......और मैंने शेर भगा दिए

पत्रकारिता की विश्वसनीयता को लेकर जब लिख रहा था तब, लिखते-लिखते ही मुझे मेरी एक दुस्साहसभरी मूर्खता याद आ रही थी। मेरी यह मूर्खता, पत्रकारिता की विश्वसीनयता से सीधे-सीधे शायद न जुड़ती हो लेकिन मुझे यह अन्ततः जुड़ती हुई ही लगती है। 

यह 1973-74 की बात है। मैं मन्दसौर में एक दैनिक का सम्पादक था। तब, जिला स्तर के अखबार टेªडल पर छपते थे और आकाशवाणी के रात पौने नौ बजेवाले समाचार बुलेटिन के बाद अन्तिम स्वरूप ले लेते थे। तब, लेण्ड लाइन टेलिफोन ही सम्पर्क का एकमात्र साधन होता था। अपने शहर/कस्बे से बाहर बात करने के लिए ट्रंक कॉल बुक करने पड़ते थे। तब, एसटीडी सेवाएँ भी नहीं थीं।

वह तेज बरसात की रात थी। शिवना में बाढ़ आई हुई थी। आधा से अधिक मन्दसौर बाढ़ के पानी से लबालब था। निचली बस्तियाँ पानी में डूबी हुई थीं और मुख्य बाजार की मुख्य सड़कें नहरें बनी हुई थीं। उन दिनों शिवना की बाढ़ वार्षिक प्रतीक्षित घटना हुआ करती थी। लोग त्रस्त भी रहते थे और दुःख का आनन्द भी लिया करते थे। शहर की मुख्य बाजार की मुख्य सड़क, कालिदास मार्ग पर एक वर्ष मैंने भी नौका विहार किया था। जिला प्रशासन को पहले से ही मालूम रहता था कि कहाँ-कहाँ, क्या-क्या हो सकता है। उसकी तैयारी पूरी रहती थी। इसी के चलते बाढ़ से निपटने के इन्तजामों को लेकर हम अखबारवालों को जिला प्रशासन की आलोचना करने के मौके बहुत ही कम मिल पाते थे।

उस वर्ष, बरसात के उस मौसम में मन्दसौर में एक सर्कस आया हुआ था। बाढ़ ने उसके डेरे-तम्बू उखाड़ दिए थे। सर्कस में तीन या चार शेर भी थे। बाढ़ के कारण उन शेरों के भाग जाने की चर्चा पूरे मन्दसौर में फैली हुई थी। बरसात से हमारा फोन बन्द पड़ा था। नयापुरा स्थित हमारा दफ्तर बाढ़ से तनिक भी प्रभावित नहीं था किन्तु हम पूरी दुनिया से कटे हुए थे। ‘लेटेस्ट’ समाचार जानने के लिए लोग आ-जा रहे थे। मैं उनसे शेरों की खबर की ही पूछताछ कर रहा था। किसी के पास पक्की खबर नहीं थी लेकिन अपना अनुमान जताने में कोई भी देर नहीं कर रहा था। लगभग प्रत्येक कहता - ‘एँ! ये भी कोई पूछने की बात है? वो तो कभी के भाग गए होंगे।’ 

उन दिनों मैं मन्दसौर का युवतम पत्रकार का तमगा हासिल किए था। उत्साह से लबालब। हमारा अखबार नया-नया था। मैं पहली बार सम्पादन कर रहा था किन्तु इन्दौर-भोपाल के अनेक पत्रकारों से मेरा सम्पर्क हो चुका था। उनका काम करने का तरीका मैं देख चुका था। इसका मुझे अतिरिक्त लाभ मिला था। मेरे सम्वाददाताओं में मेरे प्रति अतिरिक्त विश्वास, मालिक से मिली छूट और मेरी थोड़ी-बहुत मेहनत के कारण हमारे अखबार ने लोगों के बीच हमारी उम्मीदों से अधिक विश्वसनीयता हासिल कर ली थी। हमें गर्मजोशी से हाथोंहाथ लिया जा रहा था।  ये सारी बातें मुझे, अपने प्रतियोगी अखबारों को पछाड़ने की उद्दाम भावना के अधीन लोगों के अनुमान को अन्तिम सच मानने को उकसाए जा रही थी। पत्रकारिता (और बाद में बीमा में भी) मेरे गुरु (अब स्वर्गीय) श्री हेमेन्द्र त्यागी मेरे दफ्तर में ही बैठे थे। उन दिनों वे ‘नव-भारत’ का काम देख रहे थे। साहित्य, इतिहास और पुरातत्व में उनका बड़ा दखल था। वे जानकारियों और सन्दर्भों के भण्डार थे। मन्दसौर ही नहीं, पूरे जिले में उनका बड़ा दबदबा था। वे ‘घुमा कर’ बात करते थे। पत्रकारवार्ताओं में उनके सवाल सामनेवाले पर धोबी पछाड़ जैसा असर करते थे। वे मुझ पर बराबर नजर गड़ाए हुए थे। सर्कस के शेरों को लेकर जैसे ही कोई आगन्तुक अपना अनुमान जताता, बुलेट की तरह त्यागीजी का सवाल आता - ‘अन्दाज से कह रहे हो या तुमने भागे हुए शेरों को देखा या सर्कस के मालिक से बात की है?’ जवाब देनेवाले की मानो घिघ्घी बँध जाती। घुटी-घुटी आवाज आती - ‘अन्दाज से कहा।’ त्यागीजी कहते तो कुछ नहीं लेकिन जिन नजरों से सामनेवाले को देखते, वह उनकी ताब नहीं झेल पाता। वह जल्दी से जल्दी जाने की जुगत भिड़ाने लगता।

रात के नौ बज चुके थे। शेरों के भाग जाने की प्रतीक्षामय अपेक्षा में मैंने पहला पेज रोक रखा था। कम्पोजिटर चाह कर भी नहीं जा पा रहे थे। उनकी पूरी बस्ती पानी में डूबी हुई थी। उन्हें सुबह तक प्रेस में ही रुकना था। सवा नौ बजते-बजते मेरा धीरज उबलने लगा। अचानक ही एक सन्देशवाहक आया। वह त्यागीजी के लिए सन्देश लेकर आया था। उन्हें तत्काल ही घर के लिए रवाना होना पड़ा। लेकिन जाने से पहले, किसी कड़क थानेदार की तरह मुझे हिदायत दे गए - ‘मैं जानता हूँ, तू शेरों को भगाने के लिए उतावला बैठा है। तेरे पास काई अधिकृत खबर नहीं है। पीआरओ या कलेक्टर या एसपी से तेरी बात नहीं हुई है। आनेवाले सबसे मैंने तेरे सामने ही पूछा है। एक ने भी ने भी शेरों के भागने की खातरी नहीं की है। मैं जा रहा हूँ। तू शेर भगा मत देना। बहुत ही नाजुक मामला है। जिला प्रशासन पहले से ही परेशान है। शेरों के भागने की खबर से लोगों में दहशत फैलेगी और भगदड़ मच सकती है। किसी भी कीमत पर शेरों का भगाना मत।’

और त्यागीजी चले गए। उनकी हिदायत मुझे बिलकुल ही अच्छी नहीं लगी। मेरा मन उसे मानने को तैयार ही नहीं था। साढ़े नौ बजते-बजते मुख्य कम्पोजीटर रमेश बोला - ‘बैरागीजी! हमें तो रात भर यहीं रहना है। लेकिन बाकी लोगों को तो घर जाना है! अखबार कब छपेगा और कब बाहर जाएगा? जो भी करना हो, करो।’ दफ्तर में अब मैं ही मैं था। मालिक तो वैसे भी नहीं रहते थे। जो भी थे, मेरा कहा माननेवाले ही थे। उत्साह के अतिरेक मैंने जोखिम लेने का फैसला किया। शेरों के भागने का समाचार लिखा और रमेश को थमाया। रमेश ने अविश्वास और हैरतभरी नजरों से मुझे देखा और निराशाजनक स्वरों में बोला - ‘तो अपन शेर भगा रहे हैं?’ मैंने अनुभवी पत्रकार और सम्पादकीय रुतबे से कहा - ‘हाँ। अपन ने भगा दिए। अपन ने क्या भगा दिए, वे सच्ची में भाग गए।’

अखबार छपा। यूँ तो मैं देर से उठता हूँ किन्तु उस दिन जल्दी उठ गया। बाढ़ का पानी लगभग रात जैसा ही बना हुआ था। सरकारी मदद से कोतवाली पहुँचा। मैं गर्वोन्मत्त, इतराया हुआ था। लेकिन कोतवाली पहुँचते ही वहाँ मौजूद तमाम सरकारी अधिकारी मुझ पर टूट पड़े। पिटाई के अलावा बाकी सब मेरे साथ हुआ। मैं वहाँ से भाग जाना चाहता था लेकिन चारों ओर पानी ही पानी। जाने के लिए सरकारी मदद चाहिए और सारे के सारे मुझसे नाराज। बिना चाय-पानी, ग्यारह बज गए। त्यागीजी भी वहाँ पहुँच गए। मुझे देखते ही उनकी आँखों से मानो लपटें उठने लगी। मैंने प्रणाम किया तो मेरे दोनों हाथ झटक कर अन्दर चले गए। उसके बाद कोई सप्ताह भर तक मुझसे बात ही नहीं की। वह समय मेरे लिए अत्यधिक पीड़ादायक रहा। लेकिन कहता भी तो किससे कहता और क्या कहता?

मेरी खूब जग-हँसाई हुई। जो प्रतियोगी पत्रकार मेरा लिहाज पालते थे, सबको ख्ुालकर खेलने का मौका मिल गया। मेरी दशा यह कि घर में रुक नहीं सकता और बाहर कहीं बैठने की हिम्मत ही न हो। कोई एक पखवाड़े बाद त्यागीजी ने मेरी ओर देखा। मेरी पीठ पर खूब घूँसे मारे। उसके बाद दिन में जब भी पहली बार मिलते या फोन पर बात होती तो पहला सवाल करते - ‘आज कितने शेर भगाए?’ जवाब में मुझे रोना-रोना आ जाता।

तब संचार साधन बहुत सीमित थे। इसलिए, हमारे अखबार के पाठकीय क्षेत्र के बाहर बात बहुत ही धीरे-धीरे लोगों तक पहुँची। मेरी तकदीर अच्छी रही कि पुरानी हो जाने के कारण कहीं भी ज्यादा देर नहीं टिकी। 

किन्तु आदमी अपनी मूर्खताएँ कभी नहीं भूलता। भूल ही नहीं सकता। उसे डर लगा रहता है - कोई पुराना जानकार उस मूर्खता को उजागर न कर दे। और वैसा होता ही होता है। आज भी, जब उन दिनों के साथी-संगाती मिल जाते हैं तो कोई न कोई तो मजे ले ही लेता है - ‘अच्छा हुआ रे! जो तूने पत्रकारिता छोड़ दी। वर्ना जाने कहाँ-कहाँ जाने कितने शेर भगाता रहता।’  

समझदार लोग अपनी मूर्खताओं से अकल लेते हैं। अधिक समझदार वे होते हैं जो दूसरे की मूर्खता से अकल लेते हैं। आपके लिए यह बहुत ही बढ़िया मौका है।
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पहली बार सुना ऐसा इंकार

‘हलो!’

‘हलो।’

‘प्रियम्वदजी बोल रहे हैं?’

‘जी हाँ! मैं प्रियम्वद बोल रहा हूँ।’

‘नमस्कार प्रियम्वदजी। मैं रतलाम से विष्णु बैरागी बोल रहा हूँ।’

‘ओह! विष्णुजी! नमस्कार! नमस्कार!! कहिए!

‘आप मुझे अकार 46 की कितनी प्रतियाँ उपलब्ध करा सकते हैं?’

‘आप कहें उतनी। लेकिन आपको क्यों चाहिए?’

‘अपने कुछ मित्रों को भेंट देने के लिए। दरअसल इस अंक में अटल तिवारी का लेख मुझे बहुत अच्छा लगा। मैं उसे, पत्रकारिता से जुड़े अपने कुछ मित्रों को पढ़वाना चाहता हूँ।’

‘माफ करें विष्णुजी। अकार मुफ्त वितरण के लिए नहीं है।’

‘मुफ्त नहीं। प्रतियों का मूल्य मैं चुकाऊँगा।’

‘जी। आप चुकाएँगे। वे नहीं, जिन तक यह पहुँचेगा। आप जिसे भी भेजना चाहते हैं, उन्हें अकार का अता-पता दे दीजिए। लेख के बारे में उन्हें बता कर अकार की सिफारिश कर दीजिए और अंक का मूल्य भेजने के लिए कह दीजिए। हम डाक खर्च लिए बिना उन्हें अंक उन्हें भेज देंगे।’

‘भुगतान वे करें या मैं करूँ, आपको क्या फर्क पड़ता है? आपको तो आपके पैसे मिल रहे हैं!’

‘जी। हमें तो हमारे पैसे मिल रहे हैं लेकिन आप उन्हें जबरिया पढ़ा रहे हैं, वह भी मुफ्त में। हम इसके खिलाफ हैं।’

‘मुझे थोड़ी अजीब लग रही है आपकी बात।’

‘सही कहा आपने। अजीब लग ही रही होगी क्योंकि ऐसी बात सामान्यतः कोई सम्पादक-प्रकाशक नहीं करता। आप जिसे भी अकार का यह अंक भेजना चाह रहे हैं वे कितने भी गरीब हों लेकिन इतने भी नहीं कि पचास रुपये भी खर्च न कर सकें। हमारे (हिन्दीवाले) लोग, घर से निकल कर, दुकान पर जाकर, दो हजार का जूता खरीद लेते हैं लेकिन हिन्दी की किसी किताब या पत्रिका के लिए घर से निकल कर पोस्ट ऑफिस/बैंक जाकर पचास रुपये चुकाने को तैयार नहीं। हम इस मानसिकता से न तो सहमत हैं न ही इसे बढ़ावा देते हैं।’

‘..............’

‘हलो! विष्णुजी! सुन रहे हैं?’

‘जी। सुन रहा हूँ।’

‘पता नहीं आपने ध्यान दिया या नहीं, अकार बिना विज्ञापन के छप रहा है। आसान नहीं है ऐसा करना। हम करने की कोशिश में लगे हुए हैं। हम इसे लेखकों, पाठकों का प्रकाशन बनाना चाहते हैं। हम तो इसे इनका को-आपरेटिव बनाना चाहते हैं। उनका सहकारी स्वामित्व चाहते हैं। अकार के प्रत्येक अंक में अकार के बैंक खाते के ब्यौरे दिए रहते हैं। हमें सहयोग राशि भी चाहिए और कीमत चुका कर पढ़नेवाले भी। इसलिए विष्णुजी! क्षमा करें! इस अंक की प्रतियाँ तो हैं  किन्तु आपको नहीं भेजेंगे।’

‘ठीक है।’

यह ‘ठीक है।’ कहते समय मेरी आवाज में रंच मात्र भी निराशा या गुस्सा नहीं था। ताजगी अनुभव की मैंने अपनी आवाज में। जब से सूझ-समझ (अब, वह जैसी भी है) आई है तब से पहली बार ऐसा इंकार सुना। यह इंकार, हिन्दी के आकाश में गूँजे, गरजे। इस इंकार को समूचा हिन्दी समुदाय बाहुपाश में ले। इस तरह कि छूट न पाए। वहीं कैद रह जाए ताकि फिर किसी प्रियम्वद को ऐसा इंकार उच्चारित करने का अवसर नहीं मिले। जितने लिखने, छपनेवाले हों उसके सौ-हजार गुना खरीद कर पढ़नेवाले हों।

‘अकार’ के सम्पर्क ब्यौरे - अकार प्रकाशन,           
15/269, सिविल लाइंस, कानपुर-208001. 
ई-मेल:akarprakashan@gmail.com 
फोन - 0512 2305561, मोबा. नम्बर - 098392 15236  
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(जिन मित्रों को अकार का यह अंक भेजना चाह रहा था, उन सबको अब इस ब्लॉग पोस्ट की लिंक भेज रहा हूँ।)

पत्रकारिता: विश्वसनीयता की जगह विज्ञापन

एक मई को पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा में घुस कर भारतीय सेना के नायक सुबेदार परमजीति सिंह और सीमा सुरक्षा बल के प्रेम सागर की हत्या कर दी। दोनों के शवों के साथ बर्बरता भी बरती। देश उद्वेलित था कि कुछ समाचार चेनलों ने समाचार दिया कि जवाब में भारतीय सेना ने दो पाकिस्तानी चौकियाँ ध्वस्त कर दीं और सात पाकिस्तानी जवानों को मार गिराया। आक्रामक तेवरों के कारण विशिष्ट पहचान बनानेवाले, सत्तारूढ़ भाजपा के आधिकारिक प्रवक्ता सम्बित पात्रा ने एक शहीद की विधवा पत्नी को ये सूचनाएँ, गर्वपूर्वक देकर तसल्ली दी। लोगों ने सन्तोष और राहत अनुभव की। किन्तु जल्दी ही यह तसल्ली छिन गई। सेना की उत्तरी कमान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सेना ने बदले की कोई कार्रवाई नहीं की है। चैनलें अपनी मर्जी से समाचार दिखा रही हैं। सेना जब बदला लेगी, तब आधिकारिक रूप से बयान जारी किया जाएगा। यह चौंकानेवाला, हताशाजनक समाचार था। लेकिन एक भी समाचर चैनल ने इस गलत प्रसारण के लिए न माफी माँगी न खेद प्रकट किया। सेना को अपनी विश्वसनीयता की चिन्ता हुई। वहाँ से प्रतिवाद किया गया। लेकिन समाचार चेनलों को अपनी विश्वसनीयता की चिन्ता हुई हो, ऐसा नहीं लगा।

चैनलों को यह समाचार अपने सम्वाददाता से नहीं,  किसी व्यक्ति या संस्था से मिला था जो ‘जिम्मेदार और विश्वसनीय’ ही नहीं इस हैसियतवाला भी रहा होगा जिसे झूठा कहने का साहस कोई नहीं जुटा सका। किन्तु सामान्य समझवाला व्यक्ति भी जान गया कि किसके कहने से यह समाचार प्रसारित हुआ और क्यों एक भी चेनल उसका नाम नहीं बता पाया। भाग्यशाली हैं वे चेनल जो जग-हँसाई, भयभीत और आतंकित होने से बच गए।

हमें आठवीं कक्षा में समझाया गया था - यदि धन खोया तो कुछ नहीं खोया। स्वाथ्य खोया तो कुछ खोया। किन्तु चरित्र खोया तोे सब कुछ खो दो दिया। पत्रकारिता के सन्दर्भों में ‘विश्वसनीयता’ ही यह चरित्र होता है। 

मुझे इन्दौर से दैनिक भास्कर का शुरुआती समय याद आ रहा है। तब ‘नईदुनिया’ का एक छत्र दबदबा था। समाचारों की विश्वसनीयता, रिपोर्टिंग पर मैदानी सम्वाददाताओं द्वारा किया जानेवाला परिश्रम उसकी विशिष्ट पहचान था। तथ्यात्मकता के प्रति उसकी सावधानी का नमूना यह कि सरदार स्वर्ण सिंह जब विदेश मन्त्री बने तो उन्हें ‘स्वर्ण सिंह’ लिखा जाए या ‘स्वरन सिंह’, इस पर बहुत दिनों तक मन्थन होता रहा क्यों कि वे हिन्दी में अपने हस्ताक्षर ‘स्वरन सिंह’ करते थे। विश्वसनीयता यह कि अपने ही अखबार में छपे समाचार की तसल्ली करने के लिए भास्कर के लोग नईदुनिया देखा करते थे।

लेकिन समय काफी कुछ बदल ही देता है। अपवादों को छोड़ दें तो आज प्रायः हर अखबार/चौनल चारण की तरह बिरदाविलयाँ गा रहा है, भाट की तरह ‘अन्नदाता यजमान’ की वंश-वृक्षावली बाँच रहा है। ‘विश्वसनीयता’ की जगह विज्ञापन’ ने ले ली है। कस्बाई स्तर पर काम कर रहे, एक विज्ञापन एजेन्सी का प्रभारी आश्वस्ति देता है - ‘आप जो चाहेंगे, छप जाएगा। जो चाहेंगे, रुक जाएगा।’

पत्रकारिता को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ पुकारा जाता है। किन्तु शायद ही किसी को मालूम हो कि आधिकारिक रूप से लोकतन्त्र के तीन ही स्तम्भ उल्लेखित किए गए हैं - विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका। लेकिन ‘लोक स्वीकार’ ने इसे चौथा स्तम्भ बना दिया। विधायी सदनों में प्रतिपक्ष के जरिए लोगों की बात जाहिर होती है। लेकिन जब प्रतिपक्ष भी सत्ता पक्ष से मिल जाए तो? तब यह चौथा खम्भा ही जनता की आवाज बनता है। इसीलिए जनहितरक्षण की दृष्टि से पत्रकार सदैव ही प्रतिपक्ष में अपेक्षित रहता है - जो सरकार पर भी अंकुश लगाए और प्रतिपक्ष पर भी। लालच, स्वार्थ ने हमें आत्म-केन्द्रित बना दिया है। इस स्खलन से कोई नहीं बचा है। बच भी कैसे सकता है? जब तालाब का पानी उतरता है तो चारों दिशाओं में समान रूप से उतरता है। कोई इस स्खलन से नहीं बचा है। सब इसी दुनिया, इसी समाज के जीव हैं। इसके बावजूद समाज को हर समय तीन खेमों से उम्मीद बनी रहती है - न्यायपालिका, अध्यापक और पत्रकारिता। 

ऐसे में पत्रकारिता की विश्वसनीयता भंग होना हम सबकी चिन्ता होनी चाहिए। कभी पत्रकार को आदर से देखा जाता था। उसे अपनी पहचान जताने की आवश्यकता कभी नहीं होती थी। आज स्थिति उलट गई लगती है। आज तो पत्रकार जगत ही पत्रकारों से त्रस्त, क्षुब्ध है। वाहनों पर, लिखे ‘प्रेस’ पर लोगों का व्यवहार ‘इससे बचो’ जैसा होता है। यह मर्मान्तक पीड़ादायक है कि पत्रकारिता की जितनी निन्दा और भर्त्सना हमारे इस समय में हो रही है उतनी अब तक कभी नहीं हुई। लेकिन इसके लिए किसी और को दोष कैसे दिया जाए? पेटलावद विस्फोट काण्ड के दिनों में छाए अखबारी बवण्डर पर एक नेता ने अत्यन्त विश्वासपूर्वक कहा था - ‘आप जिन्हें वॉच डाग कह रहे हैं ना! देखना वे सबके सब जल्दी ही पूँछ हिलाते नजर आएँगे।’ ऐसा हुआ या नहीं, इस पर बहस हो सकती है किन्तु कोई नेता विश्वासपूर्वक ऐसा कहने की हिम्मत करता है, यही क्या कम चिन्ताजनक नहीं है?

पत्रकारों की व्यक्तिगत विचारधारा तब भी होती थी किन्तु तब वे ‘काँग्रेसी पत्रकार’, ‘जनसंघी पत्रकार’, ‘समाजवादी पत्रकार’ होते थे, ‘काँग्रेस के पत्रकार’, ‘जनसंघ के पत्रकार’, ‘समाजवादी पार्टी के पत्रकार’ नहीं। पत्रकारिता की विश्वसनीयता, शुचिता और सार्वजनिक प्रतिष्ठा की चिन्ता सब समान रूप से करते थे। 1975-76 में मैं, भोपाल में, अंग्रेजी दैनिक ‘हितवाद’ में नौकरी करता था। वहाँ हसनात सिद्दीकी काँग्रेसी,  यशवन्तजी अरगरे और संगीतजी संघी/जनसंघी और गोविन्दजी तोमर समाजवादी के रूप में चिह्नित किए जाते थे। किन्तु इनमें से किसी के भी कारण ‘हितवाद’ की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर कभी खरोंच नहीं आई। जो भी अखबार या व्यक्ति, पत्रकारिता के इन बुनियादी तत्वों से दूर हुआ, उसे दुर्दिन ही झेलने पड़े। नेशनल हेरॉल्ड की दशा हमारे सामने है। भाजपा का मुख-पत्र बने हुए,  एक अखबार को उसके अंश धारक भी नहीं खरीद रहे। 

पत्रकारों की स्थिति का अनुमान मैं भली प्रकार कर सकता हूँ। अखबारों, मीडिया घरानों के मालिक जब पूँजीपति हो तो पत्रकार भला पत्रकारिता कैसे कर सकते हैं? कर ही नहीं सकते। उन्हें नौकरी कर, अपने बाल-बच्चे पालने हैं। लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता का संकट इन्हें ही झेलना पड़ रहा है। लोग इनसे उम्मीद करते हैं कि ये सच लिखें लेकिन मालिक कहता है - सच कहने से बचने का विश्वसनीय तरीका निकालो। मैं भी कभी पत्रकार रहा हूँ। मैं इनमें खुद को देखता हूँ। जवाब इन्हें ही देना पड़ता होगा। ये क्या कहते होंगे? डॉक्टर बशीर बद्र साहब का यह शेर इनके काम आता होगा -

किसने जलाई बस्तियाँ, बाजार क्यों लुटे
मैं चाँद पर गया था, मुझे कुछ पता नहीं

समय कभी थमता नहीं। इसीलिए, वक्त तो बदलेगा ही। इलेक्ट्रानिक मीडिया के शुरुआती दिनों में प्रभाषजी जोशी रतलाम आए थे। चिन्तित युवा पत्रकारों से  उन्होंने कहा था - ‘तेज बहाववाली नदी में, बीच में खड़े हो। अपनी अंगुलियाँ, पूरी ताकत से रेत में गड़ाए रखो। बहाव स्थायी नहीं है। निकल जाएगा। बस! तुम बहने से बचो।’

पूँजी का यह हमला मारक है। सरकारी प्रश्रय इसे पल-पल बढ़ा रहा है। गंगा हिमालय से निकलती है लेकिन बाढ़ मैदानों में आती है। बचाव के रास्ते मैदानवालों को ही तलाशने पड़ेंगे। जूझना कायम रखिए। थकिए नहीं। बुरा से बुरा आदमी भी अच्छे दोस्त चाहता है। निष्पक्ष और विश्वसनीय पत्रकारिता की आवश्यकता देश-समाज को हर दौर में रही है, रहती ही है। जब आपातकाल में रास्ते तलाश लिए थे तो अब भी तलाश ही लेंगे। 

हर रात की सुबह होती है। शम्मा जलाए रखिए। 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे, भोपाल में दिनांक 18/05/2017 को प्रकाशित)

असहमति में बसते हैं लोकतन्त्र के प्राण

एक थे रमेश दुबे। शाजापुर के विधायक थे। 1967 में भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में चुने गए थे किन्तु बाद में, तत्कालीन मुख्य मन्त्री द्वारकाप्रसादजी मिश्र के प्रभाव से काँग्रेस में आ गए थे। यह किस्सा उन्होंने मुझे तो नहीं सुनाया था किन्तु जिस जमावड़े में सुनाया था, उसमें मैं भी मौजूद था।

बात आपातकाल की थी।  अखबारों पर सेंसरशिप लागू थी। तत्कालीन काँग्रेसाध्यक्ष देवकान्त बरुआ ने ‘इन्दिरा ही भारत और भारत ही इन्दिरा’ (इन्दिरा इज इण्डिया एण्ड इण्डिया इज इन्दिरा) का नारा देकर अपनी अलग पहचान बनाई हुई थी। काँग्रेस का सिण्डिकेट जिस इन्दिरा गाँधी को ‘गूँगी गुड़िया’ कह कर कठपुतली की तरह नचाने के मंसूबे बाँधे हुए था वही इन्दिरा गाँधी सबको तिगनी का नाच नचा रही थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ‘दूसरी आजादी’ का उद्घोष कर चुके थे। पूरा देश उनके पीछे चल रहा था। जेपी समेत तमाम जेपी समर्थक काँग्रेसियों सहित विरोधी दलों के नेता जेलों में बन्द किए जा चुके थे। सेंसरशिप के बावजूद चुप न रहनेवाले पत्रकार भी कैद किए जा रहे थे। इन्दिरा गाँधी दहशत का पर्याय बन चुकी थी। किन्तु इन्दिरा खेमे में जेपी के नाम की दहशत थी। उन्हें खलनायक बनाने के उपक्रम शुरु हो चुके थे। इन्हीं में से एक उपक्रम था - फासिस्ट विरोधी सम्मेलन। गाँव-गाँव में ऐसे सम्मेलन आयोजित किए जा रहे थे। काँग्रेसी इन्हें ‘फासिस्ट सम्मेलन’ कहते थे। 

ऐसे ही एक सम्मेलन में तत्कालीन मुख्य मन्त्री प्रकाशचन्द्रजी सेठी ने जेपी को चुनौती दे दी - ‘मध्य प्रदेश में कहीं से विधान सभा  चुनाव जीतकर बता दें।’ उनका कहना था कि दुबेजी उठ खड़े हुए और बोले - ‘ओ साब! बस करो। आज ये कह दिया सो कह दिया। आगे से ऐसा कहने की भूल मत करना। हमारे गाँवों में पंचायतों के ऐसे वार्ड भी हैं जहाँ इन्दिराजी भी नहीं जीत सकती। किसी सड़कछाप आदमी  ने इन्दिराजी को ऐसी चुनौती दे दी तो, आप तो चले जाओगे लेकिन हम लोगों को लेने के देने पड़ जाएँगे। बोलती बन्द हो जाएगी। जवाब देते नहीं बनेगा।’ सेठीजी अपनी सख्ती के कारण अलग से पहचाने जाते थे। लेकिन कुछ नहीं बोले। अपना भाषण खत्म किया और बैठ गए। यह चुनौती उन्होंने कहीं नहीं दुहराई। 

बिलकुल ऐसा का ऐसा तो नहीं लेकिन मूल विचार में ऐसा ही किस्सा बैतूलवाले राधाकृष्णजी गर्ग वकील साहब ने सुनाया था। गर्ग साहब काँग्रेस के जुझारू मैदानी कार्यकर्ता रहे। यह किस्सा भी 1967 के विधान सभा चुनावों का है। उन्हें पूरा भरोसा था कि काँग्रेस की उम्मीदवारी उन्हें ही मिलेगी। उनकी तैयारी और भागदौड़ भी तदनुसार ही थी। किन्तु निजी नापसन्दगी के कारण द्वारकाप्रसादजी मिश्र ने किसी और को उम्मीदवारी दे दी। गर्ग साहब ने आपा नहीं खोया। सीधे जाकर मिश्रजी से मिले और बोले - ‘दादा! आपने मेरा टिकिट काट दिया। कोई बात नहीं। किन्तु मैं यह कहने आया हूँ कि मैं चुनाव लडूँगा और काँग्रेसी उम्मीदवार बन कर लडूँगा। मैं यही कहूँगा कि नाराजगी के कारण मिश्रजी ने भले ही मुझे उम्मीदवार नहीं बनाया किन्तु असली काँग्रेसी उम्मीदवार मैं ही हूँ। आज निर्दलीय लड़ने का मजबूर कर दिया गया हूँ लेकिन जीतने के बाद काँग्रेस में ही जाऊँगा। आपसे एक ही निवेदन है कि प्रचार के लिए आप मेरे विधान सभा क्षेत्र में मत आना। वहाँ आपके बनाए काँग्रेसी उम्मीदवार की हार तय है। आप प्रचार पर आओगे तो लोग इसे आपकी हार कहेंगे। यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा। आपने भले ही मुझे टिकिट नहीं दिया लेकिन मेरे नेता तो आप ही हो।’ मिश्रजी चुपचाप सुनते रहे। कुछ नहीं बोले।

अपनी बात कह कर गर्ग साहब लौट आए और काम पर लग गए। मिश्रजी ने गर्ग साहब का कहा माना। बैतूल क्षेत्र में प्रचार के लिए नहीं गए। हुआ वही जो गर्ग साहब घोषित करके आए थे। काँग्रेसी उम्मीदवार को पोलिंग एजेण्ट नहीं मिले। गर्ग साहब अच्छे-भले बहुमत से जीते। वे ‘निर्दलीय’ के रूप में विधान सभा में पहुँचे लेकिन लोगों ने उन्हें काँग्रेसी विधायकों के बीच ही पाया। 

ये किस्से यूँ ही याद नहीं आए। गए दिनों प्रधानमन्त्री मोदी ने भाजपाई सांसदों को कुछ भी पूछताछ न करते हुए, चुपचाप, हनुमान की तरह दास-भाव से काम करने की सलाह दी। वही देख/पढ़कर मुझे दुबेजी और गर्ग साहब याद आ गए। दोनों ने अपने-अपने नेता को अनुचित पर टोका और टोकने के बाद भी निष्ठापूर्वक अपनी-अपनी जगह बने रहे। इसके समानान्तर यह भी उल्लेखनीय कि दोनों नेताओं ने इनकी बातों की न तो अनुसनी, अनदेखी की न ही इनकी बातों का बुरा माना। ये दोनों अपने नेताओं से असहमत थे लेकिन नेताओं ने इनकी असहमति को ससम्मान सुना और परिणाम आने से पहले ही स्वीकार किया। 

देश हो या दल, लोकतन्त्र के प्राण तो असहमति को सुनने और संरक्षण देने में ही बसते हैं। अंग्रेजी का ‘इण्डियन एक्सप्रेस’ इन्दिरा गाँधी को ‘अ.भा. काँग्रेस समिति की एकमात्र पुरुष सदस्य’ (ओनली मेल मेम्बर ऑफ एआईसीसी) लिखता था। जिस पर इन्दिरा गाँधी की आँख टेड़ी हो जाती, उसका राजनीतिक जीवन समाप्त मान लिया जाता था। उन्हीं इन्दिरा गाँधी की इच्छा के विपरीत युवा तुर्क चन्द्रशेखर  काँग्रस समिति का चुनाव लड़े भी और जीते भी। लेकिन काई अनुशासनात्मक कार्रवाई करना तो दूर रहा, इन्दिरा गाँधी ने सार्वजनिक रूप से अप्रसन्नता भी नहीं जताई। ऐसा ही एक और मौका आया था जब जतिनप्रसाद चुनाव लड़े थे। वे हार गए थे किन्तु इन्दिरा गाँधी ने तब भी कोई कार्रवाई नहीं की थी। 

लेकिन कालान्तर में इन्दिरा गाँधी ने, पार्टी अध्यक्ष और प्रधान मन्त्री पद पर एक ही व्यक्ति रखने की शुरुआत कर काँग्रेस का आन्तरिक लोकतन्त्र खत्म कर दिया। काँग्रेस के क्षय का प्रारम्भ बिन्दु आज भी यही निर्णय माना जाता है। 

समाजवादी आन्दोलन का तो आधार ही असहमति रहा है। समाजवादियों से अधिक वैचारिक सजग-सावधान लोग अन्य किसी दल में कभी नहीं रहे। समाजवादियों की तो पहचान ही ‘नौ कनौजिए, तेरह चूल्हे’ बनी रही। एक समाजवादी सौ सत्ताधारियों पर भारी पड़ता था। संसद की तमाम प्रमुख बहसें आज भी समाजवादियों के ही नाम लिखी हुई हैं। समाजवादियों के कारण ही सत्ता निरंकुश नहीं हो सकी। किन्तु समाजवादियों का सत्ता में आना हमारे लोकतन्त्र की सर्वाधिक भीषण दुर्घटना रही। 

जहाँ तक संघ (भाजपा) का सवाल है, वहाँ तो आन्तरिक लोकतन्त्र की कल्पना करना ही नासमझी है। वहाँ तो ‘एकानुवर्तित नेतृत्व’ की अवधारणा ही एकमात्र घोषित आधार है। ऐसे में मोदी का, अपने सांसदों को चुप रहने की सलाह देना ही चकित करता है। याने, लोग बोलने लगे थे! यह तो संघ की रीत नहीं! वहाँ तो असहमति विचार ही अकल्पनीय है। भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में अग्रणी और भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे बलराज मधोक को आज कितने लोग जानते, याद करते हैं? वे मरे तो, दलगत आधार पर दस लोग भी नहीं पहुँचे। जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष घोषित करने की सजा भुगतते आडवाणीजी को सबने देखा। कीर्ति आजाद, शत्रुघ्न सिन्हा की दशा सामने है। 

सवाल न करना, चुप रहना जीवन की निशानी नहीं। वह तो निर्जीव होने की घोषणा है। केवल ‘क्रीत दास’ (खरीदा हुआ गुलाम) ही सवाल नहीं करता। हमारी तो पहचान ही यह बोलना है - ‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे। बोल! जुबाँ अब भी है तेरी।’ 

केवल सन्तुष्ट गुलाम ही सवाल नहीं करता। और सारी दुनिया जानती है कि आजादी का सबसे बड़ा दुश्मन सन्तुष्ट गुलाम ही होता है।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’ (भोपाल) में दिनांक 20 अप्रेल 2017 को प्रकाशित जिसमें मैंने गलती से देवकान्त बरुआ की जगह हेमकान्त बरुआ लिख दिया।

कर्मफल पर अधिकार माँगनेवाला कलमकार

श्री मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर ने देश के प्रख्यात भाषाविद्, मूूूूर्धन्‍य साहित्‍यकार डॉक्टर जयकुमार जलज को अपने छठवें ‘प्रान्तीय शताब्दी सम्मान’ से अलंकृत किया। इस सम्मान में शाल-श्रीफल सहित पचास हजार रुपये नगद भेंट किए जाते हैं। रविवार दिनांक 26 मार्च 2017 को यह सम्मान समारोह इन्दौर में, ‘समिति’ के मुख्यालय, मानस भवन में सम्पन्न हुआ। नब्बे वर्षों से निरन्तर प्रकाशित हो रही, ‘समिति’ की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका ‘वीणा’ के, अप्रेल 2017 के अंक में जलजजी पर मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ है। अपना यह आलेख अपने ब्लॉग पर केवल इसलिए दे रहा हूँ ताकि यह स्थायी रूप से सुरक्षित रह सके। इसे पढ़ना और/या इस पर टिप्पणी करना आपके लिए बिलकुल ही जरूरी नहीं। किन्तु यदि आप ऐसा करते हैं तो यह मेरे लिए ‘अतिरिक्त बोनस’ ही होगा। इसके लिए आपको अन्तर्मन से आभार और धन्यवाद। हिन्दी की मौजूदा दशा पर केन्द्रित, जलजजी का एक महत्वपूर्ण आलेख यहाँ उपलब्ध है।


बाँये से ‘समिति’ के प्रधानमन्त्री श्री सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी, श्रीमती प्रीती जलज, डॉ. जयकुमार जलज, कार्यक्रम के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री वीरेन्द्रदत्तजी ज्ञानी, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. सूर्यप्रकाशजी दीक्षित (लखनऊ) तथा ‘समिति’ के वाचनालय सचिव श्री अरविन्द ओझा।

जलजजी पर लिखना जितना सुखकर है उतना ही कठिन भी। किसी को उसके वास्तविक आकार में देखने के लिए एक निश्चित दूरी जरूरी होती है। बहुत पास आ जाए तो आकार धुंधला जाता है और दूर चला जाए तो ओझल हो सकता है। जलजजी और मेरे बीच की यह ‘आवश्यक निश्चित दूरी’ नहीं रही। लिहाजा मैं या तो उनके पीछे जयकार-मुद्रा मे हूँ या फिर ऐन सामने, मुठभेड़-मुद्रा में।

जलजजी पर लिखने की बात आई तो उनकी, एक के बाद एक अनेक छवियाँ उभरने लगीं। लेकिन एक भी ऐसी नहीं जो लिखने में मदद करे। जिस आदमी के पास घण्टा भर बैठने के बाद आपको गिनती के पाँच-सात वाक्य सुनने को मिलें, उस आदमी पर क्या लिख जाए? कैसे लिखा जाए? 

मैंने मुक्तिबोध को नहीं देखा न ही उनके बारे में कुछ जाना। किन्तु मुक्तिबोध से जुड़ा परसाईजी का संस्मरण पढ़ते-पढ़ते मुझे जलजजी नजर आने लगे। परसाईजी लिखते हैं -  ‘वे एकदम किसी से गले नहीं मिलते थे।‘ और ‘सामान्य आदमी का वे एकदम भरोसा करते थे लेकिन राजनीति और साहित्य के क्षेत्र के आदमी के प्रति शंकालु रहते थे।’ जलजजी से बरसों से मिलता चला आ रहा हूँ लेकिन वे मुझे हर बार ऐसे ही लगे। उनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत (क्षमा करें, ‘दिक्कत’ नहीं, ‘चिढ़’) यह है कि वे आसानी से नहीं बोलते। गप्प-गोष्ठी के काबिल तो वे बिलकुल नहीं हैं। गप्प-गोष्ठी की बतरस का आनन्द, काम की बात से नहीं, बेकाम की बातों में ही आता है। खुद की तारीफ करने और गैरहाजिर की निन्दा करने का मजा ऐसी ही बैठकों में लिया जा सकता है। लेकिन जलजजी इन दोनों कामों के लिए कंजूस या कि ‘मिसफिट आदमी’ हैं। लिखने की कठिनाई का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इनके बारे में कोई अफवाह भी सुनने का नहीं मिलती। 

लेकिन जब ‘किनारे से धार तक’ की कविताएँ पढ़ीं तो बात समझ में आई। जलजजी बोलते हैं, खूब बोलते हैं, बखूबी बोलते हैं लेकिन अपनी कविताओं में, कविताओं के जरिए बोलते हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था - ‘कविता नहीं तो जीवन नहीं।’ तब यह एक जुमला लगा था। लेकिन जब इनकी कविताओं से मुलाकात हुई तो जलजजी का न बोलना समझ में आया।

जलजजी की कविताओं ने मेरे सारे मुख्य प्रश्नों के उत्तर दे दिए। केवल पूरक प्रश्न रह गए जिनके उत्तर पाना बहुत कठिन नहीं था। वस्तुतः संघर्षों, प्रतिकूलताओं ने जलजजी को किसी और से बात करने का समय ही नहीं दिया। जिन्दगी ने कदम-कदम पर इम्तिहान लिए। जिद और जीवट यह कि हर कदम पर जवाब दिया - ‘तू तेरी करनी में कसर मत रख। बन्दा रुकनेवाला नहीं।’ पढ़ने के लिए घर से कानपुर चले तो मालूम था कि पढ़ने के साथ कमाना भी पड़ेगा। वहाँ से झाँसी आना पड़ा। कॉलेज में प्रवेश के साथ ही स्कॉलरशिप और फ्रीशिप, दोनों के लिए आवेदन दिया। प्राचार्य ने कहा - ‘कोई एक मिलेगा।’ जरूरतमन्द विद्यार्थी अड़ गया - ‘दोनों मिलें तो यहाँ पढ़ूँ। वर्ना मैं चला।’ प्राचार्य ने रोका नहीं। उल्टे डराया - ‘तुम फर्स्ट डिविजन नहीं ला पाओगे।’ जवाब जलजजी ने नहीं, उनकी अंकसूची ने दिया। संस्कृत में विशेष योग्यता के साथ इण्‍टर प्रथम श्रेणी में किया। मुकाम मिला इलाहाबाद में। ‘पढ़ाई और कमाई’ की जुगलबन्दी यहाँ भी जारी रखनी पड़ी। महादेवी द्वारा प्रकाशित ‘साहित्यकार’ में एक कविता छपने पर दस रुपये मिलते थे। उत्तर प्रदेश सरकार की डाक्यूमेण्टरी फिल्मों के आलेख लिखे। नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान में कविताएँ छपने लगीं। यह 1953 से 1957 का काल खण्ड था। 1958 में नौकरी लगी। बड़ौत (मेरठ) कॉलेज में ज्वाइन करना था। स्थिति यह रही कि मित्र राजकुमार शर्मा ने कुर्ता-पायजामा उपलब्ध कराया। वास्तविकता को झुठलाना या छुपाना कभी नहीं रुचा। जीवनसंगिनी का चुनाव खुद किया और विवाह से पहले ससुराल जाकर ससुरजी को साफ बता आए कि उनका दामाद बारात लेकर तो आएगा किन्तु सजधज कर नहीं आएगा। 

ये सारी और ऐसी अनेक कहानियाँं जलजजी की कविताएँ सूत्रों में कहती हुई बहती हैं। प्रतिकूलताओं से पेश चुनौती कबूल कर जलजजी जवाब में विधाता से कर्म पर ही नहीं, कर्मफल पर भी अधिकार की हठ कर ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन’ से आगे जाने की ताल ठोकते मिले। कहावतों के जरिए मजबूरी को छुपाना उन्हें नहीं सुहाया। चाँदी का चम्मच मुँह में लेकर पैदा होनेवाले भी खुद को संघर्ष-पूत बताने के मौके तलाशते रहते हैं। लेकिन जलजजी ऐसे मौकों से दूर की नमस्ते करते हैं। 

मैं 1977 में रतलाम आया। तबसे जलजजी को देखता-सुनता रहा हूँ। वे 1994 में रिटायर हुए। पहले प्राध्यापक, फिर हिन्दी विभागाध्यक्ष और फिर 1983 से लेकर 1994 तक, (सेवानिवृत्ति तक) प्राचार्य रहे। लेकिन मुझे आज भी ताज्जुब है कि वे विवादास्पद नहीं हुए जबकि राजनीतिक रूप से रतलाम कम सम्वेदनशील नहीं। प्राचार्यकाल में न तो किसी नेता से मिलने गए न ही कलेक्टर से। वे दिगम्बर जैन हैं। किन्तु अपना जैनी होना अपनी ओर से कभी नहीं जताया। जैन समाज ने बुलाया तो चले गए वर्ना अपने काम से काम। अब तो उन्हें याद भी नहीं कि उन्होंने खुद को ‘जयकुमार जैन’ के बजाय ‘जयकुमार जलज’ लिखना कब शुरु किया था। उनकी पढ़ाई के जमाने में जातिवाद बहुत प्रभावी था। किन्तु उन्हें जातिगत पहचान अनुचित लगी। सो,जैन से जलज बन गए। 

उनका जमाना, गाँधी-नेहरू का जमाना था। किन्तु मुझे वे क्रमशः जेपी (जयप्रकाश नारायण), राममनोहर लाहिया और गाँधी से प्रभावित लगे। जेपी की सादगी, लोहिया का फक्कड़पन और अपने विचार के प्रति गाँधी की दृढ़ता से वे आज भी मोहित और प्रभावित हैं। 

जलजजी से मिलना-जुलना बढ़ा तो कुछ मित्रों ने मुझे सावधान किया - ‘जलजजी मेनुपलेट करते हैं।’ मुझे बात समझ में नहीं आई। ‘मेनुपलेट’ पल्ले ही नहीं पड़ा। मुझे समझाया गया - ‘मूर्ख बनाकर अपना काम साधना।’ मैं सचमुच में सावधान हो गया। लेकिन यह देखकर हैरत भी हुई और खुशी भी कि जलजजी ने मुझसे अपने कुछ काम साधे तो जरूर किन्तु हर बार साफ-साफ कहकर। 

सन् 2002 में उनकी पुस्तक ‘भगवान महावीर का बुनियादी चिन्तन’ आई। एक प्रति मुझे भी दी और कहा - ‘पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया बताइएगा जरूर।’ मैंने किताब पढ़ी। बहुत अच्छी लगी। वस्तुतः  इतनी सरलता से सुस्पष्ट तौर पर ‘महावीर’ मुझे पहली बार समझ में आए। अपनी अनुभूति सुनाते हुए मैंने जलजजी से कहा - ‘यह किताब आपको बहुत यश दिलाएगी।’ वे कुछ नहीं बोले। एक छोटी सी ‘हूँ’ करके रह गए। उनके न बोलने के स्वभाव से परिचित होने के कारण उनका कुछ न कहना मुझे अटपटा नहीं लगा।

किन्तु जब उस किताब के एक के बाद एक संस्करण आने लगे, विभिन्न भाषाओं में उसके अनुवाद होने लगे तो एक दिन अचानक ही बोले - ‘आपने जब कहा था कि यह किताब मुझे बहुत यश दिलाएगी तब मैंने आपकी बात को औपचारिक प्रशंसा ही माना था। किन्तु अब देख रहा हूँ कि आपकी बात सच साबित हुई।’ ‘जलजजी को  आखिरकार मेरी बात माननी पड़ी’ इस अहम् तुष्टि से अधिक इस बात ने मेरा ध्यानाकर्षित किया कि जलजजी ने अपने, उस समय के अविश्वास को बिना किसी भूमिका के, दो-टूक शब्दों में व्यक्त कर दिया। मैं तो शायद ही ऐसा कर पाता।

कलमकारों का शोषण मुझे आज तक नहीं रुचा। तब तो बिलकुल ही नहीं रुचता जब आयोजक धनपति हो और आयोजन से उसे सीधा-सीधा आर्थिक-सामाजिक लाभ हो रहा हो। मध्य प्रदेश सरकार ने अपने एक समारोह में रतलाम के कवियों का काव्य पाठ कराया। जलजजी भी उनमें शामिल थे। मुझे लगा था कि सरकार ने कवियों को यथेष्ठ पारिश्रमिक दिया ही होगा। किन्तु (कुछ दिनों बाद) मालूम हुआ कि सरकार ने तो मुफ्तखोरी कर ली। मुझे बहुत बुरा लगा। (अब तक लगा हुआ है।) उन दिनों मैं साप्ताहिक ‘उपग्रह’ में ‘कही-अनकही’ स्तम्भ लिखता था। उस स्तम्भ में मैंने ’वे मुफ्तखोर, ये फुरसतिये’ शीर्षक से बहुत ही कड़वी और पत्थरमार टिप्पणी लिखी। उसकी जैसी प्रतिक्रिया होनी थी, हुई। काव्य पाठ करनेवाले कुछ कवियों ने और कलेक्टर के मुँह लगे कुछ अधिकारियों ने नाराजी जाहिर की। नजदीकी कवि मित्रों ने कुछ खरी-खोटी भी सुनाई। किन्तु जलजजी ने एक शब्द भी नहीं कहा। मुझे लगा, वे मेरी उपेक्षा कर, मुझे चिढ़ा रहे हैं। मैंने तनिक अशिष्ट लहजे में उनसे बात की। वे बोले - ‘मुझे लगा कि जाना चाहिए। मैं चला गया। आपको लगा, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। आपने कह दिया। हम दोनों ने अपना-अपना काम किया। इसमें क्या कहना-सुनना?’ उनका जवाब अपनी जगह। किन्तु मैं आज भी गुस्सा हूँ और जलजजी आज भी अपनी बात पर कायम हैं। 

कोई दर्जन भर सम्मान आज जलजजी के नाम से जुड़े हुए हैं लेकिन यह सब उनके ‘सर पर सवार’ अनुभव नहीं होता। लगभग तीन लाख की आबादी वाले मेरे रतलाम में कोई साहित्यकार एक-दो बार मुख्य अतिथि या अध्यक्ष बन जाता हैं तो फिर वह श्रोता बनने से इंकार कर देता है। कोई साफ-साफ इंकार कर देता है तो कोई घुमा-फिरा कर। यह बात मैं यूँ ही, अनुमान से नहीं, अपने अनुभव से कह रहा हूँ। लेकिन जलजजी अहमन्यता के इस मामले में पिछड़े हुए हैं। श्रोता के रूप में बैठने में उन्हें आज भी असुविधा नहीं होती। 
मैं एक बहुत बड़े कवि का सगा छोटा भाई हूँ किन्तु आज के कवियों से घबराया, आतंकित की सीमा तक भयभीत रहता हूँ - पता नहीं, कौन, कब अपनी कविता सुनने का आग्रह कर दे! लेकिन इस मामले में  जलजजी ने सबको अभयदान दे रखा है। आप निश्शंक, निर्भय होकर जा सकते हैं। वे अपना ताजा लिखा या छपा न तो सुनाते हैं न ही पढ़ाते हैं। याद नहीं पड़ रहा कि मैं अब तक उनके घर कितनी बार गया। लेकिन यह पक्का याद है कि उन्होंने एक बार भी मुझे अपनी कविता नहीं सुनाई/पढ़ाई। 

जलजजी को सुनना आसान है लेकिन उनसे कुछ कहलवाना बहुत ही मुश्किल। वे बहुत सरल हैं। चौड़े पाटवाली, धीमे-धीमे बह रही, धीर-गम्भीर नदी की तरह सरल। इसीलिए उन पर लिखने को मैंने कठिन कहा है। धीमी बहती नदी में गर्जन-तर्जन नहीं होता। उसमें लहरें नहीं उठती। वह हिलोरें नहीं मारती। जलजजी को जलसों में सुना जा सकता है किन्तु अन्यथा तो मौन की साधना करनी पड़ेगी। वे नहीं बोलते। उनका मौन बोलता है। मैंने सुना है। मैं सुनता रहता हूँ।
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ब्याज के भरोसे मूल गँवाना

यह आख्यान हम सबने कई बार सुना होगा और आश्चर्य नहीं कि हममें से कइयों इसे प्रयुक्त भी किया हो।

कवि रहीम का पूरा नाम अब्दुुल रहीम खानखाना है। वे अकबर के नवरत्नों में से एक थे। वे बड़े दानशील थे। दान देते समय लेनेवाले का चेहरा नहीं देखना उनकी विशेषता थी। नतनयन, नजर झुकाए दान देते थे। कवि गंग, अकबर के दरबारी कवि थे। इनके एक छप्पय पर प्रसन्न होकर रहीम ने इन्हें 36 लाख रुपये भंेट किए थे। रहीम की इस दानशीलता और विनम्रता से प्रभावित हो कवि गंग ने रहीम से पूछा -

सीखे कहाँ नवाब जू, ऐसी दैनी देन।
ज्यों-ज्यों कर ऊँचो कियो, त्यों-त्यों नीचे नैन।।

बड़ी सरलता से रहीम ने उत्तर दिया -

देनहार कोउ और है, देत रहत दिन-रैन।
लोग भरम हम पै करें, ता सों नीचे नैन।।

सम्राट अकबर के रत्न को अपने पद का गुमान नहीं था। उन्हें अपनी अकिंचनता का भान हर पल बना रहता था।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बारे में यह उल्लेख अनेक बार पढ़ा। उन्हें देश-विदेश से बुलावे आते थे। लेकिन इन बुलावों में यदि आकाशवाणी का बुलावा होता तो वे सब बुलावों को परे सरका देते। कहते कि आकाशवाणी ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई और सुबह-सुबह देश के लगभग प्रत्येक घर में पहुँचाया। वे भला इस बात को कैसे भूल सकते हैं? उन्होंने कभी भी ‘आकाशवाणी’ की उपेक्षा, अनदेखी की न ही कभी खुशामद करवाई। ‘आकाशवाणी’ के साथ वे सदैव विनम्रतापूर्व कृतज्ञ भाव से पेश आते रहे।

डॉक्टर रामाचरण राय मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मन्त्री थे। वे दौरे पर जब भी रायपुर जाते, अपने परामर्श केन्द्र पर कुछ देर बैठकर कुछ मरीज जरूर देखते। सरकारी अस्पताल के निरीक्षण के दौरान एक वृद्धा उनके सामने आ खड़ी हुई। उसने शिकायत की कि अस्पताल का डॉक्टर ढंग से उसका इलाज नहीं कर रहा है। उसने छत्तीसगढ़ी में कहा कि उस डॉक्टर के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। रामाचरणजी ने उसे ढाढस बँधाया और कहा कि वह डॉक्टर पर भरोसा करे। बहुत अच्छा डॉक्टर है और उसका (वृद्धा का) इलाज वही करेगा। उन्होंने वृद्धा के (ईलाज के) कागज देखे, डॉक्टर से पूछताछ कर एक गोली सुझाई। डॉक्टर से ही कागजों पर लिखवाई, वृद्धा को फिर ढाढस बँधाया और चले आए। लेकिन भोपाल पहुँचकर वे उस वृद्धा को नहीं भूले। फोन पर डॉक्टर से बराबर जानकारी लेते रहे। उन्होंने मन्त्रीपद का रोब जताने के बजाय पद की शालीनता, मर्यादा और ‘डॉक्टर’ की सार्वजनिक प्रतिष्ठा की सुरक्षा की।

एक परिचित ने यह अविश्वसनीय घटना सुनाई थी। एक सुबह ‘ऊँचे घरों’ के दीखनेवाले कुछ लोग उनके मुहल्ले में आए। उन्होंने घरों के सामने आवाज लगाकर भोजन माँगा। लोगों ने जो भी दिया, दोनों हाथ फैलाकर लिया, बिना किसी बर्तन के और वहीं बैठकर खाया। पानी भी माँग कर पीया। मुहल्ले के लोग उन्हें अचरज और विश्वास से देख रहे थे किन्तु वे सबसे बेपरवाह, ‘अपना काम’ करते रहे। मेरे इन परिचित से रहा नहीं गया। कहा - “शकल, व्यवहार और कपड़ों से तो आप लोग ‘खाते-पीते घरों के’ लग रहे हैं। आप यह सब क्या कर रहे हैं?” जवाब मिला कि वे सब सचमुच में ‘खाते-पीते घरों के’ ही हैं। लेकिन शुरु से या खानदानी धनी नहीं हैं। वे सब पड़ौसी प्रदेश से आये थे। आज जरूर वे एक ही शहर में हैं लेकिन सब अलग-अलग गाँव से आकर उस शहर में बसे। सबका बचपन अभावों में, कठिनाइयों के बीच बीता। जिन्दगी ने कदम-कदम पर उनकी परीक्षा ली। कठिन परिश्रम और विकट संघर्ष करते हुए आज की दशा में पहुँचे। सबके सब करोड़पति हैं। वे वर्ष में दो बार किसी दूसरे प्रान्त में, अनजान जगहों पर जाकर इसी तरह माँग कर खाते हैं ताकि अपनी हकीकत भूल न सकें। 

बरसों पहले की बात है। स्वर्गीय दिलीप सिंह भूरिया तब मेरे इलाके के सांसद थे। वे आदिवासी थे। एक सरकारी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। कार्यक्रम से पहले उनके इलाके का एक आदिवासी दल नृत्य प्रस्तुत कर रहा था। ढोल की थाप, थालियों-झालरों की झनकार पर आदिवासी युवा-युवतियाँ खुद को भूल, मद-मस्त नाच रहे थे। लोग मन्त्र-मुग्ध भाव से नाच में खोए हुए थे। किसी को पता ही नहीं चला और अचानक ही दिलीप भाई तेजी से उठे, अपनी धोती घुटनों तक चढ़ाई, दल में शामिल हो गए और नाच खत्म होने तक नाचते रहे। अपनी कुर्सी पर लौटे तो पसीने में लथपथ थे और हाँफ जरूर रहे थे किन्तु चेहरे पर झेंप या हीन भाव की एक लकीर भी नहीं। परम प्रसन्न, सन्तुष्ट मुद्रा में। लोग तो खुश थे और तालियाँ बजा रहे थे किन्तु तमाम अधिकारी हतप्रभ, चकित थे। कलेक्टर ने जिज्ञासु नजरों से देखा तो बोले - ‘मेरा क्षेत्र, मेरे लोग, मेरे गाँव के साथी नाचें और मैं चुपचाप बैठा देखता रहूँ? अरे! मैं इनमें शामिल नहीं होऊँ तो मैं तो मैं ही नहीं रहूँ!’ कलेक्टर दिलीप भाई की नजरों की ताब नहीं झेल सका। उसकी नजरें नीची हो गईं।

हमारे परिवार के अधिकांश सदस्य आज भले ही  आय-कर चुका रहे हैं लेकिन भीख माँगना हमारे परिवार का पेशा था। जैसा कि दादा (श्री बालकवि बैरागी) कहते हैं - उन्हें पहला खिलौना जो मिला वह था, भीख माँगने का कटोरा। लोग ऐसी बातें छुपाते हैं लेकिन दादा हैं कि मौका मिलने पर यह बात बताना नहीं चूकते। गए नौ महीनों में उन्हें चार सम्मान मिले हैं और चारों के चारों लखटकिया। लेकिन दादा आज भी अपने खरीदे हुए कपड़े नहीं पहनते। वे या तो माँगे हुए कपड़े पहनते हैं या कहीं से मिले हुए। कोई उनसे पूछता है तो ठहाका लगा कर कहते हैं - ‘इससे तबीयत और दिमाग, दोनों दुरुस्त रहते हैं।’

प्रसिद्ध भोजपुरी लोक गायक मनोज तिवारी ने यह सब याद दिला दिया। 2014 से वे सांसद (लोक सभा) हैं। एक आयोजन में कार्यक्रम संचालिका ने उनसे एक गीत गाने का आग्रह कर दिया। इसी बात पर वे कुपित हो गए। माइक पर संचालिका को खूब फटकारा। सांसद पद की गरिमा और प्रतिष्ठा का हवाला दिया। उन्हें यह बात अपमानजनक लगी कि उन्हें भोजपुरी लोकगायक के रूप में पहचाना, पुकारा गया। आवेश में वे भूल गए कि ‘सांसदी’ विश्वासघाती प्रेमिका की तरह साथ छोड़ेगी ही छोड़ेगी और लोक गायकी ही चिता तक उनके साथ जाएगी। उनके आदेश के अधीन संचालिका को मंच छोड़ना पड़ा। सारी दुनिया ने यह सब देखा और अभी देख रही है। उनके इस व्यवहार पर सबकी अपनी-अपनी राय हो सकती है। उनका कहा सब कुछ वाजिब हो सकता है किन्तु इस बात से वे खुद कैसे इंकार कर सकते हैं कि उनकी पहली पहचान उनका भोजपुरी लोक गायक होना ही है। इतना ही नहीं, इससे मिली लोकप्रियता और इसीसे बनी उनकी छवि ही उनकी उम्मीदवारी की एकमात्र योग्यता थी। उनसे उनकी राजनीतिक सक्रियता और उनकी पार्टी को उनके योगदान के बारे में पूछा जाएगा तो वे तत्काल शायद ही कुछ बता पाएँ। 

मनोज तिवारी की मनोज तिवारी जानें किन्तु ‘टेम्परेरी’ के दम पर ‘परमानेण्ट’ से आँखें फेरना, उसे खारिज या अस्वीकार करना विवेकसम्मत नहीं। ब्याज का लालच  मूल को ले बैठता है और आदमी खाली हाथ, खाली जेब रह जाता है। 

हम जो नहीं हैं, खुद को वह दिखाने के चक्कर में हम वह भी नहीं रह पाते जो हम हैं। 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 23 मार्च 2017 को प्रकाशित)

समूहिक नकल: देवासवालों की परीक्षा उज्जैन में

कलवाली अपनी पोस्ट पढ़ते-पढ़ते मुझे अचानक ही पहले तो हैरत हुई, फिर खुद पर गुस्सा आया। मेरे जन्म नगर मनासा का एक गर्व पुरुष ऐसी ही एक ऐतिहासिक कथा का रचयिता बना था। मेरे आग्रह पर अपनी यह कथा-रचना उन्होंने ही सुनाई थी। इस कथा के बारे में उन्होंने अपनी ओर से कभी कुछ नहीं कहा। अखबारों में यह घटना छपी न होती तो मुझे भी मालूम न हो पाती।

इस कथा के नायक थे प्रो. श्री हरीश गुलाटी। 

भारत विभाजन के समय पाकिस्तान से आए कुछ पंजाबी परिवार मनासा में बसे। ‘गुलाटी परिवार’ उन्हीं में से एक है। चार भाइयोंवाले इस परिवार के तीसरे भाई थे प्रो. हरीश गुलाटी। बड़े प्रतिभावान। मुझे उनके बारे में न तब बहुत ज्यादा जानकारी थी न अब है। उनका जन्म 1931 या 1932 में हुआ था। मेरी पीढ़ी ने उन्हें देखा कम, उनके बारे में सुना ज्यादा। वे गणित के प्राध्यापक थे। अनुशासन, निष्ठा और ईमानदारी जैसे विशेषण उनके नाम के अविभाज्य अंग थे। वे जहाँ भी रहे, अलग से पहचाने और पूजे गए। छुट्टियों में मनासा आते तो या तो अपनी पारिवारिक दुकान पर बैठते या घर पर। अत्यधिक मितभाषी। कोई बात दो बार पूछो तो एक बार जवाब मिले। कभी आते-जाते नजर आ जाते तो हम लोग ठिठक कर खड़े हो, एक-दूसरे से कहते - ‘देख रे! वो गुलाटी सर जा रहे हैं।’ उन्हें देख लेना हम लोगों के लिए अतिरिक्त उल्लेखनीय बात होती। 

इस समय मुझे सन् तो याद नहीं आ रहा था किन्तु यह बराबर याद है कि वे वार्षिक परीक्षाओं के दिन थे। एक दिन नईदुनिया में खबर छपी कि देवास के एम.एससी. पूर्वार्द्ध के छात्रों की गणित की परीक्षा फिर से होगी और वहाँ के इन छात्रों को परीक्षा देने के लिए उज्जैन जाना पड़ेगा। कारण बताया गया था - इन छात्रों ने सामूहिक नकल की है। समाचार में उल्लेखनीय बात यह थी कि ये तमाम छात्र परीक्षा देते हुए नहीं पकड़े गए थे बल्कि इनकी उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक ने यह सामूहिक नकल पकड़ी थी। इस प्रकार की यह पहली घटना थी। सो, अगले कुछ दिनों तक लगातार यह घटना अखबारों में जगह पाती रही। देवास के छात्र जगत में तीव्र असन्तोष था। प्रदर्शन, नारेबाजी, ज्ञापनबाजी हुई। राजनेता भी बीच में पड़े किन्तु उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक की तथ्यात्मक विश्लेषणवाली रिपोर्ट के आगे किसी की नहीं सुनी गई और पुनर्परीक्षा उज्जैन में ही हुई।  उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक प्रो. हरीश गुलाटी थे। 

इस समाचार ने हम लोगों के लिए प्रो. गुलाटी को और अधिक महत्वपूर्ण तथा रहस्यमयी बना दिया। परीक्षा हॉल में नकल करते पकड़े जाने के किस्से तो कई सुने थे किन्तु उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचने से सामूहिक नकल करना कैसे मालूम हुआ होगा?

निश्चय ही मेरी तकदीर अच्छी थी कि उन परीक्षाओं के बादवाली छुट्टियों में प्रो. गुलाटी मनासा आए तो दादा से मिलने हमारे घर आ गए। वे दादा से बातें कर रहे थे और मैं उन्हें लगातार देखे जा रहा था। लगातार घूरती आँखें हमें अपनी पीठ पर भी अनुभव हो जाती हैं। मैं तो लगभग सामने ही बैठा उन्हें घूरे जा रहा था। वे तनिक असहज हो गए। दादा से बोले - ‘मुझे पहले इससे बात कर लेने दो।’ मुझे अपने पास बुलाया। मुझे कँपकँपी छूट गई-‘बेटा विश्न्या! आज तो गया काम से!’ 

मैं बहुत दूर नहीं बैठा था। मुश्किल से दो-तीन हाथ दूर। यह दूरी पार करने में मुझे मानो उफनता नाला पार करना पड़ा हो। उन्होंने सस्मित पूछा - ‘क्या बात है? क्या हो गया?’ मेरे गले से घरघराहट सी निकली। वे खुलकर हँस दिए। मुझे अभयदान देते हुए बोले - ‘घबरा मत। बता। क्या बात है?’ बड़ी मुश्किल से मेरे बोल फूटे - ‘वो, कॉपियाँ जाँचने से आपको कैसे मालूम हुआ कि सबने नकल की?’ वे खुश हो गए। बोले - ‘तो इतना घबरा कर क्यों पूछ रहा है? बताता हूँ।’ मेरी साँस में साँस आई।

उन्होंने बताया कि उन्होंने उलटे क्रम से उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनी शुरु की। याने सबसे अन्तिम उत्तर पुस्तिका सबसे पहले। अन्तिम से प्रथम के क्रम से। पाँच-सात कॉपियाँ जाँचते-जाँचते हुए उन्हें यह देख कर हैरत हुई कि एक समीकरण हल करते हुए प्रत्येक बच्चे ने, समीकरण के प्रत्येक चरण की शुरुआत में ‘2‘ का अंक लिखा है। उन्होंने यह क्रम बन्द कर, कापियाँ जाँचने का क्रम बदल दिया। याने प्रथम से अन्तिम की ओर। शुरु की पाँच-सात कॉपियाँ देखते ही उन्हें पूरी बात आईने की तरह साफ हो गई।

सबसे पहलेवाले बच्चे ने समीकरण का अगला चरण बराबर के निशान (=) से शुरु किया था। एक के पीछे एक, नकल करते-करते, बराबर का यह निशान ‘=’ से ‘2’ में बदल गया। 

प्रो. गुलाटी को ‘गुप्त सूत्र’ समझ में आ गया था। एक के बाद एक, उन्होंने सारे सवाल देखे और पाया कि जिस-जिस सवाल में बराबर का निशान (=) था, वह अपना स्वरूप बदलते-बदलते ‘2’ में बदल गया। इसके बाद उन्होंने कॉपियाँ तो एक तरफ रख दीं और सिलसिलेवार उदाहरण देते हुए विस्तृत रिपोर्ट के साथ सारी कॉपियाँ विश्व विद्यालय को इस निर्णायक अनुशंसा सहित लौटा दी कि देवास में यदि यह परीक्षा कराई गई तो विश्व विद्यालय की विश्वसनीयता सन्देह के घेरे में आ जाएगी। इस रिपोर्ट के बाद किसी के बोल नहीं फूटे और देवास के बच्चों की यह परीक्षा उज्जैन में ही हुई।

पूरा किस्सा याद आते ही मैंने अपने कक्षापाठी सखा अर्जुन पंजाबी को फोन लगा कर प्रो. गुलाटी को तलाश किया तो मालूम हुआ कि मनासा का यह गर्व पुरुष अब इस दुनिया में नहीं रहा। मैंने उनका फोटू और कुछ जानकारियाँ चाहीं। अर्जुन ने प्रो. गुलाटी के बेटे राजीव का नम्बर दिया। उससे मालूम हुआ कि प्रो. गुलाटी 1994 में सेवानिवृत्त हो गए थे और 2015 में, 83 वर्ष की उम्र में उन्होंने अन्तिम साँस ली। अर्जुन ने ही प्रिय प्रकाश गुलाटी से कह कर प्रो. गुलाटी का फोटू उपलब्ध कराया। फोटू देख कर मुझे धक्का लगा। मेरे दिल-दिमाग में तो उनकी वही छवि बनी हुई थी - भरा हुआ चेहरा, चमकती काली आँखें, मुस्कुराहट सजाए होठ, मजबूत कद काठी। लेकिन फोटू में इस सबमें से कुछ भी नहीं। मानो इतना ही पर्याप्त नहीं था। बची-खुची कसर चश्मे ने पूरी कर दी। ये मेरे प्रो. गुलाटी तो नहीं हैं।

लेकिन मेरा कष्ट यहीं खत्म नहीं हुआ। अपनी ब्लॉग पोस्टें मैं मनासा के कुछ मित्रों को भेजता हूँ। सामूहिक नकल से जुड़ी दो पोस्टें पढ़ने के बाद भी मनासावाले मेरे किसी मित्र को प्रो. गुलाटी से जुड़ी यह महत्वपूर्ण घटना याद नहीं आई।

‘आँख ओट, पहाड़ ओट’ इसी को कहते होंगे। अपने लिए मैं यही सोच कर राहत तलाश कर रहा हूँ कि मेरी यह पोस्ट पढ़कर मनासा के कुछ लोग शायद प्रो. गुलाटी के बारे में आपस में ही पूछताछ कर लें। 
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सारे परीक्षार्थी जेल में

अफसर कुर्सी पर हो या सेवा निवृत्त, अफसरी की उसकी आदतें नहीं जातीं। कामकाजी दिन हो या छुट्टी का दिन, उसे कोई बहाना मिल जाना चाहिए। खुद तो अपनी आरामगाह में ऐश करता रहता है और बाकी सबको काम पर लगा देता है। वाधवाजी ने मेरे साथ यही किया। सत्रह बरस पहले सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन अफसरी नहीं गई। अच्छे-भले रविवार को मुझे काम पर लगा दिया। 

नींद तो रोज की तरह वक्त पर ही खुल गई थी किन्तु उठने को जी नहीं किया। अलसाया हुआ बिस्तर में पड़ा था। दस बजे बाद दिन की शुरुआत की। बारह भी नहीं बजे थे कि फोन घनघनाया। पर्दे पर वाधवाजी का नाम उभरा हुआ था। इन्हें क्या हो गया? ये तो कभी फोन करते नहीं! लपककर फोन उठाया। नमस्कार कर पूछा - ‘आपकी तबीयत तो ठीक है?’ बोले - ‘अच्छा-भला हूँ। ईश्वर की कृपा और आपकी दुआएँ असर किए हुए हैं।’ आयु के चौहत्तरवें बरस में हैं, बीमार हैं लेकिन आवाज वैसी की वैसी - विक्टोरिया कल्दार सिक्के की टनटनाती, कड़क, खनकदार। मैंने पूछा - ‘आज कैसे याद कर लिया?’ बोले - ‘आपने ही उकसाया।’ मैं चकराया। महीनों हो गए इनसे बात किए! जोर से हँसे- ‘सामूहिक नकलवाला  आपका लेख अभी पढ़ा। उसी ने उकसाया।’ मुझे तसल्ली हुई। 

वाधवाजी से कोई बीस-इक्कीस बरस का परिचय है। अपनी किस्म के अनूठे आदमी हैं। नौकरी तो शुरु की थी एक साधारण लिपिक के रूप में लेकिन प्रधान लिपिक, नायब तहसीलदार, तहसीलदार की, पदोन्नति की पायदानें चढ़ते-चढ़ते सेवानिवृत्त हुए अनुभाग दण्डाधिकारी (एसडीएम) के पद से। नियमों, कानून-कायदों की आत्माएँ तक इनकी हाजरी में खड़ी रहें। फाइलबाजी और प्रक्रिया के सारे पेंच इनसे पनाह माँगें। पेचीदा मामले उलझाने में विशेषज्ञ। स्वभाव से मस्तमौला। व्यवहार का आधार ‘जैसा तेरा गाना, वैसा मेरा बजाना’। आप साीधे तो वाधवाजी आपसे भी अधिक सीधे। आप तनिक तिरछे हुए तो वाधवाजी पूरे टेड़े। 
बोले - ‘आपका किस्सा पढ़कर मुझे सुसनेर की आपबीती याद आ गई। मैंने तमाम परीक्षार्थियों को जेल में बैठा दिया था।’ मेरा आलस्य छू हो गया। अब तक चाय ही पी थी। नाश्ते से आगे बढ़कर पूरी खुराक सामने आ गई। मैंने कहा - ‘ऐसा कैसे? बात समझ में नहीं आई। आपको फुरसत हो तो विस्तार से पूरी बात बताइए।’ उसी तरह खनखनाते हुए बोले - ‘यहाँ तो पूरी तरह फुरसत है। आप अपनी देख लो।’ मैंने मौका लपका - ‘लीजिए! मैं भी पूरी तरह फुरसत में हो गया। सुनाइए।’

और वाधवाजी ने कुछ इस तरह आपबीती सुनाई -

यह 1991-92 की बात है। मैं सुसनेर में तहसीलदार था। सुसनेर तब शाजापुर जिले की एक तहसील था। आगर से लगभग तीस किलो मीटर और इन्दौर से करीब डेड़ सौ, एक सौ साठ किलो मीटर दूर। वहाँ राणाजी नाम के एक वकील साहब थे। पूरे इलाके में उनकी तूती बोलती थी। इसी के चलते सुसनेर को ‘राणाजी की सुसनेर’ के नाम से जाना-पहचाना जाता था।

परीक्षाओं के दिन थे। और जगहों की तरह, नकल की शिकायतें यहाँ भी आ रही थीं। चौहान साहब कलेक्टर थे। उनका पूरा नाम याद नहीं। बस! इतना याद है कि वे नीमच या जावद के थे और उनके पिताजी को लोग ‘जापानी वकील साहब’ कहते थे। उन्हें नकलपट्टी पसन्द नहीं थी। उन्होंने पूरे जिले में इस पर नकेल कसने की ठान रखी थी। अपने मनमाफिक नतीजे हासिल करने के लिए वे अपने अधिकारियों को खुल कर काम करने की छूट देते थे। मैं भी पूरी ताकत से इस काम में लगा हुआ था। मुझे तो आप जानते ही हो। जानबूझकर बुरा कभी किसी का किया नहीं लेकिन किसी को यह छूट भी नहीं दी कि मुझे ‘टेकन ग्राण्टेड’ ले ले। दादाओं की तरह पेश आता था। 

उस दिन शनिवार था। मेरी सख्ती से गिनती के लोग नाराज थे जबकि ईमानदार बच्चे और उनके माँ-बाप तो खुश थे। किन्तु आप ही खुद ही कहते हो कि भले लोग चुप रहते हैं और घरों से बाहर नहीे आते। सो, मेरी सख्ती से गिनती के जिन लोगों और बच्चों को असुविधा हो रही थी उन्होंने कुछ और बच्चों को एकट्ठा किया और जुलूस बनाकर, ‘तहसीलदार तेरी दादागीरी, नहीं चलेगी! नहीं चलेगी’ के नारे लगाते हुए आए। मैंने देखा, कोई 60-70 बच्चे चले आ रहे हैं। पुलिस सर्कल इंस्पेक्टर जुलूस के आगे-आगे चल रहा था। बाली सरनेम था उसका। बच्चे तो बच्चे थे। उस उम्र में वे अपना भला-बुरा क्या समझते? उनसे क्या कहना, सुनना? सो मैंने बाली को निशाना बनाया। सबके सामने उसे खूब डाँटा-फटकारा। कुछ गालियाँ भी दीं। वह कुछ भी नहीं समझ पाया कि उसका कसूर क्या था? हक्का-बक्का, परेशान हो मेरा मुँह ताक रहा था। मेरे ऐसे तेवर और बाली की दशा देखकर तमाम बच्चे दहशतजदा हो, बिना किसी के कहे, खुद-ब-खुद चुपचाप बिखर गए। मैं भी चुपचाप अन्दर चला आया। बाली शायद मेरी बात समझ गया था। जब तक हम दोनों सुसनेर रहे, उसने कभी इस बात की शिकायत नहीं की।

जुलूस तो बिखर गया लेकिन बात खत्म नहीं हुई थी। कलेक्टर तक पहुँची। चौहान साहब ने मुझे फोन किया। पूरी बात जानी। फिर पूछा - ‘चाहे जो हो, नकल तो नहीं होगी। बताओ! क्या करना चाहिए और तुम क्या कर सकते हो?’ मैंने कहा कि जहाँ अभी परीक्षा हो रही है वहीं होती रही तो नकल नहीं रुकेगी। परीक्षा की जगह बदली जानी चाहिए। उन्होंने पूछा - ‘तुम करवा सकते हो कहीं और परीक्षा?’ मैं इस सवाल के लिए तैयार था। केवल जवाब ही नहीं सोच रखा था, पूरा एक्शन प्लान भी बना रखा था। जवाब दिया - ‘आज शनिवार है। अगला पेपर सोमवार को है। आप यदि मुझे विशेष सशस्त्र बल (एस ए एफ) का एक-चार (एक हेड कांस्टेबल और चार जवान) का फोर्स दे दें तो मैं दूसरी जगह परीक्षा करा सकता हूँ।’ उन्होंने कहा - ‘फोर्स की कोई दिक्कत नहीं। जितना चाहोगे मिल जाएगा। लेकिन जगह कहाँ से लाओगे?’ मैं पूरी तरह तैयार था। एक सेकण्ड की देर किए बिना बोला - ‘नए जेल की बिल्ंिडग तैयार खड़ी है। उसका उद्घाटन भी नहीं हुआ है। पूरी की पूरी खाली है। वहीं परीक्षा हो जाएगी। जेल का उद्घाटन होगा जब होगा, इस बहाने एक नेक गतिविधि से इसका दरवाजा खुल जाएगा।’ बात सुनकर चौहान साहब बहुत खुश हुए। इतने कि मैं सामने होता तो मेरी पीठ ठोकते। बोले - ‘बहुत बढ़िया विचार है। प्रोसीड।’

इसके बाद मुझे और क्या चाहिए था? शनिवार की रात और रविवार का पूरा दिन मेरे पास था। मैं किसी से कुछ कहता उससे पहले ही सारा किस्सा पूरे सुसनेर में पसर चुका था। मेरा काम बहुत आसान हो गया था। हालत यह हो गई थी कि मैं एक कहूँ तो लोग दो मानने को तैयार। तैयारियाँ कुछ इस तरह हुईं कि रविवार को ही परीक्षा हो जाए।

सोमवार को बच्चे तो बच्चे, झुण्ड के झुण्ड लोग नई बनी जेल की तरफ उमड़ रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो हर कोई जेल में हुई परीक्षा का चश्मदीद गवाह बनना चाह रहा हो। उम्मीद से कहीं ज्यादा शान्ति से परीक्षा पूरी हुई। उसके बाद जब तक मैं सुसनेर रहा तब तक मुझे ‘जेल में परीक्षा करानेवाला तहसीलदार’ के रूप में ही जाना-पहचाना जाता रहा।

वाधवाजी रुक गए। उनके हिसाब से उनकी आपबीती पूरी कही जा चुकी थी। लेकिन मेरे मन का पत्रकार अब भी कुलबुला रहा था। पूछा - ‘किसी पत्रकार ने आपको निपटाया नहीं?’ अचानक कुछ याद आया हो, कुछ इस तरह वाधवाजी बोले - खूब याद दिलाया आपने। यह बात तो मैं तो भूल ही गया था। पत्रकारों ने मुझे खूब घेरा। किसी ने तारीफ की तो किसी ने खुन्नस निकाली। लेकिन अगले दिन अखबारों में समाचार लगभग एक ही हेडिंग से छपा - सारे के सारे परीक्षार्थी जेल में।

अब कुछ भी बाकी नहीं रह गया था। इस पुछल्ले से मुझे वह भी मिल गया था जिसकी ओर वाधवाजी का ध्यान नही नहीं था। मैंने कहा - ‘आपकी आवाज से लग रहा है, आप थक गए हैं। आप हाँफ रहे हैं।’ बरसों का प्रशासकीय अनुभव परिहासपूर्वक बोला - ‘जान रहा हूँ कि आपका काम निकल गया है। चलिए, मैं थका ही सही। मैं भी अपना काम करता हूँ। आप भी अपना काम निपटाइए।’

और हम दोनों ने ठठाते हुए अपना-अपना फोन बन्द कर दिया।
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सामूहिक नकल: दरोगा ने दोस्ती नहीं की

‘बैरागीजी हैं?’

मैं अगले कमरे में बैठकर अपनी लिखत-पढ़त कर रहा था। अपने नाम की हाँक सुन, तनिक ऊँची आवाज में जवाब दिया -‘जी। अन्दर आ जाईए। दरवाजा खुला है।’

वे अदब से अन्दर आए। मुझे नमस्कार किया। मुझे लगा, प्रीमीयम जमा करने आए हैं। मैंने उनकी ओर देखे बिना, लापरवाही से कहा - ‘प्रीमीयम जमा करनी है? बैठिए। पॉलिसी नम्बर दीजिए।’ धीमी आवाज में जवाब आया - ‘नहीं। प्रीमीयम जमा नहीं करनी है। आपसे थोड़ी बात करनी है।’ अब मैंने उनकी ओर देखा। उम्र सत्तर के आसपास। लेकिन चेहरा और कद-काठी पचपन जैसी। सफेद कुर्ता-पायजामा, काला जॉकेट। माथे पर भूरे रंग की टोपी। जेब में दो पेन। दोनों ही स्याहीवाले। हाथों में ‘हंस’ और ‘वीणा’ के मार्च महीने के अंक। 

अपना नाम बता कर बोले - ‘मैं सेवानिवृत्त हायर सेकेण्डरी लेक्चरार हूँ। पास ही के गाँव में रहता हूँ। पढ़ाना मेरा व्यवसाय था। पढ़ने का शौक है। सुबह भोजन कर रोज रतलाम आ जाता हूँ। साहित्यिक रुचिवाले मित्रों, परिचितों से मिल कर, बतिया कर शाम को लौट जाता हूँ। आज एक मित्र के बेटे ने आपका लेख पढ़वाया। बिलकुल वैसे ही एक किस्से का अनुभव मुझे भी है। वही सुनाने आया हूँ। सुन लीजिए और हो सके तो इस पर भी एक लेख लिख दीजिए।’ उन्हें लेकर मेरी सोचने की दिशा और धारणा एक झटके में बदल गई। वे अपने लिए नहीं, मेरे लिए आए थे। मैंने चाय की मनुहार की। सहजता से बोले - ‘बात में थोड़ा समय तो लगेगा ही। बनवा लीजिए। पी लूँगा।’

बिना किसी विस्तृत परिचय और भूमिका के उन्होंने कुछ इस तरह अपना अनुभव बताया।

यह कोई दस बरस पहले की बात है। हायर सेकेण्डरी की वार्षिक परीक्षा में उनकी डयूटी लगी थी। परीक्षा केन्द्र शहर के एक छोर पर स्थित स्कूल में था। इस दो मंजिले स्कूल भवन का मुख्य दरवाजा आम स्कूलों की तरह खूब चौड़ा, चेनल वाला ही था। परीक्षार्थियों की बैठने की व्यवस्था दोनों मंजिलों पर थी। यह स्कूल इनका नहीं था। इसमें ये पहली बार आए थे। योग-संयोग कुछ ऐसा रहा कि यहाँ ये किसी को नहीं जानते थे। 

केन्द्राध्यक्ष द्वारा बताए कमरे में गए तो पाया कि उनका कमरा ठीक चेनल गेट के पासवाला है। समयानुसार परीक्षा की कार्रवाई शुरु हुई। कमरों में प्रश्न-पत्र पहुँचे, बँटे। बच्चों ने अपनी-अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में माथा गड़ाया। सब कुछ शान्त, संयत, नियन्त्रित। 

पाँच-सात मिनिट ही बीते होंगे कि चेनल गेट बन्द होने की आवाज आई। इन्हें अटपटा लगा। जिज्ञासावश गेट तक आए। देखा, चपरासी गेट पर ताला लगा रहा था। इन्हें कुछ समझ में नहीं आया। परीक्षा ड्यूटी का बरसों का अनुभव। किन्तु इस तरह मुख्य दरवाजे पर ताला कभी, कहीं नहीं लगा। चपरासी से पूछा। जवाब मिला - ‘यहाँ ऐसे ही परीक्षा होती है।’ अब कुछ जानने, समझने की जरूरत नहीं रह गई थी। जी कसैला हो गया। डर भी लगने लगा। ऐसा सुना तो जरूर था किन्तु देखा कभी नहीं था। आज न केवल देख रहे थे बल्कि इसका हिस्सा भी हो रहे थे। मन ही मन भगवान का नाम लिया-‘बचाना भगवन्। रिटायरमेण्ट के दो बरस बचे हैं। बुढ़ापा मत बिगाड़ देना।‘ अब इनका ध्यान परीक्षा पर कम, खुद के बचाव पर ज्यादा हो गया।

तकदीर बहुत अच्छी थी कि इनके कमरे में नकल नहीं हो रही थी। लेकिन मनोदशा ऐसी हुई कि हर बच्चा नकल करता नजर आ रहा था। एक-एक पल भारी पड़ रहा था। आज सब राजी-खुशी निपट जाए तो गंगा नहाए। कल, कुछ भी करके अपना केन्द्र बदलवा लेंगे।

कोई डेड़ घण्टा बीता होगा कि मुख्य दरवाजे पर कार रुकने की आवाज आई। फिर, कार की फाटकें खुलने और बन्द होने की। सीढ़ियों पर कुछ लोगों के चढ़ने की आहट हुई। फिर, चेनल खड़खड़ाने के साथ ही किसी ने रोबदार आवाज में आदेश दिया - ‘दरवाजा खोलो।’ चपरासी बहुत दूर नहीं था। लेकिन वह भागकर नहीं आया। आना तो दूर, पहली बार तो उसने मानो आवाज सुनी ही नहीं। पल भर की प्रतीक्षा के बाद चेनल जोर-जोर से खड़खड़ाने के साथ बावाज गूँजी ‘अरे! सुना नहीं? दरवाजा फौरन खोलो।’ इस बार चपरासी भाग कर आया। पूछा - ‘आप लोग कौन हैं?’ बौखलाई हुई आवाज ने बुरी तरह से फटकारते हुए कहा - ‘कौन हैं? समझ में नहीं आता? इंस्पेक्शन टीम आई है। चलो! फटाफट दरवाजा खोलो।’ चपरासी ने हाथ जोड़कर, नम्रतापूर्वक माफी माँगी और पूरी ताकत से केन्द्राध्यक्ष को पुकारा - ‘सर! चाबी दीजिए। गेट खोलना है। इंस्पेक्शन टीम आई है।’ 

होना तो यह चाहिए था कि केन्द्राध्यक्ष पहली मंजिल से कूद कर आते। लेकिन इसके बदले जवाब आया - ‘रुकना जरा! सर बाथरूम गए हैं। आते हैं।’ 

इसके बाद, जो होना था, वही हुआ। केन्द्राध्यक्ष आए। क्षमा याचना करते हुए खुद ताला खोला। कहा-सुनसान इलाके के कारण सुरक्षा की दृष्टि से दरवाजे पर ताला लगाना पड़ा। 

लेकिन इसके बाद वह नहीं हुआ जो इंस्पेक्शन टीम को करना था। निरीक्षण दल के प्रमुख ने निरीक्षण से इंकार कर दिया। कहा-‘अब केन्द्र का नहीं, आपका निरीक्षण करेंगे। वह भी यहाँ नहीं, कलेक्टर के दफ्तर में।’ 

दल प्रमुख ने वहीं, वस्तुस्थिति के विस्तृत ब्यौरे सहित रिपोर्ट बनाई। केन्द्राध्यक्ष के हस्ताक्षर लिए और लिखित में आदेश दिए - ‘उत्तर पुस्तिकाएँ सील कर आप कलेक्टर कार्यालय पहुँचें। अगली कार्रवाई वहीं होगी।’

घटना सुनकर मैंने पूछा - ‘उसके बाद क्या हुआ? केन्द्राध्यक्ष पर कोई कार्रवाई हुई? उन्हें कोई सजा मिली?’ ये बोले - ‘उस वक्त तो मुझे कुछ भी भान नहीं रहा। ड्यूटी के बाद घर जाने के बजाय सीधा जिला शिक्षाधिकारी के पास पहुँचा। पूरी बात सुनाई और साफ-साफ कह दिया कि मैं तो अब वहाँ ड्यूटी नहीं करूँगा। फिर चाहे मुझे बर्खास्त ही क्यों नहीं कर दें। उन्होंने मेरी सुनवाई कर ली। फौरन मेरी ड्यूटी बदल दी।’ मैंने अपनी जिज्ञासा दुहराई तो बहुत खुश होकर बोले - ‘सर! इंस्पेक्शन टीम के प्रमुख ने उस दरोगा की तरह केन्द्राध्यक्ष से दोस्ती नहीं की। उन्होंने पहली ही रिपोर्ट ऐसी बनाई कि केन्द्राध्यक्ष को निलम्बित कर जाँच बैठाई गई जिसमें वो दोषी साबित हुए। सजा के तौर पर उन्हें अपने घर से सैंकड़ों किलोमीटर दूर फेंक दिया गया। उनकी भविष्य की सारी वेतनवृद्धियाँ रोक दी गईं और ऐसी व्यवस्था कर दी गई कि वे फिर कभी परीक्षा केन्द्राध्यक्ष नहीं बन सके।’ 

मैंने देखा, उनके चेहरे पर परम प्रसन्नता व्याप्त है। उनके अनुसार वे दो बातों से बहुत खुश थे। पहली, उन पर कोई आँच नहीं आई और दूसरी, निरीक्षण दल के दरोगा ने दोस्ती नहीं की।

जिस तन्मयता और आत्मपरकता से उन्होंने आपबीती कही यह उसका ही प्रभाव था कि इस बीच कब चाय आई और कब हमने पी ली, हमें पता ही नहीं चला।

सुख और प्रसन्नता के क्षण सचमुच में बहुत तेजी से बीतते हैं।
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पटेल बा की अफीम की तस्करी



वे रतलाम आए तो मुझे तलाश कर, मिलने के लिए बुलाया। मैं हाथ के सारे काम छोड़, भाग कर गया। कम से कम पैंतीस बरस बाद उनसे मिलना जो हो रहा था! हम दोनों की उम्र में अठारह बरस का फासला है-वे 88 बरस के, मैं 70 बरस का। लेकिन इस अन्तर को उन्होंने न तो खुद माना न ही मुझे मानने दिया। परिचय के पहले ही क्षण से मित्रवत् ही मिले और आज जब मिले तब भी उसी भाव से। स्वभाव पर उम्र की छोटी सी खरोंच भी नहीं आ पाई। खूब गर्मजोशी से मिले। खूब बतियाये। बातें करते-करते मुझे, हमेशा की तरह ही पाँच-सात धौल जमाए। वैसे ही झन्नाटेदार, जैसे पैंतीस बरस पहले थे। बातों ही बातों में वह किस्सा भी सुनाया जिसने उनकी ‘पटलई’ को सीमेण्ट-काँक्रीट की मजबूती दे दी थी। 

वे बरसों तक, मन्दसौर जिले की मल्हारगढ़ तहसील के एक समृद्ध गाँव के ‘पटेल’ बने रहे। वे उस जमाने के ‘इण्टर पास’ हैं जिस जमाने में मेट्रिक पास होना ही किसी को दर्शनीय बना देता था। अच्छी-खासी सरकारी नौकरी मिल रही थी लेकिन न तो ताबेदारी (अधीनस्थता)  कबूल न ही बँध कर रहना। सो इंकार कर दिया। परिवार के पास सिंचित जमीन का भरपूर रकबा। खुद को खेती में झोंक दिया। ‘इण्टर पास पेण्टधारी जण्टरमेन’ को खेतों में बुवाई, सिंचाई, निंदाई-गुड़ाई करते देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते।

आज तो नीमच अलग जिला है लेकिन तब वह मन्दसौर जिले का उप सम्भाग (सब डिविजन) हुआ करता था। प्रदेश को, सुन्दरलालजी पटवा और वीरेन्द्रकुमारजी सकलेचा जैसे दो-दो मुख्यमन्त्री देने की पहचान से पहले मन्दसौर जिले की पहचान अफीम के लिए रही है। मध्य प्रदेश में सर्वाधिक अफीम मन्दसौर जिले में ही पैदा होती है। अफीम की खेती वहाँ आज भी एक महत्वपूर्ण ‘सामाजिक प्रतिष्ठा-प्रतीक’ है। आज तो स्थिति लगभग आमूलचूल बदल गई है किन्तु तब माना जाता था कि प्रत्येक अफीम उत्पादक किसान किसी न किसी स्तर पर अफीम तस्करी से जुड़ा हुआ है। 

जैसा कि ‘पटेल बा’ ने बताया, उनका गाँव अफीम उत्पादक गाँवों मे अग्रणी था। नामचीन अफीम तस्कर और उनके कारिन्दे इस गाँव मे अक्सर नजर आते थे। एक बार अफीम का बड़ा सौदा हुआ। गाँव के कई किसान इस सौदे में शरीक थे। पढ़े-लिखे और प्रतिभाशाली होने के कारण पटेल बा को गाँव की ओर से प्रभारी बनाया गया। तय हुआ कि फलाँ तारीख की रात को तस्कर के लोग आकर अफीम की डिलीवरी लेंगे। भागीदार किसानों की अफीम पटेल बा के घर में इकट्ठी की गई। 

एक तो बड़ा सौदा और दूसरे, माथे पर जिम्मेदारी। सो, पटेल बा ने अपने पक्के मकान की छत पर खाट बिछाई। अमावस की रात। माहौल में अफीम की मादक गन्ध। लेकिन पटेल बा की आँखों ने नींद को अनुमति नहीं दी। कभी खाट पर बैठें तो कभी छत पर चहल कदमी करें।

आधी रात होने को आई। तस्कर के कारिन्दों के आने का समय हो चला था। पटेल बा की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। ऐसा काम अब तक छुटपुट स्तर पर ही किया था। इतने बड़े स्तर का पहला मौका था। उनकी आँखें मानो मशालें बन जाना चाह रही थीं। अँधेरे को घूर कर और चीर कर दूर-दूर तक देखने, टोह लेने की कोशिशें जारी थीं।

लेकिन पटेल बा चौंके। दूर से दो जीपों की बत्तियाँ चमकती नजर आईं। यह क्या? यह तो तय नहीं हुआ था! तस्कर के लोग तो मोटर सायकिलों से आनेवाले थे! ये जीपें कैसी? बात समझने में पटेल बा को क्षण भी नहीं लगा। निश्चय ही किसी भेदिये ने पुलिस को खबर कर दी होगी। अब क्या किया जाए? जीपों की घरघराहट और उनकी रोशनी पल-पल बढ़ती जा रही थी। गाँव से उनकी दूरी हर साँस पर कम होती जा रही थी। छापा कामयाब हो गया तो आधे से ज्यादा गाँव पकड़ा जाएगा! क्या किया जाए? 

जैसे किसी आत्मा ने पटेल बा पर अपनी सवारी उतार दी हो इस तरह पटेल बा ने जोर-जोर से चिल्लाना, आवाजें लगाना शुरु कर दिया - ‘डरना मत रे! घबराना मत रे! ये डाकू नहीं हैं। ये तो अपने पुलिसवाले हैं।’ छोटा सा गाँव और कवेलू की छतें। पटेल बा की आवाज गाँव के हर घर में गूँज उठी। जिनकी अफीम थी वे तो पहले से ही अधजगे थे। वे तो पूरे जागे ही जागे, बाकी गाँव भी जाग गया और पटेल बा का मकान मानो पंचायत घर में बदल गया। जिनका ‘माल’ था, वे चीतों की तरह झपटे। अपना-अपना ‘माल’ कब्जे किया। ठिकाने लगा कर वापस पटेल बा के घर पहुँच, भीड़ में शामिल हो गए।

कुछ ही मिनिटों में पुलिस दल पहुँच गया। पूरे गाँव को जमा देख दरोगाजी भन्ना गए। सारा खेल खराब हो चुका था। समझ तो गए थे किन्तु कहते और करते भी क्या? पटेल बा को खरी-खोटी सुनाने लगे। उधर दरोगाजी बिफरे जा रहे इधर पटेल बा मासूम, दयनीय मुद्रा में सफाई दिए जा रहे - ‘क्या गलत किया सा‘ब? डाकू समझ कर गाँव के लोग बन्दूकें चला देते। पता नहीं क्या से क्या हो जाता। मैंने तो आपको और गाँववालों को बचाया सा‘ब! और आप हैं कि मुझे डपटे जा रहे हैं! सच्ची में भलमनसाहत का तो जमाना ही नहीं रहा।’ पूरा गाँव पटेल बा की हाँ में हाँ मिलाता, मुण्डियाँ हिला रहा। दरोगाजी की झल्लाहट देखते ही बनती थी। 

दरोगाजी आखिर कब तक चिल्लाते? जल्दी ही चुप हो गए। पटेल बा ने गाँववालों को डाँटा - ‘अपना आराम छोड़ कर आधी रात को हाकम आए हैं। तुम आँखें फाड़े देख रहे हो! कुछ तो  शरम करो! गाँव का नाम डुबाओगे क्या? हाकम को कम से कम पानी की तो पूछो!’ सुनते ही पूरा गाँव ताबेदारी में जुट गया। फटाफट देसी घी का हलवा बनाया और लोटे भर-भर ‘कड़क-मीठी’ चाय पेश की। 

भुनभुनाते हुए दरोगाजी चलने को हुए तो पटेल बा ने कुछ इस तरह मानो मक्खन में छुरी गिर रही हो, ‘मालवी मनुहार’ की - ‘साब! अब आधी रात में कहाँ जाओगे? गाँववालों के भाग से आपका आना हुआ। रात मुकाम यहीं करो। सवेरे कलेवा करके जाना।’ दरोगाजी तिलमिला उठे। मानो कनखजूरे पर चीनी छिड़क दी हो। चिहुँक कर बोले - ‘रहने दो पटेल! रहने दो। मुँह में आया निवाला तो आधी रात को छीन लिया और सुबह के कलेवे की मनुहार कर रहे हो। तुम्हारी मनुहार का मान फिर कभी रखूँगा। याद रखूँगा और राह देखूँगा। लेकिन तुम भी याद रखना। जब कभी मेरे ठिकाने पर आओगे तो कलेवा तो क्या पूरा भोजन कराऊँगा। वो भी बिना मनुहार के।’

बमुश्किल अपनी हँसी रोकते हुए पटेल बा, नतनयन, दीन-भाव से विनीत मुद्रा में बोले - ‘आप हाकम, हम रियाया। जैसे रखेंगे वैसे रहेंगे हजूर। आप नाराज हों, आपकी मर्जी। अपने जानते तो हमने कोई गुनाह नहीं किया। फिर भी आप सजा देंगे तो भुगत लेंगे हजूर! ग्रीब तो जगत की जोरू होता है। भला हाकम से हुज्जत कर सकता है?’

ठठाकर हँसते हुए पटेल बा ने कहा - ‘आग उगलती आँखों से देखते हुए दरोगाजी ने बिदा ली। उनकी जीपों ने गाँव छोड़ा भी नहीं कि मेरे घर के सामने जश्न मनने लगा। लोगों ने मुझे कन्धों पर उठा लिया। उसके बाद किसी ने गाँव का पटेल बनने की बात सोचना ही बन्द कर दी। नया पटेल तभी बना जब मैंने अपनी मर्जी से पटलई छोड़ी।’

मैंने पूछा - ‘वो सब तो ठीक है लेकिन आपको भोजन कराने की, दरोगाजी की हसरत पूरी होने का मौका तो नहीं आया?’ पटेल बा बोले - ‘दरोगा गुस्सैल जरूर था लेकिन मूरख नहीं। अपनी आँखों देख लिया था कि पूरा गाँव मेरी पीठ पर है। कुछ ही दिनों बाद उसने खुद ही दोस्ती कर ली।’ मैंने शरारतन पूछा - ‘आपके हर काम से दोस्ती कर ली?’ जोरदार धौल टिकाते हुए बोले - ‘पोते का दादा हो गया लेकिन अब तक अक्कल नहीं आई। उस दिन क्या उस बेचारे की फजीहत कोई कम हुई जो आज तू फिर मुझसे उसकी फजीहत कराना चाहता है।?’  

ठठाकर हँसते हुए, टेल बा ने मुझे बाँहों में भर लिया।
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बुलबुल भी हम, सैयाद भी हम

जब से उसके पास से लौटा हूँ, वह रोज सुबह वाट्स एप पर ‘सुविचार-सन्देश’ देने लगा है। पहले नहीं देता था। आज का चलन यही है। किन्तु आज आया उसका सन्देश पढ़कर मन जाने कैसा-कैसा तो हो गया है! सन्देश है - ‘रोटी कमाना बड़ी बात नहीं है। परिवार के साथ खाना बड़ी बात है।’ इन तेरह शब्दों ने मुझे झिंझोड़ दिया है। उसने यह सन्देश खुद भी पढ़ा या नहीं? केवल मुझे ही भेजा है या सबको? मुझे कह रहा है या अपनी व्यथा-कथा सुना रहा है? 
वह घर से कोई तीन सौ किलो मीटर दूर है। मित्र का बेटा है। अट्ठाईस बरस का, अविवाहित। मुझे पितृवत् मान देता है। किसी काम से उसके नगर जाना हुआ तो तीन दिन उसी के कमरे पर ठहरा। हम लोग बहत्तर घण्टे एक छत के नीचे रहे किन्तु दिन के उजाले में एक बार भी एक-दूसरे को नहीं देखा। वह सुबह सवा पाँच, साढ़े पाँच बजे निकल जाता। मैं अपनी सुविधा और आवश्यकतानुसार निकलता। मैं दिन ढलते कमरे पर पहुँच जाता किन्तु वह कभी भी रात साढ़े नौ बजे से पहले नहीं पहुँचा। वह भोजन करके आता और मैं उसके आने से पहले भोजन कर चुका होता। उसने चाहा भी कि कम से कम एक समय तो हम दोनों साथ भोजन करते। किन्तु ऐसा हो नहीं पाया। मैं लौटा तो उससे मिले बिना ही। उसकी गैर हाजरी में। उसने फोन पर कहा - ‘तीन साल से नौकरी कर रहा हूँ। लेकिन जैसा आज लग रहा है, वैसा पहले कभी नहीं लगा। मम्मी-पापा आते रहे। उनके साथ भी ऐसा ही हुआ। लेकिन आपका इस तरह जाना बर्दाश्त नहीं हो रहा। मम्मी-पापा तो आते रहेंगे लेकिन आप कब आएँगे? आज पहली बार अपनी नौकरी पर गुस्सा भी आ रहा है और शर्म भी। आप मुझे माफ कर दीजिएगा।’ उसकी भर्राई आवाज ने मुझे हिला दिया। मानो, कोई वट वृक्ष अपनी जड़ें छोड़ रहा हो। मैंने कठिनाई से कहा - ‘वल्कल (मेरा बड़ा बेटा)  की दशा भी कुछ ऐसी ही है। मैं समझ सकता हूँ। तुम मन पर बोझ मत रखो।’ 
माँ-बाप जल्दी से जल्दी उसका विवाह कर देना चाहते हैं। वह भी राजी है। किन्तु  वह पहले ‘सेटल’ हो जाना चाहता है। ‘सेटल’ याने इतना समृद्ध कि अपनी और अपनी पत्नी की इच्छाएँ पूरी कर सके। उसकी दशा देख कर फिल्म ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ की, बरसात में भीगते हुए, ‘तेरी दो टकिया की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए’ गाती हुई, नायिका नजर आने लगी। मुझे दहशत हो आई। मन ही मन प्रार्थना की - ‘हे! भगवान। इसे वैसी दशा से बचाना।’ 
गए रविवार को कुछ घण्टों के लिए भोपाल में था। तीन परिवारों में जाना हुआ। तीनों ही परिवारों में बूढ़े/अधेड़ पति-पत्नी। बिलकुल मुझ जैसी दशा तीनों की। बच्चे गिनती के और वे भी अपनी-अपनी नौकरी पर बेंगलुरु या पूना में। वहाँ, बच्चों को अपनी देखभाल करनी है और यहाँ हम बूढ़ों को अपनी। वे हमें लेकर चिन्तित और हम उन्हें लेकर। न वे हमारे साथ रह सकते और न ही हम वहाँ जाने की स्थिति में। तीनों जगह एक ही विषय। सम्वाद भी लगभग एक जैसे। उलझन भी एक जैसी - “बच्चों की ‘अच्छी-भली’ नौकरी पर खुश हों या सकल परिस्थितियों पर झुुंझलाएँ?” क्या स्थिति है! प्रत्येक वार त्यौहार पर वे हमें याद करें और हम उन्हें। त्यौहारों पर व्यंजन बनाने का जी न करे और बना लें तो स्वाद नहीं आए। मुझे रह-रह कर पुराना फिल्मी गीत याद आता है - ‘कैद में है बुलबुल, सैयाद मुस्कुराए। कहा भी न जाए, चुप रहा भी न जाए।’ किससे शिकायत करें? किसे दोष दें? हम ही बुलबुल, हम ही सैयाद! 
प्रख्यात कवि सुरेन्द्र शर्मा का एक वीडियो अंश मुझे एक के बाद एक, कई मित्रों ने भेजा। इस वीडियो अंश में सुरेन्द्र भाई दिल्ली के किसी कॉलेज में व्याख्यान देते हुए, अपने स्वभावानुरूप परिहासपूर्वक पालकों और बच्चों की मौजूदा ‘कैदी दशा’ और विसंगतियों पर तंज कस रहे हैं। सुनते हुए, कभी लगता है वे हमें रुला देंगे तो कभी लगता है खुद ही न रो दें। साफ अनुभव होता है कि तमाम बातों में कहीं न कहीं वे खुद भी शामिल हैं। उलझनों के बीहड़ में वे अपना रास्ता कुछ इस तरह घोषित करते हैं - ‘मेरा बेटा केवल पन्‍द्रह हजार रुपये महीने की नौकरी करता है लेकिन रात का भोजन मेरे साथ करता है। मेरे लिए इससे बड़ा और कोई पेकेज नहीं।’
यह तीन दिन पहले की बात है। रात के आठ बजनेवाले थे। प्रीमीयम जमा करने के लिए विजय भाई माण्डोत मेरे घर आए। मैंने चाय की मनुहार की। हाथ जोड़कर, नम्रतापूर्वक इंकार करते हुए बोले - ‘अंकुर दुकान मंगल करके घर पहुँच रहा होगा। सब भोजन पर मेरी राह देखेंगे। हम तीनों बाप-बेटे, एक ही थाली में, एक साथ भोजन करते हैं। पहले मेरी पत्नी भी साथ देती थी। किन्तु अंकुर की शादी के बाद वे दोनों सास-बहू एक साथ भोजन करती हैं और हम तीनों एक साथ। (विजय भाई के दो बेटे हैं।) इसके लिए हमने एक बड़ी थाली अलग से खरीद रखी है।’ मुझे रोमांच हो आया। उन्हें दरवाजे से ही विदा किया और मन ही मन याचना की - ‘हे! प्रभु! कृपा करना। इस थाली को सदैव उपयोगी बनाए रखना।’
नहीं जानता कि आज स्थिति क्या है। किन्तु, जब तक गाँव में रहा तब तक मालवा के लोक मानस में ‘पढ़ाई’ सदैव ही दोयम पायदान पर पाई। बच्चे को पढ़ाने का मतलब घर से दूर करना। पढ़-लिख कर घर से दूर जाने के बजाय, जीवन यापन का कोई ठीक-ठीक जतन कर, गाँव-घर में ही रहने को बेहतर माना जाता था। यहाँ तक कि अपनी मिट्टी न छोड़ने के लिए भीख माँगने तक की अनुमति दी जाती थी। 
एक गीत हमने खूब गाया भी और खूब सुना भी। किन्तु गाते-सुनते समय इसकी व्यंजना का अनुमान कभी नहीं हो पाया। आज की हकीकत अब इस गीत की व्यंजना अनुभव करा रही है। आज, बारहवीं के बाद, ‘उच्च शिक्षा’ के लिए घर से निकल रहा बच्चा, वस्तुतः हमेशा के लिए घर से दूर हो रहा है। मालवा के ‘लोक’ ने इस यथार्थ का अनुमान पता नहीं कब से लगा रखा है। इन सारे क्षणों से गुजरते हुए वही सब याद आ रहा है।
पंछियों से फसलों की रक्षा के लिए खेत के बीचोंबीच मचान बनाया जाता है। रखवाला किसान, गोफन (और पत्थर लिए) लिए उसी पर अपने दिन-रात काटता है। कभी गोफन चला कर, कभी थाली बजा कर तो कभी मुँह से विभिन्न आवाजें निकाल कर पंछियों को फसल पर बैठने से रोकता है। मालवी में मचान को ‘डागरा’, पढ़ाई/शिक्षा को ‘भणाई, पंछियों को भगाने को ‘ताड़ना’ और तोते को ‘हूड़ा’ कहते हैं। उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाने को मचल रहे बेटे को रोकने के लिए किसान कहता है -
‘बेटा! भणे मती रे!
आँपी माँगी खावाँगा।
डागरा पे बेठा-बेठा,
हूड़ा ताड़ाँगा।’
अर्थात्-बेटे! अपन यहाँ माँग कर खा लेंगे, तोतों को भगा-भगा कर, मचान पर बैठ, खेतों की रखवाली करके अपना पेट पाल लेंगे। किन्तु तू पढ़ाई के लिए बाहर मत जा। घर मत छोड़।   
गाँवों से पलायन में तेजी आई है। गाँव का पिता यह गीत गाता तो अब भी होगा लेकिन उसकी आवाज धीमी हो गई होगी। जिन्दा रहना पहली शर्त है। क्या पता, रोकनेवाला पिता खुद भी बेटे के पीछे-पीछे चल पड़ा हो। 
किससे कहें? क्या कहें? बुलबुल भी हम और सैयाद भी हम। 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में 09 मार्च 2017 को प्रकाशित।)