ये पण्डित डुबो देंगे धर्म को

बिच्छू पण्डित का बड़ा दबदबा है। आतंकित रहते हैं लोग उनसे। लेकिन उनके बिना काम नहीं चलता। मुहूर्त निकालने-साधने और अनुष्ठान, धार्मिक, मांगलिक प्रसंगों के क्रिया-कर्मों में न तो कोई समझौता करते हैं न ही यजमान या उसके परिजनों का हस्तक्षेप स्वीकार करते हैं। बुरी तरह से डाँट देते हैं। किसी का लिहाज नहीं करते और न ही जगह, मौका देखते हैं। परशुराम के अवतार हो जाते हैं। कहते हैं - ‘धर्म के मामले में कोई समझौता नहीं चलेगा।’  उनके इस स्‍वभाव के कारण ही लोगों ने उनका यह नामकरण किया  है। बिच्छू पण्डित की उपस्थिति का मतलब ही है कि सब कुछ मुहूर्त में और शास्त्रानुसार, विधि-विधान से पूरा होगा। लोग उनसे डरते हैं लेकिन अपने काम उन्हीं से कराते हैं। यजमानी ही उनकी रोजी-रोटी है। दक्षिणा जरूर यजमान की श्रद्धा अनुसार होती है लेकिन अपना पारिश्रमिक खुद ही तय करते हैं।  

अर्चेन्द्र बड़ा भगत है बिच्छू पण्डित का। भगत नहीं, अन्ध-भगत है। उसे भी लग रहा है कि लोग धर्म विमुख हो रहे हैं और सनातन धर्म रसातल में जा रहा है। इसे बचाना जरूरी है। वह इसी काम में लगा रहता है। 

एक दिन अर्चेन्द्र के पिता ने घर पर ब्राह्मण-भोज आयोजित करने की भावना प्रकट की। अर्चेन्द्र ने फौरन हाँ भरी और कहा - ‘ब्राह्मण भोज से एक दिन पहले घर पर यज्ञ-हवन करा लेते हैं और ब्राह्मण-भोजवाले दिन, भोजन से पहले किसी विद्वान् ब्राह्मण का एक व्याख्यान भी करा लेते हैं।’ पिताजी निहाल हो गए। विचार को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी और छूट अर्चेन्द्र को दे दी।

व्याख्यान आयोजनों में उपस्थिति को लेकर अर्चेन्द्र के अनुभव बहुत अच्छे नहीं थे। यह उपक्रम किसी तिथि या प्रसंग से जुड़ा हुआ तो था नहीं। सो, उपस्थिति अधिकाधिक रहे, इस लक्ष्य से अर्चेन्द्र ने तय किया, घर पर किया जानेवाला हवन शनिवार को और व्याख्यान तथा भोजन रविवार को। 

अपनी योजना लेकर अर्चेन्द्र बिच्छू पण्डित के पास पहुँचा। पूरी बात सुनकर पण्डितजी ने पंचांग खोला। पन्ने पलटे। कभी कागज पर लिख कर तो कभी अंगुलियों पर, कोई बीस-बाईस मिनिट तक गणना की और घोषणा की - ‘शनिवार को तो हवन सम्भव ही नहीं।’ अर्चेन्द्र आसमान से धरती पर आ गिरा। उसने बिच्छू पण्डित को समझाने की कोशिश की कि न तो कोई मंगल आयोजन है न ही कोई मुहूर्त साधना है। बस! हवन मात्र करना है। सुबह न हो तो शाम को कर लेंगे। कोई फर्क नहीं पड़ता। बिच्छू पण्डित ने कुपित नेत्रों से अर्चेन्द्र को देख और एक के बाद एक कई ग्रहों और योगों का हवाला देते हुए कहा कि जिस शनिवार की बात अर्चेन्द्र कर रहा है उस शनिवार को तो हवन करने का सोचा भी नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि बहुत ही आवश्यक है तो शनिवार से पहलेवाले गुरुवार को हवन कराया जा सकता है। सुन कर अर्चेन्द्र पशोपेश में पड़ गया। हवन गुरुवार को याने व्याख्यान शुक्रवार को और शुक्रवार तो अच्छा-भला कामकाजी दिन! सुननेवाले कैसे आएँगे? व्याख्यान तो फ्लाप हो जाएगा! उसने बिच्छू पण्डित से चिरौरी की - ‘गुरु! जरा एक बार और ध्यान से देख लो! कोई रास्ता निकलता हो।’ सुन कर बिच्छू पण्डित आपे से बाहर हो गए। मानो अर्चेन्द्र को धक्के देकर फेंक देंगे, कुछ इस तरह कहा - ‘तू तो मुझे जानता है! मैं धरम के काम में समझौता नहीं करता। फौरन निकल जा यहाँ से।’

बिच्छू पण्डित का स्वभाव जानता था अर्चेन्द्र। इसलिए उसने बुरा नहीं माना। मरी-मरी आवाज में कहा - ‘ठीक है गुरु! गुरुवार को हवन करवा देना।’ बिच्छू पण्डित खुश हो गए। हवन की पूरी रूपरेखा और पारिश्रमिक की रकम तय कर अर्चेन्द्र लौट आया। पिताजी को बताया। हवन गुरुवार को हो या शुक्रवार को। पिताजी को कोई फर्क नहीं पड़ना था। 

पूरा खाका अर्चेन्द्र के मन में शुरु से ही साफ था। व्याख्यान हेतु विद्वान् ब्राह्मण से उसने पहले की कच्ची बात कर रखी थी। तारीख तय होते ही बात पक्की कर दी। ताबड़तोड़ निमन्त्रण पत्र छपवाए। फोन और वाट्स एप पर सबको खबर कर दी। अपनी व्यवस्थाओं को लेकर वह पहले ही क्षण से निश्चिन्त था। अब उसने पूरा ध्यान, व्याख्यान में अधिकाधिक उपस्थिति पर केन्द्रित कर दिया। 

वह इसी काम में लगा था कि वह हो गया जिसने अचेन्द्र के विश्वास के वट-वृक्ष को जड़ सहित उखाड़ दिया।

जिस गुरुवार को हवन होना तय हुआ था, उससे पहलेवाले रविवार को बिच्छू पण्डित का फोन आया। वे कह रहे थे कि शनिवार को हवन सम्भव है। अर्चेन्द्र चाहे तो वे शनिवार को हवन करा देंगे। अर्चेन्द्र उलझन में पड़ गया। बात तो उसके मन की थी लेकिन कमान से तीर छूट चुका था। अब बदलाव मुमकिन नहीं था। अर्चेन्द्र ने कहा - ‘अब तो कुछ नहीं हो सकता गुरु! निमन्त्रण बँट गए, हलवाई और भोजन की जगह तय हो गई। लेकिन यह गुंजाइश कैसे निकल आई गुरु? उस दिन तो आपने साफ कह दिया था कि शनिवार को कोई हवन ही नहीं हो सकता। अब कैसे हो गया?’ बिच्छू पण्डित ने ‘वो ऐसा है। वो वैसा है! वो उस दिन उधर ध्यान नहीं गया।’ जैसे जवाब दिए। लेकिन अर्चेन्द्र के गले नहीं उतरी। उसने कहा - ‘गुरु! आपसे ऐसी चूक हो ही नहीं सकती। आपने तो उस दिन आधे घण्टे तक पंचाग उल्टा-पुल्टा था और ढेर सारी गणनाएँ की थीं। आधा घण्टा कम नहीं होता गुरु! कोई गुंजाइश होती तो आप बता देते। कोई दूसरा पंचाग तो नहीं देख लिया?’ जवाब में सफाइयाँ देने की रौ में बहकर बिच्छू गुरु ने एक बात ऐसी कह दी कि अर्चेन्द्र चेतनाविहीन, जड़ हो गया। बिच्छू पण्डित ने कहा - ‘ये सब तो देखने में मैं चूका ही लेकिन अभी-अभी खबर मिली कि उस शनिवार को मैंने बड़नगर में जो हवन कराने की हाँ भर रखी थी, वह प्रोग्राम केंसल हो गया है। अब मैं शनिवार को फ्री हूँ। चाहो तो शनिवार को हवन करा लो।’

अर्चेन्द्र को काटो तो खून नहीं। उसके जी में आया कि फोन में ही हाथ डालकर बिच्छू गुरु की गर्दन मरोड़ दे। कोई ग्रह और कोई कुयोग आड़े नहीं आ रहा था। उस दिन उन्हें बड़नगर जाना था इसलिए उस शनिवार को हवन का होना ही निषिद्ध कर दिया! सारा मामला बिच्छू पण्डित के पारिश्रमिक का था। वे धरम के काम में समझौता नहीं करते लेकिन अपने पारिश्रमिक की मोटी रकम के लिए धरम की बलि चढ़ा सकते हैं। अर्चेन्द्र तो समझ रहा था कि सनातन धर्म ही उनका धर्म है। लेकिन अब वे ही बता रहे हैं कि उनका धर्म तो उनके पारिश्रमिक की रकम है। अर्चेन्द्र ने खुद पर काबू किया। यह कह कर फोन बन्द कर दिया कि हवन तो गुरुवार को ही होगा। वे समय पर आ जाएँ।

गुरुवार को हवन और शुक्रवार को व्याख्यान तथा भोजन हो गया। अर्चेन्द्र की मेहनत रंग लाई। उपस्थिति उसकी अपेक्षानुरूप ही रही। पिताजी प्रसन्न हुए। उनकी आत्मा तृप्त हुई उन्होंने अर्चेन्द्र को खूब आशीष दिए।

यह सब मुझे सुनाने अर्चेन्द्र आया था। बहुत गुस्से में था। बिच्छू पण्डित को भारी-भारी गालियाँ दे रहा था। मैं बार-बार उसे समझाऊँ और वह हर बार पटरी से उतर जाए। कोई बीस-पचीस मिनिट बैठ कर (और बिच्छू पण्डित का वाचिक दाह संस्कार कर) लौटा। जाते-जाते कह गया - ‘ये स्साले पण्डित! इन्हें न भगवान पर भरोसा न ही भाग्य पर। अपने पुरुषार्थ पर भी भरोसा नहीं। जब बिच्छू गुरु ही ऐसा करें तो बाकी की क्‍या बात करें? ये करेंगे धरम की रक्षा? ये तो धरम को बेच खाएँगे। डुबो देंगे सनातन धर्म को।’

मैं क्या कहता? कहता भी तो किससे? अर्चेन्द्र तो जा चुका था।
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(इस प्रसंग के दोनों पात्र जीवित हैं और रतलाम में ही हैं। अर्चेन्द्र की सुरक्षा और बिच्छू पण्डित के कोप के भय से नाम बदल दिए हैं। भय यह भी रहा कि बिच्छू पण्डित मुझ पर मानहानि का मुकदमा न लगा दें। इन दिनों ऐसे मुकदमों का मौसम जो आया हुआ है। ) 

उन्होंने मुझे मन भर गुलाब जामुन खिलाए

मेरे ‘खाद्य मन्त्रीजी’ रोते-रोते हॉल में घुसे। उन्हें चलने में तकलीफ होती है। वकील बेटे जीतेन्द्र का सहारा ले, रोते-रोते ही हॉल पार किया और मेरे सामने बैठ गए। मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर, रोते रहे। वे कुछ बोलने की कशिश कर रहे थे लेकिन बोल नहीं पा रहे थे। हिचकियों के बीच, टुकड़ों-टुकड़ों मे बोले - ‘क्या यार! दादा सच्ची में चले गए?’

‘खाद्य मन्त्रीजी’ याने श्रीमाणक मेहता। मैं उन्हें गए पैंसठ बरस से जानता हूँ, जब वे तहसील कार्यालय में बाबू बनकर मनासा में आए थे। 1953 में। वे दादा की मित्र मण्डली में थे। मैं उनके बारे में कुछ नहीं जानता था। बस, यही कि वे दादा के मित्र हैं। मैं उन्हें ‘माणक भई’ कहता था। ‘खाद्य मन्त्रीजी’ तो बरसों बाद कहना शुरु किया। सन् 1980 में। तब मुझे भी रतलाम आए तीन बरस हो चुके थे।

इस मित्र मण्डली में कुल सात सदस्य थे। मालवा अंचल में बारहसिंघा प्रजाति का एक जानवर होता है - जरख। लोक व्यहार में उसे जरखड़ा कहते हैं। इसका अपभ्रंश रुप वरख/वरखड़ा/वरगड़ा है। यह जानवर नुकसान ज्यादा करता है। दादा की मित्र मण्डली को मनासा के लोग परिहासपूर्वक ‘हाता वरगड़’ याने ‘सात जरख’ कहते थे। लेकिन ये कहने भर को ‘हाता वरगड़’ थे। किसी का नुकसान नहीं करते थे। 

तनिक मुश्किल से माणक भाई का रोना थमा। वे अतीत को याद करने लगे। मण्डली के सातों सदस्य अपने काम से काम रखते। ये सात सदस्य थे - माणक मेहता, बालकवि बैरागी, सोहन मास्टर (सोहनलाल नागदा), मदन लाल व्यास, नन्दू व्यास (नन्दकुमार व्यास), बादर (बहादुर हुसैन) और फिद्दी (फिदा हुसैन)। माणक भई तहसील/कचहरी में और मदनलालजी व्यास कोर्ट में बाबू थे। दादा, जमनालालजी जैन वकील साहब के मुंशी थे। सोहन मास्टर, जैसा कि नाम से ही साफ था, मास्टर थे। नन्दकुमारजी व्यास कोर्ट और कचहरी के डाक्यूमेण्ट/पीटिशन रायटर थे। बादर भाई बस कण्डक्टर थे। फिद्दी भैया बस मालिक थे और खुद बस चलाते थे। मनासा में कोर्ट और कचहरी एक ही मैदान में है। सो, माणक भई, मदनजी व्यास और दादा दिन भर एक ही परिसर में रहते थे। सोहन मास्टर सा‘ब अपने स्कूल से निपट कर वहीं पहुँच जाया करते थे। बादर भाई और फिद्दी भैया शाम को फुरसत पाते थे। 

माणक भाई शुरु में दादा को दादा नहीं, ‘बैरागी’ कहते थे। माणक भाई ने कहा - “वो मुझे माणक कहते थे और मैं उन्हें बैरागी कहता था। जब मनासा में था तब दादा राजनीति में लगभग नहीं के बराबर थे। मैं मनासा से निकला उसके बाद दादा की राजनीतिक सक्रियता बढ़ी। उनकी राजनीतिक पहचान बनती और बढ़ती जा रही थी। साथ ही साथ वे बालकवि के रूप में स्थापित और लोकक्रिय होते जा रहे थे। उनका कद दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था। हम जब भी मिलते, दादा तो सामान्य ही रहते लेकिन मुझे संकोच होने लगा - इतने लोगों के बीच उन्हें ‘ऐ बैरागी!’ कैसे कहूँ? इस बीच 1965 में मैं राजस्व विभाग से खाद्य विभाग में आ गया। 1967 में दादा विधायक बन गए और संसदीय सचिव भी। 1969 में वे राज्य मन्त्री बन गए। अब मुझे अधिक संकोच होने लगा। मैं उन्हें केवल ‘बैरागी’ सम्बोधित करूँ तो लोग क्या कहेंगे? उनका मन्त्री होना और मेरा कर्मचारी होना तो कभी आड़े नहीं आया लेकिन मैं खुद ही संकोचवश उन्हें दादा कहने लगा। लेकिन फर्क केवल सम्बोधन में आया। हमारे रिश्ते और व्यवहार में तिल भर भी फर्क नहीं आया। मैं उनका वही ‘माणक’ बना रहा और वे मेरे वही ‘बैरागी’ बने रहे।” 

याद करते-करते माणक भई फिर सिसकने लगे। बोले - “राजनेता और मन्त्री तो वे बहुत बाद में बने। लेकिन उससे पहले, जब-जब मुझे नौकरी में संकट आया, हर बार मेरे संकट मोचक बने। मुझे उनका बड़ा भरोसा था - कुछ भी होगा तो निपट लेंगे। दादा जो हैं!”

1980 में दादा खाद्य राज्य मन्त्री बनाए गए। माणक भई खाद्य निरीक्षक थे। एक दिन अचानक उनसे मुलाकात हो गई। वे बहुत नहीं, बहुत-बहुत-बहुत खुश थे। मैंने पूछा - ‘क्या बात है दादा? प्रमोशन हो गया क्या?’ मानो पूरी दुनिया मुझ पर न्यौछावर कर देंगे, कुछ इस अन्दाज में बोले - ‘अपने तो सारे प्रमोशन हो गए। दादा मन्त्री बन गए। यही अपना प्रमोशन है।’ मैंने कहा - ‘आप तो ऐसे कह रहे हो जैसे आप खुद खाद्य मन्त्री हो गए हो!’ माणक भाई बोले - ‘बिलकुल ठीक। अपन ही फूड मिनिस्टर हैं।’ मैंने टोका - ‘आप तो दादा को जानते हो। वो गैरवाजिब काम करेंगे नहीं और आपको छूट नहीं देंगे कि आप उनके नाम पर अफसरी करो।’ माणक भाई लहलहाते हुए, बेलौस मुद्रा मे बोले - ‘गैरवाजिब! अरे अपन को तो वाजिब काम के लिए भी कहने की जरूरत पहले भी नहीं पड़ी तो अब क्या पड़ेगी! मन्त्री तो दादा आज बने हैं। लेकिन पहले से ही ऐसा होता आ रहा है कि दादा को जैसे ही मालूम होता कि माणक तकलीफ में है, खुद ही दौड़े चले आते। और रही बात उनके नाम पर अफसरी करने की, तो ये तेने सोच भी कैसे लिया? मुझे अपनी नौकरी करनी है। मेरी वजह से दादा पर अंगुली भी उठ गई तो फिर क्या नौकरी की? लेकिन अपन को मन्त्री मानने से कौन रोक सकता है?’ उसी दिन से मैंने माणक भाई को ‘खाद्य मन्त्रीजी’ कहना शुरु कर दिया।

कुछ दिनों बाद माणक भई के घर गया। मुझे आया देख वे फिर भावाकुल हो गए। सामान्य हुए तो बोले - ‘मेरे पास हम सातों दोस्तों का एक फोटू है।’ कह कर उन्होंने तत्काल मुझे फोटू थमा दिया। मैं चौंका। यही फोटू मैंने दादा के एलबम में देखा था। बोले - ‘यह 14 मार्च 1954 का फोटू है।’ मैं पहली ही नजर में सबको पहचान गया। 

कुर्सियों पर बैठे हुए बाँये से - बालकवि बैरागी, मदनलाल व्यास, नन्द कुमार व्यास। 
खड़े हुए बाँये से - सोहनलाल नागदा (सोहन मास्टर), बहादुर हुसैन (बादर भाई), फिदा हुसैन (फिद्दी) और माणक मेहता।

मैंने कुरेदा - ‘दादा को लेकर कोई ऐसी याद, कोई ऐसी बात जो भूल नहीं पाए।’ माणक भाई तपाक से बोले - “हैं तो बहुत सारी लेकिन एक बात ऐसी रही कि उसके बाद मैंने कान पकड़ लिए कि दादा से कभी कोई फरमाइश नहीं करूँगा।

“मैं धोबी गली और गणेशपुरा गली वाले चौराहे पर, बद्री काका की दुकान के सामने झँवर सेठ के मकान में रहता था। कचहरी जाने के लिए गणेशपुरा गली, चौपड़ गट्टा पार कर, चारभुजा मन्दिर गली होते हुए जाता था। गणेशपुरा गली में लच्छा बा’ कँदोई (लक्ष्मीनारायणजी विजयवर्गीय हलवाई) की, मिठाइयों की दुकान थी। लच्छा बा’ घुटनों तक की धोती और लट्ठे की, बिना बाँहों की बनियान पहने बैठे रहते थे। वे खूब मोटे थे। ऐसा लगता था मानो अपनी बनाई मिठाइयाँ चखने के नाम पर पहले खुद पेट भर खाकर बैठे हों। उनके गुलाब जामुन  प्रसिद्ध थे। सुबह कचहरी जाते वक्त गरमा-गरम गुलाब जामुनों से भरी कढ़ाई मेरी नजरें खींच लेती थी। मावे और घी की खुशबू परेशान कर देती थी। लेकिन मँहगाई का जमाना और बाबू की नौकरी! बस! देख कर ही तसल्ली कर लेता था।

“एक दिन मुझसे रहा नहीं गया। मैंने दादा से कहा - ‘क्या यार! अपन भी कभी मन भर के गुलाब जामुन खा सकेंगे?’ दादा यारबाज ही नहीं, मस्तमौला भी थे। मुझे लेकर फौरन लच्छा बा’ की दुकान पर पहुँचे। लच्छा बा’ से बोले - ‘काकाजी! इसे मन भर गुलाब जामुन खिलाओ।’ लच्छा बा’ चौंके और डाँटते हुए बोले - ‘मन भर गुलाब जामुन कभी देखे भी हैं? मन भर देखे तो नहीं और बापड़े (बेचारे) मन भर खाने को चले।’ उस जमाने में तौल की इकाई छटाँक, पाव, सेर, मन होता था। चार छटाँक का एक पाव, चार पाव का एक सेर, चालीस सेर का एक मन। लच्छा बा’ उसी मन की समझे। दादा ने हँस कर कहा - ‘अरे! काकाजी! वो मन नहीं, आदमी का मन। गुलाब जामुन खाते-खाते जब तक माणक का मन नहीं भर जाए, तब तक इसे गुलाब जामुन खिलाओ।’ अब लच्छा बा’ समझे और दो-दो छँटाक गुलाब जामुन हमें थमा दिए। मेरा तो पेट और मन उसी में भर गया। लेकिन दादा ने मेरी नहीं सुनी। लच्छा बा’ ने फिर दो छँटाक गुलाब जामुन दे दिए। मुझसे खाया नहीं जाए। इधर दादा हैं कि ‘इसे और दो! और दो’ कहे जा रहे। मैं गुलाब जामुन मुँह में डालूँ और वह अन्दर जाने के बजाय बाहर आए। लच्छा बा’ को मुझ पर दया आ गई। उन्होंने दादा को डाँटा। तब कहीं मुझे मुक्ति मिली। उस दिन के बाद दादा से कभी कोई फरमाइश की भी तो खूब सोच-समझ कर बोला।”

माणक भाई मीठे-मादक अतीत में गुम थे। मुझे लौटना था। मैंने खँखार कर उनकी तन्द्रा भंग की। कहा - ‘आपके पास तो ढेर सारे किस्से होंगे। लेकिन मुझे जाना है। यह फोटू मुझे दे दीजिए। इसे स्केन करके लौटा दूँगा।’

और मैं लौट आया। मेरे खाद्य मन्त्रीजी, माणक भई को उनकी यादगाह में। मेरे दादा और उनके बैरागी के साथ छोड़कर।
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आभार - मैंने 'सोलह पाव का एक सेर' लिख दिया था। श्रीयुत के. डी. शर्मा ने टोका  - 'एक सेर में सोलह नहीं, चार पाव होते थे।' टोकते ही अपनी चूक अनुभव हुई। तत्‍काल दुरुस्‍ती की। बहुत-बहुत आभार शर्माजी। शर्माजी सहित तमाम कृपालुओं से आग्रह है - मुझ पर नजर बनाए रखिएगा और मुझे दुरुस्‍त करते रहिएगा। 

तू चन्दा मैं चाँदनी - 3

(दादा श्री बालकवि बैरागी के आकस्मिक निधन के बाद, फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ के उनके गीत ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ की बहुत चर्चा हुई। इस गीत से जुड़ा यह संस्मरण ‘एकोऽहम्’ पर    20 जुलाई  2007 को प्रकाशित हो चुका है। तब ब्लॉग जगत में मेरी उम्र कुल दो माह की थी। तब मैं, लेख में न तो फोटू लगाना जानता था न ही परमा लिंक। मित्रों के आग्रह पर इस लेख को मैं एक बार फिर दे रहा हूँ - दादा के निधन के बाद बनी स्थितियोंनुसार संशोधन, सम्पादन सहित।)



मनासा लौटने के बाद भी मुम्बई से दादा का सम्पर्क बना रहा। तब तक दादा को कवि सम्मेलनों के न्यौते मिलने लगे थे और वे मंच लूटने के लिए पहचाने जाने लगे थे। उनकी मालवी रचना ‘पनिहारी’ लोगों के दिलों पर तब से ही राज करने लगी थी। उन्हें ‘मालवी का राजकुमार’ कहा जाने लगा था। इसी क्रम में उनका सम्पर्क बालाघाट के अग्रणी खनिज व्यवसायी ‘त्रिवेदी बन्धुओं’, भानु भाई त्रिवेदी और मुकुन्द भाई त्रिवेदी से हुआ। इनकी रुचि फिल्मों में थी ही। नितिन बोस निर्देशित फिल्म ‘नर्तकी’ के निर्माता ये ‘त्रिवेदी बन्धु’ ही थे।

मुकुन्द भाई त्रिवेदी स्वतन्त्र रूप से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में आना चाह रहे थे। सो, फिल्म बनना तय हुआ। मामला बातों से कागजों पर उतरना शुरु हुआ। गीत लिखने का जिम्मा दादा को मिला। ‘इन्द्रधनुष फिल्म्स’ बैनर तले बनी इस फिल्म के निदेशक थे बलवन्त दवे। स्पेशल इफेक्ट्स भी उन्हीं ने दिए थे। यह एक स्टण्ट/हॉरर/थ्रिलर श्याम-श्वेत फिल्म थी। नाम था - ‘गोगोला’। ऐसी फिल्मों की कहानी जैसी होती है, वैसी ही इस फिल्म की भी थी। उन दिनों के स्टण्ट फिल्मों के सुपरिचित नायक आजाद इस फिल्म के नायक और तबस्सुम इसकी नायिका थीं। संगीत का जिम्मा ‘रॉय और फ्रेंक’ को सौंपा गया। इनमें से कोई एक (सम्भवतः फ्रेंक), प्रख्यात संगीतकार रवि के सहायक थे। दादा की यह पहली फिल्म थी जिसके सारे के सारे गीत दादा ने लिखे थे। 

फिल्म बनी, सेंसर हुई और जैसे-तैसे प्रदर्शित भी हुई। उन दिनों रेडियो सीलोन से, सवेरे-सवेरे पन्द्रह मिनिट का कार्यक्रम (सम्भवतः सवेरे सात बजे) ‘एक ही फिल्म के गीत’ आया करता था। जिस दिन इस कार्यक्रम में ‘गोगोला’ के गीत बजे उस पूरे दिन हम सब लोग मानो नशे में रहे। फिल्म में चार गीत थे और यह संयोग ही था कि उस कार्यक्रम में चार गीत ही बजाए जाते थे। याने उस कार्यक्रम में, ‘गोगोला’ के सारे के सारे गीत बजे। इनमें से एक गीत (जो वस्तुतः गजल था) उन दिनों लोकप्रिय गीतों के दायरे में शामिल हुआ था। गीत का मुखड़ा था -

‘जरा कह दो फिजाओं से हमें इतना सताए ना।
तुम्हीं कह दो हवाओं से तुम्हारी याद लाए ना।’

इसे मुबारक बेगम और तलत महमूद ने गाया था। (दादा के आकस्मिक निधन के फौरन बाद, विविध भारती के सुपरिचित, लोकप्रिय उद्घोषक श्री युनूस खान ने दादा को इसी गीत से याद किया।) कुछ ही दिनों बाद ‘गोगोला’ के रेकार्ड दादा के पास आए। हमारे घर में रेकार्ड प्लेयर नहीं था। ऐसे समय में माँगने की आदत खूब काम आई। मैं ने एक रेकार्ड प्लेयर जुगाड़ा और पूरे चौबीस घण्टे वे रेकार्ड बजा-बजा कर सुनता रहा। शुरु-शुरु के कुछ घण्टों तक तो सबने आनन्द लिया लेकिन जल्दी ही वह नौबत आ गई कि मेरी पिटाई हो जाए। मुझे मन मार कर रुकना पड़ा।
गोगोला का पोस्टर 


यह फिल्म इन्दौर के महाराजा सिनेमा में लगी थी। इन्दौर के लोग इस बात की ताईद करेंगे कि इन्दौर के सिनेमाघरों में महाराजा सिनेमा श्रेष्ठता क्रम में अन्तिम स्थान पाता था। इस सिनेमा घर में फिल्म प्रदर्शित होना ही फिल्म के स्तर पर टिप्पणी होता था और यहाँ लगने वाली फिल्मों का दर्शक वर्ग स्थायी और चिर परिचित होता था। इसके बावजूद, फिल्म तो देखनी ही थी। सो दादा और उनके दो मित्र श्री कृष्ण गोपालजी आगार और श्री मदन मोहन किलेवाला, दादा की पहली फिल्म ‘गोगोला’ देखने हेतु इन्दौर के लिए चले। ये दोनों महानुभाव अब इस दुनिया में नहीं हैं। कृष्ण गोपालजी रहते तो मनासा में थे किन्तु व्यापार करते थे नीमच की मण्डी में। उन्हें मनासा का नगर सेठ होने का रुतबा हासिल था। वे प्रतिदिन नीमच आना-जाना करते थे। वे मनासा के एकमात्र ‘कार स्वामी’ हुआ करते थे। किलेवालाजी नीमच निवासी ही थे। वे न्यू इण्डिया इंश्योरेंस कम्पनी के विकास अधिकारी थे। वे फर्राटेदार, धमकदार, धमाकेदार अंग्रेजी बोलते थे। रहन-सहन और जीवन शैली बिलकुल अंग्रेज की तरह। उनसे वे लोग भी जलते और चिढ़ते थे जिनका उनसे कभी कोई लेना-देना न तो रहा और न ही रहनेवाला था। नीमच में उनकी अलग ही पहचान थी।दादा, कृष्ण गोपालजी को ‘केजी’ और किलेवालाजी को ‘एमएम’ के सम्बोधनों से पुकारते थे। कभी-कभी वे इन्हें ‘कनु’ और ‘मनु’ भी कहते । लेकिन ‘केजी’ और ‘एमएम’ ही इनकी पहचान बन गये थे। ‘केजी’ बहुत ही कम बोलने वाले, मानो संकोची हों या आत्म केन्द्रित जब कि ‘एमएम’ चुप्पी के बैरी। ये दोनों दादा के अन्तरंग मित्र थे, सुख-दुख के संगाती और अपनी सम्पूर्ण आत्मीयता और ममत्व से दादा की चिन्ता करने वाले लोग थे। इनका विछोह दादा के लिए आज मृत्युपर्यन्त मर्मान्तक बना रहा।

किलेवालाजी के बेटे सुदेश किलेवाला के सौजन्य से प्राप्त इस चित्र में सबसे बाँयेवाले सज्जन को मैं नहीं पहचान पाया। उनके पास, काला चश्मा लगाए किलेवालाजी (याने दादा के 'एमएम' या 'मनु') , फिर दादा, उनके पास बापूलालजी जैन, फिर कृष्णगोपालजी आगार (याने दादा के 'केजी' या 'कनु') और सबसे अन्त में हस्तीमलजी जैन वकील साहब। सबसे बाँयेवाले सज्जन के अतिरिक्त सब अब दिवंगत हैं।


इन्हीं दोनों के साथ दादा इन्दौर रवाना हुए। बल्कि कहा जाना चाहिए कि ये दोनों दादा को, दादा के गीतों वाली फिल्म दिखाने और खुद देखने, दादा को इन्दौर ले गए। कार, ‘केजी’ की ही होनी थी। यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि इन्हें ‘गोगोला’ देखने की खुशी ज्यादा थी या महाराजा सिनेमा में इस फिल्म के रिलीज होने का गम। दादा को ऐसी बातों से सामान्यतः कोई अन्तर नहीं पड़ता था। वे अपने को हर हाल में, हर दशा में बहुत जल्दी समायोजित कर लेते थे। अभावों को कुशलतापूर्वक जीने का अभ्यास उनके बड़े काम आता था। लेकिन ‘केजी’ और ‘एमएम’ के लिए महाराजा सिनेमा में प्रवेश करना इज्जत हतक से कम नहीं था। फिर भी अपने यार की खातिर इन दोनों ने, महाराजा सिनेमा को इज्जत बख्शने का ऐतिहासिक उपकार किया। फिल्म में देखने के नाम पर केवल गीतों का फिल्मांकन देखना था। लेकिन सारे के सारे गीत एक साथ तो आते नहीं। सो दोनों मित्र खुद को सजा देते हुए, कसमसाते हुए बैठे रहे। फिल्म समाप्त हुई। तीनों बाहर आए और मुकाम पर चलने के लिए कार में बैठे। कार सरकी ही थी कि ‘एमएम’ ने कुछ ऐसा कहा - “यार! बैरागी! ‘गोगोला’ देखनी थी सो देख ली  फिल्म में तो कोई दम है नहीं। गीतों की तारीफ क्या करना! लेकिन मजा तो तब आए जब तुम्हारा गीत लता गाए और उस पर वहीदा नाचे।” ‘केजी’ मुस्कुरा दिए। दादा कुछ नहीं बोले। महाराजा सिनेमा के दर्शकों की टिप्पणियाँ उनके कानों में शायद तब भी गूँज रहीं थीं। अपनी बात का ऐसा ‘कोल्ड रिस्पांस’ पा कर ‘एमएम’ को अच्छा तो नहीं लगा लेकिन चुप रहने के सिवाय वे और कर भी क्या सकते थे? सो, ‘एमएम’ की बात आई-गई हो गई। तीनों मित्र लौटे और अपने-अपने काम में लग गए।

लेकिन जब ‘उस सुबह’ दादा को, भोपाल में लताजी का फोन मिला और लताजी से बात कर दादा जैसे ही सामान्य-संयत हुए, वैसे ही उन्हें ‘एमएम’ की बात याद आ गई। वे भावावेग में रोमांचित हो गए। तब तक ‘रेशमा और शेरा’ की कास्टिंग सार्वजनिक हो चुकी थी और सबको पता था कि वहीदाजी इसकी नायिका हैं। ‘एमएम’ ने इच्छा प्रकट की थी या भविष्यवाणी की थी? दादा ने हाथों-हाथ ‘एमएम’ को फोन लगाया। ‘एमएम’ ‘नाइट लाईफ’ जीने वाले, 'आजाद हिन्‍दुस्‍तान में अंग्रेज आदमी' थे और उठने के मामले में ‘सूरजवंशी’। सो, दादा का फोन उन्होंने चिढ़ कर ही उठाया लेकिन जब किस्सा-ए-फोन सुना तो ऐसे चहके मानो सवेरे-सवेरे उनके घर, वंश वृध्दि का मंगल बधावा आ गया हो।

‘रेशमा और शेरा’ तीनों ने जब देखी और ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ पर वहीदाजी की भाव प्रवण भंगिमाएँ देखीं तो उनकी क्या दशा रही होगी, यह कल्पना करने का कठिन काम आप खुद कर लीजिए। वह प्रसंग उनके लिए आजीवन ज्यों का त्यों जीवन्त बना रहा। तीनों के गले रुँधे हुए थे और ‘एमएम’ खुद को, बार-बार चिकोटी काट-काट कर अपने होने को अनुभव कर रहे थे।

बात यहीं समाप्त हो जानी चाहिए। लेकिन एक और बात बताने से मैं अपने आपको को रोक नहीं पा रहा हूँ। सबके लिए यह बात बासी हो सकती है किन्तु यहाँ प्रासंगिक है।

आज की लोकप्रिय और स्थापित गायिका सुनिधि चौहान का रिश्ता भी ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ से है। मुझे यह तो याद नहीं आ रहा कि किस टी वी चैनल ने कौन सी प्रतियोगिता आयोजित की थी। किन्तु उस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पा कर ही सुनिधि चौहान ने पार्श्व गायन के क्षेत्र में प्रवेश किया था। प्रतियोगी के रूप में सुनिधि ने जो गीत गा कर प्रथम स्थान पाया था वह दादा का यही गीत था - तू चन्दा मैं चाँदनी।
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तू चन्दा मैं चाँदनी - 2

(दादा श्री बालकवि बैरागी के आकस्मिक निधन के बाद, फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ के उनके गीत ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ की बहुत चर्चा हुई। इस गीत से जुड़ा यह संस्मरण ‘एकोऽहम्’ पर 20 जुलाई 2007 को प्रकाशित हो चुका है। तब ब्लॉग जगत में मेरी उम्र कुल दो माह की थी। तब मैं, लेख में न तो फोटू लगाना जानता था न ही परमा लिंक। मित्रों के आग्रह पर इस लेख को मैं एक बार फिर दे रहा हूँ - तनिक संशोधन, सम्पादन सहित।)

यह तब की बात है जब ‘रेशमा और शेरा’ का अता-पता कल्पना में भी शायद ही रहा होगा।

फिल्मों में गीत लिखने के सिलसिले में दादा साठ के दशक में कुछ अरसा मुम्बई में रह चुके थे। तब उन्होंने श्री मुबारक मर्चेण्ट के यहाँ मुकाम जमाया था। ये मुबारकजी वे ही थे जिन्होंने फिल्म ‘अनारकली’ में अकबर की, फिल्म ‘नागिन’ में वैजयन्तीमाला के पिता की, फिल्म ‘झाँसी की रानी’ में राजा गंगाधर राव भूमिका निभाई थी और जो बाद में स्थापित चरित्र अभिनेता के रूप में पहचाने गए। दुर्गा खोटे की आत्मकथा ‘मी दुर्गा’ में मुबारकजी का सन्दर्भ अत्यन्त भावुकता से आया है। मुबारकजी मूलतः तारापुर के रहने वाले थे। यह तारापुर, महाराष्ट्र वाला नहीं बल्कि मालवा वाला तारापुर है जो इस समय नीमच जिले की जावद तहसील का हिस्सा है। इस तारापुर की रंगाई और इसकी छींटें (प्रिण्ट्स) विश्व प्रसिध्द हैं जिन्हें ‘तारापुर प्रिण्ट्स’ के नाम से जाना जाता है। इन छींटों की रंगाई के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले प्राकृतिक रंग खूब गहरे/गाढ़े होते हैं जो सैंकडों धुलाइयों के बाद भी फीके नहीं पड़ते। तारापुर के रंगरेजों की पीढ़ियाँ बीत गई हैं लेकिन कोई भी यह बताने की स्थिति में नहीं है कि रंगों के कड़ाहों में पहली बार रंग किसने डाला था। इन कड़ाहों को पूरा खाली होते किसी ने नहीं देखा। अपने से पहली वाली पीढी से प्राप्त, इन रंग भरे कड़ाहों को अपने से आगे वाली पीढ़ी को सौंपने का क्रम आज भी बना हुआ है। तारापुर के रंगरेज अपनी इस परम्परा का सगर्व बखान करने का कोई अवसर नहीं चूकते। इन रंगरेजों को ‘छीपा’ जाति के नाम से पहचाना जाता है और इस जाति में दोनों सम्प्रदायों (हिन्दू और मुसलमान) के लोग हैं। सच बात तो यह है कि तारापुर की यह छपाई अपने आप में अध्ययन और लेखन का स्वतन्त्र/वृहद् विषय है।


मुबारकजी

फिल्मी दुनिया में मुबारकजी को किस सम्बोधन से पुकारा जाता था यह मुझे नहीं पता क्यों कि उनके रहते मैं कभी मुम्बई नहीं गया। हम लोगों ने उनका जिक्र सदैव ही दादा से सुना। दादा उन्हें ‘चाचाजी’ कहते थे। सो, वे हम सबके चाचाजी थे। मुम्बई में भी चाचाजी ने तारापुर को अपने मन में बराबर बसाए/बनाए रखा। वे मालवी न केवल फर्राटे से बालते थे बल्कि मालवी बोलने के मौके पैदा करते थे। दादा के आग्रह पर वे एक बार मनासा आए थे और हमारे परिवार के साथ कुछ दिन रहे थे। उन्हें मनासा के डाक बंगले में ठहराया गया था। वे शिकार के शौकीन थे। दादा के कुछ मित्रों ने उनके लिए शिकार खेलने की व्यवस्था की थी। जिज्ञासा भाव से मैं भी उस शिकार में शरीक हुआ था। कंजार्डा पठार के जंगलों में, चाचाजी के साथ, शिकारी जीप में की गई वह यात्रा मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा। प्रत्येक क्षण मुझे लगता रहा कि यह जीप या तो कहीं टकरा जाएगी या फिर उलट जाएगी और हम लोगों के शव ही घर पहुँचेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। काफी भाग दौड़ के बाद उन्होंने अन्ततः बारहसिंघे की प्रजाति के जानवर एक ‘जरख’ को मार गिराया था। लेकिन इससे पहले, जब काफी देर तक कोई शिकार नहीं मिला और एक खरगोश सामने आया तो शिकार आयोजित करने वाले मेजबानों ने चाचाजी को सलाह दी कि वे खरगोश का शिकार कर लें। उन्होंने फौरन ही इंकार कर दिया। मेरे लिए यह ‘विचित्र किन्तु सत्य’ जैसी स्थिति थी। अँधेरे की अभ्यस्त हो चुकी आँखों से मैं ने चाचाजी का चेहरा देखा तो वहाँ शिकारी की क्रूरता और हिंसा कहीं नहीं थी। जीप की हेड लाइट की तेज रोशनी में खरगोश की शरबती आँखें चमक रही थीं और चाचाजी के चेहरे पर मानो मक्खन का हिमालय उग आया था। वे खरगोश को ऐसे देख रहे थे मानो खुदा की सबसे बडी नेमत उनके सामने मौजूद हो। उन्होंने कहा था - ‘कैसी बातें करते हैं आप? इतना खूबसूरत और मुलायम जानवर तो प्यार करने के लिए है, मारने के लिए नहीं।’ उस समय वे ‘सोमदत्त’ के भेस में थे और उनका व्यवहार ‘सिध्दार्थ’ जैसा था। कंजार्डा पठार के घने जंगलों में, उस गहरी, अँधेरी रात में मैं ने एक कलाकार का जो स्वरूप देखा, वह मेरे लिए जीवन निधी से कम नहीं है।

चाचाजी नियमित सुरा-सेवी थे। मनासा तब मुश्किल से नौ-दस हजार की आबादी वाला कस्बा था। आबादी में माहेश्वरियों और श्वेताम्बर/दिगम्बर जैनियों का प्रभुत्व तथा प्रभाव। माहेश्वरियों ने तो उस गाँव को बसाने में भागीदारी की। सो, सकल वातावरण ‘सात्विक’। देसी शराब का ठेका जरूर वहाँ था लेकिन ‘अंग्रेजी शराब’ की तो बस बातें ही होती थीं। ऐसे में एक शाम, जब डाक बंगले मैं अकेला उनके पास था, उन्होंने अचानक ही शराब की फरमाइश की। मैं अचकचा गया। शराब का नाम मैं ने तब तक सुना जरूर था लेकिन शराब देखी नहीं थी। शराब का ठेका भी मैं ने देखा जरूर था लेकिन वह ‘स्थायी वर्जित प्रदेश’ था। मैं घबरा गया। समझ नहीं पाया और तय नहीं कर पा रहा था कि क्या करूँ और चाचाजी को क्या जवाब दूँ। तब तक चाचाजी ने फरमाईश दुहरा दी। शराब ला पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं था और डाक बंगले पर रूक पाना उससे भी अधिक कठिन हो गया था। मैं वहाँ से चला तो मेरे कानों में सीटियाँ बज रही थीं और आँखें कुछ भी देख पाने में मदद नहीं कर रही थीं। एक प्रतिष्ठित कवि का छोटा भाई और ‘बैरागी-साधु’ जाति के महन्त का बेटा, छोटी सी बस्ती में, जहाँ सब उसे खूब अच्छी तरह जानते-पहचानते हों, दारू लाने के लिए ठेके पर जा रहा था। मुझे लग रहा था मानों बस्ती के लोग तो लोग, सडक पर विचर रहे ढोर-डंगर भी मुझे कौतूहल से देख रहे हैं और धिक्कार रहे हैं। लेकिन मेरा भाग्य शायद साथ दे रहा था। मैं डाक बंगले से सौ-डेड़ सौ कदम ही चला होऊँगा कि मैं ने देखा कि सामने से मोहम्मद साहब चले आ रहे हैं। मोहम्मद साहब के पिताजी और मेरे पिताजी गहरे मित्र थे और उनसे हमारा पारिवारिक व्यवहार था। मोहम्मद साहब खुद दादा के अच्छे मित्र थे और चाचाजी के शिकार की व्यवस्थाएँ करने में अग्रणी थे। लेकिन उस क्षण की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि वे आबकारी विभाग में कांस्टेबल के पद पर मनासा में ही पदस्थ थे। मेरी शकल की इबारत उन्होंने मानो पढ़ ली  मेरी बात सुन कर वे खूब हँसे और मुझे डाक बंगले वापस भेजा। बाद में, जब वे देसी दारू की बोतल लेकर चाचाजी के पास आए तो मेरी दशा का बखान कर, खूब मजे लिए।


मुबारकजी की एक और मुद्रा

इन्हीं चाचाजी ने मुम्बई में दादा को अपने पास रखा । दादा तब तक हालांकि ‘बालकवि’ के रूप में स्थापित हो चुके थे लेकिन अन्तरंग स्तर पर वे अपने मूल नाम ‘नन्दराम दास’ से ही सम्बोधन पाते थे। चाचाजी दादा को ‘नन्दू’ कह कर पुकारते थे। मुम्बई में दादा के संघर्ष गाथा की जानकारी मुझे बिलकुल ही नहीं रही। लेकिन वे वहाँ इतने समय तक रहे कि पिताजी, दादा की सफलता की प्रतीक्षा नहीं कर सके और एक दिन मुम्बई जाकर, चाचाजी से उनके ‘नन्दू’ और अपने ‘नन्दा’ को मनासा लिवा लाए।

शेष भाग अगली कड़ी में
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मुबारकजी के चित्र मुझे  फेस बुक मित्र  सर्वश्री प्रवीण माथुुुर, राजेश कर्णधार, खुशदीप सहगल और कुमार मुकेश ने उपलब्‍ध कराए।  मैं इन सबका अत्‍यधिक आभारी हूं।

तू चन्दा मैं चाँदनी - 1

(दादा श्री बालकवि बैरागी के आकस्मिक निधन के बाद, फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ के उनके गीत ‘तू चन्दा मैं चाँदनी’ की बहुत चर्चा हुई। इस गीत से जुड़ा यह संस्मरण ‘एकोऽहम्’ पर    20 जुलाई  2007 को प्रकाशित हो चुका है। तब ब्लॉग जगत में मेरी उम्र कुल दो माह की थी। तब मैं, लेख में न तो फोटू लगाना जानता था न ही परमा लिंक। मित्रों के आग्रह पर इस लेख को मैं एक बार फिर दे रहा हूँ - दादा के निधन के बाद बनी स्थितियोंनुसार संशोधन, सम्पादन सहित।)

ब्लाग की दुनिया में घूमते -घूमते आज श्री सुरेश चिपलूनकर के महाजाल की सैर की तो 2 मई 2007 की पोस्ट पर नजर ठहर गई। ‘बालकवि बैरागी: तू चन्दा मैं चाँदनी’ शीर्षक ने ही जकड़ लिया। सुरेशजी ने गीत पर, गीत के समान ही सुन्दर शास्त्रोक्त सांगोपांग वर्णन किया है। कह सकते हैं कि लताजी, जयदेवजी और दादा बालकविजी की ओर से यदि कोई कसर रह गई होगी तो चिपलूनकरजी ने वह पूरी कर दी। 

पोस्ट पढते-पढते, ऊँट के पास बैठे वहीदा रहमान, सुनीलदत्त और इन दोनों सम्पूर्ण कलाकारों को अपने में समेटता हुआ अनन्त रेगिस्तान आँखों पर अपना साम्राज्य कायम करने लगा। गीत कानों में बजने लगा और उसके मादक प्रभाव से आँखें मुँदने लगीं। पूरा गीत मानो कायनात को मालवा के अफीम के खेत में बदल रहा हो जिसमें अफीम के लाल, बैंगनी, सफेद फूलों से लिपटे डोड़े (ओपियम केप्सूल) एक ताल में नाच रहे हों और अफीम की आदिम मादक गन्ध का ऐसा समन्दर बना रहा हो जिससे बाहर आने को जी ही नहीं करे। और जब गीत समाप्त हो रहा होता है तो स्थिति नाड़ी जाग्रत होने वाली या फिर शवासन वाली आ जाती है। ‘रेशमा और शेरा’ से पहले भी रेगिस्तान अनेक फिल्मों में छायांकित किया जाता रहा है लेकिन इस फिल्म का रेगिस्तान ‘निर्जीव’ नहीं था। इसकी बालू का कण-कण स्पन्दित होता लगता था। ‘धर्मयुग’ के फिल्म समीक्षक ने इस रेगिस्तान को ‘रेशमा और शेरा’ का अनूठा जीवन्त पात्र करार दिया था।


रेशमा और शेरा में वहीदा रहमान और सुनील दत्‍त एक भावपूर्ण मुद्रा में

लेकिन मुझे केवल यही सब याद नहीं आया । कई सारी वे बातें याद आ गईं जिन्हें इस समय उजागर करते हुए रोमांच हो रहा है, फुरहरी छूट रही है। यह 1969-70 की बात है। तब दादा, मध्य प्रदेश के सूचना प्रकाशन राज्य मन्त्री थे। पण्डित श्यामाचरण शुक्ल (जिन्हें दादा ने ‘श्यामा भैया’ का लोक सम्बोधन दिया था) मुख्यमन्त्री थे। दादा का निवास भोपाल में, शाहजहाँनाबाद स्थित पुतलीघर बंगले में था। ‘रेशमा और शेरा’ के गीत लिखवाने के लिए जयदेवजी वहीं आए थे और कच्चा-पक्का एक सप्ताह भोपाल रहे थे। जयदेवजी को तो यही काम था लेकिन दादा के पास तो राज-काज का झंझट भी था। उसी में से समय चुरा कर दादा, जयदेवजी के पास बैठते, उनकी बातें सुनते, सिचुएशन सुनते, अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत करते। जयदेवजी ने पहली ही बैठक में स्पष्ट कर दिया था कि वे धुन पर गीत नहीं लिखवाएँगे, गीत के अनुसार धुन तैयार करेंगे। किसी भी रचनाकार के लिए यह स्थिति मुँह माँगी मुराद से कम नहीं होती। जयदेवजी का एक ही आग्रह था - मैं गीत लेकर जाऊँगा। यही हुआ भी।


जयदेवजी


जयदेवजी चले गए। फिल्मों में गीत लिखने का दादा का यह कोई पहला मौका नहीं था। फिल्मी दुनिया के तौर तरीके और फिल्म निर्माण की गति से वे भली भाँति वाकिफ थे। सो, जयदेवजी के जाने के बाद उत्कण्ठा तो बराबर बनी रही लेकिन वह बेचैनी में नहीं बदली। राजनीति, दादा को वैसे भी सर उठाने की फुरसत कम ही देती थी। वे भी खुद को साबित करने के लिए अतिरिक्त परिश्रम करते थे। उन्हें बडी विचित्र स्थितियों का सामना करना पडता था। वे राजनेताओं के बीच कवि होते थे और कवियों के बीच राजनेता। दादा इस स्थिति से तनिक भी नहीं घबराते बल्कि अपने मस्त मौला स्वभाव के अनुसार आसमान फाड़ ठहाके लगा कर इस विसंगति को कुशल नट की भाँति सुन्दरता से निभाते और सबकी मुक्त कण्ठ प्रशंसा पाते  राजनीति में अपने आप को साबित करने के लिए दादा जितना परिश्रम करते उससे अधिक परिश्रम वे ‘राजनीति के राज रोग’ से खुद को बचाने के लिए करते। विसंगतियों की इस विकट साधना के बीच समाचार सूत्रों से और फिल्मी अखबारों/पत्र-पत्रिकाओं से ‘रेशमा और शेरा’ की प्रगति सूचनाएँ मिलती रहती थीं।

सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि एक सवेरे वह हो गया जिसे दादा न तो कभी भूल पाए और न ही कभी भूलना चाहा। मन्त्री रहते हुए भी दादा ने मन्त्री पद और मन्त्रीपन को खुद पर हावी नहीं होने दिया। वे यथासम्भव सवेरे जल्दी उठ जाते अपने विधान सभा क्षेत्र से आने वाले कार्यकर्ताओं/मतदाताओं की अगवानी करते, उन्हें अतिथिशाला में ठहराते, उनकी चाय-पानी की व्यवस्था करते। मन्त्रियों के टेलीफोन सूरज उगने से पहले ही घनघनाते लगते हैं। ऐसे टेलीफोनों को दादा खुद ही अटेण्ड किया करते थे। सामने वाले की ‘हैलो’ के जवाब में जब दादा कहते - ‘बोलिए! मैं बैरागी बोल रहा हूँ।’ तो सामने वाला विश्वास ही नहीं करता। सब यही मानते कि मन्त्रीजी के कर्मचारी तो अभी आए नहीं होंगे, कोई छोटा-मोटा कर्मचारी बैरागी बन कर बात कर रहा है। ऐसे लोग फौरन डाँटते और कहते - ‘अपनी औकात में रहो और मन्त्रीजी को फोन दो।’ दादा ऐसे क्षणों का भरपूर आनन्द लेते और कहते - ‘भैया! मानो न मानो, मैं बैरागी ही बोल रहा हूँ।’ सुन कर सामने वाले की क्या दशा होती होगी, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

ऐसा ही एक फोन ‘उस’ सवेरे आया। दादा ने फोन उठाया। उधर से नारी स्वर आया - ‘हैलो! बैरागीजी के बंगले से बोल रहे हैं?’ दादा उठे-उठे ही थे। लेकिन ऐसा भी नहीं कि नींद के कब्जे में हों। खुमारी थी जरूर लेकिन यह ‘हैलो’ कानो में क्या पड़ी, मानों सम्पूर्ण जगत की चेतना कान के रास्ते शरीर में संचारित हो गई हो - बिलकुल बिजली की तरह। निमिष मात्र में। पता नहीं, दादा ने उत्तर दिया था या वे हल्के से चित्कारे थे - ‘अरे ! दीदी आप!’ उधर से लताजी बोल रही थीं। उस एक क्षण का वर्णन कर पाना मेरे बस में बिलकुल ही नहीं है। दादा होते तो कहता कि आप दादा से ही पूछिएगा और मुमकिन हो तो किसी सार्वजनिक समारोह में पूछिएगा। सब सुनने वालों का भला होगा। ‘कहन’ के मामले में दादा अद्भुत और बेमिसाल थे। जब वे कोई घटना कह रहे होते थे तो सुनने वाले उस घटना के एक-एक ‘डिटेल’ को ‘माइक्रो लेवल’ तक देख रहा होता था। 

सो, उस अविस्मरणीय पल को दादा ने जिस तरह जीया वह कुछ इस तरह था - ‘लताजी की आवाज मानो कानों में मंगल प्रभातियाँ गा रही थीं या फिर सूरज की अगवानी में भैरवी गाई जा रही थी। वे बोल रही थीं लेकिन मैं उनके एक एक शब्द को देख पा रहा था, मानो बाल रवि की अगवानी में शहद के फूलों की सुनहरी घण्टियाँ प्रार्थनारत हो गई हैं।’ दादा को वह एक पल एक जीवन जी लेने के बराबर लगा।

अभिवादन के शिष्टाचार के बाद सम्वाद शुरु हुआ तो लताजी ने जो कुछ कहा वह किसी भी रचनाकार की कलम के लिए अलौकिक पुरस्कार से कम नहीं हो सकता। लताजी ने कुछ इस तरह से कहा - ‘कल पापाजी (जयदेवजी को फिल्मोद्योग में इसी सम्बोधन से पुकारा जाता था) ने मुझसे एक गीत रेकार्ड कराया है - रेशमा और शेरा के लिए। गीत तो मैं बहुत सारे गाती हूँ लेकिन मुझे अच्छे लगने वाले गीत बहुत ही कम होते हैं। मुझे वह गीत बहुत अच्छा लगा। इतना अच्छा लगा कि गीतकार को बधाई दिए बिना चौन नहीं मिल रहा था। पापाजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि गीत आपका है। उन्हीं से आपका नम्बर लिया। इतना अच्छा गीत लिखने के लिए आपको बधाई। ऐसे ही गीत लिखते रहिएगा।’ यह गीत था - तू चन्दा मैं चाँदनी।

लताजी ने ठीक-ठीक क्या कहा था, यह तो दादा ही बता सकते थे क्यों कि मैंने तो उनसे सुनी-सुनाई लिख दी, वह भी इतने बरसों बाद। सम्भव है, कई पाठकों को यह किस्सा सुनकर रोमांच हो आए। लेकिन यह तो कुछ भी नहीं है। इस रोमांच का वास्तविक आनन्द तो दादा से सुनने पर ही मिल सकता था क्यों कि मालवा में कहावत है कि आम की भूख इमली से नहीं जाती।

सो, फिलहाल आप इस इमली से काम चलाइए। लेकिन इस गीत से जुड़ा यह एक ही संस्मरण नहीं है। एक और किस्सा है। 

अगली कड़ी में वही किस्सा।
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राजनीति में सीनाजोरी तो गहना है


इन दिनों, राजस्थान के पूर्व मुख्य मन्त्री अशोक गेहलोत का एक वीडियो फेस बुक और वाट्स एप पर छाया हुआ है जिसमें गेहलोत कहते हुए नजर आ रहे हैं कि बिजली प्राप्त करने के लिए बनाए बाँधों का पानी सिंचाई के काम नहीं आएगा क्योंकि उसमें से ‘पॉवर’ तो रहेगा ही नहीं। गेहलोत की खूब हँसी उड़ाई जा रही है और गेहलोत के बहाने उनकी पार्टी और पार्टी नेताओं की खिल्ली उड़ाई जा रही है।

यह सब देखकर मुझे शुरु में ताज्जुब हुआ। क्योंकि हमारे यहाँ कहावत है कि कहनेवाला भले ही मूर्ख हो लेकिन सुननेवाला तो समझदार होता है। लेकिन जब जानबूझकर, दुराशयतापूर्वक, सोद्देश्य कोई झूठ परोसा जाता है तो फिर ऐसी कहावतें निरर्थक हो जाती हैं। तब कहनेवाला तो समझदार होता है लेकिन सुननेवाला मूर्ख हो जाता है। मजे की बात यह है कि झूठ फैलानेवाले भली प्रकार जानते हैं कि उनके झूठ का जीवन पानी के बुलबुले की तरह है। लेकिन जब दुष्प्रचार किसी झूठ को अभियान के तहत, सुनियोजित रूप से चलाया जाता है तो यह सीनाजोरी की गिनती में आता है। इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सीनाजोरी अनजाने में नहीं की गई। 

मूल वीडियो में अशोक गेहलोत कहते नजर आते हैं कि भाखड़ा बाँध के सन्दर्भ में तत्कालीन जनसंघ के लोग नेहरू को गालियाँ देते हुए यह बात कहते थे। गेहलोत की इस बात का मैं गवाह हूँ। फर्क इतना ही है कि वे भाखड़ा नागल बाँध का हवाला दे रहे हैं और मैंने इसे, मन्दसौर जिले के जनसंघियों से गाँधी सागर बाँध के सन्दर्भ में सुना था। इस बाँध का शिलान्यास नेहरूजी ने सात मार्च 1954 में किया था। मैं अपना माँ के साथ उस दिन वहाँ गया था। उस समय मैं सात बरस का था। इस बाँध से देश को, मुख्यतः मध्य प्रदेश और राजस्थान को बिजली और सिंचाई के लिए पानी मिलनेवाला था।  
गाँधी सागर बाँध का विहंगम दृष्य

गाँधी सागर बाँध पर स्थापित चम्बल की मूर्ति। बच्‍चे मध्य प्रदेश और राजस्थान हैं।

जनसंघ के लोग नितान्त राजनीतिक कारणों से इस बात का विरोध आम सभाओं में, अपने भाषण में भी करते थे और वही बात कहते थे जो अशोक गेहलोत को अपनी ओर से कहते बताए जा रहे हैं - बिजली निकल गई तो पानी में पॉवर नहीं रह जाएगा। 

लेकिन बात केवल ‘बिना पॉवरवाले पानी’ तक ही सीमित नहीं थी। वोट पाने के लिए तब विद्युतीकरण का भी विरोध किया जाताथा। 

मनासा विधान सभा क्षेत्र में एक पठारी इलाका है जिसे ‘कंजार्ड़ा पठार’ के नाम से जाना जाता है। मनासा से कंजार्ड़ा की दूरी करीब पचीस किलो मीटर होगी। इसके आसपास चौकड़ी, खेड़ली, बेसदा जैसे कुछ गाँव है। यह 1962 से 1967 के बीच की बात है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री सुन्दरलालजी पटवा तब मनासा के विधायक थे। 

कंजार्ड़ा पठार के लोग विद्युतीकरण की माँग करते थे। जवाब में लोगों को समझाया जाता था कि बिजली के करण्ट से लोग मर जाएँगे। तब जनसंघ के लोग मनासा-कंजार्ड़ा सड़क का भी विरोध करते थे। कहते थे कि सड़क बन जाने पर शहर के लोगों का गाँव में आना-जाना बढ़ जाएगा। वे शहरी लोग गाँव की बहन-बेटियों को छेड़ेंगे। सड़क की वजह से गाँव की समृद्धि शहरों में चली जाएगी। मेरी इस बात के गवाह अब भी उस इलाके में कुछ लोग मिल ही जाएँगे। 

तब कंजार्ड़ा पठार पर पटवाजी और जनसंघ की तूती बोलती थी। पूरा इलाका मानो पटवाजी और जनसंघ की जागीर था। वहाँ के गाँवों में काँग्रेसी घुस नहीं पाते थे। मनासा विधान सभा क्षेत्र के मतदान केन्द्रों का क्रमांकन इसी इलाके से शुरु होता था और मतगणना के परिणाम मतदान केन्द्रवार घोषित होते थे। इन मतदान केन्द्रों पर काँग्रेस को मिलनेवाले मत दो अंकों में भी नहीं होते थे। मतगणना परिणामों की घोषणा की शुरुआत सदैव काँग्रेस की पराजय से  होती थी। 

लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि अपने गाँव में स्कूल खुलवाने की बात को लेकर चौकड़ी के सरपंच नानालाल धाकड़ (लोग उन्हें ‘नाना पटेल’ कहते थे।) पटवाजी से नाराज हो गए। वे आधी रात को, सदलबल दादा के पास आए। (दिन के उजाले में किसी काँग्रेसी के पास जाने की हिम्मत वे नहीं जुटा पाए।) दादा से सारी बात कही। दादा उन्हें लेकर भोपाल गए। द्वारका प्रसादजी मिश्र से मिलवाया। मिश्रजी ने कहा कि वे लोग यदि दादा की बात मानेंगे तो स्कूल खुल जाएगा। नाना पटेल ने वादा किया - ‘या नान्या की जिबान हे। बेरागीजी ने जीतई ने लऊँगा।’ (यह नानालाल की जबान है। बैरागीजी को जितवा कर लाऊँगा।) 

1967 के चुनाव में मिश्राजी ने पटवाजी के सामने दादा को मनासा से उम्मीदवार बनाया। मतगणना के नतीजे आए तो कंजार्ड़ा पठार के आँकड़े एकदम उल्टे हो गए। कंजार्ड़ा पठार ने पटवाजी से पीठ फेर ली। पटवाजी दस वर्ष से विधायक थे। वे हार गए। तकदीर ने उनके साथ नाइंसाफी यह की कि मन्दसौर जिले की सात सीटों में से हारनेवाले वे अकेले जनसंघी उम्मीदवार थे। इस नाइंसाफी की कसक तब कई गुना हो गई जब प्रदेश मे संविद सरकार बनी। पटवाजी यदि तब विधायक होते तो वे पहली ही किश्त में केबिनेट मन्त्री बनते।

मिश्राजी ने दादा को संसदीय सचिव बनाया। लेकिन किसी मुद्दे पर मिश्राजी और श्रीमती विजयाराजे सिन्धिया में ठन गई। फलस्वरूप काँग्रेस के तीस-पैंतीस विधायकों ने दलबदल किया और प्रदेश मे गोविन्द नारायण सिंह के नेतृत्व में संविद (संयुक्त विधायक दल) सरकार बनी। लेकिन यह सरकार दो साल भी नहीं चली। नई काँग्रेसी सरकार श्यामाचरण शुक्ला के नेतृत्व में बनी। शुक्लाजी ने दादा को राज्य मन्त्री बनाया।

दादा के राज्य मन्त्री बनने के बाद नाना पटेल की भावनानुसार स्कूल खुला। उसके बाद जल्दी ही कंजार्ड़ा को विद्युतीकृत करने की बात आई। कंजार्ड़ा का प्रतिनिधि मण्डल लेकर दादा श्यामाचरणजी से मिलने गए। वे दिल्ली के जाने के लिए हवाई अड्डे के लिए निकल चुके थे। दादा सबको लेकर वहाँ पहुँचे। विमान की सीढ़ियों पर बात हुई। विद्युतीकरण के आदेश के लिए उन्होंने कागज माँगा। किसी के पास नहीं था। प्रतिनिधिमण्डल में से किसी एक ने केवेण्डर सिगरेट का पाकेट निकाला और पाकेट के जिस हिस्से पर सिगरेटें रखी हुई थीं, वह आगे बढ़ा दिया। श्यामाचरणजी ने उसी के पीछे ‘कंजार्ड़ा की विद्युतीकरण योजना स्वीकार की जाती है।’ लिख कर दादा को थमा दिया।

लेकिन आदेश जितनी आसानी से मिला, विद्युतीकरण उतना आसान नहीं था। तब मनासा में श्री किशोर कुमार सक्सेना म.प्र.वि.मं. के सहायक यन्त्री थे। दादा ने यह काम उन्हें सौंपा। तब मनासा-कंजार्ड़ा के बीच सड़क नहीं थी। सक्सेनाजी ने समस्या बताई - पचीस किलो मीटर दूर तक खम्भे कैसे पहुँचाएँ? बात कंजार्ड़ावालों तक पहुँची तो खम्भे पहुँचाने की जिम्मेदारी उन्होंने ले ली। कंजार्ड़ा के लोगों ने उम्मीद से बहुत कम समय में सक्सेनाजी के बताए मुताबिक खम्भे डलवा दिए।

लेकिन दुष्प्रचार की मुहीम थमी नहीं थी। खम्भे गाड़ने के लिए गड्ढे खुदना शुरु हुए ही थे कि जनसंघी खेमे से बात चली - ‘गाँव को कीला (मन्त्रबिद्ध किया) जा रहा है। गाँव की लक्ष्मी रूठ जाएगी।’ इस बात से पार पाने में सबको पसीना आ गया। लेकिन सक्सेनाजी ने काम रुकने नहीं दिया। उन्होंने और उनके लोगों ने दिन को दिन नहीं समझा और रात को रात नहीं। जो काम कम से कम छः महीनों में होता, वह तीन महीनों से कम में कर दिया।

वह सन् 1970 था या 1971, यह तो मुझे याद नहीं। लेकिन तारीख मुझे खूब अच्छी तरह याद है - 26 जनवरी। उस दिन कंजार्ड़ा में बिजली का बटन दबना था। मैं उस समारोह का प्रत्यक्षदर्शी हूँ। कंजार्ड़ा गाँव के बाहर बने, हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्रांगण में समारोह हुआ था। केवल कंजार्ड़ा गाँव के ही नहीं, आसपास के दसियों गाँवों के लोग वहाँ मौजूद थे। रंग-बिरंगी पगड़ियों और लुगड़ों से पूरा परिसर इन्द्रधनुष को टक्कर दे रहा था। औरतें मंगल बधावे गा रही थीं। हर कोई उत्सुक और विगलित था। दादा मुख्यतः मौजूद थे। जैसे ही बटन दबा, मानो वहाँ मौजूद तमाम लोगों में करण्ट दौड़ गया। ‘जय हो’ और ‘जिन्दाबाद’ के नारों ने मानो आसमान फोड़ दिया। हर कोई एक दूसरे को बाँहों में भर बधाइयाँ दे रहा था। औरतें दादा की बलैयाँ ले रही थीं और दादा धार-धार रोए जा रहे थे।

उस समारोह में दादा ने सक्सेनाजी सहित, विद्युत मण्डल के तमाम लोगों को कंजार्ड़ा और आसपास के गाँवों की ओर से साफे बँधवा कर सम्मानित करवाया। समारोह के लिए जितनी मालाएँ आई थीं, दादा ने वे सब की सब सक्सेनाजी को पहनवाईं। गाँव लोगों ने सक्सेनाजी को नोटों की माला पहनाई। माला में पिरोए नोटों की रकम पचास रुपये थी। उन दिनों यह बड़ी रकम थी। मजदूर को सवा रुपया मजदूरी मिलती थी। सक्सेनाजी ने वह रकम वहीं की वहीं अपने साथी श्रमिकों मे बँटवा दी। हर कोई विगलित, रोमांचित और पुलकित था। वैसा लोकोत्सव मैंने उसके बाद से अब तक कहीं नहीं देखा। सक्सेनाजी समारोह का वर्णन आज भी इस तरह करते हैं मानो वे अभी भी कंजार्ड़ा में, समारोह में ही हों। वे भोपाल में बस गए हैं। जिसे इस बारे में और कुछ जानने की उत्सुकता हो वह उनसे मोबाइल नम्बर 99774 07468 पर उनसे बात कर ले।


किशोर कुमारजी सक्सेना

यह किस्सा मुझे अशोक गेहलोत के वीडियो ने याद दिला दिया। भाई लोग जस के तस बने हुए हैं। तनिक भी नहीं बदले। आगे भी शायद ही बदलें। 

राजनीति में सीनाजोरी गहना बन चुकी है।
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एसपी, कलेक्टरों के मिजाज और तेवर बदल दिए ‘गाँव बन्दी’ ने

किसानों को चाहिए कि वे मुख्य मन्त्री शिवराज सिंह चौहान का नागरिक अभिनन्दन करें। ‘गाँव बन्दी’ आन्दोलन को असफल करने की कोशिशें करते-करते शिवराज ने आन्दोलन को सफलता और किसानों की माँगों और  आन्दोलन को जायज और वाजिब होने का प्रमाण-पत्र दे दिया है।

कुशल रणनीतिकार कहते हैं कि किसी को असफल करना हो तो उसकी उपेक्षा कर दो। लेकिन शिवराज ने किसान-आन्दोलन को सर्वोच्च महत्व दे दिया। कुछ इस तरह मानो यह उनके जीवन-मरण का सवाल हो। यही किसानों की सफलता, किसानों की जीत है और इसीलिए उन्होंने शिवराज का नागरिक अभिनन्दन करना चाहिए।

आन्दोलन को असफल करने के लिए शिवराज ने क्या-क्या नहीं किया? समूची सरकारी मशीनरी झोंक दी। रतलाम जिले को आधार बनाऊँ तो मान लीजिए कि लगभग 25 मई से सरकारी दफ्तरों में कोई काम नहीं हो रहा है। दफ्तर चाहे नायब तहसीलदार का हो या एस पी, कलेक्टर का। सब जगह ‘गाँव बन्दी’ आन्दोलन पसरा हुआ है। इसके समानान्तर सच यह है कि जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तब किसानों का ‘गाँव बन्दी’ आन्दोलन लगभग असफल ही हो गया है। इसका असर अब तो कहने को भी नजर नहीं आ रहा।

लेकिन इस आन्दोलन ने सरकारी अमले का मिजाज और तेवर बदल दिए।  जिस एस पी, कलेेक्टर से मिलने के लिए पर्ची भेज कर घण्टों उबाऊ प्रतीक्षा करनी पड़ती थी, जन सुनवाई में अपना नम्बर लगाने के लिए एडीएम/एसडीएम के दफ्तर के बाहर सुबह आठ बजे से ही लाइन लग जाती थी, वह एस पी, कलेक्टर, वह एडीएम/एसडीएम गाँव-गाँव की धूल छान रहे हैं। किसानों के दरवाजे खटखटा रहे हैं। रास्ते आते-जाते किसान से आगे रहकर राम-राम, नमस्कार कर रहे हैं। थाने का पूरा अमला किसानों से इस तरह पेश आ रहा है मानो लड़कीवाले बारातियों की पूछ-परख कर रहे हों। जेठ महीने की 44/46 डिग्री गर्मी में करनी पड़ रही पदयात्रा के कारण पसीने ने  वर्दी का कलफ गला दिया है। न आवाज कड़क रही न वर्दी। 

शाम होने पर जो अफसर बंगलों का रुख करते थे वे अब सूरज ढलते गाँवों में पहुँच रहे हैं। लोगों को रोक-रोक कर पूछते हैं - ‘कोई तकलीफ तो नहीं? हो तो बेहिचक बताना।’ अमले के कुछ लोग तो साथ हैं ही, कुछ गाँववालों को इकट्ठा करते हैं। दो-दो टीमें बनाते हैं। खेल शुरु हो जाता है। कोई गाँववालों के साथ कबड्डी खेल रहा है तो कोई खो-खो। कोई रस्साकशी में जोर लगा रहा है तो कोई वॉलीबाल में हुनर दिखा रहा है। खेल खतम होने के बाद घर नहीं लौटते। कहीं मैदान में तो कहीं किसी ओटले पर तो कहीं किसी मन्दिर के चबूतरे पर चौपाल जमा लेते हैं। गाँववालों की तारीफ करते न तो रुकते हैं न ही थकते। गाँव में शान्ति बनाए रखने के लिए किसानों को मिठाई खिलाते हैं। लेकिन अपना काम नहीं भूलते। धीरे से कहते हैं - ‘देखना! कोई ऐसा काम मत कर लेना कि बाद में तकलीफ उठानी पड़ जाए।’ सुनकर गाँववालों के चेहरों बदल जाते हैं। अफसरों की आवाज में उन्हें पुलिस के डण्डों और दफ्तरी कर्मचारियों की डाँट-डपट सुनाई देने लगती है। मिठाई में जायफल का स्वाद आने लगता है। समझ जाते हैं - ‘दोस्त-खिलाड़ी के भेस में हुक्मरान आया है।’ वे सहम जाते हैं। जबानें हिलना बन्द कर देती हैं। सिर हिलने लगते हैं। चुप्पी छा जाती है। लोग, अफसरों के जाने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। वे चले भी जाते हैं। उन्हें तो किसानों से भी ज्यादा जल्दी है।

लेकिन हुक्मरान यदि लोक-मित्र बन जाएँ तो फिर सरकार का जलवा नहीं रह पाता। इसलिए हुक्मरान अपना मूल चरित्र दिखाने का अवसर मिलते ही लपक लेते हैं। गाँवों के सारे रास्तों पर पुलिस ने नाकाबन्दी कर रखी है। बाहर से आनेवाले प्रत्येक व्यक्ति का वीडियो लिया जा रहा है। आनेवाला सहम जाता है। अपना काम भूल कर दहशत में आ जाता है। हजारों लोगों से बॉण्ड भरवा लिए गए हैं। बॉण्ड में क्या लिखा है, कोई नहीं जानता। बस, यही जानता है कि पुलिस ने किसी कागज पर उससे दस्तखत कराए हैं। नींद उड़ादेने के लिए इतना ही काफी है। वह आन्दोलन भूल कर अपनी और अपने बाल-बच्चों की सुरक्षा की फिकर करने लगता है।

लेकिन जैसे ही हुक्मरान और उनके नुमाइन्दे पीठ फेरते हैं, किसान खुशियाँ प्रकट करने लगते हैं - “अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे। हमने शहर जाने से इंकार किया तो मालूम पड़ा कि किसान और किसान की ताकत क्या होती है। इनके दरवाजे जाओ तो सीधे मुँह बात नहीं करते। बात करना तो दूर, देखते भी नहीं। अब हमारे घर आकर ‘भैया-भैया’ कर रहे हैं।” केन्द्रीय कृषि मन्त्री कह रहे हैं - ‘करोड़ों किसानों में से दो-तीन हजार किसान आन्दोलन कर रहे हैं।  अखबारों में छपने के लिए ऐसा करना ही पड़ता है।’ लेकिन शिवराज सरकार का पूरा अमला केन्द्रीय कृषि मन्त्री को झूठा कह रहा है। 

6 जून 2017 को मन्दसौर जिले में पुलिस ने 6 किसानों को गोलियों से भून दिया था। उनकी पहली बरसी पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के नाम पर काँग्रेस ने, मन्दसौर जिले के पीपल्या मण्डी के पास खोखरा में बड़ी सभा की। राहुल गाँधी उसमें पहुँचे। रतलाम-पीपल्या मण्डी का, 103 किलो मीटर की फोर लेन सड़क पर जाम लग गया। इस सभा को ऐतिहासिक बनाने के लिए काँग्रेसियों अपनी जान झोंक दी। लेकिन शिवराज सरकार उससे अधिक जी-जान से इसे असफल करने में जुटी रही। कोशिश की गई कि लोग इस सभा में न पहुँचे। सूची बना ली गई कि कितनी बसों को विशेष परमिट जारी किए गए हैं। ऐसी सावधानी और कोशिश इस अंचल में इससे पहले किसी भी पार्टी के किसी भी आयोजन में नहीं देखी गई। लगा कि ‘वन-टू-वन’ की तर्ज पर एक-एक आदमी को रोकने की कोशिश की गई। बरखेड़ा पंथ का अभिषेक पाटीदार पुलिस गोलीबारी में मारा गया था। कोई पाँच महीने पहले सरकार ने उसके भाई सन्दीप को भानपुरा में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर नौकरी दी है। भानपुरा तहसील, गरोठ सब डिविजन में आती है। गरोठ के एसडीओ आर पी वर्मा ने सन्दीप को फोन पर कहा कि उसके परिजन राहुल गाँधी की सभा में न जाएँ। वर्ना उसकी नौकरी खतरे में आ जाएगी। आर पी वर्मा का कहना है कि उन्होंने किसी को  सभा में जाने से नहीं रोका। केवल पूछताछ की थी। लेकिन एक बड़ा अखबार कह रहा है कि उसके पास वर्मा की बातचीत की रेकार्डिंग है। एक मृतक के परिजन समाचार चैनल पर कहते नजर आए कि राहुल की सभा में न जाने के लिए एसडीओपी ने उन पर दबाव बनाया।

सरकार की इन कोशिशें और हरकतों ने एक ही बात साबित की - किसानों की माँगें और उनका आन्दोलन सही है। यदि किसान और उनकी बातें गलत होतीं तो शिवराज तथ्यों और आँकड़ों की बाढ़ ला देते। मृतक पूनमचन्द पाटीदार के ताऊ बालाराम पाटीदार ने कहा कि मुख्यमन्त्री मन्दसौर आए तो उन्हें बुलाया तक नहीं और जब वे खुद गए तो मिलने बुलाया नहीं। इन्होंने मिलने की कोशिश की तो धक्के मारकर  बाहर कर दिया। एक मृतक किसान के परिजनों ने कहा - ‘पैसे (एक करोड़ रुपये) तो मिल गए लेकिन न्याय अब तक नहीं मिला।’ शिवराज औढरदानी तो बन गए लेकिन न्यायी शासक नहीं बन पाए। इसीलिए वे और उनकी पूरी सरकार बदहवास है।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के एक नौजवान अधिकारी ने कहा - ‘बेहतर होता कि हम चुपचाप लोगों को आने-जाने देते। चेकिंग के नाम पर उन्हें रोकने की कोशिशें हमसे करवाई गईं। लेकिन हम एक चींटी को नहीं रोक पाए। बिना सरकारी मदद के इतनी भीड़ मैंने अपने सर्विस पीरीयड में पहली बार देखी।’

नीमच से फोन पर मेरे एक किसान मित्र ने कहा - ‘हर कोई जानता है कि राहुल सत्ता में नहीं है। वे तत्काल कुछ नहीं कर सकते। केवल ढाढस बँधा सकते हैं। यह भी सब जानते हैं कि नेता जितना कहता है, उतना कभी नहीं करता। फिर भी मृतकों के परिजन यदि घण्टों पहले पहुँच कर प्रतीक्षा करते हैं तो इसका एक ही मतलब होता है कि उनकी बात किसी ने सुनी नहीं। वे केवल अपने मन का गुबार निकालना चाहते थे। इसीलिए राहुल जब सामने आए तो उनसे लिपट कर रोने लगे। इन्हें शिवराज का काँधा मिल जाता तो ये राहुल के पास क्यों जाते?’ 
 6 जून 2017 को पुलिस गोली के शिकार घनश्याम धाकड़ के पिता दुर्गालाल के 
सामने राहुल पहुँचे तो वे राहुल के गले लग कर फफक-फफक कर रो पड़े। 
(चित्र - महेश नँदवाना की फेस बुक वाल से साभार।)   

किसान असंगठित होते हैं। उस पर पार्टी लाइन के चलते बड़ी संख्या में किसान इस आन्दोलन से स्वतः दूर हो गए हैं। इसके बावजूद यह आन्दोलन यदि शिवराज सरकार की नींद उड़ाए हुए है और सरकार असहाय, लाचार दशा में है और करने के नाम पर विभाजित किसानों की लकीर को छोटी करने में पसीना बहा रही है तो इसका एक ही मतलब है - यह किसानों की जीत है। 

हमारा लोक मानस ‘उदार हृदय, विशालमना’ है। क्षमा करना उसका संस्कार और भूल जाना उसका स्वभाव है। शिवराज का बैर काँग्रेस से है, किसानों से नहीं। वे काँग्रेस का गुस्सा किसानों पर नहीं निकालें। प्रतिशोधी मुद्रा छोड़ कर ‘लोक मित्र’ बनने पर सोचें। वे घाटे में नहीं रहेंगे। अजातशत्रु हो जाएँगे।   
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दैनिक 'सुबह सवेरे', भोपाल, 07 जून  2018

डीआरएम के पाँच रुपये

रतलाम रेल्वे स्टेशन पर दुपहिया वाहनों की पार्किंग व्यवस्था दो जगहों पर है। एक तो पुराने जमाने से चली आ रही पुराने शेड की और दूसरी, गए कुछ वर्षों पहले शुरु हुई है। यह व्यवस्था, स्टेशन के बाहर, खुले में है। इसे प्रीमीयम पार्किंग का नाम दिया हुआ है। दोनों पार्किंगों पर भुगतान पहले करना पड़ता है - वाहन रखते समय। इस प्रीमीयम पार्किंग के काउण्टरवाले से कुछ दिनों पहले मेरा सम्वाद हुआ। सम्वाद रोचक और सूचनादायी लगा। इसीलिए यहाँ दे रहा हूँ।

- पार्किंग का कितना पैसा लगता है?

- दस रुपये।

- दस रुपये? यह तो बहुत ज्यादा है! पासवाले पार्किंग पर तो पाँच रुपये ही लगता है?

- वहाँ का पता नहीं। यहाँ दस रुपये लगता है। प्रीमीयम पार्किंग है।

- इस प्रीमीयम पार्किंग में क्या खास है? वहाँ तो गाड़ियाँ शेड में रखी जाती हैं। यहाँ तो खुले में रखी जाती हैं। इसमें क्या प्रीमीयम बात हुई?

- यही तो प्रीमीयम पार्किंग है।

- लेकिन पार्किंग चार्ज कहीं भी लिखा हुआ नहीं है। न तो कोई बोर्ड लगा है न ही तुम जो स्लिप दे रहे हो उस पर लिखा हुआ है।

- हाँ। कहीं लिखा हुआ नहीं है। मैं कह रहा हूँ वही फायनल है। दस रुपये।

- यह तो गलत बात है!

- गलत है, तो है। चार्ज तो दस रुपये ही है।

- तो एक काम करो। मुझे जो स्लिप दी है उस पर लिख दो - पार्किंग चार्ज दस रुपये।

- नहीं लिखूँगा।

- ऐसे कैसे? जो पैसा ले रहे हो वह कहीं तो लिखा हुआ नजर आना चाहिए! आना चाहिए कि नहीं?

- हाँ। आना चाहिए। लेकिन यहाँ नहीं चलता।

- ये क्या बात हुई? तुम भले ही बीस रुपये लो। लेकिन देनेवाले को मालूम तो होना चाहिए कि उससे कितना पैसा लिया गया है। 

- आप चाहे जो कहो। यहाँ तो ऐसा ही चल रहा है और ऐसा ही चलेगा।

- मैं डीआरएम से शिकायत करूँगा।

- आप एक काम करो। अपना काम निपटा कर आओ। फिर बात करेंगे।

मैं अपना काम निपटा कर लौटा। उसने मेरी स्लिप ली। काउण्टर के पटिए पर रखे सिक्कों में से पाँच का सिक्का उठा मेरी ओर बढ़ाया। मैंने हाथ नहीं बढ़ाया। इसके बाद हमारा सम्वाद कुछ इस तरह हुआ -

- ये आपके पाँच रुपये वापस।

- क्यों? वापस क्यों? तुमने तो चार्ज दस रुपये बताया था?

- हाँ। बताया था। वो गलत है। चार्ज पाँच रुपये ही है।

- तो फिर तुम दस रुपये क्यों माँगते हो और लेते हो?

- कहना पड़ता है और लेना पड़ता है।

- क्यों? क्यों कहना और लेना पड़ता है?

- ये पाँच रुपये डीआरएम के हैं।

- क्या? क्या कहा तुमने? पाँच रुपये डीआरएम के हैं?

- हाँ। ये पाँच रुपये डीआरएम के हैं।

- डीआरएम को पता है कि तुम उनके नाम पर ये पाँच रुपये ले रहे हो?

- हाँ। उनको पता है। उनको ही क्यों? नीचे से ऊपर तक, सबको पता है।

- याने कि तुम्हें पाँच रुपये ही मिलते हैं?

- हाँ। मुझे तो पाँच रुपये ही मिलते हैं। बाकी पाँच डीआरएम को जाते हैं।

- तो अभी जो तुम मुझे पाँच रुपये लौटा रहे हो वो डीआरएम के पाँच रुपये हैं?

- हाँ। वो डीआरएम के पाँच रुपये हैं।

- तो ये पाँच रुपये तुम अपनी जेब से डीआरएम को दोगे?

- नहीं! दो-चार दिन में आपके जैसा शिकायत करने की बात करनेवाला ग्राहक आ जाता है तो उसे दे देता हूँ। इतना एडजस्टमेण्ट तो चलता है। यह भी सब जानते हैं।

- तो यार! जब तुम्हें तुम्हारे पाँच रुपये ही मिलते हैं तो ये दस रुपये लेने की बदनामी और रिस्क क्यों लेते हो?

- करना पड़ता है। मना कर दूँगा तो मेरे पाँच रुपये भी नहीं मिलेंगे। मेरा ठेका केंसल हो जाएगा।

इसके बाद पूछने के लिए कुछ भी बाकी नहीं रह गया था। मैंने अपने पाँच रुपये लिए और निकल आया।

सोच रहा हूँ कि मैंने अपना हक बचाया या डीआरएम के हक पर डाका डाला?

चित्र की इबारत ध्यान से पढ़िए। सज्जन व्यक्ति का परिचय देने से मना किया गया है। दुर्जन का परिचय चलेगा। चित्र पुराना है लेकिन है रतलाम रेल्वे स्टेशन के इसी प्रीमीयम पार्किंग स्टैण्ड का।

उनका नामकरण मेरे सामने हुआ

(दादा श्री बालकवि बैरागी के आकस्मिक निधनोपरान्त शोक प्रकट करनेवालों का सैलाब उमड़ पड़ा। उन्हें चाहने-जाननेवाले पूरे तेरह दिनों तक लगातार आते रहे। अब भी आ रहे हैं - मनासा में भी और मेरे यहाँ, रतलाम में भी। अनेक ऐसे थे जो हम परिजनों में से किसी को नहीं जानते थे और न ही हम परिजन उन्हें। इस आवगमन में दादा से जुड़ी कुछ ऐसी बातें सामने आईं जो जानकारियाँ बढ़ानेवाली तथ्य भी थीं और दादा के व्यक्तित्व के अनजान-अनछुए पहलुओं को उजागर करनेवाली भी। ऐसी ही कुछ बातों का दस्तावेजीकरण करने के लिहाज से मैं उन्हें लिख रहा हूँ ताकि कभी, किसी जिज्ञासु के लिए उपयोगी हो सकें।)


बरसों बाद उन्हें देखा तो पहचान नहीं पाया। समय ने कुछ ज्यादा ही असर दिखाया निवास दादा पर। उनका पूरा नाम श्री श्रीनिवास बसेर है लेकिन हम उन्हें निवासजी या निवास दादा के नाम से ही जानते-पुकारते हैं। मेरे मित्र गोपाल बसेर और महेश बसेर के बड़े भाई हैं। इनके एक छोटे भाई और थे - विश्वनाथजी बसेर। हम उन्हें विशु दादा कहते थे। उनकी लम्बी-घनी मूँछें उन्हें विशिष्ट पहचान देती थीं। मैं गाहे-बगाहे उनकी मूँछों पर हाथ फेरने का सुख ले लिया करता था। उन्हें भी इसमें मजा आता था।

निवास दादा आए तो दादा की बातें करते-करते अतीत में खो गए। यह तो होना ही था। बोले - “मैं उनसे पाँच-छः साल छोटा हूँ। लेकिन हमारी दोस्ती थी। हम गुलाम भारत में जी रहे थे लेकिन आजादी-वाजादी जैसी बातों का मतलब नहीं समझते थे। मनासा में एक ‘अन्याय दमणी सेवादल’ (‘अन्याय दमणी’ याने ‘अन्याय दमनी’ याने अन्याय का दमन करनेवाला। मालवी बोली के प्रभाव से ‘दमनी’, ‘दमणी’ हो गया।) चलता था। गाँव के अनेक बच्चे उसमें जाते थे। हम दोनों भी जाते थे।”

निवास दादा के सामने बोलने या उनसे पूछने के लिए हमारे पास कुछ नहीं था। वे कहे जा रहे थे और हम सुने जा रहे थे। वे एक के बाद एक बातें बताते जा रहे थे। इसी क्रम में बोले - ‘काटजू सा’ब ने उनका नाम मेरे सामने रखा था। मैं मौजूद था उस वकत।’ यह बात मेरे काम की थी। मैंने कहा - ‘दादा! जरा खुल कर पूरी बात बताओ।’ 

निवास दादा उत्साहित हो गए।  उन्हें कुछ याद करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। जैसे सब कुछ उन्हें सामने नजर आ रहा हो और वे ‘आँखों देखा हाल’ सुना रहे हों। बोले - “यह सम्वत 2008 की बात है। मेरी उमर चौदह बरस की थी। काटजू सा’ब दिल्ली सरकार में मन्त्री थे। वे दौरे पर मनासा आए थे। काँग्रेस ने उनकी सभा कराई थी। यहाँ बाजार में अभी जहाँ रामदयाल मन्त्री की दुकान है, झँवरों की दुकान के सामने, वहाँ बड़ा तखत लगाया गया था जिस पर कुर्सी लगाई गई थी। काटजू सा’ब उसी कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने बैठे-बैठे ही भाषण दिया था। 

“सभा शुरु होने से पहले दादा ने स्वागत गीत गाया था। उसके बोल थे - ‘हुए बरबाद, कराया भारत को आजाद। राखो न राखो, तुम्हारी मरजी।’ गीत सुनकर काटजू सा’ब बहुत खुश हुए थे। जब उनसे भाषण देने के लिए कहा तो भाषण में सबसे पहले उन्होंने दादा के गीत की ही बात की। दादा की खूब तारीफ की और कहा कि यह लड़का आपके गाँव का ही है। अच्छे गीत लिखता और गाता है। इसका नाम तो मुझे नहीं मालूम लेकिन आप इसे बालकवि कहना। बस! उसी मिनिट से दादा बालकवि हो गए।”

मैंने पूछा - ‘दादा का नामकरण होने के बाद आपने उनसे
इस बारे में कभी बात की थी? कुछ बता सकते हैं कि दादा को कैसा लगा था?’ जवाब में निवास दादा ने कहा कि इस बारे में दादा से उनकी कोई बात नहीं हुई। लेकिन दादा को कोई फर्क पड़ा हो ऐसा नहीं लगा। सब कुछ रोज की तरह राजी-बाजी चलता रहा और लोगों ने दादा को बालकवि कहना शुरु कर दिया। 

दादा के नामकरण-संस्कार के किसी प्रत्यक्षदर्शी की ऐसी आधिकारिक बात मैंने पहली बार सुनी। यही बात मुझे तनिक महत्वपूर्ण लगी।
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अपने नामकरण को लेकर दादा यह बात बार-बार लिख और कह चुके हैं। लेकिन उनके चाहनेवाले फिर भी कभी-कभी अपनी इच्छा और सुविधा से उनके नामकरण की अपनी-अपनी कहानी बताते रहते हैं। गए दिनों ‘नईदुनिया’ ने छापा था कि यह नामकरण रामपुरा में आयोजित काँग्रेस सम्मेलन में हुआ था। काटजू सा’ब दादा का नाम भूल गए थे और गलती से उन्हें बालकवि सम्बोधित कर बैठे। किसी जमाने में विश्वसनीयता और आधिकारिता का पर्याय रहे ‘नईदुनिया’ में यह छपना मुझे विस्मित कर गया था। मैंने सम्पादकजी को पत्र भी लिखा था। लेकिन जैसा कि मैंने अनुमान लगाया था, पत्र नहीं छपा।
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मेवालाल और उसका प्याज

मेवालाल खुद को सचमुच में अन्नदाता मानने लगा था। शहर ने एक झटके में उसका मुगालता दूर कर दिया। उसे उसकी औकात बता दी।

यह कल, 31 मई 2018 गुरुवार को ही हुआ। रतलाम की मण्डी में।

मेवालाल रतलाम जिले के गाँव बरबोदना का रहनेवाला है। उसे मालूम हुआ कि रतलाम मण्डी में प्याज का भाव साढ़े तीन/चार रुपये किलो मिल रहा है। वह बड़ी आशा से अपना प्याज लेकर रतलाम मण्डी में आया। लेकिन उसकी आशाओं पर ओले गिर गए। उसे कहा गया कि उसे ढाई रुपये किलो के भाव पर अपना प्याज बेचना पड़ेगा। उसने एतराज जताया तो उन सबने पीठ फेर ली जो उसकी बेहतरी और उसकी हिफाजत की ग्यारण्टी देने के दावे करते हैं। उसे दो टूक जवाब मिला - ‘यही भाव मिलेगा। बेचना हो तो बेचो। नहीं तो अपना प्याज वापस ले जाओ।’ मन मसोस कर मेवालाल को अपना प्याज ढाई रुपये किलो ही बेचना पड़ा।

मेवालाल ऐसा अकेला किसान नहीं है। यहाँ हर किसान मेवालाल है। इन मेवालालों के साथ ऐसा ही हो रहा है। 

ये मेवालाल अपनी उपज मण्डी में लाते हैं। खरीदने के लिए व्यापारी इकट्ठे होते हैं। एक व्यापारी कहता है - ‘यह प्याज मैं खरीदूँगा।’ सुनकर बाकी व्यापारी लौटते तो नहीं लेकिन बोली भी नहीं लगाते। लगाते भी हैं तो इस तरह कि उसी व्यापारी की बोली अन्तिम हो जो खरीदने का इरादा जता चुका है। 

यह सब कुछ चौड़े-धाले हो रहा है। नेताओं, अफसरों की आँखों के सामने और नाक के नीचे। लेकिन मेवालालों की मदद कोई नहीं कर रहा। न तो मण्डी अध्यक्ष (जो खुद एक किसान है और किसानों के वोट लेकर अध्यक्ष बना है) न ही मण्डी सचिव और न ही कलेक्टर। कैसे करें बेचारे? सब कुछ कानून कायदे से तो हो रहा है! व्यापारी इकट्ठे हो रहे हैं। बोली लगा रहे हैं। सब कुछ किसान के सामने हो रहा है। सब कुछ पारदर्शी है। कहीं कोई बदमाशी, चोरी-चकारी नहीं। लेकिन फिर भी तमाम मेवालाल कहते हैं कि उनके साथ बेईमानी, अन्याय हो रहा है। उन पर जुल्म हो रहा है।

इन मेवालालों से पूछते हैं - ‘जब मनमाफिक भाव नहीं मिल रहा तो क्यों बेचते हो? वापस क्यों नहीं ले जाते?’ लगभग रोते-रोते ये मेवालाल कहते हैं - ‘बात तो सही कर रहे हो सा’ब। लेकिन वापस ले जाने पर और घाटा हो जाएगा। इस बार लाने-ले जाने का खर्चा माथे पड़ेगा और अगली बार लाने का खर्चा फिर झेलना पड़ेगा। और सा’ब! इस बात की क्या ग्यारण्टी कि अगली बार भी मनमाफिक भाव मिल जाएगा? इसलिए मजबूरी है सा’ब!’ हालत यह है कि जब किसी मेवालाल को मनमाफिक भाव नहीं मिलता तो वह घरवालों को फोन लगाता है - ‘भाव नहीं मिल रहा। क्या करूँ?’ लाचारी की चक्की में पिसा हुआ, घुटी-घुटी आवाज में जवाब आता है - ‘बेच दे भैया! मजबूरी है। जो भी भाव मिल, उस भाव बेच दे।’

व्यापारियों, नेताओं, अफसरों की मिली भगत का शानदार उदाहरण मण्डी में खुली आँखों देखा जा सकता है। यहाँ प्रत्येक व्यापारी ने खरीदी का अपना-अपना आँकड़ा तय कर रखा है। उसका आँकड़ा पूरा करने में बाकी सारे व्यापारी मदद करते हैं। जैसे ही उसका आँकड़ा पूरा होता है, वह पीछे हट जाता है और उन व्यापारियों का आँकड़ा पूरा करने में मदद करने लगता है जिन्होंने उसका आँकड़ा पूरा करवाया था। किस भाव खरीदना है और कितना खरीदना है, सारी मनमानी मिली भगत से हो रही है।

कोई मेवालाल दीन स्वरों में प्रतिवाद, प्रतिरोध करता है तो व्यापारी उससे ठिठोली करते हैं - ‘तुझे क्या नुकसान हो रहा है? भावान्तर में बाकी रकम सरकार से ले लेना।’ तमाम मेवालाल चुपचाप यह जवाब सुन लेते हैं। कुछ नहीं बोलते। बोलते हैं तो कहते हैं - ‘भावान्तर से भी फायदा तो सेठों को ही मिल रहा है।’

ऐसी दुर्दशा झेल रहे मेवालाल यदि शहर आने से इंकार करें और कहें कि उनकी अपनी उपज उनके दरवाजे पर ही खरीदी जाए तो सबके पेट में मरोड़ें उठने लगती हैं।
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पुछल्ला - कल मैंने कहा था कि किसान को अपना माल मण्डी में खुला रखना पड़ता है। उसकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं। बरसात हो जाए तो सारा नुकसान किसान को ही झेलना पड़ता है। कोई नेता, कोई अफसर उसकी मदद पर नहीं आता।

कल मेरी यह बात सच हो गई। कल रात हुई बरसात से किसानों का, मण्डी में, खुले में रखा प्याज गीला हो गया। यह नुकसान किसानों को ही सहन करना पड़ेगा। मण्डी सचिव ने किसानों की चिन्ता की और अमूल्य सलाह दी - ‘किसान अपनी उपज तिरपाल या अन्य साधनों से ढँक कर लाएँ ताकि बरसात होने पर उनकी उपज सुरक्षित रहे।’
चित्र - गुरुवार की रात हुई बरसात से भीगे प्याज। चित्र सौजन्य - ‘पत्रिका’।