‘नोटा’ बन गया ‘सोटा’: जीत गया तो फिर से होंगे चुनाव

यह किसी सपने के सच हो जाने जैसा है। 

हमारे मँहगे चुनाव मुझे देश में व्याप्त आर्थिक भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण लगते हैं। धनबली और बाहुबली लोग विधायी सदनों पहुँचकर हमारी तकदीरों से खेलते हैं। ‘इण्डिया’ के लोग ‘भारत’ की तकदीर बनाने का ठेका ले लेते हैं। वास्तविक जन प्रतिनिधि विधायी सदनों में पहुँच ही नहीं पाते।

इनसे मुक्ति पाने के लिए मुझे ‘नोटा’ प्रभावी, परिणामदायी हथियार अनुभव होता है। लेकिन उसका वर्तमान स्वरूप मुझे और क्षुब्ध कर देता है। इसका वर्तमान स्वरूप, उम्मीदवारों के प्रति मतदाताओं की नाराजी, असहमति तो जरूर प्रकट करता है लेकिन  किसी को जीतने से रोक नहीं पाता। अपनी इसी बात को लेकर मैं 05 अक्टूबर 2018 को, ‘नोटा’ को उम्मीदवार की हैसियत दिए जाने की बात कही थी। तब मुझे सपने में भी गुमान नहीं था कि डेड़ माह से भी कम अवधि में मेरी मुराद पूरी होने की शुरुआत हो जाएगी। कल, 13 नवम्बर को अचानक ही मुझे जानकारी मिली कि ‘नोटा’ को उम्मीदवार मान लिया गया है और यदि इसे सबसे ज्यादा वोट मिल गए तो वहाँ फिर से चुनाव कराया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने 27 सितम्बर 2013 को ‘नोटा’ का बटन, मतदान मशीन पर उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। लेकिन आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि किसी चुनाव में ‘नोटा’ को तमाम उम्मीदवारों से ज्यादा मत मिल जाएँ तब भी, (‘नोटा’ के बाद) सर्वाधिक मत हासिल करनेवाले उम्मीदवार को विजयी घोषित कर दिया जाए। याने, चूँकि ‘नोटा’ कोई उम्मीदवार नहीं है इसलिए वह जीत कर भी हार जाएगा और उसे मिले मत, निरस्त मत माने जाएँगे। 

लेकिन महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग (मरानिआ) इस स्थिति से एक कदम आगे बढ़ गया है। ‘मरानिआ’ के सचिव शेखर चन्ने के अनुसार अब (महाराष्ट्र में) किसी चुनाव/उप चुनाव में यदि ‘नोटा’ को सर्वाधिक मत मिले तो किसी भी उम्मीदवार को विजयी घोषित नहीं किया जाएगा और वहाँ (उस पद के लिए) फिर से चुनाव कराया जाएगा। श्री चन्ने के अनुसार यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। 

लेकिन यह आदेश फिलहाल महाराष्ट्र के समस्त नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों के चुनावों, उप चुनावों में ही लागू होगा।

श्री चन्ने के अनुसार, ‘नोटा’ के वर्तमान स्वरूप में मतदाताओं की नकारात्मकता अनदेखी रह जाती है इसलिए यह प्रावधान किया गया है। इसमें ‘नोटा’ को ‘काल्पनिक चुनावी उम्मीदवार’ (Fictional Electoral Candidate) माना जाएगा और यदि चुनावी उम्मीदवारों को इस ‘काल्पनिक चुनावी उम्मीदवार’ से कम मत मिले को कोई भी उम्मीदवार विजयी घोषित नहीं किया जाएगा और वहाँ (जिस पद के लिए यह चुनाव हुआ था, उस पद के लिए) फिर से चुनाव कराया जाएगा।

हालाँकि यह अधूरी जीत है किन्तु यह पूरी जीत की शुरुआत है। ‘मरानिआ’ का क्षेत्राधिकार चूँकि केवल राज्यस्तरीय निकायों तक सीमित है इसलिए उसने अपने क्षेत्राधिकार के मतदाताओं को यह ताकत दे दी। यह शुरुआत यहीं नहीं रुकेगी। यह ‘छूत की बीमारी’ की तरह फैलेगी ही फैलेगी। एक के बाद एक, अन्य राज्य भी अपने मतदाताओं को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए इस प्रावधान को लागू करेंगे और अन्ततः बात भारत निर्वाचन आयोग तक पहुँचेगी ही पहुँचेगी। इसमें देर लग सकती है लेकिन ऐसा होना तो तय हो गया है।

मतदाताओं को अधिक ताकतवर बनाने के लिए, उनकी नापसन्दगी को स्वीकृती दिलाने हेतु, चुनाव सुधारों के लिए काम कर रहे अनेक एक्टिविस्ट और एनजीओ, ‘नोटा’ का प्रावधान लागू होने के ठीक बाद से लगातार माँग कर रहे हैं कि किसी चुनाव में ‘नोटा’ को सर्वाधिक मत मिलने की दशा में वहाँ फिर से चुनाव तो कराया ही जाए, मतदाताओं के इंकार को स्वीकृती देते हुए, उस चुनाव में, ‘नोटा’ के जरिए खारिज किए गए तमाम उम्मीदवारों को फिर से उस चुनाव के लिए अयोग्य भी घोषित किया जाए।

हमारे राजनेता देश को और देश के लोगों को जिस मुकाम पर ले आए हैं उसके चलते यह सब होगा। होकर रहेगा। देश को मँहगे चुनावों से मुक्ति मिलेगी, एक औसत आदमी चुनाव लड़ सकेगा, वास्तविक जन प्रतिनिधि विधायी सदनों में नजर आएँगे। आर्थिक भ्रष्टाचार यदि समूल नष्ट नहीं भी हुआ तो भी वह न्यूनतम स्तर पर आएगा। राजनीतिक दलों के, दरियाँ-जाजम उठाने-झटकारनेवाले, झण्डे-डण्डे उठानेवाले मैदानी कार्यकर्ताओं की पूछ-परख होगी। ऐसी बातों की बहुत लम्बी सूची है। वे सब होंगी।

शुरुआत हो चुकी है। विधायी सदनों में बैठे तमाम नेता, अपने सारे मतभेद भुलाकर इसे रोकने में जुट जाएँगे। मुमकिन है, कुछ बरसों तक वे इसे रोक भी लें। लेकिन वे अन्ततः परास्त होंगे। वही ‘जनता-जनार्दन’ की जीत होगी।

अँधरे को प्रकाश की अनुपस्थिति कहते हैं। लेकिन वह तो एक प्राकृतिक स्थिति है। अँधेरा दूर करने के लिए उजाला करना पड़ता है। छोटे-छोटे जुगनू लगातार जूझ रहे हैं। हर रात की एक सुबह होती ही है। लेकिन वे इस भरोसे चुपचाप नहीं बैठेंगे। वे सुबह लाने तक रुकेंगे नहीं। चैन से नहीं बैठेंगे। वे सुबह लाकर ही मानेंगे।
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(यह पोस्ट मैंने, इण्डियन एक्सप्रेस के मुम्बई संस्करण में, दिनांक 13 नवम्बर 2018 को प्रकाशित समाचार के आधार पर लिखी है। इस समाचार की लिंक मुझे, ग्वालियरवाले श्री  विष्णुकान्त शर्मा Vishnukant Sharma की फेस बुक वॉल से मिली है।  श्री शर्मा की वॉल पर उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार वे, इस पोस्ट के लिखे जाने के समय तक, 28 नवम्बर को हो रहे विधान सभा चुनावों में ग्वालियर विधान सभा क्षेत्र 15 से प्रत्याशी हैं। 

मेरा अंग्रेजी ज्ञान बहुत कम है। मैंने, परम् सद्भाव और सदाशयता से, अपनी सूझ-समझ के अनुसार इस समाचार का यथासम्भव समुचित हिन्दी भावानुवाद किया है। समाचार का जो हिस्सा मुझे समझ नहीं पड़ा, वह मैंने छोड़ दिया है। मुझसे यदि कोई चूक हुई हो तो कृपया मुझे अविलम्ब सूचित कीजिएगा ताकि मैं खुद को सुधार सकूँ। मुझे प्राप्त समाचार लिंक यहाँ दे रहा हूँ।)

पटाखों और फुलझड़ियों से ही नहीं होती दीपावली

जिन्दगी के पनघट पर घटनाओं की रस्सियों से बने अनुभूतियों के अमिट निशान हमारी धरोहर और जीवन पाथेय बन जाते हैं। तब चीजें, बातें एक नया अर्थ, नई उपयोगिता हासिल करने लगती हैं। दीपावली को लेकर कुछ ऐसा ही मेरे साथ गए कुछ बरसों से हो चला है। लेकिन मुझे यह भ्रम नहीं कि ऐसा केवल मेरे साथ ही हुआ, हो रहा होगा। विश्वास करता हूँ कि मैं ऐसे अनगिनत लोगों की भीड़ का सबसे अन्तिम, सबसे छोटा हिस्सा ही हूँगा। 

बचपन में बताए, समझाए गए, दीपावली के सारे अर्थ एक के बाद एक, बदल गए। अब दीपावली केवल लंका विजय के बाद राम की अयोध्या वापसी का या तीर्थंकर महावीर के निर्वाण का या फिर नई फसल के आने का त्यौहार नहीं रह गई। पहले समझाया जाता था - दीपावली खुशियों का, खुशियाँ मनाने का त्यौहार है। लेकिन अकेली खुशी भी खुश नहीं हो पाती। खुशी को भी खुश होने के लिए संगाती चाहिए। संगाती भी ऐसा जो हमारी खुशी को अपनी खुशी मानने को तैयार हो सके। कोई दुखी आदमी भला हमारी खुशी में कैसे शरीक हो सकता है? लिहाजा, अपनी खुशी का आनन्द लेने के लिए हमें किसी खुश आदमी की ही जरूरत होती है। तब ही समझ आया कि खुश होना ही पर्याप्त नहीं है। अपने आसपास के लोगों का खुश होना भी बराबरी से जरूरी है। इसलिए, यदि वे खुश नहीं हैं तो उन्हें खुश करने, खुश रखने की भावना उपजी होगी। तब ही अनुभव हुआ होगा कि लोगों को खुश रखना ही सबसे बड़ी खुशी होती है। तब ही दीपावली का नया भाष्य सामने आया - दीपावली खुशियों का त्यौहार तो है जरूर लेकिन उससे पहले, खुशियाँ बाँटने का त्यौहार है। यह पवित्र भावना मन में उपजते ही त्यौहार मन जाता है। तब हम खुशियों की खेती करने लगते हैं। खुशियाँ बोते हैं और खुशियों  की फसल काटते हैं।

खुशी कोई वस्तु तो है नहीं कि बाजार से खरीद लें! वस्तुएँ खुशी दे सकती हैं लेकिन घावों पर मरहम नहीं लगा पातीं। कुछ लोगों के लिए वस्तुएँ खुशी का सबब होती हैं। लेकिन कुछ इनसे अलग होते हैं। उन्हें कुछ दिए बिना भी खुशी दी जा सकती है, यह प्रतीति कुछ बरस पहले मुझे अचानक ही हुई। तब से, हर बरस मेरी दस-बीस दीवालियाँ मन रही हैं। 

बीमे के धन्धे के कारण मैं सभी वर्गों, श्रेणियों, धर्मों, जातियों के लोगों से मिलता हूँ। इन सबसे मिलने पर बार-बार वह बात याद आती है कि सुख, खुशी और सुविधाओं, सम्पन्नता का कोई रिश्ता नहीं है। मुझे महलों में दुःखी, असन्तुष्ट, क्षुब्ध लोग मिलते हैं तो झोंपड़ियों में परम प्रसन्न, सुखी, सन्तुष्ट लोग। 

एक परिवार में मुझे, जिसका बीमा करना था उसकी प्रतीक्षा करनी थी। परिवार में उसके बूढ़े पिता ही फुरसत में थे। उनसे बतियाने लगा। शुरु में तो वे कन्नी काटते रहे। कुछ-कुछ भयभीत होकर। लेकिन जल्दी ही खुल गए। उन्हें कोई कमी नहीं थी। कोई कष्ट नहीं था, किसी से कोई शिकायत नहीं थी। उनकी सारी जरूरतें पूरी हो रही थीं और अपेक्षानुरूप देखभाल भी। लेकिन उनसे बात करने की फुरसत किसी को नहीं थी। मुझे घण्टे भर से अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ी। तब तक वे न जाने कहाँ-कहाँ की बातें करते रहे। मेरे काम की एक भी बात नहीं थी। लेकिन मैं हाँ में हाँ मिलाते हुए सुनता रहा। बीमा करानेवाला लौटा तो उन्होंने आश्चर्य से कहा - ‘अरे! तू इतनी जल्दी आ गया? काम अधूरा छोड़ कर तो नहीं आ गया?’ मुझे अपना काम निपटाना था। मैं उठने लगा तो मेरी बाँह पकड़ कर बोले - ‘आज कितने दिनों में कोई मेरे पास बैठा। आज मैंने खूब बातें कीं। आज तो आपने मेरी दीवाली कर दी।’ यही वह घटना थी जिसने मुझे पहली बार  दीवाली का नया भाष्य दिया था। मेरी गाँठ से कुछ नहीं गया। लेकिन वे बुजुर्ग परम प्रसन्न थे। उसके बाद से तो मैं ऐसी स्थितियों की तलाश करने लगा।

एक परिवार में अब मैं नियमित रूप से जाता हूँ। परिवार के सबसे वृद्ध सज्जन अपंग तो नहीं हैं लेकिन ज्यादा चल-फिर नहीं सकते। मुझे देखते ही खुश हो जाते हैं। उनके पास भी आधा-पौन घण्टा गुजार लेता हूँ। उन्हें परिवार से तो नहीं लेकिन जमाने से शिकायतें हैं। उन्हें दुनिया में कुछ भी अच्छा होता नजर नहीं आता। मैं उनसे कभी सहमत नहीं हो पाया किन्तु कभी असहमति भी नहीं जताई। मैं लौटता हूँ तो कहते हैं कि मैं तनिक जल्दी-जल्दी मिलने आया करूँ। मैं परिहास करता हूँ - ‘आप जमाने को गालियाँ देते हो। क्या गालियाँ सुनने के लिए आऊँ?’ वे कुम्हला जाते हैं। कहते हैं - ‘मैं तो ऐसा ही हूँ। लेकिन आप आते रहो। आप मेरी बातें सुन लेते हो। मुझे खुशी होती है।’

एक परिवार की वृद्धा से मेरी दोस्ती हो गई है। दो मुलाकातों में तीन हफ्तों से अधिक का अन्तराल न हो यह चेतावनी उन्होंने दे रखी है। मेरी खूब खातिरदारी करती हैं। पौन घण्टा तो मुझे रुकना ही होता है उनके पास। अपनी इकलौती बहू की खूब बुराई करती हैं। मैं टोकता हूँ - ‘इतनी तो सेवा करती है बेचारी आपकी! फिर भी बुरी है?’ वृद्धा का जवाब होता है - ‘सब दिखावा करती है। आप बहुओं को नहीं जानते। बहू कुछ भी कर ले, है तो परायी जायी।’  पौन घण्टे के इस बुराई-पीरीयड में बहू दो-तीन बार आकर पानी, चाय-नाश्ता रख जाती है। आते-जाते हँसती रहती है। लौटता हूँ तो वृद्धा मुझे भर-पेट असीसती हैं। कहती हैं - ‘आप आते हो तो मेरा आफरा (अजीर्ण) झड़ जाता है।’ बहू मुझे छोड़ने के लिए बाहर तक आती है। कहती है - ‘आप आते रहिए। मेरे पीहर में तो कोई है नहीं और ससुरालवाले वाले आते-जाते नहीं। बई (सासू माँ) ने सबसे झगड़ा कर रखा है। बई को मेरी बुराई करने में बड़ा सुख मिलता है। मेरी बुराई इनकी बीमारी की दवा है। आपसे कह देती हैं तो इनकी तबीयत ठीक रहती है।’

ये तो गिनती के नमूने हैं। ऐसे कई लोगों से मैंने घरोपा बना लिया है। मैं बीमा एजेण्ट। मेरा काम बातें करना। ऐसे मामलों में मुझे सुनना होता है। सुन लेता हूँ। हर जगह से लौटने में बड़ी सुखानुभूति होती है। लगता है, देव पूजा करके या यज्ञ में समिधा-आहुति डाल कर आ रहा हूँ। इन लोगों की खुशी देखते ही बनती है। सचमुच में अवर्णनीय। ऐसी हर आहुति के बाद लगता है, मैंने दीवाली मना ली है। 

बिना पटाखे फोड़े, बिना फुलझड़ियाँ छोड़े, आदमी के मन और आत्मा को खुशियों और उजास से भर देनेवाली ऐसी दीवालियाँ आप-हम सब, जाने-अनजाने साल भर मनाते हैं लेकिन कभी ध्यान नहीं देते हैं। अब ध्यान दीजिएगा तो खुशी कम से कम दुगुनी तो हो ही जाएगी। बच्चन की मधुशाला तो ‘दिन को होली, रात दीवाली’ मनाती है। लेकिन खुशियों की यह मधुशाला तो दिन-रात, चौबीसों घण्टे, बारहमासी दीवाली मनाती है।  
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‘सुबह सवेरे’ (भोपाल) ने मेरी इस पोस्ट को सम्पादित रूप
में अपने दीपावली 2018 के अंक के मुखपृष्ठ पर जगह दी। 




नरोड़ा का आशीष और वटवा की साजिया

जो दुर्व्यसन अहमदाबाद वाले केशवचन्द्रजी शर्मा ने पाल रखा है, वह हम सब भी पाल लें तो नफरत की आग बुझे भले नहीं लेकिन उसकी आँच, उसकी तपन जरूर काफी कुछ हो जाए। वे अहमदाबाद के गुजराती, हिन्दी, अंग्रेजी अखबारों में छपनेवाले ‘असामान्य’ समाचार, जानकारियाँ ढूँढ कर जुटाते हैं और उनकी कतरनें (तथा गुजराती, अंग्रेजी सामग्री के हिन्दी अनुवाद) मुझे भेजते हैं। उनकी भेजी सामग्री आत्मा को शीतलता तो देती ही है, आत्मा को ताकत भी देती है और भरोसा भी दिलाती है कि जितना कुछ नकारात्मक, निराशाजनक, भयानक परिदृष्य पर नजर आ रहा है, परिदृष्य के पीछे उससे बहुत-बहुत ज्यादा अच्छा है। केशवजी की कोशिश उसी ‘बहुत अच्छे’ को सामने लाने की है। 

क्यों कर रहे हैं केशवजी यह सब? क्या फायदा है इसमें उनका? वक्त लगाते हैं, लिखने में मेहनत करते हैं, गाँठ का दाम खर्च करते हैं। क्यों? जिम्मेदारी की भावना से शायद केवल इस आस में कि हमारी आनेवाली पीढ़ियाँ एक बेहतर कल हासिल कर सकें। आम के पौधे लगाने जैसा काम कर रहे हैं केशवजी - ‘मैं तो नहीं, लेकिन मेरा पोता रसीले आमों का आनन्द लेगा।’ लंका तक पहुँचने के लिए निर्मित हो रहे सेतु में अपना योगदान देने केलिए बार-बार गीली होकर रेत में लोटनेवाली गिलहरी लगते हैं केशवजी मुझे। उनकी इसी मौन साधना ने मुझे प्रेरित किया कि उनकी सामग्री को विस्तारित करूँ। याने, रामजी की गिलहरी केशवजी और मैं केशवजी की सहायक गिलहरी।

आप इस सामग्री का आनन्द लीजिए और आपकी आत्मा अनुमति दे तो मेरी ही तरह एक गिलहरी बन, इसे विस्तारित कीजिए। लिख कर न सही, अपनेवालों से, मिलनेवालों से इस सामग्री की और इन कोशिशों की चर्चा करके। 

अच्छी बातों का जिक्र कीजिए ताकि बुरी बातों के जिक्र की गुंजाइश न रहे।

कहानी बहुत ही छोटी है। इक्कीस  शब्दों और दो-ढाई पंक्तियों में कही जा सकनेवाली। एक लड़के ने एक लड़की से राखी बँधवा कर उसे बहन बनाया और रिश्ता बना हुआ है, दिनोंदिन प्रगाढ़ होता हुआ। बस। लेकिन जब मालूम हो कि यह लड़की दूसरे धर्म की है और लड़के की पहले ही दो सगी बहनें हों तो कहानी चौंकाती है और जिज्ञासु बनाती है। तब, सवाल ‘क्या हुआ?’, ‘क्या किया?’ से बदल कर ‘क्यों हुआ?’, ‘क्यों किया?’ हो जाता है।

यह सात बरस पहले की बात है।

अहमदाबाद का नरोड़ा निवासी आशीष, अपने गुजरात से बेहद प्यार करनेवाला एक औसत युवक है। लेकिन अपने मित्र मण्डल में तनिक अलग किस्म का नजर आता है। वह जिस तरह की बातें करता है, जैसा सोचता-विचारता है उससे उसे प्रगतिशील और सर्व-धर्म-समभावी कहा जा सकता है। वह कहता तो कुछ नहीं लेकिन उसकी बातों से लगता है कि वह, दुनिया में अपने गुजरात की छवि को लेकर चिन्तित रहता है। वह ‘कहने’ के बजाय ‘करने’ में विश्वास करता है। उसकी इस मानसिकता ने ही इस कहानी को जन्म दिया। आशीष को विचार आया - किसी मुस्लिम लड़की को बहन बनाया जाए। यूँ तो यह कोई अनूठा विचार नहीं क्योंकि ऐसे रिश्ते बड़ी संख्या में मिल जाएँगे। लेकिन आशीष की तो दो सगी बहनें हैं! यही तथ्य इस कहानी का बीज-विचार बना।

लेकिन आशीष ने भावुकता की दासता अस्वीकार की। रिश्ता जब बनाना है तो उसे निभाना भी होगा। केवल अपनी एक ‘सनक’ के आधार पर तो रिश्ता नहीं बनाया जा सकता! लिहाजा, आशीष ने समान वैचारिक धरातल वाली मुस्लिम लड़की की तलाश शुरु की। 

काम आसान नहीं था। लेकिन आशीष ने अपनी तलाश जारी रखी। अचानक ही एक नाटक प्रतियोगिता में उसकी मुलाकात, वटवा इलाके में रहनेवाली साजिया से हुई। आशीष ने अनुभव किया कि उसका और साजिया का सोचना-विचारना एक जैसा है। फिर भी आशीष ने, तत्काल किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से खुद को रोके रखा। उसने साजिया को परखना जारी रखा और जब उसे भरोसा हो गया कि सोच-विचार के आधार पर उसकी और साजिया की निभ जाएगी तो उसने साजिया से राखी बँधवाने की बात कही। साजिया के लिए यह सर्वथा अनपेक्षित प्रस्ताव था। किन्तु वह भी आशीष को थोड़ा-बहुत जान-समझ चुकी थी। उसने प्रसन्नतापूर्वक हामी भरी। और उसी क्षण एक रिश्ते ने जन्म लिया। ऐसा रिश्ता जो एक महीन धागे से बँधा था।

सात बरस हो गए हैं। हर बरस रक्षा बन्धन पर साजिया, आशीष को राखी बाँधती है और आशीष अपनी बहन को नेग चुकाता है। दो व्यक्तियों से शुरु हुए इस रिश्ते ने दोनों परिवारों को अपने में समेट लिया। अब दोनों परिवार मिल कर त्यौहार मनाते हैं और केवल एक-दूसरे को नहीं, सारे जमाने को भरोसा दिला रहे हैं - ‘प्रेम ही जीवन-जड़ी है।’ वह ‘जीवन-जड़ी’ जो कबीर के मुताबिक न तो खेत में पैदा होती है न ही हाट-बाजार में बिकती मिलती है। वह ‘जीवन जड़ी’ जो निर्मल, निष्कलुष, मानवीय हृदयों की उर्वरा जमीन में पाई जाती है।
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जरूरत और फर्ज का धर्म

जो दुर्व्यसन अहमदाबाद वाले केशवचन्द्रजी शर्मा ने पाल रखा है, वह हम सब भी पाल लें तो नफरत की आग बुझे भले नहीं लेकिन उसकी आँच, उसकी तपन जरूर काफी कुछ हो जाए। वे अहमदाबाद के गुजराती, हिन्दी, अंग्रेजी अखबारों में छपनेवाले ‘असामान्य’ समाचार, जानकारियाँ ढूँढ कर जुटाते हैं और उनकी कतरनें (तथा गुजराती, अंग्रेजी सामग्री के हिन्दी अनुवाद) मुझे भेजते हैं। उनकी भेजी सामग्री आत्मा को शीतलता तो देती ही है, आत्मा को ताकत भी देती है और भरोसा भी दिलाती है कि जितना कुछ नकारात्मक, निराशाजनक, भयानक परिदृष्य पर नजर आ रहा है, परिदृष्य के पीछे उससे बहुत-बहुत ज्यादा अच्छा है। केशवजी की कोशिश उसी ‘बहुत अच्छे’ को सामने लाने की है। 

क्यों कर रहे हैं केशवजी यह सब? क्या फायदा है इसमें उनका? वक्त लगाते हैं, लिखने में मेहनत करते हैं, गाँठ का दाम खर्च करते हैं। क्यों? जिम्मेदारी की भावना से शायद केवल इस आस में कि हमारी आनेवाली पीढ़ियाँ एक बेहतर कल हासिल कर सकें। आम के पौधे लगाने जैसा काम कर रहे हैं केशवजी - ‘मैं तो नहीं, लेकिन मेरा पोता रसीले आमों का आनन्द लेगा।’ लंका तक पहुँचने के लिए निर्मित हो रहे सेतु में अपना योगदान देने केलिए बार-बार गीली होकर रेत में लोटनेवाली गिलहरी लगते हैं केशवजी मुझे। उनकी इसी मौन साधना ने मुझे प्रेरित किया कि उनकी सामग्री को विस्तारित करूँ। याने, रामजी की गिलहरी केशवजी और मैं केशवजी की सहायक गिलहरी।

आप इस सामग्री का आनन्द लीजिए और आपकी आत्मा अनुमति दे तो मेरी ही तरह एक गिलहरी बन, इसे विस्तारित कीजिए। लिख कर न सही, अपनेवालों से, मिलनेवालों से इस सामग्री की और इन कोशिशों की चर्चा करके। 

अच्छी बातों का जिक्र कीजिए ताकि बुरी बातों के जिक्र की गुंजाइश  कम हो।


कोई पचीस बरस पहले इस ‘आज’ की शुरुआत हुई थी। तब किसी को अन्दाज नहीं था कि बात इस मुकाम तक पहुँचेगी। सब कुछ अनायास हुआ। धीरे-धीरे। जैसे, कुम्हार के आँवे में धीरे-धीरे गरम होकर मिट्टी का कच्चा घड़ा पकता है। जेठ-बैसाख की तपती गर्मी में मिट्टी के घड़े का ठण्डा पानी हलक के नीचे उतरता है तो उससे मिलती तृप्ति सब कुछ भुला देती है। याद ही नहीं आता कि यह ठण्डापन पाने के लिए मिट्टी के घड़े ने कितना ताप झेला। उसी ताप की अनुभूति ने ही घड़े को शीतलता प्रदान करने की सीख दी होगी। महबूब मलिक और कोकिला बेन राणा के परिवार ऐसी ही बातों को साकार कर रहे हैं। 

अहमदाबाद से लगी छाटी सी बस्ती के गिनती के परिवारों में ये दो परिवार भी शामिल हैं। यह छोटी सी बस्ती मजदूर पेशा लोगों की है। कोकिला बेन की तीन बेटियाँ - सोनल, दीपिका और चन्द्रिका। तीनों स्कूली बच्चियाँ। कोकिला बेन का काम ऐसा कि सुबह घर से निकलो और शाम का लौटो। बड़ा संकट। काम पर जाए तो घर पर बच्चियाँ अकेली। काम पर न जाए तो अपना और बच्चियों का पालन-पोषण कैसे हो? 

बड़ी झिझक और संकोच सहित कोकिला बेन ने पड़ौसी महबूब भाई से मदद चाही। महबूब भाई ने खुशी-खुशी तीनों बच्चियों की जिम्मेदारी कबूल की। कोकिला बेन की बेटियाँ अब मलिक परिवार की बच्चियाँ बन गईं। तीनों को भोजन कराना, स्कूल भेजना, स्कूल से लौटने पर उनके बस्ते सम्हालना, उनका होम वर्क कराना सब कुछ मलिक परिवार ने अपने जिम्मे ले लिया। जिस चिन्ता और भावुकता से मलिक परिवार ने अपनी जिम्मेदारी निभाई उसे देख-देख ‘ऊपरवाला’ निहाल हुए जा रहा था।

वक्त अपनी चाल चलता रहा और कोकिला बेन, उनकी तीनों बेटियाँ, मलिक परिवार वक्त की चाल से बेखबर अपना-अपना काम करते रहे। दरअसल वक्त ने इनमें से किसी को भी इतना वक्त नहीं दिया कि ये वक्त की ओर देख सकें। बेटियाँ जब प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं को पार कर उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में दाखिल हुईं तो अचानक ही कोकिला बेन को वक्त का भान हुआ। उन्होंने अंगुलियों पर गिनती शुरु की तो लगा अंगुलियों की पोरें कम पड़ जाएँगी। यह अनुभूति होते ही कोकिला बेन की आँखें बहने लगीं। उसी शाम उन्होंने महबूब भाई से कहा - ‘महबूब भाई! मेरी बेटियों की जैसी देखभाल आप सबने की है वैसी तो इनका सगा मामा भी नहीं कर पाता। आपके मुझ पर बड़े उपकार हैं। आपका कर्जा मैं इस जनम में तो नहीं चुका सकती। अगला जनम किसने देखा? मेरी एक अर्जी और कबूल कर लो।’ महबूब भाई भावाकुल दशा में थे। बोले - ‘कैसी बातें करती हो कोकिला बेन! बच्चे तो बच्चे होते हैं। क्या आपके और क्या मेरे! यह तो मेरी खुशनसीबी रही कि एक नेक काम के लिए आपने मुझे मौका दिया और खुदा ने मुझे जरिया बनाया। और आपने यह क्या अर्जी-अर्जी लगा रखी है? आप तो हुकुम करो बेन!’ बहती आँखों को रोकने की कोई कोशिश कोकिला बेन ने नहीं की। भर्राए स्वरों में बोली - ‘बिना किसी रिश्ते के जिम्मेदारी निभाते चले आ रहे हो। आज महरबानी कर दो और मेरे राखी-बन्ध भाई बन जाओ।’ कोकिला बेन का यह कहना हुआ नहीं कि महबूब भाई मानो तीनों बच्चियों से छोटे बच्चे बन कर बिलख पड़े। उनसे बोला नहीं गया। हिचकियाँ लेतेे-लेते ही अपना दाहिना हाथ बढ़ा दिया। और बिना महूरत वाले उस पल में एक रश्तिा बन गया।

वह दिन और आज का दिन। सूत के कच्चे धागे ने दोनों परिवारों को ऐसा बाँधा कि 2002 की नफरत और नृशसंता शर्मिन्दा होकर उल्टे पाँवों लौट गई। सारे त्यौहार दोनों परिवार मिल कर मनाते हैं। ईद की सिवैयों के लिए केवड़े का सत् कोकिला बेन लाती हैं। होली की पापड़ियाँ महबूब भाई के यहाँ से बन कर आती हैं और मुहर्रम का सोग राणा परिवार मनाता है। 

कोकिला बेन की सबसे बड़ी बेटी सोनल के विवाह में महबूब भाई ने मामा का नेगचार पूरा किया। कोकिला बेन नानी बन गई हैं। दोनों परिवार जिन्दगी तो अपनी-अपनी जी रहे हैं लेकिन एक दूसरे की चिन्ता करते हुए और एक दूसरे को धन्यवाद देते हुए। 

एक ने जरूरत में मदद पाने के लिए दूसरे की ओर देखा। दूसरे ने पूरी ईमानदारी से अपना फर्ज निभाया। न जरूरत का कोई धर्म होता है न ही फर्ज का। यह मनुष्यता का अदृष्य धागा ही था जिसने दो परिवारों को बाँध दिया और बाँधे हुए है।
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चुप रहने की बारी अब हमारी है

मेरा विवाह,1976 में, 29 बरस की उम्र में हुआ। मैं, विवाह न करने पर अड़ा हुआ था।उस काल खण्ड के लोक पैमानों के अनुसार मैं आधा बूढ़ा हो चुका था। तब बापू दादा (स्व. बापूलालजी जैन) ने कहा था - ‘तू शादी कर या मत कर। लेकिन याद रखना - काँकर पाथर जो चुगे, उन्हें सतावे काम। घी-शक्कर जो खात हैं, उनकी राखे राम।’ याने, जब अन्न कणों के भ्रम में कंकर-पत्थर चुग जानेवाले पंछियों में भी काम भाव होता है तो स्वादिष्ट, पुष्ट भोजन करनेवाले मनुष्य को तो भगवान ही काम भाव से बचा सकता है। बापू दादा के मुँह से समूचा ‘लोक’ मुझे एक अविराम चैतन्य सत्य का साक्षात्कार करा रहा था।

दो घटनाएँ याद आ रही हैं। पहली अटलजी से जुड़ी है जो लगभग सर्वज्ञात है। अटलजी आजीवन अविवाहित रहे। एक बार किसी ने उन्हें ब्रह्मचारी कह दिया। अटलजी ने उसे सुधारते हुए सस्मित कहा कि वे ब्रह्मचारी नहीं, अविवाहित हैं। छुटपुट राजनीतिक कटाक्षों को छोड़ दें तो सबने अटलजी की इस आत्मस्वीकृती की सराहना ही की थी। उनके यौन विचलन को सहज मान कर ही सराहना की होगी और आश्चर्य नहीं कि सराहना करते समय खुद को अटलजी की जगह देखा हो। दूसरी घटना सम्भवतः 1961 की है। मैं नवमी कक्षा में था। दादा की वजह से देश के कई अखबार डाक से आते थे। उन्हीं में से किसी एक में यह पढ़ी थी। किसी नगर के बड़े, वयोवृद्ध साहित्यकार का नागरिक अभिनन्दन हुआ था। वे अपने अभिनन्दन के लिए बिलकुल ही तैयार नहीं थे। लेकिन लोग नहीं माने। वे साहित्यकार सर्वथा अनिच्छापूर्वक, लगभग जबरन आयोजन में उपस्थित हुए। उद्बोधन के लिए माइक के सामने खड़े होते ही धार-धार रोने लगे। रोते-रोते ही उन्होंने कहा कि वे नागरिक अभिनन्दन के नहीं, कुम्भी पाक नरक का दण्ड पाने के अपराधी हैं। उन्होंने  माँ समान भाभी के साथ नारकीय दुष्कृत्य किया था। उनका यह कहना हुआ कि लोगों ने उनके जिन्दाबाद के नारे लगाने शुरु कर दिए और कार्यक्रम समापन पर उन्हें अपने कन्धों पर बैठाकर घर पहुँचाया। 

एक कवि सम्मेलन में यह परिहास सुना था। गाँव में आयोजित नसबन्दी शिविर में पहुँचा एक दम्पत्ति झगड़ रहा था। दोनों अपनी-अपनी नसबन्दी की जिद कर रहे थे। डॉक्टर को अच्छा तो लगा लेकिन उसे महिला की जिद पर आश्चर्य हुआ। उसने महिला को समझाया कि पुरुष सामान्यतः नसबन्दी के लिए तैयार नहीं होते। तू भाग्यशाली है कि तेरा पति खुद तैयार है। महिला ने कहा - ‘डॉक्टर सा’ब! आप मरद हो। नहीं समझोगे। मेरे दो जेठ और तीन देवर हैं। मैं किस-किसकी नसबन्दी कराऊँगी?’ कपोल-कथा समाप्त होते ही स्त्रियों समेत समूचा जनसमुदाय ठहाके मारता हुआ तालियाँ बजा रहा था। 

होली के अनेक भाष्य सुनने-पढ़ने को मिलते हैं। एक भाष्य में इसे हमारी कुण्ठाओं के प्रकटीकरण का ‘सेफ्टी वाल्व’ भी कहा जाता है। साल में एक बार खुले आम गालियाँ देकर हम अपनी कुण्ठाओं से मुक्ति पा लेते हैं। हमने कहा भले ही न हो, कभी न कभी सुना जरूर होगा और सुनकर खूब हँसे भी होंगे - जेठ ने बहू से कहा ‘बहू! याद रखना। साल में एक महीना जेठ का भी होता है।’ 

दो दिन पहले ही, कौन बनेगा करोड़पति का एक वीडियो अंश देखा। हॉट सीट पर बैठी महिला, अपने चहेते अभिनेताओं के नाम बता रही थीं जो उनके सपने में आते हैं। महिला का पति भी श्रोताओं में बैठा था। अमिताभ ने पूछा - ‘आपके पति देवता सपने में नहीं आते?’ महिला ने कहा - ‘नहीं आते।’ अमिताभ ने कहा इसका मतलब हुआ कि वे अपने पति को नहीं चाहतीं। महिला का जवाब था - ‘आप (यहाँ बैठी) हर किसी (स्त्री) से पूछो कि किसके सपने में पतिदेव आता है।’ जवाब तालियों और ठहाकों में डूब गया। हँसनेवालों में उसका पति भी था।

अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की आत्मकथा ‘एन आर्डिनरी लाइफ-ए मेमॉयर’ इतनी विवादास्पद हो गई कि उन्हें इसकी सारी प्रतियाँ बाजार से वापस लेनी पड़ी। इसमें नवाज ने तीन विवाहित महिलाओं से अपने अन्तरंग सम्बन्धों का नामजद उल्लेख किया था। तीनों महिलाओं ने आपत्ति ली। मामल शायद कोर्ट तक गया। 

ये सारी बातें मैंने सोद्देश्य कही हैं। इनके बहाने मैं कुछ जाने-पहचाने निष्कर्ष दुहराना चाह रहा हूँ। पहला - प्राणी मात्र में काम भावना प्रति पल बनी रहती है। दूसरा - कोई भी मनुष्य, किसी भी विपरीत लिंगी की ओर आकर्षित हो सकता है। तीसरा - पुरुष प्रधान हमारे समाज में पुरुष को यौनिक स्खलन की छूट, अधिकार भाव से मिली हुई है। चौथा - स्त्री या तो सम्पत्ति है, या वस्तु (क्या चीज है! क्या माल है!) है जो भोग किए जाने के लिए ही बनी है। वह स्वतन्त्र व्यक्तित्व नहीं है। उसका अपना कोई अस्तित्व, अपनी कोई इच्छा नहीं है। अपनी यौनेच्छापूर्ति के लिए पुरुष को उससे पूछने, उसकी अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। पाँचवाँ - अपने दुराचार की स्वीकृती पुरुष को न केवल सराहना दिलाती है बल्कि उसे बड़ा और महान् भी बनाती है। छठवाँ - स्त्री के लिए योनि शुचिता अनिवार्य, अपरिहार्य है और इस शुचिता की रक्षा भी उसी की जिम्मेदारी है। कोई पुरुष यदि उसे भंग करता है तो यह स्त्री का ही अपराध होगा और उसका दण्ड उसे ही भोगना होगा। देवता, कपटपूर्वक किसी पतिव्रता का शील भंग करे तो भी पत्थर बनने का दण्ड तो शीलवन्ती, पतिव्रता को ही भुगतना पड़ेगा। 

हम सब पुरुष अपनी जवानी के दिनों को, कॉलेज के जमाने को याद करें। कोर्स के बाहर हम किस विषय पर सर्वाधिक बातें करते थे? मित्र मण्डली में हम सब खुद को ‘कामदेव’ और ‘औरतखोर’ (लेडी किलर) साबित करने की प्रतियोगिता में पहला स्थान पाने की कोशिशें नहीं करते थे? कॉलेज की एक भी लड़की से कभी भी बात नहीं की लेकिन यह जताने में कि कौन-कौन लड़की हमारे लिए मरी जा रही है, शेखचिल्ली के खानदान के आदिपुरुष नहीं बन जाते थे? और, ऐसी बातें अब भी नहीं कर रहे? बुड्ढे बन्दर गुलाटियाँ मारना भूल गए? मौका मिल जाए तो अब भी नहीं मारेंगे?

हाँ। मैं ‘मी टू’ के सन्दर्भ में ही यह सब कह रहा हूँ। ‘तब क्यों नहीं बोली?’ पूछनेवाले, पूछने से पहले भली प्रकार जानते हैं कि ‘वो’ तब क्यों नहीं बोली। तब मुझे-आपको ‘सब कुछ’ करने की छूट, सुविधा और विशेषाधिकार हासिल थे लेकिन ‘उसे’ तो अपनी माँ के सामने भी बोलने की सुविधा नहीं थी। कोई बोली भी तो माँ ने ही उसके मुँह पर हाथ रख दिया - ‘आज तो कह दिया। अब कभी मत कहना।’ आज वह बोल पाई है तो केवल इसलिए कि अपनी जिन्दगी जीने के लिए आज वह ‘आपकी-हमारी’ मोहताज नहीं। और इसलिए बोल पाई कि अब उससे अपनी आत्मा का यह बोझ नहीं सहा जा रहा। वह इसलिए भी अब बोली कि कहीं न कहीं उसे भरोसा हो पाया है कि उसकी कही बात, सुनी भी जाएगी और सच भी मानी जाएगी।

अपने चरित्रवान होने की दाम्भिक दुहाइयाँ तो दीजिए ही मत। हम सब जानते हैं कि हम सब (जी हाँ, हम सब) चरित्रहीन होने को उतावले बैठे हुए हैं। बस, वे ही चरित्रवान बने हुए हैं या कि बनने को मजबूर हैं जिन्हें या तो मौके नहीं मिले या फिर मौके मिले तो हिम्मत नहीं कर पाए। और हाँ! अपवादों की बात तो कीजिए ही नहीं। अपवाद अन्ततः सामान्य नियमों की ही पुष्टि करते हैं।

थोड़े कहे को बहुत समझिएगा। चुप रहने की बारी अब हमारी है। चुप रहिए। वर्ना, काँदे के छिलके उतरते जाएँगे और फजीहत की दुर्गन्ध आसमान पर छा जाएगी। कहीं के नहीं रह जाऍंगे।
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'सुबह सवेरे', भोपाल, 18 अक्‍टूबर 2018




संस्कृति और परम्पराओं की सदानीरा गुप्त सरस्वती

सावन के भरे-भरे, अपनी सम्पूर्णता से फट कर धरती को लील जाने को उतावले बादल की तरह वे आए और मानो अपने शरीर और आत्मा की पूरी ताकत लगा कर बोले - ‘मैं अकेला रो नहीं पा रहा हूँ। मुझे अपने पास बैठ कर रो लेने दें।’ और मानो प्रलयकारी उद्वेलन कर रही अथाह जलराशि ने सारे तटबन्ध तोड़ दिए। मैं कुछ कहूँ, कुछ पूछूँ, उससे पहले ही, खड़े-खड़े ही फफक-फफक कर रोने लगे। उन्हें बैठाने के लिए मैं उठा तो, उसी तरह रोते-रोते, मुझे बाहों में भींच लिया। अनिष्ट की आशंका से मेरे होश उड़ गए थे। मेरे दोनों जबड़े भिंच गए। जबान तालू से चिपक गई। मैं बोल नहीं पा रहा था। लगा, मैं मूर्च्छित हो जाऊँगा। खुद को गिरने से बचाने के लिए मैंने उन्हें जकड़ लिया। वे मुझसे सहारा लेने आए थे लेकिन मेरा सहारा बने हुए थे। नहीं बता सकता कि कितनी देर हम इस दशा में खड़े रहे।

वे उद्वेगमुक्त हुए तब तक मैं भी तन्द्रा उबरा। ताँबे की तरह तपते उनके चेहरे पर आँसू ठहर नहीं पा रहे थे। मेरे बनियान का दाहीने कन्धेवाला हिस्सा तर-ब-तर होकर पीठ को भीगो रहा था। उन्होंने मुझे छोड़ा और मैंने उन्हें। मेरी ओर देखे बिना ही वे बोले - ‘घबराने या डरने की कोई बात नहीं है। लेकिन अभी-अभी मेरे साथ जो हुआ, उसने मुझे बिखेर दिया। अकेले रह पाना मुश्किल हो गया। इसलिए, जैसा था, वैसा ही चला आया।’ तब मैंने देखा, वे नंगे पाँव ही आए थे। तब भी मेरे बोल नहीं फूटे। अपने दोनों हाथ मेरे कन्धों पर रख, मुझे लगभग धकेलते हुए बोले - ‘बैठिए।’ मैं मन्त्रबिद्ध दशा में बैठ गया। उन्होंने मुझे मौका ही नहीं दिया। खुद ही पूरी बात बता गए।

उनके पोते के ब्याह के बाद यह पहली नवरात्रि थी। अन्तिम दिन, नवमी को उनकी कुलदेवी की पूजा होती है। पोता और बहू कोई ढाई सौ किलो मीटर दूर नौकरी पर हैं। श्राद्ध पक्ष समाप्त होता उससे पहले ही उन्होंने दोनों से खरी-पक्की कर ली थी। वे तो चाहते थे कि पोता और बहू अष्ठमी को ही उनके पास पहुँच जाते। बहू को तो छुट्टी की कोई समस्या नहीं थी लेकिन पोता नौकरी में तनिक महत्वपूर्ण स्थिति में था। उसे थोड़ी कठिनाई आ रही थी। उसने पूरी कोशिश भी की। लेकिन ऐसा सम्भव नहीं हो पा रहा था। तय हुआ कि दोनों ‘लाड़ा-लाड़ी’ नवमी की सुबह नौ बजे तक आ ही जाएँगे। उनकी खुशी पूरे मुहल्ले में बही जा रही थी। उनकी दशा देख-देख उनकी पत्नी हँसे जा रही थी - ‘बावले हो गए हैं ये तो!’ पोते की पसन्द तो उन्हें खूब मालूम थी, बहू की पसन्द के बारे में पहले पोते से, फिर खुद बहू से और बाद में बहू की माँ से भी पूछताछ कर ली। बस! केवल एक दिन बाद, परसों ही, नई कुल-लक्ष्मी जोड़े से, पहली बार अपने परिवार की कुलदेवी की पूजा करेगी। इस कल्पना ने उन्हें बहू से भी छोटा बना दिया था। तैयारियों के लिए वे किसी मृग छौने की तरह कुलाँचे भर रहे थे। लेकिन उन्हें पता नहीं था कि ऊपरवाले ने कुछ और ही तय कर लिया है।

शाम कहिए या रात, कोई साढ़े सात बजे पोते का फोन आया। उसकी आवाज से साफ लग रहा था, वह झुंझलाया हुआ है - ‘दादाजी! सब गड़बड़ हो गया है। अभी-अभी कम्पनी के हेड ऑफिस से मेल आया है। दीवाली से पहले की सारी छुट्टियाँ केन्सल हो गई हैं। केवल मेरी नहीं। हम सबकी। हम सब गुस्से में हैं और लोकल हेड से झगड़ रहे हैं। लेकिन उसकी हालत तो हमसे भी ज्यादा खराब है। हम तो उससे कह रहे हैं लेकिन वो किससे कहे? उसे तो हमारी और ऊपरवालों की, सबकी सुननी है। इसलिए दादाजी! मैं तो नहीं आ सकूँगा। हाँ! आपकी लाड़ी जरूर आ जाएगी।’ पोते की बात पूरी होते-होते वे मानो निश्चेतन हो गए-किसी सूखे ठूँठ की तरह। इस तरह बोले मानो कोई और उनसे कहलवा रहा हो - ‘ठीक है लाला! मैं तुम्हारी दादी से बात कराता हूँ।’ लेकिन पत्नी से कहने की जरूरत ही नहीं हुई। वे पास ही खड़ी थीं। झुंझलाहट में पोता इतनी जोर से बोल रहा था कि दादी को सब कुछ बिना कोशिश के ही सुनाई दे गया। दादी की दशा तो और ज्यादा खराब थी। मरे हाथों से फोन लिया और मानो सबकी मुश्किल आसान कर रही हों, कुछ इस तरह से बोलीं - ‘ठीक है लाला! प्राइवेट कम्पनियों की नौकरियाँ तो ऐसी ही होती हैं। जब छुट्टी मिले तभी त्यौहार। बहू को मत भेजना। पूजा तो तुम दोनों से जोड़े से ही होनी थी। अकेली आकर क्या करेगी? उसे वहीं रहने देना। अगले बरस देखेंगे। तुम दोनों हिलमिल कर, मजे से दशहरा मनाना। रावण दहन देखने जाना और लौट कर फोन करना।’ 

उधर दादी ने मोबाइल बन्द किया और इधर दादाजी की छाती मानो अब फटी कि तब फटी। कुछ भी सूझ-समझ नहीं पड़ी और मेरे पास आ गए। 

रात के नौ बजने को हैं। गली सुनसान हो गई है। श्रीमतीजी पड़ौस में, देवी-भजन में गई हैं। घर में सन्नाटा है। हम दोनों एक दूसरे की धड़कनें सुन रहे हैं। मैं अब सामान्य हो, उन्हें ढाढस बँधाने की कोशिश कर रहा हूँ - ‘हो जाता है कभी-कभी ऐसा। बच्चों का तो कोई दोष नहीं। वे तो आना चाहते थे। लेकिन मजबूरी है। यही मान लें कि ईश्वर यही चाहता था और ईश्वर बुरा तो कभी नहीं करता! इसमें भी उसने सबका कुछ भला ही सोचा होगा।’ मन के भारीपन ने कमरे पर भी कब्जा कर लिया था। मैंने परिहास किया - ‘वैसे भी उन दोनों के हिसाब से अच्छा ही हुआ। यहाँ आते तो आप दोनों बूढ़ों के बीच फँस जाते। बूढ़ों के साथ दशहरे की रेलमपेल और भीड़-भाड़ का मजा नहीं ले पाते। वहाँ दोनों पंछियों की तरह फुदकते-चहकते हुए मेले का मजा लेंगे।’ सुनकर वे मुस्कुरा दिए। बोले - ‘समझा रहे हैं मुझे? चलिए! मैं समझ गया। आपकी बात मान ली।’ फिर रुक कर, लम्बी साँस लेकर बोले - ‘लेकिन विष्णुजी! हम कहाँ आ गए हैं? अपने बच्चों को ऊँची-ऊँची पढ़ाई करवा कर हमने इनका नुकसान तो नहीं कर दिया? और केवल उनका ही क्यों? हमने अपन सबका नुकसान नहीं कर दिया? ठीक है कि बच्चों की तनख्वाहें अच्छी हैं। अच्छी जिन्दगी जी रहे हैं। लेकिन इसकी कीमत कुछ ज्यादा ही नहीं चुका रहे? अब देखिए! बेटा बेंगलोर में है। आ नहीं सकता। लेकिन लाला? ये तो ढाई सौ किलो मीटर है दूर है! लेकिन ये ढाई सौ किलो मीटर भी बेंगलोर के बराबर हो गए! सोचा था, इस बच्ची को कुलदेवी के बारे में कुछ मालूम पड़ेगा। अपने परिवार की परम्परा के बारे में, अपनी संस्कृति के बारे में कुछ जानेगी। इसके मायके में अष्ठमी पूजन होती है और हमारे यहाँ नवमी। दोनों कुलों के नैवेद्य अलग-अलग हैं। इस अन्तर को  जानेगी, समझेगी। शादी के बाद अपनी इस पहली कुलदेवी-पूजा को आजीवन याद रखेगी। लेकिन यह सब हमारे हाथों से छिन गया! अब देखिए ना! त्यौहार है और हम तीन जगह बिखरे हुए हैं। हर पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को परम्पराएँ इसी तरह तो सौंपती हैं! संस्कृतियाँ इसी तरह तो अनवरत, अविरल प्रवाहमान होती हैं! यदि ऐसा ही होता रहा तो हमारी अगली पीढ़ियाँ तो खाली हाथ लिए बैठी रह जाएँगी? ऐसा ही चलता रहा तो कहीं ऊँची तनख्वाहों के पेकेज ही हमारी परम्परा तो नहीं बन जाएँगे? हम अपनी जिस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और गर्वीली परम्पराओं की दुहाई देते हैं वह सब हमारे सामने ही, हमारे हाथों ही तो नष्ट नहीं हो जाएँगी?’ 

मैं उलझन में था। उनकी बात मानने को जी नहीं कर रहा था लेकिन जो कुछ उनके साथ अभी-अभी घटा था उससे भी तो आँखें नहीं फेरी जा सकती थीं। किन्तु मेरे आशावाद ने मेरा हाथ थामा। मैंने कहा-“संस्कृति और परम्पराएँ तो सदानीरा गुप्त सरस्वती की तरह निरन्तर प्रवाहमान रहती हैं। मेरा मन कहता, इस बरस न आ पाने को वह एक अवसर की तरह लेगी। उसका फोन भाभीजी के पास आता ही होगा। वह सारी जानकारी लेकर अपनी गृहस्थी में, अपनी कुलदेवी का पहला पूजन कर ही लेगी। संस्कृतियाँ और परम्पराएँ तो ‘लोक संजीवनी’ से बनती-चलती हैं।” सुनकर मानो उनमें प्राण संचरित हो गए। उछलकर बोले - ‘ओह! भगवान करे वैसा ही हो जैसा आपने कहा।” और मैं उनकी कुछ मनुहार करूँ, उससे पहले ही, उठते हुए बोले - ‘अरे! मैं किस हालत में चला आया? चलता हूँ। श्रीमतीजी परेशान हो रही होंगी।’ और जैसे अस्तव्यस्त आए थे, वैसे ही अलमस्त लौट गए।
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‘नोटा’ की पुकार - मुझे ‘सोटा’ बनाओ

मेरी धारणा है कि भ्रष्टाचार की जड़ें हमारे मँहगे चुनावों में हैं। नेता चुनाव लड़ता है। जीते या हारे, नतीजों के बाद वह खर्चे की भरपाई और अगले चुनाव की तैयारी के लिए धन संग्रहण में जुट जाता है। वह और कोई काम करे, न करे, धन संग्रहण करता रहता है। कह सकते हैं कि धन संग्रहण नेता का मुख्य काम है। इसीलिए भ्रष्टाचार ही आज हमारे नेताओं की मुख्य पहचान बन कर रह गया है। कोई भी नेता अकेला धन संग्रहण नहीं कर पाता। यदि वह सत्ता में है तो सरकारी  अधिकारी/कर्मचारी उसका सबसे बड़ा औजार होते हैं। हम अधिकारियों/कर्मचारियों को भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी के लिए कोसते हैं। लेकिन तनिक ध्यान से समग्र स्थितियों का विश्लेषण करेंगे तो पाएँगे कि इसके मूल में अन्ततः नेता ही होता है जो चुनावों के लिए धन संग्रह करता है। इसीलिए प्रत्येक नेता, किसी अधिकारी/कर्मचारी के भ्रष्टाचार पर गर्जना के सिवाय कभी, कुछ नहीं कर पाता। भ्रष्ट नेता के पास वह नैतिक आत्म-बल  नहीं होता कि वह किसी को भ्रष्टाचार के लिए दण्डित कर सके। ऐसे में हमारे चुनाव पूँजीपतियों, नेताओं और अधिकारियों/कर्मचारियों के ‘बँधुआ मजदूर’ बन कर रह गए प्रतीत होते हैं। आज कोई ईमानदार, भला आदमी चुनाव लड़ने की सोच ही नहीं सकता। उम्मीदवारी तय करते समय पार्टियाँ ‘जीतने की सम्भावना’ को एक मात्र पैमाना बनाती हैं और इस पैमाने पर कोई ईमानदार, भला, मैदानी कार्यकर्ता कभी भी खरा नहीं उतरता। अन्ततः कोई धन-बली, बाहु-बली ही हमारे सामने पेश किया जाता है।

चुनावों को इन जंजीरों से कैसे मुक्त कराया जाए? चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय सरकार को समय-समय पर चुनाव सुधारों के लिए कहते रहते हैं। लेकिन चूँकि ये सारे सुझाव नेताओं की चुनावी सम्भावनाओं पर कुठाराघात करते हैं इसलिए वे (याने कि सरकार) इन पर ध्यान-कान ही नहीं देते। सर्वोच्च न्यायालय ने अभी-अभी ही सरकार से आग्रह किया है संसद को अपराधियों से मुक्त कराने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए। लेकिन जिस संसद में तीस प्रतिशत लोग ‘अपराध-दागी’ हों वे भला (संसद में प्रवेश के) अपने रास्ते क्यों बन्द करेंगे? 

ऐसे में मुझे ‘नोटा’ अवतार की तरह नजर आता है। मुमकिन है, मेरा सोचना ‘अतिआशावाद’ हो। लेकिन कोई भी व्यवस्था/प्रणाली सम्पूर्ण निर्दोष (जीरो डिफेक्ट) नहीं होती। ऐसे में न्यूनतम दोष (मिनिमम डिफेक्ट) वाली व्यवस्था/प्रणाली अपनाई जानी चाहिए। मुझे लगता है, ‘नोटा’ हमें यह व्यवस्था/प्रणाली देने में मददगार हो सकता है। 

अपने मौजूदा स्वरूप में ‘नोटा’, उम्मीदवारों के प्रति हमारी निराशा, उनके प्रति हमारा अस्वीकार तो प्रकट करता है किन्तु किसी एक को जीतने से रोक नहीं सकता। एक लाख मतदाताओं में से 99,900 मतदाता ‘नोटा’ का बटन दबा दें तब भी, शेष 100 में से सर्वाधिक वोट पानेवाला उम्मीदवार जीत जाएगा। मध्य प्रदेश में, 2013 के विधान सभा चुनावों में 26 उम्मीदवारों की और दिसम्बर 2017-जनवरी 2018 में हुए गुजरात विधान सभा चुनावों में 30 उम्मीदवारों की जीत का अन्तर ‘नोटा’ को मिले वोटों से कम था। जाहिर है, आज का ‘नोटा’ हमारी नाराजी तो जताता है किन्तु जिसे हम खारिज करना चाह रहे हैं उसे विधायी सदन में जाने से रोक नहीं पाता।

‘सपाक्स’ ने दो दिन पहले ‘सपाक्स समाज दल’ के नाम खुद को राजनीतिक दल में बदलने की घोषणा की है। इससे पहले तक ‘सपाक्स’ के कार्यकर्ता ‘नोटा का सोटा’ का डर दिखा रहे थे। दोनों प्रमुख पार्टियाँ भयभीत भी थीं। किन्तु वे निश्चिन्त भी थीं कि ‘नोटा’ केवल ‘नोटा’ ही रहेगा, ‘सोटा’ नहीं बन पाएगा। वह किसी न किसी को जीतने से तो रोक नहीं पाएगा। सोटा याने लट्ठ, याने मारक/घातक, याने परिणामदायी। लेकिन आज का ‘नोटा’ मारक या घातक, प्रभावी या कि जन-मनोनुकूल और इससे आगे बढ़कर कहूँ तो जिस मकसद से यह लागू किया था उसके अनुकूल परिणामदायी नहीं है। 

इसलिए ‘नोटा’ को ‘सोटा’ में बदला जाना चाहिए। ‘नोटा’ को एक उम्मीदवार की हैसियत दी जानी चाहिए। तब ही यह इसका मकसद पूरा कर सकेगा। उसके बिना यह एक आत्मवंचना के झुनझुने से अधिक कुछ नहीं है। 

‘नोटा’ को ‘सोटा’ में बदलने के लिए इसे उम्मीदवार की हैसियत दी जानी चाहिए। यदि नोटा जीत जाए तो वहाँ फिर से चुनाव कराया जाए। इस चुनाव में वे लोग उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे जो ‘नोटा’ से परास्त हुए थे क्योंकि मतदाता तो उन्हें पहले ही खारिज कर चुके हैं। यह प्रावधान चुनावी विसंगतियों के लिए ‘मारक’ साबित होगा और राजनीतिक दल खुद को दुरुस्त करने के लिए विवश होंगेे।

उपरोक्त प्रावधान हो जाए तो इसके चमत्कारी नतीजे मिलेंगे। मेरे कुछ आशावादी अनुमान इस तरह हैं।

पार्टी कार्यकर्ताओं/समर्थकों को छाताधारी उम्मीदवारों से मुक्ति मिलेगी। देश में आज भी कई लोक सभा, विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र ऐसे मिल जाएँगे जहाँ पहले चुनाव से लेकर आज तक, उस निर्वाचन क्षेत्र से बाहर का आदमी चुनाव जीत रहा है। पार्टी लाइन या पार्टी अनुशासन के नाम पर कार्यकर्ता, बुझे मन से, मन मारकर बाहरी उम्मीदवार को विजयी बनाते हैं। ‘नोटा’ के ‘सोटा’ बन जाने के बाद कार्यकर्ता अपने नेताओं को ‘नोटा’ का भय दिखाकर बाहरी उम्मीदवार को रोक सकेंगे। तब वे कह सकेंगे कि ऐसा करके वे किसी विरोधी को विधायी सदन में नहीं भेज रहे हैं क्योंकि ‘नोटा’ के जीतने पर सब उम्मीदवार खारिज हो जाएँगे। तब पार्टी को स्थानीय उम्मीदवार तलाशना पड़ेगा। तब, बरसों से पार्टी के लिए जाजम बिछानेवाले, दरियाँ झटकनेवाले कार्यकर्ताओं में से किसी को मौका मिल सकेगा। तब लोकतन्त्र की भवनानुरूप ऐसा सच्चा और वास्तविक, स्थानीय नेतृत्व सामने आएगा जिसे अपने क्षेत्र की समस्याओं की न केवल जानकारी होगी बल्कि उन्हें हल करने में भी उसकी दिलचस्पी होगी। ऐसे उम्मीदवार के लिए तमाम कार्यकर्ता अतिरिक्त उत्साह से काम करेंगे जिसका परोक्ष प्रभाव चुनावी खर्च पर भी पड़ेगा ही पड़ेगा।

इसी नजरिये से देखेंगे तो पाएँगे कि राजनीति में परिवारवाद, भ्रष्ट-बेईमान-दागी-दुराचारियों के उम्मीदवार बनने, पार्टियों में विद्रोह, गुटबाजी, भीतरघात की सम्भावनाएँ शून्यवत होंगी। सबसे अच्छी बात होगी कि पार्टियों में आन्तरिक लोकतन्त्र पनपेगा, विकसित होगा। आन्तरिक लोकतन्त्र किसी भी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत होती है। पार्टियों का आन्तरिक लोकतन्त्र किसी जमाने में हमारी विशेषता और पहचान हुआ करती थी। काँग्रेस की ‘युवा तुर्क तिकड़ी’ चन्द्रशेखर, कृष्णकान्त और मोहन धारिया पार्टी के अन्दर जिस तरह वैचारिक बहस करती थी उससे नेतृत्व को असुविधा होती थी। काँग्रेस के इतिहास में चन्द्रशेखर ऐसे पहले और एकमात्र व्यक्ति बने हुए हैं जिन्होंने इन्दिराजी की इच्छा के विरुद्ध अ. भा. काँग्रेस कमेटी के सदस्य का चुनाव लड़ा और जीता।  इन्दिराजी यह पराजय स्वीकार नहीं कर पाईं और पार्टी का आन्तरिक लोकतन्त्र ही खत्म कर दिया। यहीं से काँग्रेस का पराभव प्रारम्भ हुआ। यह दुर्भाग्य ही है कि सत्ता में आने के बाद प्रत्येक पार्टी काँग्रेस हो जाती है। इसीलिए आज किसी भी पार्टी में आन्तरिक लोकतन्त्र नजर नहीं आता। वामपंथी पार्टियाँ अपवाद होने का दावा कर सकती हैं किन्तु अपवाद सदैव ही सामान्यता की ही पुष्टि करते हैं।

‘नोटा’ को यदि उपरोक्तानुसार स्वरूप दे दिया जाए यह ‘लाख दुःखों की एक दवा हो सकता है। तब चुनाव लड़ने के लिए नेताओं को भारी-भरकम चन्दा जुटाने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी जिसका अर्थ होगा, भ्रष्टाचार में भरपूर कमी। भ्रष्टाचार तब भी होगा किन्तु तब हमारे नेताओं में भ्रष्टाचारियों पर कड़ी कार्रवाई करने का आत्म-बल होगा।

फिर कह रहा हूँ, ‘नोटा’ को लेकर मेरा सोच अतिआशावादी हो सकता है, इसमें कमियाँ हो सकती हैं। किन्तु ‘नोटा’ को ‘सोटा’ में बदलने पर हम ‘न्यूनतम दोष’ वाली दशा में आ सकते हैं।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 04 अक्टूबर 2018



चुनाव सुधारों के पक्ष में आक्रामक वातावरण चाहिए

मेरी यह पोस्ट दैनिक ‘सुबह सवेरे’ भोपाल में दिनांक 20 सितम्बर 2018 को (और रतलाम से प्रकाशित साप्ताहिक ‘उपग्रह में 27 सितम्बर को) छप चुकी थी। किन्तु इसका दूसरा भाग प्रकाशित होने तक के लिए मैंने इसे ब्लॉग पर देने के लिए रोक रखा था। आज, 04 अक्टूबर को इसका दूसरा भाग ‘सुबह सवेरे’ में छप गया है जिसे मैं कल ब्लॉग पर दूँगा। मुझे गा कि दोनों भाग एक के बाद एक देना बेहतर होगा। 

एक अखबारी खबर के मुतािबक एक आयोजन में बोलते हुए भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ओ. पी. रावत ने, चुनाव में काला धन रोकने के लिए मौजूदा कानूनों को अपर्याप्त बताया है। मुमकिन है, मुख्य चुनाव आयुक्त ने और भी कुछ कहा हो लेकिन मुझ जैसे पाठकों तक तो केवल एक ही बात पहुँची कि वे केवल एक ही बात पर चिन्तित थे - चुनाव में काले धन को रोकने के लिए।

चुनाव में बढ़ता काला धन हमारी समस्या है तो जरूर लेकिन यह चिन्ता न तो एकमात्र है न ही आधारभूत। जब तक चुनावों का मौजूदा ‘अत्यधिक खर्चीला’ स्वरूप बना रहेगा तब तक काला धन न केवल अपना डंका बजाता रहा बल्कि इसका दखल बढ़ता ही जाएगा। लिहाजा, चुनावों में काले धन को नियन्त्रित करने से पहले, चुनावों को खर्चीला होने से बचाने पर विचार किया जाना चाहिए और यह काम केवल चुनाव सुधारों से ही सम्भव है। लेकिन यही सबसे कठिन काम भी है। इसलिए कि सुधार करने का अधिकार हमारे सांसदों के पास है और उनमें से शायद ही कोई इनमें विश्वास और रुचि रखता हो। यह स्थिति भारतीय चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन इसे केवल चुनाव आयोग की जिम्मेदारी मानकर छोड़ देना हम सबका, सबसे बड़ा अपराध है - मेरे तईं, राष्ट्रद्रोह के स्तर का अपराध। 

चुनाव आयुक्त आते-जाते रहेंगे। वे सब अपने-अपने हिसाब से कोशिशें करते रहेंगे। वे जिस वर्ग से आते हैं, उसे मँहगाई, भ्रष्टाचार, अफसरशाही, बाबू राज से कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें पड़ता है। लेकिन हम ही उदासीन हैं। आयोग की प्रत्येक पहल अन्ततः हम आम लोगों का हित रक्षण ही करती है लेकिन हम ही इससे उदासीन हैं। हम चाहते हैं कि चुनाव आयोग ताकतवर बने लेकिन हम उसे ताकतवर बनाने में दिलचस्पी नहीं रखते। हम भूल जाते हैं कि हम ही चुनाव आयोग की ताकत हैं।

हमारे मँहगे चुनाव, भ्रष्टाचार सहित अनेक समस्याओं की जड़ हैं। ये जब तक मँहगे बने रहेंगे, काले धन का दबदबा बना रहेगा। आज पार्टियाँ उम्मीदवारों का चयन योग्यता, शिक्षा, चाल-चरित्र, ईमानदारी जैसे मूलभूत गुणों के आधार पर नहीं, ‘जीतने की सम्भावना’ के अधीन करती हैं। यह ‘सम्भावना’  धन-बल, बाहु-बल से जुटाई जाती है। इसी के चलते देश के विधायी सदन कभी-कभी अपराधियों की शरण स्थली अनुभव होने लगते हैं।

चुनाव सुधारों के लिए चुनाव आयोग प्रति पल प्रयासरत नही संघर्षरत रहता है। टी. एन. शेषन से पहले तक चुनाव आयोग ‘नख दन्त विहीन शेर’ था। शेषन ने इसे नई पहचान और नए तेवर दिए। उसके बाद से ही नेताओं को इससे असुविधा होने लगी। लेकिन गए तीन-चार बरसों में शेषन-पूर्व का समय लौटता नजर आने लगा है। इसके बावजूद चुनाव आयोग समय-समय पर जनोपयोगी और लोकतन्त्र की रक्षा करते हुए महत्वपूर्ण सुझाव देता रहता है। ‘नोटा’ ऐसा ही एक सुझाव था जो वास्तविकता बना। किन्तु आयोग के इन सुझावों को जन समर्थन कभी नहीं मिलता।

अभी-अभी आयोग ने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। एक व्यक्ति एक ही स्थान से चुनाव लड़े, दो स्थानों से जीता हुआ व्यक्ति किसी एक स्थान से त्याग-पत्र दे तो वहाँ होनेवाले उप चुनाव का खर्च उससे वसूल किया जाए या, वहाँ दूसरे नम्बर पर आए उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाए। ये दोनों ही सुझाव ऐसे हैं जिन्हें मंजूर कराने के लिए पूरे देश को सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। चुनाव आयोग ने तो यह सुझाव अब दिया है लेकिन मेरे कस्बे के चार्टर्ड इंजीनीयर जयन्त बोहरा कोई बीस बरस पहले ही यह सुझाव दे चुके थे। उनके साथ मिलकर मैंने भी खूब लिखा-पढ़ी की थी। किन्तु कार्रवाई तो दूर रही, मुझे पावती भी नहीं मिली। ‘व्यवस्था’ से जवाब पाना भाग्यशालियों को ही नसीब होता है। लेकिन, त्याग-पत्र देनेवाले से खर्च वसूल करना, मौजूदा व्यवस्था को मजबूत ही करेगा। हमारे नेताओं के पास अकूत धन है। वे आसानी से खर्चा दे देंगे। इसलिए, त्याग-पत्र के बाद वहाँ दूसरे नम्बर पर आए उम्मीदवार को ही विजयी घोषित किया जाना चाहिए। तब नेता को, विधायी सदन में एक विरोधी के बढ़ जाने की चिन्ता होगी। इस व्यवस्था से न केवल उप चुनाव के ताम-झाम और उपक्रम से मुक्ति मिलेगी बल्कि लोकतन्त्र के विचार को मजबूती भी मिलेगी। 

चुनाव आयोग के इन सुझावों को प्रचण्ड जन समर्थन मिलना चाहिए। आज का समीकरण यह बन गया है कि जो नेता के हित में होता है वह नागरिकों के लिए अहितकारी होता है। इसका विलोम समीकरण यही होगा कि जो नेता के प्रतिकूल होगा वह नागरिकों के अनुकूल होगा। चुनाव आयोग के प्रस्तावित सुधार नागरिकों के अत्यधिक अनुकूल हैं। इन्हें प्रचण्ड जन समर्थन मिलना चाहिए।

अजाक्स, अपाक्स, करणी सेना जैसे संगठनों ने, अपने-अपने कारणों से इन दिनों देश में आन्दोलन छेड़ रखा है। राजनीतिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर लोग जगह-जगह नेताओं-मन्त्रियों से सवाल पूछ रहे हैं, काले झण्डे दिखा रहे हैं, टमाटर फेंक रहे हैं। नेता-मन्त्री गूँगे हो गए हैं। उनके बोल नहीं फूट रहे। वे रास्ते बदल रहे हैं। दौरे निरस्त कर रहे हैं। ये तीन संगठन तो उदाहरण मात्र हैं। मेरा कहना है कि देश भर के तमाम सार्वजनिक संगठनों (इनमें मैं लायंस, रोटरी, जेसी जैसे ‘सेवा संगठनों’ को भी शरीक करता हूँ) ने चुनाव आयोग के प्रस्तावित सुधारों के पक्ष में भी ऐसा ही आक्रामक वातावरण बनाना चाहिए। केवल चुनाव सुधार ही हमें मँहगे चुनावों से मुक्ति दिला सकते हैं। 

चुनाव सुधारों में दो सुधार और फौरन शरीक किए जाने चाहिए। पहला, दलबदल करनेवाला अगले छः वर्ष तक किसी दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का पात्र न रहे। वह निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत जाए तो किसी दल में शामिल न हो सके।   

दूसरा - चुनावी चन्दे के मामले में मौजूदा सरकार ने, इलेक्टोरेल बॉण्ड की व्यवस्था कर एक पाप किया है। बढ़ती पारदर्शिता के इस समय में यह व्यवस्था काले धन को बढ़ावा देती है। पार्टी के समर्थकों/कार्यकर्ताओं को मालूम होना चाहिए कि उनकी पार्टी किन लोगों से चन्दा ले रही है। इलेक्टोरोल बॉण्ड यह जानकारी छुपाते हैं। यह व्यवस्था फौरन वापस ली जानी चाहिए।

सपाक्स और करणी सेना के आन्दोलन में नोटा का जिक्र खूब हो रहा है - एक धमकी के रूप में तमाम नेता और दल इस धमकी से आतंकित हैं। नोटा का वर्तमान स्वरूप अपर्याप्त और अप्रभावी है। अभी यह असन्तोष प्रकट करने का माध्यम मात्र है। नोटा को एक उम्मीदवार की हैसियत देकर इसे प्रभावी बनाया जाना चाहिए। मेरा तो मानना है कि नोटा को यदि इसके ‘आशय’ (इंटेंशन) के अनुरूप हैसियत दे दी जाए तो हमें शनै-शनै मँहगे चुनावों से ही नहीं, अनेक राजनीतिक समस्याओं से भी मुक्ति मिल जाएगी जिसकी अन्तिम परिणति भ्रष्टाचार से मुक्ति होगी।

नोटा हमारे ‘लाख दुःखों की एक दवा’ है। यह अलग से स्वतन्त्र आलेख का विषय है। मैं इस पर अवश्य लिखूँगा। शायद अगले सप्ताह ही। लेकिन हम मूल बात को नहीं भूलें - चुनाव आयोग के प्रस्तावित चुनाव सुधारों से हम खुद को जोड़ें, आयोग को ताकत दें। हमने संसदीय प्रणाली अपनाई है। इसलिए चुनाव हमारे लिए अपरिहार्य हैं। हम चुनाव प्रणाली को ऐसी बनाएँ कि आप भी चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा सकें और मैं भी। 

हम सब अपने-अपने नेताओं से कहीं न कहीं असन्तुष्ट, अप्रसन्न और दुःखी हैं। हमारे ये नेता चुनाव आयोग से डरते हैं। गोया, चुनाव आयोग परोक्षतः हमारा (और प्रकारान्तर में लोकतन्त्र का) ही मनोरथ साध रहा है। इसलिए भी हमने चुनाव आयोग को खुलकर, मुक्त-हृदय, मुक्त-कण्ठ, मुक्त-मन, मुक्त-धन सहयोग करना चाहिए। 

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दैनिक ‘सुबह सवेरे’,  भोपाल, 20 सितम्बर 2018 



दुनिया की कोई ताकत मेरे चरित्र को झुका नहीं सकती

          06 जुलाई 1944 को सिंगापुर से लिखा गया, गाँधीजी के नाम नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का यह पत्र मुझे केशवचन्द्रजी शर्मा के सौजन्य से मिला है। इस पत्र में गाँधी और सुभाष के आत्मीय सम्बन्धों की खुशबू बरबस ही हमें घेर लेती है। इस पत्र में गाँधी के प्रति सुभाष का न केवल आदर भाव उत्कटता से प्रकट होता है अपितु ‘आपको आशीर्वाद देना ही पड़ेगा।’ जैसा अधिकार भाव भी सहजता से प्रकट हो जाता है। 
            नहीं जानता कि गाँधी जयन्ती पर यह पत्र कितना प्रासंगिक है। किन्तु इन दोनों राष्ट्र नायकों के आत्मीय अन्तर्सम्बन्धों की स्पष्ट झलक इसमें आसानी से अनुभव की जा सकती है। 


सिंगापुर 06 जुलाई 1944
महात्माजी!

अंग्रेजी कारागार में कस्तूरबा की मृत्यु के बाद सारे देश का, आपके स्वास्थ्य के बारे में चिन्तित हो उठना स्वाभाविक था।

हमारा उद्देश्य एक है और हम हिन्दुस्तानी जो आज हिन्दोस्तान के बाहर हैं, उनकी निगाह में साधनों की भिन्नता तो महज घरेलू सवाल है। 1929 के पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव के बाद काँग्रेस के सभी सदस्यों का एकमात्र उद्देश्य आजादी रहा है। हम सभी हिन्दुस्तानियों की निगाह में आप जागृति के अग्रदूत हैं। जबसे आपने 1942 में गरज कर भारत छोड़ने की माँग की है तब से हमारे हृदय में आपके लिए सहस्रगुनी श्रद्धा बढ़ गयी।

मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इस खतरनाक काम को करने के पहले मैं हफ्तों और महीनों तक मैं इसके पक्ष और विपक्ष के बारे में सोचता रहा। इतने दिनों तक अपने देश की सेवा करने के बाद, अपने देश को प्यार करने के बाद, मुझे पहला देशद्रोही बन जाने का शौक नहीं था। मैं अपनी जनता का, अपने भाइयों का विश्वास जीत चुका था और उन्होंने राष्ट्रपति बनाकर मुझे जीवन का सर्वोच्च गौरव दिया था।  मुझे एक दल मिल गया था, फारवर्ड ब्लाक, जिसका हर सदस्य मेरे लिए जान देने के लिए तैयार था। मैं जानता हूँ कि हिन्दोस्तान से भागने में न केवल मैं, वरन् मेरी पार्टी भी खतरे में पड़ रही है। लेकिन मुझे अणु भर भी विश्वास होता कि युद्धकाल में भारत में ही रहकर मैं स्वतन्त्रता का आन्दोलन चला सकूँगा तो यकीन मानिये मैं आपके चरणों से दूर न आया होता। 

हाँ, धुरी राष्ट्रों का प्रश्न शेष है। क्या उन्होंने मुझे धोखा दिया? क्या मैं धोखा खा गया हूँ? दुनिया जानती है कि अंग्रेज दुनिया की सबसे बड़ी धोखेबाज कौम है। जो व्यक्ति जीवन भर उन धोखेबाजों से जिन्दगी और मौत की लड़ाई लड़ता रहा है वह फिर दूसरों से धोखा नहीं खायेगा। अगर अंग्रेज राजनीतिज्ञ मुझे धोखा नहीं दे सके तो दूसरे भला क्या धोखा दे सकेंगे? और अगर जिन्दगी भर जेल में बन्द रखकर, मेरी नसों को चूर-चूर कर ब्रिटिश सरकार मेरी नैतिकता पर दाग नहीं लगा सकी तो यकीन मानिये कि दुनिया की कोई ताकत मेरे चरित्र को झुका नहीं सकती। मैंने आज तक हिन्दोस्तान की आन कायम रखी है। हिन्दोस्तान के झण्डे को झुकता हुआ देखने से पहले मैं हमेशा के लिए आँखें मूँद लूँगा।

एक जमाना था जब जापान हमारे दुश्मन का साथी था। जब तक जापान और अंग्रेजी की दोस्ती थी, मैं जापान नहीं आया। जब जापान ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी तब मैं जापान आया हूँ। वैसे, चीन के साथ मेरी पूरी सहानुभूति रही है। आपको याद होगा कि सन् 1938 में मेरे ही उद्देश्यों से चीन की सहायता के लिए एक चिकित्सा दल भेजा गया था। आप खुद जानते हैं, मैं झूठे वादों पर विश्वास करना ही नहीं जानता। मैं जापान की मदद लेनेवाला आखिर व्यक्ति होता यदि मैं समझता कि जापान महज झूठे वादे कर रहा है। अगर अपने उद्योग से, आन्दोलन से भारतवासी स्वतन्त्र हो जायें तो मुझसे ज्यादा और कोई प्रसन्न नहीं होगा। अगर अंग्रेज भी आपका प्रस्ताव स्वीकार कर भारत छोड़ दें तो मैं अपना उद्देश्य पूरा समझ लूँगा। मगर न तो यह सम्भव है न मेरी समझ में आता है। एक सशस्त्र हिंसात्मक क्रान्ति की आवश्यकता पड़ेगी। 

इसलिए हम लोगों ने यहाँ आजादी की आखरी लड़ाई की रणभेरी फूँक दी है। आजाद हिन्द फौज के दल आज हिन्दोस्तान की जमीन पर लड़ रहे हैं और मौत को पीछे धकेल कर आगे बढ़ रहे हैं। यह सशस्त्र संग्राम चलता रहेगा। जब तक कि आखिरी अंग्रेज स्वेज शहर के पार नहीं ढकेल दिया जाएगा और वायसराय भवन पर तिरंगा (भारत का झण्डा) नहीं फहराने लगेगा। 

हम सभी हिन्दोस्तानियों के श्रद्धेय बापू! आजादी के इस धर्म-युद्ध में आपको आशीर्वाद देना ही पड़ेगा। इस पवित्र धर्म-युद्ध में हम आपका आशीर्वाद चाहते हैं। आशीर्वाद दीजिए।
- सुभाष।

खुद से बातें करता खोर का नव तोरण मन्दिर

कल, 27 सितम्बर को विश्व पर्यटन दिवस’ था, यह मुझे एक दिन बाद, आज 28 सितम्बर को मालूम हो पाया। यह मालूम होते ही मुझ ‘खोर’ की स्मृति हो आई। 

पुरातत्व मेरा विषय कभी नहीं रहा। लेकिन पुरातात्विक स्थानों पर जाना मुझे अच्छा लगता है। ‘खोर’ भी एक पुरातात्विक स्थल है। ‘खोर’, मध्य प्रदेश के नीमच जिले की जावद तहसील का छोटा सा गाँव है। मेरी बुआजी की एक बेटी, धापू जीजी जावद ही ब्याही थी। वहाँ आना-जाना हुआ करता था। तब हम लोग मनासा से नीमच पहुँच कर, रेल से केशरपुरा रोड़ रेल्वे स्टेशन उतरते थे। वहाँ से जावद जाते थे। केशरपुरा रोड़ का नाम अब नया गाँव रेल्व स्टेशन हो गया है। केशरपुरा रोड़ (याने आज के नया गाँव) से जावद जाते हुए रास्ते में खोर पड़ता है। पिताजी यहाँ के तोरण और नन्दी के बारे में बताया करते थे। पिताजी दो-एक बार हमें खोर ले गए थे तभी यह जगह देखी थी। 

अभी, इसी बरस मार्च में चित्तौड़गढ़ जाना हुआ। मेरी चार भानजियों में सबसे छोटी भानजी  रीती श्रवण वैष्णव के सुसरजी के निधन के प्रसंग पर। लौटते में हम जावद आते हुए आए। जावद में हमें, मेरी दूसरे नम्‍बर की भानजी माया, जमाई  आनन्‍दजी और इनकी बिटिया झुनझुन से मिलना थाा  निम्बाहेड़ा पार करते ही मुझे खोर याद आया और वहाँ रुकना तय किया। निम्बाहेड़ा से खोर पहुँचते-पहुँचते मैंने खोर के बारे में बातें शुरु की तो उत्तमार्द्धजी मुझसे अधिक उत्सुक और बेचैन हो गईं।

खोर में हम लोग कोई पौन घण्टा रुके। देखने के लिए कुल एक स्थान और गिनती के स्मारक। लेकिन पाषाण शिल्पों ने कुछ ऐसे मोहा और टटकाया कि मालूम ही नहीं हुआ कि कब पैंतालीस मिनिट निकल गए। 

उसी समय लिए गए, तोरण और नन्दी के कुछ चित्र यहाँ प्रस्तुत हैं। 

मुझे खोर के बारे में और तोरण-नन्दी के बारे में कोई जानकारी नहीं। वहाँ के परिचय शिलालेख पर जो लिखा, वही मेरी भी जानकारी है। वहाँ पत्थर पर, हिन्दी और अंग्रेजी में उकेरे गए परिचय की इबारत यहाँ जस की तस दे रहा हूँ।

आप जब भी सड़क के रास्ते, नीमच-महू रास्ते से निम्बाहेड़-चित्तौड़गढ़ जाएँ तो खोर अवश्य जाएँ। नीमच से थोड़ा सा रास्ता बदल कर, जावद होते हुए निम्बाहेड़ा जाएँगे तो जावद से कुछ ही किलोमीटर पर खोर आता है।

खोर सर्वथा उपेक्षित, अनदेखा स्थान है। लगता है, सुन्दर आकृतियों और सुन्दर नक्काशी से अंलकृतयह नव तोरण मन्दिर सुनसान वीरान में खड़ा मानो खुद से एकालाप कर रहा है या अपने बारे में बताने के लिए आपकी बाट जोह रहा होा इसका जिक्र भी कहीं नहीं मिलता। इसके बारे में कोई साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। छोटा सा गाँव है। यहाँ चाय-पानी की भी व्यवस्था नहीं है। लेकिन आपको किसी सुविधा की आवश्यकता शायद ही पड़े। यहाँ देखने की एक ही जगह है। घूम-फिर कर देखने जैसी कोई बात ही नहीं है। कुछ ही मिनिटों का मामला है। 

उम्मीद है, चित्र आपको निराश नहीं करेंगे। 

सड़क से ऐसा दिखता है नव तोरण मन्दिर



परिचय शिलालेख और इस पर उकेरी गई इबारत
नव-तोरण मन्दिर, खोर
नवतोरण ग्यारहवीं शताब्दी का एक महत्वपूर्ण अवशेष है। यह दो पंक्तियों से व्यवस्थिति दस आलंकारिक महराबों से निर्मित है। इन पंक्तियों में से एक लम्बाई में तथा दूसरी चौड़ाई में है और ये केन्द्र में एक दूसरे को काटती हैं। ये सभा-भवन तथा अर्द्ध मण्डपों में स्तम्भ-युग्मों पर आश्रित हैं। यह मन्दिर पत्राकृति सीमान्त, मकरमुख तथा मालाधारी आदि अलंकरणों से सज्जित है। 
NAVA-TORAN TEMPLE AT KHOR
NAV-TORAN IS AN IMPORTANT REMNANT OF THE ELEVENTH CENTURY. IT CONSISTS OF TEN DECORATIVE ARCHES ARRANGED UN TWO ROWS, ONE LENGTH-WISE AND THE OTHER WIDTHWISE. CROSSING EACH OTHER AT THE CENTRE AND SUPPORTED ON A PAIR OF PILLARS IN THE HALL AND PORCHES. THE TEMPLE IS DECORATED WITH LEAF-SHAPED BORDERS, HEADS OF MAKARAS, GARLAND AND BEARERS ETC.





तोरण द्वारों के कुछ चित्र













नक्काशी से अलंकृत नन्दी








तोरण द्वारों के खम्भों पर उकेरी गई कुछ आकृतियाँ 


















हमारी हिन्दी: हम केवल चिन्ता करते हैं

हिन्दी दिवस पर मुख्य अतिथि बनने के, दो संस्थाओं के न्यौतों को अस्वीकार कर दिया। अब जी ही नहीं करता ऐसे आयोजनों में जाने का। सब कुछ खानापूर्ति, औपचारिकता, नकली, बनावटी लगता है। ऐसे आयोजनों में शामिल लोगों की हँसी और हिन्दी की दुर्दशा पर उनका विलाप-प्रलाप भी नकली, खुद से बोला जा रहा झूठ लगता है। हर कोई हिन्दी की दुर्दशा के प्रति क्षोभ और आक्रोश तो जताता है लेकिन जब खुद कुछ करने की बात आती है तो मानो लकवा मार जाता है।

अपने छुट-पुट शारीरिक कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भाई ओम चौरसिया के योग केन्द्र का लगभग नियमित लाभार्थी हूँ। जिस खेप में मैं जाता हूँ उसमें आठ-दस लोग हैं। तीन दिन पहले एक ने कहा - “हिन्दी की तो ऐसी-तैसी करके रख दी है लोगों ने। एक ने अपने मकान का नाम ‘माँ की दूआ’ लिखा है। उसे ‘दुआ’ और ‘दूआ’ का फर्क ही नहीं मालूम।” सब खुल कर हँसे। मैं चुप था। एक ने मुझे उकसाया - ‘कमाल है! आपने कुछ नहीं कहा! आपको तो सबसे पहले बोलना था।’ मैंने उसी से पूछा - ‘आपने अपने मकान पर नाम लिखवा रखा है?’ जवाब हाँ में आया। मैंने पूछा - ‘हिन्दी में लिखवाया है?’ कोई जवाब नहीं आया। मैंने कहा - ‘कोई बात नहीं। अब उसे हिन्दी में लिखवा लीजिए।’ तुरन्त जवाब आया - ‘ऐसे कैसे लिखवा लूँ? सीमेण्ट से लिखवा रखा है! हिन्दी में लिखवाने पर तो दो-चार हजार का फटका लग जाएगा।’ मैं चुप रहा। बाकी सब भी चुप रहे। शायद सबने ऐसा ही कुछ कर रखा होगा। मैंने पूछा - ‘चलो! कोई बात नहीं। लेकिन आप दस्तखत हिन्दी में करते हो?’ जवाब, झेंप भरे ‘नहीं’ में आया। मैंने कहा - ‘हिन्दी में दस्तखत करने में तो एक पैसे का भी फटका नहीं लगेगा। आप हिन्दी में दस्तखत करना शुरु कर दीजिए।’ इस बार अधिक झेंप भरा जवाब आया - ‘बहुत मुश्किल है। उसकी तो आदत ही नहीं।’ 

कभी किसी बोली के तो कभी किसी भाषा के विलुप्त होने की जानकारी आए दिनों विभिन्न स्तर के सर्वेक्षण देते हैं। पहले मुझे ये सच नहीं लगते थे। लेकिन अचानक ही अपने आसपास नजर गई तो इन सूचनाओं पर विश्वास करना पड़ा। मैं तीन परिवारों से चार बोलियों को लुप्त होते देख रहा हूँ। दो परिवार तो मेरे बेटों के ही हैं। बड़े बेटे का सुसराल निमाड़ अंचल में है। यह दम्पति अब न तो मालवी में बात करता है न ही निमाड़ी में। हिन्दी में ही बतियाता है। इनका बेटा (हमारा पोता) कभी निमाड़ी और/या मालवी बोली के बारे में शायद ही जान पाए। स्कूल में वह अंग्रेजी वातावरण में ही रहता है। इस परिवार से दो समृद्ध बोलियाँ बिदा हो रही हैं।

दूसरा परिवार मेरे छोटे बेटे के ससुराल का है। समधी दिनेशजी चौरसिया बृज पृष्ठभूमि के हैं और समधन रीनाजी पंजाबी पृष्ठभूमि की। इनकी बहू आरती मालवी पृष्ठभूमि की। कहने को यह परिवार तीन-तीन बोलियों से जुड़ा है लेकिन पूरा परिवार हिन्दी में ही संवाद करता है। इस परिवार में न तो बृज बोली जाती है, न पंजाबी न ही मालवी। 

तीसरा परिवार मेरे छोटे बेटे का है। वह मालवी पृष्ठभूमि का है। बहू नन्दनी (चौरसिया परिवार की बेटी) की अपनी कोई बोली नहीं रही। यह दम्पति भी हिन्दी में बात करता है। हम जब भी इनके पास जाते हैं तो नन्दनी, विस्फारित नेत्रों से हम पति-पत्नी को मालवी में बात करते देखती है। इन तीनों परिवारों की पृष्ठभूमि में सम्पन्न बोलियाँ हैं लेकिन अब एक भी बोली इन परिवारों नहीं रही। 

मैं यथा सम्भव मालवी में ही बात करने की कोशिश करता हूँ। मालवी में बात शुरु करते ही सामनेवाला ‘सहज’ से आगे बढ़कर ‘आत्मीय’ हो जाता है। आत्मीयता के साथ-साथ मिठास अपने आप चली आती है। रतलाम में तो मुझे हर बार मालवी में ही जवाब मिलता है लेकिन रतलाम से बाहर (मालवा में ही) ऐसा नहीं होता। इन्दौर में मेरा डेरा, बंगाली चौराहे के पास, सर्व सुविधा नगर में रहता है जबकि मेरे मिलनेवाले राजवाड़ा से आगे के इलाकों में। मुझे सिटी बस में यात्रा करना अच्छा लगता है। कनाड़िया सड़क से महू नाका और फिर उससे आगे वैशाली नगर तक मैं एक लघु भारत के साथ यात्रा कर लेता हूँ। मालवी तो बनी ही रहती है, भोजपुरी, अवधि, बुन्देली, पूरबी, मराठी, गुजराती भी खूब सुनने को मिलती है। कभी-कभार हिम्मत करके मैं बीच में, मालवी में ही कूद पड़ता हूँ। अपनी-अपनी बोली में बतिया रहे गैर मालवी लोग स्वाभाविक ही मुझे हिन्दी में जवाब देते हैं। लेकिन मालवी में बतिया रहे लोग भी हिन्दी में जवाब देते हैं। मेरी मन्दसौरी-रतलामी मालवी और इन्दौरी मालवी में उन्नीस-बीस का अन्तर है। इस उम्मीद में कि मुझे मालवी में जवाब मिलेगा, मैं बिना बात के बात बढ़ाने की कोशिश करता हूँ। लेकिन जवाब हिन्दी में ही आता है। हिन्दी भी अंग्रेजी चाशनी से लिपटी। 

बंगाली चौराहे का और तिलक नगर का सब्जी बाजार भी लघु भारत अनुभव होता है। वहाँ मालवी में भाव-ताव करता हूँ तो पहली बार तो हिन्दी में ही जवाब मिलता है। दूसरी बार में मालवी आ जाती है। लेकिन इन बाजारों में मालवी बोलनेवाले दुकानदार धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। लेकिन शास्त्री पुल पार करते ही बोलियों की विविधता छँट जाती है और मालवी सवाल का जवाब हर बार मालवी में ही मिलता है। यह दशा ठेठ वैशाली नगर तक बनी रहती है।

लेकिन व्यापारिक सन्दर्भों में ऐसा बिलकुल ही नहीं है। वहाँ अंग्रेजी ही अंग्रेजी है। दुकानों के नाम या उनके कागज-पत्तर, सब अंग्रेजी में। एक दुकान पर बड़ा मजा आया। दुकान का साइन बोर्ड अंग्रेजी की चौथी बारहखड़ीवाली लिपि में था। कलाकार ने मानो अपनी समूची प्रतिभा झोंक दी थी। संयोग से मुझे उसी दुकान में जाना पड़ा। दुकान के नाम और भीतरी व्यवस्था में बड़ा विरोधाभास था। दुकान में नजर आ रहे धार्मिक चित्र/प्रतीक, दुकान के नाम से कहीं भी मेल नहीं खा रहे थे। मैंने पूछा - “यह क्या? दुकान पर नाम तो ‘बाबूअली’ लिखवाया है और मूर्ति भगवान महावीर की!” दुकानदार चौंका। उसने बाहर आकर, दुकान से दूर जाकर, साइन बोर्ड पढ़ा। लौट कर तनिक चिन्ता से बोला - “आप ठीक कह रहे हो। मैंने लिखवाया तो ‘बाहुबली’ था। लेकिन आपने कहा तो मुझे भी ‘बाबूअली’ ही नजर आया। आज ही दुरुस्त करवाता हूँ।” मैंने कहा - ‘दुरुस्त करवा ही रहे हैं तो हिन्दी में लिखवा लेना। तब लोग गलत नहीं पढ़ेंगे।’ दुकानदार ने विनम्रता से धन्यवाद देते हुए कहा - ‘बिलकुल। अब हिन्दी में ही लिखवाऊँगा।’ इस घटना के अपने-अपने भाष्य किए जा सकते हैं। अपनी भाषा की उपेक्षा के खतरे असीमित होते हैं।

हिन्दी आज वहीं है जहाँ हम उसे ले आए हैं। हम इसकी दुर्दशा से दुःखी तो होते हैं किन्तु खुद कुछ नहीं करना चाहते। हिन्दी अखबारों ने हिन्दी का सर्वाधिक नुकसान किया है और किए जा रहे हैं। बची-खुची कसर, रोमन में हिन्दी लिखने का चलन पूरी कर रहा है। 

हिन्दी और अपनी बोलियों के प्रति यदि हमारा यही चाल-चलन रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम संकेतों और चिह्नों से ही खुद को व्यक्त करते नजर आएँगे। फेस बुक और वाट्स एप ने यह शुरुआत कर दी है। हमारी पीढ़ियाँ हमारी भाषाओं, बोलियों और लिपियों को संग्रहालयों में देखने-सुनने जाया करेंगी।

संस्कार, वे चाहे भाषायी हों या सांस्कृतिक, सदैव घर से शुरु होते हैं और उनका सार्वजनिक आचरण ही उन्हें पुष्ट, दृढ़ और हमारी पहचान बनाता है।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 13 सितम्बर 2018