इन दिनों जैन समाज के, दिगम्बर सम्प्रदाय का पर्यूषण-पर्व चल रहा है।
नीमच के दैनिक ‘नई विधा’ के लिए दादा श्री बालकवि बैरागी ने कुछ वर्षों तक, आठ दिवसीय इस पर्व के प्रत्येक दिन एक आलेख तथा क्षमापना-दिवस पर एक छन्द लिखा था। यह बात तो मुझे याद थी लेकिन यह सामग्री मेरे पास नहीं थी।
इन्दौर के दीर्घानुभवी, परिपक्व, प्रबुद्ध, विद्वान्, अग्रणी सीनीयर एडवोकेट आदरणीय श्री बी. एल. पावेचा साहब के जरिए, जावरा (रतलाम) वाले आदरणीय श्री बाबूलाजी नाहर से मुझे दादा-रचित ये आठ छन्द और एक दोहा मिला।
आदरणीय पावेचा साहब और नाहर साहब को धन्यवाद सहित, मेरी नहीं, ‘सर्व’ की यह सम्पत्ति, ‘सर्व’ को अर्पित है।
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वीतराग कोई नहीं, सबके मन में राग,
हर चादर मैली यहाँ, हर दामन में दाग।
सब संसारी जीव हैं, सब में है संसार,
कोई करुणाकर नहीं, और नहीं अवतार।
आप क्षमा-श्री-सन्त हैं, मैं हूँ मूढ़ महान्,
देव मुझे दे दीजिए, दिव्य क्षमा का दान।
पुद्गलों की सृष्टि है, पर्याय का संसार है,
साधना जिन-कल्प की भी, कर्म के अनुसार है।
वीर-वाणी जीव यह, अब तक समझ पाया नहीं,
मोक्ष के जिन-पंथ पर, चलना कभी आया नहीं।
त्रस्त हूँ आठों पहर, संसार के सन्ताप से,
याचना उत्तम क्षमा की कर रहा हूँ आप से।
तन की टूटी टापरी, मन कषाय की खान,
काम, क्रोध, मद लोभ के, आ बैठे मेहमान।
त्याग-तपस्या कुछ नहीं, नहीं सन्त-संवाद,
ऐसे में मुझसे हुए, होंगे कुछ अपराध।
विनत्-शीश, करबद्ध, मैं, अपराधी इन्सान,
माँग रहा हूँ आपसे, ‘दिव्य क्षमा’ का दान।
अनुभव आज अनाथ है, बृद्धि आज बेहोश,
पल-पल बढ़ता जा रहा, कटु-कषाय का कोष।
शून्य पड़ी है चेतना, वाणी है लाचार,
मन के राजा हो गए, अहंकार, ममकार।
मैं भी इस परिवेश में, करता नित्य प्रमाद,
देकर के उत्तम क्षमा, दें अरिहन्त-प्रसाद।
कामनाएँ मोक्ष की, और, भावनाएँ भोग की,
जिन्दगी जंजाल है, बस, इसी संजोग की।
चाहता हूँ सब सही हो, किन्तु हो पाता नहीं,
कब अवज्ञा हो गई, कुछ भी समझ आता नहीं।
इस विकट संग्राम को, किस शस्त्र के बल पर लड़ूँ?
आपसे उत्तम क्षमा मिल जाए, तो, आगे बढ़ूँ।
इस छोर से उस छोर तक, अविचार ही अविचार है,
दम्भ से दंशित हृदय का, नाम ही संसार है।
एक अदना जीव हूँ, मैं भी इसी संसार का,
जानता कुछ भी नहीं हूँ, अर्थ लोकाचार का।
इसलिए, मेरी विगत की, गलतियाँ बिसराइए,
दीजिए उत्तम क्षमा, अरिहन्त-मन पाईए।
हर कदम पर कर रहा हूँ, कुछ-न-कुछ अपराध मैं,
साधना के क्षेत्र में भी, हूँ नहीं अपवाद मैं।
खर्चता खटराग में, नित, साँस की यह सम्पदा,
मोल लेता जा रहा हूँ, आपदा पर आपदा।
प्रार्थना है आपसे, उद्धार मेरा कीजिए,
सम्पदा उत्तम क्षमा की, श्रेष्ठिवर! दे दीजिए।
मोह का विष पी रहा हूँ, किन्तु फिर भी जी रहा हूँ,
साँस की दुर्बल सुई से, जिन्दगी को सी रहा हूँ।
द्वेष का भादों बरस कर, तर-ब-तर करता मुझे,
दम्भ का दावा दहक कर, दर-ब-दर करता मुझे।
संतप्त हूँ आठों पहर, संसार के सन्ताप से,
याचना उत्तम क्षमा की कर रहा हूँ आपसे।
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क्षमा किए सुख ही बढ़े, क्षमा धर्म का सार।
अपना भी उपकार हो, पर का भी उपकार।
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