उन्हें सवाई-ड्योड़ी मौत मिली

13 मई 2018 रविवार। हर दिन की तरह एक सामान्य दिन। रोज की तरह दादा उठे। नौ बजे तक तैयार हो गए। आज उन्हें एक पेट्रोल पम्प के उद्घाटन में जाना है।

घर में कुल तीन लोग हैं - दादा, बड़ा बेटा मुन्ना और परिचारक भूरा। बहू सोना, राजसमन्द गई है, बेटी (याने दादा की पोती) रौनक के पास। वह वहाँ जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी है। बहू सोना आज आ रही है। वह उदयपुर आ जाएगी। मुन्ना उसे लेने उदयपुर जाएगा। 

दादा सलीम कुरेशी को फोन करते हैं - ‘वक्त पर आ जाना। साढ़े ग्यारह बजे उद्घाटन है। मैं तैयार बैठा हूँ।’ मल्हारगढ़-नीमच फोर लेन पर, ग्राम चंगेरा में एक पेट्रोल पम्प का उद्घाटन है। कार्यक्रम में जाना तो बहुत पहले से तय था लेकिन उन्हें कल ही मालूम हुआ कि उद्घाटन उन्हें ही करना है। वे मना कर ही नहीं सकते थे। पेट्रोल पम्प बाबू सलीम चौपदार का है और बाबू किसी परिजन से कम नहीं। दादा को देर से पहुँचना पसन्द नहीं। कोई आए न आए, कार्यक्रम भले ही देर से शुरु हो, वे समय से पहले ही पहुँचते हैं। आदत है उनकी।

दस बज कर पाँच मिनिट हो गए हैं। दादा अधीर हो गए हैं। अब तक तो उन्हें निकल जाना चाहिए था। लेकिन उन्हें ले जानेवाले  अब तक नहीं आए। वे फोन लगाने की सोचते हैं। लेकिन फोन लगाएँ, उससे पहले ही कार दरवाजे पर आ जाती है।  चन्द्रशेखर पालीवाल, मंगेश संघई, सलीम कुरेशी और ओम रावत उतरते हैं। चन्द्रशेखर मनासा ब्लॉक काँग्रस अध्यक्ष है और मंगेश जिला काँग्रेस उपाध्यक्ष। दादा उठ खड़े होते हैं - ‘चलो भई! चलो। अपन लेट हो गए हैं।’ चारों में से कोई एक कहता है - ‘प्रोग्राम साढ़े ग्यारह बजे है। अपन घण्टे भर में ही पहुँच जाएँगे। लेट नहीं होंगे।’ दादा कुछ नहीं बोलते। वे ड्रायवर के पासवाली सीट पर बैठ चुके हैं। हाथ से इशारा करते हैं - चलो। कार चल पड़ती है।

दादा के जाने के कोई दो घण्टे बाद मुन्ना भी उदयपुर के लिए निकल जाता है। दोनों बाप-बेटे पहले ही तय कर चुके हैं - सम्भव हुआ तो मुन्ना और सोना, दादा की वापसी के समय तक नीमच पहुँच जाएँगे और सब साथ-साथ मनासा आएँगे। 

सवा ग्यारह बजे दादा पेट्रोल पम्प पर पहुँचते हैं। लोग दादा की आदत जानते हैं। सो, काफी लोग पहुँच चुके हैं। बाबू भाई उनकी अगवानी करते हैं। 

साढ़े ग्यारह बजे कार्यक्रम शुरु होता है। दादा से आग्रह किया जाता है - मंच पर आने का। वे मना कर देते हैं। उन्हें मंच पर चढ़ने में तकलीफ होती है। फौरन तय होता है - मंच पर कोई नहीं बैठेगा। सब दादा के साथ, मंच के नीचे ही बैठेंगे। दादा तो मंच पर नहीं गए। मंच ही नीचे आ गया।

तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक दादा से उद्बोधन का अनुरोध होता है। दादा माइक सम्हालते हैं। अपनी चिर-परिचित शैली में, लगभग तीस मिनिट में अपनी बात कहते हैं। बाबू सलीम के परिवार से अपने नाते का विस्तृत ब्यौरा देते हुए उन्हें और उनके परिवार को असीसते हैं। धन्धे में मधुर व्यवहार, नैतिकता, पारदर्शिता, ईमानदारी बरतने की, आैर ग्राहकों को दिए जाने वाले बिलों पर हिन्‍दी में हस्‍ताक्षर करने की आग्रहभरी सलाह देते हैं। यह सब करते हुए मीठी चुटकियाँ लेते हैं। लोगों को गुदगुदी होती है। ठहाके लगते हैं। बार-बार तालियाँ बजती हैं।
पेट्रोल पम्प उद्घाटन समारोह में बोलते हुए दादा (चित्र - बाबू भाई चोपदार की फेस बुक वाल से)

दादा फीता काटते हैं। कार्यक्रम समाप्त होता है। भोजन शुरु हो जाता है। दादा की मनुहार होती है। वे भोजन से इंकार कर देते हैं। एक मनुहार होती है - ‘थोड़े से दाल-चाँवल तो चलेंगे।’ दादा हाँ भर देते हैं। प्लेट आ जाती है। दादा प्रेमपूर्वक भोजन करते हैं।

ढाई बज गए हैं। गर्मी चरम पर है। मुन्ना और सोना अब तक नहीं आए हैं। दादा रवाना हो रहे हैं। लोग उन्हें बिदा करने कार तक आते हैं। दादा, ड्रायवर के पासवाली सीट पर बैठते हैं। नमस्कार करते हुए सबसे कहते हैं - ‘आप लोग भी जल्दी से जल्दी अपने-अपने मुकाम पर पहुँचो और आराम करो। गरमी बहुत तेज है।’ 

लगभग साढ़े तीन बजे दादा अपने निवास पर पहुँचते हैं। चन्द्रशेखर, मंगेश, सलीम और ओम जाने की इजाजत माँगते हैं। दादा उन्हें रोकते हैं - ‘ऐसे कैसे? पानी पीकर जाओ।’ वे भूरा को आवाज लगाते हैं - ‘भूरा! इन्हें दो-दो गिलास पानी पिलाना। इन्होंने आज बहुत श्रीखण्ड खाया है।’ चारों हँसते हैं। पानी पीते हैं। दादा चारों को बिदा करते हैं - ‘अब जाओ। तुम भी आराम करो। मैं भी आराम करूँगा।’

दादा अपने कमरे में आते हैं। कुर्ता बदल कर लेट जाते हैं। साढ़े चार बजे उठते हैं। मुन्ना को फोन लगाते हैं - ‘कहाँ हो तुम लोग?’ मुन्ना बताता है कि वे मंगलवाड़ चौराहा पार कर चुके हैं। दादा कहते हैं - ‘मैं घर आ गया हूँ। आराम कर लिया है। अब चाय पीयूँगा। तुम लोग तसल्ली से आना। जल्दी मत करना।’ फोन बन्द कर वे भूरा से चाय के लिए कहते हैं और दाहिनी हथेली पर सर टिका कर, दाहिनी करवट पर लेट जाते हैं।

दादा ग्रीन टी पीते हैं। बनाने में कोई देर नहीं लगती।
मुश्किल से पाँच मिनिट होते हैं कि भूरा चाय लेकर पहुँचता है। देखता है, दादा सो रहे हैं। वह ‘पापाजी! पापाजी!!’ की आवाज लगाता है। कोई जवाब नहीं मिलता। उसे लगता है, दादा थक गए हैं। गहरी नींद में हैं। वह वापस चला जाता है। कोई दस मिनिट बाद फिर चाय बनाकर लाता है और दादा को आवाज लगाता है-एक बार, दो बार, तीन बार। दादा जवाब नहीं देते हैं। वह उन्हें हिलाता है। दादा फिर भी न तो कुछ बोलते हैं न ही आँखें खोलते हैं। भूरा घबरा जाता है। रोने लगता है। इसी दशा में मुन्ना को फोन कर सब कुछ बताता है। मुन्ना कहता है -‘पापा को हिला।’ भूरा कहता है, वह सब कुछ कर चुका। मुन्ना इस समय निम्बाहेड़ा के आसपास है। वह फौरन डॉक्टर मनोज संघई को फोन लगाता है - ‘जल्दी पापा को देखो। वे बोल नहीं रहे। लगता है, उनकी शुगर कम हो गई है।’ मनोज भाग कर दादा के पास पहुँचता है। दादा को टटोलता है। वह पाता है - अब दादा की केवल देह वहाँ है। दादा नहीं। 

मनोज, मुन्ना को फोन करता है - ‘दादा चले गए मुन्ना भैया। आप जल्दी चले आओ।’ मुन्ना गाड़ी चला रहा है। एक पल उसके हाथ काँपते हैं। लेकिन वह खुद को संयत करने की कोशिश करते हुए, भर्राई आवाज में सोना से कहता है - ‘पापा चले गए सोनू! सबको फोन करो।’ सोना पर मानो पहाड़ टूट पड़ता है। वह रोने लगती है। मुन्ना कहता है - ‘मैं गाड़ी चला रहा हूँ। फोन नहीं कर सकता। तुम फोन करो।’ रोते-रोते ही सोना एक के बाद एक परिजनों को फोन लगाती है और रोते-रोते हम सबको खबर करती है। 

सात-सवा सात बजे मुन्ना घर पहुँचता है। देखता है, अपनी दाहिनी हथेली पर माथ टिकाए दादा, दाहिनी करवट लेटे हुए हैं। रोज की तरह। मानो अभी उठ जाएँगे और कहेंगे - ‘मेरी चाय लाओ।’

दादा ‘अकस्मात मृत्यु’ की बातें किया करते थे। लगता है, उन्होंने कभी एकान्त में ईश्वर से अकस्मात मृत्यु माँगी होगी। ईश्वर ने उनकी कामना सवाई-ड्योड़ी पूरी की। केवल अकस्मात मृत्यु नहीं दी। निःशब्द, एकान्त, अकस्मात मृत्यु दी। अन्तिम समय में वे थे और उनका ईश्वर उनके पास था। उनसे बतिया रहा था।
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रे! नागरिक! अपनी औकात समझ

शुक्रवार। 11 मई 2018। सुबह के साढ़े नौ बजे हैं। मैं इन्दौर में हूँ। अपराह्न तीन बजे वाली बस से रतलाम लौटूँगा। बोरिया-बिस्तर बाँधना है। लेकिन उससे पहले यह सब लिखने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। लिख तो रहा हूँ लेकिन मर्मान्तक पीड़ा से। आँसू बह रहे हैं, अक्षर धुँधला रहे हैं। लिखा नहीं जा रहा। लेकिन लिख रहा हूँ। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा कि कि मुझे क्या लिखना है और यह लिखना कहाँ, कैसे खत्म करूँगा। 

मालवा अंचल के अनगिनत गरीबों का सहारा बना हुआ, सात मंजिला महाराजा यशवन्त अस्पताल अपनी पहचान ‘सर्वाधिक अव्यवस्थित अस्पताल’ के रूप में बना चुका है। मन्त्री, अफसर इन्दौर आते हैं, इस अस्पताल का निरीक्षण करते हैं। हर बार अनगिनत कमियाँ पाते हैं। हर बार डॉक्टरों, कर्मचारियों को डाँटते-फटकारते हैं। चले जाते हैं। अखबारों के पहले पन्नों पर यह सब छपता है। लेकिन शायद ही कभी कुछ होता-जाता हो। 

गए दस-बारह दिनों से यह अस्पताल लगातार अखबारों के नगर पन्नों की पहली खबर बना हुआ है।

इन्दौर से तीस-बत्तीस किलो मीटर दूर के बेटमा का 42 वर्षीय अब्दुल सलाम यहाँ भर्ती है। उसकी, पेट की बड़ी आँत का ऑपरेशन हुआ है। टाँकों पर डेªसिंग के कारण पसीना आने से बहुत तकलीफ होती है। वार्ड वातानुकूलित नहीं है। अब्दुल के परिजन मजबूरी में घर से कूलर लाए। कूलर से अतिरिक्त बिजली खर्च होती है। सो, डॉक्टर ने आसानी से अनुमति नहीं दी। परिजनों को कई बार गुहार लगानी पड़ी। 

अस्पताल की पहली मंजिल पर महिला वार्ड है। बीस बिस्तर हैं। लेकिन पंखे कुल 12 ही लगे हैं। इनमें से भी एक निकल गया है। उसे सुधरवाने के लिए किसी के पास समय नहीं है। समय तो तब हो जब इस ओर किसी का ध्यान जाए और इसे सुधरवाना जरूरी समझा जाए।

रोगियों के परिजन बाहर से न तो भोजन ला सकते हैं न चादर और न ही कोई और सामान। रोगियों के पास बैठनेवालों (अटेण्डरों) के बैठने की व्यवस्था नहीं है। उन्हें या तो मरीज के बिस्तर पर बैठना पड़ता है या धरती पर। अस्पताल की अधिकांश मंजिलों के खाद्य भण्डारों (पेण्ट्रियों) में पानी की व्यवस्था नहीं है। रोगियों के परिजन अस्पताल के आसपास बनी प्याउओं से पानी लाते हैं। रोगी की पहियेदार कुर्सी (व्हील चेयर) रोगी के परिजनों को ही धकेलनी पड़ती है।

अस्पताल के इण्डोस्कोपिक ऑपरेशन थिएटर नम्बर एक में प्रतिदिन दो-तीन ऑपरेशन होते थे। वह बन्द कर दिया गया है। आईसीयू और ऑपरेशन थिएटर में एयर कण्डीशनर अनिवार्य होते हैं क्यों कि ठण्डक में बैक्टिरिया नहीं पनपते। इस ऑपरेशन थिएटर का एयर कण्डीशनर खराब हो गया है। इसलिए इसे बन्द कर देना पड़ा। 

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इस अस्पताल में सब कुछ ऐसा ही, इतना ही खराब हो। एक मरीज के लिए इस अस्पताल की पाँचवीं मंजिल पर बने कार्डियक इको चेस्ट सेण्टर को विशेष वार्ड में बदल दिया गया है। मरीज के परिजनों की सुविधा के लिए नर्सों के लिए बने कमरा नम्बर 513 को प्रायवेट रूम में बदल दिया गया है और डायलेसिस इकाई का एयर कण्डीशनर निकाल कर यहाँ लगा दिया गया है। अस्पताल का पूरा स्टॉफ, अस्पताल के तमाम रोगियों को भूलकर इस रोगी की तीमारदारी में और इसके परिजनों की खातिरदारी में लगा अनुभव हो रहा है। 

बात कुछ खास नहीं है। 91 वर्षीया एक वृद्धा को 21 अप्रेल को छाती में दर्द हुआ। मालूम हुआ कि उसे निमोनिया की भी शिकायत है। सर्वोच्च वरीयता देकर उस वृद्धा को तत्काल भर्ती किया गया। यह सब उसी वृद्धा के लिए हो रहा है।  यह  सब उसी वृद्धा के लिए हो रहा है। यह संयोग ही है कि यह वृद्धा, प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव की माँ है। 



इन्दौर अत्यधिक सजग शहरों में गिना जाता है। सामाजिक बदलावों के लिए यह शहर समूचे मालवा अंचल को दिशा देता है। लोक सभा स्पीकर श्रीमती सुमित्रा महाजन यहीं से सांसद हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महामन्त्री और भारी-भरकम राजनेता कैलाश विजयवगीर्य यहीं के बाशिन्दे हैं। यहाँ के पाँचों विधायक भाजपा के हैं और पाँचों ही मन्त्री बनने की पात्रता रखते हैं। मुख्य मन्त्री इन्दौर को अपना दूसरा घर कहते हैं। लेकिन सात मंजिला अस्पताल में हो रही इस असामान्य अनहोनी से किसी का कोई लेना-देना नजर नहीं आ रहा। 

‘लोक कल्याण’ किसी भी राज्य, किसी भी प्रशासन की पहली जिम्मेदारी होती है। लेकिन यहाँ तो राज्य या कि प्रशासन ही ‘लोक’ को दुखी किए हुए है और दुखी किए ही जा रहा है। शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी होती है यह देखना कि गरीब को उसका हक मिल रहा है या नहीं, किसी गरीब का हक कोई सरमायेदार तो नहीं छीन रहा। लेकिन यहाँ तो शासन-प्रशासन खुद ही गरीब का हक हड़प रहा है।
अपनी स्कूली किताबों में हम किस्से पढ़ा करते थे कि अपनी प्रजा के हाल जानने के लिए किस तरह राजा भेस बदल कर रात को गलियों, पगडण्डियों के चक्कर लगाते थे। अपने मनसबदारों के आचरण पर वे पैनी नजर रखते थे। लेकिन इन्दौर का यह किस्सा तो एकदम उलटा है! राजा और उसके मनसबदार खुद ही गरीब का हक हड़प रहे हैं, वह भी चौड़े-धाले!

इन्दौर में बारहों महीने किसी न किसी धार्मिक आयोजन का पाण्डाल तना ही रहता है। इस पर मैं कल ही विस्तार से लिख चुका हूँ। मैं अनुमान लगा रहा हूँ कि इन्दौर के धार्मिक आयोजनों के एक वर्ष के खर्च की रकम से इस अस्पताल की सारी तकनीकी और मशीनी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। पूरे अस्पताल के एयर कण्डीशनर, पंखे, पीने के पानी के कूलर बदले/खरीदे जा सकते हैं। लेकिन ऐसा कोई नहीं करेगा। अस्पताल की इन प्राणलेवा अव्यवस्थाओं की जानकारी नगर के तमाम धर्म-पुरुषों को है। लेकिन इस काम के लिए कोई आगे नहीं आएगा। क्योंकि वे यदि अस्पताल की काया पलट करेंगे तो वह सब सारी दुनिया को नहीं दिखेगा। केवल अस्पताल में ही सिमट कर रह जाएगा। उसकी खबर भी एक दिन ही छप कर रह जाएगी। लेकिन कथाएँ, भण्डारे, चुनरी यात्राएँ बारहों महीने, सातों दिन, चौबीसों घण्टे उन्हें लोगों के बीच सर्वव्यापी बनाए रखते हैं और उनकी राजनीतिक ताकत बढ़ाते हैं। ऐसे आयोजनों में वे भी खुशी-खुशी जाते हैं जिनका हक यहाँ मारा जा रहा है और वे तो सबसे पहली पंक्ति में बैठते ही हैं जो गरीबों का हक मारते हैं। कथावाचक भी पूरी अन्तर्कथा जानता है लेकिन वह चुप रहने की समझदारी बरतता है। वह भली प्रकार जानता है कि यदि वह अंगुली उठा देगा तो कल से उसका पाण्डाल सूना हो जाएगा और उसे ‘एकान्त आराधना’ करनी पड़ जाएगी।

यह सब अनुभव करते हुए, लिखते हुए मुझे मर्मान्तक पीड़ा हो रही है। हम कहाँ आ गए हैं? या कहिए कि कहाँ ले आए गए हैं? सामान्य नागरिक के रूप में हमारी क्या औकात रह गई है? हमें तो मनुष्य भी नहीं माना जा रहा! हम तो केवल वोट बनकर रह गए हैं! वोट भी ऐसा जिसका अपना कोई सोच ही नहीं रह गया है! हमने किन हाथों में खुद को सौंप दिया है? 

मेरी आँखें अभी भी बहे जा रही हैं। अक्षर धुँधला रहे हैं। लेकिन केवल अक्षर ही क्यों? मुझे तो अपना आनेवाला समूचा समय ही धुँधलाता नजर आ रहा है।
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धार्मिक आयोजनों की अपनी-अपनी प्राप्तियाँ

इन्दौर को मध्य प्रदेश की आर्थिक और पत्रकारिता की राजधानी माननेवाले अपनी जानकारी में बढ़ोतरी कर लें। इन्दौर, दो-दो ज्योतिर्लिंगों (महाकालेश्वर और औंकारेश्वर) वाले मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी की हैसियत भी हासिल कर चुका लगता है। इसके साथ ही साथ, अपने मौलिक मालवी जायकों के लिए विश्वप्रसिद्ध इस शहर ने, धार्मिक मादकता युक्त जायकेदार मिठाई का आविष्कार भी किया है। 

कोई एक पखवाड़े से इन्दौर में हूँ तो ऐसी बातें मालूम हो पाईं। वर्ना, प्रोन्नत तकनीकी विस्फोट के कारण, तमाम ‘अखिल भारतीय’ अखबार ‘स्थानीय’ होकर रह गए हैं। इन्दौर की खबरें रतलाम के अखबारों में नहीं मिलतीं और रतलाम की खबरें इन्दौर के अखबारों में नहीं। रतलाम-इन्दौर तो बहुत दूर की बात हो गई, जिले की खबरें भी पूरे जिले में नहीं पहुँच पाती। इन्दौर में पूरी तरह से फुरसत में हूँ। ‘जो नहीं पढ़ा, वह नया’ की तर्ज पर पुराने अखबार भी नए लग रहे हैं। 

धार्मिक गतिविधियाँ यूँ तो हर कस्बे, गाँव में चलती रहती हैं। लेकिन इन्दौर में कुछ इस तरह चलती हैं मानो ‘बम्बई का बच्चा’ यह शहर इन्हीं गतिविधियों के कारण अपनी साँसें लेता है। पुराने अखबारों की ताजी खबरें यह कि अप्रेल में यहाँ तीन कथाएँ हुईं। एक कथा के निमित्त पाँच किलो मीटर लम्बी कलश यात्रा निकली जिसमें लगभग चालीस हजार महिलाओं ने भाग लिया। हमारे देश में धर्म, महिलाओं के जरिए शक्ति पाता है। इसे अनुभव कर, कथा के यजमान ने घर-घर जाकर महिलाओं को न्यौता। खाली हाथ नहीं, प्रत्येक महिला को एक साड़ी भेंट कर। यजमान को इस बात का कष्ट रहा कि लक्ष्य एक लाख साड़ियों का था लेकिन अस्सी हजार ही पहुँचा पाए।  कथा के लिए एक लाख वर्ग फुट का पाण्डाल बना। तीस हजार वर्ग फुट की भोजनशाला अलग से बनाई गई। महिलाओं को घर जाकर भोजन बनाने की चिन्ता से मुक्त रखने के लिए, कथा के बाद तमाम श्रोताओं के लिए भोजन की व्यवस्था थी। सारे व्यंजन शुद्ध देशी घी से बने जिन्हें बावन काउण्टरों के माध्यम से श्रद्धालुओं तक पहुँचाया गया। अब यह यजमान आभार प्रदर्शन करते हुए सवा लाख घरों में  प्रसाद पहुँचाने घर-घर जा रहा है।  

समाचार ने मुझे चकित किया। एक के बाद एक अखबार पलटे तो मालूम हुआ कि यह कथा का यजमान, 2019 के विधान सभा चुनावों में एक पार्टी की उम्मीदवारी का दावेदार है। यह भी मालूम हुआ कि गए चुनावों में अपनी पार्टी से टिकिट न मिलने से असन्तुष्ट हो, निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़, एक पार्टी का विद्रोही उम्मीदवार खुद हार कर और अपनी पार्टी को हराने के बाद फिर चुनाव लड़ने की मंशा से इस सबमें जुटा हुआ है। इस सूचना ने मुझे जिज्ञासु बना दिया। अनूठी जानकारियाँ मिलने लगीं। हर जानकारी एक नई जिज्ञासा जगाए। मित्रों से पूछा तो सब मेरे अज्ञान पर हँसे। मालूम हुआ कि इन्दौर की राजनीति में तो यह सब ‘बुनियादी अनिवार्यता’ है। इस ‘संस्कार’ के बिना तो कोई राजनीति में प्रवेश कर ही नहीं सकता। 

मित्रों ने बताया कि इन्दौर में पाँच विधायक हैं। इस समय, सारे के सारे भाजपा के हैं। विकास कार्यों के लिए किसकी, कितनी-कैसी पहचान है, इस पर दो राय हो सकती है किन्तु इस बात पर सब एक मत हैं कि कम से कम तीन विधायकों की पहचान, अपनी-अपनी धार्मिक गतिविधियों के कारण बनी हुई है। किसी की पहचान चुनरी यात्रा से है तो किसी की कथा-प्रवचन आयोजन से तो किसी की भोजन-भण्डारे से। एक विधायक लड़कियों के विवाह कराते हैं तो एक विधायक से ‘आप कुछ भी धार्मिक आयोजन करवा लो’ से है। जो दो विधायक धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजनों से दूर रहते आए हैं उनमें से एक अब मजबूर होकर धार्मिक हो चले हैं। लोगों की नजरें अब पाँचवें पर हैं - ‘देखते हैं! कब तक टिके रहते हैं।’ इन्दौर वह शहर है जहाँ किसी न किसी धार्मिक आयोजन का विशाल पाण्डाल बारहों महीने-सातों दिन-चौबीसों घण्टे तना रहता है।

कुछ पुराने पत्रकार मित्रों से बात करता हूँ तो मालूम होता है, कोई भी आयोजन करोड़ों से कम का नहीं होता। हर आयोजन भरपूर समय, भरपूर तैयारियाँ और भरपूर धन बल-जन बल माँगता है। मैं पूछता हूँ - ‘इतना खर्चा ये लोग कहाँ से लाते होंगे और इस सबसे इन्हें क्या मिल जाता है?’ मेरे कन्धे पर धौल टिकाते हुए एक मित्र ने समझाया - ‘यह खर्चा नहीं। इन्वेस्टमेण्ट है। ऐसा इन्वेस्टमेण्ट जो बीसियों गुना होकर लौटता है।’

मित्र के जवाब ने मुझे विचारक बना दिया। ऐसे धार्मिक उपक्रम पूरे देश में बारहों महीने चलते रहते हैं। गए दिनों उज्जैन में चक्रतीर्थ श्मशान घट पर ग्यारह दिवसीय, पाँचवाँ ‘सह सुधार महायज्ञ’ हुआ जिसमें इक्कीस फुट गहरे कुए में, 11 किलो चाँदी के कलश से, सूखे मेवे और  एक घण्टे में 90 किलो, एक दिन में 22 क्विंण्टल के मान से शुद्ध देशी घी की आहुतियाँ दी गईं। अभी-अभी पूरे मालवा में साँई-सप्ताह मनाया गया। सात मई को सब जगह भण्डारे हुए। मेरे कस्बे में कम से कम करोड़ रुपये तो इस पर खर्च हुए ही होंगे। देश भर में खर्च होनेवाले इन अरबों रुपयों से कितने स्कूल, कितने अस्पताल साधन-सम्पन्न बनाए जा सकते थे? कितने कुपोषित बच्चों को आहार उपलब्ध कराया जा सकता था? पाँच वर्ष की उम्र तक पहुँचने से पहले ही काल कवलित हो जानेवाले कितने शिशु बचाए जा सकते थे? प्रसव के दौरान होनेवाली कितनी मौतें रोकी जा सकती थीं? कितने बच्चों को उच्च शिक्षित किया जा सकता था? कितनी बच्चियों को उनका हक दिलाया जा सकता था? कितने लोगों को भिक्षा वृत्ति से मुक्त कराया जा सकता था? ये सब बातें सबके (खर्च करनेवालों के और श्रध्दालुओं के) मन में भी आई ही होंगी! लेकिन ऐसा क्या हुआ कि किसी ने अपने मन की नहीं सुनी? 

इन धार्मिक उपक्रमों का सामाजिक अवदान क्या है?अपराध कम होने का नाम नहीं ले रहे। इसके विपरीत लगता है मानो धर्मिक आयोजनों और अपराधों की गति और संख्या में प्रतियोगिता बनी हुई है। लोगों के बीच झगड़े कम नहीं हो रहे। प्रेम के बजय नफरत फैल रही है। समस्याएँ कम नहीं हो रहीं। भ्रष्टाचार कम नहीं हो रहा। लगता है, हमारे दैनन्दिन जीवन की इन सारी बातों से धर्म का कोई लेना-देना है ही नहीं। इन्दौर में पहली बार कथा बाँचने आई किशोरीजी ने एक अखबार को दिए साक्षात्कार में कहा कि कथा सुननेवालों में से दस प्रतिशत पर ही कथा-प्रवचन का असर होता है। मुझे लगता है, ये दस प्रतिशत लोग भी वे ही होंगे जो पहले से ही धर्म को जी रहे होंगे। याने, पहले से ही धार्मिक व्यक्ति अधिक धार्मिक हो रहा है और बाकी सब वैसे के वैसे बने हुए हैं।

धर्म को मनुष्य की आत्मा की उन्नति का श्रेष्ठ माध्यम कहा गया है। ऐसा होता भी होगा। लेकिन वह व्यक्तिगत स्तर पर ही होता होगा। धर्म जब सामूहिक होता है तो वह अपना मूल स्वरूप और अर्थ खोकर केवल दिखावा बन कर रह जाता है।

आज तो नजर आ रहा है कि राजनीति और धन-बल ने धर्म को बैल की तरह जोत रखा है। श्रद्धालुओं को हलों की मूठें थमा दी है। बैल और हलवाहे अपना काम कर रहे हैं। राजनीति और धन-बली इसकी फसल से अपनी कुर्सियों के पाए मजबूत कर रहे हैं, अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं। हलवाहे और उनके परिजन, चलते बैल का गोबर एकत्र कर, उसके ऊपले थाप कर खुद को धन्य और कृतार्थ कर अनुभव कर रहे हैं।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 10 मई 2018                


पाप मन्त्री का, दण्ड राजा को

मेरे एक व्यंग्यकार मित्र अन्ध-समर्थकों से बहुत चकित होते, चिढ़ते और गुस्सा होते थे। उन्हें चुन-चुन कर विशेषणों और उपमाओं से विभूषित करते थे। फिर भी क्षुब्ध ही बने रहते थे। लम्बे समय बाद उन्हें समझ पड़ी कि गलती तो उन्हीं की थी। वे अन्ध समर्थकों से नाहक ही, विवेकवान व्यक्ति की तरह व्यवहार करने की अपेक्षा किए बैठे थे। अब वे उन पर न तो चिढ़ते हैं न ही गुस्सा होते हैं। चकित तो बिलकुल ही नहीं होते। आनन्द लेते हैं। हाँ, उपमाएँ और विशेषण देना जारी रखे हुए हैं। कुछ दिनों पहले तक वे उन्हें ‘मतवाले’ कहा करते थे। अब कुछ दिनों से ‘मसखरे’ कहते हैं।

मैंने टोका। मेरे तईं, ‘मसखरा’ का पर्याय ‘विदूषक’ और ‘जोकर’ है। मेरी जानकारी के अनुसार, मसखरा या विदूषक होना इतना आसान नहीं है। कोई बुद्धिमान, विवेकवान, प्रतिभावान व्यक्ति ही यह दरजा हासिल कर सकता है। विदूषकों को तो भारतीय राजदरबारों में जगह मिलती रही है। राज-विदूषक के नाम पर सबसे पहले गोपाल भाँड का नाम मन में उभरता है। वे, अठारहवीं शताब्दी में, नादिया नरेश कृष्णचन्द्र (1710-1783) के दरबारी थे। वे किसी की खिल्ली नहीं उड़ाते थे। हास्य और करुणा से सनी अपनी टिप्पणियों से न केवल राजा और दरबार का मनोरंजन करते थे अपितु नागरिकों के प्रति राजा और राज्य के उत्तरदायित्वों, उचित-अनुचित का भान भी कराते रहते थे। उनकी प्रतिभा और अनूठे विचारों के कारण राजा कृष्णचन्द्र ने उन्हें अपने नवरत्नों में शामिल किया था। गोपाल भाँड से जुड़ी अनगिनत लोक कथाएँ आज भी सुनी जाती हैं।

दूसरा नाम मुझे याद आया गोनू झा का। परिहास का पुट लिए प्रत्युत्पन्नमति या कि हाजिरजवाबी इनकी पहचान है। ये भी किसी की खिल्ली नहीं उड़ाते थे। अपनी और अपने नायक की प्रतिष्ठा, छवि की रक्षा और उसमें बढ़ोतरी इनका लक्ष्य होता था। ये दोनों काम प्रतिभा और कौशल से ही सम्भव होते हैं, अन्ध समर्थन से नहीं। मुझे नहीं पता कि ये राज दरबार में थे या नहीं। लेकिन मैथिली में कही-सुनी जानेवाली इनकी अधिकांश लोक कथाएँ मिथिला के राजा हरिसिंह से जुड़ी हैं। 

इनके बाद मुझे तेनाली राम याद आते हैं। इनका वास्तविक नाम तेनाली रामकृष्ण था। ये विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय के दरबारी थे। किन्तु विदूषक या मसखरा नहीं थे। उद्भट विद्वान तेनाली राम को ‘विकटकवि’  कहा जाता था और ये राज दरबार के ‘अष्टदिग्गज’ कवियों में शामिल थे। लेकिन इनकी लोक पहचान ‘परिहास प्रिय संकटमोचक’ की बनी हुई है। राजा के अत्यधिक विश्वस्त और प्रिय पात्र होने के कारण अन्य दरबारी इनसे ईर्ष्या करते थे और इन्हें नीचा दिखाने, इनका रुतबा कम करने के निरन्तर प्रयास करते थे और मुँह की खाते थे। अपने राजा पर आए बौद्धिक, राजनीतिक संकट को दूर करने की जिम्मेदारी तेनालीराम ही उठाते थे। राजा कृष्णदेवराय और तेनाली राम की जोड़ी के किस्से सुनते हुए अकबर-बीरबल के किस्से बरबस ही याद आने लगते हैं।

अन्ध समर्थक और मसखरे या कि विदूषक में कोई साम्य तलाश करना समझदारी नहीं है। ‘मसखरा’ लोक रंजक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाता है। वह किसी की अवमानना नहीं करता। किसी को नीचा नहीं दिखाता, किसी का उपहास नहीं करता। अपने नायक के लिए यह सब करते हुए वह दो बातों का ध्यान रखता है। पहली - उसकी किसी भी बात या हरकत से उसके नायक की छवि, प्रतिष्ठा पर खरोंच न आए, कोई लोकोपवाद न हो। दूसरी - वह सदैव अपने नायक को सर्वोच्च वरीयता दे। ऐसा न हो कि वह खुद को नायक से आगे और नायक से बेहतर साबित करता लगे। अन्ध समर्थकों के लिए ये दोनों बातें अर्थहीन होती हैं। अपने नायक की प्रत्येक बात, प्रत्येक क्रिया का औचित्य साबित करने के लिए बिना सोचे-विचारे प्रतिक्रियाएँ देने लगते हैं। वफादारी जताने की होड़ में अंग्रेजी कहावत ‘मोअर लॉयल टू द किंग देन हिम सेल्फ’ (राजा के प्रति खुद राजा से भी अधिक वफादार) को साकार कर देते हैं। ऐसा करते हुए वे प्रायः ही अपने नायक को हास्यास्पद स्थिति में ला खड़े करते हैं। तब अन्ध समर्थक, अपने नायक के लिए बोझ बन जाते हैं।

बातें चल रही थीं। अचानक ही व्यंग्यकार मित्र ने पूछा - ‘ऐसे अन्ध समर्थक दरबारी बन जाएँं या बना दिए जाएँ तब?’ में अचकचा गया। इस सवाल के लिए बिलकुल ही तैयार नहीं था। अचानक ही मुझे देवाचार्य स्वामी राजेन्द्रदासजी महाराज याद आ गए। मैं और मेरी अर्द्धांगिनीजी उनके प्रवचन बड़े चाव से सुनते हैं। श्रीमतीजी धार्मिकता के अधीन सुनती हैं। मैं शब्द सम्पदा के लालच में। मुझे वे, एकमात्र ऐसे प्रवचनकार अनुभव हुए हैं जो ‘शब्द’ को महत्व देते हुए उसका वैयाकरणिक विवेचन करते हैं। कथा सन्दर्भों में उनकी विद्वत्ता और अध्ययन अद्भुत है। मानो, सारे ग्रन्थ उनके जिह्वाग्र पर विराजमान हैं। कोई भी सन्दर्भ या उद्धरण देने के लिए उन्हें निमिष भर भी विचार नहीं करना पड़ता। उनके श्रीमुख से सब कुछ सहजता और स्वाभाविकता से आता है।

इन्हीं राजेन्द्रदासजी महाराज की, ग्वालियर की एक रेकार्डिंग प्रसारित हो रही थी। प्रसंग तो याद नहीं आ रहा किन्तु बात ‘पाप-दण्ड’ से जुड़ी थी। स्कन्द पुराण के हवाले से राजेन्द्रदासजी महाराज ने गुरु, पति और राजा को मिलनेवाले पाप दण्डों का उल्लेख किया। शिष्य के पाप का दण्ड गुरु को भुगतना ही पड़ता है कि उसने अपात्र को शिष्य बनाया। पत्नी के पाप का दण्ड पति को भगुतना पड़ता है कि उसने पति (स्वामी) धर्म का निर्वहन नहीं किया और पत्नी को पाप कर्म की ओर प्रवृत्त होने की स्थितियाँ बनने दीं। मन्त्री के पाप का दण्ड राजा को भुगतना ही पड़ता कि उसने अयोग्य को मन्त्री बनाया। व्यंग्यकार मित्र से मैंने कहा - ‘राजेन्द्रदासजी महाराज के जरिए यदि स्कन्द पुराण की मानें तो ऐसे अन्ध समर्थक के दरबारी बन जाने या बना दिए जाने पर दण्ड का भागी खुद राजा ही होगा।’

मित्र को अब या तो आनन्द आने लगा था या वे मेरे मजे लेने के मूड में आ गए थे। पूछा - ‘चलो! ये तो समझ में आ गया। लेकिन यदि राजा, अपने ऐसे दरबारी को, ऐसा पाप कर्म करने के बाद भी दण्डित न करे। न केवल चुप रह कर उसे क्षमा कर दे, उसके पाप कर्म का समर्थन करे उल्टे उसे ऐसे पाप कर्म करने के लिए निरन्तर प्रोत्साहित करे तो?’ 

अब मेरी बोलती बन्द हो गई। यह तो राजा द्वारा खुद ही प्रत्यक्ष पाप कर्म करना हुआ! इस बारे में न तो राजेन्द्रदासजी महाराज ने कुछ कहा था न ही मैंने सोचा था। जवाब देने  की खानापूर्ति करते हुए मैंने कहा - ‘जब अपने मन्त्री के पाप कर्म का दण्ड उसे मिलेगा तो खुद के पाप कर्म का दण्ड तो उससे पहले मिलेगा ही! ’ मित्र ने चुटकी ली - ‘कितना?’ मैं क्या बताता? जवाब दिया - ‘मुझे नहीं मालूम। कभी राजेन्द्रदासजी महाराज के प्रत्यक्ष दर्शन का सौभाग्य मिला तो पूछूँगा।’ मानो मित्र को मुझ पर दया आ गई हो और वे मुझे गिरफ्त से छोड़ रहे हों, इस तरह बोले - ‘जरूर पूछिएगा और मुझे बताइएगा। आप पर मेरा कर्जा रहा।’

मित्र जाने के लिए उठे। मैंने कहा - ‘ईश्वर मुझे आपके कर्ज से मुक्त होने का अवसर दे। लेकिन ध्यान रखिएगा! अन्ध समर्थकों को मसखरा मत कहिएगा। यह मसखरों का अपमान है। कूढ़ मगज, बट्ठर दिमाग लोग मसखरे नहीं हो पाते। उसके लिए आदमी को सभ्य, सुसंस्कृत, शालीन, विवेकवान और विनम्र होना पड़ता है।’

वे मान गए। अन्ध समर्थकों को अब मसखरा नहीं कहेंगे।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 03 मई 2018


अपवाद के सामान्य में बदलने का आशावाद

यह रविवार, 29 अप्रेल की सुबह है। मैं इन्दौर में हूँ। एक बीमा अभिकर्ता साथी का फोन आया। एक अखबार का नाम और पन्ने का नम्बर बताते हुए कहा - ‘यह खबर पढ़िए। छोटी सी है लेकिन छोटी नहीं है। पढ़िएगा और पढ़कर बताइएगा, मैं ठीक कह रहा हूँ या नहीं।’ 

मेरे पास अखबार नहीं है। मैं अखबार का ई-संस्करण खोलता हूँ। मित्र के बताए पन्ने पर जाता हूँ। ज्यादा खोजना नहीं पड़ता। जल्दी ही नजर आ जाती है। पन्ने के ऊपरी हिस्से में ही है। इन्दौर की सांसद और लोकसभा स्पीकर श्रीमती सुमित्रा महाजन से जुड़ी, छः/साढ़े छः कॉलम शीर्षक वाली खबर है। मित्र की बताई खबर सचमुच में बहुत छोटी है - एक कॉलम में। गिनती की नौ पंक्तियों की। लेकिन मित्र का अनुमान सही है। खबर दीखने में छोटी है लेकिन छोटी है नहीं।

खबर के मुताबिक, जिला विकास एवम् निगरानी समिति की बैठक में, श्रीमती महाजन की उपस्थिति में, पंचायतों को डिजिटल बनाने के मुद्दे पर, बीएसएनएल के अधिकारी जब सफाई दे रहे थे तभी इन्दौर की महापौर श्रीमती मालिनी गौड़ ने पूछा लिया कि बीएसएनएल का फोन एक बार में क्यों नहीं लगता? बड़ी मुश्किल से बात हो पाती है। इस पर अधिकारी ने कहा - ‘मैडम! आपके घर आकर जाँच करा लेते हैं।’ इस पर महापौर ने कहा - ‘मैं अपने घर की नहीं, सभी के घर की बात कर रही हूँ।’ समाचार यहीं समाप्त हो जाता है।

मैं मित्र का आशय समझ जाता हूँ। मेरे मित्र भी आखिर हैं तो मुझ जैसे ही! मैंने उन्हें फोन लगाया। पूछा - ‘अपनी महापौर से नाराज हो?’ बोले - ‘सही पकड़े हैं। बीएसएनएल का फोन एक बार में नहीं लगता यह कोई आज की या एक दिन की बात नहीं है। सारा शहर और आसपास के गाँवों के अनगिनत लोग परेशान हैं। महापौर को यह ज्ञान प्राप्ति उस बैठक में अचानक ही नहीं हुई। वे सब कुछ अच्छी तरह से जानती हैं। लेकिन उन्हें अफसरों से कहने की फुरसत कभी नहीं मिली। वे सारा दिन घूमती हैं। रोज ही आठ-दस पत्र तो लिखवाती ही होंगी। एक चिट्ठी बीएसएनएल के अफसरों को भी लिख देतीं! उन्हे अपने दफ्तर मे बुलवा लेतीं या खुद उनके दफ्तर चली जातीं। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। किया भी तब जब जिले भर के अफसरों का जमावड़ा उन्हें तैयार मिला।’

मित्र की नाराजी मुझे ठीक नहीं लगी। मैंने कहा - ‘आप अपनी महापौर से जबरन नाराज लगते हैं। लगता है, आप कोई काम लेकर गए होंगे और उन्होंने आपको टरका दिय होगा।’ मित्र बोले - ‘आपको लगता है कि मैं इस कारण से ऐसी बातें कर रहा हूँ? ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं नाराज भी नहीं हूँ। हाँ! दुःखी जरूर हूँ। जो काम वे महीनों पहले कर सकती थीं, या कहिए कि उन्हें कर लेना चाहिए था, वह काम करने के लिए वे मौके और मुहूर्त की बाट तकती रहीं। आपको उनसे सहानुभूति हो रही है तो आप भी एक बात नोट कर लो! अफसरों के मजमे में बीएसएनएल के अफसरों को हड़काने के बाद वे पलटकर भी नहीं देखेंगी कि उनके कहे पर कोई कार्रवाई हुई भी या नहीं। मैं इसी बात पर गुस्सा  हूँ और दुःखी हूँ। समस्या का निपटारा करना उनका मकसद नहीं था। उनका मकसद था, अफसरों को हड़काना और अखबारों में सुर्खियाँ पाना। बस! और कोई बात नहीं।’

मैं मित्र से पूरी तरह सहमत नहीं हो सका। महापौर ने भले ही अफसरों को हड़काने के लिए ऐसा किया हो लेकिन मुझे इसमें यह बात अच्छी लगी कि उन्होंने अपनी नहीं, सबकी चिन्ता की। वे जिस हैसियत में हैं उसमें, उन्हें तो फोन से परेशानी नहीं ही हो रही होगी। लेकिन उन्होंने यह महसूस किया कि उनकी जैसी सुविधा बाकी लोंगों को नहीं ही मिल रही है। उनके मन में यह बात आई या पहले से रही हो, मुझे बहुत अच्छी लगी।

हमारी ‘व्यवस्था’ इस मायने में खूब चतुर, चुस्त, चौकन्नी और सजग है। वह खूब जानती है कि कौन कितना बोलेगा और किसके बोले का कितना असर होगा। इसलिए, जिसके बोलने का असर होता लगता है, सबसे पहले उसकी बोलती बन्द करती है। मैं इस बात का भुक्त-भोगी हूँ। एक बार नहीं, कई बार।

लोक सेवाओं से जुड़े विभिन्न विभाग, खानापूर्ति के लिए ग्राहकों के सम्मेलन बुलवाते रहते हैं। ऐसे सम्मेलनों में मुझे खूब बुलावे आते थे। लेकिन किसी भी विभाग ने मुझे दूसरी बार नहीं बुलाया। अब तो मेरी ‘प्रसिद्धि’ इतनी फैल गई है कि अब कोई नहीं बुलाता। अब तो सावधानी बरती जाती है - दफ्तर की गलती से मुझे बुला न लिया जाए

ऐसे ग्राहक सम्मेलनों में होता यह था कि असन्तुष्ट लोगों की शिकायतों के बाद विभाग के लोग उन लोगों से उनके अनुभव पूछते जिन्होंने कोई शिकात नहीं की। मैं ऐसे ही लोगों में शरीक होता था। आकण्ठ भरोसे और बड़ी निश्चिन्तता से मुझसे पूछा जाता - ‘हमारी सेवाओं को लेकर आपका अनुभव क्या है?’ मेरा अनुभव सदैव अच्छा ही रहता था क्योंकि मेरी पहचान ‘कुशल शिकायतकर्ता’ की थी। मेरी शिकायतों की सफलता का प्रतिशत सदैव ही 90 से ऊपर रहा है। इसलिए मैं जब भी किसी विभाग में जाता तो मेरी समस्या प्रायः ही हाथों हाथ हल कर दी जाती। पूछनेवाले को भरोसा रहता था कि मैं उनके पक्ष में जवाब दूँगा। लेकिन मैं उनकी आशा पर तुषारापात कर देता। कहता - ‘मेरा अनुभव तो बहुत अच्छा है लेकिन मैं जानता हूँ कि वह क्यों अच्छा है। मैं अपवाद हूँ। इसलिए मेरी बात का कोई मूल्य नहीं है। जिन्होंने यहाँ शिकायतें सुनाई हैं, मैं उन सबको व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और यह भी जानता हूँ कि वे आपके दफ्तर के चक्कर काट-काट कर थक गए हैं। सच बात तो वही है जो इन सबने कही है। मेरा अनुभव भले ही आपके पक्ष में है लेकिन ऐसा सबके साथ हो तो ही मेरी बात का कोई मतलब होगा।’ मेरी बात पर लोग तालियाँ बजाते और अफसरों के चेहरे उतर जाते। सम्मेलन समाप्ति के बाद सबसे पहला काम होता - यह सुनिश्चित करना कि अगले सम्मेलन में मुझे न बुलाया जाए।

इसलिए, मित्र की बात से मैं सहमत नहीं हो पाया। महापौर का मकसद चाहे जो रहा हो, लेकिन उन्होंने सबकी चिन्ता की। यह बहुत अच्छी और प्रशंसनीय बात है। 

मुमकिन है, आज केवल दिखावे के लिए, अफसरों को हड़का कर अपनी धाक जमाने के लिए, अखबारों की सुर्खियाँ पाने के लिए ऐसा किया गया हो। लेकिन ऐसा हर बार तो सम्भव नहीं हो पाएगा। आज का अपवाद, कल की सामान्य स्थिति बनेगा।

हमें इतना आशावाद तो अपनाना चाहिए। इसमें हर्ज ही क्या है?
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पुनश्चः मेरे पूछने पर मित्र ने बताया कि अपने मन की यह सारी बात उन्होंने महापौर को लिख भेजी है। मुझे फोन करने से पहले ही। मुझे उनकी यह व्यक्तिगत ईमानदारी बहुत अच्छी लगी।
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.......मैं दो बाप की औलाद हो गया

यह मंगलवार 24 अप्रेल की सुबह है। पौने दस बज रहे हैं। नरेन्द्रजी अभी-अभी गए हैं। उनकी दशा देखी नहीं जा रही थी। व्यापारी तो मझौले स्तर के हैं लेकिन साख चौबीस केरेट सोने जैसी। सौदे के सच्चे, बात के पक्के। कम बोलते हैं लेकिन नाप-तोल कर बोलते हैं। भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता और संघ के समर्पित स्वयम् सेवक हैं। उनसे मेरी खूब पटती है। उम्र में मुझसे अठारह बरस छोटे किन्तु मेरे आदरणीय। जब भी मौका मिलता है, उनकी दुकान पर बैठ जाता हूँ। खुलकर बात करते हैं। गलत को गलत और सही को सही कहते-सुनते हैं।

उनका अचानक आना मुझे अच्छा तो लगा लेकिन उनकी सूरत ने सहमा दिया। होठ पपड़ाए हुए मानो कच्छ का रन पैदल पार कर आ रहे हों। आँखें इस तरह गीली और रतनार मानो गहरे पानी में सौ डुबकियाँ मार ली हों। उनके आने से उपजी खुशी, उनकी दशा से उपजी दहशत में दब गई। घरघराती आवाज में अगवानी की - ‘वाह! आज तो भए प्रकट कृपाला। कैसे कृपा कर दी?’ मेरा पूछना हुआ नहीं कि मानो कोई मजबूत दीवार भरभरा कर गिर पड़ी हो। उनका निःशब्द रुदन गूँजने लगा। उन्हें इस दशा में देख मैं इतना घबरा गया कि न तो कोई पूछताछ कर पाया न ही सांत्वना के दो बोल मेरे मुँह से फूटे। दो-एक मिनिटों में उन्होंने खुद को संयत किया और बिना किसी भूमिका के, मर्मान्तक पीड़ा भरे स्वरों में बोले - “आज तो बैरागीजी! मैं अपनी ही नजरों में दो बाप की औलाद हो गया।” मुझे मानो ततैया ने काट लिया हो। खुद के बारे में ऐसी टिप्पणी? लेकिन मैं चुप ही रहा। वे अनुचित, अकारण नहीं बोलते। सहमा हुआ, जिज्ञासु बन उनकी शकल देखता रहा। बोले - “यूँ तो कोई ढाई-तीन साल से गुस्सा आ रहा है लेकिन हर बार सोचता रहा कि चलो कोई बात नहीं। मोदीजी जल्दी ही सब ठीक कर देंगे। लेकिन डेड़ साल से तो मैं रोज अपनी परीक्षा ले रहा हूँ और रोज फेल हो रहा हूँ। मँहगाई के विरोध में हमने कितने जुलूस निकाले! कितनी नारेबाजी की! कितनी गालियाँ दीं! कितने पुतले जलाए! कितने ज्ञापन दिए! कोई गिनती नहीं। लेकिन आज सबकी जबानों को लकवा मार गया है। नोटबन्दी के बाद से तो जैसे तपते तवे पर बैठे हैं। धन्धा चौपट हो गया। दुकान खाली पड़ी है। माल नहीं। नाणा तंगी ऐसी कि जहाँ पहले आधी ट्रक माल मँगाता था वहाँ आज टेम्पो भी नहीं भरता। मँगतों की तरह टुकड़ों-टुकड़ों में माल मँगाना पड़ रहा है। बची-खुची कसर जीएसटी ने निकाल दी। धन्धा बाद में करो, पहले रेकार्ड रखो और रिटर्न भरो। मैंने अपने सर्कल के व्यापारियों से बात की - भई! कुछ करो। लेकिन सबने चुप रहने को कहा। बोले - अपनी पार्टी की सरकार है। नेताओं से बात करेंगे। लेकिन हुआ कुछ नहीं। फिर मैंने अपनी एसोसिएशनवालों से बात की। उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए कि देखा नहीं सराफावालों की क्या दशा हुई थी? नेताओं के घर-घर गए थे कि भैया ज्ञपान तो ले लो। लेकिन कोई ज्ञापन लेने को भी तैयार नहीं हुआ था। व्यापारियों ने पार्टी से सपरिवार स्तीफे दिए थे। लेकिन किसी ने परवाह नहीं की। फिर! सूरत के व्यापारियों ने क्या कुछ कम कोशिश की थी? लाखों लोग महीने भर तक रैलियाँ निकालते रहे लेकिन न तो कोई आया न किसी ने बुलाया। इसलिए चुपचाप रहो। जो सबके साथ होगा वही अपने साथ भी होगा। सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा। यह क्या बात हुई कि अपनी पार्टी की सरकार है तो गैरवाजिब बात पर भी चुप रहो? अरे! अपनी पार्टी की सरकार है तो फिर तो पार्टी को अपनी चिन्ता सबसे पहले करनी चाहिए! मैंने कहा कि भले ही कुछ नहीं हो लेकिन विरोध तो करो। गलत को गलत तो कहो! चार साल पहले जो बात गलत थी, वो आज सही कैसे हो गई? लेकिन कोई नहीं बोला। सब चुप रहे। मेरा जी खट्टा हो गया।

“मैं व्यापारी हूँ। दुकानदारी चलाने के लिए सबसे पहले ग्राहक का भरोसा जीतना पड़ता है। जब भी कोई ग्राहक भाव-ताव करता है, मैं अपनी बिल बुक बता कर कहता हूँ - ‘देख लो! एक भी बिल यदि तुम्हें बताई रकम से कम का हो तो तुम्हें फोगट में दे दूँगा। जिसका बाप एक, उसकी बात एक।’ यह सुनकर बैरागीजी! ग्राहक कोई सवाल नहीं करता। ऐसा मैं खाली कहने-सुनने या दिखाने के लिए नहीं करता। सच्ची में इस पर कायम रहता हूँ।

“लेकिन बैरागीजी! आज सुबह अखबार देखा तो अपने पर घिरना (घृणा) आ गई। पेट्रोल अस्सी रुपया लीटर पार कर गया! इस पेट्रोल को लेकर हमने मनमोहन सरकार को कितनी गालियाँ दीं! कितनी खिल्ली उड़ाई! कोई गिनती नहीं। पूरी दुनिया के भाव दिखा कर हम कहते थे कि हमें सारी दुनिया में सबसे मँहगा पेट्रोल खरीदना पड़ रहा है। तब हमने मँहगाई का खूब विरोध किया। हमारे बड़-बड़ेे नेता पेट्रोल और गैस की बढ़ती कीमतों के विरोध में धरने पर बैठे। मोदी सरकार बनी तो लगा था कि मँहगाई के खात्मे की शुरुआत पेट्रोल की कीमतें कम होने से होगी। लेकिन एकदम उल्टा हो गया। कच्चे तेल के भाव जैसे-जैसे कम हों, अपने यहाँ पेट्रोल की कीमत वैसे-वैसे बढ़ने लगी। मैंने पार्टीवालों से कहा कि यह गलत है। इसका विरोध करो। जिसका बाप एक, उसकी बात एक। सबने मेरी बात का एक ही जवाब दिया - ‘अपन ऐसा नहीं कर सकते। अपनी पार्टी की सरकार है।’ फिर मैंने एक के बाद एक वो सारी बातें गिनवाईं जिन पर मोदीजी ने पलटियाँ खाईं। लेकिन किसी ने मेरी नहीं सुनी।

“लेकिन आज तो बैरागीजी मेरी आत्मा ने मुझे धिक्कार दिया। ऐसी कैसी पार्टी लाइन कि हर गलत बात को सही कहो! अरे! मँहगा पेट्रोल यदि कल गलत था तो आज सही कैसे? गलत तो गलत ही होता है। मैंने सुमित और राजेन्द्र को फोन लगाया। शरम तो उन्हें भी आ रही है और मेरी बात को सही भी कह रहे हैं लेकिन वही जवाब - ‘पार्टी लाईन।’ मैं सुबह से रो रहा हूँ। काँच में अपनी शकल देखने की भी हिम्मत नहीं हो रही। क्या करूँ, क्या नहीं? कोई जवाब नहीं सूझा तो आपके पास चला आया। मालूम है कि आप कुछ नहीं कर सकते। लेकिन अपनी बात किससे कहूँ। आपके सामने रो-गा लूँगा तो छाती ठण्डी हो जाएगी।”

यह सब सुनने के लिए मैं बिलकुल ही तैयार नहीं था। मैंने कहा - ‘आप सब लोग मिलकर हाईकमान से बात करें? न हो तो पार्टी से बगावत की धमकी दें। चुनाव के साल में सरकार से जो चाहो करवा लो।’ बोले - ‘इस पर भी सोचा। लेकिन बैरागीजी! व्यापारी की मूँछ हमेशा नीची ही रहती है। फिर, आप हमारे संगठन को नहीं जानते। हम अछूत बना दिए जाएँगे। अरे! आप आडवाणीजी, मुरली मनोहर जोशीजी जैसे दिग्गजों की दो कौड़ी की दशा देख नहीं रहे? हमारे यहाँ जिसका बहिष्कार किया, उसके तो दाग (दाह संस्कार) में भी नहीं जाते।”

उन्हें अपना अतीत और वर्तमान ही नहीं अपना भविष्य भी पता था। मैंने पूछा - ‘तो अब आप क्या करेंगे?’ मानो अपनी छाती में अपने हाथों खंजर भोंक रहे हों, इस तरह बोले - ‘चुनाव की राह देखेंगे।’ ‘लेकिन तब तक?’ ‘तब तक? तब तक खुद को दो बाप की औलाद मानते रहेंगे। इसे भूलेंगें नहीं।’

वे चले गए। उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर मुझे गर्व हो रहा है लेकिन चिन्ता भी हो रही है। अब मुझे रोज उनका हाल-चाल पूछना है। यह जिम्मेदारी मैंने खुद ओढ़ी है।
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दैनिक 'सुबह सवेरे', भोपाल,  दिनांक 26 अप्रेल 2018 

रॉकेट की यात्रा, बैलगाड़ी में बैठकर

हम दोनों, पत्नी-पति के नाम पर डाक घर में पाँच आवर्ती जमा (आर. डी.) खाते  हैं। डाक घर की बचत योजनाओं के एजेण्ट मित्रों की मदद से ये खाते चल रहे हैं। कोई तीन महीने पहले, इन एजेण्ट मित्रों ने एक के बाद एक कहना शुरु किया कि हमें डाक घर में बचत खाता अनिवार्यतः खुलवाना पड़ेगा क्योंकि डाक घर से अब न तो नगद भुूगतान मिलेगा न ही चेक से। इन मित्रों को मैंने बताया कि हमारे खाते पहले से ही दूसरे बैंकों में हैं। अब कहीं और नया खाता खुलवाने का कोई औचित्य नहीं है। डाक विभाग चेक न दे, हमारे खाते में नेफ्ट के जरिये भुगतान कर दे। लेकिन एक के बाद एक, पाँचों ने कहा कि डाक विभाग नेफ्ट से भी भुगतान नहीं करेगा। डाक घर में ही खाता खुलवाना पड़ेगा।

बात मेरी समझ में बिलकुल ही नहीं आई। तमाम आय-कर सलाहकार कहते हैं कि लोगों को कम से कम बैंक खाते रखने चाहिए। मुमकिन हो तो एक ही खाते से काम चलाना चाहिए। लेकिन यहाँ सरकार का ही एक विभाग जबरन खाता खुलवाने पर तुला हुआ है। मुझे लगा कि शायद इन एजेण्टों को नए खाते खुलवाने का ‘टार्गेट’ दे दिया गया है और प्रत्येक एजेण्ट अपने-अपने आवर्ती खाते के लिए हमारा अलग-अलग बचत खाता खुलवाना चाह रहा है। याने पाँच बचत खाते। लेकिन मेरा यह अनुमान गलत निकला। कहीं कोई टार्गेट नहीं था। हमें एक ही बचत खाता खुलवाना पड़ेगा। मेरे गले बात उतर ही नहीं रही थी।

मैं सीधा, प्रधान डाक घर के मुख्य डाक पाल से मिला। उन्होंने एजेण्टों की बात दुहराई - ‘यदि भुगतान लेना है तो आपको डाक घर में ही बचत खाता खुलवाना पड़ेगा।’ मैंने समझाने की कोशिश की तो वे अत्यधिक विनम्रता से बोले कि उन्हें मेरी बात समझ में आ रही है कि हम दोनों के नाम पर पहले से ही दूसरे बैंकों में खाते चल रहे हैं और हम चाह रहे हैं कि डाक विभाग नेफ्ट से हमारे खातों में हमारा भुगतान भेज दे। ‘लेकिन सर! इट इज नॉट पॉसिबल। आपको यहाँ खाता खुलवाना ही पड़ेगा। उसके बिना हम आपको पेमेण्ट नहीं कर पाएँगे।’ - उन्होंने शान्त स्वरों में कहा। वे तो शान्त थे लेकिन उनकी बात से मुझे चिढ़ आ गई। मुझे लगा, वे मेरे साथ ‘अफसरशाही’ बरत रहे हैं। मैंने कहा - ‘अजीब जबरदस्ती है! मेरा खाता पहले से बैंक में है। आप एक और खाता खुलवाने पर तुले हैं। मैं एक खाता और क्यों खुलवाऊँ? नहीं खुलवाना मुझे खाता।’ वे तनिक भी असहज या विचलित नहीं हुए। बोले - ‘यह तो आप ही तय करेंगे सर! लेकिन हमारी मजबूरी है कि हम आपको भुगतान तब ही कर सकेंगे जब आप डाक घर में बचत खाता खुलवा लें। आपके किसी और बैंक खाते में हम भुगतान नहीं कर सकेंगे।’

खुद पर नियन्त्रण रख पाना मेरे लिए पल-पल कठिन होता जा रहा था। धैर्य साथ छोड़ने को उतावला हुआ जा रहा था। तनिक ऊँची आवाज में मैंने कहा - ‘अजीब मनमानी है! ऐसा कोई आदेश है आपके पास?’ उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप अपना ड्राअर खोला और दो पन्ने मुझे थमा दिए। यह कहते हुए - ‘मुझे, यह आदेश मिलते ही लग गया था कि कभी न कभी, कोई यह सवाल जरूर करेगा। लीजिए! आप खुद ही पढ़ लीजिए।’ मैंने आदेश पढ़ा और मेरी बोलती बन्द हो गई। दोनों बातें साफ-साफ लिखीं थी - डाक घर से किया जानेवाला कोई भी भुगतान नगद या चेक से नहीं किया जाए और डाक घर के बचत खाते में ही भुगतान किया जाए। मेरे सुर बदल गए। मुख्य डाकपालजी से हो रहे सम्वादों में खिसियाहट और झेंप घुल गई। गर्मी खाने और अकड़ दिखाने पर शर्म भी आई। लेकिन गुस्सा कम नहीं हो रहा था। एक ओर तो डाक विभाग अपने तमाम डाक घरों को ‘सम्पूर्ण बैंक’ में बदल रहा है और दूसरी ओर बैंकिंग की न्यूनतम गतिविधि को अंजाम देने से इंकार कर रहा है! मैंने जानना चाहा कि आखिर क्या वजह है जो मुझे नेफ्ट से भुगतान नहीं मिल पाएगा? मुख्य डाकपालजी ने इस बार अत्यधिक विनम्रता बरती। बोले - ‘मुझे माफ करें। यह बताने की इजाजत मुझे नहीं है। आप तो व्यापक सम्पर्कों वाले आदमी हैं। पता करने में आपको देर नहीं लगेगी।’

मैं चुपचाप चला आया। इतना चुपचाप कि धन्यवाद ज्ञापित करने का शिष्टाचार निभाना भी भूल गया। वहाँ से निकलते ही सीधा अपने बैंक में गया। वहाँ मित्रों को सारी बताई तो वे गम्भीर हो गए। बोले - ‘सर! उन पर गुस्सा मत कीजिए। वे दया के पात्र हैं। हम उनकी कठिनाई समझ सकते हैं। एक तो स्टॉफ कम और दूसरे, लगभग जीरो इन्फ्रास्ट्रक्चर। वे भी क्या करें? उन्हें नेफ्ट करने की टेक्नोलॉजी ही उपलब्ध नहीं कराई गई है।’ जाहिर था, मुझे न केवल खाता खुलवाना था बल्कि चेक बुक भी जारी करवानी थी। (ताकि वहाँ की रकम अपने बैंक के खाते में जमा करा सकूँ।)

एक एजेण्ट मित्र से खाता खुलवाने की खानापूर्ति करवाई। कोई एक महीने में पास बुक मिली। पास बुक मिलते ही मैंने एजेण्ट मित्र से चेक बुक दिलाने में मदद माँगी। तीन दिन बाद उन्होंने कहा इसके लिए कि मुझे एक आवेदन देना पड़ेगा। फौरन आवेदन दिया। लेकिन चेक बुक फौरन ही नहीं मिली। कोई डेढ़ महीने बाद मिली। चेक बुक देख कर मैं हैरान रह गया। चेक बुक के आवरण पन्ने पर जरूर मेरी उत्तमार्द्धजी का नाम (संयुक्त खाते में पहला नाम उन्हीं का है) और खाता नम्बर लिखा था लेकिन अन्दर सारे के सारे चेक एकदम खाली थे - चेकों पर न तो नाम छपा था न ही खाता नम्बर। अब प्रत्येक चेक पर अपना खाता नम्बर और हस्ताक्षरों के नीचे अपना नाम मुझे ही लिखना है। बैंकिंग प्रक्रिया का यह बहुत ही महत्वपूर्ण काम डाक घर ने मेरे ही जिम्मे कर दिया। 

यहाँ मैं चेक बुक के आवरण पन्ने की और एक चेक की फोटू लगा रहा हूँ। आवरण पन्ने पर चेक बुक का नम्बर छपा है और पहले चेक पर भी वही नम्बर छपा है जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उसी चेक बुक का चेक है।

चेक बुक का आवरण पृष्ठ। चेक बुक नम्बर 751281 दृष्टव्य है।



चेक बुक का पहला खाली चेक जिस पर चेक नम्बर 751281 आसानी से देखा जा सकता है।

बहुत हैरत हो रही है और उतना ही गुस्सा भी आ रहा है। लेकिन भोंडा मजाक यह कि मेरे इस गुस्से के पात्र उच्चाधिकारी मेरे सामने नहीं हैं और जो कर्मचारी सामने हैं वे इस अव्यवस्था के लिए कहीं जिम्मेदार नहीं हैं। याने कुढ़ना, खीझना, झुंझलाना मुझे ही है - खुद पर ही।

डिजिटल इण्डिया का सपना शायद इसी तरह पूरा होगा - राकेट में यात्रा करनी है लेकिन अपनी बैलगाड़ी में बैठकर।
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भीड़ बन जाना ही हमारी प्रॉब्लम है सर!

‘सर! मैं करीब-करीब पूरा इण्डिया घूम लिया हूँ। और मुझे कहीं ऐसा नहीं लगा जैसा आप पूछ रहे हो और सोच रहे हो।’ वसीम ने कहा तो मैं चौंक गया। बात के बादवाले हिस्से ने तो भरपूर तसल्ली दी लेकिन पूरा भारत घूम लेनेवाली बात पर विश्वास नहीं हुआ। लगा, बात करते-करते, रौ में बहकर गलतबयानी कर बैठा। अभी उसकी उम्र ही कितनी है! कुल 29 बरस! उसी ने बताया था। मैंने भेदती नजर से पूछा - ‘कैसे मुमकिन है? कितने बरस की उम्र में काम शुरु किया?’ ‘सर, पाँच बरस की उम्र से संघर्ष कर रहा हूँ।’ सड़क पर नजरें जमाए उसने जवाब दिया। मैं फिर चौंका। कार चलाते ड्रायवर से मैं सामान्यतः बात नहीं करता हूँ। लेकिन इस बार खुद को रोक नहीं पाया। 

हुआ यह कि भानजी प्रीति की बिटिया रोशी (रजनी) के विवाह की कुछ रस्मों में शरीक होने के लिए गुरुवार को हम दोनों (पति-पत्नी) को मन्दसौर जाना था। मुझे अपने रिश्तेदार से अधिक मान देनेवाले, बैंक कर्मचारियों के बड़ेे नेता हरीश  भाई यादव की कार मिल गई थी। ड्रायवर की व्यवस्था, हरीश भाई के विश्वस्त अरविन्द को करनी थी। अरविन्द ने पूछा - ‘सर! मुसलमान ड्रायवर चलेगा?’ मुझे हैरत भी हुई और बुरा भी लगा। लगा, अरविन्द ने मुझे गाली दे दी है। मैंने तनिक रोष से जवाब दिया - ‘बिलकुल चलेगा। किसी भी जात-धरम का चलेगा। लेकिन तुमने यह पूछा क्यों?’ उसने सहम कर कहा - ‘सर! कुछ लोगों को नहीं चलता।’ सुनकर और बुरा लगा था। ऐसा भी कहीं होता है? लेकिन होता ही होगा। वर्ना भला, बेचारा अरविन्द पूछता ही क्यों? मेरी बात के जवाब में अरविन्द ने कार सहित हम दोनों को वसीम के हवाले कर दिया।

जैसा कि मैंने कहा है, मैं कार चला रहे ड्रायवर से सामान्यतः बात नहीं करता। उसका ध्यान भंग न हो, इसलिए। लेकिन अरविन्द के सवाल ने मुझे आकुल कर रखा था। बस्ती से निकल कर हम लोग जैसे ही फोर लेन पर आए, मैंने वसीम से बतियाना शुरु कर दिया था। मैं जानना चाहता था कि इन दिनों के, धर्मान्धता और नफरत के माहौल से उसके काम-काज पर, उसके साथ हो रहे व्यवहार पर, उसके मुसलमान होने से क्या कोई फर्क पड़ा? उसे कोई परेशानी हुई या हो रही है? उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी में कोई बदलाव आया है? उसे अपनी धार्मिक पहचान छुपानी तो नहीं पड़ती? मेरी बातों के जवाब में उसने टुकड़ों-टुकड़ों में जो कुछ वह कुछ इस तरह था -

‘सर! मुझे कहीं भी, कुछ भी फर्क नहीं पड़ा। सब कुछ वैसा का वैसा है। जो लोग बरसों से मुझे बुला रहे हैं, वे उसी तरह आज भी बुला रहे हैं। आप तो जानते हो कि रतलाम में जैन समाज का बोलबाला है। इसलिए जैन समाज में ही मेरा ज्यादा आना-जाना है। व्यवहार में भेद-भाव तो दूर की बात है सर! कोई भी मुझे यह अहसास भी नहीं कराता कि मैं मुसलमान हूँ। अभी कुछ दिनों पहले मैं चैन्नई ट्रिप पर गया था। पूरे पन्द्रह दिनों में घर आया। लेकिन मुझे एक सेकण्ड भी नहीं लगा कि मुझे मजहबी तौर पर अलग से ट्रीट किया जा रहा है। चार-चार, पाँच-पाँच दिनों के ट्रिप तो मेरे लिए अब आम बात है सर!’ और फिर वही कहा जो मैंने शुरु में लिखा है - कि वह करीब-करीब पूरा भारत घूम चुका है।

पाँच बरस की उम्र से संघर्ष करनेवाली बात पर मेरे सवाल के जवाब में उसने मानो अपनी जिन्दगी की किताब ही मेरे हवाले कर दी। वह पाँच बरस की उम्र में बिना माँ का हो गया था और नौ बरस की उम्र में पिता भी चल बसे। कहने को बड़ा भाई था तो जरूर लेकिन इतना बड़ा नहीं कि छोटे भाई की देख-भाल कर सके। छोटे भाई से फकत दो बरस बड़ा। यूँ तो अच्छा-खासा कुनबा लेकिन सबने आँखें फेर लीं। दोनों नासमझ बच्चों को महसूस करा दिया कि वे खुदा पर और अपने दोनों हाथों पर भरोसा करें। वह तो अच्छा हुआ कि पिताजी ने मकान बनवा लिया था। वर्ना जमाने ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जमीन ही बिछाने और आसमान ओढ़ने की नौबत आ जाती। जिन्दा रहने के लिए दोनों भाइयों को माँ की मौत के बाद से ही हाथ-पाँव मारने शुरु करना पड़ गए थे। 

हमारी कार ‘कथित फोर लेन’ पर उचकती, हिचकोले खाती, ठेकेदार-नेता-अफसरों की ‘राष्ट्रीय चरित्र’ वाली पारम्परिक भ्रष्टाचारी मिलीभगत के किस्से बयान करती दौड़ रही थी। मेरी नजर वसीम पर टिकी हुई थी और वसीम था कि सड़क पर नजरें जमाए, मानो उसकी बगल में बनी हुई मेरी मौजूदगी से बेखबर, अपना काम किए जा रहा था।

वसीम की बातों ने मुझे मथ दिया था। करुणा के सोते प्रवाहित करती उसकी कहानी मुझे परेशान कर रही थी। लेकिन, मेरी मूल जिज्ञासा के जवाब में वह जो कुछ कह रहा था, उससे बड़ी तसल्ली, बड़ी ठण्डक मिल रही थी। कुछ इस तरह जैसे कि बैसाख के महीने में, किसी दानी पुरुष द्वारा शुरु की गई प्याऊ पर बैठ मुझे ठण्डा गंगा जल पिला रहा हो।

मैंने पूछा - ‘वसीम! कुछ बता सकते हो कि जब तुम्हें कोई परेशानी नहीं हो रही, तुम्हारा काम और तुम्हारे भाई का गेरेज बिना किसी बाधा, बिना किसी रुकावट के अच्छा-भला चल रहा है, तुम्हारे सर्कल में सभी धर्मों के लोग हैं और तुम कह रहे हो कि वे कभी भी तुम्हारे मुसलमान होने का अहसास भी नहीं कराते तो फिर मुल्क में, धर्म के नाम पर ये मरने-मारने, तोड़-फोड़, हंगामा, आगजनी, यह नफरत क्यों फैली हुई है।?’

अविचल और निर्विकार भाव से, किसी यन्त्र की तरह कार चलाते हुए वसीम ने शान्त, संयत और सधी हुई आवाज में जवाब दिया - ‘सर! अनपढ़-गँवार लोग ये सब बेकूफियाँ करते हैं। वे न तो कुछ जानते-समझते हैं न ही जानना-समझना चाहते हैं। ऐसे लोग सर! हर कौम, हर मजहब में होते हैं। कुछ पढ़े-लिखे धन्धेबाज लोग इन्हें जरिया बनाकर अपनी दुकानें चलाते हैं। बस! यही मुश्किल है सर।’ मैंने कहा - ‘लेकिन ये तो बहुत थोड़े लोग हैं। गिनती के। ये गिनती के लोग पूरे देश में बवाल कैसे पैदा कर देते हैं?’ इस बार वसीम ने मेरी ओर देखा और थोड़ा रुक कर बोला - ‘सर! गिनती के ये लोग जब हम लोगों को भीड़ में बदल देते हैं तो सब कुछ गड़बड़ हो जाता है। आप तो जानते ही हो सर! कि भीड़ का दिमाग नहीं होता। वो तो भेड़ों का रेवड़ बन जाती है। यदि गिनती के इन लोगों पर सख्ती से रोक लग जाए और हम लोग भीड़ में न बदलें तो कोई प्राब्लम ही न हो सर! हमारा भीड़ बन जाना ही सारी प्राब्लम है सर!’

शाम करीब पाँच बजे वसीम हमें घर पर छोड़ गया है। लेकिन उसकी निर्दोष बातों की पोटली मेरे सामने खुली पड़ी है। आधी रात बीत गई है। मैं पोटली को उलट-पुलट रहा हूँ। वसीम की बातें मुझे एक से बढ़कर एक, अनमोल जेवरों की तरह लग रही हैं। लेकिन मैं इन्हें बाँधकर अपनी आलमारी में नहीं रख सकता। इन्हें तो चौराहों पर लुटाने में ही इनकी सार्थकता और मेरी समझदारी है।

अचानक ही जिज्ञासा हो आई - ‘वसीम’ के मायने क्या हैं? मैं उर्दू-हिन्दी शब्दकोश उठाता हूँ। वसीम के मायने बताए गए हैं - ‘सुन्दर, शोभित, खूबसूरत।’ आधी रात में मेरी सुनहरी सुबह हो गई हो, ऐसा लग रहा है मुझे। 

यह वसीम तो फकत एक नौजवान नहीं, मेरा मुल्क है जो खुद अपना परिचय दे रहा है - सुन्दर, शोभित, खुबसूरत।
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बाबा, मुख्य मन्त्री और हम लोग याने हमाम के नंगे

बाबाओं को राज्य मन्त्री का दर्जा देनेवाले मामले में किसकी असलियत सामने आई? बाबाओं की? सरकार की? या फिर हम, आम लोगों की? मुझे लग रहा है - हम सबकी असलियत सामने आ गई। सारी बातें जानते तो सब थे लेकिन सब खुद से नजरें बचा रहे थे। 

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। राजा के सिपाहियों से बचने के लिए एक ठग गिरोह ने दूर-दराज के एक गाँव में ठौर ली। मुखिया ने बाबा का चोला धारण किया। मुखिया प्रमुख बाबा और बाकी सब उसके अनुचर सन्यासी। जल्दी ही बाबा का मुकाम ‘बाबा का धाम’ बन गया।

एक दिन गाँव का साहूकार, रुपयों से भरी थैली लेकर आया। बोला कि एक विवाह प्रसंग में उसे पाँच दिनों के लिए बाहर जाना है। अपने जीवन की सारी कमाई, सुरक्षा के लिए बाबा के पास छोड़े जा रहा है। लौट कर ले लेगा। बाबा ने थैली रख ली। छठवें दिन साहूकार लौटा और अपनी थैली माँगी। बाबा ने थैली जस की तस थमा दी। साहूकार खुश हो, बाबा की जैकार करता चला गया। उसके जाते ही साथियों ने पूछा - ‘थैली क्यों लौटा दी? कोई गवाह तो था नहीं। मना कर देते तो साहूकार क्या कर लेता?’ मुखिया ने कहा - “हम भले ही ठग हैं लेकिन ‘बाने की लाज’ रखनी पड़ती है। साहूकार ने ‘बाबा’ को थैली थमाई थी, ‘ठग’ को नहीं।’ किसी के पास कोई जवाब नहीं था। कुछ बाबाओं ने राज्य मन्त्री का दर्जा लेने से जरूर मना कर दिया है लेकिन बाकी बाबाओं ने ‘बाने की लाज’ नहीं रखी। इनमें से एक तो भोपाल पहुँच भी गए हैं और सर्किट हाउस की छत पर धूनी रमा रहे हैं।

मुख्य मन्त्री ने क्या किया? निश्चय ही अनुचित किया। लेकिन डगमगाती कुर्सी को थामे बैठा राजनेता किसी भी सीमा तक चला जाता है। तब नैतिकता, ईमानदारी, मूल्य जैसी बातें जुमले बन कर रह जाती हैं। मुख्य मन्त्री को पता था कि जिन मुद्दों पर बाबा लोगों ने पूरे पैंतालीस दिन, पैंतालीस जिलों के गाँव-गाँव जाकर सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोलने की बात कही है, वे सारी बातें सच हैं। बाबा की कही बातों पर लोग वैसे भी बिना सोचे भरोसा कर लेते हैं। सो मुख्य मन्त्री ने बाबाओं को अपनी जमात में शरीक कर लिया। मुझ जैसे तुम भी हो जाओ। अब भला, एक भ्रष्ट आदमी, दूसरे भ्रष्ट आदमी की पोल कैसे खोल सकता है? लिहाजा, भ्रष्टाचार को उजागर करनेवाली, बाबाओं की जन-यात्रा, पद प्राप्ति योजना में बदल गई। यह साफ-साफ दो टू सौदा था। मुख्यमन्त्री ने सरेआम रिश्वत दी और बाबाओं ने सरे आम यह रिश्वत कबूल की। लेकिन किसी मुख्य मन्त्री की इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि वह किसी साधु-सन्त को इस तरह जगजाहिर प्रलोभन दे? जवाब आसान है। मुख्य मन्त्री को खूब पता था कि इन बाबाओं ने कबीर की बात पर अमल किया है - ‘मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा।’ 

मुख्यमन्त्री की इस पेशकश ने मुझे काका हाथरसी की बरसों पुरानी एक कुण्डली याद दिला दी -

कूटनीति मंथन करी, प्राप्त हुआ यह ज्ञान।
लोहे से लोहा कटे, यह सिद्धान्त प्रमाण।
यह सिद्धान्त प्रमाण, जहर से जहर मारिए।
चुभ जाए काँटा तो काँटे से निकालिए।
कह ‘काका’ क्यों काँप रहा है रिश्वत लेकर?
रिश्वत पकड़ी जाए, छूट जा रिश्वत देकर।

सारी दुनिया ने इस कुण्डली को साकार होते देखा। इस तरह, बाबाओं की और राजनीति की वह असलियत सामने आई जिसे हम सब पता नहीं कब से जानते हैं। इसीलिए, रिश्वत के इस लेन-देन पर हमें न तो ताज्जुब हुआ और न ही गुस्सा आया। तलाश कीजिए कि इस लेन-देन पर कितने लोगों ने आपत्ति ली? कितने लोग गुस्सा हुए? कितने लोग सड़कों पर आए? अनगिनत बाबाओं के इस देश में गिनती के पाँच-सात बाबा अप्रसन्न हुए। यह देश चूँकि ‘पार्टी लाइन’ पर चलता है, इसलिए सत्तारूढ़ पार्टी के उत्साही वक्तव्यवीरों की भी बोलती बन्द हो गई। बड़े नेताओं ने तो बढ़-चढ़ कर मुख्य मन्त्री का समर्थन किया। रही बात प्रति पक्ष की! तो उसकी तो मानो बाँछें खिल गईं। मुख्य मन्त्री ने उन्हें एक नया औजार थमा दिया है। यदि कभी सत्ता में आए तो इसे काम में लेंगे। लिहाजा, प्रतिपक्ष भी अण्टा गाफिल मुद्रा में, चुप पड़ा रहा। सत्तारूढ़ पार्टी के दो-चार लोग विरोध में, चैनलों के पर्दे पर बोले जरूर लेकिन उनके विरोध को किसी ने ‘ईमानदार विरोध’ माना ही नहीं। उनका कहा, उनके कहने से पहले ही हवा हो गया।

अब रही बात आम लोगों की। आपकी-हमारी। हम सबकी। तो हम सब जानते हैं कि इन बाबाओं को बाबा हम ही ने बनाया है। भेंट-पूजा-पत्री, नारियल-प्रसाद, फूल मालाएँ, चढ़ावे की थालियाँ लिए हम ही लम्बी कतारों में लग, इनके दर्शनों की प्रतीक्षा में अपनी टाँगें पतली करते रहे। ये बाबा जैसे भी हैं और जो कुछ भी कर रहे हैं, उसके लिए तो हम ही जिम्मेदार हैं। यदि हम लोग इन्हें भाव न दें तो भला मुख्य मन्त्री इन्हें क्यों पूछे। हम सबने इनके पिछलग्गू बनकर खुद को वोट बैंक में बदल लिया है। मुख्य मन्त्री को वोट चाहिए। और जब चुनाव ऐन सामने हों तब तो चाहिए ही चाहिए। मुख्य मन्त्री ने वही किया। हमने ताज्जुब जरूर किया लेकिन हमारे ताज्जुब में ताज्जुब कम और उपहास ज्यादा था। हम जब इनका उपहास कर रहे थे तब वास्तव में हम अपनी ही खिल्ली उड़ा रहे थे। ऐतराज तो हम कर ही नहीं सकते थे। कैसे करते? खूब जानते हैं कि सारा किया-धरा तो हमारा ही है! हम यही कह-कह कर अपना मन समझाते रहे कि बाबाओं और मुख्यमन्त्री, दोनों ने एक-दूसरे का उपयोग कर लिया। जबकि हकीकत यह है कि इन दोनों ने हमारा उपयोग किया है। इन दोनों ने तो माल कूटा है। ठगाए तो हम हैं और हम खुशी-खुशी ठगाए हैं।

जो समाज अनुचित पर चुप रह कर अपनी सहमति देता है, वह ठगाने के लिए अभिशप्त रहता है। मुझे याद आ रहा है कि जैन समुदाय के साधु-सन्त ऐसा व्यवहार नहीं कर पाते।  प्रत्येक जैन साधु अवचेतन में भी जानता है कि उसके आचरण पर श्रावक समुदाय नजर बनाए हुए है। यायावरी, जैन साधु जीवन की अनिवार्य शर्त है। कोई जैन साधु यदि किसी एक स्थान पर तीन दिन से अधिक रुक जाए तो श्रावक करबद्ध हो, विनीत भाव से पूछ लेता है - ‘आपकी इच्छा क्या है महाराज साब?’ स्खलित आचरण के कारण जैन साधुओं को, श्रावक समुदाय द्वारा सांसारिक वेश धारण कराने के कुछ मामलों की जानकारी तो मुझे निजी स्तर पर है। वहाँ ‘श्रावक’ सजग-सावधान रह, अपनी जिम्मेदारी निभाता है। लेकिन अपने हिन्दू होने पर गर्व करने का आह्वान करनेवाले हम अपने किसी साधु से कभी कोई पूछताछ नहीं करते। हमें हिन्दू धर्म विरोधी करार दिए जाने का खतरा बना रहता है। 

दरअसल, सर्वाधिक अधर्म, अनाचार, अत्याचार धर्म के नाम पर ही होता है। हमारे अज्ञान के कारण हमारा धर्म अन्धों का हाथी बन कर रह गया है। सबके पास धर्म की अपनी-अपनी व्याख्या और अपना-अपना स्वरूप है। तरलता और पारदर्शिता धर्म की प्रकृति है। लेकिन हमने धर्म को जड़ और लौह आवरण में बदल कर रख दिया है। हमने प्रतीकीकरण को धर्म मान लिया है।

यह सब कुछ हमारा ही किया-धरा है। नेता हो या बाबा, हमें वही और वैसा ही मिल रहा है जिसकी पात्रता हमने अर्जित की है। बबूल बोये हैं तो आम कहाँ से पाएँगे? 

आइये! काँटों की चुभन के साथ आनन्दपूर्वक जीने का अभ्यास करें।
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‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 12 अप्रेल 2018

.............. राजा माँगे ईमानदार प्रजा

विभिन्न देशों को, भारत सरकार द्वारा दिए उपहारों का ब्यौरा बताने से सरकार ने इंकार कर दिया है। कारण?  इससे उन देशों के साथ हमारे सम्बन्ध खराब हो सकते हैं। गोया, दुनिया के देश, भारत की प्रेमिकाएँ हैं जो अपनी सौतन को मिले उपहार से जल-भुन कर हमसे बेवफाई कर लेंगे। यह जानकारी ‘सूचना के अधिकार’ के तहत माँगी गई थी। इस तर्क की हकीकत समझी जा सकती है। लेकिन सरकार की अपनी सोच है। जरूरी नहीं कि लोगों की सोच और सरकार की सोच एक जैसी हो। लेकिन ऐसे इंकार लोगों की जिज्ञासा और बढ़ा देते हैं। 

सरकार ने ऐसा इंकार पहली बार नहीं किया। प्रधान मन्त्री की विदेश यात्राओं के खर्च का ब्यौरा देने से भी इंकार कर दिया। क्योंकि यह खर्च उजागर करना देशहित में नहीं है। सरकारी यात्राओं के, एयर इण्डिया के कितने बिलों की कितनी रकम की देनदारी सरकार के माथे है, यह बताने से भी इंकार कर दिया गया। क्योंकि यह बताना व्यापक हितों के विरुद्ध होगा। यहाँ यह जानना महत्वपूर्ण है कि अत्यधिक आर्थिक भार से एयर इण्डिया की कमर टूटी जा रही है और इसी कारण सरकार इसके विनिवेश पर विचार कर रही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार की तरफ एयर इण्डिया की देनदारी इतनी हो कि यदि सरकार चुका दे तो एयर इण्डिया के विनिवेश की जरूरत ही नहीं रहे? 

अपने खर्चों का ब्यौरा देने में सरकारों की रुचि नहीं होती। वे इससे बचना चाहती हैं। मन्त्रियों-सांसदों के वेतन-भत्तों, उनकी विलासितापूर्ण सुख-सविधाओं, सरकार का पूरा खर्चा आम आदमी चलाता है। लेकिन उसे ही जानने का अधिकार नहीं कि उसकी कमाई का उपयोग कैसे हो रहा है। लेकिन हिसाब-किताब न देने की यह सुविधा जनसामान्य को नहीं है। वेतन भोगियों की आय तो सरकार की सीधी नजर में रहती है। उन्हें तो वित्तीय वर्ष पूरा होत-होते ही अपना पूरा-पूरा आय कर चुका देना होता है। उद्यमियों, व्यापारियों, व्यवसायियों के लिए भी अपने आय-व्यय का ब्यौरा देने और आय कर चुकाने के लिए समय सीमा निर्धारित है। इसका उल्लंघन करने पर न्यूनतम दण्ड का प्रावधान है। 

जीएसटी लागू होने के बाद व्यापार का भट्टा बैठ गया है। छोटे दुकानदार और असंगठित क्षेत्र के अनगिनत लोग बेकार हो गए हैं। छोटे और मझोले व्यपारियों के लिए व्यापार करना आसान नहीं रह गया है। इसी पहली अप्रेल से लागू हुए एक प्रावधान ने रोजमर्रा की कठिनाई और बढ़ा दी है। अब कोई भी व्यापारी एक दिन में दस हजार या उससे अधिक का नगदी लेन-देन नहीं कर सकता है। गैर व्यापारियों (याने ग्राहकों/उपभोक्ताओं) के लिए यह सीमा बीस हजार रुपये है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि मैं अपने कस्बे से बाहर खरीददारी करता हूँ तो मुझे चेक देना पड़ेगा। बाहर का दुकानदार मेरा चेक स्वीकार करने की जोखिम उठाएगा या नहीं? याने ग्राहक/उपभोक्ता को अपने कस्बे/शहर में ही खरीददारी करनी है। मेरा कस्बा रतलाम सोने के आभूषणों के लिए विख्यात है। वैवाहिक तथा अन्य विभिन्न प्रसंगों के लिए आभूषण खरीदने के लिए, देश के कोने-कोने से लोग यहाँ आते हैं। पहले नगद खरीदी कर लेते थे। अब नहीं कर सकते। कोई ताज्जुब नहीं कि रतलाम के आभूषण व्यापार पर नकारात्मक असर हो। अन्य कस्बों/शहरों पर भी यह बात लागू होगी। याने, आम आदमी, उद्यमी, व्यापारी, व्यवसायी को अपनी साँस-साँस का हिसाब देना है,  आर्थिक सुस्पष्टता और पारदर्शिता बरतनी है। लेकिन इन सबके द्वारा चुनी गई सरकारें, अपने चयनकर्ताओं को अपना हिसाब देने को तैयार नहीं। 

मौजूदा व्यवस्था का रूपक यदि रचा जाए तो कह सकते हैं कि हमारी सरकारें (और राजनीतिक पार्टियाँ) पारम्परिक, देहाती महिलाओं की तरह, लम्बे, अपारदर्शी घूँघट में अपनी शकल छिपाए रखती हैं और शेष देश को पारदर्शिता बरतने का न केवल उपदेश देती हैं अपितु उस पर सख्ती से अमल भी कराती हैं।

हमारी राजनीतिक पार्टियों के चन्दे को ‘सूचना का अधिकार’ में शामिल करने के लिए अनेक समूह बरसों से लगे हुए हैं। लेकिन सारे राजनीतिक दल गिरोहबन्दी कर इसे असफल किए हुए हैं। मँहगे चुनाव भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण है। चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों की अधिकतम खर्च सीमा, लोक सभा के लिए सत्तर लाख रुपये और विधान सभा के लिए 28 लाख रुपये है। लेकिन मौजूदा चुनावी चलन में एक भी माई का लाल इस सीमा में रहकर चुनाव नहीं जीत सकता। चुने हुए लोग कभी-कभी उत्साह के आवेग में टीवी के पर्दे पर जो आँकड़े बताते हैं, वे सदैव ही करोड़ों में होते हैं। 

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) के एक अध्ययन के अनुसार 2014 के चुनावों में जीतकर सांसद बननेवालों ने 13,575 करोड़ रुपये खर्च किए। पार्टियों का और हारनेवालों का खर्च अलग है। सेण्टर ऑफ मीडिया के अध्ययन के अनुसार 2014 के लोक सभा चुनावों का कुल खर्च 30,000 करोड़ रुपये रहा। 

सरकारें और राजनीतिक दल अपना हिसाब देने से न केवल बचते हैं बल्कि बचे रहने के सुनिश्चित प्रावधान भी कर/करवा लेते हैं। अभी-अभी ऐसे ही दो प्रावधान सबने ‘प्रसन्नतापूर्वक मिलजुलकर’ किए हैं। पहला - इलेक्टोरल बॉण्ड। दुनिया में यह ऐसी पहली व्यवस्था है जिसमें सफेद धन को काले धन में बदलने की व्यवस्था की गई है। इसमें खरीदनेवाला चेक से खरीदेगा। यह खरीदी, खरीदनेवाले के खर्च में शामिल कर उसे आय-कर की छूट दी जाएगी। लेकिन यह बॉण्ड उसने किस पार्टी को दिया, यह जानकारी उसके सिवाय किसी और को नहीं होगी। यह बॉण्ड वह अपनी मनपसन्द पार्टी के बैंक खाते में सीधे जमा करवा सकता है, बन्द लिफाफे में पार्टी दफ्तर पहुँचा सकता है। पार्टी के लिए यह ‘गुप्त दान’ होगा - किसी के नाम की रसीद नहीं कटेगी। दूसरा - 1976 के बाद से मिले विदेशी चन्दे के बारे में किसी पार्टी से कोई पूछताछ नहीं की जा सकेगी।  ये दोनों प्रावधान ईमानदारी, शुचिता, नैतिकता, पारदर्शिता जैसे नैतिक मूल्यों को ठेंगा भी दिखाते हैं और उनकी खिल्ली भी उड़ाते हैं। ताज्जुब की बात तो यह कि इसके बाद भी तमाम नेता भ्रष्टाचार समाप्त करने का बीड़ा उठाते हैं।

पार्टियों को मिली ऐसी छूटें सारे गड़बड़झाले की जड़ हैं। सब कुछ साफ-सुथरा बनाने के लिए लॉ कमीशन ने 2015 से दो सुझाव दे रखे हैं। पहला - तमाम राजनीतिक दल अपना ऑडिटेड हिसाब पेश करें जिसे सीएजी भी जाँच सके। दूसरा - यदि 20,000 रुपयों से कम चन्दे की कुल रकम, बीस करोड़ रुपयों से अधिक हो तो इस रकम का स्रोत अनिवार्यतः बताया जाए। पार्टियाँ भला ऐसे आत्मघाती सुझाव कैसे मान लें? 

यह सब देख-देख कर कहने को जी करता है कि अपनी प्रजा को सम्पूर्ण रूप से ईमानदार बनाने में लगा राजा खुद ईमानदार बनने बनने को तैयार नहीं।

स्कूली दिनों में ‘फूलो का फ्राक’ शीर्षक कहानी पढ़ी थी। कम उम्र फूलो की सगाई कर दी जाती है। उसे निरन्तर समझाया जाता है कि ससुराल के लोगों से पर्दा करे। अपना चेहरा न दिखाए। एक दिन उसके ससुरजी, बिना खबर दिए, अचानक ही आ जाते हैं और अचानक ही फूलो उनके सामने आ जाती है। समझाइश का पालन करते हुए फूलो फ्राक उठाकर अपना चेहरा छुपा लेती है। यह देख ससुरजी हो-हो कर हँसते हुए उसे गोद में उठा लेते हैं।

कहानी की फूलो तो बाल सुलभता में फ्राक उठाकर चेहरा छुपाती है। लेकिन हमारी सरकारें और पार्टियाँ खूब सोच-समझ कर, सीनाजोरी से अपनी-अपनी फ्राकें उठा रही हैं। फूलो लिहाज पाल रही थी। ये सब लिहाज नहीं पाल रहे। अपनी निरावृतता बता रहे हैं। लोग भौंचक हैं और ये गर्व कर रहे हैं।
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‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 05 अप्रेल 2018

वे आँखें परेशान करती हैं

1977 का वह दिन और आज का दिन। उस चाँटे की आवाज कानों में जस की तस गूँज रही है और तपिश अभी भी गाल पर महसूस हो रही है। खास बात यह कि वह चाँटा मुझे नहीं पड़ा था।

मेरे ब्याह को डेढ़ बरस भी नहीं हुआ था। नौकरी करना फितरत में नहीं था और न थी कमा-खाने की जुगत भिड़ाने की अकल। मन्दसौर में सक्रिय पत्रकारिता में था। उस समय दैनिक ‘दशपुर-दर्शन’ का सम्पादक था। लेकिन पत्रकारिता के उच्च नैतिक आदर्श निभाते हुए कमाई कर लेने का करिश्मा मेरे बस के बाहर की बात थी। गृहस्थी चलाना तो कोसों दूर, अकेले का पेट पालना भी कठिन था। तभी एक अपराह्न, बाबू (यादवेन्द्र भाटी) रतलाम से आया। उसके साथ जैन साब (विजय कुमार जैन) भी थे। वे थे तो मूलतः सागर के लेकिन रतलाम में ही, ग्लुकोज/सलाइन बोतलें बनानेवाली इकाई में मेन्यूफेक्चरिंग केमिस्ट के पद पर नौकरी कर रहे थे। दोनों रतलाम में, दवाइयाँ बनानेवाली इकाई स्थापित करने की योजना बनाए हुए थे। जैन साब से मेरा कोई परिचय नहीं था। बाबू मेरा हितचिन्तक रहा है। उसने मुझसे पूछे बिना और मुझे बताए बिना मुझे तीसरा भागीदारी बना लिया था। वह भागीदारी अनुबन्ध टाइप करवा कर लाया था। दोनों आए उस समय मैं दफ्तर में बैठा अखबार के मुख पृष्ठ की तैयारी शुरु कर रहा था। बाबू ने जैन सा‘ब से मेरा परिचय कराया और कहा कि कुछ जरूरी बात करनी है जो दफ्तर में नहीं हो सकती। हम तीनों नयापुरा से निकल कर सुचित्रा टाकीज के सामनेवाली होटल पर आए। बाहर लगी बेंच पर बैठे। बाबू ने वह भागीदारी अनुबन्ध मेरे सामने रखा और कहा कि जहाँ-जहाँ मेरा नाम लिखा है, वहाँ-वहाँ हस्ताक्षर कर दूँ। मैंने हस्ताक्षर कर प्रश्नाकुल आँखों से उसे देखा। वह हँसते हुए बोला - ‘तुम एक फार्मास्युटिकल यूनिट में पार्टनर हो गए हो। रतलाम शिफ्ट होने की तैयारी करो।’ मैं घबरा गया। मेरी जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी। बाबू फिर हँसा और बोला - ‘तुम्हें कुछ नहीं करना है। तुम वर्किंग पार्टनर हो।’ और तेरह अगस्त 1977 को मैं रतलाम आ गया। 

कच्चा खाका बना हुआ था। काम-काज का बँटवारा हो चुका था। प्रबन्धकीय/प्रशासकीय और वित्तीय व्यवस्था बाबू के जिम्मे थी। जैन सा‘ब दवाइयों का निर्माण देखेंगे। बाहर की भाग-दौड़ मैं करूँगा। हमें म. प्र. वित्त निगम (एम.पी.एफ.सी.) से लोन लेना था। इसका मुख्यालय इन्दौर में था। इन्दौर आना-जाना मेरे जिम्मे ही हुआ। मुझे न तो पैसे-कौड़ी की अकल न ही धन्धे की सूझ। उस पर पत्रकारिता की अकड़ बनी हुई। मुझे तो सवाल पूछने की आदत। जबकि यहाँ छोटी से छोटी बात का भी जवाब देना होता था। वह भी विस्तार से और याचक मुद्रा में। मुझे तो पल-पल अपने आप से जूझना पड़ता था - ‘मेरी किसी मूर्खता से बाबू का और जैन सा‘ब का कोई नुकसान न हो जाए।’ खास-खास मौकों पर बाबू साथ आता लेकिन छोटे-मोटे कामों के लिए मैं ही जाता था। ये ‘छोटे-मोटे काम’ मेरे लिए हर बार हिमालय पार करने जैसे होते थे।

रतलाम से इन्दौर की दूरी 135 किलो मीटर है। उन दिनों बसें बहुत ज्यादा नहीं चलती थीं। पूरी सड़क ‘सिंगल रोड़’ और बहुत खराब। बस को लगभग चार घण्टे लगते थे इन्दौर पहुँचने में। पहली बस सुबह छः बजे निकलती थी। दफ्तरों का काम निपटानेवालों के लिए यही बस अनुकूल होती थी - दफ्तर खुलने से पहले पहुँच जाओ और काम निपटा कर शाम को वापस रतलाम के लिए चल दो। लेकिन मेरे लिए यही सबसे बड़ी प्रतिकूलता थी। मैदानी पत्रकारिता के कारण मेरी कोई नियमित दिनचर्या नहीं थी। अनियमित दिनचर्या ही मेरी नियमित दिनचर्या थी। आज भी वही दशा है। सुबह जल्दी उठना मेरे लिए सबसे कड़ी सजाओं में से एक है। मुझे रात भर जगवा लीजिए, लेकिन सुबह जल्दी उठने की मत कहिए। सो, उन दिनों, रतलाम से इन्दौर तक की पूरी यात्रा मैंने हर बार सोते/ऊँघते हुए ही पूरी की। 

रतलाम से चालीस किलो मीटर की दूरी पर, बदनावर में बस का पहला पड़ाव होता है। बदनावर की कचोरी इस अंचल में बहुत प्रसिद्ध है। इसका अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इस अंचल के केटररों के मेनू में ‘बदनावरी कचोरी’ एक व्यंजन के रूप में शामिल है। इमली की चटनी और दही के साथ हींग-काली मिर्च वाले जायकेदार सिंगदानों से सजी गरम-गरम बदनावरी कचोरी की तेज गन्ध अच्छे-अच्छे विश्वामित्रों की तपस्या भंग कर देती है। घर से खाली पेट चले लोग, नाश्ते के नाम पर यहाँ की कचोरियों के साथ ‘असल मालवी चरित्र’ के तहत ‘सम्पूर्ण न्याय’ करते हैं। तले-गले के कड़े परहेजी लोग, अपने डॉक्टरों, परिजनों की सारी हिदायतें, चेतावनियाँ ताले में बन्द कर इन कचोरियों पर टूट पड़ते हैं। एक कचोरी से किसी का काम नहीं चलता। एक नमूने से बात शायद आसानी से और अधिक प्रभावी ढंग से समझ में आ जाएगी।

श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति (इन्दौर) के वर्तमान प्रधान मन्त्री श्री सूर्यप्रकाशजी चतुर्वेदी रतलाम कॉलेज में प्रोफेसर हुआ करते थे। तब से आज तक वे बदनावरी कचोरी के दास बने हुए हैं। वे इन्दौर के हैं। आज वे अस्सी बरस के आसपास होंगे। उन्हें वे बीमारियाँ घेरे हुए हैं जिनमें तला-गला खाना निषिद्ध है। लेकिन उन्हें जब भी इन्दौर से रतलाम, मन्दसौर, नीमच इलाके में जाने का काम पड़ता है तो वे अनिवार्यतः बदनावर होकर ही यात्रा करते हैं और परिवार में घोषणा करके आते हैं कि वे आते-जाते, बदनावर में कम से कम दो-दो कचोरियाँ तो खाएँगे ही खाएँगे। बदनवारी कचोरी के व्यसनी, ऐसे अनगिनत चतुर्वेदीजी बदनावर से रोज गुजरते हैं। 

बदनावर तब तहसील मुख्यालय हुआ करता था। अब शायद उप सम्भाग हो गया हो। यह इस इलाके का अच्छा-भला व्यापार केन्द्र है। कपास और अनाज मण्डी है। अंचल के कई गाँवों, कस्बों का मुख्य बाजार यही है। यहाँ का बस अड्डा यदि बहुत बड़ा नहीं तो बहुत छोटा भी नहीं है। वहाँ कोई न कोई बस आती-जाती रहती है। बस के रुकते ही, होटलों पर काम करनेवाले बच्चे इन बसों में चढ़कर यात्रियों को आवाजें देने लगते हैं। इन आवाजों से मुझे बहुत परेशानी होती थी। मेरी नींद में व्यवधान जो पड़ता था! 

उस दिन भी यही हुआ। बस बदनावर बस अड्डे पर रुकी। लोग फटाफट उतरे। बस में हम गिनती के यात्री रह गए थे: पाँच-सात महिलाएँ और दो-एक बूढ़े। आठ-नौ बरस की उम्रवाले तीन बच्चे अन्दर आकर, अपनी आदत और जिम्मेदारी के अनुरूप जोर-जोर से ‘कचोरी-पोहे! गरम गरम कचोरी-पोहे!’ की आवाजें लगाने लगे। दो बच्चे तो थोड़ी देर में चले गए लेकिन एक बच्चा बराबर आवाज लगाता रहा। मुझे परेशानी होने लगी। मैंने अधखुली आँखों से, गुस्से से उसे देखा। मुझे अपनी ओर देखते देख वह अधिक उत्साह से आवाज लगाने लगा। मैंने उसे टोका। लेकिन वह चुप नहीं हुआ। मैंने तनिक डाँटते हुए कहा - ‘गिनती के लोग यहाँ बैठे हैं। सबने तेरी बात सुन ली। अब भाग जा।’ लेकिन उसने मेरी बात नहीं सुनी। आवाज लगाता रहा। मैंने जोर से कहा - ‘सुना नहीं? मैंने कहा ना! भाग जा। चल भाग!’ उसने पलट कर कहा - ‘मैं अपना काम कर रहा हूँ। आपको क्या? आप अपना काम करो।’ मुझे गुस्सा आ गया। चिल्लाया - ‘सामने बोलता है? जाता है या चाँटा टिकाऊँ?’ मेरी शकल देख और चिल्लाना सुन वह सहमा। लेकिन कुछ ही पलों में सामान्य हो बोला - ‘क्यों नाराज होते हो बाबूजी? मैं आपका क्या ले रहा हूँ? मुझे अपना काम करने दो।’ यह सुनना था कि मैं अपने बस में नहीं रहा। मेरा धैर्य छूट गया और मैंने जोर से, उसे चाँटा मार दिया। बच्चा हतप्रभ हो गया। उसके साथ ऐसा शायद पहली बार हुआ था। उसे मानो विश्वास ही नहीं हुआ। अपने गाल पर हाथ रख कर मुझे ताकने लगा। मुझे लगा था, वह रोना शुरु कर देगा और रोते-सुबकते बस से उतर जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वह, उसी मुद्रा में मुझे ताकता रहा। कुछ इस तरह कि मैं असहज हो गया। नजरें चुराने लगा। उसकी आँखों में न तो गरीबी की लाचारी थी न ही बच्चा होने का, शरीरिक दुर्बलता का भाव। इस क्षण भी मुझे उसकी वे, ताब भरी, मुझे घूरती आँखें साफ-साफ दिखाई दे रही हैं। वे ही आँखें मुझ पर गड़ाए हुए बोला - ‘बस! मार दिया झापट? हो गई तसल्ली? अब बाबूजी! मैं भी आपको एक झापट मार दूँ तो? क्या इज्जत रह जाएगी आपकी? यहाँ अभी भले ही कोई नहीं देख रहा है। लेकिन आप क्या कभी मेरे झापट को भूल जाओगे?’ कह कर वह, बिना रोए-सिसके बस से उतर गया।

उसका उतरना था कि मुझे मानो कँपकँपी छूट गई। मैं समझ ही नहीं पाया कि मैंने क्या कर दिया और वह बच्चा क्या कर गया। मेरी उम्र तीस बरस और उसकी आठ-नौ बरस। झापट नहीं मार पाता लेकिन मारने की कोशिश तो कर ही सकता था! प्रतिशोधग्रस्त आदमी को न तो उम्र की बाधा होती है न ही शारीरिक बल की। वह तो कुछ भी कर गुजरता है। लेकिन वह बच्चा न तो गुस्से में आया न ही बदले की भावना में बहा। वह संयत बना रहा और मुझे क्षमा कर चला गया। 

थोड़ी देर में बस इन्दौर के लिए चल दी। लेकिन मैं उसके बाद, पल भर नहीं सो पाया। और केवल उस दिन ही क्यों? उसके बाद बरसों तक, मैं जब भी उस बस से गया, कभी नहीं सो पाया। कभी बदनावर में उतरा भी नहीं। बस बदनावर के ज्यों-ज्यों पास पहुँचती, मेरा दिल बैठने लगता - कहीं उस बच्चे से सामना न हो जाए। वह सामने आ गया तो मेरा क्या हाल होगा? जब तक बस बदनावर से चल नहीं देती, मैं इस तरह से बस में बैठा रहता मानो कोई अपराधी पुलिस से बचने के लिए छिपा-बैठा हो।

आज भी जब-जब भी यह सब याद आता है तो घबरा जाता हूँ। पसीना-पसीना हो जाता हूँ। उस चाँटे की आवाज कानों में गूँजने लगती है। उसकी तपिश अपने गाल पर महसूस होने लगती है। लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी होती है, उस लड़के की ताब भरी आँखों से। वे आँखे अब भी मेरी आँखों में गड़ी हुई हैं।
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देश पहली इण्टरनेट साहित्य पत्रिका ‘रचनाकार’ ने  
इस संस्मरण को 26 मार्च 2018 को प्रकाशित किया।