पनघट की कठिन डगर

मुझे आपकी मदद चाहिए।

हर बात के कम से कम दो पक्ष तो होते ही हैं। सबकी अपनी-अपनी नजर होती है और सबको अपनी नजर ही सही लगती है। ‘उन’ दोनों के साथ भी यही स्थिति है। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं। दोनों ने मुझे  ‘पंच’ बना दिया है। बोले हैं - ‘आप ही फैसला करो।’ कहा ही नहीं, हिदायत (जो मुझे ‘धमकी’ लगी) भी दी - ‘बीच का रास्ता मत बताईएगा। साफ-साफ बताईएगा कि हम दोनों में से कौन सही है।’

‘दोनों’ याने पति-पत्नी। उनसे मेरा, रोज का मिलना। पारिवारिक स्तर पर। किसी एक को सही बताने का मतलब, किसी न किसी की नाराजी मोल लेना और दीर्घावधि के लिए न सही, अल्पावधि के लिए तो किसी एक की ‘कुट्टी’, निष्कासन झेलना और ‘सत्संग’ से वंचित रहना। मेरी कठिनाई यह कि मिलना-जुलना मुझे ऊर्जा देता है, बतरस मेरी जिन्दगी है और अड्डेबाजी एक मात्र व्यसन। याने, इस मामले में मुझे ‘कुछ न कुछ’ तो खोना ही है।
इसीलिए मुझे आपकी मदद चाहिए।


एक बेटे, एक बेटी के माता-पिता, यह दम्पति अपनी बेटी के विवाह को लेकर असहमत हैं। नहीं, विवाह करने को लेकर नहीं, रिश्ता कहाँ तय किया जाए - यह मुद्दा है। ‘कहाँ’ से मतलब गाँव का गाँव में ही या किसी दूसरे गाँव में। जिस जाति-समाज से सम्बद्ध यह दम्पति है, उसमें, गाँव के गाँव में ही विवाह करने का मानो चलन बन गया है। इस जाति-समाज के लगभग अस्सी प्रतिशत रिश्ते, गाँव के गाँव में ही हैं। सुना है कि एक परिवार ने तो 6 पीढ़ियों के बाद, पहली बार गाँव से बाहर रिश्ता किया। सो, पत्नी का कहना है कि एक ही लड़की है, गाँव में ही पचासों उपयुक्त वर हैं, गाँव में ही रिश्ता कर लेना चाहिए। लड़की चौबीसों घण्टे, बारहों महीने, नजर के सामने रहेगी। मिलने को तरसना नहीं पड़ेगा।

पति का सोचना एकदम विपरीत है।  कहता है - गाँव के गाँव में रिश्तों की कदर नहीं होती। सम्बन्धों की ऊष्मा क्षण भर भी अनुभव नहीं होती। महत्व भी अनुभव नहीं होता। प्रतीक्षा और मनुहार जैसी बातें तो ध्यान में ही नहीं रह पातीं। सब कुछ नीरस और बोझिल खानापूर्ति बन कर रह जाता है। दामाद, दामाद न रह कर रास्ते चलता आदमी नजर आने लगता है। सुसर-दामाद एक ही व्यापार में हुए और संयोगवश एक ही बाजार में आमने-सामने के दुकानदार हो गए तो न चाहते हुए भी प्रतियोगिता भाव मन में आएगा और उससे जुड़ी खिन्नता अपने आप चली आएगी।


पति का कहना है कि दामाद को दामाद का और समधी को समधी का सम्मान मिलना चाहिए। कोई आए तो लगना चाहिए कि कोई आया है। उसके आने की प्रतीक्षा का अपना आनन्द होता है। पति का निश्चित मत है कि सम्बन्धों की मधुरता, आनन्द और परस्पर मान-सम्मान के लिए ‘दूरी’ अनिवार्य है। वह मालवी कहावत उद्धृत करता है - ‘डूँगर दूर ती रण्यावरा लागे।’ याने, पर्वत दूर से ही सुन्दर/नयनाभिराम/मनोहारी लगते हैं। कहता है - ढोल भी दूर के ही सुहावने लगते हैं। अड़ा हुआ है - ‘छोरी को भले ही नामली, धराड़ (रतलाम से क्रमशः 12 और 10 किलोमीटर दूर) दे दूँगा लेकिन गाँव की गाँव में नहीं दूँगा।’ दामाद बेशक बेटे की तरह होता है किन्तु दामाद आए तो पूरे परिवार को लगना चाहिए कि दामाद आया है। राखी पर बेटी के आने की प्रतीक्षा का सुख और आनन्द तभी भोगा जा सकता है जब वह गाँव से बाहर हो। यह क्या कि शाम को, ऐन मुहूर्त के मौके पर आई, राखी बाँधी और चली गई! कहता है - ‘मेरा समधी आए या मैं समधी के यहाँ जाऊँ तो लगना तो चाहिए कि समधियाने में आना-जाना हो रहा है! यह क्या कि रास्ते चलते समधी की दुकान पर बैठ कर चाय पी ली या उसे पिला दी? दूरी से इज्जत और प्रेम बना रहता है। वर्ना गाँव का दामाद तो घर-जमाई जैसा लगता है जिसकी कदर कुत्ते से ज्यादा नहीं होती।’


उधर माँ है जो अपनी इकलौती बेटी को आँखों से ओझल नहीं होने देना चाहती। कहती है - ‘बेटे को आँखें फेरते देर नहीं लगती। जमाने भर को देख लो! मुश्किल में बेटियाँ ही माँ-बाप की सेवा कर रही हैं। छोरी को गाँव में देंगे तो बुढ़ापा बिगड़ेगा नहीं।’


ऐसे ‘हठीलों’ ने मुझे पंच बना दिया है। मैं दोनों में से किसी की नाराजी मोल लेना नहीं चाहता जबकि जानता हूँ कि बिना खोए, कुछ पाया नहीं जाता।


मेरी बौद्धिकता, सयानापन, वरिष्ठता, परिपक्वता, अनुभव - सबने घुटने टेक दिए हैं। ईश्वर की अकृपा से मैं ‘बेटी का बाप’ नहीं बन पाया। सो, कहने की आवश्यकता नहीं कि मेरा सोच अपने आप में अधूरा और एक पक्षीय ही है।


सूझ नहीं रहा कि क्या करूँ? ‘अश्वत्थामा हतो’ कहने की न तो स्थिति है न ही गुंजाइश। मुझे दो टूक फैसला सुनाना है। 


इसीलिए आपकी मदद चाहिए।


मदद करेंगे ना?

21 comments:

  1. वैसे दोनों की बातों में दम है परन्तु पिता ज्यादा सही लगते हैं. माँ का मोह ही है जो उसे ऐसा सोचने के लिए प्रेरित कर रहा है. आपको कोई समाधान तो स्पष्ट रूप में नहीं दे प् रहा हूँ. देखें आगे आने वाले सुधी लोग क्या कहते हैं.

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  2. आपको बूरी तरह फंसाया गया है, आपकी पीठ पिछे वे दम्पति मजे ले रहे होंगे। :)
    प्रश्न वेताल बनकर सर पर सवार है :)

    वस्तुतः दोनो चिंतन के अपने अपने गुण-दोष है और परिणाम जो भी हो भविष्य ही निर्धारित करेगा। कईं बातें काल, नियति प्रारब्ध पुरूषार्थ स्वभाव पर ही निर्भर होती है।

    अब आप भी मजे ले रहे है………
    मदद करेंगे ना? कहकर :)

    खैर कह दो कि "बेटी जो चाहे वह करो"
    यदि वे कहे कि "हमने तो कौन सही है कौन गलत का निर्णय करने को कहा था……?"
    तो कह देना कि "जो बेटी के विचारों का साथ देगा वह सही :)"

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    1. सुज्ञजी! आपकी बात न केवल राहत देनेवाली है अपितु व्‍यावहारिकता के अध्रिक निकट है। जब तक और कोई परामर्श नहीं आता, तब तक तो मैं आपकी ही बात, आपका उल्‍लेख करते हुए ही, 'उन दोनों' तक पहुँचाऊँगा। जिस तरह से आपने सोचा है, वैसा तो मुझे सूझा भी नहीं। आपको कोटिश: धन्‍यवाद।

      और हॉं! न तो 'उन दोनों' ने मुझे फँसाने की नियत से यह सब किया है और न ही मैं किसी के मजे ले रहा हूँ। उस परिवार में सचमुच में कलह छाया हुआ है।

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    2. आभार आपका आपने एक विचार को महत्व दिया।

      फंसाने वाली बात तो परिहास में कही थी, क्योंकि समान गुण-दोष वाले निर्णय अबूझ पहेली से होते है और बडे बडे विद्वान भी उलझन में फंस कर रह जाते है। क्योंकि पहेली बेलेन्स्ड थी, किसी एक तरफ किसी तीसरे मान्य वज़न रखने पर ही तोला जा सकता था। इस युक्ति से परिवार का कलह दूर होने की पूरी सम्भावना है किन्तु दोनो में से एक को भी बेटी की परीक्षा न करने दें, या पूछ-ताछ को परीक्षा की तरह न ले।

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    3. भावुकता की बात करें तो दोनो ही निरे भावुक ही है दोनों की अपनी छिपी इच्छाएं ही उनके विचारों पर हावी है। पूर्वग्रंथियां है। पिता की महत्वकांक्षा है दामाद को अतितिक्त सम्मान से नहलाना, रिश्तो को अतिशय महिमावान शिखर देकर उसे पालने की आत्मसंतुष्टि अनुभव करना। और माता निकटता को स्नेह की गारंटी मानती है। माता की महत्वकांक्षा है वह दौड दौड कर पुत्री को सहयोग सहायता देती रहे।

      माता पिता दोनो ही भावुकता से अपनी अपनी संक्लपनाओं के घेरे से बाहर जाकर नहीं सोच पा रहे है, पुत्री की सोच ही उनकी संकल्पना का किसी एक घेरे का वज़न बढ़ा सकती है। अगर पुत्री भी उसी दुविधा में अनिर्णय की अवस्था में हो तो पिता के विचारों का थोडा दृव्यमान घटाया जा सकता है। क्योंकि पिता के चिंतन में पुत्री से अधिक दामाद को प्राथमिकता है। इस एक छोटी सी मनस्थिति के कारण पिता का पक्ष कमजोर माना जा सकता है।

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  3. लड़की की माँ उसी गाव की है या दुसरे गाव की यह नहीं बताया और वह सुखी है की नहीं ?

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  4. लडकी की मॉं उसी गॉंव की है। बाहर की नहीं। प्रथमदृष्‍टया, वह सुखी ही है। गृहस्‍थी के स्‍तर पर कोई दुख नहीं है उसे।

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    1. मेरा जवाब: गाँव में शादी होनी चाहिये
      विस्तृत उत्तर: बच्चों के विवाह में इकलौता प्रश्न अच्छे परिवार का होना चाहिये। अगर अच्छा रिश्ता गाँव में ही मिल जाता है तो वही ठीक है, बाहर होता है तो वह भी ठीक है। ऐसा भी हो सकता है कि लड़की के पिता के मन के किसी कोने में यह गाँठ हो कि उन्हें दामाद होने का वह सुख नहीं मिला जो गाँव के बाहर शादी होने पर मिलता। लेकिन जब लड़की के माता पिता (दोनों) ने खुद गाँव में शादी की तो फिर पिता अपनी बेटी को इस सुख से वंचित क्यों करना चाहते हैं? दूसरे, गाँव में ही शादी करने से बारात से लेकर आगे के अनेक अवसरों पर मिलने आने जाने का समय-धन आदि की बर्बादी से बचाव तो होगा ही, गाड़ी कम चलेगी तो प्रदूषण में भी कमी आयेगी।

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  5. बड़ा कठिन निर्णय है, सबको एक साथ साधना कठिन है, आप जो भी निर्णय लेंगे अच्छा ही होगा।

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  6. लड़की की शादी हो रही है या 'विदेश निति' तय की जा रही है? क्या ग्यारंटी है की पास वाला घर-बार ही लड़की को सुखी रखेगा और दूर-दराज का दुखी रखेगा. इसका एक दम उलट भी हो सकता है.
    मान-सम्मान कितना मिलेगा ये तो देर सवेर व्यवहार तय करेगा.
    मेरे ख्याल से प्राथमिकता केवल और केवल अच्छा वर और परिवार होना चाहिए, इसमें लड़की के सुखमय भविष्य की सम्भावनाये ज्यादा है जो की विवाह का मूल उद्देश्य है.
    रही बात दूरी की तो ये 'relative term' है, रतलाम का 'दूर' मुंबई का 'पास' हो जाता है.
    जोर इस बात पर दिया जाए की किया जाने वाला रिश्ता सब को 'साथ' रखे, और अगर ऐसा नहीं होता तो 'पास' 'दूर' हो जायेगा और 'दूर' 'बहुत दूर' हो जायेगा.

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  7. भैया जी रिश्ते पास रहकर भी निभाए जा सकते हैं और विदेश में रहकर भी ख़राब किये जा सकते हैं .
    आप उन्हें मेरी दो पोस्ट विनम्र आग्रह और घर घर की कहानी पढ़कर सुना दीजिये शायद उन्हें कुछ
    राहत मिले . रिश्ते जुड़े फिर मिठास आ ही जाएगी ...

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  8. क्या बेटी की राय और चाहत का कोई मूल्य नहीं? आप को निर्णय देना चाहिए कि बेटी क्या चाहती है? यह जाना जाए। वह भी उस के किसी अन्तरंग मित्र के माध्यम से जिस के सामने वह किसी तरह का कोई दबाव महसूस न करती हो।

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  9. http://zaruratakaltara.blogspot.in/2012/05/blog-post_21.html

    http://zaruratakaltara.blogspot.in/2012/05/blog-post_07.html
    विनम्र आग्रह और घर घर की कहानी का
    लिंक क्रमश दिया गया है कृपया देखने का कष्ट करेगे

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  10. थोड़ा समय बीतने दें, निर्णय खुद-ब-खुद सामने आएगा.

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  11. यहाँ बेटी की ख़ामोशी सुनी जाएँ ...

    कोई भी निर्णय हो वही सबसे ज्यादा प्रभावित होगी ...

    बेटी को भी सारी बातें तय करने में भागीदार बनाया जाय ...

    अगर बेटी अपनी हर इच्छा माता-पिता पर छोड़े तो फिर ...

    पिता के हक़ में फैसला हो ... पिता के तर्कों में केवल भावुकता का पुट नहीं हैं बल्कि दुर्लभ और व्यवहारिक समझदारी का भी समावेश हैं ... माँ के तर्क निरे भावुक हैं ... और अकाट्य भी नहीं ... ४० - ५० किलोमीटर दूर बेटी अगर ब्याही भी गयी तो कौन - सी बैलगाड़ियों से अब इधर उधर आना जाना होगा ... आजकल के दौर इतनी दुरी तो बस २०-३० मिनिट में नाप जाती हैं .

    माँ को समझाया जाय की बेटी जरा - सा दूर रहेगी तो ... उसकी गृहस्ती के छोटे-मोटे निर्णय खुद लेना सीखेगी और उसका आत्मविश्वाश भी उत्तरोतर बढेगा ही ... मोबाइल फोन से भी माँ-बेटी जब चाहे बातें कर सकती हैं .

    अतः माँ की परेशानियों का बहुत कुछ हल मोबाइल फोन और तेज आवागमन के सहारे आसानी से हो सकता हैं .

    बेटी का मंगल हो !!!

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  13. पहली बात: आप पोस्ट का शीर्षक पोस्ट में ही दे देते हैं. कृपया इसे शीर्षक के लिए निर्धारित खाने में ही लिखें. और शीर्षक के नीचे आपको ब्लौगर प्रोफाइल की हायपरलिंक (विष्णु बैरागी) लगाने की कोई महती आवश्यकता नहीं है.
    पोस्ट पर: वाकई दुविधा है. मैं पति के साथ हूँ, यदि दूरी मात्र कुछ किलोमीटर की ही हो तो पत्नी को क्या समस्या है? यहाँ दिल्ली में तो २०-२५ किलोमीटर को कोई दूरी ही नहीं मानता.
    क्या यह लड़की उनकी एकमात्र संतान है?

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    1. निशान्तजी! मुझ पर ध्यान देने के लिए धन्य्वाद।

      मेरी बात पर हँस भले ही लें किन्तु विश्वास करने की कृपा कीजिएगा।

      ब्लॉग को लेकर मेरा तकनीकी ज्ञान शून्यववत है। इसलिए आपकी बातें मैं बिलकुल ही नहीं समझ पाया। कृपया अपना फोन नम्बर दें और वह समय सूचित करें जब आपसे बात करना आपको सुविधाजनक हो। आप मेरी बेहतरी ही चाह रहे हैं। इस हेतु मैं आपसे व्यक्तिश: परामर्श और निर्देश लूँगा।

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  14. Please take the advice of the girl.What does she want ? It is her personal but important matter.

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  15. फेस बुक पर रमेश चोपडा, बदनावर (धार) की टिप्‍पणी-

    जोडियाँ तो ऊपरवाला बनाता है। हम तो निमित मात्र हैं। बेटी के भाग्य में लोकल होगा तो आप कुछ कर नहीं पायगे, रतलाम से बहार होगा तो भी आप रोक नहीं पायेंगे। हमारा काम, योग्य वर तलाशना है।

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.