Showing posts with label अनुचित अपने आसपास. Show all posts
Showing posts with label अनुचित अपने आसपास. Show all posts

.......और मैंने असल से पहले नकल कर ली

सोमवार, ग्यारह दिसम्बर की सुबह। थक कर चूर था। एक दिन पहले, दस दिसम्बर को छोटे बेटे तथागत का पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुआ था। कुछ रस्में बाकी थीं। घर में उन्हीं की तैयारी चल रही थीं। थक कर बैठने की छूट नहीं थी। मुझ जैसे आलसी आदमी को सामान्य से तनिक भी अधिक कामकाज झुंझलाहट और चिढ़ से भर देता है। मैं इसी दशा और मनोदशा में था। तभी फोन घनघनाया। चिढ़ और झुंझलाहट और बढ़ गई। बेमन से फोन उठाया। उधर
से भाई अनिल ठाकुर बोल रहे थे। वे रतलाम से हैं और इन दिनों पुणे में हैं। वे क्षुब्ध और आवेशित थे। उन्होंने जो खबर दी उससे मेरी थकान, झुंझलाहट, चिढ़, सब की सब हवा हो गई। मैं ताजादम हो, हँसने लगा। मेरी इस प्रतिक्रिया ने अनिल भाई को चिढ़ा दिया। बोले - ‘मेरी इस बात पर आपको गुस्सा आना चाहिए था। नाराज होना चाहिए था। लेकिन आप हैं कि हँस रहे हैं! यह क्या बात हुई?’ मैंने कहा - ‘क्यों न हँसू भला? आपको नहीं पता, आपने इस जर्रे को हीरे में तब्दील हो जाने की खबर दी है।’ फिर मैंने उन्हें कवि रहीम का यह दोहा सुनाया -

रहीमन यों सुख होत है, बढ़त देख निज गोत।
ज्यों बढ़री अँखियन लखिन, अँखियन को सुख होत।।’

मेरा जवाब सुन अनिल भाई अपना गुस्सा, अपना क्षोभ भूल गए। बोले - ‘पहले तो इस दोहे का अर्थ बताइए और फिर बताइए कि मेरी बात का इस दोहे से क्या लेना-देना?’ मैंने जवाब दिया - ‘आपकी बात सुन कर मुझे ठीक वैसा ही सुख हुआ जैसे किसी की बड़ी आँखें (मृग-लोचन) देख कर बड़ी आँखों वाले को और अपनी गोत्र वृध्दि होने पर किसी को होता है। यही इस दोहे का अर्थ भी है। आज आपने मेरी गोत्र वृद्धि की ही खुश खबर दी है।’

वस्तुतः हुआ यह कि अनिल भाई ने, पुणे के हिन्दी दैनिक ‘आज का आनन्द’ के, रविवार दस दिसम्बर के अंक में, अखबार के मालिक और सम्पादक श्री श्याम ग्यानीरामजी अग्रवाल का ‘जिंदगी में न्याय ही दुनिया का संवर जाना है/मौत तो इंसान के सपनों का बिखर जाना है/जिन्दा रहना है तो मरने का सलीका सीखो/वरना मरने को तो हर आदमी को मर ही जाना है’ शीर्षक आलेख पढ़ा तो उन्हें (अनिल भाई को) लगा कि यह लेख वे पहले भी कहीं पढ़ चुके हैं। उन्होंने खूब सोचा। उन्हें अचानक ही, सात दिसम्बर को प्रकाशित मेरी इस ब्लॉग पोस्ट का ध्यान आया जो सात दिसम्बर को ही भोपाल से प्रकाशित हो रहे दैनिक ‘सुबह सवेरे’ में भी छपी थी। उन्होंने अपना वाट्स एप टटोला और अपने अनुमान को सही पाया। उन्होंने श्यामजी के लेख की स्केन प्रति मुझे भेजी। पढ़ने में मुझे तनिक असुविधा तो हुई लेकिन जैसे-तैसे पढ़ने पर लगा कि अनिल भाई सच ही कह रहे हैं।

‘आज का आनन्द’ पुणे का अग्रणी हिन्दी अखबार है। छियालीस बरसों से निरन्तर प्रकाशित हो रहा है। आठ कॉलम आकार में सोलह पृष्ठों का अखबार है। सारे के सारे सोलह पृष्ठ रंगीन। मोहक साज-सज्जा और आकर्षक ले-आउट। श्यामजी का स्तम्भ सम्भवतः प्रतिदिन छपता है।


यह है वह लेख जिससे अनिल भाई क्षुब्ध हुए

एक ही विचार/भाव भूमि पर एकाधिक रचनाएँ, लेख मिलना बहुत ही स्वाभाविक है। लेकिन शब्द चयन, वाक्य विन्यास, घटनाओं/सन्दर्भों का ब्यौरा शब्दशः समान हो और घटनाक्रम भी जस का तस हो, ऐसा तो कभी होता ही नहीं। लेकिन श्यामजी के लेख में ऐसा ही हुआ। उनका लेख पढ़कर मुझे लगा कि  मैंने श्यामजी के लिखने के तीन दिन पहले ही उनकी नकल कर ली है। मुझे अतीव प्रसन्नता हुई - ‘चलो! मैं भी ठीक वैसा ही सोचता हूँ जैसा कि छियालीस बरसों से छप रहे प्रतिष्ठित और लोकप्रिय दैनिक अखबार का प्रधान सम्पादक सोचता है।’ और यह भी कि यह जर्रा (याने कि मैं) खुद के हीरा होने का आत्म-मुग्धता भरा मुगालता तो पाल ही सकता है।

मैंने मन ही मन, श्यामजी को धन्यवाद दिया। उन्होंने मेरी बात को न केवल रेखांकित किया बल्कि उस पर अपना ठप्पा लगाकर ‘गुणवत्ता प्रमाणीकरण’ (क्वालिटी सर्टिफिकेशन) भी कर दिया। उसे विस्तारित किया, यह मेरे लिए अतिरिक्त उत्साहजनक कारक है। उम्मीद है, वे मुझ पर इसी तरह नजर बनाए रखेंगे और इसी तरह मेरा उत्साह बढ़ाते रहेंगे।

मेरी बातें सुनकर (अब) अनिल भाई भी ठठा कर हँसे। बोले - ‘आप बार-बार खुद के आशावादी और सकारात्मक होने का जो दावा करते हैं, वह आज समझ में आया। मैं बेकार ही दुःखी हुआ। अब मैं भी इसका मजा लूँगा। चलिए! लगे हाथों तथागत की शादी की और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर लेने की बधाइयाँ कबूल कीजिए।’

हमारी बात यहीं ठहर गई और मैं अपनी थकान, झुंझलाहट, चिढ़ भूल कर, पूरी तरह ताजादम हो, शादी के बाकी काम निपटाने में लग गया। (इसके लिए अतिरिक्त धन्यवाद श्यामजी!)
------------

प्रकाशन से पहले ही आ गई टिप्पणी

जब मैं यह सब लिख रहा था तो मेरा बड़ा बेटा वल्कल मेरे
पास ही बैठा हुआ, शादी के बाकी काम निपटाने में लगा हुआ था। सारी बात जानकर उसने टिप्पणी की - ‘पापा! यह सब जानकर आप खुश हुए। यह मुझे अच्छा लगा। ऐसे ही बने रहिएगा। साहित्यिक हलकों के कई लोग ब्लॉग दुनिया से जुड़े नहीं हैं। ऐसे अनेक लोग डिजिटल माध्यमों से भी जुड़े नहीं हैं। इतना पुराना अखबार जब अपने ढंग से ब्लॉग पर प्रकट विचारों को विस्तारित, प्रतिध्वनित करता है तो न केवल ब्लॉगर का हौसला बढ़ाता है अपितु ब्लॉग के विस्तारण में भी अपना योगदान देता है।’
-----

पेकेज के बँधुआ मजदूर

चार साल की वन्या हर रविवार की शाम बहुत परेशान कर देती है। कर क्या देती है, वस्तुतः वह खुद परेशान हो जाती है। रविवार की शाम उसका एक भी संगी-साथी मुहल्ले में नजर नहीं आता। सारे बच्चे अपने माता-पिता के साथ कहीं न कहीं घूमने निकल जाते हैं। वन्या मुहल्ले में अकेली रह जाती है। उसका पिता तरुण, कार बनानेवाली एक अन्तरराष्ट्रीय कम्पनी के स्थानीय विक्रय केन्द्र पर बड़े ओहदे पर काम करता है। कहने को शनिवार, रविवार को उसकी छुट्टी रहती है किन्तु केवल कागजों पर। छुट्टियों के इन दोनोें दिनोें में उसे रोज की तरह सुबह साढ़े नौ बजे दफ्तर पहुँचना ही पड़ता। रात में वापसी का कोई समय निश्चित नहीं। चूँकि इन दोनों दिनों की उसकी हाजरी कागजों पर नहीं लगती, इसलिए उसे इन दोनों दिन काम करने का कोई अतिरिक्त भुगतान भी नहीं मिलता। छुट्टियों के प्रति उसके नियोक्ता का व्यवहार यह कि जिस दिन भारत अपनी आजादी का जश्न मनाता है उस दिन तरुण आजाद नहीं रह पाता। उसकी नियुक्ति की शर्तें और देश के श्रम कानून, नौकरी की वास्तविकता के नीचे कराहते रहते हैं। तरुण मेरे कस्बे में परदेसी है। जाहिर है, उसका पारिवारिक जीवन रात दस-ग्यारह बजे से सुबह नौ-साढ़े नौ बजे के बीच ही रहता है। सामाजिक जीवन तो उसका लगभग शून्य ही है। 

अग्रवालजी की बेटी निधि बेंगलुरु में, एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में आईटी प्रोफेशनल है। उसका दफ्तर सुबह साढ़े नौ बजे शरु होता है खत्म शाम छः बजे। किन्तु वह कभी भी साढ़े सात-आठ बजे से पहले दफ्तर से निकल नहीं पाती। निधि अपने काम-काम में चुस्त-चौबन्द है। अपना सारा काम शाम छः बजते-बजते पूरा कर लेती है। किन्तु उसके बाद डेड़-दो घण्टे दफ्तर में ही बैठना पड़ता है क्योंकि उसका बॉस तब तक कुर्सी पर जमा रहता है और दूसरे सहकर्मी भी अपना काम निपटाने के बाद भी वहीं बने रहते हैं। काम तो बॉस के पास भी कुछ नहीं होता। वह अपने सहयोगियों-अधीनस्थों से बतियाता रहता है। एक शाम निधि छः बजे ही निकलने लगी तो बॉस ने टोका - ‘आज जल्दी जा रही हो!’ निधि ने कहा - ‘नहीं! सर! आज वक्त पर जा रही हूँ।’ बॉस ने चुप रहने की समझदारी बरती। प्रति दिन इन डेड़-दो घण्टों के लिए किसी को कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं मिलता। 

तन्मय एक अमरीकी आईटी कम्पनी के गाजियाबाद दफ्तर में बहुत बड़ा अधिकारी है। खूब अच्छी तनख्वाह मिलती है। किन्तु उसने त्याग-पत्र पेश कर दिया। अपनी कार्यकुशलता, दक्षता और परिश्रम से वह कम्पनी के लिए अनिवार्य जैसी स्थिति में आ गया है। कार्यालय प्रमुख ने उसे बुलाकर बात की। तन्मय ने बताया कि उसे हर आठ-दस दिनों मे अमेरीका भेजा जाता है। लौटने के बाद दो-तीन दिनों तक उसका,  सोना-खाना, उसकी दिनचर्या गड़बड़ रहती है। सब कुछ सामान्य होते ही उसे अगले ही दिन फिर अमरीका जाने का हुक्म थमा दिया जाता है। यात्रा से अधिक असुविधा गाजियाबाद से दिल्ली हवाई अड्डेे जाना और हवाई अड्डे से गाजियाबाद आनेे में होती है। वह अनिद्रा और हाई बीपी के घेरे में आ गया है। नियुक्ति की शर्तों के अधीन वह ऐसी यात्राओं से मना नहीं कर सकता। किन्तु दूसरी ओर, इसी कारण उसकी जान पर बन आई है। उसे यात्रा और अमरीका प्रवास में सारी सुविधाएँ जरूर उपलब्ध कराई जाती हैं किन्तु इस अतिरिक्त भाग-दौड़ के लिए कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं मिलता। यहाँ भी श्रम कानूनों पर मेनेजमेण्ट की मनमर्जी भारी पड़ती है। कम्पनी उसे खोना नहीं चाहती थी। उसने इसी शर्त पर स्तीफा वापस लिया कि उसे इस तरह अमरीका नहीं भेजा जा जाएगा।

हेमेन्द्र भी बेंगलुरु में ऐसी ही एक अमरीकी कम्पनी में काम करता है। उसकी नौकरी भी नौ से छःह बजे तक की है किन्तु रात आठ बजे से पहले कभी वापसी नहीं होती। हफ्ते में चार-पाँच बार ऐसा होता है कि वह घर के लिए निकल रहा होता है कि अमरीका से फोन आता है - ‘हेमेन्द्र! अपने एक महत्वपूर्ण ग्राहक यहाँ बैठे हुए हैं। उनकी एक छोटी सी समस्या हल कर दो।’ यह ‘छोटी सी समस्या’ कभी भी आधी रात से पहले हल नहीं होती। इस तरह आधी रात तक उसका काम करना कहीं भी रेकार्ड पर नहीं आता। महीने में दो-तीन बार उसे ‘इमर्जेन्सी’ के नाम पर शनिवार-रविवार को भी दफ्तर आना पड़ता है। इस अतिरिक्त काम के लिए उसे न तो कोई अतिरिक्त भुगतान मिलता है और न ही मुआवजे के रूप में कोई छुट्टी ही मिलती है। इसके विपरीत, सुबह नौ बजे नौकरी पर पहुँचना अनिवार्य है। यहाँ भी श्रम कानून एड़ियाँ रगड़ता है।

अड़तीस वर्षीय सुयश की कठिनाई तनिक विचित्र है। उसे सुबह साढ़े नौ बजे पहुँचना होता है। नौकरी तो शाम छःह बजे तक की ही है किन्तु रात नौ बजे से पहले कभी नहीं निकल पाता। नौकरी ऐसी कि सुबह जाते ही अपने खोके (क्यूबिम) में जो घुसता है तो लौटते समय ही निकल पाता है। घर से दफ्तर और दफ्तर से घर दुपहिया पर, दफ्तर में खोके में। पैदल चलना-फिरना शून्य। दो बरसों में उसका शरीर थुलथुल और वजन नब्बे किलो पार हो गया है। उसे हाई बीपी ने घेरना शुरु कर दिया है। किन्तु कम्पनी को इन बातों से कोई लेना-देना नहीं है। 

सुयश एक विदेशी विज्ञापन कम्पनी में काम करता है। कम्पनी दृष्य-श्रव्य-मुद्रित (आडियो-विजुअल-प्रिण्ट) विज्ञापन तैयार करती है। उसका समय भी सुबह साढ़े नौ से शाम छःह तक की है। समय पर पहुँचना जरूरी है किन्तु जरूरी नहीं कि शाम छःह बजे छुट्टी मिल ही जाएगी। कभी नहीं मिलती। कम से कम साढ़े आठ तो बजते ही हैं। शनिवार आधे दिन की छुट्टी रहती है किन्तु केवल कागजों पर। एक भी शनिवार ऐसा नहीं आया जब आधे दिन बाद छुट्टी मिल गई हो। रविवार की छुट्टी भी अपवादस्वरूप ही मिल पाती है। कभी स्पॉट रेकार्डिंग के लिए तो कभी आउटडोर शूट के लिए रविवार को जाना पड़ता है। इस अतिरिक्त काम के लिए सुयश को भी कोई अतिरिक्त भुगतान या मुआवजास्वरूप छुट्टी नहीं मिलती। सुबह समय पर पहुँचना अनिवार्य। वापसी का कोई समय नहीं। यहाँ भी केवल कम्पनी-कानून ही चलता है।

ये सारे के सारे कोई काल्पनिक पात्र-प्रसंग नहीं हैं। ये सब बच्चे मेरे पॉलिसीधारक हैं। सीधे मुझसे जुड़े हुए। इनसे जीवन्त सम्पर्क है मेरा। ये सारे के सारे बताते हैं कि इनके साथ काम करनेवाले तमाम लोगों का भी यही किस्सा है। इनकी शब्दावली भले ही अलग-अलग रही किन्तु सब खुद को ‘उच्च तकनीकी शिक्षित, पेकेज के मारे, कुशल बँधुआ मजदूर’ मानते हैं। ये सब अपने-अपने नगरों-कस्बों से, माँ-बाप से दूर बैठे हैं। इनके लिए सारे त्यौहार-पर्व अपना अर्थ और महत्व खो चुके हैं। पारिवारिकता खोते जा रहे हैं। देहातों-कस्बों-गाँवों के छोटे बच्चे जिस उम्र में धड़ल्ले से दादा-दादी, नाना-नानी से बातें कर-करके मनमोहते हुए परेशान कर देते हैं, उसी उम्र के इनके बच्चे बराबर बोल नहीं पा रहे। इनके बच्चों को बात करनेवाले बच्चे और परिजन नहीं मिल रहे। इनकी जिन्दगी दफ्तर और मॉलों तक सिमट कर रह गई है। बाजार की गिरफ्त इतनी तगड़ी है कि बचत के नाम पर भी कोई बड़ा आँकड़ा इनके बैंक खातों में नहीं है। निधि के मुताबिक ये तमाम लोग ‘सुबह हो रही है, शाम हो रही है, जिन्दगी यूँ ही तमाम हो रही है’ पंक्तियों को जीने को अभिशप्त हो गए हैं। बेंगलुरु और पुणे में मालवा के सैंकडों बच्चे नौकरियाँ कर रहे हैं किन्तु इनका आपस में मिलना तभी हो पाता है जब ये किसी प्रसंग पर अपने-अपने नगरों-कस्बों में इकट्ठे होते हैं। 

निजीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण ने आर्थिक सन्दर्भों में जरूर परिदृष्य बदल दिया है किन्तु अपनी इस पीढ़ी की सेहत, इसकी पारिवारिकता, इसकी सामाजिकता सिक्कों की खनक में गुम हो गई है। पेकेज की प्राप्ति की कीमत कहीं हम अपनी इस समूची पीढ़ी को अकेलापन और अस्वस्थता देकर तो नहीं चुका रहे?
-----

हक से नावाकिफ











अपरिहार्य कारणों से मुझे यह पोस्‍ट हटानी पडी है।

शरद जोशी: आज की जरूरत


कल ‘उन्होंने अनायास ही श्रद्धेय शरद भाई (स्वर्गीय शरद जोशी) की बात याद दिला दी।

‘वे मेरे कस्बे के, मझौले स्तर के ठीक-ठीक व्यापारी हैं। लिखने-पढ़ने के शौकीन हैं। प्रबुद्ध श्रेणी में गिने जाते हैं। अखबारों में, सम्पादक के नाम उनके पत्र नियमित रूप से छपते रहते हैं। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयम् सेवक संघ के समर्थक हैं, सो उनके लगभग सारे के सारे पत्र, काँग्रेस, काँग्रेसी मन्त्रियों और काँग्रेसी सरकारों के विंसगत, विरोधाभासी आचरण, जन-विरोधी निर्णयों आदि पर केन्द्रित होते हैं। यह सम्भवतः उनकी ‘प्रतिबद्धता आधारित मानसिकता’ के अधीन ही होता है कि प्रतिपक्ष की जो बातें उन्हें अनुचित लगती हैं, अपनों की वे ही बातें उनसे अनदेखी रह जाती हैं। जैसे कि काँग्रेसी अगुवाईवाली मौजूदा केन्द्र सरकार और काँग्रस शासित किसी राज्य सरकार की जो बात उन्हें जन विरोधी लगती है, भाजपा शासित राज्य सरकार की वही बात उन्हें वाजिब लगती है। किसी काँग्रेसी नेता की जो बात उन्हें देश के लिए घातक लगती है, भाजपा नेता की वही बात उन्हें राष्ट्र-हित लगती है। मेरे कस्बे के पत्र लेखकों में उन्होंने अपना अलग स्थान बनाया हुआ है। दुकानदार-व्यापारियों से जुड़े, श्रम-कानूनों, गुमाश्ता कानून जैसे कुछ महत्वपूर्ण कानूनों पर उनकी अच्छी पकड़ है-किसी ‘विषय विशेषज्ञ’ जैसी। दुकान-व्यापारियों से जुड़ी व्यावाहारिक और वास्तविक समस्याओं/उलझनों पर केन्द्रित उनके पत्र, कुछ अवसरों पर, दुकानदारों और जिला प्रशासकीय तन्त्र के लिए ‘मध्यस्थ’ की तरह, परिणामदायी-उपयोगी साबित हुए हैं। 

पूर्व सूचना देकर कल वे मिले तो तनिक असन्तुष्ट और दुःखी थे। उन्हें शिकायत थी कि वे इतने पत्र लिखते हैं, जनहित से जुड़े इतने मुद्दे उठाते हैं लेकिन कोई बात ही नहीं करता। और तो और, खुद उनकी पार्टी के लोग ही उनदेखी करते हैं। धन्यवाद और बधाई देना तो दूर, यह तक नहीं कहते कि उनका कोई पत्र आज फलाँ अखबार में छपा है। चूँकि वे सक्रिय राजनीति या कि पद प्राप्ति की दौड़ में नहीं हैं इसलिए वे किसी के लिए नुकसानदायक बिलकुल नहीं हैं। ऐसे में, अपनी इस अनदेखी, उपेक्षा से वे न केवल चकित अपितु आहत, क्षुब्ध, खिन्न, आक्रोशित और उत्तेजित थे। वे मुझसे जानना चाहते थे कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। मुझे आश्चर्य हुआ। हम दोनों भली प्रकार जानते हैं कि हम दोनों परस्पर स्थायी असहमत हैं। 

उनकी ‘व्यथा-कथा’ का पूर्वानुमान मुझे था तो सही किन्तु उनकी पूरी बात सुनने से पहले कुछ भी कहना मुझे उचित नहीं लगा। सुनकर लगा, उन्होंने वही सब कहा जो मैं पहले से ही न केवल जानता था अपितु उनसे अधिक तथा उनसे बेहतर जानता था। मैंने अधिकार भाव से कहा कि अपनी इस (दुः)दशा के लिए वे ही जिम्मेदार हैं। यदि उनका लेखन, अपनी राजनीतिक वैचारिकता के प्रति समर्पण भाव से किया गया सेवा-अनुष्ठान है तो उन्होंने किसी प्रशंसा, शाबासी की अपेक्षा बिलकुल नहीं करनी चाहिए। जिनकी वे आलोचना कर रहे हैं, जो उनसे असहमत हैं, वे उनकी प्रशंसा भला क्यों करेंगे? और उनकी पार्टी के लोगों के हिसाब से वे नया और अनोखा कुछ भी नहीं कर रहे हैं। वही तो कर रहे हैं जो एक पार्टी-सेवक को करना चाहिए! इसलिए वे आपका नोटिस नहीं लेंगे और इसीलिए न तो धन्यवाद देंगे और न ही प्रशंसा करेंगे। लोगों पर भी उनकी बातों का असर इसलिए नहीं होता कि वे जानते हैं कि आपने क्या लिखा है और क्यों लिखा है। लोग जानते हैं कि आपने लोगों की चिन्ता में नहीं, अपने विरोधियों की आलोचना करने के लिए यह सब लिखा है। आप जब पक्ष बन जाते हैं तो न केवल प्रतिपक्ष अपितु खुद आपका ही पक्ष आपकी उपेक्षा करेगा। सार्वजनिक स्वीकार, प्रशंसा, सराहना केवल निरपेक्ष जन पक्षधरता को ही मिल पाती है और उसके लिए भी भरपूर समय लगता है। 

मेरी बात सुनकर वे कुछ नहीं बोले। हाँ, मेरी बातों का प्रतिवाद भी नहीं किया। चुपचाप सुनते रहे। चुपचाप चाय पी। और चुपचाप ही लौट भी गए। अन्तर केवल इतना ही रहा कि आए थे तब व्यग्र और मुखर थे। जाते समय गम्भीर, विचार मग्न और निःशब्द।

उनके जाते ही मुझे शरद भाई याद आए। 

यह सम्भवतः सत्तर के दशक की बात होगी। उन दिनों लेखकीय प्रतिबद्धता को लेकर देश व्यापी बहस चली थी। उसी दौर में किसी पत्रकार ने, इस मुद्दे शरद भाई से उनकी राय पूछी थी। अब, इस समय मुझे शब्दशः तो सब कुछ याद नहीं किन्तु तब शरद भाई ने कुछ ऐसा कहा था कि उनकी प्रतिबद्धता केवल लिखने के प्रति है। लिखने के बाद जब लोगों के सामने जाएगा तब लोग खुद ही उनके (शरद भाई के) लेखन की प्रतिबद्धता समझ भी जाएँगे और तय भी कर लेंगे। उनका काम केवल लिखना है। यह तय करके नहीं लिखना है कि वे किसके लिए, किसके पक्ष में, किसके विरोध में लिख रहे हैं। जो बात लिखने के लिए बेचैन कर दे, वह बात लिखनी ही है। 

शरद भाई ने आज मुझे अचानक ही हमारे एक बड़े संकट का कारण समझा दिया। हमारे बुद्धिजीवियों की बातें इसीलिए असरकारी नहीं हो रही हैं। सबके सब अपनी-अपनी प्रतिबद्धता के अधीन बात कर रहे हैं। निरपेक्ष भाव तिरोहित होता लग रहा है। कोई बुद्धिजीवी कुछ कहे, उससे पहले ही उसकी बात का अनुमान हो जाता है। लगता है, मानो प्रत्येक समन्दर खुद को तालाब बना रहा है। उनकी कथनी और करनी का अन्तर इस संकट को और अधिक विकराल तथा गम्भीर बनाता है। वे सपेक्षिक रह कर निरपेक्ष प्रतिसाद चाहते हैं।  ‘खोटी मुद्र्रा, अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है’ वाला अर्थशास्त्र का नियम हमारे बुद्धिजीवियों पर भी तो लागू नहीं हो गया? सापेक्षिक बुद्धिजीवियों ने हमारे निरपेक्ष बुद्धिजीवियों को नेपथ्य में तो नहीं धकेल दिया?  परिदृष्य पर सक्रिय और मुखर बुद्धिजीवी हमें रास्ता दिखाते अनुभव नहीं होते। उन पर, उनकी बातों पर विश्वास करने का साहस नहीं होता।

नहीं जान पा रहा कि मैं ठीक सोच रहा हूँ या नहीं। किन्तु कल से मुझे शरद भाई याद आ रहे हैं। बहुत याद आ रहे हैं। वे होते तो वही कहते जो आजकी जरूरत है।

डिश टीवी की सीनाजोर दादागिरी


आज मेरा यह भ्रम दूर हो गया कि मैंने अपने लिए, अपनी सुविधा के लिए डिश टीवी का कनेक्शन लिया हुआ है। डिश टीवीवालों ने आज मुझे जता दिया कि वे मेरे लिए नहीं, मैं उनके लिए हूँ। उन्होंने आज मुझे मेरी सीमाएँ, मेरी औकात जता दी।

गए दो-तीन दिनों से अचानक ही मेरे कनेक्शन से ‘लाइफ ओके’ तथा ‘स्टार उत्सव’ चैनलें दिखाई देना बन्द हो गईं। इस मामले में मैं पूरी तरह से वासु भाई पर आश्रित हूँ। उन्हीं से मैंने डिश टीवी की छतरी खरीदी और उनके माध्यम से ही निर्धारित समय में शुल्क का पुनर्भरण (रीचार्ज) करता हूँ। सो, उन्हीं के पास गया।

वासु भाई, ऐसे मामलों में मेरी हकीकत जानते हैं। सो, मुझसे अधिक मेरी चिन्ता करते हैं। उन्होंने तत्काल ही, डिश टीवी के स्थानीय सेवा केन्द्र पर सम्पर्क किया। अपने स्तर पर उन्होंने समझाने-समझने की भरपूर कोशिश की। अन्ततः, फोन का चोंगा मुझे ही थमा दिया। मुझे सूचित किया गया कि ‘लाइफ ओके’ प्राप्त करने के लिए मुझे पचीस रुपये प्रति माह अतिरिक्त रूप से चुकाने पड़ेंगे। मैंने कहा - ‘अब तक तो बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के मिल रहा था। व्यापार के स्थापित व्यवहार के अधीन, मेरे अगले पुनर्भरण (रीचार्ज) तक तो मुझे यह चैनल पूर्वानुसार ही निःशुल्क मिलती रहनी चाहिए। उधर से पत्थरमार जवाब आया कि मैं खुद को भाग्यशाली मानूँ और डिश टीवीवालों को धन्यवाद दूँ कि वह चैनल मुझे अब तक मुफ्त मिलता रहा। क्योंकि वह तो मुझे मिलना ही नहीं चाहिए था। यह कम्पनी ही तय करेगी कि मेरे मौजूदा मासिक शुल्क में मुझे क्या-क्या मिलना है। आगे से मुझे यदि यह चैनल चाहिए तो मुझे पचीस रूपये मासिक अतिरिक्त रूप से चुकाने पड़ेंगे। मैंने अपनी आपत्ति दुहराई तो मुझे समझाइश दी गई कि वे मुझे पढ़ा-लिखा और समझदार मानते हैं इसलिए मैंने वैसा ही व्यवहार करना चाहिए।

‘स्टार उत्सव’ चैनल के लिए मुझे कहा गया कि मैं ‘चैनल सर्च’ का सहारा लेकर चैनल प्राप्त कर लूँ। मैंने कहा कि मुझे चैनल सर्च के बारे में कुछ बता दें। जवाब मिला कि रिमोट कण्ट्रोल पर सब कुछ मौजूद है। अपनी अकल लगाइए, चैनल प्राप्त कीजिए, कम्पनी के सेवा केन्द्रों पर सेवा देनेवालों का समय खराब कर उन्हें परेशान न करें।

वासु भाई समझ गए कि डिश टीवी के स्थानीय सेवा केन्द्र से यह सम्मान प्राप्त करने के बाद भी मेरा समाधान नहीं हुआ है। उन्होंने कम्पनी का टोल फ्री नम्बर लगाया। एक बार लगाया। दूसरी बार लगाया। तीसरी बार लगाया। मुझे लगा, नम्बर व्यस्त होगा। लेकिन बात दूसरी थी। चौथी बार नम्बर लगा कर वासु भाई ने चोंगा मेरे कान पर लगाया। लाइन में इतनी खरखराहट थी कि कुछ भी समझ नहीं पड़ रहा था। इतना भर लग रहा था कि उधर कोई टेप बज रहा है किन्तु क्या बज रहा है - बिलकुल ही समझ नहीं पड़ रहा था। वासु भाई ने बताया कि पहले तीनों बार भी यही दशा थी। यन्त्र से कब तक और कैसे संघर्ष किया जा सकता था? हम दोनों ने तत्क्षण ही हार मान ली।

अपनी मूर्खतावश मैंने दो महीनों का भुगतान कर दिया था। इसलिए, पाँच फरवरी से पहले डिश टीवी से मुक्ति लेने का मतलब है, लगभग एक महीने के शुल्क को पानी में डुबोने की हिम्मत कर लूँ।

नहीं जानता कि आगे क्या करूँगा। अभी तो यही जान रहा हूँ कि मुझे डिश टीवीवालों की यह सीनाजोर दादागिरी, प्रसन्नतापूर्वक झेलनी ही है।

यह खबर कौन छापेगा?


अभी तीन दिन इन्दौर में रहा। काम कम और फुरसत अधिक। कुछ ऐसी कि लगभग पूरी तरह से फुरसत। बेटी-बेटे, महू नाका चौराहे पर, एक बहु-मंजिला इमारत की दूसरी मंजिल पर रहते हैं। अन्नपूर्णा मन्दिर जानेवाली सड़क के समानान्तर ही जाती है - फूटी कोठी और रणजीत हुनमान मन्दिर पहुँचानेवाली  सड़क। इसी के, चौराहेवाले कोने पर बड़े सवेरे, अखबार विक्रेता अपना अड्डा जमा लेते हैं। उनका आना, अखबार लानेवाले वाहनों की प्रतीक्षा करना, वाहनों के आते ही, जल्दी से जल्दी, अपने-अपने ढेर उतारना, उन्हें टेबलों पर रखना, अपनी-अपनी सायकिलें लिए, सामने और आसपास खड़े हॉकरों के हिसाब से उन्हें प्रतियाँ थमाना आदि-आदि सब कुछ, बेटों के निवास की खिड़की से साफ-साफ दिखाई देता है। 

चूँकि सब कुछ लगभग पूर्वनिर्धारित ही रहता है, इसलिए, चहल-पहल तो भरपूर रहती है किन्तु बातें बहुत ही कम। बहुत जरूरी हो तो ही बात होती है अन्यथा एक ने अखबार की प्रतियाँ दीं, दूसरे ने लेकर अपनी सायकिल पर जमाई। उनके ठीक-ठीक जमने की तसल्ली करने के लिए जोर से दो-चार बार थपथपाईं और चल दिए। सबको, सबसे पहले जाने की जल्दी। इस बीच, चाय भी आ जाती है, बिना किसी मनुहार के सब अपना-अपना ग्लास उठा लेते हैं। चाय पी। खाली ग्लास एक तरफ रखा और अगला काम शुरु। किसी को किसी की परवाह नहीं। बस! एक ही धुन - सबसे पहले निकल जाना है। हर एक इतनी जल्दी में कि बेचारा सूरज अपनी पहली किरण फेंक कर देखता है तो शायद ही कोई नजर आए। घुप अँधेरे से अपने काम की शुरुआत कर, मुँह अँधेरे तक सब अपना-अपना काम कुछ इस तरह से निपटाते हैं मानो सूरज उनका कोई ‘टे्रड सीक्रेट’ देख न ले।

लगातार तीन दिन, ब्राह्म मुहूरतों में मैंने इस जीवन्त दृष्य श्रृंखला का आनन्द लिया। मैं सबको ध्यान से देखता रहा किन्तु मेरी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अखबार लो, पैसे दो। बस!

तीनों ही दिन, तीन अखबार लिए - नईदुनिया, भास्कर और पत्रिका। हाँ, सान्ध्य दैनिक प्रभातकिरण भी तीनों ही दिन लिया किन्तु उसके लेने में ऐसे आनन्द का सहस्रांश भी नहीं।

अखबारों की हालत किसी से छुपी नहीं। विज्ञापन ही विज्ञापन। समाचार-सामग्री की स्थिति कुछ ऐसी कि मानो अखबार को अखबार बताना जरूरी न हो तो विज्ञापन के सिवाय और कुछ छापा ही नहीं जाए। ऐसे में अखबार, केवल कहने भर को अखबार। पठनीय कम और दर्शनीय तो उससे भी कम। लेकिन आदत की बात। जब तक अखबार न देखो तब तक न देखने की बेचैनी और देखने के बाद, खुद पर हुई ‘आखिरकार देखा ही क्यों’ की खीझ।

इस सबके बीच ही अखबारों की कीमतों और पृष्ठ संख्या पर ध्यान गया तो वह बात सामने आई जिसके कारण यह सब लिखना पड़ा। अचानक ही यह ज्ञान प्राप्ति हुई कि ‘दाम और माल’ के मामले में हम रतलामवालों के साथ कुछ अनुचित किया जा रहा है, असमानता बरती जा रही है। आँकड़े खुद ही सारी बात कह देते हैं -

नईदुनिया 
शनिवार, 12 जनवरी को - 
इन्दौर में - 24 पृष्ठ,  2/- रुपये। रतलाम में - 20 पृष्ठ, 2/- रुपये।

रविवार, 13 जनवरी को -
इन्दौर में - 52 पृष्ठ, 5/- रुपये (वार्षिक केलेण्डर सहित)। रतलाम में - 24 पृष्ठ, 2/- रुपये (बिना केलेण्‍डर)।

सोमवार, 14 जनवरी को -
इन्दौर में - 20 पृष्ठ, 2/- रुपये। रतलाम में - 16 पृष्ठ, 2/- रुपये।

दैनिक भास्कर 
शनिवार, 12 जनवरी को -
इन्दौर में - 22 पृष्ठ, 2/- रुपये। रतलाम में - 20 पृष्ठ, 3.50 रुपये।

रविवार, 13 जनवरी को -
इन्दौर में - 26 पृष्ठ, 3/- रुपये। रतलाम में - 22 पृष्ठ, 4/- रुपये।

सोमवार, 14 जनवरी को -
इन्दौर में - 18 पृष्ठ, 2/- रुपये। रतलाम में - 14 पृष्ठ, 2/- रुपये।

पत्रिका 
शनिवार, 12 जनवरी को -
इन्दौर में - 36 पृष्ठ, 2/- रुपये। रतलाम में - 18 पृष्ठ, 3/- रुपये।

रविवार, 13 जनवरी को -
इन्दौर में - 40 पृष्ठ, 3/- रुपये। रतलाम में - 22 पृष्ठ, 3/- रुपये।

सोमवार, 14 जनवरी को -
इन्दौर में - 26 पृष्ठ, 2/- रुपये। रतलाम में - 16 पृष्ठ, 2/- रुपये।

सान्ध्य दैनिक प्रभातकिरण 
उपरोक्त तीनों ही दिन -
इन्दौर में - 10 पृष्ठ प्रतिदिन, 1/- रुपया। रतलाम में - 6 पृष्ठ प्रतिदिन, 1/- रुपया।

गणित के मामले में मैं शुरु से ही फिसड्डी रहा हूँ। व्यापार की सूझ आज तक नहीं आ पाई। सो, इस अन्तर का कारण समझ नहीं पा रहा हूँ। निपट देहाती आदमी हूँ सो लगता है कि या तो हम रतलामवालों ने इन्दौरवालों की, घनी अमराइयाँ काट दी होंगी या फिर, रतलाम की बेटियों ने इनकी बहू के रूप में इन्हें इतनी यातना दी होगी कि हमसे इस तरह बदला लिया जा रहा है। 

ईश्वर से प्रार्थना भी कर रहा हूँ - जैसा हम रतलामवालों के साथ हो रहा है, वैसा और किसी कस्बेवालों के साथ न हो। गाँवों-कस्बों के दम पर किस तरह शहरों को पाला-पोसा जा रहा है, उसी का एक उदाहरण यह भी है।

सालाना साढ़े बारह अरब के एसएमस याने गरीबों की अमीरी


एसएमएस मुझे सदैव ‘आपात’ ही लगते हैं - पढ़ना हो या भेजना हो। पढ़ने में ही प्राण निकल जाते हैं तो लिखने में क्या गत होती होगी, कल्पना की जा सकती है। फिर भी, इससे बच पाना सम्भव नहीं रह गया है। सो, पढ़ता भी हूँ और (लिख कर) भेजता भी हूँ।

कुछ मेहरबान हैं जो मुझे एसएमएस से बराबर जोड़े रखे हुए हैं। प्रति दिन सुबह, मध्याह्न, अपराह्न, देर रात एसएमएस भेजते रहते हैं। कुछ इस तरह, मानो अपने आराध्य की निर्धारित पूजा-सेवा का क्रम, निष्ठापूर्वक निभा रहे हों। सुबह प्रभातियाँ गाकर उठाते हैं और रात को शयन-आरती करके सुलाते हैं। उत्सवों, पर्वों और विशेष प्रसंगों पर आनेवाले एसएमएस इनमें शामिल नहीं हैं। कभी-कभी ऐसे एसएमएस भी आ जाते हैं जो मुझे अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों की आदिम-फूहड़ता की याद दिला देते हैं। ऐसे एसएमएस अपने अन्तरंगों को ही भेजे जाते होंगे, मुझे गलती से आ जाते हैं। जाहिर है, भेजनेवाले को भी पता नहीं कि वह किसे, कौन सा सन्देश भेज रहा है। सो, प्रतिदिन, लगभग अठारह-बीस एसएमस पढ़ ही लेता हूँ।

गए कुछ दिनों से ये एसएमस ही विचार पटल पर छाए हुए हैं। इनमें मुझे कोई रचनात्मकता दिखाई नहीं देती। उपयोगिता तो निश्चय ही कुछ नहीं होती। मुझे लगता है, भेजनेवाले किसी व्यसन के अधीन ही भेजते होंगे। क्योंकि मुझे नियमित रूप से एसएमएस भेजनेवाले  दो कृपालु मुझे प्रायः प्रतिदिन मिलते हैं किन्तु अपने ही भेजे हुए एसएमएस की चर्चा उन्होंने कभी नहीं की। उनसे बातें करते समय मैं नजरें गड़ा कर, ध्यान से उनका चेहरा देखता हूँ। मुझे एक बार भी, एक पल को भी नहीं लगा कि उन्हें पता है कि वे मुझे नियमित रूप से एसएमस भेजते हैं।

मुझे नहीं पता कि मेरा सोचना कितना सही या कितना गलत है। किन्तु मुझे लग रहा है कि एसएमएस के मामले में हमने अपनी स्थिति और दशा एकदम विपरीत दिशा में स्थापित कर दी है - एसएमएस हमारे लिए होने चाहिए थे किन्तु हम एसएमएस के होकर रह गए हैं। हमें मोबाइल कम्पनियों का उपभोक्ता होना चाहिए था किन्तु हम मोबाइल कम्पनियों के उत्पाद बन कर रह गए हैं। हम मोबाइल कम्पनियों और मोबाइल सेवाओं को प्रयुक्त नहीं कर रहे, वे हमें प्रयुक्त कर रही हैं और मजे की बात यह कि यह सब हम अपनी गाढ़ी कमाई की कमत पर कर रहे हैं।

सुनता और पढ़ता हूँ कि देश की जनसंख्या और देश की मोबाइल संख्या लगभग बराबर हो गई है। गई रात मैंने बहुत ही मामूली गिनती की तो, हाड़ जमा देनेवाली इस ठण्ड में भी मुझे पसीना आ गया।

मेरी गणित शुरु से ही बहुत ही कमजोर रही है। सम्भव है, मेरी गणना गलत हो। ऐसे में, किसी और बात के लिए नहीं तो केवल इसी बात के लिए कि मेरी गणना सही है या नहीं, थोड़ी देर के लिए मेरे साथ हो लीजिए।

मोटे तौर पर हमारी जनसंख्या सवा अरब मान रहा हूँ। मान रहा हूँ कि इनमें से 80 प्रतिशत जनसंख्या के बराबर ही देश में मोबाइलों की संख्या होगी - याने एक अरब। इनमें से 10 प्रतिशत लोग अर्थात् 10 करोड़ लोग वैसे ही ‘एसएमएस व्यसनी’ होंगे जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है और प्रति व्यक्ति, प्रति दिन एक एसएमएस करता होगा। एक एसएमएस का शुल्क कम से कम एक पैसा तो होगा ही। याने, 10 करोड़ पैसे प्रतिदिन। याने 10 लाख रुपये प्रति दिन। इस मान से पूरे वर्ष का आँकड़ा बनता है - 36 करोड़ 50 लाख रुपये।

मोबाइल कम्पनियाँ एक और ‘लोकप्रिय’ सेवा उपलब्ध कराती हैं - रिंग टोन की। मोबाइलधारकों की, मेरी उपरोक्त अनुमानित संख्या के 5 प्रतिशत, याने 5 करोड़ मोबाइलधारक भी यदि यह सेवा प्रयुक्त करते हैं तो इसका आँकड़ा ‘भयावह’ की सीमा तक पहुँच जाता है। इस सेवा के लिए एक उपभोक्ता यदि 20 रुपये मासिक चुकाता है तो एक महीने का राष्ट्रीय आँकड़ा 1 अरब रुपये अर्थात् 12 अरब रुपये वार्षिक होता है।

यहाँ तक लिखते-लिखते मेरी साँस फूल आई है। मैं ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ कि मेरी यह गिनती आंशिक रूप से भी सच न हो। लेकिन आप इसमें कितनी कमी कर पाएँगे?  

मेरी इस गणना को परखने का श्रम कीजिए और साथ-साथ यह भी विचार करते रहिएगा कि यह सब उस देश में हो रहा है जिसकी आधी से अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है।

यह सब हम ही कर रहे हैं। या तो हम, यह सब जानते ही नहीं हैं या फिर जानना ही नहीं चाहते। हमने ‘परम् प्रसन्नतापर्वूक’ खुद को, मोबाइल कम्पनियों के ‘उत्पाद’ में बदल लिया है। 

यह कौन सा भारत है? 

देश बनाने का आधारभूत ‘गाँधी तत्व’

गाँधी तो अचेतन में भी बने रहते हैं किन्तु उनके जीवन की सारी घटनाएँ एक साथ याद रख पाना सम्भव नहीं हो पाता। हाँ, प्रसंगानुसार वे सब याद अवश्य आ जाती हैं। अपने आप ही। कोई विशेष तथा अतिरिक्त प्रयास नहीं करने पड़ते।
 
इन दिनों, नारायण भाई देसाई के विवाह को लेकर बापू का व्यवहार याद आ रहा है। बार-बार। लगातार।
 
गाँधी के लिए ‘अपने’ कभी अपवाद नहीं हो पाए। अपने निर्णयों को बापू स्वयम् पर तो अपनी सम्पूर्ण कठोरता, दृढ़ता और आत्म-बल से लागू करते ही, सब पर भी उसी समानता से लागू करते थे।
 
उन्होंने निर्णय कर लिया था कि वे उसी विवाह समारोह में नव-युगल को आशीर्वाद देने जाएँगे जब एक सवर्ण और दूसरा हरिजन हो। बापू के इस निर्णय के बाद नारायण भाई देसाई का विवाह तय हुआ। वर-वधू, दोनों सवर्ण थे। तब तक महादेव भाई देसाई (नारायण भाई के पिताजी) का देहावसान हो चुका था।
 
महादेव भाई देसाई और गाँधी का रिश्ता किसी विवरण की माँग नहीं करता। फिर भी कहने से रुका नहीं जा रहा। महादेव भाई देसाई को गाँधीजी अपना पुत्र मानते थे और जब महादेव भाई का निधन हुआ तो गाँधीजी ने उन्हें मुखाग्नि दी थी। यह कहते हुए कि ‘वह आजीवन मेरा पुत्र रहा किन्तु आज मैं उसका पुत्र बन कर उसे मुखाग्नि दूँगा।’
 
आज, गाँधी-कथा-वाचन को अपने जीवन का लक्ष्य बना कर जी रहे नारायण भाई देसाई, उन्हीं महादेव भाई के बेटे हैं।
 
नारायण भाई का, घर का नाम ‘बाबला’ था। बाबला की माँ दुर्गाबाई की चिन्ता थी - बाबला के विवाह में बापू का आशीर्वाद तो चाहिए ही चाहिए। उन्होंने, अपने पारिवारिक हितैषी नरहरि भाई परिख को बापू से बात करने भेजा। ‘बापू! आपसे कुछ प्रायवेट बात करनी है।’ कह कर नरहरि भाई ने समय माँगा। बापू ने सन्ध्या भ्रमण का समय दिया। शाम को, घूमने के दौरान, साथ चलते हुए, भूमिका बनाते हुए नरहरि भाई ने कहा - ‘बापू! अपने बाबला का विवाह तय हो गया है।’ सुनकर बापू ठिठके। अचरज प्रकट करते हुए बोले - ‘अच्छा! बाबला इतना बड़ा हो गया?’ नरहरि भाई ने पूरी बात बताई। यह भी बताया कि दोनों पक्ष सवर्ण हैं। सुनकर और सारी बात समझकर बापू खिलखिलाकर बोलेे - ‘अच्छा! तो दुर्गा ने तुम्हें वकील बनाकर भेजा है। फिर बोले - ‘बाबला तो अपने परिवार का बच्चा है। उसके लिए अपवाद नहीं हो सकता। दुर्गा से कहना, मेरे आशीर्वाद तो बच्चों को मिलेंगे लेकिन उपस्थिति नहीं।’ और बापू विवाह में नहीं गए। ठीक विवाह वाले दिन उनका आशीर्वाद-पत्र वहाँ जरूर पहुँच गया।
 
बापू का कहना था - ‘जो सोचो वही बोलो और जो बोलो वही करो। मन-वचन-कर्म में एकरूपता इसी का तो पर्याय है!
 
लालच, मोह, स्वार्थ दिमाग में चढ़ने पर आदमी के मन पर भय का आवरण चढ़ जाता है। बापू निरावरण थे और यही उन्हें हम सबसे अलग करता है। उन्होंने बड़ी ही सहजता से कहा है - ‘सत्य मेरे लिए सहज था। बाकी गुणों के लिए मुझे प्रयत्न करने पड़े।’
 
इन दिनों, अपराधों-अपराधियों और शासकों-प्रशासकों के व्यवहार के प्रति हमारे आचरण को लेकर मुझ यह प्रसंग चौबीसों घण्टे याद आ रहा है। हम सारी बातों को निरपेक्ष, निरावरण भाव से न देखने का अपराध कर रहे हैं और इसीलिए अपराधविहीन समाज नहीं बन पा रहे हैं।
 
बलात्कार को लेकर इन दिनों यही हो रहा है। देख रहा हूँ कि हमारी चिन्ता का विषय बलात्कार कम और, बलात्कार कहाँ, किसकी सरकार में हुआ है - यह महत्वपूर्ण हो गया है। बलात्कार ही नहीं, सभी प्रकार के अपराध, सर्वकालिक और सर्वदेशीय हैं। कोई भी राज्य, कोई भी अंचल इससे अछूता नहीं है।

मैं मध्य प्रदेश में रह रहा हूँ। उन्नत तकनीक के कारण, राष्ट्रीय अखबार भी स्थानीय बनकर रह गए हैं। राष्ट्रीय समाचार नाम मात्र की संख्या में, प्रदेश के समाचार उनसे तनिक अधिक संख्या में, रतलाम जिले के समाचार उससे अधिक संख्या में और रतलाम कस्बे के समाचार सर्वाधिक संख्या में पढ़ने को मिलते हैं। मैं जानबूझकर, उन अपराध घटनाओं के (विशेषतः, महिलाओं से जुड़ी आपराधिक घटनाओं के) समाचारों की कतरनें फेस बेक पर चिपका रहा हूँ और व्यंग्योक्तियाँ-तीखे कटाक्ष रह रहा हूँ जो मध्य प्रदेश में घट रही हैं। दिल्ली और केन्द्र में काँग्रेसी सरकारें हैं और मध्य प्रदेश में भाजपा की। दिल्ली की और मध्य प्रदेश की, समान स्तर की आपराधिक घटनाओं पर भाजपाइयों की प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग हो रही हैं। अपनी सुविधा और आवश्यकतानुसार, काँग्रेसी भी ऐसा ही करते हैं। और केवल काँग्रेसी या भाजपाई ही क्यों? सबके सब ऐसा ही करते हैं।
जानता हूँ कि ‘वोट’ की राजनीति के चलते ही ऐसा हो रहा है। इस स्थिति पर मुझे न तो हँसी आ रही न ही आवेश-आक्रोश। हाँ, उदासी अवश्य आती है। क्या कोई ‘अपराध’ केवल इसलिए ‘अपराध’ माना जाए क्योंकि वह हमारी विरोधी दल की सरकार के राज में हुआ? क्या वही ‘अपराध’ इसलिए ‘अपराध’ न माना जाए क्योंकि वह हमारी सरकार के राज में हुआ है? क्या सच भी सापेक्षिक हो सकता है? क्या ऐसी ‘सापेक्षिक’ मानसिकता और सोच के चलते हम अपराधविहीन समाज बना सकेंगे और बन सकेंगे?
 
अचरज और कष्ट यह देख कर होता है कि ऐसी स्थिति में ‘सामनेवाले’ की आलोचना करनेवाले, ऐसी ही स्थिति में आए ‘अपनेवाले’ के बचाव में ढेरों ‘किन्तु-परन्तु’ लेकर, चकित कर देनेवाली सहजता से खड़े हो जाते हैं।
 
ऐसे आचरण से वोट हासिल किए जा सकते हैं, सरकारें भी बनाई जा सकती हैं, सरकारें बनाए रखी जा सकती हैं। किन्तु देश नहीं बनाया जा सकता।
 
‘अपनेवाले’ को अपवाद बनाने से हम सरकारें भले ही बना लें, देश नहीं बना सकते। देश बनाने के लिए तो हमें, ‘अपनेवाले’ को अपवाद बनाने से बचना ही होगा।
 

थोक में मँहगा, फुटकर में सस्ता

‘‘नमाज पढ़ने गए थे, रोजे गले पड़ गए’’ वाली कहावत मुझ पर शब्दशः लागू हो गई। मैं अचकचा गया। मेरे अनुमान, आशा, अपेक्षा के सर्वथा प्रतिकूल और कल्पना से परे।
 
‘अपने, भेजे जानेवाले पत्रों पर टिकिट मत लगाइए। हमें एक मुश्त सौंप दीजिए। खर्च का भुगतान कर दीजिए और भूल जाइए।‘ डाक विभाग की इस योजना के बारे में एकाधिक बार सुना था। इसीसे उत्साहित हो कर सोचा - ‘इस वर्ष भेजे जानेवाले लगभग 700, दीपावली अभिनन्दन पत्र इसी योजना से भेजे जाएँ।’ अचेतन में शुभेच्छापूर्ण (और लालच भरा भी) अनुमान रहा कि ‘थोक’ का मामला है तो ‘दो पैसों की बचत’ हो जाएगी। किन्तु वहाँ तो सब कुछ उल्टा ही झेलना पड़ा।

मुझे बताया गया कि इस योजना के अन्तर्गत मुझे, पत्र पर लगने वाले डाक टिकिटों के मूल्य के अतिरिक्त, फ्रेंकिग शुल्क के नाम पर प्रति पत्र दस पैसों का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा। मुझे विश्वास ही नहीं हुआ।

मेरी अपनी धारणाएँ थीं - इस योजना के अन्तर्गत डाक कर्मचारियों को कोई अतिरिक्त श्रम नहीं करना था। मैं टिकिट लगा कर डाक के डिब्बे में डालूँ तो भी उन्हें एक ठप्पा लगाना है और इस योजना के अन्तर्गत पत्र सौंपूँ तो भी उन्हें एक बार ठप्पा लगाना (फ्रेंकिंग करना) है। मुझसे अतिरिक्त शुल्क लेने के बजाय मुझे तो छूट मिलनी चाहिए क्योंकि मैं डाक विभाग के (टिकिट में होनेवाले) कागज, छपाई, मानव-श्रम आदि का मूल्य बचा रहा हूँ। बात को तनिक आगे बढ़ाऊँ तो मैं पर्यावरण रक्षा में सहायक बनने का यश भी डाक विभाग को दे रहा हूँ क्योंकि टिकिट कम छपेंगे तो उनका प्रत्यक्ष/परोक्ष प्रभाव, कागज बनने के लिए काटे जानेवाले वृक्षों (की संख्या में कमी होगी) पर पड़ेगा। फिर, मैं थोक में धन्धा दे रहा हूँ। इस दृष्टि से, मुझे तो छूट मिलनी चाहिए! लेकिन हो रहा है एकदम उल्टा! जो आदमी विभाग की सहायता कर रहा है, थोक में ग्राहकी दे रहा है उससे अतिरिक्त वसूली की जा रही है! याने, यहाँ, ‘थोक में सस्ता और फुटकर में मँहगा’ वाले, व्यापार के सामान्य सिद्धान्त को उलट कर ‘थोक में मँहगा और फुटकर में सस्ता’ का नया, ग्राहकों को विकर्षित करनेवाला सिद्धान्त अपनाया जा रहा है। ग्राहकों को समझाया जा रहा है - ‘हमें थोक में, कम समय में अधिकाधिक व्यापार कर, मुनाफा देनेवाला व्यापार मत दो।’

‘ग्राहक एक बार दुकान में आए तो सही। आएगा तो कुछ न कुछ तो खरीद कर ही जाएगा। न भी खरीदेगा तो कौन सा घाटा हो जाएगा?’ की मानसिकता के चलते, व्यापारी क्या-क्या हथकण्डे वापरते हैं? ‘एक पर एक फ्री’ तक के दावे किए जा रहे हैं।

डाक विभाग के घाटे में चलने की और इसकी ग्राहक संख्या कम होने की खबरें आए दिनों अखबारों में पढ़ने को मिलती रहती हैं। आय बढ़ाने के लिए सोने के सिक्के बेचना, पासपोर्ट के, विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं के और अनेक रोजगार सूचनाओं के आवेदन-पत्र बेचने का काम इसे दिया जाने लगा है। सुनते हैं कि बहुत जल्दी अब यह अपनी बैंक सेवाएँ भी शुरु करनेवाला है। लेकिन जहाँ दो पैसों की कमाई की बात आती है तो ‘मूर्ख व्यापारी’ की तरह व्यवहार करता है।

जिन-जिन से मैंने बात की, सबने मुझसे सहमति जताई। डाक कर्मचारी संगठनों के कुछ नेताओं ने बताया कि जो कुछ मैं कह रहा हूँ, वही बात वे विभाग को कई बार सुझा चुके हैं। किन्तु अमल करना तो दूर रहा, उसे सुनने/पढ़ने के लिए ही कोई तैयार नहीं होता।

इस सबमें मुझे दो बातों से तसल्ली हुई। पहली तो यह कि जो मैं सोच रहा था, वही वे सब, मुझसे पहले से  ही  सोच रहे थे। और दूसरी - इस बात पर मैं अकेला दुखी नहीं था। मुझसे पहले ही दुखी लोग वहाँ मौजूद थे।

ऐसा क्यों होता है - मैं सोच ही रहा था कि ‘मेल प्यून‘ के पद पर काम रहा एक भाई ने मानो मेरे मन की बात जान ली। बोला - ‘सा’ब! सरकारी दुकान है। इसके फैसले वे लेते हैं जिन्हें इसकी कोई चिन्ता नहीं। जो ऐसे फैसले लेते हैं उन्हें तो पता भी नहीं होगा कि एक पोस्ट कार्ड कितने में आता है और कितनी मेहनत से उसे मुकाम तक पहुँचाया जाता है।’
 
मुझे उनकी बात समझ में आई। इसके साथ ही साथ कृषि विभाग का वह अधिकारी याद आ गया (तब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था) जिसने मूँम्फली के एक खेत की मेड़ पर खड़े-खड़े, एक ग्राम सेवक को डाँट दिया था। उस ग्राम सेवक ने कहा था - ‘बहुत अच्छी फसल आई है सा’ब।’ तब अधिकारी ने, अपना ज्ञान प्रदर्शित करते हुए, आठ-दस लोगों की उपस्थिति में उस ग्राम सेवक को हड़का दिया था - ‘हमें बेवकूफ समझते हो? एक भी मूँम्फली तो नजर नहीं आ रही और कह रहे हो कि फसल बहुत अच्छी आई है?’

ऐसे ही ‘कुशल व्यापारी’ जब सरकारी दुकानें चलाते हैं तो यही होता है - थोक में मँहगा, फुटकर में सस्ता।
 

काम एक : व्‍यवहार अनेक

एक ही काम के लिए, एक ही प्रकृति के संस्थानों/कार्यालयों में अलग-अलग व्यवहार देख कर अचम्भा होता है। कभी-कभी दुःख भी होता है। काम एक, संस्थान एक तो फिर अलग-अलग व्यवहार क्यों?
 
ऐसे अनुभवों की संख्या तो अधिक ही है किन्तु दैनन्दिन व्यवहारवाले तीन अनुभव मुझसे भूले नहीं बन रहे।

पहला अनुभव बैंकों का।

एक साथी अभिकर्ता के साथ एक निजी बैंक में जाना पड़ा। ‘पूछताछ‘ वाली टेबल पर उसने कहा कि उसे अपने खाते के लेन-देन की जानकारी उसके मोबाइल पर चाहिए। कर्मचारी ने अभिकर्ता की पहचान माँगी। पुष्टि होने पर खाता नम्बर पूछा। कम्प्यूटर पर उसका खाता खोल कर, एक बार फिर नाम की पुष्टि की, मोबाइल नम्बर पूछा, उसे दोहरा कर पुष्टि की। दो-तीन बटन दबाए और कहा - ‘हो गया। अब आपको एसएमएस अलर्ट मिलता रहेगा।’ साथी अभिकर्ता ने पूछा - ‘मैं कैसे कन्फर्म करूँ?’ कर्मचारी ने कहा - ‘आप अभी ही अपने खाते में कुछ रकम या तो जमा कर दें या निकाल लें। मालूम हो जाएगा।’ अभिकर्ता ने पाँच सौ रुपये जमा कराए। कुछ ही क्षणों में उसके मोबाइल पर सूचना आ गई।

हम तीन अभिकर्ता बैंक ऑफ बड़ौदा की शाखा में खड़े थे। एक कर्मचारी ने कहा कि हमारा काम खत्म कर, जाने से पहले हम उससे मिल लें। हमने वही किया। उसने एक-एक करके हमसे हमारा खाता नम्बर पूछा। अपने कम्प्यूटर में कुछ देखा। उसमें अंकित उनके मोबाइल नम्बर दोहरा कर पुष्टि की। मेरा नम्बर आया तो कम्प्यूटर देख कर बोला - ‘कमाल है! आपने एसएमएस अलर्ट सुविधा अब तक नहीं ली?’ उसे मेरा मोबाइल नम्बर याद था। कम्प्यूटर में लिखा और दोहरा कर पुष्टि कर बोला - ‘आपके खाते के लेन-देन की जानकारी अब आपको फौरन ही आपके मोबाइल पर मिल जाएगी।’

एक अन्य अभिकर्ता को यह सुविधा चाहिए थी। उसका खाता, भारतीय स्टेट बैंक में था। हम दोनों पहुँचे। सम्बन्धित बाबू से बात की। उसने अभिकर्ता की ओर देखा भी नहीं और रूखी आवाज में कहा - ‘एक एप्लीकेशन दे दो। साथ में पान कार्ड की फोटो कॉपी लगा देना।’ वांच्छित फोटो प्रति अभिकर्ता के पास पहले से ही थी। उसी बाबू से कागज माँगा। आवेदन लिखा। आलपिन माँग कर पान कार्ड की फोटो प्रति नत्थी की और बाबू को दी। उसने बेमन से आवेदन लिया, खाता नम्बर बुदबुदाया और आवेदन को दराज में रखते हुए बोला - ‘ठीक है। हो जाएगा।’ अभिकर्ता ने पूछा - ‘कब हो जाएगा?’ बाबू को अच्छा नहीं लगा। बोला - ‘कह दिया ना? हो जाएगा। आप जब भी ट्राँसेक्शन करोगे, मालूम पड़ जाएगा।’ अभिकर्ता ने कहा - ‘अभी जमा कर रहा हूँ। मालूम हो जाएगा?’ बाबू को अच्छा नहीं लगा। चिढ़ गया। बोला - ‘ऐसे कैसे हो जाएगा? अभी तो मैंने कुछ किया ही नहीं! अपने आप थोड़े ही ऐसे कुछ हो जाता है? जब होना होगा, हो जाएगा।’ अभिकर्ता ने बताया कि इसके तीसरे दिन उसे एसएमएस अलर्ट सुविधा मिल पाई।

दूसरा अनुभव ऑटो रिक्शा के किराये को लेकर है। जानता हूँ कि यह मामला किसी ‘संस्था’ से जुड़ा नहीं है लेकिन मेरी शुभेच्छा है कि ऐसा नहीं होना चाहिए।

रेल्वे स्टेशन से मेरे निवास तक का किराया अधिकतम तेईस रुपये लगता है। अभी, 29 अक्टूबर को हम दोनों पति-पत्नी, नीमच से, बस से लौटे। जावरा फाटक पर उतर कर दिल बहार चौराहा पहुँचे जहाँ से मेरे निवास की दूरी, रेल्वे स्टेशन से मेरे निवास की दूरी के मुकाबले आधा किलो मीटर कम है। हमने ऑटो रिक्शावाले से भाड़ा पूछा। उसने कहा - ‘तीस रुपये।’ वहाँ आठ-दस ऑटो रिक्शा खड़े थे। सो मैंने तनिक अतिरिक्त उत्साह से, अन्य रिक्शावालों से बात की। सबने, एक स्वर में भाड़ा तीस रुपये ही बताया। मैंने रेल्वे स्टेशन से वहाँ तक की आधा किलो मीटर कम दूरी का और स्टेशन से घर तक का किराया तेईस रुपये होने की बात कह कर अधिकतक बीस रुपये देने की पेशकश की तो सबने कहा कि वहाँ से तेईस रुपयेवाली बात उन सबको पता है। सबने एक स्वर से कहा - ‘आप स्टेशन जाकर वहाँ से तेईस रुपयों में अपने घर चले जाइए।’ मुझे बहुत बुरा लगा। सूझ-समझ नहीं पड़ी कि क्या करूँ? प्रतिवाद, प्रतिरोध का कोई उपाय तत्क्षण मेरे पास नहीं था। हम दोनों पति-पत्नी ने तय किया कि इस बेशर्मी और अनुचित के सामने समर्पण नहीं करेंगे। और हम दोनों पैदल-पैदल ही घर आए।

तीसरा अनुभव एल आई सी का है। तनिक पुराना है।

मेरे कस्बे में, एल आई सी की तीन शाखाएँ हैं। एक सज्जन ने दोनों शाखाओं से, एक ही दिन, एक-एक लाख रुपयों की, अलग-अलग, दो, मनी बेक पॉलिसियाँ लीं। पाँच वर्षों के बाद उन्हें, दोनों शाखाओं से, बीस-बीस हजार रुपयों के दो, अलग-अलग चेक मिले। वे सज्जन चेक जमा कराना भूल गए और तीन महीनों के बाद वे दोनों चेक ‘बासी’ (स्टेल) होकर अप्रभावी/अनुपयोगी हो गए। दोनों चेक लेकर वे, पहले काटजू नगर स्थित शाखा क्रमांक-1 पहुँचे। वहाँ के कर्मचारियों ने हाथों-हाथ दूसरा चेक बना कर दे दिया।

वे सज्जन खुशी-खुशी, शाखा क्रमांक-2 पहुँचे। मैं इसी शाखा से सम्बद्ध हूँ। यहाँ के कर्मचारियों ने उनसे, मूल पॉलिसी अभिलेख (ओरीजनल पॉलिसी बॉण्ड) तथा विमुक्ति पत्रक (डिस्चार्ज वाउचर) माँगा। वे सज्जन कुछ नहीं समझ पाए। उन्होंने शाखा क्रमांक-1 का हवाला दिया, वहाँ से जारी किया नया चेक दिखाया। कर्मचारियों से कहा कि वे चाहें तो शाखा क्रमांक-1 के कर्मचारियों से पूछ लें। लेकिन कर्मचारियों ने कुछ नहीं सुना। कहा - ‘वहाँ, उन्होंने क्या किया, इससे हमें कोई लेना-देना नहीं। हम तो मेन्युअल के हिसाब से चलेंगे जिसके मुताबिक दोनों कागज चाहिए। उनके बिना नया चेक नहीं दिया जा सकता। बस।’

हम सब लोग असहाय, निरुपाय बन, टुकुर-टुकुर देख रहे थे क्योंकि मेरी शाखा के कर्मचारियों की बात सही थी। किन्तु इसके समानान्तर, व्यावहारिक सच का प्रमाण, ग्राहक के हाथ में था। मेरी शाखा के कर्मचारी अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने शाखा प्रबन्धक का अनुरोध भी अस्वीकार कर दिया। मुझ सहित, उपस्थित कोई भी अभिकर्ता उन सज्जन की कोई सहायता नहीं कर पाए।

उन सज्जन को अन्ततः चेक तो मिला लेकिन उन्होंने कहा - ‘आप मेरे जीते जी मुझे मेरे वाजिब पैसे नहीं दिलवा सके तो मेरे मरने के बाद मेरे बच्चों को क्या दिलवाओगे?’ उन्हें उत्तर दिया जा सकता था, समझाया जा सकता था। किन्तु परास्त नैतिकता से दबे हम लोग उन्हें कोई उत्तर नहीं दे सके।
ये और ऐसी ही छोटी-छोटी बातें मुझे कचोटती हैं। असहज करती हैं।

राष्ट्रवाद याने राष्ट्रवाद नहीं

वे सीहोर (मध्य प्रदेश के, भोपाल से लगभग 40 किलो मीटर दूर, एक, जिला मुख्यालय वाला कस्बा)  से बोल रहे थे। एलआईसी के एक अभिकर्ता साथी ने मुझसे पूछ कर ही मेरा नम्बर उन्हें दिया था। वे उस अभिकर्ता साथी के जीजा थे। अभिकर्ता साथी ने कहा था कि उसके जीजा को, एक साहित्यिक संगठन की शाखाएँ पूरे मध्य प्रदेश में गठित करने का दायित्व दिया गया है। वे चाहते थे कि उस संगठन की रतलाम शाखा के लिए मैं उन्हें कुछ ‘लिखने-पढ़नेवालों’ के नाम सुझाऊँ।

हमारा सम्वाद कुछ इस तरह हुआ -

वे - ‘नमस्कारजी! मैं सीहोर से .........बोल रहा हूँ। आपका नम्बर मुझे देवासवाले ........जी ने दिया है।’

मैं - ‘नमस्कारजी। हाँ। याद आया। हुकुम कीजिए।’

वे - ‘हुकुम तो कुछ नहीं जी। हम एक राष्ट्रवादी संगठन हैं। इसकी रतलाम शाखा के लिए हमें राष्ट्रवादी विचारधारावाले कुछ लोगों के नाम चाहिए थे। आप मदद कर दें।’

मैं - ‘राष्ट्रवादी से आपका क्या मतलब? अपने देश में तो सब ही राष्ट्रवादी हैं!’

वे - ‘नहीं। आप नहीं समझे। मैंने कहा कि हम एक राष्ट्रवादी संगठन हैं और इसी विचारधारा के सहित्यकार हमें चाहिए।’

मैं - ‘क्या आपके यहाँ कोई अराष्ट्रवादी है? यदि हैं तो कुछ नाम बताइए। शायद मैं  किसी को जानता होऊँ। उन नामों से अनुमान लगाने की कोशिश करूँगा कि अराष्ट्रवादी लोग किस प्रकार के होते हैं।’

वे - ‘नहीं! नहीं! आप अब तक नहीं समझे। फिर कह रहा हूँ कि हम एक राष्ट्रवादी संगठन हैं और रतलाम में हमारे संगठन की शाखा गठित करने के लिए हमें राष्ट्रवादी विचारधारावाले साहित्यकारों के नाम चाहिए।’

मैं - ‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। मैं वाकई में अब तक नहीं समझा कि राष्ट्रवादी से आपका मतलब क्या है।’

वे - ‘कमाल है! आप तो खुद ही लिखने-पढ़नेवाले हैं! राष्ट्रवादी का मतलब नहीं समझते?’

मैं - ‘अब तक तो नहीं समझा। अच्छा, यह बताइए कि आपकी परिभाषा में मैं राष्ट्रवादी हूँ या नहीं?’

वे - ‘कैसी बातें करते हैं आप? आप राष्ट्रवादी तो हैं किन्तु आपके बारे में जितना मुझे मालूम है उसके मुताबिक हमारी राष्ट्रवादी विचारधारा में फिट नहीं बैठते हैं।’

अब मेरी ट्यूब लाइट चमकी। वे ऐसे आदमी से सहायता चाह रहे थे जिसे वे अपने लिए अनुकूल तो नहीं मान रहे थे किन्तु जिसकी सदाशयता पर उन्हें विश्वास था। वे ‘प्रतिकूल’ से ‘अनुकूल’ की प्रत्याशा कर रहे थे! चूँकि बात मेरी समझ में आ चुकी थी सो अब मैं मजे लेने लगा।
हमारा सम्वाद आगे कुछ इस तरह रहा -

मैं - ‘याने कि आपको संघ की विचारधारावाले साहित्यकार चाहिए?’

वे (बात मुझे समझ में आ गई है, इसकी प्रसन्नताभरी खनक उनकी आवाज में भरपूर गर्मजोशी से अनुभव हुई) - ‘हाँ। अब आप समझे।’

मैं - ‘तो इसके लिए आपने मुझे फोन क्यों किया? आप ‘तपस्या’ (रतलाम में ‘संघ’ का कार्यालय) में फोन लगा लेते! रुकिए! मैं आपको ‘तपस्या’ का नम्बर देता हूँ।’
वे (तनिक घबरा कर) - ‘नहीं! नहीं! वो नम्बर तो मेरे पास है।’

मैं - ‘तो फिर?’

वे - ‘हम वहाँ से सीधी सहायता नहीं लेना चाहते। हम नहीं चाहते कि लोग हमें संघ का समर्थक संगठन समझें।’

मैं - ‘यह क्या बात हुई? आप संघ की विचारधारावाले लोग भी चाहते हैं और चाहते हैं कि आपको संघ का समर्थक संगठन नहीं समझें! ऐसा कैसे सम्भव है? और अब, मुझे तो मालूम हो ही गया है! मैं ही सबको बता दूँ तो?’

वे - ‘नहीं! नहीं! ..........जी ने बताया था कि आप ऐसे आदमी नहीं हैं।’

मैं - ‘तो एक काम कीजिए। कुछ जनवादी लिखने-पढ़नेवाले मेरे मित्र हैं। उनके नाम लिख लीजिए। उनके होने से आप पर संघ की विचारधारा से जुड़ने का ठप्पा नहीं लगेगा।’

वे - ‘नहीं! नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है। वे तो जनवादी हैं। फिर हम राष्ट्रवादी विचारधारावाला संगठन कैसे रह पाएँगे?’

मैं - ‘क्यों? क्या जनवादी लोग राष्ट्रवादी नहीं हैं?’

वे - ‘नहीं! नहीं! यह बात नहीं! वे भी राष्ट्रवादी तो हैं किन्तु वैसे राष्ट्रवादी नहीं, जैसे हम चाहते हैं।’

मैं - ‘क्या मतलब? राष्ट्रवाद की भी श्रेणियाँ होती हैं?’

वे - ‘नहीं। श्रेणियाँ तो नहीं होतीं किन्तु हम एक राष्ट्रवादी संगठन हैं और हमें हमारे जैसे ही राष्ट्रवादी चाहिए।’

मैं - ‘आपने मुझे उलझन में डाल दिया। आप मुझे राष्ट्रवादी तो मानते हैं किन्तु अपने राष्ट्रवाद के लिए फिट नहीं मानते। जनवादियों को भी राष्ट्रवादी मान रहे हैं किन्तु अपने जैसे राष्ट्रवादी नहीं मान रहे। आपके जैसे राष्ट्रवादियों के नाम जानने के लिए आप संघ के कार्यालय की सहायता भी नहीं लेना चाहते। निष्पक्ष नजर आते रहकर संघ की विचारधारा को आगे भी बढ़ाना चाहते हैं। आपका यह राष्ट्रवाद मुझे विचित्र लग रहा है।’

वे - ‘समझ में नहीं आ रहा कि आप क्या कह रहे हैं। .......जी ने तो बताया था कि आप बहुत समझदार आदमी हैं। लगता है कि या तो आप राष्ट्रवाद का मतलब नहीं जानते या फिर आप राष्ट्रवादियों की सहायता नहीं करना चाहते।’

मैं - ‘उलझन में तो आपने डाल दिया है। आप अपना राष्ट्रवाद मुझे समझा नहीं पा रहे हैं और मेरे राष्ट्रवाद को राष्ट्रवाद नहीं मान रहे हैं। ऐसे में मैं चाहकर भी आपकी मदद नहीं कर पा रहा हूँ। आपके साले साहब ........जी मेरे अच्छे मित्र हैं। यदि आपकी मदद नहीं कर पाऊँगा तो वे दुखी भी होंगे और नाराज भी। इसलिए प्लीज!  मेरी मदद कीजिए और बताइए कि राष्ट्रवाद से अपका मतलब क्या है?’

वे - ‘आप अब तक नहीं समझे तो मेरे समझाने से क्या समझेंगे? आपको खामखाँ ही तकलीफ दी। धन्यवाद। नमस्कार।’

मैं उलझन में हूँ। मैं राष्ट्रवादी हूँ या नहीं?

महबूब की बेवफाई

मैं सार्वजनिक उपक्रमों का पक्षधर हूँ। मेरी धारणा  है  कि ये हम सामान्य लोगों को निजी क्षेत्र की मनमानियों और शोषण से बचाते हैं। यह भी जानता हूँ ‘सरकारी’ होने के कारण भ्रष्टाचार और लापरवाही इनका स्वभाव बने हुए हैं। इसके बाद भी मैं इनका पक्षधर हूँ। अन्धा पक्षधर। किन्तु ऐसा भी नहीं कि विवेक को ताक पर रख दूँ। इसीलिए, ‘इनसे भी’ लड़ता हूँ और ‘इनके लिए भी’ लड़ता हूँ। मैं ‘प्रेमी’ की तरह अपनी प्रेमिका पर अधिकार भी जताता हूँ और उसकी चिन्ता भी करता हूँ। इसीलिए, बीएसएनल का अनपेक्षित व्यवहार मुझे ‘प्रेमिका की बेवफाई’ जैसा लगा और मैं छटपटा उठा।

मेरे साथी अभिकर्ता कैलाश शर्मा ने किराए के मकान से खुद के मकान में रहना शुरु किया तो उसे अपना फोन नई जगह स्थानान्तरित कराना ही था। पहली अगस्त को कैलाश ने अपने मकान में अपनी गृहस्थी जमाई। इससे पहले कि वह फोन स्थानान्तरित करने का आवेदन दे पाता, केंसरग्रस्त अपने एक प्रियजन के लिए उसे अचानक ही इन्दौर जाना पड़ा। फोनवाला काम वह मेरे जिम्मे कर गया। दो अगस्त को राखी की छुट्टी थी। तीन अगस्त को मैंने बीएसएनएल कार्यालय जाकर, कैलाश का आवेदन लगाया। कुछ परिचित वहाँ निकल आए। मैंने उनसे व्यक्तिशः अनुरोध कर काम जल्दी से जल्दी कराने का अनुरोध किया क्योंकि अपने परिवार से सम्पर्क बनाए रखने के लिए कैलाश का यही माध्यम था।

सबने भरपूर गर्मजोशी दिखाई और भरोसा दिलाया कि मैं चिन्ता न करूँ क्योंकि पहली नजर में यह काम ‘हाथों-हाथ’ होने जैसा है। वहीं मुझे भाई राकेश देसाई मिल गए। मुझे पता नहीं था कि वे उसी कार्यालय में बड़े अधिकारी हैं। यह काम यद्यपि उनके क्षेत्राधिकार का नहीं था फिर भी, अपनी सीमाओं से परे जाकर, आगे रहकर उन्होंने मेरी मदद की। मुझे विश्वास हो गया कि तीन अगस्त की शाम होते-होते कैलाश के नए मकान पर फोन लग ही जाएगा और इस गम्भीर परिस्थिति में कैलाश अपने परिवार से सतत् सम्पर्क में रह सकेगा।

किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। एक दिन, दो दिन, तीन दिन निकल गए। फोन नहीं लगा। तलाश किया तो कभी ‘लाइनमेन को कह दिया है’ तो कभी ‘अरे! क्या बात करते हैं? अब तक नहीं लगा? अभी दिखवाते हैं। आप जाइए।’ जैसे प्रभावी जुमले सुनने को मिले। लाइनमेन से मैं दो बार मिला और चार-पाँच बार उससे फोन पर बात की। पहले दिन तो उसके साथ जाकर उसे कैलाश का नया मकान भी दिखाया।

इस बीच मैं भी अपने काम में उलझ गया। कैलाश का इन्दौर आना-जाना बराबर बना हुआ था। चूँकि उसकी ओर से कोई शिकायत या उलाहना नहीं मिला तो मुझे लगा, फोन लग गया होगा।

सत्रह अगस्त को, बीमा कार्यालय में कैलाश से, तसल्ली से मुलाकात हुई। वह इन्दौर से लौट आया था। केंसरग्रस्त उसके प्रियजन की दशा बेहतर थी। बातों ही बातों में पता लगा कि फोन अब तक, याने आवेदन के पन्द्रहवें दिन तक उसके नए मकान पर नहीं लगा है, वह भी इतनी भाग-दौड़ और कई लोगों से ‘भाई-दादा’ करने के बाद भी! मैं हत्थे से उखड़ गया और वह व्यवहार कर बैठा जिसे मैं खुद अनुचित मानता हूँ।

मैंने, रतलाम में पदस्थ, बीएसएनएल के सबसे बड़े अधिकारी का नम्बर लेकर फोन लगाया। उनकी महिला सहायक ने फोन उठाया। उन्होंने पूरा मामला जानना चाहा। मैंने कहा - ‘आपको ही सब बता दूँगा तो अधिकारी से क्या बात करूँगा?’ मैंने आपे से बाहर होते हुए कहा - ‘मुझे आपसे बात नहीं करनी। अपने अधिकारी से मेरी बात कराइए।’ उस भद्र महिला ने मेरी अशिष्टता की अनदेखी करते हुए कहा कि पूरी बात जानना और ग्राहक से बात कराने से पहले पूरा मामला अधिकारी को बताना उसकी ड्यूटी में शरीक है। मैंने पूरी बात बताई और कहा - ‘मैंने आपको पूरी बात बता दी। अब अधिकारी से मेरी बात कराइए।’ महिला ने विनम्रता से कहा कि अधिकारी अभी दूसरे फोन पर व्यस्त हैं इसलिए मैं ‘थोड़ी देर बाद’ फिर फोन लगा लूँ। मैंने उबलते हुए, पूरी कड़वाहट से पूछा - ‘थोड़ी देर बाद’ याने कितनी देर बाद?’ महिला ने पूर्ववत् विनम्रता से कहा - ‘थोड़ी देर बाद।’ मैंने फोन रखते ही, एक सेकण्ड से भी कम समय बाद ही फिर फोन लगा दिया। उधर से वही ‘थोड़ी देर बाद’ की बात कही गई। गुस्से में उबलते हुए मैंने, इस ‘थोड़ी देर बाद’ को अपनी सुविधा से व्याख्यायित करते हुए, पाँच-सात बार, फोन लगा दिया - हर बार एक सेकण्ड से भी कम समय में।

अन्ततः अधिकारी से बात हुई। मैंने पूरा किस्सा सुनाया और कहा कि फोन लगना न लगना एक बात है किन्तु विभाग ने एक बार भी आवेदक से सम्पर्क नहीं किया और न ही यह बताया कि उसका फोन लगेगा या नहीं और लगेगा तो कब तक लगेगा। मैंने दोहरी शिकायत की - काम न होने की और इस बारे में सम्वादहीनता बरतने की। अधिकारी ने शान्त और संयत स्वरों में मेरी हर बात से सहमति जताई और कहा - ‘आप ठीक कह रहे हैं। हम आज ही शर्माजी को स्थिति से अवगत करा देंगे।’ अधिकारी से बात समाप्त करने से पहले मैंने उनका नाम जानना चाहा। उन्होंने कहा - ‘मैं बिड़वई बोल रहा हूँ।’ 

केवल बीएसएनएल के व्यवहार से ही नहीं, अपने इस व्यवहार से भी मैं दुःखी भी था और क्षुब्ध भी। खुद से नजरें मिला पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था। सो, बात समाप्त करते ही मैं वहाँ से घर चला आया। मैंने वह सब किया और कहा था जिसे मैं खुद अनुचित, अशालीन और अशिष्ट मानता हूँ। संस्कारों से अपने इस स्खलन से मैं मर्माहत था और अपनी ही नजरों में गिरा हुआ भी। लेकिन आगे जो हुआ उसने मुझे उलझन में डाल दिया।
कोई आधे घण्टे बाद ही  कैलाश का फोन आया। वह घर से ही बोल रहा था और मुझे धन्यवाद दे रहा था। याने, उसके नए मकान पर फोन लग गया था। मुझे अच्छा तो लगा किन्तु दुःख भी हुआ। जो काम आधे घण्टे में हो गया वह पूरे पन्द्रह दिनों तक क्यों नहीं हो पाया? क्या अपने काम कराने के लिए प्रत्येक आदमी को बिड़वईजी से बात करनी पड़ेगी और ऐसी भाषा-शैली में बात करनी पड़ेगी? यदि बिड़वईजी से ही बात करनी है तो फिर कहाँ है व्यवस्था? जो कुछ हुआ वह सब मेरे व्यवहार, मेरी भाषा-शैली, लहजे, मेरे संस्कार-स्खलन को वाजिब ठहरा रहा था। मैं हतप्रभ था।

मैंने तत्काल ही बिड़वईजी को और उनकी सहायक श्रीमती व्यास को (उनका नाम मुझे बिड़वईजी से ही मालूम हुआ) धन्यवाद दिया और अपने व्यवहार के लिए क्षमा-याचना की। दोनों ने उदारतापूर्वक कहा - ‘आप क्षमा मत माँगिए। आपने ऐसा कुछ भी नहीं किया-कहा।’ यह उन दोनों का ‘बड़ापन’ हो न हो, ‘बड़प्पन’ तो था ही।
काम तो हो गया किन्तु जिस तरह से हुआ उससे लग रहा है कि किस्सा खत्म नहीं हुआ। लगता है, ‘महबूब’ के सितम जारी रहेंगे। सितम करना और करते रहना शायद महबूब की फितरत भी होती है और पहचान भी।

सोच रहा हूँ, बिडवईजी यह सब पढ़ लें और महबूब की फितरत और पहचान बदलने का यश हासिल कर लें।

खून नहीं, दूध बहता है नसों में

ऐसी यातना मैंने अब तक किसी यात्रा में नहीं झेली। नर्क यात्रा और कैसी होती होगी? 22 जुलाई को दोपहर लगभग साढे तीन बजेवाली रेल से मैं रतलाम से राजेन्द्रनगर (इन्दौर) के लिए चला था। मेरा यात्रा टिकिट नम्बर एस-52084459 था।
 
हमारे नेताओं के निर्लज्ज निकम्मेपन,  रेल अधिकारियों के (क्रूरता की सीमा तक के) रूखेपन और जन सामान्य की, सब कुछ सहते हुए चुप रहने की प्रकृति, के कारण, रतलाम-महू के बीच चल रही छोटी लाइन की रेलों से यात्रा करना किसी दण्ड भोगने से कम नहीं रह गया है। रेल अधिकारियों का रवैया कुछ ऐसा कि मानो हड़का रहे हों - ‘हजार बार कह दिया है कि यात्रा मत करो। फिर भी नहीं मान रहे हो तो जाओ! मरो! करो यात्रा अपनी ऐसी-तैसी कराते हुए।’
 
बैठने की जगह तो रतलाम से ही मिल गई किन्तु थोड़ी मेहनत करनी पड़ी। रेल्वे की कोई परीक्षा देने के लिए आए, महू लौट रहे चार रेलकर्मियों ने, बैग रख कर अपने उस साथी के लिए जगह रोक रखी थी जो दुनिया में था ही नहीं। मैंने हाथ जाड़कर (सचमुच में हाथ जोड़कर कर) कहा - ‘आपका दोस्त आ जाएगा तो मैं उठ जाऊँगा।’ अत्यधिक अनमनेपन ने उन्होंने मुझे बैठने की अनुमति देने का उपकार किया।

डिब्बे में भरपूर भीड़ थी। हिलना-डुलना दूभर था। फिर भी सबकी यात्रा प्रसन्नतापूर्वक जारी थी। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी। मौसम बदराया हुआ था। लग रहा था, बरसात होगी। इस ‘लगने’ के दम पर ही सब आशा भी कर रहे थे कि बरसात हो ही जाए। फतेहाबाद से ठीक पहलेवाले फ्लेग स्टेशन, ओसरा से कुदरत महरबान हो गई। बरसात शुरु हो गई। जल्दी ही फतेहाबाद आ गया। वे ही हरकत में आए जिन्हें उतरना था। कुछ लोग चढ़े भी। लेकिन उतरने-चढ़नेवालों को परे धकेलते हुए और जोरदार हल्ला करते हुए, तीन-चार लोगों ने, डिब्बे के दोनों दरवाजों और दोनों शौचालयों के बीच दूध की टंकियाँ जमा दीं - पाँच टंकियाँ दरवाजों के बीच और दो टंकियाँ शौचालयों के बीच। इतना ही नहीं, दरवाजे से अन्दर (सीटों की ओर) आनेवाली जगह पर भी दो टंकियाँ रख दीं। अब स्थिति यह कि जो जहाँ बैठा/खड़ा था, वहीं बैठा/खड़ा रहे। हिलना-डुलना, आना-जाना बन्द। टंकियों की ऊँचाई इतनी कि फलाँग कर भी नहीं जा सकते। अब कोई, पेशाब करने के लिए भी नहीं जा सकता था। कुछ लोगों ने टंकियों को ही ‘सीट’ बना लिया। स्थिति ऐसी बन गई थी मानो डिब्बा था तो दूध की टंकियाँ रखने के लिए और हम लोग जबरन उसमें घुस कर बैठ गए हों।
 
मुझे अजीब तो लगा ही, असहनीय भी लगा। मैंने हाँक लगा कर पूछा - ‘ये किसकी टंकियाँ हैं भाई?’ कोई जवाब नहीं आया। जाहिर था कि टंकियाँ रखनेवाले अपना काम करके जा चुके थे। मैंने फिर हाँक लगाई - दूसरी, तीसरी बार। सुनकर एक नौजवान प्रकट हुआ। मुझे हड़काते हुए बोला - ‘क्या बात है? क्यों चिल्ला रहे हो?’ मैंने टंकियाँ रखने और रास्ता बन्द होने पर आपत्ति जताई और कहा कि टंकियाँ भले ही रखी रहें किन्तु इस तरह कि शौचालयों तक जाने के लिए तथा यात्रियों के चढ़ने-उतरने के लिए रास्ता मिल जाए। मेरी बात को उसने अपनी हेठी समझा। आँखें तरेरकर और त्यौरियाँ चढ़ाकर बोला - ‘टंकियाँ तो रख दी हैं औैर अब यहीं रखी रहेंगी। बोलो! क्या करना है?’ आसपास बैठे/खड़े यात्रियों से सहयोग/समर्थन मिलने की आशा में अपने आसपास देखते हुए मैंने उससे कहा कि मैं उसकी इस हरकत की और गैर कानूनी रूप से टंकियाँ रखने की शिकायत डीआरएम और सीनीयर डीसीएम से  करूँगा। जवाब में उसने जो कुछ कहा और जिस तरह से कहा, उससे लगा कि उसे पता था कि मैं क्या कहूँगा। मेरी ओर देखे बिना, लापरवाही से उसने कहा - ‘जरूर करना और आकर मुझे बताना कि क्या हुआ?’ उसके तेवर और अपने कहे पर उसका आत्म विश्वास देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया। मेरी बदरंग शकल देखकर उसे मजा आ गया। मेरा मखौल उड़ाते हुए वह बोला - ‘चुपचाप बैठे रहो सा‘ब। लगता है, आप साल में कभी-कभार ही रेल में बैठते हो। यहाँ रोज की बात है। हम लोग रोज टंकियाँ रखते हैं और किसी से छुपा कर, चुपचाप नहीं रखते। सारी दुनिया के सामने रखते हैं। आप जैसे कई आए और चले गए। शिकायतें भी हुईं हैं और होती रहती हैं। आज तक कुछ नहीं हुआ। आप भी चाहो तो शिकायत करके तसल्ली कर लो। कुछ नहीं होगा। स्टेशन के पोर्टर से लेकर डीआरएम तक की नसों में खून नहीं, हमारा दूध बहता है। अब नमक के असरवाला जमाना गया। अब नमक का नहीं, दूध का असर होता है। बरसों से हो रहा है। सारी दुनिया देख रही है। आप भी शिकायत करके देख लो। आपको भी मालूम हो जाएगा।’

मुझे बहुत बुरा लगा। तय नहीं कर पा रहा था कि मुझे गुस्सा अधिक आ रहा है या रोना। लगा, अभी रोना आ जाएगा। मेरी आँखें डबडबा आईं। अपने आसपास देखा। कोई भी उस नौजवान से कुछ कहने को, मेरा साथ देने को तैयार नहीं लगा। मुझे लगा, सब मेरी ओर दया भरी नजरों से देख रहे हैं। मुझे और अधिक बुरा लगा।
 
अकस्मात ही मेरा विवेक और आत्म विश्वास लौटा। नहीं, वे मुझ पर दया नहीं दिखा रहे थे। उन सबकी नजरों में दयनीयता उजागर हो रही थी। वे भली प्रकार जान रहे थे कि मैं सही हूँ, उन्हें मेरा साथ देना चाहिए था और चुप रहकर वे अनुचित का समर्थन करने का ‘आदतन- अपराध’ कर रहे थे।

मैंने खुद की पीठ थपथपाई - मैं कामयाब नहीं हुआ तो क्या? मैंने प्रतिकार करने का साहस और यत्न तो किया! स्टेशन पोर्टर से लेकर डीआरम तक, सबके सब अपनी-अपनी जानें। अपने बारे मे मैं भली प्रकार जानता हूँ कि मेरी नसों में खून ही बह रहा है, फतेहाबाद के दूधियों का दूध नहीं।           

उन्‍होंने अण्‍णा का ईलाज कर दिया

यमुना ब्रिज-रतलाम यात्री गाड़ी से रतलाम आने के जिए मैं नीमच रेल्वे स्टेशन पर खड़ा था। गाड़ी आई। एक स्लीपर डिब्बे के सामने पहुँच, कोच-कण्डक्टर से बैठने की जगह माँगी। उसने कहा - ‘साठ रुपये लगेंगे। रसीद बनेगी।’ यह शर्त मेरे मनोनुकूल थी। ना करने का सवाल ही नहीं था। कण्डक्टर ने कहा - ‘कहीं भी बैठ जाईए। मैं मन्दसौर में आकर रसीद बना दूँगा।’ लगभग पूरा डिब्बा खाली था। मैंने खिड़कीवाली एक सीट पर अपना झोला फैला दिया।

मन्दसौर में कई लोग डिब्बे में चढ़े। तीन लोग मेरे वाले खाँचे (कूपे) में आकर बैठ गए। उनकी बातों ने पहले ही क्षण जता दिया कि वे, सरकारी विभागों से जुड़े, या तो ठकेदार थे या सप्लायर। सरकारी अधिकारियों और बाबुओं की रिश्वतखोरी को लेकर वे उनकी आलोचना भी कर रहे थे और परस्पर परिहास भी। उनकी बातों का निष्कर्ष था कि तमाम सरकारी अधिकारी और बाबू ‘बिकाऊ’ हैं जिनका मूल्य चुका कर उनसे कोई भी काम कराया जा सकता है। उनमें से एक, झबरीली मूँछोंवाला, शायद किसी अधिकारी या कर्मचारी से तनिक अधिक परेशान था। उसका, मोटी रकम का बिल अटक गया था। उसने गुस्से से कहा - ‘स्साले! इन्हें बिलकुल ही शरम नहीं आती। नाजायज पैसा ऐसे माँगते हैं जैसे इनके बाप का माल हो। दीमक की तरह देश को चूस रहे हैं। अण्णा हजारे को आने दो। सबका ईलाज हो जाएगा।’ उसके दोनों साथियों ने उससे सहमति भी जताई और सहानुभूति भी।

गाड़ी सरकी ही थी कि कोच-कण्डक्टर आ गया। सबसे पहले मेरे पास आकर मेरी रसीद बनाई और उन तीनों की तरफ मुड़ा। तीनों ने बीस-बीस रुपये उसकी ओर बढ़ा दिए जो उन्होंने, कण्डक्टर के आते ही अपनी-अपनी जेब से निकाल लिए थे। कण्डक्टर ने कहा - ‘यह क्या है?’ झबरीली मूँछोंवाला खुलकर मुस्कुराते हुए बोला - ‘आपका सेवा शुल्क।’ मेरी ओर इशारा करते हुए कण्डक्टर उनसे बोला - ‘अभी आपने देखा नहीं? इन साहब की, साठ रुपयों की रसीद बनाई है।’ जवाब आया - ‘हाँ। देखा। तो?’ कण्डक्टर ने जवाब दिया - ‘तो क्या? आप भी साठ-साठ रुपये निकालिए। रसीद बनेगी।’ इस बार दूसरा बोला - ‘आज सवेरे ही तो बीस-बीस रुपये देकर आए हैं!’ कण्डक्टर ने कहा - ‘सुबह आपने किसके साथ क्या किया, आप जानो। मैं अपनी बात कर रहा हूँ। साठ-साठ रुपये निकालिए और रसीद बनवा लीजिए वर्ना पाँच-पाँच सौ रुपयों का फाइन भी भरना पड़ जाएगा।’ सुनकर तीनों सहम गए। सौ रुपयों का नोट बढ़ाते हुए, इस बार तीसरा बोला - ‘चलिए! न आपकी और न हमारी। यह रखिए।’ कण्डक्टर ने घूर कर, तनिक कठोरता से कहा - ‘आपको बात समझ में नहीं आ रही? रसीद बनेगी। बस।’ तीनों तनिक अधिक सहम गए। कुछ क्षणों के मौन के बाद झबरीली मूँछोंवाला मन्द स्वरों में ऐसे बोला जैसे मिमिया रहा हो - ‘चलिए! आप खुश हो जाईए। दो की रसीद बना दीजिए।’ कह कर उसने, तीसरे के हाथ से सौ का नोट लिया और अपनेवाले बीस रुपयों के नोट के साथ, एक सौ बीस रुपये कण्डक्टर की ओर बढ़ा दिए। कण्डक्टर ने नोट लिए, जेब में रखे और आगे बढ़ने लगा। झबरीली मूँछोंवाले ने कहा - ‘रसीद?’ कण्डक्टर ने उसकी ओर देखे बिना, लापरवाही से जवाब दिया - ‘रसीद तो तीनों की बनेगी। बोलो! बनाऊँ?’ झबरीली मूँछोंवाला मानो सकते में आ गया। कोई जवाब देते नहीं बना। कण्डक्टर ने एक  पल प्रतीक्षा की और तीनों की चुप्पी  अपनी पीठ पर लादे आगे बढ़ गया। जब वह हमारेवाले खाँचे (कूपे) से तीसरेवाले खाँचे में में चला गया, इतनी दूर कि यहाँ की बात वहाँ सुनाई न दे, तो झबरीली मूँछोंवाला आपे से बाहर हो गया। भुनभुनाते हुए बोला - ‘स्साला। भ्रष्ट। देखा? एक सौ बीस रुपये जेब में रखते हुए और रसीद बनाने से इंकार करते हुए उसके चेहरे कहीं शरम नजर आई? रुपये जेब में ऐसे रख लिए जैसे उसके बाप का माल हो।’ उसके दोनों साथी, उससे पहले ही उससे सहमत थे। तीनों के तीनों गुस्से में भी थे और हतप्रभ भी। उन्हें लग रहा था कि कण्डक्टर उन्हें बेवकूफ बना गया है। उन्हें कुछ भी समझ नहीं पड़ रहा था। तीनों ही, कसमसाते हुए चुप हो गए थे।

गाड़ी जावरा पहुँची तो भीड़ का रेला डिब्बे में चढ़ आया। कोई सीट खाली नहीं रह गई थी। गाड़ी चली तो झबरीली मूँछोंवाला ऊँचा-नीचा होने लगा। उसे असहज देख दूसरे ने पूछा - ‘क्या बात है? क्या हुआ?’ झबरीली मूँछोंवाला बोला - ‘कण्डक्टर को देख रहा हूँ। देखता हूँ, किस-किसकी रसीद बनाता है? नहीं बनाता है तो परेड ले लूँगा स्साले की। अपन ही मिले थे भ्रष्टाचार की वसूली के लिए?’ दूसरा उससे तनिक अधिक समझदार निकला। हँसकर बोला - ‘अपन भी तो बीस-बीस रुपयों की बेईमानी करके बैठे हुए हैं। तुझे बुरा इस बात का लग रहा है कि तेरे हिसाब से उसने अपने से बीस-बीस रुपये ज्यादा ले लिए। चुपचाप बैठा रह वर्ना सबकी रसीद बनवाने के चक्कर में अभी साठ रुपये और लग जाएँगे।’ झबरीली मूँछोंवाले को बात तो समझ में आ गई, वह चुप भी हो गया किन्तु उसका गुस्सा कम नहीं हो रहा था। वह बार-बार गर्दन घुमा-घुमा कर कोच-कण्डक्टर को तलाश करता रहा।

गाड़ी ने रतलाम से ठीक पहलेवाला स्टेशन, धौंसवास पार किया और फिर भी कोच-कण्डक्टर नहीं आया तो झबरीली मूँछोंवाले का धैर्य छूट गया। अपना दाँव (बारी) आते ही खेल खत्म हो जाने की घोषणा सुनकर कोई बच्चा जिस तरह से चिल्लाता और झल्लाता है, बिलकुल उसी तरह, झबरीली मूँछोंवाला मानो चित्कार उठा - ‘अपन तीनों के तीनों बड़े शाणे (सयाने/चतुर) बनते हैं लेकिन हैं गधे। अरे! थोड़ी देर और उस भ्रष्ट कण्डक्टर को बहलाते रहते तो जावरा आ जाता और फिर उसके बाप की हिम्मत नहीं होती अपने से पैसे लेने की। अपन देख ही रहे हैं कि जावरा से पूरा डिब्बा स्लीपर से जनरल कोच बन गया है। वह किस-किस से पैसे लेता? सब मिल कर उस स्साले की शकल बिगाड़ कर रख देते। ऐसी हालत कर देते उस हरामखोर की कि बाकी जिन्दगी भर रसीद बनाना भूल जाता।’

कुछ ही मिनिटों में गाड़ी रतलाम स्टेशन पहुँची। सब जल्दी-जल्दी उतरने लगे। अपने दोनों साथियों के साथ झबरीली मूँछोंवाला भी उतरा किन्तु इस तरह मानो उसकी दुनिया लुट गई हो या कि उसे सबके सामने मूर्ख साबित कर दिया गया हो।

मैं सबके बाद उतरा। प्लेटफार्म पर पाँव रखते ही मुझे लगा - पता नहीं, अण्णा किस-किसका ईलाज कब करेंगे। फिलहाल तो इन्होंने अण्णा का ईलाज कर दिया।
-----

लीक पर न चलने के कष्ट

ऐसा क्यों होता है कि बात नई न होने पर भी कचोटती, ध्यानाकर्षित करती है? यह बात का प्रभाव है या अनदेखी न करने की आदत का दुःख? पता नहीं। किन्तु हर बार की तरह ही, बात बहुत छोटी तो है ही, कचोटनेवाली और ध्यानाकर्षित करनेवाली भी है ही।

रविवार, 24 जून को मैं अवधेशजी के घर बैठा था। वे एक शासकीय विद्यालय के प्रधानाध्यापक हैं। हम दोनों बातों में मगन थे कि किसीने दरवाजा खटखटाया। अवधेशजी ने हाँक लगाई - ‘दरवाजा  खुला है। आ जाईए।’ दरवाजा खुला। एक सज्जन अन्दर आए। हम दोनों को देखकर तय नहीं कर पाए कि गृहस्वामी कौन है। सो, नमस्कार किया और कहा - ‘मुझे अवधेश सर से मिलना है। बात करनी है।’ अवधेशजी ने उन्हें सादर खाली कुर्सी पर बैठाया और कहा - ‘मैं अवधेश हूँ। कहिए?’ मेरी उपस्थिति आगन्तुक को असहज करती लगी। अवधेशजी ने कहा - ‘ये अपनेवाले ही हैं। कहिए! क्या बात करनी है?’

कुछ ‘कहने‘ के बजाय आगन्तुक ने ‘पूछा’ - ‘सर! आपके स्कूल में लेट्रीन बनवाने के लिए 45 हजार का अलॉटमेण्ट आया है। आप कब बनवा रहे हैं?’ अवधेशजी चौंके। बोले - ‘आपको कैसे मालूम? आप कौन हैं?’ आगन्तुक ने बताया कि वह सरकारी ठेकेदार है और उसे केवल अवधेशजी के स्कूल के ही नहीं, नगर के तमाम स्कूलों के आबण्टन की जानकारी है। उसने यह भी बताया कि ऐसे काम करने में वह ‘एक्सपर्ट’ है और उसके काम से आज तक कोई ‘नाराज’ नहीं हुआ है। यदि अवधेशजी उसे ‘सेवा’ का मौका देंगे तो वह सबको साध लेगा और अवधेशजी को भी नाराज होने का मौका नहीं देगा।

ठेकेदार की बात सुनकर मुझे उस पर दया आ गई। वह अवधेशजी को जानता होता तो यह ‘मूर्खता’ कदापि नहीं करता। मैं साँस रोक कर किसी ‘अनहोनी’ के घटित होने की प्रतीक्षा करने लगा। किन्तु इस बार अवधेशजी ने मुझे निराश कर दिया। हँसते हुए बोले - ‘यार! ठेकेदारजी! जितना काम होना है, वह इन 45 हजार में होगा नहीं। जब ये 45 हजार मूल काम में ही कम पड़ रहे हैं तो आप शौचालय बनाने के साथ, सबको ‘खुश’ कैसे कर लेंगे?’ ठेकेदारजी ने सहजता से कहा - ‘वह आप मुझ पर छोड़ दीजिए सर। सब हो जाएगा। इसी बात के तो पैसे लेते हैं हम लोग!’ अवधेशजी को अब शायद मजा आने लगा था। बोले - ‘जरा खुलकर समझाओ यार!’ अवधेशजी की जिज्ञासा शान्त करते हुए ठेकेदार ने पूरा हिसाब बता दिया जिसमें अवधेशजी से लेकर, निरीक्षण करने और वित्तीय स्वीकृती देने तक की पूरी श्रृंखला के अधिकारियों/कर्मचारियों के ‘परसेण्टेज’ का खुलासा था। सुनकर अवधेशजी ने पूछा - ‘यार! इतना सब बाँट दोगे तो बननेवाला शौचालय कितने दिन चलेगा?’ ठेकेदार ने ‘सहज लापरवाही’ से कहा - ‘जितने दिन चलना होगा, चल जाएगा। उसकी फिकर किसी को नहीं करनी है। बस! एक बार बना हुआ नजर आ जाना चाहिए। फायनल इन्स्पेक्शन हुआ और बात खतम।’ अवधेशजी बोले - ‘यार! यह शौचालय तो एक महीना भी नहीं चलेगा। मुझे तो इसके बनने से पहले ही इसकी मरम्मत कराने की तैयारी करनी पड़ेगी।’ ठेकेदार ने अवधेशजी को ढाढस बँधाया - ‘हाँ। वो तो है। लेकिन उसकी फिकर आप क्यों करते हैं। मैं हूँ ना! रिपेयरिंग के लिए आपको अलग से बजट मिल जाएगा। मेरा तो काम ही यही है। आप एक बार सेवा का मौका तो दीजिए!’

अवधेशजी तनिक असहज हुए। बोले - ‘अभी तो मैंने अलॉटमेण्ट लेटर भी ध्यान से नहीं देखा है। आप अपना मोबाइल नम्बर दे जाइए। मैं आपको बाद में खबर कर दूँगा।’ ठेकेदार को मानो अवधेशजी का जवाब मालूम  था। उसने फौरन अपना विजिटिंग कार्ड दिया और बोला - ‘मैं आपके फोन की राह देखूँगा। लेकिन जरा जल्दी कीजिएगा। बरसात का मौसम आ गया है। काम तेजी से निपटाना पड़ेगा।’

अवधेशजी ने ‘हाँ’ में अपनी मुण्डी हिलाई और नमस्कार कर, ठेकेदार को विदा करने हेतु दरवाजे तक गए। ठेकेदार ने ‘विनयावनत’ मुद्रा में हाथ जोड़कर नमस्कार किया और कहा - ‘सर! एक रिक्वेस्ट है। आपके पास और ठेकेदार भी आएँगे। लेकिन आप याद रखिएगा कि सबसे पहले मैं आया था। आपके काम पर पहला हक मेरा है। आप सेवा का मौका दीजिए। मेरा वादा है कि मुझसे डील करने के बाद आप किसी और को याद नहीं करेंगे।’

ठेकेदार चला गया। मैं अवधेशजी की शकल देख रहा था। वे सबसे अलग, सबसे हटकर हैं। उनकी ‘कार्य शैली’ से उनके तमाम अधिकारी दुखी, अप्रसन्न, क्षुब्ध और तनिक आतंकित भी रहते हैं। वे, ईश्वर आराधना की तरह नौकरी करते हैं। तबादला कल होता हो तो आज हो जाए, लेकिन अनुचित न तो किया और न ही होने दिया। मैंने पूछा - ‘अवधेशजी! क्या करेंगे?’ वे खुलकर हँसे और बोले - ‘आपको कुछ पता नहीं। कुछ बरस पहले मैं अपनी शाला का भवन बनवा चुका हूँ। कागजी कार्रवाई और निर्धारित प्रक्रिया पूरी की। भवन निर्धारित समयावधि में बना। एक पैसा इधर से उधर नहीं जाने दिया। इंजीनीयर ने और दफ्तर के बाबुओं, साहबों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। ऑडिट में पचासों रोड़े अटकाए। लेकिन सबको धूल चटा दी।  मेरे शाला भवन के साथ बने तमाम शाला भवन खण्डहर हो गए हैं लेकिन मेरा शाला भवन वैसा का वैसा खड़ा हुआ है। मरम्मत के नाम पर अब तक एक पैसा भी नहीं लगा। मेरे यहाँ इन्स्पेक्शन के लिए कोई नहीं आता। सब जानते हैं कि क्या पता, पानी भी मिले, न मिले। मेरे यहाँ एक ही काम होता है - पढ़ाई और केवल पढ़ाई।’

वे अपनी रौ में बह रहे थे, मेरी उपस्थिति से बेखबर। मानो छत को भेद कर शून्य में देख रहे हों, कुछ इस तरह देखते हुए बोले - ‘आप देखना! इसी रकम में मैं यह शौचालय भी बनवाऊँगा और ऐसा बनवाऊँगा कि मेरे बच्चों-बच्चियों को जिन्दगी भर का आराम हो जाएगा।’

और इसके बाद अवधेशजी ने जो कहा, उसने मुझे मथ दिया। आहत स्वरों में बोले - ‘शर्म और तकलीफ इस बात की है कि मेरे रास्ते में वे ही लोग बाधाएँ खड़ी करते हैं जो दिन भर बच्चों को ‘सदा सच बोलो’ का पाठ पढ़ाते हैं।’

हमारी गप्प गोष्ठी अब शोक सभा में बदल गई थी। और शोक सभा तो दो मिनिट के मौन के साथ ही समाप्त हो जाती है!

हो गई।