इसके कुछ ही बरसों बाद, संविधान सभा में अपने अन्तिम भाषण में अम्बेडकर ने कहा था - ‘यदि हम भारतीय, पंथ और मत को देश पर हावी होने देंगे तो आजादी शायद हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी।.......सामाजिक स्वतन्त्रता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता अधूरी है।’ आज लग रहा है, हम इस खतरे की अनदेखी कर रहे हैं और अधूरेपन को बढ़ा रहे हैं। यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम पूरी तरह रीत जाएँगे और अपने खाली हाथ देखते रहेंगे। अम्बेडकर ने तब आह्वान किया था - ‘समता और न्याय के सिद्धान्त पर आधारित समाज की रचना का संकल्प लें और जुट जाएँ।’ यह कह कर अम्बेडकर वस्तुतः गाँधी की बात को ही आगे बढ़ा रहे थे।

लेकिन हम वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं। हम आजाद बने रहें, यही हमारी चाहत हैं। लेकिन भूल जाते हैं कि आपदाएँ भेदभाव नहीं करतीं। लेकिन हवेलियाँ/कोठियाँ आग और बाढ़ से सुरक्षित ही रहती हैं। बाढ़ में तटवर्ती कच्चे मकान, झोंपड़े ही बहते हैं और आग भी इन्हें ही घेरती है। यह देश कच्चे मकानों/झोंपड़ों का देश है, कोठियों/हवेलियों का नहीं। आजादी हमारी जरूरत भी है और जिम्मेदारी भी।
यह सब देख-देख कर कवि गिरिजा कुमार माथुर अचानक ही बड़ी शिद्दत से याद आ जाते हैं। 15 अगस्त 1947 की आधी रात जब नेहरू संसद के सेण्ट्रल हॉल में स्वतन्त्र भारत के पहले प्रधान मन्त्री के रूप में भाषण दे रहे थे और पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था, तब उन्होंने लिखा था - ‘आज विजय की रात, पहरुए! सावधान रहना।’ कवि त्रिकालदर्शी होता है। माथुरजी ने आजादी के पहले ही पल हमें आगाह किया था। हम अनसुनी करते रहे। माथुरजी ने हमें आजादी के ‘पहरुए’ कहा था। हम उपभोक्ता बन गए। बीत गई सो बीत गई। खूब भोग लिया आजादी का आनन्द। अब बारी आ गई है जिम्मेदारी निभाने की। हम ही इसे लाए हैं। हम ही इसे बचा सकते हैं। हम ही इसे बचाएँगे। 

समता और न्याय के सिद्धान्त पर आधारित समाज की रचना का संकल्प लें और जुट जाएँ।
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‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 15 अगस्त 2018



जनता बोलती नहीं, चुपचाप फैसला सुना देती है

मैं इन्दौर में था। सर्व सुविधा नगर से महू नाका जाने के लिए नौ नम्बर की बस में सवार। मेरी अगली सीट पर बैठे दो बन्दे बहस में व्यस्त थे। सुबह-सुबह का वक्त। दोनों ही जवान और ताजादम। एक अति उत्साह में, बढ़-चढ़कर बोल रहा था। दूसरा शान्त भाव और संयत स्वर में, लगभग निर्विकार भाव से बोल रहा था। पहलेवाला मोदी समर्थक था। दूसरा किसका समर्थक था, यह तो मालूम नहीं हो पा रहा था लेकिन मोदी समर्थक नहीं था। बहस का विषय नया और अनूठा नहीं था। चारों ओर जो हो रहा है, वही विषय था। आगे, अपनी बात सुविधाजनक रूप से कहने के लिए मैं दोनों को क्रमशः ‘मोस’ (मोदी समर्थक) और ‘मोसन’ (मोदी समर्थक नहीं) कहूँगा।

मोसन -  तुम ये जो सब कर रहे हो, ठीक नहीं है। नीदर फेयर नार गुड।

मोस - व्हाट डू यू मीन? क्या कर रहे हैं हम लोग?

मोसन - यही! मनमानी, मारापीटी। किसी पर हमला कर देना। जान ले लेना। इट इज एनार्की। (यह अराजकता है।)

मोस - नो! इट इज नाट एनार्की। इट इज जस्टिस। वी आर डूइंग जस्टिस। (नहीं! यह अराजकता नहीं है। हम तो न्याय कर रहे हैं।) 

मोसन - यही तो एनर्की (अराजकता) है। तुम कौन होते हो जस्टिस करनेवाले? कोर्ट्स आर देयर फॉर जस्टिस। (न्याय करने के लिए न्यायालय है।)

मोस - कोर्ट टेक्स ए लांग टाइम। वी हेव नो टाइम एण्ड नो पेशंस। वी काण्ट वेट। एण्ड मेनी टाइम्स कोर्ट्स डिलीवर डिसिजंस ओनली। दे डोण्ट डू जस्टिस। (न्यायालय बहुत समय लेते हैं। हमारे पास न तो समय है न ही धैर्य। और कई बार तो न्यायालय केवल फैसला सुनाते हैं। न्याय नहीं करते।)

मोसन - व्हाट रबिश! यू आर रिजेक्टिंग ज्यूडिशियरी आट राइट! यू आर एडमिटिंग देट यू आर डूइंग एनार्की। (क्या बेवकूफी है! तुम न्यायपालिका को सिरे से ही खारिज कर रहे हो! कबूल कर रहे हो कि तुम अराजकता फैला रहे हो।)

मोस - डू यू फील सो? देन, लेट इट बी सो। (तुम्हें ऐसा लगता है? ठीक है! यही सही।) अब तो यही चलेगा।

मोसन - यू आर बिहेविंग इन सच ए मेनर देट यू पीपुल हेव गॉट द चेयर फॉर एव्हर। इट इज पब्लिक टू डिसाइड, नॉट यू। नोट इट! पब्लिक विल नॉट एसेप्ट इट। दे विल किक यू। (तुम तो इस तरह व्यवहार कर रहे हो जैसे कि तुम्हें कुर्सी स्थायी रूप से मिल गई है! यह तुम नहीं, जनता तय करेगी। लिख लो, जनता यह कबूल नहीं करेगी। लात मार कर तुम्हें भगा देगी।)

मोस (खुल कर हँसते हुए। जैसे ‘मोसन’ की खिल्ली उड़ा रहा हो) - पब्लिक? व्हेयर इज पब्लिक? इज एनी वन स्पीकिंग? एव्हरीवन इज सायलेंट। कीपिंग मम। इट मीन्स, दे आर एग्री विथ अस। नॉट एग्री ओनली! दे आर सपोर्टिंग अस टू। (लोग? कहाँ हैं लोग? एक भी बोल रहा है? सब चुप हैं। इसका मतलब है, वे हमसे सहमत हैं। केवल सहमत ही नहीं, वे हमारा समर्थन भी कर रहे हैं।)

मोसन (अचानक हिन्दी में बोलने लगा। शायद अंग्रेजी में खुद को व्यक्त नहीं कर पा रहा था) -  साइलेंस का मतलब हर बार सहमति नहीं होता। रेप की विक्टिम (शिकार) औरत का मुँह दबा दिया। वह बोल नहीं सकती। इसका मतलब क्या वह रेप को एग्री है?  रेप को सपोर्ट कर रही है? नो। यू आर रांग। यू आर मिसलीडिंग, मिसइण्टरप्रीटिंग। (नहीं! तुम गलत कह रहे हो। गलत व्याख्या कर रहे हो।) फॉरगेट नॉट! अपने यहाँ नर को नारायण और जनता को जनार्दन कहा गया है। पब्लिक एक लिमिट तक सहन करती है। वह बोलती नहीं। चुपचाप अपना डिसीजन सुना देती है। पब्लिक ही गॉड है और गॉड की लाठी की आवाज नहीं आती। 

‘मोसन’ की यह बात सुनकर मैं चौंक गया। मुझे 1977 के लोक सभा चुनाव याद आ गए। अब मुझे ‘मोस’ और ‘मोसन’ की बातें नहीं सुनाई दे रही थीं। 

उस समय मैं मन्दसौर में दैनिक ‘दशपुर दर्शन’ का सम्पादक था। काँग्रेस ने मन्दसौर संसदीय क्षेत्र से रतलामवाले बंसी भाई गाँधी को उम्मीदवार बनाया था। इन्दौरवाले महेश भाई जोशी उनके चुनाव संचालक बनकर मन्दसौर आए थे। ‘दशुपर दर्शन’ के मालिक सौभाग्यमलजी जैन काँग्रेस की सक्रिय राजनीति में थे। महेश जोशी उनके नेता थे। अपनी रणनीति की बुनावट के तहत महेश भाई ने ‘दशपुर दर्शन’ की भूमिका के बारे में सौभाग भाई से बात की। उन्होंने मुझे आगे कर दिया। मैंने कहा कि यदि एक ही पक्ष की बातें छपेंगी तो दूसरा पक्ष अखबार पढ़ना ही बन्द कर देगा। इसलिए खबरों में शालीन सन्तुलन रहेगा। महेश भाई का कहा मुझे अभी भी शब्दशः याद है - “ये ‘नईदुनिया’ वाली, ‘तेरी भी जय और उसकी भी जय’ नहीं चलेगी।’ फैसला हो चुका था। चुनाव तक मैं लगभग पूरी तरह फुरसत में हो गया।

मन्दसौर जिले के अग्रणी काँग्रेसी नेता (स्वर्गीय) भँवरलालजी नाहटा ने मुझे पकड़ लिया। वे ‘कवरेज’ के लिए अपनी, देहातों की आम सभाओं में मुझे ले जाने लगे। हम लोग शाम आठ बजे निकलते। नौ बजते-बजते पूर्व निर्धारित गाँव पहुँचते। आम सभा शुरु होती। लगभग पूरा का पूरा गाँव, आबाल-वृद्ध सभा में पहुँचता। बिछात छोटी पड़ जाती। कहीं-कहीं महिलाएँ भी बड़ी संख्या में आतीं। किसी गाँव में दो-एक स्थानीय वक्ता होते। कहीं-कहीं अकेले नाहटाजी ही अकेले वक्ता होते। नाहटाजी बहुत अच्छा बोलते थे। बीच-बीच में मालवी में भी बात करते। आम सभा देर तक चलती। कभी-कभी आधी रात तक। नाहटाजी की आम सभाएँ ‘प्रचण्ड सफल’ कहलाने की अधिकारिणी होती थीं। 

आम सभा की शानदार और प्रचण्ड सफलता से गद्गदायमान नाहटाजी लौटते में मेरी प्रतिक्रिया पूछते। मैं उनकी मनमाफिक बातें नहीं कर पाता। वे तुनक जाते। मेरी टप्पल में धौल टिकाते हुए कहते - ‘पूरा का पूरा गाँव सभा में मौजूद था। सबके सब आखरी तक बैठे रहे। एक बच्चा भी उठ कर नहीं गया। एक भी आदमी ने कोई सवाल नहीं उठाया। तुझे कुछ भी नजर नहीं आया?’ मैं कहता - ‘यह सब तो मुझे नजर आया बाबूजी! लेकिन मुझे और भी कुछ नजर आया।’ वे पूछते - ‘तुझे ऐसा क्या नजर आया जो मुझे नजर नहीं आया?’ मैं कहता - ‘मैंने देखा कि आपके भाषण के दौरान कोई अपनी जगह से नहीं हिला। किसी ने कोई सवाल तो नहीं पूछा लेकिन एक भी आदमी हँसा भी नहीं। एक बार भी तालियाँ नहीं बजीं। सब ऐसे बैठे थे जैसे थानेदार ने जबरन उन्हें बैठा रखा हो। मुझे तो ऐसा लगा जैसे आप जिन्दा लोगों को नहीं, गेहूँ के बोरों को भाषण दे रहे थे।’ मेरी बात सुनकर नाहटाजी और ज्यादा नाराज होते थे। कहते थे - ‘तुम अखबारवाले स्साले! किसी के सगे नहीं होते। तुम्हें कुछ भी अच्छा नजर नहीं आता।’ मैं चुप रहता। बोल कर अपनी टप्पल में धौल कौन खाए?

चुनाव परिणाम ने देश को ही नहीं, दुनिया को हिला कर रख दिया। आम सभाओं में गूँगे रहनेवाले, गेहूँ के बोरों की तरह निर्जीव, चुपचाप भाषण सुननेवाले लोग बिना मुँह खोले ऐसे बोले कि इतिहास बन गया। बंसी भाई गाँधी हार गए। लेकिन बंसी भाई कहाँ लगते? खुद इन्दिरा गाँधी ही हार गईं। गूँगे लोगों ने उन्हें इतिहास के कूड़े के ढेर पर फेंक दिया। 

‘मोसन’ की बात इकतालीस बरस पीछे खींच ले गई। मैं अपने में लौटा तब तक वे दोनों उतर चुके थे। इस बात पर ‘मोस’ का जवाब नहीं सुन पाया। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने जनार्दन की लाठी की आवाज सुन ली हो और वह चुप रहा गया हो?  
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‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 09 अगस्त 2018

खरीदी की उम्मीद में मुफ्त बँटी

यह जो कुछ मैं यहाँ लिख रहा हूँ, इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है। सौ टका ‘पराई पूँजी’ है। हिन्दी व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर, कविताओं के मंच की शोभा, अनेक पुस्तकों के रचयिता, अनेक ख्यातनाम सम्मानों से सम्मानित,
बहुप्रशंसित कवि श्री अशोक चक्रधर की पूँजी है यह। वे हिन्दी अकादमी, दिल्ली तथा केन्द्री हिन्दी संस्थान् के उपाध्यक्ष रहे हैं। अपने दाँतों के इलाज के लिए आज इन्दौर में रमेश भाई चोपड़ा के पास बैठा था। बातों ही बातों में रमेश भाई ने कहा - ‘दादा (श्री बालकवि बैरागी) सच्ची में बैरागी ही थे। उनका बस चलता तो अपने आसपासवालों को भी बैरागी बना देते।’ मैंने कहा - ‘ऐसी कौन सी बात आपके सामने आ गई जो ऐसा कह रहे हैं?’ रमेश भाई बोले - ‘मुझे तो घर बैठे ही मालूम हुई। अशोकजी चक्रधर यहीं, इसी ऑफिस में आकर बता गए।’ चूँकि रमेश भाई साहित्यिक अभिरुचि सम्पन्न व्यक्ति हैं इसलिए मुझे लगा, अशोक भाई से उनका आत्मीय सम्पर्क होगा और इसीलिए अपनी इन्दौर यात्रा में वे रमेश भाई के दफ्तर आए होंगे। मैंने सहज भाव से पूछा - ‘कब आए थे? साथ में और कौन था?’ रमेश भाई हँस पड़े - ‘अरे! सशरीर नहीं आए। इसके जरिए आए।’ कहते हुए अपने ड्राअर से एक पत्रिका निकाली और मुझे थमाते हुए बोले - ‘लीजिए! खुद ही पढ़ लीजिए।’ वह ‘साहित्य अमृत’ के जून 2018 अंक की प्रति थी। अशोक भाई ने दादा से जुड़ी, भावाकुल कर देनेवाली अनेक स्मृतियाँ अपने लेख में उकेरी हैं।  

अशोक भाई से दादा के पारिवारिक रिश्तों की जानकारी तो मुझे थी। लेकिन इस लेख से मालूम हुआ कि मेरी ये जानकारियाँ शून्यवत ही थीं। मेरी जानकारियाँ तो केवल अशोक भाई और दादा को लेकर ही थीं। इस लेख से ही मालूम हुआ कि किसी जमाने में मेरे अत्यन्त प्रिय कवि रहे श्री राधेश्यामजी प्रगल्भ, अशोक भाई के पिताजी थे। मैंने देखा है, दादा इन्हें अपना बड़ा भाई मानते थे और इनके पाँव छूते थे।

अपने इसी लेख में अशोक भाई ने वह संस्मरण उजागर किया जिसके आधार पर रमेश भाई ने ‘सबको बैरागी बना देते।’ वाली टिप्पणी की थी। घटना का सार मेरे लिए न तो नया था न ही चौंकानेवाला। दादा के अन्तरंग क्षेत्र के लोग भी नहीं चौंकेंगे। लेकिन ऐसे, गिनती के लोगों के अलावा तमाम लोग जरूर अविश्वास से इस घटना को पढ़ेंगे और शायद चौकें भी।

दादा के निधन के समाचारों के साथ दादा की प्रकाशित पुस्तकों में ‘दादी का कर्ज’ नामक पुस्तक का नाम न देख अशोक भाई हैरान रह गए। इस पुस्तक की प्रकाशन-प्रक्रिया के हर चरण के, अशोक भाई उसी तरह गवाह थे जिस तरह कोई ‘दाई’ किसी प्रसव की समूची प्रक्रिया की गवाह होती है। 

बात तब की है जब अशोक भाई किशोर से युवा होने की दहलीज पर थे। उनके परिवार ने प्रिण्टिंग प्रेस लगाई। कम पूँजी में बढ़िया काम करने के संकल्प के साथ प्रगल्भजी ने प्रेस का नाम ‘संकल्प प्रेस’ रख दिया था। इस प्रेस से जो पहली पुस्तक प्रकाशित हुई, वह थी दादा की बाल कविता ‘दादी का कर्ज।’ उस पुस्तक की पूरी कम्पोजिंग अशोक भाई ने की थी। उसका, दुरंगा आवरण मथुरा के एक कलाकार ने बनाया था। चित्रों की छपाई के लिए तब ‘ब्लॉक’ बनते थे। दो ब्लॉक बने थे। आवरण पृष्ठ की छपाई, लाल और आसमानी रंग में दो बार हुई थी। उस जमाने में वह मुखपृष्ठ ‘चित्ताकर्षक’ था। 

दादा तब मन्त्री बने ही बने थे। प्रगल्भजी को आशा थी कि यह किताब सरकारी खरीद में आ जाएगी। एक प्रकाशक और सप्लायर के रूप में अशोक भाई, ‘दादी का कर्ज’ लेकर भोपाल पहुँचे। मिलनेवालों की भीड़ छोड़कर दादा, अशोक भाई को अन्दर, अपने अध्ययन कक्ष में ले गए। पुस्तक देखकर बहुत खुश हुए। ‘चचे’ के निवास पर ‘भतीजे’ की भरपूर आवभगत हुई। 

दो दिन भोपाल रुक कर अशोक भाई, शानदार विदाई के साथ मथुरा लौट गए। अशोक भाई लिखते हैं - “कुछ दिन बाद पिताजी के पास बैरागीजी का पत्र आया कि ‘क्योंकि मैं अब मन्त्री हो गया हूँ, इसलिए सरकारी खरीद में अपनी किताब का प्रस्ताव नहीं रख सकता। कोई और रखेगा तो समर्थन नहीं करूँगा। आप मध्य प्रदेश में नहीं, किसी और प्रान्त में प्रयत्न करें।’ पिताजी भी घर-फूँक तमाशा देख संप्रदाय के थे। उन्होंने कहीं और प्रयास किया हो, मुझे याद नहीं पड़ता। वह पुस्तक उदारता से बाँटी गई। दोबारा छपी नहीं। शायद इसीलिए सूची में उस पुस्तक का नाम नहीं आया। बिना अपनी पूरी उम्र पाए काल के चक्र में समा गई।”

आज के जमाने में इस किस्से के दोनों पात्रों, प्रगल्भजी और दादा को लोग मूर्ख ही कहें तो विस्मय नहीं। लेकिन ‘वे’ लोग ऐसे ही थे। बकौल अशोक भाई - ‘घर-फूँक तमाशा देख सम्प्रदाय’ के सदस्य। वे इसी में मगन, पूर्ण सन्तुष्ट और भर-पेट प्रसन्न थे। आत्मा की यह शुद्धता और यह कंचन-नैतिकता उनकी जीवनी शक्ति थी और यही उनके जीवन का पाथेय भी था। उनकी जेबें खाली रहती थीं लेकिन देश के श्री-पुत्र उनकी अगवानी में गुलाब-जल की झारियाँ लिए प्रतीक्षारत रहते थे। वे मस्तमौला थे। कबरीपंथी मस्ती के कुबेर।
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पाकिस्तानियों ने हमेंं हरा दिया


पाकिस्तानियों ने हम भारतीयों को हरा दिया। यदि हराया नहीं है तो, कम से कम यह सन्देश तो दे ही दिया है कि हम गलत रास्ते पर चल पड़े हैं। पाकिस्तानी संसद के चुनावों में इस्लामी आतंकी हाफिज सईद का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत पाया। हाफिज के निकट सम्बन्धी भी चुनावों में उम्मीदवार थे। उनमें से भी कई नहीं जीत पाया। पाकिस्तान मतदाताओं ने सारी दुनिया को जता दिया कि वे अमनपसन्द कौम हैं और वे धार्मिक आतंकवाद को खारिज, अस्वीकार करते हैं।


धार्मिक कट्टरता के सन्दर्भ में वहाँ की प्रगतिशील  कवयित्री फहमीदा रियाज ने पाकिस्तान को ‘नरक’ तक कहा था। कोई तेरह बरस पहले वे, भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाने के आतंकी, उन्मादी उपक्रम देख वे चौंकी थी। अपनी मनोदशा उन्होंने, ‘तुम बिलकुल हम जैसे निकले’ शीर्षक कविता से व्यक्त की थी। लोगों ने ढूँढ-ढूँढ कर इसे पढ़ा था और सबने इसे भरपूर व्यापक किया था। अपनी संसद के चुनाव परिणामों से वे निश्चय ही खुश हुई होंगी। लेकिन भारतीय सन्दर्भों में उनकी यह कविता भविष्यवाणी जैसी लगती है। ‘आदित्यहृदयस्तोत्रम्’ में ‘कवि’ को सूर्य का पर्यायवाची कहा गया है। याने ‘कवि’, सूर्य की ही तरह ‘त्रिकालदर्शी’ होता है। 2005 में लिखी अपनी इस कविता में फहमीदा रियाज भारत का भविष्य बाँचती लगती हैं।

पाकिस्तानी संसद के चुनाव परिणामों ने हलकी सी आशा जताई है - लोग सेना के राजनीतिक हस्तक्षेप को पसन्द नहीं करते हैं। वे सेना को सारी मुसीबतों की जड़ मानते हैं। जानते हैं कि पाकिस्तान की तमाम सरकारें सेना की कैदी होती हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि धार्मिक कट्टरता और आतंक को सेना ही पाल-पोस रही है। चुनावों के दौरान उन्होंने सेना और आईएसआई के विरुद्ध प्रदर्शन भी किए। यह रोचक विसंगति है कि सारी दुनिया इमरान खान को सेना की कठपुतली ही मान रही है। देखना रोचक होगा कि प्रधान मन्त्री के रूप में इमरान  पाकिस्तानी जनता की भावनाओं से कैसे तादात्म्य बैठाते हैं। 

लेकिन हम क्या कर रहे हैं? पाकिस्तानी जनता जिन हालात से मुक्ति चाह रही है, हम उन्हीं हालात की ओर बढ़ रहे हैं। पाकिस्तानी लोग धार्मिक आतंकवाद को नकार रहे हैं और हम अपनी जगविख्यात सहिष्णुता, उदारता, समरसता, नम्रता, छोड़ कट्टरता को गले लगाने को ‘राष्ट्र भक्ति’ साबित करने में लग गए हैं। चारों ओर नफरत, वैमनस्य, भय, आतंक, बैर पसर रहा है। जिस बात के लिए हम पाकिस्तान की आलोचना करते हैं, वही बात खुद अमल में लाने को जरूरी कर रहे हैं। इस्लामी कट्टरता का जवाब हिन्दू कट्टरता से न केवल दे रहे हैं बल्कि इसे उचित, जरूरी  मान रहे हैं और इससे आगे बढ़कर इस पर गर्व कर रहे हैं।

गए दिनों मुझे हुए एक अनुभव से आप भी रू-ब-रू हाइए। 

वे तीन भाई हैं। एक भाई केन्द्र सरकार के उपक्रम में अफसर थे। सेवा निवृत्त होकर, दोनों भाइयों साथ व्यापार कर रहे हैं। बीच बाजार में उनकी दुकान है। जिस सामान का व्यापार करते हैं, वैसी दुकानें मेरे कस्बे में पाँच भी नहीं होंगी। छोटा-मोटा ‘मोनोपॉली बिजनेस’ मान लीजिए। तीनों के मित्र मण्डल और ग्राहकों में मुसलमानों की बड़ी संख्या है। कइयों से तो सघन घरोपा है। एक भी मुसलमान मित्र या ग्राहक ने कभी कोई कष्ट नहीं दिया। किसी ने वादाखिलाफी, बेवफाई, विश्वासघात नहीं किया। किसी ने उधारी का पैसा नहीं हड़पा। अपने एक भी मुसलमान मित्र या ग्राहक से, तीनों में से किसी को कोई शिकायत नहीं है। लेकिन तीनों का कहना है ‘मुसलमान हम हिन्दुओं का हक मार रहे हैं। सारी सरकारी सबसीडी खा रहे हैं। अस्पतालों में जाओ तो ये ही ये नजर आते हैं। सरकारी नौकरियों में भरे पड़े हैं। इनका इलाज तो होना ही चाहिए था। इनके साथ जो हो रहा हैै वो बहुत अच्छा हो रहा है। जरूरी है। यह तो बहुत पहले हो जाना था। अब मोदी इनका इलाज कर रहा है।’ मैंने तीनों से, इनकी बातों की पुष्टि में आँकड़े या अनुभव माँगे तो बोले - ‘आप यूँ एक-एक करके पूछोगे तो कुछ भी नहीं मिलेगा। लेकिन हैं ऐसे ही। इसी काबिल हैं।’ मैंने पूछा - ‘आपको निजी तौर पर किसी से कोई शिकायत नहीं और आपके पास न तो घटनाएँ हैं न ही आँकड़े। फिर आप ऐसा किस आधार पर कह रहे हैं?’ जवाब वही मिला - ‘आप एक-एक करके पूछोगे तो कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन ये हैं इस काबिल ही।’ मैंने पूछा - “आप ‘मान कर’ कह रहे हैं या ‘जान कर’ कर कह रहे हैं?” जवाब आया - ‘आपको जो समझना हो समझ लो, मानना हो तो मानो, नहीं मानना हो तो मत मानो। लेकिन हैं ये इसी काबिल।’ केन्द्र सरकार के उपक्रम से सेवानिवृत्त हुए भाई से मैंने पूछा - ‘आप तो सरकारी अफसर रह चुके हैं! कानून-कायदे जानते हैं। आप लोगों के ये जवाब क्या वाजिब हैं?’ फौरन जवाब मिला - ‘देखो! विष्णु भैया! आप बातों में उलझाओ मत। एक बार कह दिया ना कि ये लोग हैं इसी काबिल! बस! कह दिया सो कह दिया।’

तीनों मुझसे खिन्न थे। बातचीत बढ़ने की गुंजाइश खत्म हो चुकी थी लेकिन मुझे तसल्ली नहीं हो रही थी। मैंने कहा कि ‘निपटाने’ का यह सिलसिला आज विधर्मियों पर लागू है लेकिन आनेवाले समय में यह ‘राजनीतिक असहमतों’ से होता हुआ ‘व्यक्तिगत असहमतों’ तक आकर कभी आप पर भी आ सकता है। बोले - ‘वो तो होगा ही। लेकिन वो भी मंजूर। लेकिन इनका इलाज तो होना ही चाहिए। मोदी वही कर रहा है। बढ़िया है।’ मैंने बात को व्यापारिक सन्दर्भों की ओर मोड़ी - ‘आपका तो मोनोपाली बिजनेस है। नोटबन्दी और जीएसटी से आपको तो कोई फरक नहीं पड़ा?’ चिहुँक कर बोले - ‘क्या बात करते हो विष्णु भैया? व्यापार तो व्यापार है! फरक कैसे नहीं पड़ा? पड़ा और अच्छा-खासा पड़ा। ऐसी मार पड़ी है कि अभी तक कमर सीधी नहीं हो रही है।’ मैंने पूछा - ‘अब तो आप व्यापारियों की पार्टी की ही सरकार है! अब तो आपको कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए!’ जवाब मजेदार मिला - ‘देखो विष्णु भैया! आज की तारीख में तो इस सरकार में व्यापार का भट्टा बैठा हुआ है। छोटे व्यापारी का तो बाजार में बैठना ही मुश्किल हो गया है। सच्ची बात तो यह है कि व्यापार तो हम काँग्रेसी राज में ही करते थे। लेकिन अपन तो मोदी के पीछे हैं। व्यापार समेटना पड़े तो समेट लेंगे। घर बैठना पड़ेगा तो बैठ जाएँगे। लेकिन इन मुसट्टों का तो इलाज होना ही चाहिए। और मोदी यह कर रहा है। अपन तो इसी में खुश हैं।’ समूचे सम्वाद में मुझे फहमीदा रिआज बराबर याद आती रही। उनका कहा सच होते मैं अपनी आँखों देख रहा था, अपने कानों सुन रहा था। 

मुझे गुस्सा नहीं आया। ताज्जुब भी नहीं हुआ। अब मैंने खुद को ऐसे जवाबों के लिए अच्छी तरह तैयार कर लिया है। लेकिन जर्मनी याद आता रहा। हिटलर ने नस्लवाद को सरकारी सुरक्षा, संरक्षा दी थी। लेकिन वहाँ के लोग आज खुद को हिटलर से जोड़ने पर शर्मिन्दा होते हैं। दुनिया से माफी माँगते हैं। धार्मिक कट्टरता और धर्मान्धता दम्भ से शुरु होती है और लज्जा, अपराध-बोध और आत्म-ग्लानि पर समाप्त होती है। बरसों पहले, मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री द्वारका प्रसादजी मिश्र ने कहा था - ‘दंगे तो मुख्यमन्त्री कराता है।’ जाहिर है, ‘कानून और व्यवस्था’ वही और वैसी ही होती है जैसा सरकार चाहती है। अनुचित पर सरकारों की चुप्पी अपने आप मेंं एक बयान होतीी है।

इस समय हम यही, नफरतों से भरा बयान सुन रहे हैं जो कह रहा है - पाकिस्तानियों ने हम भारतीयों को हरा दिया है।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 02 अगस्त 2018


तत्काल सन्दर्भ के लिए फहमीदा रिआज की कविता यहाँ प्रस्‍तुत है -


                                                            तुम बिलकुल हम जैसे निकले

                                                            अब तक कहाँ छुपे थे भाई
                                                            वो मूरखता, वो घामड़पन
                                                            जिसमे हमने सदी गँवाई
                                                            आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे
                                                            अरे बधाई बहुत बधाई

                                                           प्रेत धरम का नाच रहा है
                                                          कायम हिन्दू राज करोगे?
                                                          सारे उलटे काज करोगे
                                                         अपना चमन दराज करोगे
                                                         तुम भी बैठे करोगे सोचा
                                                         पूरी है वैसी तैयारी

                                                         कौन है हिन्दू कौन नहीं है
                                                         तुम भी  करोगे फतवे जारी
                                                         होगा कठिन यहाँ भी जीना
                                                         दाँतों आ जायेगा पसीना
                                                         जैसी तैसी कटा करेगी
                                                         यहाँ भी सबकी साँस घुटेगी

                                                          कल दुःख से सोचा करती थी
                                                          सोच के बहुत हँसी आज आई
                                                           तुम बिलकुल हम जैसे निकले
                                                           हम दो कौम नहीं थे भाई !

                                                          भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
                                                          अब जाहिलपन के गुण गाना
                                                          आगे गड्ढा है ये मत देखो
                                                           वापस लाओ गया ज़माना
                                                           मश्क  करो तुम आ जायेगा
                                                           उलटे पाँव चलते जाना

                                                          ध्यान न मन में दूजा आये
                                                          बस पीछे ही नज़र जमाना
                                                          एक जाप सा करते जाओ
                                                          बारम-बार यही दोहराओ
                                                          कितना वीर महान था भारत
                                                          कैसा आलिशान था भारत
                                                         फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
                                                          बस परलोक पहुँच जाओगे

                                                         हम तो हैं पहले से वहाँ पर
                                                        तुम भी समय निकालते रहना
                                                        अब जिस नरक में जाओ वहाँ से
                                                         चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना
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