सास-बहू की पहली होली की पहेली


परिवार में आए विवाह प्रसंग पर हम लोगों ने कई परम्पराओं के अर्थ जानने के प्रयत्न किए । खूब देर तक विमर्श और विचार किया, तर्क-कुतर्क जुटाए, औचित्य तक पहुँचने के लिए गहन और विस्तृत छिद्रान्वेषण किया । हम सब यह जानकर विस्मित हुए कि तत्कालीन परिस्थितियों की अनिवार्यताओं के चलते शुरू किए गए अधिसंख्य उपक्रमों को हम आज अनावश्यक होने पर भी ढोए जा रहे हैं । `लोग क्‍या कहेंगे' और `ऐसा थोड़े ही होता है' जैसे निराकार `लोक-दैत्य-भय' के आगे अच्छे-अच्छे प्रगतिशीलों को घुटने टेकने पड़ जाते हैं । मैं इस मामले में सचमुच भाग्यशाली हूँ कि मेरे परिजनों ने वास्तविकता को अनुभव किया और हम कई परम्पराओं से मुक्‍त रह सके ।


लेकिन एक मामला अभी भी जिज्ञासा बना हुआ है । बहू आई वैशाख शुक्‍ल द्वितीया को । उसके पीछे-पीछे, तेरहवें दिन होली चली आ रही थी । आस-पड़ौस में खुसुर-पुसर शुरू हो गई थी । बहू का मायका बड़वानी में है । हर कोई जानने को उत्सुक था कि बहू बड़वानी जाएगी या रतलाम में ही मामा के घर ? अचरज मुझे इस बात पर हो रहा था कि बहू की विदाई को लेकर कोई भी मुझे न तो कुछ बता रहा था और न ही कोई मुझसे कुछ पूछ रहा था । मुझे ऐसा लगने लगा मानो मेरे आस-पास कोई रहस्य-कथानक बुना जा रहा हो । कुछ दिनों तक तो मैं प्रतीक्षा करता रहा कि मेरे घर का मामला है, मुझसे भला क्‍यों छुपाया जाएगा । लेकिन प्रतीक्षा की भी हद होती है । खासकर तब, जबकि आपके आस-पास फुसफुसाहटें शोर कर रही हों और आपको कुछ सूझ नहीं पड़ रहा हो । सो, मेरे धैर्य ने अन्तत: साथ छोड़ दिया । मैंने तनिक आवेश में पूछा कि आखिर मुझसे क्‍या छुपाया जा रहा है । मेरी मुख-मुद्रा, हाव-भाव और आवाज की तुर्शी से परिजन सकते में आ गए । कुछ ही पलों के बाद मुझे बताया गया कि पहली होली पर सास-बहू साथ नहीं रहतीं । सो, बहू की यह होली कहाँ होगी, यह तय किया जा रहा है ।

मेरे लिए यह अनूठी सूचना थी । मैंने पूछा- `साथ-साथ क्‍यों नहीं रहती ?' उत्तर मिला- `पता नहीं । लेकिन साथ -साथ नहीं रहती ।' मैंने फिर पूछा- `क्‍यों ?' इस क्‍यों का जवाब किसी के पास नहीं था । हम लोग जिज्ञासावश आपस में पूछताछ करने बैठ गए । यह बात तो हर कोई कह रहा था कि मालवा की परम्‍परानुसार, सास-बहू पहली होली पर साथ-साथ नहीं रहती लेकिन इसके पीछे का तर्क , कारण किसी को सूझ नहीं पड़ा । सोचा- बुजुर्गों से पूछा जाए । सो, परम्पराओं, लोकोक्तियाँ, मुहावरों के विशद् ज्ञाता भगवानलालजी पुरोहित से पूछा । उन्होंने हैरान भी किया और निराश भी । बोले- 'हाँ, सास-बहू पहली होली पर साथ-साथ नहीं रहती । लेकिन मुझे नहीं मालूम कि क्‍यों नहीं रहती ।' मैंने कहा- `जब कोई कारण नहीं है तो हम दोनों को साथ-साथ रहने दें तो कोई हर्ज है ?' चिन्तातुर और अमंगल की कल्पना से भयातुर परिजन की भूमिका निभाते हुए उन्होंने कातर स्वरों में आग्रह किया- `भले ही कारण मालूम न हो लेकिन साथ-साथ मत रहने दीजिए । पुराने लोगों ने कुछ सोचकर ही यह प्रथा शुरू की होगी।' मेरे लिए यह निराशाजनक स्थिति थी ।

औचित्य-अन्वेषण और तार्किकता के घोड़े पर अमंगल के भय ने सवारी कर ली और आशंकाओं के चाबुक सटाक्-सटाक् बरसने लगे । अन्तत: वही हुआ जो ऐसी दशा में हो सकता था । मेरी सारी प्रगतिशीलता धरी रह गई और सास-बहू ने अपना पहला होलीका दहन साथ-साथ नहीं देखा।


लेकिन जिज्ञासा, विचार-विमर्श और छिन्द्रान्वेषण बराबर चल रहा था । हम सब लस्त-पस्त और परास्त होकर परम्परा के सामने घुटने टेके बैठे थे । सबकी `शाणपत' बिलों में घुस चुकी थी । बिना किसी घोषणा के अध्याय समाप्त् हो चुका था ।

अचानक मेरे छोटे बेटे तथागत के चेहरे पर शरारत और दुष्टताभरी मुस्कुराहट तैर आई । वह अपनी हँसी नहीं रोक पाया । हो-हो कर हँसने लगा । अब उसकी हँसी हमारी जिज्ञासा बन गई थी । हम सबने लगभग एक स्वर में पूछा कि वह क्‍यों हँस रहा है । उसने कहा- `इस परम्परा का मूल कारण मुझे पता है।' अब वह सयाने की तरह हमें और हम सब मूढ़मति की तरह उसे देख रहे थे । अन्तत: उसने कहा- `सीधी सी बात है । पहली-पहली होली और सास-बहू साथ-साथ हो तो पता नहीं कौन किसे पहले होली में धक्‍का दे दे ।' कहकर वह फिर हँसने लगा । हम सब भी खुलकर हँसने लगे । आखिरकार हमें परम्परा का एक काम चलाऊ औचित्‍य या उद्गम मालूम हो चुका था ।


थोड़ी देर बाद हम सब अपने-अपने काम में लग गए । अपना काम करते-करते अचानक ही मैं सिहर उठा । क्‍या सचमुच में यही कारण रहा होगा ? यदि ऐसा ही है तो इस परम्परा से मुक्‍त हो पाना मुझे अभी भी सम्भव नहीं लगता । दहेज और अन्यान्‍य कारणों से अभी भी हमारी बेटियाँ अपनी ससुराल में जला दी जाती हैं । यदि इस परम्परा का वास्तविक उद्गम सचमुच में यही है तो हमारी नवोढ़ा बहू-बेटियाँ तो प्रतिदिन, प्रतिपल अपनी - अपनी सास के साथ पहली होली ही मना रही हैं ।


तब से शुरू हुई मेरी घबराहट अब तक बनी हुई है। तथागत का परिहास मुझे आतंकित किए हुए है ।

आपमें से कोई बताएगा कि इस परम्परा का वास्तविक उद्गम क्‍या है ?

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