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उमड़-घुमड़ कर आओ रे



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की सैंतीसवी/अन्तिम कविता  

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


उमड़-घुमड़ कर आओ रे

लगता है नादान पड़ौसी, फिर से हिम सुलगायेगा
लगता है मेरे उपवन से, फिर पतझर टकरायेगा
लगता है फिर बलिदानों की, महा दिवाली जागेगी
लगता है फिर घायल झेलम, ताजा लोहू माँगेगी
लगता है ये पेकिंगवाला दुनिया को मिटवायेगा
लगता है दिल्ली के हाथों, पिण्डी को पिटवायेगा

उमड़-घुमड़ कर आओ रे!
महाकाल बन जाओ रे!
प्रलय-घटा-से छाओ रे!
और
आनन गरजो, फानन बरसो, फिर तूफान उठाना है
मेरे देश के लहू लपक जा, फिर लोहा अजमाना है।

आओ रे! आओ रे! आओ रे!
महाकाल बन जाओ रे!
प्रलय-घटा-से छाओ रे।।

सूख नहीं पायी है स्याही, ताशकन्द के वादों की
देखो बदल गई है नीयत, बेगैरत जल्लादों की
भूल गये हैं इतनी जल्दी, वे वामन के वारों को
छेड़ रहे हैं इसीलिये फिर, चेरी और चिनारों को
ललिता का सिन्दूर पुँछा पर, पिण्डी का मन भरा नहीं
(तो) साबित कर दो अभी हमारा, लाल बहादुर मरा नहीं।

लो, आओ रे! आओ रे! आओ रे!

ललिता की बेंदी का सपना, सच करके दिखलाना है
मेरे देश के लहू लपक जा, फिर लोहा अजमाना है।

उमड़-उमड़ कर आओ रे!
महाकाल बन जाओ रे!
प्रलय-घटा-से छाओ रे।।

बजें नगाड़े एक बार फिर, राख झड़े अंगारों की
इच्छोगिल में एक बार फिर, प्यास बुझे तलवारों की
कान लगाकर सुनो तुम्हें फिर, हाजीपीर बुलाता है
फिर दयाल का स्वागत करने, वो बाँहे फैलाता है
वो भूपेन्दर भटक रहा है, सरहद के गलियारों में
हाँक हमीदा मार रहा है, पेटन के अम्बारों में

लो, आओ रे! आओ रे! आओ रे!

उनने सींच दिया है लोहू, फसलें हमें उगाना है
मेरे देश के लहू लपक जा, फिर लोहा अजमाना है।
 
उमड़-घुमड़ कर जाओ रे!
महाकाल बन आओ रे!
प्रलप-घटा-से छाओ रे।।

अभी अधूरा रक्त-यज्ञ है, आहुति अभी अधूरी है
अभी विजय से वीर जुझारों, एक चरण भर दूरी है
अभी-अभी तो शुरु हुआ है, रण-ऋतु का बलि-मेला रे
अरे! अभी तो खर्च हुआ है, अपना एक अधेला रे
कोरे बहुत पड़े हैं शूरों! पृष्ठ अभी इतिहासों के
वक्त इन्हें लिख लेगा तुम तो, ढेर लगा दो लाशों के।

लो आओ रे! आओ रे! आओ रे!

सूख रहा है यश का सागर, उसमें ज्वार उठाना हे
मेरे देश के लहू लपक जा, फिर लोहा अजमाना है।

उमड़-घुमड़ कर आओ रे!
महाकाल बन जाओ रे!
प्रलय-घटा-से छाओ रे।।

कैसे सहती हैं सन्तानें, उफ्! बन्दा बैरागी की
रीती माँग लिये बैठी है, गुमसुम कविता ‘त्यागी’ की
हाय! शहीदों की सौगातें, सौदों में जब बँटती हैं
लाल किले की लाली घटती, माँ की छाती फटती है
जिस दिन अपना पावन नेजा, पिण्डी पर पहरायेगा
विजयघाट का अमर विजेता, चैन उसी दिन पायेगा।

लो, आओ रे! आओ रे! आओ रे!

एक चरण पूजा बैरी ने, दूजा भी पुजवाना है
मेरे देश के लहू लपक जा, फिर लोहा अजमाना है।

उमड़-घमड़ कर आओ रे!
महाकाल बन जाओ रे!
प्रलय घटा-से छाओ रे।।

क्यों इतने गुमधुम बैठे हो, क्यों इतने अकुलाये हो
आसमान पर तुम लोहू से, हस्ताक्षर कर आये हो
तुमने जेट मसल डाले हैं, तुमने पेटन फाड़े हैं
बाँहों से ही जकड़-पकड़ कर, परबत-राज उखाड़े हैं
तुमने लावा मथ डाला है, इन फौलादी हाथों से
तुमने सूरज चबा लिया है, दो दुधियाले दाँतों से

लो, आओ रे! आओ रे! आओ रे!

रंग बदल दो फिर अम्बर का, फिर से भूमि कँपाना है
मेरे देश के लहू लपक जा, फिर लोहा अजमाना है।

उमड़-घुमड़ कर आओ रे!
महाकाल बन जाओ रे!
प्रलय-घटा-से छाओ रे।।

राजघाट को राजी कर लो, शान्ति घाट को समझा दो
बुझने आये हैं जो शोले, आज उन्हें फिर भड़का दो
ऐसे घुटन-भरे मौसम में, तुम कैसे जी लेते हो
नीलकण्ठ हो फिर भी इतना, विष कैसे पी लेते हो
कोई माँ को गाली दे और, पालो भाई-चारा तुम
(तो) फिर कैसे इस धरती पर, लोगे जनम दुबारा तुम।

लो, आओ रे! आओ रे! आओ रे!

गाली का बदला गोली से, लेकर के दिखलाना हैं
मेरे देश के लहू लपक जा, फिर लोहा अजमाना है।

उमड़-घुमड़ कर आओ रे!
महाकाल बन जाओ रे!
प्रलय-घटा-से छाओे रे।।

जिस दिन ये कमला की जायी, अम्बर भर हुँकारेगी
लाल किले से बिफर-बिफर कर, नागिन-सी फुँकारेगी
जिस दिन ये भौंहें तानेगी, जिस दिन तेवर बदलेगी
फेंक चूड़ियाँ, लेकर खाँडा, रणचण्डी बन मचलेगी
जिस दिन ये ऋतुराज-दुलारी, खुद बारूद बिखेरेगी
जिस दिन ये दुश्मन को उसके, घर में जाकर घेरेगी
जिस दिन खुद ‘राजू-संजू’ को, केसरिया पहिनायेगी
तिलक लगाकर सिर चूमेगी, औ’ ममता बिसरायेगी
एक पड़ेगा जब पिण्डी पर, इक पेकिंग पर छायेगा
कौन बचायेगा दुनिया को, कौन सामने आयेगा
जिस दिन इसका एक इशारा, ये यौवन पा जायेगा
जिस दिन सारा देश तड़प कर, अपनी पर आ जायेगा
उस दिन दुनिया खूब सोच ले, जो भी होगा कम होगा
मानवता भी मिटी अगर तो, हमें न कुछ भी गम होगा।

लो, आओ रे! आओ रे! आओ रे!

अरि-शोणित की गढ़-गंगा में जननी को नहलाना है
मेरे देश के लहू लपक जा, फिर लोहा अजमाना है।

उमड़-घुमड़ कर आओ रे!
महाकाल बन जाओ रे!
प्रलय-घटा-से छाओ रे।।
आनन गरजो, फानन बरसो.....।।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















मेघ मल्हारें बन्द करो



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की छत्तीसवी कविता  

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


मेघ मल्हारें बन्द करो

ऋतु-चक्र बराबर चला नहीं
अंकुर को अम्बर मिला नहीं
सपना फूला या फला नहीं
दुर्भाग्य देश का टला नहीं

लगता है सपना टूट गया
इन शोलों और शरारों का
ये मेघ मल्हारें बन्द करो।
मौसम है रक्त मल्हारों का।।

जो नहीं किया है अब तक, वो कर दिखलाना होगा।
शायद है जवानों, तुमको, अब खून बहाना होगा।।

सूरज जब स्याही उगले और, चन्दा उगने काजल
हर तारा हो आवारा, हर दीप-शिखा हो पागल
ऊषा जब संयम खो दे और, किरनें सँवला जायें
जब सारी सूरजमुखियाँ, अकुला कर कुम्हला जायें
जब शर्त बदे अँधियारा, साँसों में समा जाने की
तो साँसों को सुलगा कर, उजियारा लाना होगा।
शायद है जवानों, तुमको.....।।

कजरारे मेघ हटाओ, रतनारे मेघ बुलाओ
अब जल-तरंग को छोड़ो, और ज्वाल-तरंग बजाओ
ओ कोमल सुर के गायक, अब तीव्र स्वरों में गाओ
अवरोह अभी तक गाया, अब आरोहों पर आओ
हर सुर हो जाय बजारू और आरतियाँ ही गावे
(तो) बेशक वर्जित हो लेकिन धैवत धधकाना होगा।
शायद है जवानों, तुमको.....।।

कुछ लोग क्रान्ति को बन्ध्या, कुछ बाँदी मान रहे हैं
कुछ रक्तपात की अन्धी, आजादी मान रहे हैं
यह शैली है जीवन की, यह चपला का चिन्तन है
यह इज्जत है यौवन की, यह शोणित का दर्शन है
जब सारा गणित गलत हो, हर समीकरण विचलित हो
तो अग्नि गणित का अभिनव अभियान चलाना होगा।
शायद है जवानों, तुमको.....।।

यूँ ऊसर में क्या मरना, यूँ दलदल में क्या जीना
यूँ भूख-गरीबी सहकर, क्या शोषण का विष पीना
ओ सोये ज्वालामुखियों!  ओ बुझते हुए अँगारों!
ओ ठण्डे-ठार अलावों! ओ आहत क्रान्ति-कुमारों!
जब आग, आग को तरसे और आश्वासन ही बरसे
(तो) बेशक अपना ही घर हो, लावा बरसाना होगा।
शायद है जवानों, तुमको.....।।

आसन्न क्रान्ति के रोड़े, हट जायें बहुत अच्छा है
ये पीढ़ीखोर कुहासे, छँट जायें बहुत अच्छा है
कुछ पाषाण-कलेजे, फट जायें बहुत अच्छा है
दस-पाँच करोड़ निकम्मे, कट जायें बहुत अच्छा है
जब कुर्सी करे दलाली, हो जाय छिनाल व्यवस्था
तो सारे वेश्यालय को, फिर देश बनाना होगा।
शायद है जवानों, तुमको.....।।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















एक गीत ज्वाला का



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की पैंतीसवी कविता  

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


एक गीत ज्वाला का

बीज हुआ तैयार फसल कल, अनुशासन की आयेगी
शायद अब भँवरों की पीढ़ी, पूरे सुर में गायेगी
यह सच है सपनों का सिंचन, खून पसीना करता है
यह सच है शीतल बादल, मिट्टी को मीना करता है
पर आग और पानीवाला ही, बादल बादल कहलाता है
महाप्रलय और महासृजन का ऐसा ही कुछ नाता है
तो
बुझ नहीं जाये आग तुम्हारी
मर नहीं जाये पानी रे
जिन्दाबाद तुम्हारी ज्वाला
जिन्दाबाद जवानी रे।
बुझ नहीं जाये आग तुम्हारी।।

यह कैसी चुप्पी है बोलो, यह कैसा सन्नाटा है
अन्तर में सरगम है लेकिन, कण्ठ नहीं गा पाता है
कब तुम तोड़ोगे यह चुप्पी, कब तुम खुलकर गाओगे
कब तक इन ज्वालामुखियों को, अन्तर में हुलराओगे
कब तक तुम स्वीकार करोगे, मौसम की मनमानी रे
जिन्दाबाद तुम्हारी ज्वाला, जिन्दाबाद जवानी रे।
बुझ नहीं जाये आग तुम्हारी।।

तुम ही तो लाये हो नवयुग, तुम ही इसे सम्हालोगे
है मुझको विश्वास निरन्तर, इसको और उजालोगे
(पर) याद रखो शोणित का लावा, जब ठण्डा पड़ जाता है
(तो) जीवन का सब दर्प हवा में, बन कपूर उड़ जाता है
पौरुष रहे प्रचण्ड तुम्हारा, ऊष्मा रहे सयानी रे
जिन्दाबाद तुम्हारी ज्वाला, जिन्दाबाद जवानी रे।
बुझ नहीं जाये आग तुम्हारी।।

पश्चिम का कायर बेटा ही, अँधियारा कहलाता है
जो उससे डरता है उसको, ज्यादा और डराता है
ओ प्राची के किरन-कुमारों, अँधियारे से नहीं डरो
आत्मघात कर लेगा कल यह, मत ऐसी उम्मीद करो
तुम सुलगो तो सुलगे इसकी, नालायक रजधानी रे
जिन्दाबाद तुम्हारी ज्वाला, जिन्दाबाद जवानी रे।
बुझ नहीं जाये आग तुम्हारी।।

बाग हमारा, फूल हमारे, हम ही इसके माली हैं
(पर) कोयल भी चुप, कौए भी चुप, यह कैसी रखवाली है
काँटों के नाखून अभी भी, पैने हैं और पूरे हैं
फागुन की राहों में अब भी, हँसते लाख धतूरे हैं
सम्भवतः कुछ और लगेगी फूलों की कुर्बानी रे
जिन्दाबाद तुम्हारी ज्वाला, जिन्दाबाद जवानी रे।
बुझ नहीं जाये आग तुम्हारी।।

रहे खौलता खून निरन्तर, शिरा-शिरा में आग रहे
साँसों में संकल्प घुले हों, आँखों में सौभाग्य रहे
युद्ध तुम्हारा चले बराबर, चुप्पी और अँधियारों से
इससे ज्यादा और कहूँ क्या, इन गुमसुम अंगारों से
जीवन का मतलब है जलना, बुझना है बेईमानी रे
जिन्दाबाद तुम्हारी ज्वाला, जिन्दाबाद जवानी रे।
बुझ नहीं जाये आग तुम्हारी।।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















जो ये आग पियेगा



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की चौंतीसवी कविता 
 
यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


जो ये आग पियेगा

गण-गंगा ने गहराई ली, गति और अधिक गतिवान हुई
इन कूल-कछारों की महिमा, सचमुच ही और महान हुई
गुंजार मिली फिर भँवरों को, फगुनाहट मिली बहारों को
शोणित के रथ को राह मिली, फिर आग मिली अंगारों को

जो ये आग पियेगा
वो जरूर जियेगा
इस ज्वाला को पी के पचाओ रे।
मेरी जान की कसम! रे ईमान की कसम!
तुम पल-पल दहकते ही जाओ रे।
जो ये आग पियेगा।

बर्फानी पानी में हो के खड़े, जो आवाज देते अंगारों को
ओ रे अंगारों, अब तो समझ लो, उनके नपुंसक इशारों को
उनको डूब जाने दो, गहरे खूब जाने दो,
उनसे बारूद अपनी बचाओ रे।
मेरी जान की कसम।

कन्धा तुम्हारा, बन्दूक उनकी, तो इतिहास को फिर रोना ही है
आँखों के अन्धे, साधें निशाना, तो कन्धों को घायल होना ही है
पोंछो, घाव को पोंछो, सोचो दूर की सोचो
यूँ तो इतिहास को मत रुलाओ रे।
मेरी जान की कसम।

काली अमावस से घबरा के, कोई रोने लगे चिल्लाने लगे
तो समझो वो सूरज का वंशज नहीं है, जो अपना ही पौरुष लजाने लगे
रातें रोज आयेंगी, रातें रोज जायेंगी
तुम तो प्राणों को अपने जलाओ रे।
मेरी जान की कसम।

जब तक रगों में है जिन्दा वो ज्वाला, तब तक जवानी जवानी है
वरना तो शीर्षक ही शीर्षक है प्यारे! सम्बोधनों की कहानी है
जिन्दा लाश नहीं हो, कोई पलाश नहीं हो
जो फागुन ही फागुन में झर जाओ रे।
मेरी जान की कसम।

जब कोई बादल, बहिनाँ कहे, किसी ज्वाला की जायी चिनगारी को
तो समझो दबोचेगी कोई हविस, किसी मासूम कन्या कुमारी को
जिसका भाव दूजा हो, और प्रभाव तीजा हो
ऐसी राखी नहीं बँधवाओ रे।
मेरी जान की कसम।

जब भी जलाओ अँधेरा जलाओ, तिल भर तरस मत खाओ रे
मौसम के सुर में सुर क्या मिलाना, अपना भी मौसम बुलाओ रे
खुद की लाश मत ढोओ, अपने प्राण को बोओ
और किरणों की फसलें उगाओ रे।
मेरी जान की कसम।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















पता नहीं



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की तैंतीसवी कविता  

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


पता नहीं

बद से बदतर दिन बीतेगा, अब सारा का सारा
सूरज उनका भी निकला है अन्धा औ’ आवारा।

मौसम में कुछ फर्क नहीं है, ऋतुओं में बदलाव नहीं
मधुमासों की आवभगत का, कोई भी प्रस्ताव नहीं
वैसा का वैसा है पतझर, वही हवा की मक्कारी
तापमान का तर्क वही है, वही घुटन है हत्यारी
बड़े मजे से नाच रहा है, फिर वो ही अँधियारा
सूरज उनका भी निकला है अन्धा औ’ आवारा।

शोक-गीत में बदल रही है, धीरे-धीरे लोरी
उनने तो फन्दा डाला था, ये खींचेंगे डोरी
अब जीवन की शर्त यही है, जैसे-तैसे जी लो
आँख मूँदकर सारा गुस्सा, एक साँस में पी लो
नभ-गंगा निस्तेज पड़ी है, रोता है ध्रुवतारा
सूरज उनका भी निकला है, अन्धा औ’ आवारा।

किरन-किरन आरोप लगाती, दिशा-दिशा है रोती
पछतावे का पार नहीं है, असफल हुई मनौती
लगता है परिवेश समूचा, खुद को हार गया है
लगता है गर्भस्थ स्वप्न को, लकवा मार गया है
पिण्ड न जाने कब छोड़ेगा, ये दुर्भाग्य हमारा
सूरज उनका भी निकला है, अन्धा औ’ आवारा।

अगर यही है मुक्त हवा तो, इससे मुक्ति दिलाओ
मुक्ति व्यर्थ बदनाम नहीं हो, अपनों को समझाओ
‘इससे तो बन्धन अच्छा था’, कहने लगीं हवाएँ
जी करता है इस जीने से, बेहतर है मर जाएँ
पता नहीं कल को क्या होगा, मेरा और तुम्हारा
सूरज उनका भी निकला है अन्धा औ’ आवारा।

आधा जीवन कटा रेत में, शेष कटे कीचड़ में
और पीढ़ियाँ रहें भटकती, नारों के बीहड़ में
दुश्चरित्र हो जाएँ अगर, नैया के खेवनहारे
(ता) गंगा हो या हो वैतरणी, प्रभु ही पार उतारे
नया फैसला करना होगा, शायद हमें दुबारा
सूरज उनका भी निकला है अन्धा औ’ आवारा।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















तीन कविताएँ ‘आसान’, ‘वही बीज’ और ‘दायित्व बोध’



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की तीन कविताएँ  


यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।



तीसवी कविता 
आसान

बहुत आसान है नारा लगाना
और भी आसान है वादा भुलाना
पर ये उससे भी आसान काम कर रहे हैं
वे आत्महत्या करके मर गये
ये इसी खुशी में मर रहे हैं।
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इकतीसवी कविता 
वही बीज

इतना गरजे आशा के बादल
इतना बरसे विश्वास के मेघ
ऐसी तैयार हुई धरती
कि ढूँढे नहीं मिलती है मिसाल
पर बोवनी के वक्त फिर वही कमाल
कि मेड़-मेड़ पर
सलाह-मशविरे हो रहे हैं
बैशक तुम झोली में हाथ डालकर देख लो
वे फिर से निराशा बो रहे हैं।
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बत्तीसवी कविता 
दायित्व बोध

कहते हैं
जब दायित्व आता है
तो तीर भी कमान बन जाता है।
झुक जाती है उसकी रीढ़
खो जाती हैं प्रखरता
बँध जाते हैं उसके बिन्दु
तन जाती है उसकी प्रत्यंचा
नपा-्तुला हो जाता है उसका घेरा
टंकार और लचक हो जाते हैं उसके गुण
तब जो हो निपुण
वो उसे कन्धे पर धारे
यूँ तो तीरन्दाज बहुत फिरते हैं
मारे-मारे ।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















हे! लोकदेव नेहरू



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की उनतीसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


हे! लोकदेव नेहरू

महक रही है और अधिकतम
गन्ध तुम्हारे प्रिय गुलाब की
शान्ति-कपोत तुम्हारे अनथक
उड़ते जाते हैं अनन्त में
पुनर्प्रतिष्ठा प्रजातन्त्र को देता है
ऊर्जित नव-यौवन
स्वप्न-सेतु नित उभर रहे हैं
अनजाने अभिनव क्षितिजों पर
भेद गरीबी औ’ दरिद्र का
अभी-अभी समझा है हमने
पूरे युग के बाद समझ में
आये हो तुम ।
पूरे युग के बाद समझ में
आया है उत्सर्ग तुम्हारा
प्रश्नों की आँखों में आँखें
डाल चुकी है जलती पीढ़ी
आस्थामय सम्पूर्ण चेतना
आज वचन देती है तुमको
जिस मिट्टी में बोये तुमने
प्राण स्वयं के
उस मिट्टी से जो उभरेगा
वह होगा संस्कार तुम्हारा।
लोकदेव!
यदि देख सको तो आज देख लो
कितना अनुशासित-पुष्पित है
उपवन पर उपकार तुम्हारा।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















फिर चुपचाप अँधेरा



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की अट्ठाईसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


फिर चुपचाप अँधेरा

आँगन-आँगन फैल रहा है, फिर चुपचाप अँधेरा
उदयाचल पर अस्त पड़ा है, मरणासन्न सवेरा।
खुद सूरज के वंशज ही जब, उम्र बढ़ा दे अँधियारों की
या तो वो सूरज अन्धा है, या फिर किरणें आवारा हैं।

युग सूरज का इससे ज्यादा, और भला क्या अपयश होगा
किरणें हों यदि शीलवती तो, मावस का क्या साहस होगा
(यह) माना उन भँवरों का कुछ, दीन नहीं, ईमान नहीं था
लेकिन ये भी वैसे होंगे, ऐसा तो अनुमान नहीं था

खुद मधुकर ही मधु के मद में नोचे फूलों की पंखुरियाँ
या तो ये भँवरे कपटी हैं, या फिर मौसम हत्यारा है।
खुद सूरज के वंशज ही जब......।

तितली बैठे इन्द्र-धनुष पर, इन्द्र-धनुष टेढ़ा हो जाये
एक टिटहरी के क्रन्दन में, सारा ही अम्बर खो जाये
जिस अम्बर में आँख मूँद ले, अपमानित होकर ध्रुव तारा
उस अम्बर पर धरती कैसे, कर लेगी विश्वास दुबारा?

अपने हाथों आप पोंछ ले, जब अपना सिन्दूर दिशाएँ
या तो वो कुंकुम काला है या फिर दर्पण दुखियारा है।
खुद सूरज के वंशज ही जब.....।

पचरंग चूनर बुनती बेला, सूत परख यदि लेते साँई
चूनरिया को बदरंग कैसे कर देती कोई परछाई
अपने पौरुष को गाली है, सतवन्ती को बाँझ बताना
भाँवर लेना बहुत सरल है, बड़ा कठिन है वंश चलाना।

जब चूनर के पाँच रंगों में, सतरंगा संग्राम मचा हो
या तो सब रंगरेज कुटिल हैं, या फिर जुलहा बेचारा है।
खुद सूरज के वंशज ही जब.....।

जिन पाँखों में उड़न नहीं हो, उन पाँखों का मतलब क्या है
जिन आँखों में सपन नहीं हों, उन आँखों का मतलब क्या है
निर्जन में भी फूल खिले तो, गन्ध गगन तक छा जाती है
सौरभ की यह आत्माहुति ही, युग की कविता कहलाती है।

जब कविता ही पाँव पकड़ कर चरणामृत को हाथ पसारे
या तो ये हिमगिरि गूँगा है या फिर गंगाजल खारा है।
खुद सूरज के वंशज ही जब.....।

बीते कल को अच्छा कहना, जिस जीवन की लाचारी हो
पतझारों का बन्दी रहना, जिस उपवन की बीमारी हो
उस जीवन में, उस उपवन में, ऋतु की रानी क्यों आयेगी? 
आई भी तो दिन-दो दिन से, ज्यादा कैसे रह पायेगी?

जन्म-दिवस पर जब आँगन में, यमदूतों की भीड़ लगी हो
या तो शिशु में साँस नहीं है, या फिर ऑगन अँधियारा है।
खुद सूरज के वंशज ही जब.....।
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संग्रह के ब्यौरे
कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















बन्द करो



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की सत्ताईसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


बन्द करो

हो गया क्रान्ति का पटाक्षेप
तुम और नहीं छलछन्द करो
इस नाटक में क्या रक्खा है
यह खेल-तमाशा बन्द करो।

सचमुच में तुम खलनायक थे
नायक का सिर्फ मुखौटा था
अभिनय में महा छलावा था
उद्देश्य बहुत ही छोटा था।

नुच गई नकाबें शनैः-शनैः
जो भीतर था अब बाहर है
तुम लाख मुखौटे लटकाओ
नीयत का स्वगत उजागर है।

अच्छा है, मध्यान्तर करके
रोटी का अन्य प्रबन्ध करो
इस नाटक में क्या रक्खा है
यह खेल तमाशा बन्द करो
हो गया क्रान्ति का पटाक्षेप।

सम्वाद सभी बेमानी हैं
सब बक-बक है, लफ्फाजी है
मक्कार मंच पर चढ़ बैठे
धूर्तों की धोखेबाजी है

नेपथ्य भरा कोलाहल से
हर सूत्रधार चिल्लाता है
जो नायक है वह रोता है
और सिर्फ विदूषक गाता है

हर दर्शक का दम घुटता है
अब बन्द वाद्य और वृन्द करो
इस नाटक में क्या रक्खा है
यह खेल तमाशा बन्द करो
हो गया क्रान्ति का पटाक्षेप।

तुम जब तक थे चौराहों पर
बस क्रान्ति-क्रान्ति चिल्लाते थे
जो बैठे थे सिंहासन पर
उनको बदमाश बताते थे

पर सिंहासन पर जाते ही
तुम उनसे ज्यादा मरते हो
वे भी बदमाशी करते थे
तुम भी बदमाशी करते हो।

मेरे आंगन को छोड़ो भी
तुम और कहीं आनन्द करो
इस नाटक में क्या रक्खा है
यह खेल तमाशा बन्द करो
हो गया क्रान्ति का पटाक्षेप।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















क्रान्ति का मृत्यु गीत



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की छब्बीसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


क्रान्ति का मृत्यु-गीत

मर गई क्रान्ति, शव-दाह करो
कन्धा दो चलो, श्मशान चलें।

दस-पाँच लफंगों ने मिल कर
षड़यन्त्र किया, तैयारी की
फुसला कर इसको फँसा लिया
हत्या कर दी बेचारी की
तिस पर भी वे इतराते हैं
खुद को निर्दाेष बताते हैं
जो होना था, सो हुआ, चलो
शव का करने सम्मान चलें
मर गई क्रान्ति शव-दाह करो
कन्धा दो चलो, श्मशान चलें।

जिन कन्धों पर शव जायेगा
उन कन्धों को ये तोड़ेंगे
जो शव-यात्रा में जायेंगे
उनको क्या जीवित छोड़ेंगे
कल कहलाते थे रक्त-दूत
अब कहलाते हैं क्रान्ति-पूत
मरघट तक इन हत्यारों की ही
करने को पहिचान चलो
मर गई क्रान्ति शव-दाह करो
कन्धा दो चलो श्मशान चलें।

ऊमर को जिनने गाली दी
पीढ़ी को जिनने भटकाया
शोणित से जिनने दगा किया
सपनों को जिनने भरमाया
प्रतिगामी युग की खटपट में
वे सभी मिलेंगे मरघट में
उन सबकी करें कपाल-क्रिया
भूतों के घर मेहमान चलें
मर गई क्रान्ति शव-दाह करो
कन्धा दो चलो श्मशान चलें।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















तरुणाई के तीरथ



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की पचीसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


तरुणाई के तीरथ

ओ सीमा के सजग पहरुओं!
ओ रे ओ सेनानियों!

तरुणाई के तीरथ बन गये, ये शमशान तुम्हारे
आजीवन हम याद रखेंगे, ये एहसान तुम्हारे।

तुमने स्वर्णिम देश उगाया, हर दीवार ढहा कर
जननी का आँचल उजलाया, अपना खून बहा कर
तुमने केसर-कुंकुंम बनकर, माँडी वो रांगोली।
अपने आप ललक कर रुक गई, विजय-वधू बड़बोली।

रौंद गये सौ-सौ सदियों को, ये अभिमान तुम्हारे
आजीवन हम याद रखेंगे, ये एहसान तुम्हारे
तरुणाई के तीरथ बन गये, ये शमशान तुम्हारे।

अम्बर तो था किन्तु कहाँ, था रवि इतना उजियाला
यौवन तो था किन्तु कहाँ थी, नस-नस में रण-ज्वाला
प्राणों की पोथी पर तुमने, ऐसी जिल्द चढ़ाई
हर पाठक बन बैठा ‘भूषण’, हर श्रोता ‘बरदाई’।

बैरी तक गाते फिरते हैं, ये यश-गान तुम्हारे
आजीवन हम याद रखेंगे, ये एहसान तुम्हारे
तरुणाई के तीरथ बन गये, ये शमशान तुम्हारे ।

मानवता के महालक्ष्य को, देकर प्राण गये होे
शब्द-कोश को एक शब्द का, देकर दान गये हो
संगीनों की सेज सजाई, कर बारूद बिछौना
पारस-देह परसकर तुमने, माटी कर दी सोना

नहीं समाते हैं आँखों में, ये सम्मान तुम्हारे
आजीवन हम याद रखेंगे, ये एहसान तुम्हारे
तरुणाई के तीरथ बन गये, ये शमशान तुम्हारे।

सिद्ध किया है तुमने होता, पौरुष में भी पानी
सिद्ध किया है तरुणाई भी, होती है कल्याणी
भाष्य किया है नव भारत का, लोहू को दी भाषा
युद्धों को युगबोध दिया है, प्राणों को परिभाषा।

नव ऊषा के नव-गहने हैं, ये प्रतिदान तुम्हारे
आजीवन हम याद रखेंगे, ये एहसान तुम्हारे
तरुणाई के तीरथ बन गये, ये शमशान तुम्हारे।

इस थाती की आठ पहर हम, रखेंगे रखवाली
कभी नहीं पड़ने पायेगी, ये रक्ताभा काली
ओ मेरे अवतार फरिश्तों! हमको पंथ बताना
तुम पूर्वज हो, हम वंशज हैं, आशीषें बरसाना।

सौंपेंगे तुतली पीढ़ी को, हम वरदान तुम्हारे
आजीवन हम याद रखेंगे, ये एहसान तुम्हारे
तरुणाई के तीरथ बन गये, ये शमशान तुम्हारे।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















अधूरी पूजा



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की चौबीसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


अधूरी पूजा

बदल दिया भूगोल भले ही, भारत की तलवारों ने
बदल दिया इतिहास भले ही, सिंहों की हुँकारों ने
यौवन को नव गरिमा दे दी, प्राणों को परछाई दी
भारत को भी बेशक हमने, हिमगिरि की ऊँचाई दी
लेकिन लगता है यह पूजा, पूरी नहीं अधूरी है
बोलो रे, बोलो रे दिल्लीवालों, यह कैसी मजबूरी है?

(तुम) दो दिन और बनाये रखते, उस बलिदानी दौर को
(और) लगे हाथ निपटा ही देते, पिण्डी और लाहौर को।

हाँ, वह मेरी ही जिद थी, सुर था इस नादान का
(कि) ‘नक्शे पर से नाम मिटा दो, पापी पाकिस्तान का’
पूरा नहीं चुका है बदला, जननी के अपमान का
एक बार फिर से बदलेंगे, हम भूगोल जहान का ।

(ये) सेबर पेटन क्या रोकेंगे, विजयन्तों के शोर को
लगे हाथ निपटा ही देते, पिण्डी और लाहौर को
दो दिन और बनाये रखते, उस बलिदानी दौर को।

एक धमाका और लगाते, उस घनघोर नगाड़े में
(और) एक दाँव की और बात थी, जीते हुए अखाड़े में
कौन वजन था एक सूप का, भरे हुए उस गाड़े में
एक दिवस वैसे भी कम था, उस विजयी पखवाड़े में।

नाहक बचा लिया है तुमने, रणचण्डी के कौर को
लगे हाथ निपटा ही देते, पिण्डी और लाहौर को
दो दिन और बनाये रखते उस बलिदानी दौर को

जैसे बूढ़ी गंगा को तुम, तप्त जवानी दे आये
जैसे पद्मा की लहरों को, मस्त रवानी दे जाये
बंग-बन्धु को इतिहासों की, अमर निशानी दे आये
(और) मेघना के पानी को, अपना पानी दे आये।

वैसा ही कुछ दे देते उन, साढ़े पाँच करोड़ को
(और) लगे हाथ निपटा ही देते, पिण्डी और लाहौर को
दो दिन और बनाये रखते उस बलिदानी दौर को।

पूरब तो आजाद हो गया, अब पच्छिम की बारी है
(और) अस्ताचल पर सूर्य उगे तो, वाकई शान हमारी है
अपना हृदय टटोलो, बोलो, कल की क्या तैयारी है
मानवता को मुक्त कराना, किसकी जिम्मेदारी है?

(तो) एक बार फिर न्यौता दो तुम, उस बलिदानी भोर को
(और ) लगे हाथ निपटा ही डालो, पिण्डी और लाहौर को
दो दिन और बनाये रखते उस बलिदानी दौर को।

अरे अभी तो रणवीरों का, हर अरमान अधूरा है
संकल्पों के इतिहासों का, हर बलिदान अधूरा है
(इन) पैंसठ कोटि महामुण्डों का, शोणित-स्नान अधूरा है
जब तक पाकिस्तान है तब तक, हिन्दुस्तान अधूरा है।
 
सदा-सदा के लिये मिटा दो, नफरत की इस कोढ़ को
(और) लगे हाथ निपटा ही डालो, पिण्डी और लाहौर को
दो दिन और बनाये रखते उस बलिदानी दौर को।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















अंगारों से



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की तेईसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


अंगारों से

हर कोयल को हक आता है, अपने सुर में गाने का
हर कोंपल को हक आता है, अम्बर तक उठ जाने का
हर पीढ़ी को पूरा हक है, अपने सपन सजाने का
अंगारों को पूरा हक है, जलने और जलाने का।

बेशक आग लगाओ रे अंगारों, मावस के गलियारों में
देखो आग लगा मत देना, पूनम के पखवारों में।

जिन काँटों ने घाव दिये हों, उनसे दो-दो हाथ करो
उनसे उनकी ही भाषा में, खुलकर सीधी बात करो
उस बिजली पर खूब सोच लो, जिसने रंग बिगाड़े हों
उन भंँवरों के पंख नोच लो, जिनने बाग उजाड़े हों
उस माली को माफी मत दो, जिसने गन्ध चुराई हो
जिसके होते हर क्यारी में नागफनी उग आई हो।
हाँ रे हाँ, मेरे अंगारों......।

माली को परखा जाता है, बेमौसम पतझारों में
देखो आग लगा मत देना, पूनम के पखवारों में
बेशक आग लगाओ रे, अंगारो मावस के गलियारों में।

दसों दिशाएँ जब डूबी हों, अंधियारे के ज्वारों में
तब ही ध्रुव ढूँढा जाता है, लाख-करोड़ सितारों में
उस दिन जो चिनगारी चमके, वो ज्वाला बन जाती है
कालान्तर में उसकी लपटें, अम्बर तक छा जाती हैं
यह सच है लावण्य लपट, का युग के चुम्बन पाता है
यह सच है उस पुण्य प्रभा पर, यौवन बौरा जाता है।
ओ रे ओ, मेरे अंगारों........।

खूब नहाओ उस मंगलमय, लावे के फव्वारों में।
लेकिन आग लगा मत देना पूनम के पखवारों में।
बेशक आग लगाओ रे, अंगारों मावस के गलियारों में।

कोमलता के कारण काजल, आँखों तक आ जाता है
पी जाता है वह पौरुष को, ऊष्मा को खा जाता है
काला तिल खुद आमन्त्रण है, छोटे-बढ़े डिठौने को
इसका अर्थ नहीं कजराई, खा जाए हर कोने को
आज समूचा क्षितिज किसी ने, पोत दिया है काजल से
शायद इसको धोना होगा, गर्म लहू के बादल से।
ओ रे ओ, मेरे अंगारों......।

कालिख के मालिक को बेशक, चुन देना दीवारों में
लेकिन आग लगा मत देना पूनम के पखवारों में
बेशक आग लगाओ रे, अँगारों मावस के गलियारों में।

लडने को तो अँधियारे से, हर कोई लड़ जाता है
(पर) उजले मुँहवाला तारा ही, निर्णायक यश पाता है
नैतिक युद्ध नहीं होते हैं नारों और हथियारों से
ऐसे युद्ध लड़े जाते हैं, चारित्रिक आधारों से
जले पलीता उससे पहिले, खुद को देखो दर्पण में
उजले मुँहवाला जीवन ही, अर्पण करो समर्पण में
वरना ओ रे ओ, मेरे अंगारों......।

वरना फिर क्या फर्क रहेगा, तुममें और बटमारों में
देखो आग लगा मत देना पूनम के पखववारों में
बेशक आग लगाओ रे, अंगारो मावस के गलियारों में।

कहाँ गये ‘दिनकर’ के वंशज, ‘भारतेन्दु’ के लाल कहाँ
‘महाप्राण’ की महिमावाले, महिमा-मण्डित भाल कहाँ
जो ‘नवीन’ के सुर में फूटा, वो विप्लव भूचाल कहाँ
जिसे ‘सुमन’ ने लाली दी वो, जलती हुई मशाल कहाँ
अनाचार का ताण्डव कब तक, होगा यहाँ अँघेरे में
कौन सूरमा बदलेगा, इस सबको स्वर्ण सवेरे में
सड़ी घुटन और बेचैनी में, जीने से इनकार करो
अन्तर का अँधियार जलाकर, खुद को कुछ तैयार करो।
पर उत्तेजन को शक्ति समझकर, लड़ना केवल मरना है
पहिले इतना तो तय कर लो, मरना या तम हरना है
भाषण क्रान्ति अगर लाते तो, बरसों पहिले आ जाती
गद्दारों की वंश-बेलि को, नोच-नोच कर खा जाती
(पर) जिसका श्रेय तुम्हें जाना है, वह तो तुमको जायेगा
कोई धरती का बेटा ही, क्रान्ति-दूत बन आयेगा।
ओ रे ओ, मेरे अंगारों.......।

उसका चित्र नहीं पाओगे, इन बासी अखबारों में
देखो रे आग लगा मत देना, पूनम के पखवारों में
बेशक आग लगाओ रे, अंगारों मावस के गलियारों में।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















एक बार फिर करो प्रतिज्ञा



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की बाईसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


एक बार फिर करो प्रतिज्ञा

एक बार फिर करो प्रतिज्ञा, चिर नवीन इस माटी से
एक बार फिर करो प्रतिज्ञा, बलिदानी परिपाटी से
एक बार फिर करो प्रतिज्ञा, चौराहों चौपालों से
एक बार फिर करो प्रतिज्ञा, जलते हुए सवालों से
भुजा उठाओ, गगन गुंजाओ, नई चुनौती आई है
एक बार फिर साबित कर दो, तरुणाई है, तरुणाई है।
आओ रे! आओ रे! आओ रे!

जननी पर मर मिटनेवालों, प्राण उँडेलो प्राणों में
आग बिछाकर अमन उगाओ, खेतों में, खलिहानों में।

ताशकन्द में जिस सावन को, सूर्यपुत्र ने न्यौता था
बार-बार जो शोणित में ही, अपने पाँव डुबोता था
उस सावन को फिर शिमला, में चन्द्रकिरण ने न्यौता है
(तो) पंथ बुहारो और निहारो ,अब आगे क्या होता है।
(तो) आओ रे! आओ रे! आओ रे!

स्वागत की तैयारी रक्खो, खन्दक और खदानों में,
आग बिछाकर अमन उगाओ, खेतों में, खलिहानों में।
जननी पर मर मिटनेवालों......।

लोहू में लथपथ धरती को, हम हँसकर लौटाते हैं
इसका मतलब कभी नहीं हम, सौदों में बिक जाते हैं
दुनिया के दिक्पालों, सुन लो, हम रण-रीत निभाते हैं
रजत बरस की न्यौछावर है, मर्दों की सौगातें हैं।
आओ रे! आओ रे! आओ रे!

सौंप रहे हैं पूरे मन से, आशंकित अनुमानों में
आग बिछाकर अमन उगाओ, खेतो में, खलिहानों में।
जननी पर मर मिटनेवालों......।

दस सदियों तक लड़नेवाली, भाषा शायद बदलेगी
माँ की कोख उजड़नेवाली, आशा शायद बदलेगी
इसीलिये लोहू को हमने, चुम्बन दिया सियाही का
शायद है बहिनाँ की राखी, भाग्य बदल दे भाई का 
आओ रे! आओ रे! आओ रे!

नहीं सजेगी अब यह राखी, फिर जंगी दूकानों में
आग बिछाकर अमन उगाओ, खेतों में, खलिहानों में।
जननी पर मर मिटनेवालों.....।

रण-मेलों में रंग जमाकर, जंग-जुझारे आये हैं
घोर निराशा में डूबे हैं, मन ही मन अकुलाये हैं
हर पीढ़ी को यह परिपाटी, मर-मर कर दुहरानी है
फिर से हमको अमन की कीमत, मँहगे मोल चुकानी है।
आओ रे! आओ रे! आओ रे!

यह कीमत ही रह पाती है, यायावर यश-गानों में
आग बिछाकर अमन उगाओ, खेतों में, खलिहानों में।
जननी पर मर मिटने वालों......।

अरबत-परबत अद्दी-नद्दी, नालों में, परनालों में
चलो घोल दो नया पसीना, इस पीढ़ी के छालों में
सावन हो तो कजरी गाओ, फागुन हो तो फाग उड़ें
ढम्मक ढमके ढोल-मंजीरा, और रास के राग उड़ें
छम्मक-छम्मक छम छमाछम, आने दो खुशहाली को
आज अमन का वादा दे दो, फिर गुलाब की डाली को
लेकिन जिस दिन अमन-चमन पर, कोई मेघा मँडराये
इधर-उधर से बादल लाकर, तुम पर बिजली बरसाये
उस दिन सारे गीत भूलकर, अंगारे बन जाना तुम
कजरी-ददरी छोड़-छाड़कर, केवल आल्हा गाना तुम
इंच-इंच पर अरिमुण्डों के, फिर से मेले जोड़ेंगे
जैसे तोड़ा है पुूरब को, पश्चिम को भी तोड़ेंगे
ताशकन्द के संग शिमला का, ले लेना भुगतान नया
अब की बार बना ही लेना, अपना हिन्दुस्तान नया।
आओ रे! आओ रे! आओ रे!

रक्त-ज्वार की कहाँ कमी है, इन जसवन्त जवानों में
आग बिछाकर अमन उगाओ, खेतों में, खलिहानों में
जननी पर मर मिटनेवालों.......।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















वैज्ञानिक के प्रति



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की इक्कीसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


वैज्ञानिक के प्रति

जिन हाथों ने
किया पोकरण में प्रस्थापन
अणु ऊर्जा का,
उनको मेरे शत अभिनन्दन,
न्यौछावर उन पर मेरे
अनगाये वन्दन।

जिन हाथों ने आर्यभट्ट को
प्रस्थापित कर दिया शून्य में,
उनको मेरे सौ-सौ चुम्बन,
न्यौछावर उन पर मेरी
अनलिखी पंक्तियाँ।

परम ऋणी हूँ मैं अपने उस वैज्ञानिक का
जिससे मुझको नव गरिमा दी,
नवल प्रभा दी, नई कथा दी,
जिसने मुझको नया दर्प दे
झुका हुआ मेरा मृत मस्तक
तान दिया ढलते कन्धों पर।

तने हुए चैतन्य शीश को आज
झुकाता हूँ मैं फिर से
उन चरणों में
जिनकी पदचापों के नीचे
शायद मेरे लिये कहीं कोई यश-गंगा
नव सुरसरि, यश-गाथा कोई
प्रवल वेग से बह आने को
अकुला कर
कसमसा रही हो।
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संग्रह के ब्यौरे

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कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















माताओं-पिताओं से



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की बीसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


माताओं-पिताओं से

बीमार बीज को भी देखो
कुछ उस पर भी सन्धान करो।
कोंपल को अपराधी कह कर
मत कोंपल का अपमान करो।

धरती कैसी, पानी कैसा?
उसको कैसा आकाश मिला?
(फिर) माली की नीयत क्या थी?
कितना मादक मधुमास मिला?

क्या करते थे तितली-भँवरे?
पंछी ने क्या व्यापार किया?
क्या चाल-चलन था मौसम का?
किसने कैसा व्यवहार किया?

इल्जाम लगाने से पहिले
कुछ अपनी भी पहचान करो।
कोंपल को अपराधी कहकर
मत कोंपल का अपमान करो।

हर एक बिषमता से लड़ कर
वह लाली लेकर आई है।
न्यौछावर जिस पर सौ सावन
हरियाली लेकर आई है।

इस लाली का, हरियाली का
इसके उजले संघर्षों का।
मूल्यांकन थोड़ा ठीक करो
इसके अभिनव उत्कर्षों का।

मत परखो गलत कसौटी पर
कुछ गुण का भी गुणगान करो।
कोंपल को अपराधी कहकर
मत कोंपल का अपमान करो।

यह वंश-बेल है, गौरव है
है पुनर्जन्म यह खुद अपना।
झाँको तो इसकी आँखों में
शायद हो अपना ही सपना।

संस्कार तुम्हारा खुद का है
यह चरम सत्य स्वीकार करो।
मत देखो इसको नफरत से
आजीवन इसको प्यार करो।

पावन प्रभुता है प्रभु की
इस प्रभुता का सम्मान करो।
कोंपल को अपराधी कहकर
मत कोंपल का अपमान करो।

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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल



 





















चिन्तन की लाचारी (पुरवा को पछुवा मार गई।)



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की उन्नीसवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


चिन्तन की लाचारी

गन्तव्य वही, मन्तव्य वही, आदेश वही अधिकार वही
रीति वही और नीति वही, प्रतिशोध वही प्रतिकार वही
जो क्रान्ति बताता है इसको, उस चिन्तन की बलिहारी है
परिवर्तन को क्रान्ति बताना, सम्भवतः लाचारी है।

जब चिन्तन पर काई जम जाये
विप्लव की भाँवर थम जाये
तो समझो पीढ़ी हार गई
पुरवा को पछुवा मार गई।

ये हिंसक और अहिंसक क्या, ये भाषा क्या परिभाषा क्या
ये भाषण क्या, प्रतिभाषण क्या, ये अभिनय और तमाशा क्या
(बस) क्रान्ति, क्रान्ति ही होती है, पहिले तुम इतना मानो तो
खुद को दर्पण में देखो तो, इस पीढ़ी को पहिचानो तो।
जब घाव वही, अलगाव वही
बात वही, बिखराब वही
तो आहुति क्या बेकार गई?
पुरवा को पछुआ मार गई?
चिन्तन पर काई जम जाये......

जब अग्नि-बीन का गायक ही, खो जाये मेघ मल्हारों में
(तो) जी करता है आग लगा दूँ, अग्नि-बीन के तारों में
तुम आग जगा कर कहते हो, हे! ज्वाला माँ अब सो जाओ
जब तक हम गाएँ दरबारी, तब तक तुम पानी हो जाओ।
जब दीन वही, ईमान वही
जब मुर्दे और मसान वही
तो झंझा किसे झंझार गई?
पुरवा को पछुआ मार गई?
चिन्तन पर काई जम जाये.....

वे चाट गये उस सावन को, शायद ये फागुन पी जायें
दोनों ने कसमें खाई हैं, ये बगिया कैसे जी जाये
लगता है राहू बैठ गया, इस माली के और डाली के
लग्न बराबर मिले नहीं, इस लाली और हरियाली के।
(जब) भँवरों का वक्तव्य वही
(जब) तितली का भवितव्य वही
(तो) मधुऋतु किसे सँवार गई?
पुरवा को पछुआ मार गई?
चिन्तन पर काई जम जाये.....

मैं कल भी भैरव गाता था, मैं अब भी भैरव गाता हूँ
मैं कल भी तुम्हें जगाता था, मैं अब भी तुम्हें जगाता हूँ
वो अँधियारे की साजिश थी, ये साजिश का उजियारा है
इस पीढ़ी को हर सूरज ने, मावस से मिलकर मारा है।
जब घात वही प्रतिघात वही
काजल कुंकुम की जात वही
तो ऊषा किसे निखार गई?
पुरवा को पछुआ मार गई?
चिन्तन पर काई जम जाये.....

कल आग-आग जो करते थे, वे सिर पर सावन ढोते हैं
कल जिनके सिर पर सावन था, वे आज आग को रोते हैं
ये सब मौसम के तस्कर हैं, सब मिली-जुली चतुराई है
सब सपनों के सौदागर हैं, ये सब मौसेरे भाई हैं।
अम्बर में नारे वो के वो
और अन्धे तारे वो के वो
घूँघट में डायन मार गई?
पुरवा को पछआ मार गई?
चिन्तन पर काई जम जाये......
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















अग्नि-वंश का गीत



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की अठारहवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


अग्नि-वंश का गीत

कहाँ गई वो आग कि जिसमें, शोणित सदा नहाता था
कहाँ गई वो आग कि जिसमें, महाप्रलय मुस्काता था
परिवर्तन के पलने में जब, अग्नि-वंश सो जाता है
(तो) कालान्तर में अग्नि-वंश ही मेघवंश हो जाता है।

उनकी पुरवा बहे, इनकी पछुआ बहे
पर झुलसाये मेरी बहारों को
(तो) ज्वाला को जोखिम लेनी ही होगी
जलना ही होगा अंगारों को।

पहिली ही किरन को ललकारो, यदि ये सूरज भी काला हो
किरणों का कंचन खोटा हो, नकली हो कलई वाला हो
अंजुलि को बदलो मुट्ठी में, भैरव में बदलो मन्त्रों को
मैं फिर लिख दूँगा गायत्री, पहिले निपटो षड़यन्त्रों को।

ले के आड़ बाढ़ों की
सींचे प्यास डाढ़ों की
तोड़े मन्दिर के पावन किवारों को
तो ज्वाला को जोखिम लेनी ही होगी जलना ही होगा अंगारों को।

हम हैं कि सुबह की नीयत पर, हर बार भरोसा करते हैं
हर बार जलालत सहते हैं, हर बार तड़प कर मरते हैं
इस बार जलालत आई तो, तय है कि बगावत आयेगी
इन सूरज, चाँद, सितारों को, लोहू की नदी पी जायेगी।

मेरा नाम ले लेना
ये पैगाम दे देना
उन पैदायशी अवतारों को
इस ज्वाला को जोखिम लेनी ही होगी जलना ही होगा अंगारों को।

आँसू को जहाँ आँसू ही मिले, इज्जत न पसीना पाता है
वह राज हजार खुदा को हो, पल भर में पलट ही जाता है
हम जिसको खुदाई देते हैं, इन्सान समझ कर देते हैं
कल को न खुदा हो जाये वह, पहिले ये वादा लेते हैं।

पद में भूल के कोई
मद में फूल के कोई
बिसरे न नारों के मारों को
इस ज्वाला को जोखिम लेनी ही होगी जलना ही होगा अंगारों को।

हम दीन नहीं, हम हीन नहीं, हम याचक या कि गुलाम नहीं
नारों के नशे में मर जायें, ऐसे भीे उमर खैयाम नहीं
हम अपनी उमर को खाते हैं, हम अपना पसीना पीते हैं
बारूद हमारी जिन्दा है, बेशक हम बुझे पलीते हैं।

कोई धोखा न दे
वेसा मौका न दे
इन लावा उगलते शरारों को
इस ज्वाला को जोखिम लेनी ही होगी जलना ही होगा अंगारों को।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















ठहरो



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की सत्रहवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


ठहरो

मेरा
झलाझल लौ-वाला
ऊर्जस्वी, प्रज्ज्वलित दीप
मत रखना उस देहरी पर
जिसके इस ओर निकम्मे
और उस ओर नपुंसक रहते हों।
जो अँधेरे में बेआवाज रोयें
और उजाले में निरर्थक बेसुरा शोर करें,
वे किसी भी मौत मरें
यह कहकर मैं नहीं होना चाहता हैँ
दायित्वहीन।

पर मैं नहीं हूँ
सर्वशक्तिमान प्रभुसत्ता-सम्पन्न प्रभु से भी बड़ा
जो उनके लिए भी हो जाऊँ खड़ा
जो कि नहीं हैं खुद अपने
और तोड़-तोड़ कर अपने ही सपने
बैठ जाते हैं ‘रोशनी! रोशनी!!’ जपने।
इन शुतुरमुर्गों के शवों पर
आखिर मैं अकेला
मर्सिया कब तक पढ़ूँगा?
अब
निकम्मों और नपुंसकों के खिलाफ
पहिले मैं अपने आप से
लड़ूँगा।
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संग्रह के ब्यौरे

कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल


 




















फिर से लगे मुनादी



श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘कोई तो समझे’ 
की सोलहवी कविता 

यह कविता संग्रह
(स्व.) श्री संजय गाँधी को 
समर्पित किया गया है।


फिर से लगे मुनादी

बदतमीजी बरकरार है,
निरन्तर है, जारी है
इस बार बोलने की मेरी बारी है।

अब मैं हूँ वह कठफोड़ा
जो खुली सूचना देता है पतझारों की
चाहे चिन्ता उसने
कभी नहीं की हो बहारों की।
हर पतझर के अपने कठफोड़े होते हैं
अब की बार मैं हूँ वह पक्षी।
मैं ठेठ ऊपर की टहनी पर से देख रहा हूँ
देख क्या रहा हूँ
मुझे दीख रहा है कि
बदतमीजी बरकरार है,
निरन्तर है, जारी है
इसीलिये, इस बार बोलने की मेरी बारी है।

राजघाट से प्रभा-स्मृति तक
सब कुछ स्पष्ट है।
कसमें कसमसा रही हैं
और ‘उस बूढ़े’ की चेतना को
मर्मान्तक कष्ट है।
जो बूढ़ा
माथे पर गमछा, हाथ में लाठी और
चिन्तन में सम्पूर्ण क्रान्ति का सपना लेकर
कल तुम्हारे आगे चला था।

काई की तरह चीर दी थी
जिसने सत्ता की सारी साजिशें
आज वह बूढ़ा
तिरस्कृत करके, चुप कर दिया गया है ।
रौंद दिये गये हैं उसके घरौंदे
सुलगा दिये गये हैं उसके लक्ष्य-गृह,
मानो वे लाक्षागृह हों।
बन्द हो गई है उसकी पूछ-परख
विस्मृत कर दी गई है प्रभा-स्मृति
समझना तो दूर
सुना तक नहीं जाता उसे।
छोड़ दिया गया है उसे
प्रायश्चितों और पश्चात्तापों के लिये
वह भी न जाने किन-किन के पापों के लिये।

निस्सीम क्षितिज को
निरीह, अकेला, अपलक देखता रहता है वह
उदास, निराश और हताश।
उठते हैं उसके अभय हाथ
मात्र मृत्यु याचनार्थ।
अहसास और एकाकी से अधिक
नहीं मानता वह खुद को
शायद है भी ऐसा ही
आप और मुझ-जैसा ही ।

बोट क्लब से गाँधी मैदान तक की
सारी भीड़
पसर गई है पंचायतों, विधान सभाओं
और संसद की कु्सियों पर।
फाड़ दिये गये हैं उसके वचन-पत्र
उसकी साँस तक मानी जाती है हस्तक्षेप।
उस अंधेरे ने छीना था उसका स्वास्थ्य
यह उजाला ले लेगा उसकी जान
हे भगवान!
उसकी सारी वाहिनियाँ
दत्तक ले ली हैं यदुवंश ने।

और उसके वे रक्तिम आह्वान?
एक बूढ़े की बकवास के सिवा
कुछ नहीं रहे।
क्रान्ति का प्रतिरोपण करके संसद में
उसने पसीना भी नहीं पोंछा कि
उसे मान लिया गया मात्र स्मारक-शिला।
सत्ता-संग्राम में क्षत-विक्षत शरीर
अब उससे लेते हैं केवल आशीर्वाद
बिलकुल निर्लज्ज होकर।

कैसा है यह बेशरम सिलसिला?
अब वह न हँसता है न मुसकाता है
न लिखता है कविताएँ
न करता है युग-भाष्य
क्षुब्ध होकर सब सहता है।
एक अवधूत की तरह
सम्पूर्ण क्रान्ति के श्मशान में
गुमसुम बैठा रहता है।
थक जाता है तो डायलिसिस पर
चला जाता है
सौभाग्य शायद इसी तरह दुर्भाग्य
के हाथों छला जाता है।

काटते हैं उसे नारे
खटकता है उसे आवारा अराजकता का शोर
निरीहों का बहता हुआ निरर्थक खून
झनझना देता है उसकी नसें।

हर राजपुरुष और हर राजधानी ने
कसम खा ली है उसकी नसों को निचोड़ने की।
झुलस चुकी हैं उसकी हुलस।
नेता, नीति और नीयत
सबने उँडेली है उस पर अनास्था
और अब? अब सत्ता उसी से पूछती--
सन्त का राजनीति से क्या वास्ता?
अनन्त क्षितिज पर
दूर-दूर तक पुत गई है एक अवज्ञा,
एक अनिष्ट अवहेलना।

सांध्यकाल में सूरज को
क्या-क्या पड़ रहा है झेलना?
न कोई आरोप, न कोई उलाहना
पर जठरानल से दावानल और बड़वानल
की मिताई का यह पारिश्रमिक?
वह भी अनमाँगे?
तब भी माथे पर गमछा, हाथ में लाठी
और चिन्तन में सम्पूर्ण क्रान्ति का सपना लेकर
चलना चाहता है वह हर पीढ़ी के आगे,
ताकि रक्त वक्त से मिल सके
इस निराशा की राष्ट्र-खोर झील में भी
गाँधी का एकाध स्वप्न-कमल खिल सके।

फिर से करे कोई ‘भवानी’
फिर से ‘त्रिकाल-संध्या’, पिटे ढिंढोरा
फिर से लगे ‘मुनादी’
फिर से चले किसी ‘भारती’ की प्रणम्य लेखनी
मात्र ‘कल्पना’ के लिये नहीं
किसी ‘धर्मयुग’ के लिये भी
शायद कुछ वैसा हो जाए
तुम्हारे मेरे किए भी!
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कोई तो समझे - कविताएँ
कवि - बालकवि बैरागी
प्रकाशक - मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल
एकमात्र वितरक - साँची प्रकाशन, भोपाल-आगरा
प्रथम संस्करण , नवम्बर 1980
मूल्य - पच्चीस रुपये मात्र
मुद्रक - चन्द्रा प्रिण्टर्स, भोपाल