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चाँद से





श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की तेईसवीं/अन्तिम कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




चाँद से

चाँद! तेरी चाँदनी में घुटता है दम
मेरे गीतों को सूरज का घाम चाहिये

000

माना मैंने तेरा ये इरादा नहीं था
पर इतनी लम्बी रात का तो वादा नहीं था
होती है चरित्रवान भोर ही विकल
बन्धु मेरे! भोर का चरित्र मत बदल
प्राची के सिन्दूर को तरस गई फसल
खिलने को तरस गये हैं प्राण के कमल
सूरज के सातों अश्व हिनहिना रहे
तेरे रथ में जुते मृग को भी आराम चाहिये
मेरे गीतों को सूरज का घाम चाहिये
चाँद! तेरी चाँदनी में घुटता है दम।।

000

अपने अपने नीड़ों में पंछी थक गये
इन झींगुरों के शोर से कान पक गये
पंख चाहते हैं थकन मुक्त गगन की
चोंच चाहती है अगन जलती किरन की
चहचहाना भूल गये जो ये सुरीले
तो ऊषा के हाथ कैसे होंगे रे पीले
तारों की बारात सारी म्लान हो गई
अब भाँवर का लग्न एक ललाम चाहिये
मेरे गीतों को सूरज का घाम चाहिये
चाँद! तेरी चाँदनी में घुटता है दम।।

000

जब तलक थी चाँदनी प्राण का नशा
तब तलक किसी ने कभी कुछ नहीं कहा
पर नशा बदल के अब प्रमाद हो गया
लग रहा है सूर्य कहीं दूर खो गया
भैरवी से पूछने लगी है प्रभाती
क्यों हमें सुहागनें अब नहीं गाती
आरती के दीप का उपहास हो रहा
जय-जयकार को भी कुछ विराम चाहिये
मेरे गीतों को सूरज का घाम चाहिये
चाँद! तेरी चाँदनी में घुटता हैं दम।।

000

मिट्टी का सतीत्व है रवि की आग में
बाँझपना है कहाँ धरा के भाग में
वंश अगर डूब गया कल को बीज का
क्या जलाल होगा तब सती की खीज का
कोख इसकी चलती रहे, फलवती रहे
पयस्विनी की पीढ़ियाँ बलवती रहें
इसके लिये छोड़ दे तू आग सूर्य की
स्पर्श इसे सूर्य का उद्गाम चाहिये
मेरे गीतों को सूरज का घाम चाहिये
चाँद! तेरी चाँदनी में घुटता है दम।।

000

गोरी हो या काली बन्धु! रात, रात है
रात सदा रात रहे यह क्या बात है!
दिन के सिवा कौन है मसीहा रात का
भूल गये रंग तलक हम प्रभात का
कोई चाँदनी को भला कब तलक पिये
अधमरी दिशाओं में किस तरह जिये
करवटें बदल बदल के टूट गया तन
तन से मन को जुड़ने का मुकाम चाहिये
मेरे गीतों को सूरज का घाम चाहिये
चाँद! तेरी चाँदनी में घुटता है दम।।
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‘ओ अमलतास’ की बाईसवीं कविता ‘फिर भी गा रहा हूँ’ यहाँ पढ़िए




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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फिर भी गा रहा हूँ





श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की बाईसवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




मैं फिर भी गा रहा हूँ

कितना उदास मौसम, मैं फिर भी गा रहा हूँ
सरगम नहीं है सरगम, मैं फिर भी गा रहा हूँ

ये दर्द का समन्दर, ये डूबता सफीना
चारों तरफ है मातम, मैं फिर भी गा रहा हूँ

सपनों का आसरा था, वे भी सहम गये है
सहमा हुआ है आलम, मैं फिर भी गा रहा हूँ

कहते हैं जिनको आँसू, अब वे भी थम गये हैं
कोई नहीं है हमदम, मैं फिर भी गा रहा हूँ

जलता हुआ नशेमन, इसके सिवा कहे क्या
वह जुल्म है बहुत कम, मैं फिर भी गा रहा हूँ

अहसान है कि उनने, हर गम दिया सुरीला
बेजार है तरन्नुम, मैं फिर भी गा रहा हूँ
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‘ओ अमलतास’ की इक्कीसवीं कविता ‘आप बस गुमनाम’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की तेईसवीं/अन्तिम कविता ‘चाँद से’ यहाँ पढ़िए 

 


संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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आप बस गुमनाम




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की इक्कीसवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




आप बस गुमनाम

आप बस गुमनाम मरना चाहते हैं
कौन सा शुभ काम करना चाहते हैं

जिन्दगी से प्यार तो करते नहीं
बस उसे बदनाम करना चाहते हैं

साँस भर का फासला तय नहीं हुआ
उम्र भर आराम करना चाहते हैं

एक ही तो दोस्त मिला दर्द नाम का
दोस्त को नीलाम करना चाहते हैं

कर रहे हैं आपसे वो खास इशारा
आप बस सलाम करना चाहते हैं

ख्वाब-ऐ-फरिश्ता है इन्साँ की जिन्दगी
आप बस नाकाम करना चाहते हैं
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‘ओ अमलतास’ की बीसवीं कविता ‘मन्दिर जिसे समझ रहे है’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की बाईसवीं कविता ‘फिर भी गा रहा हूँ’ यहाँ पढ़िए 

 


संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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मन्दिर जिसे समझ रहे है




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की बीसवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।








मन्दिर जिसे समझ रहे हैं

मन्दिर जिसे समझ रहे हैं आप प्यार का
मलबा है भाई सा’ब! वो मेरी दीवार का

मीना बाजार के भरोसे आ तो गये आप
भीतर नजारा देखिये मछली बजार का

पूजा की थालियों को अभी फेंकिये नहीं
वे खौफ खा रहे हैं उसी अन्धकार का

अन्धे के हाथ लग गई जो कोई बटेर
वो मानने लगे हैं खुद को तीसमारखाँ

डायल बदल के कह दिया अब ठीक है घड़ी
बस नाम भी बदल दो अब शुक्रवार का

अवतार ही अवतार हैं मलबे के पासबाँ
ये भी करिश्मा है मेरे परवरदिगार का
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‘ओ अमलतास’ की उन्नीसवीं कविता ‘त्यौहार की सुबह’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की इक्कीसवीं कविता ‘आप बस गुमनाम’ यहाँ पढ़िए 

 


संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
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सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
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त्यौहार की सुबह




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की उन्नीसवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।



त्यौहार की सुबह

त्यौहार की सुबह ही अगर खुशनुमाँ नहीं
तो और कुछ हैं आप मगर रहनुमा नहीं

कल तक थी जिनके काँधों पे यारों की पालकी
ये उनने कहलवाया है, मेरा बयाँ नहीं

कल जो बहाई आपने घी-दूध की नदी
मेरे हुजूर! उसका तो मीलों पता नहीं

तुम दिलजलों ही दिलजलाें में मैं क्या करूँगा
महफिल है या मजाक जहाँ पर शमा नहीं

किरनों के संग आ रही हैं फिर उदासियाँ
सूरज तो कहीं आपका भी बदगुमाँ नहीं?

खामोश मुझे कर न सके यार के सितम
मैं आईना हूँ आपका, बेजुबाँ नहीं
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‘ओ अमलतास’ की अठारहवीं कविता ‘पूछिये मत’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की बीसवीं कविता ‘मन्दिर जिसे समझ रहे हैं’ यहाँ पढ़िए 

 


संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
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प्रथम संस्करण 1981
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पूछिये मत




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की अठारहवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




पूछिये मत

पूछिये मत क्या वहाँ कर पायेंगे
घाटियों में घूम कर आ जायेंगे

आपके उन्माद की ईश्वर रखे
जिन्दगी भर हम उसे भुनवायेंगे

ख्वाब जो गिरवी रखेंगे आज तो
देख लेना उम्र भर पछतायेंगे

हो मुबारक आपको अपनी जमीं
हम दरख्तों पर खड़े हो जायेंगे

मामला कसम-ए-वफा का छोड़िये
पेट से लाचार हैं, खा जायेंगे

इम्तिहाँ लेने की जिद है, लीजिये
कापियाँ आखिर कहाँ जँचवायेंगें
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‘ओ अमलतास’ की सत्रहवीं कविता ‘चुप रहो’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की उन्नीसवीं कविता ‘त्यौहार की सुबह’ यहाँ पढ़िए 

 


संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
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चुप रहो




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की सत्रहवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।



   
चुप रहो

तकरीर ही तकरीर है, चुप रहो
मामला गम्भीर है, चुप रहो

हर गड़ा मुर्दा उखाड़ा जायेगा
ख्वाब की तामीर है, चुप रहो

शौक से खुद ही गले में बाँध ली
कीमती जंजीर है, चुप रहो

बदचलन कोई नहीं है, ठीक है
बदचलन तकदीर है, चुप रहो

कल सुबह तक फैसला हो जायेगा
ये दवा अक्सीर है, चुप रहो

मसखरों को माफ ही कर दीजिये
इस सदी के पीर हैं, चुप रहो
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‘ओ अमलतास’ की सोलहवीं कविता ‘इन्कलाब है’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की अठारहवीं कविता ‘पूछिये मत’ यहाँ पढ़िए 

 


संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
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इन्कलाब है




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की सोलहवीं कविता 

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समर्पित किया गया है।




इन्कलाब है

रोइये या गाइये ये इन्कलाब है
देखते ही जाइये ये इन्कलाब है

बाखुशी उस बाँध को तोड़ तो दिया
अब डूब कर मर जाइये, ये इन्कलाब है

और क्या करते सिवा नारा लगाने के
आप ही समझाइये ये इन्कलाब है

रोटियों के मामले की मुल्तवी रखें
और भी कुछ खाइये ये इन्कलाब है

एक दो नारे सुने और बाँध ली उम्मीद
अब तथ्य पर आ जाइये ये इन्कलाब है

रेत में तो जी लिये, अब आ गया दलदल
शौक से चिल्लाइये, ये इन्कलाब है
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‘ओ अमलतास’ की पन्द्रहवीं कविता ‘बड़ा मजा है’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की सत्रहवीं कविता ‘चुप रहो’ यहाँ पढ़िए 

 


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ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
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बड़ा मजा है





श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की पन्द्रहवीं कविता 

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समर्पित किया गया है।




बडा मजा है

इस तट से उस तट को देखो, बड़ा मजा है
नये-नये घूँघट को देखो, बड़ा मजा है

पीढ़ी की पीढ़ी निपटा दी जिसने अपनी एक लहर से
उस कजरारी लट को देखो, बड़ा मजा है

एक बूँद पानी दिखलाकर भीड़ जुटा ले जो लाखों की
उस प्यासे पनघट को देखो, बड़ा मजा है

थिरक-थिरक तक जिस चादर पर रम्भाओं ने रास किया
उस चादर की सलवट को देखो, बड़ा मजा है

करना था सो कर ही डाला, होना है सो हो जायेगा
पर यारों की खटपट को देखो, बड़ा मजा है

भाँवर से उठते ही सीधे, अभी-अभी जो आया घर में 
उस जोड़े की खटपट को देखो, बड़ा मजा है
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‘ओ अमलतास’ की चौदहवीं कविता ‘मुरझा गये कमल’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की सोलहवीं कविता ‘इन्कलाब है’ यहाँ पढ़िए 

 


संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
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प्रथम संस्करण 1981
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सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
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मुरझा गये कमल




श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की चौदहवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




मुरझा गये कमल

पहिली किरन के साथ ही मुरझा गये कमल
अल्लाह रे! फिर से फरेब खा गये कमल

शबनम जिसे समझ रहे हैं वो है पसीना
देखिये न किस कदर घबरा गये कमल?

पानी के खानदान पे कीचड़ की फब्तियाँ
तालाब के भरोसे कहाँ आ गये कमल!

सपना था किसी देवता के सिर पे चढ़ेंगे
पर देवता को देख के गश खा गये कमल

रोशनी के पाँव में फिर मोच आ गई
बेनूर सुबह आई तो शरमा गये कमल

एक-एक पंखुरी पे घाव हजारों
अपने ही फैसलों की सजा पा गये कमल
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‘ओ अमलतास’ की तेरहवीं कविता ‘लहद से मैयत मेरी’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की पन्द्रहवीं कविता ‘बड़ा मजा है’ यहाँ पढ़िए 

 


संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
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सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
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लहद से मैयत मेरी


 


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की तेरहवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




लहद से मैयत मरी

लहद से मैयत मेरी वापस निकालेंगे रकीब
इस लहदबाजी में खुद को मार डालेंगे रकीब

वो तो मैं था जिसने उनको रक्खा अब तक बाशऊर
पगड़ियाँ अब तो खुदा तक की उछालेंगे रकीब

आशियाँ मैंने बनाया आसमाँ से जूझकर
हो न हो अब आशियाँ में साँप पालेंगे रकीब

साकी-ओ-मीना वही मय-ओ-मयखाना वही
देख लेना मुझ से ज्यादह जाम ढालेंगे रकीब

कत्ल करके मेरे कातिल मत जला घी के चिराग
इन चिरागों से चमन अपना जला लेंगे रकीब

या खुदा दे दे उन्हें मेरा खूँ, मेरा जुनूँ
वर्ना अपने खून में पानी मिला लेंगे रकीब
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‘ओ अमलतास’ की बारहवीं कविता ‘ओ किरणों! कंचन बरसाओ’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की चौदहवीं कविता ‘मुरझा गये कमल’ यहाँ पढ़िए 

 


संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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ओ किरणों! कंचन बरसाओ

 
  


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की बारहवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




ओ किरणों! कंचन बरसाओ

ओ किरणों! कंचन बरसाओ
हर आँगन का अँधियार हरो
मंगल अभिषेक करो
धरा पर सुबरन चरण धरो

रुनक-झुनक झुन-झुन-झुन आओ
अँधियारा सारा पी जाओ
कनक कलश के साथ पिया की
डोली से उतरो
धरा पर सुबरन चरण धरो। ओ किरणों!

नील गगन के लाखों तारे
कब तक लड़ते रहें बिचारे
शीलवती! इनसे भी कुछ तो
शुचि सहयोग करो
धरा पर सुबरन चरण धरो। ओ किरणों!

उजियारा यदि परवश होगा
बोलो किसका अपयश होगा
कोख नहीं हो जाय कलंकित
अपनी गोद भरो
धरा पर सुबरन चरण धरो। ओ किरणों!
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‘ओ अमलतास’ की ग्यारहवीं कविता ‘ ओ अमलतास!’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की तेरहवीं कविता ‘लहद से मैयत मेरी’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
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ओ अमलतास!

 
  


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की ग्यारहवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




ओ अमलतास!

ओ अमलतास!
मत हो उदास
तेरा पंछी कल फिर आयेगा
फिर मीठ सुर में गायेगा
ओ अमलतास ...।।

अम्बर के आँचल में उसका,
कोई नहीं ठिकाना
तेरे ही आँगन में होगा, उसको नीड बनाना
बाँहे पसार
कर इन्तजार
वो टूटे तिनके लायेगा
मीठे सुर में गायेगा
ओ अमलतास! मत हो उदास।।

उदयाचल से अस्ताचल तक,
सूरज जलता जाये
दिशा-दिशा उसके पंखों पर, अंगारे बरसाये
तब बार-बार
दो पल उधार
वो तेरी छैंया चाहेगा
तेरा पंछी कल फिर आयेगा
फिर सुर में गायेगा
ओ अमलतास! मत हो उदास।।

पल दो पल के लिए भले
वह और कहीं उड जाता
(पर) तेरा उसका जनम-जनम का
गीत-प्रीत का नाता
तू डार-डार
कर ले सिंगार
वह चैन यहीं पर पायेगा
तेरा पंछी कल फिर आयेगा
फिर सुर में गायेगा
ओ अमलतास! मत हो उदास।।
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‘ओ अमलतास’ की दसवीं कविता ‘आलिंगन के बाहर भी प्रिय!’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की बारहवीं कविता ‘ओ किरणों! कंचन बरसाओ’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
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मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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आलिंगन के बाहर भी प्रिय!

 
  


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की दसवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।



आलिगन के बाहर भी प्रिय !


आलिगन के बाहर भी प्रिय !
बहुत बड़ा संसार पड़ा है

बाहों के घेरे में केवल, कंचन तन का ताजमहल है
बहुत हुआ तो तट से छूता, जमुना तल का राजमहल है
लेकिन उसके आगे भी प्रिय!
गोकुल का विस्तार पड़ा है
आलिगन के बाहर भी प्रिय! बहुत बड़ा संसार पड़ा है।

यह सच है मादक आलिंगन, सुधबुध सारी हर लेता है
एक सनातन रूप पिपासा, रोम-रोम में भर देता है
किन्तु रूप के आगे भी प्रिय!
सत्, शिव अपरम्पार पड़ा है
आलिगन के बाहर भी प्रिय! बहुत बड़ा संसार पडा है।

काया कभी न कर पायेगी, भूख प्यास से कड़ा बहाना
यह भी सच है बड़ा कठिन है, प्यासे मरुथल को समझाना
किन्तु परिधि के बाहर भी प्रिय!
रस का पारावार पड़ा है
आलिंगन के बाहर भी प्रिय! बहुत बड़ा संसार पड़ा है।
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‘ओ अमलतास’ की नौवीं कविता ‘यौवन के उत्पात वसन्ती’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की ग्यारहवीं कविता ‘ओ अमलतास!’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
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यौवन के उत्पात वसन्ती


  


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की नौवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




यौवन के उत्पात बसन्ती

दिन वासन्ती रात बसन्ती
युग का पुण्य प्रभात बसन्ती

पनघट-पनघट रस की बातें
ऋतुराजा की चढ़ी बरातें
दिशा-दिशा से बरस रही है
रंग-रस की बरसात 
बसन्ती
दिन वासन्ती रात बसन्ती

बगिया लीपे किरण किशोरी
हाँ-हाँ उस सूरज की छोरी
ऋतु कुँवरी सरवर में उतरी
लेने को जलजात बसन्ती
दिन वासन्ती रात बसन्ती

भँवरे गाए कोयल बोले
कलियों ने सब घूँघट खोले
बगिया-बगिया होने लग गये
यौवन के उत्पात बसन्ती
दिन वासन्ती रात बसन्ती
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‘ओ अमलतास’ की आठवीं कविता ‘सेनापति के नाम’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की दसवीं कविता ‘आलिंगन के बाहर भी प्रिय!’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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सेनापति के नाम

 
 


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की आठवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




सेनापति के नाम

अडियल घोड़े बदहवास हों
सारथि जिसके सूरदास हों
समर शेष है
ऐसे रथ से
मेरे रथी! उतर भी जाओ।

राज मार्ग के जय निनाद में, भूल गए अपनी पगडण्डी
सेनाएँ हो गईं प्रमादी, सेनापति हो गए शिखण्डी
इस सेना का अन्त निकट है-शेष समर अत्यन्त विकट है
रण ऋतु की रंगत पहिचानो, ओ रणव्रती! उतर भी जाओ
मेरे रथी! उतर भी जाओ।।

आलिगन में ऊष्मा हो तो, आँखों में रस बन्धन होते
द्रोपदी पल भर में बँट जाती, यदि सब कुन्ती नन्दन होते
सिर्फ उपद्रव जिनकी रति हो, दुर्गति ही जिनकी सद्गति हो
उनके रथ में राम नहीं है, लक्ष्मण जती! उतर भी जाओ
मेरे रथी! उतर भी जाओ।।

जनादेश को अपमानित कर वचन भंग के दो दोषी हो
संसद जिनका रनिवासा हो सत्ता जिनकी बेहोशी हो
सेना नहीं गिरोह बचा है, खुद जिसमें संग्राम मचा है
उनकी शैली उनको शुभ हो, ओ जय शती! उतर भी जाओ
मेरे रथी! उतर भी जाओ
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‘ओ अमलतास’ की सातवीं कविता ‘फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की नौवीं कविता ‘यौवन के उत्पात वसन्ती’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे

 
  


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की सातवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।




फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे

कितने मोहक, कितने मादक
प्राण पुरुष! उत्पात तुम्हारे
फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे

पल में पीली, पल में नीली
जीवन शाख बड़ी लचकीली
क्या-क्या रंग दिखा देते हैं
सतरंगे आघात तुम्हारे
फूल तुम्हारे पात तुम्हारे

बीज उगा, आँसू अँकुराया
जड़ को तुमने जीव बनाया
माटी का वृन्दावन रचकर
क्या आया है हाथ तुम्हारे
फूल तुम्हारे पात तुम्हा
रे

सक्षम हो सब कर सकते हो
गहरे और उतर सकते हो
मुझ घायल के सिवा वहाँ तक
कौन चलेगा साथ तुम्हारे
फूल तुम्हारे पात तुम्हारे
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‘ओ अमलतास’ की छठवीं कविता ‘क्यों तुमने यह बिरवा सींचा’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की आठवीं कविता ‘सेनापति के नाम’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

 
  


श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की छठवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।



  
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

क्यों यह अर्ध्य दिया अभिमन्त्रित
क्यों इतना अनुराग उलीचा
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

गगन टेक कर किरन लुकाटी
ढूँढ रहा है सुरभित माटी
अम्बर को तुम अपने तप से
क्यों ले आये इतना नीचा
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

प्राण-प्राण मनवन्तर जुड़ती
पागल गन्ध निरन्तर उड़ती
छन्द-छन्द को बना दिया है
तुमने कैसा गन्ध-गलीचा
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा

आज ऋणी है स्पन्दन-स्पन्दन
यह कैसा पानी का बन्धन
अँकवारी भर जल ने जल को
क्यों कर यूँ बाँहों में भींचा
क्यों तुमने यह बिरवा सींचा
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‘ओ अमलतास’ की पाँचवीं कविता ‘आज तो करुणा करो’ यहाँ पढ़िए

‘ओ अमलतास’ की सातवीं कविता ‘फूल तुम्हारे, पात तुम्हारे’ यहाँ पढ़िए 




संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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आज तो करुणा करो



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की पाँचवीं कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।





आज तो करुणा करो

हर शिरा ने शीश तुमको ही झुकाया
नाथ! तुम ही हो प्रभंजन
आज तो करुणा करो

000

वन्दना की वेदना से मैं अपरिचित
पर निरत हूँ वन्दना में रात दिन
तुम सुपरिचित मैं अपरिचित
आ गई कजरी निशा कितनी भयावह प्रातः बिन
हर निशा ने शीश तुमको ही झुकाया
नाथ! तुम ही हो किरण कण
आज तो करुणा करो
हर शिरा ने शीश तुमको ही झुकाया

 000

व्यग्र, व्याकुल, विरह विगलित
छटपटाते प्राण का मैं क्या करूँ
डूबती तम तोम में
पल-पल सिसकती वर्तिका को
छोड़ कर मन्दिर तुम्हारा
और किसके पग धरूँ
हर शिखा ने शीश तुमको ही झुकाया
नाथ! तुम ही हो कवच-मन
आज तो करुणा करो
हर शिरा ने शीश तुमको ही झुकाया

000

झिलमिलाती कामनाएँ चेतना को
चूमकर चुपचाप हैं
अश्रु स्नाता एक चितवत कर रही संकेत मुझको
यह तम्हारी, हाँ तुम्हारी
पावनी पदचाप है
हर तृषा ने शीश तुमको ही झुकाया
नाथ! तृम ही हो सजल घन
आज तो करुणा करो
हर शिरा ने शीश तुमको ही झुकाया
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संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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मेरे नगर क्षमा कर देना


 
श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘ओ अमलतास’ की चौथी कविता 

यह संग्रह श्री दुष्यन्त कुमार को
समर्पित किया गया है।

   
   

   मेरे नगर क्षमा कर देना

मातृगर्भ से मरघट तक के, इस कोलाहल भरे सफर में
मुझसे जो भी भूल हुई हो, मेरे नगर क्षमा कर देना
तेरे सरवर, तेरे पोखर, तेरे नाले, तेरी सरिता
मेरी कंकरिया खाकर भी, देते रहे हमेशा कविता
तेरी चन्दन सी माटी को, मैंने अपने पैरों रौंदा
फिर भी तूने हर उमर में, सौंपा मुझको नया घरौंदा
दाई से अँगनाई तक के
हर अपमानित पुण्य प्रहर में 
मुझसे जो भी भूल हुई हो, मेरे नगर क्षमा कर देना
मातृगर्भ से मरघट तक के

000

मंजरियों को मसला मैंने, लूटी मैंने हर अमराई
हर कोंपल को ऐसा नोचा, धोखा खा गई हर चतुराई
तितली की तनतोड़ प्यास के, मैंने झूठे सरगम गाये
भँवरों के दिल जला-जला कर, कलियों को कंगन पहनाए
ये आरोप सभी झूठे हैं,
फिर भी इस नादान उमर में
मुझसे जो भी भूल हुई हो, मेरे नगर क्षमा कर देना
मातृगर्भ से मरघट तक के

000

प्यार दिया हर एक दिशा ने, खुला मुझे हर द्वार मिला है
बाँहों का बौराया आँगन, मुझको लाखों बार मिला है
मनुहारों के मान महल में, चुम्बन की शैया पर सोया
वैसे तो क्या तेरे बल पर, सपनों में भी कभी न रोया
लेकिन फिर भी भूले भटके
आँसू की अनजान लहर में
मुझसे जो भी भूल हुई हो, मेरे नगर क्षमा कर देना
मातृगर्भ से मरघट तक के

000

गली-गली में गाया मैंने, जो भी गाया सुर में गाया
सुनने मुझको वातायन में, हर गवाक्ष का यौवन आया
लाखों ललचाये अधरों ने मांगे मुझसे गीत रसीले
अपलक मुझको रहे देखते, चरण-चरण पर नैन नशीले
निष्कलंक था हर कटाक्ष पर
काजल के कमनीय जहर में
मुझसे जो भी भूल हुई हो, मेरे नगर क्षमा कर देना
मातृगर्भ से मरघट तक के

000

हर सूरज को अर्ध्य दिया है, हर चन्दा को नमन किया है
हर तारे को फिर मिलने का, मैंने मन से वचन दिया है
आशीषों का आँचल माँगा मैंने, पूज्य पिता-माता से
तेरा आँगन फिर माँगा है, मैंने अपने निर्माता से
नष्ट नीड़ सा स्पष्ट रहा हूँ
फिर भी तेरी छिपी नजर में
मुझसे कोई भूल हुई हो, मेरे नगर क्षमा कर देना
मातृगर्भ से मरघट तक के
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संग्रह के ब्यौरे
ओ अमलतास (कविताएँ)
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - किशोर समिति, सागर।
प्रथम संस्करण 1981
आवरण - दीपक परसाई/पंचायती राज मुद्रणालय, उज्जैन
सर्वाधिकार - बालकवि बैरागी
मूल्य - दस रुपये
मुद्रण - कोठारी प्रिण्टर्स, उज्जैन।
मुख्य विक्रेता - अनीता प्रकाशन, उज्जैन
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