हमारी हिन्दी: हम केवल चिन्ता करते हैं

हिन्दी दिवस पर मुख्य अतिथि बनने के, दो संस्थाओं के न्यौतों को अस्वीकार कर दिया। अब जी ही नहीं करता ऐसे आयोजनों में जाने का। सब कुछ खानापूर्ति, औपचारिकता, नकली, बनावटी लगता है। ऐसे आयोजनों में शामिल लोगों की हँसी और हिन्दी की दुर्दशा पर उनका विलाप-प्रलाप भी नकली, खुद से बोला जा रहा झूठ लगता है। हर कोई हिन्दी की दुर्दशा के प्रति क्षोभ और आक्रोश तो जताता है लेकिन जब खुद कुछ करने की बात आती है तो मानो लकवा मार जाता है।

अपने छुट-पुट शारीरिक कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भाई ओम चौरसिया के योग केन्द्र का लगभग नियमित लाभार्थी हूँ। जिस खेप में मैं जाता हूँ उसमें आठ-दस लोग हैं। तीन दिन पहले एक ने कहा - “हिन्दी की तो ऐसी-तैसी करके रख दी है लोगों ने। एक ने अपने मकान का नाम ‘माँ की दूआ’ लिखा है। उसे ‘दुआ’ और ‘दूआ’ का फर्क ही नहीं मालूम।” सब खुल कर हँसे। मैं चुप था। एक ने मुझे उकसाया - ‘कमाल है! आपने कुछ नहीं कहा! आपको तो सबसे पहले बोलना था।’ मैंने उसी से पूछा - ‘आपने अपने मकान पर नाम लिखवा रखा है?’ जवाब हाँ में आया। मैंने पूछा - ‘हिन्दी में लिखवाया है?’ कोई जवाब नहीं आया। मैंने कहा - ‘कोई बात नहीं। अब उसे हिन्दी में लिखवा लीजिए।’ तुरन्त जवाब आया - ‘ऐसे कैसे लिखवा लूँ? सीमेण्ट से लिखवा रखा है! हिन्दी में लिखवाने पर तो दो-चार हजार का फटका लग जाएगा।’ मैं चुप रहा। बाकी सब भी चुप रहे। शायद सबने ऐसा ही कुछ कर रखा होगा। मैंने पूछा - ‘चलो! कोई बात नहीं। लेकिन आप दस्तखत हिन्दी में करते हो?’ जवाब, झेंप भरे ‘नहीं’ में आया। मैंने कहा - ‘हिन्दी में दस्तखत करने में तो एक पैसे का भी फटका नहीं लगेगा। आप हिन्दी में दस्तखत करना शुरु कर दीजिए।’ इस बार अधिक झेंप भरा जवाब आया - ‘बहुत मुश्किल है। उसकी तो आदत ही नहीं।’ 

कभी किसी बोली के तो कभी किसी भाषा के विलुप्त होने की जानकारी आए दिनों विभिन्न स्तर के सर्वेक्षण देते हैं। पहले मुझे ये सच नहीं लगते थे। लेकिन अचानक ही अपने आसपास नजर गई तो इन सूचनाओं पर विश्वास करना पड़ा। मैं तीन परिवारों से चार बोलियों को लुप्त होते देख रहा हूँ। दो परिवार तो मेरे बेटों के ही हैं। बड़े बेटे का सुसराल निमाड़ अंचल में है। यह दम्पति अब न तो मालवी में बात करता है न ही निमाड़ी में। हिन्दी में ही बतियाता है। इनका बेटा (हमारा पोता) कभी निमाड़ी और/या मालवी बोली के बारे में शायद ही जान पाए। स्कूल में वह अंग्रेजी वातावरण में ही रहता है। इस परिवार से दो समृद्ध बोलियाँ बिदा हो रही हैं।

दूसरा परिवार मेरे छोटे बेटे के ससुराल का है। समधी दिनेशजी चौरसिया बृज पृष्ठभूमि के हैं और समधन रीनाजी पंजाबी पृष्ठभूमि की। इनकी बहू आरती मालवी पृष्ठभूमि की। कहने को यह परिवार तीन-तीन बोलियों से जुड़ा है लेकिन पूरा परिवार हिन्दी में ही संवाद करता है। इस परिवार में न तो बृज बोली जाती है, न पंजाबी न ही मालवी। 

तीसरा परिवार मेरे छोटे बेटे का है। वह मालवी पृष्ठभूमि का है। बहू नन्दनी (चौरसिया परिवार की बेटी) की अपनी कोई बोली नहीं रही। यह दम्पति भी हिन्दी में बात करता है। हम जब भी इनके पास जाते हैं तो नन्दनी, विस्फारित नेत्रों से हम पति-पत्नी को मालवी में बात करते देखती है। इन तीनों परिवारों की पृष्ठभूमि में सम्पन्न बोलियाँ हैं लेकिन अब एक भी बोली इन परिवारों नहीं रही। 

मैं यथा सम्भव मालवी में ही बात करने की कोशिश करता हूँ। मालवी में बात शुरु करते ही सामनेवाला ‘सहज’ से आगे बढ़कर ‘आत्मीय’ हो जाता है। आत्मीयता के साथ-साथ मिठास अपने आप चली आती है। रतलाम में तो मुझे हर बार मालवी में ही जवाब मिलता है लेकिन रतलाम से बाहर (मालवा में ही) ऐसा नहीं होता। इन्दौर में मेरा डेरा, बंगाली चौराहे के पास, सर्व सुविधा नगर में रहता है जबकि मेरे मिलनेवाले राजवाड़ा से आगे के इलाकों में। मुझे सिटी बस में यात्रा करना अच्छा लगता है। कनाड़िया सड़क से महू नाका और फिर उससे आगे वैशाली नगर तक मैं एक लघु भारत के साथ यात्रा कर लेता हूँ। मालवी तो बनी ही रहती है, भोजपुरी, अवधि, बुन्देली, पूरबी, मराठी, गुजराती भी खूब सुनने को मिलती है। कभी-कभार हिम्मत करके मैं बीच में, मालवी में ही कूद पड़ता हूँ। अपनी-अपनी बोली में बतिया रहे गैर मालवी लोग स्वाभाविक ही मुझे हिन्दी में जवाब देते हैं। लेकिन मालवी में बतिया रहे लोग भी हिन्दी में जवाब देते हैं। मेरी मन्दसौरी-रतलामी मालवी और इन्दौरी मालवी में उन्नीस-बीस का अन्तर है। इस उम्मीद में कि मुझे मालवी में जवाब मिलेगा, मैं बिना बात के बात बढ़ाने की कोशिश करता हूँ। लेकिन जवाब हिन्दी में ही आता है। हिन्दी भी अंग्रेजी चाशनी से लिपटी। 

बंगाली चौराहे का और तिलक नगर का सब्जी बाजार भी लघु भारत अनुभव होता है। वहाँ मालवी में भाव-ताव करता हूँ तो पहली बार तो हिन्दी में ही जवाब मिलता है। दूसरी बार में मालवी आ जाती है। लेकिन इन बाजारों में मालवी बोलनेवाले दुकानदार धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। लेकिन शास्त्री पुल पार करते ही बोलियों की विविधता छँट जाती है और मालवी सवाल का जवाब हर बार मालवी में ही मिलता है। यह दशा ठेठ वैशाली नगर तक बनी रहती है।

लेकिन व्यापारिक सन्दर्भों में ऐसा बिलकुल ही नहीं है। वहाँ अंग्रेजी ही अंग्रेजी है। दुकानों के नाम या उनके कागज-पत्तर, सब अंग्रेजी में। एक दुकान पर बड़ा मजा आया। दुकान का साइन बोर्ड अंग्रेजी की चौथी बारहखड़ीवाली लिपि में था। कलाकार ने मानो अपनी समूची प्रतिभा झोंक दी थी। संयोग से मुझे उसी दुकान में जाना पड़ा। दुकान के नाम और भीतरी व्यवस्था में बड़ा विरोधाभास था। दुकान में नजर आ रहे धार्मिक चित्र/प्रतीक, दुकान के नाम से कहीं भी मेल नहीं खा रहे थे। मैंने पूछा - “यह क्या? दुकान पर नाम तो ‘बाबूअली’ लिखवाया है और मूर्ति भगवान महावीर की!” दुकानदार चौंका। उसने बाहर आकर, दुकान से दूर जाकर, साइन बोर्ड पढ़ा। लौट कर तनिक चिन्ता से बोला - “आप ठीक कह रहे हो। मैंने लिखवाया तो ‘बाहुबली’ था। लेकिन आपने कहा तो मुझे भी ‘बाबूअली’ ही नजर आया। आज ही दुरुस्त करवाता हूँ।” मैंने कहा - ‘दुरुस्त करवा ही रहे हैं तो हिन्दी में लिखवा लेना। तब लोग गलत नहीं पढ़ेंगे।’ दुकानदार ने विनम्रता से धन्यवाद देते हुए कहा - ‘बिलकुल। अब हिन्दी में ही लिखवाऊँगा।’ इस घटना के अपने-अपने भाष्य किए जा सकते हैं। अपनी भाषा की उपेक्षा के खतरे असीमित होते हैं।

हिन्दी आज वहीं है जहाँ हम उसे ले आए हैं। हम इसकी दुर्दशा से दुःखी तो होते हैं किन्तु खुद कुछ नहीं करना चाहते। हिन्दी अखबारों ने हिन्दी का सर्वाधिक नुकसान किया है और किए जा रहे हैं। बची-खुची कसर, रोमन में हिन्दी लिखने का चलन पूरी कर रहा है। 

हिन्दी और अपनी बोलियों के प्रति यदि हमारा यही चाल-चलन रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम संकेतों और चिह्नों से ही खुद को व्यक्त करते नजर आएँगे। फेस बुक और वाट्स एप ने यह शुरुआत कर दी है। हमारी पीढ़ियाँ हमारी भाषाओं, बोलियों और लिपियों को संग्रहालयों में देखने-सुनने जाया करेंगी।

संस्कार, वे चाहे भाषायी हों या सांस्कृतिक, सदैव घर से शुरु होते हैं और उनका सार्वजनिक आचरण ही उन्हें पुष्ट, दृढ़ और हमारी पहचान बनाता है।
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 13 सितम्बर 2018

नोटबन्दी: इसमें देश कहीं नहीं था

नोटबन्दी की विफलता का बचाव करते हुए वित्त मन्त्री अरुण जेटली सच ही कह रहे थे कि नोटबन्दी का मकसद यह देखना नहीं था कि बन्द किए गए नोटों में से कितने नोट वापस आएँगे। यह कहते हुए वे यह भी कह रहे थे कि आठ नवम्बर 2016 की रात को, नोटबन्दी की घोषणा करते हुए प्रधान मन्त्री मोदी झूठ बोले थे कि नोटबन्दी का लक्ष्य  आतंकवाद, नकली मुद्रा, काले धन और भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना था। आँकड़े और जमीनी वास्तविकताएँ बता रही हैं कि जेटली ही सच्चे हैं, प्रधान मन्त्री नहीं। नोटबन्दी का लक्ष्य देश की बेहतरी नहीं था।

तब, क्या था नोटबन्दी का लक्ष्य?

वही, जो मेरे एक सीए मित्र ने मुझे, नोटबन्दी की घोषणा के अगले दिन, नौ नवम्बर को बताया था। 

सरकारों की आर्थिक नीतियों/निर्णयों का राजनीतिक भाष्य करने के शौकीन इन सीए मित्र ने कहा था ‘यह नोटबन्दी राजनीति है बैरागीजी! जोरदार राजनीति। मुद्दा यूपी का चुनाव है। यूपी में सपा, बसपा, काँग्रेस सबकी खाट खड़ी हो गई है। भाजपा सबका सूपड़ा साफ कर देगी।’ मुझे बात न तो समझ पड़ी थी न ही इसे राजनीतिक कदम मानने को तैयार हुआ था। मेरा विश्वास रहा है कि राजनीतिज्ञ कितना ही टुच्चा, घटिया, झूठा, दम्भी हो, पार्टी या राजनीति के लिए देश को तो दाँव पर कभी नहीं लगाएगा। नोटबन्दी के बाद फैली अफरा-तफरी, अपना ही पैसा पाने के लिए तड़पते, तरसते, करुण क्रन्दन करते, अपनी बेटियों के हाथ पीले करने के लिए पाई-पाई को मोहताज हो गए, पैसों के अभाव में ईलाज हासिल न करने से मर गए लोगों को, बैंकों के सामने लाइन में लगे मरते लोगों को देख-देख कर, उनके बारे में सुन-सुन कर, पढ़-पढ़ कर भी मैं नोटबन्दी को राजनीतिक फैसला मानने को कभी तैयार नहीं हुआ। फिर, ‘संघ’ और भाजपा तो ‘दल से पहले देश’ की दुहाई देते हैं! ये भला अपने राजनीतिक लाभ के लिए देश को दाँव पर कैसे लगा सकते हैं?

लेकिन धीरे-धीरे सामने आई, आती रही वास्तविकताओं से मोह भंग होने लगा। सरकार द्वारा जारी किए गए, दो हजार के जाली नोट तो नोटबन्दी की अवधि में ही काश्मीर में आतंकियों से बरामद हो गए। आठ नवम्बर को नोटबन्दी की घोषणा हुई और नवम्बर समाप्त होते-होते ही 155 बड़ी आतंकी घटनाएँ हो गईं। 2017 में ये बढ़कर 184 हो गईं और 31 जुलाई 2018 तक 191 घटनाएँ हो गईं। आतंकियों के हाथों हमारे जवानों का मरना जारी रहा।

भ्रष्टाचार के मामले में हमारी दशा तो बद से बदतर हो गई। ट्रांसपरेंसी इण्टरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, भ्रष्टाचार के मामले में, 2017 में दुनिया के 175 देशों में हमारा स्थान 79वाँ था जो 2018 में 81वाँ हो गया। 

जाली नोटों के मामले में, आतंकवादी हमें असफल साबित कर ही चुके थे। देश में भी ‘कलाकारों’ ने हमें धूल चटा दी। सरकारी रिपोर्टों के अनुसार 2016-17 में देश में 2000 के 638 नकली नोट बरामद हुए थे। 2017-18 में यह संख्या बढ़कर 17,929 हो गई। 

काले धन के मामले में तो न केवल सरकार की बल्कि हमारे देश की, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जोरदार किरकिरी हो गई। बन्द किए नोटों के मूल्य के 99.3 प्रतिशत नोट वापस आ गए! सरकारी आँकड़ों के मुताबिक केवल 10,270 हजार करोड़ रुपये ही वापस नहीं आए। लेकिन इस रकम को भी पूरी तरह काला धन नहीं कह पा रहे क्योंकि नेपाल-भूटान में अभी भी हमारे पुराने नोट चल रहे हैं। नौ दिसम्बर 2016 को सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को अपना अनुमान बताया था कि नोटबन्दी से तीन से चार लाख करोड़ रुपयों के नोट वापस नहीं आएँगे। अब जेटली कह रहे हैं कि नोटबन्दी का लक्ष्य यह देखना नहीं था कि कितने नोट वापस आएँगे। सच यही है। नोटबन्दी का लक्ष्य यह नहीं था।

वापस आए नोटों की संख्या का समाचार 30 अगस्त को सामने आया तो मेरे ज्ञान-चक्षु खुले। मैंने उन सीए मित्र को फोन लगाया। वे बाहर थे। मैंने पूछा - ‘आपने कैसे कहा था कि नोटबन्दी का मुद्दा यूपी चुनाव हैं?’ वे बोले - ‘मुझे पता था, आप फोन करोगे ही करोगे। अभी बाहर हूँ। सोमवार रात को आऊँगा। मंगलवार को बात करेंगे।’

बड़ी ही आकुलता में बीते मेरे ये पाँच दिन। मंगलवार (4 सितम्बर) की सुबह, उन्हें फोन किए बिना ही उनके यहाँ पहुँच गया। वे उठे-उठे ही थे। खुलकर हँसते हुए अगवानी की। मुझसे रहा नहीं जा रहा था। बैठते-बैठते ही पूछताछ शुरु कर दी। और जोर से हँसते हुए बोले - ‘अरे! इतनी भी क्या जल्दी? इस उमर में ऐसी बेकरारी शोभा नहीं देती। सब बताता हूँ। बैठिए तो सही!’ 

उनके मुताबिक राजनीति उनका विषय नहीं है न ही इसमें उन्हें दिलचस्पी है। सीए होने के कारण सरकार की आर्थिक नीतियों/निर्णयों पर उनकी नजर रहती है। इसीलिए इन नीतियों/निर्णयों के राजनीतिक प्रभावों का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं। नोटबन्दी के राजनीतिक आयाम भी इसी तरह देखने की कोशिश की थी। नोटबन्दी की घोषणा के ‘टाइमिंग’ से उन्होंने अनुमान लगाया और यह मात्र संयोग ही रहा कि कड़ियाँ एक के बाद एक, कुछ ऐसी जुड़ती गईं कि उनका अनुमान  सही निकला।

उन्होंने सविस्तार पूरी कहानी सुनाई। मौजूदा सरकार में अब सीबीआई इकलौता तोता नहीं रह गया। संवैधानिक संस्थाएँ एक के बाद एक ‘तोता-दशा’ प्राप्त करती जा रही हैं। सो, यूपी के चुनावों का पूरा खाका सरकार के पास था ही। आठ नवम्‍बर की रात को नोटबन्दी की घोषणा के कारण जेब में पड़ा पैसा अप्रभावी-अनुपयोगी हो गया। बैंकों से लेन-देन की सीमा लगा दी गई। 27 दिसम्बर को, बसपा के पार्टी फण्ड में जमा 104 करोड़ रुपयों की जाँच शुरु कर दी गई। 17 जनवरी को यूपी विधान सभा चुनाव घोषित हो गए। मँहगी रैलियाँ हों या साधन-संसाधन, हर मामले में भाजपा ही भाजपा थी। भाजपा के 30 से अधिक हेलिकाफ्टर उड़ रहे थे। बाकी पार्टियों के पास 10 भी नहीं थे। ‘आपको याद होगा, तब अखबारों में भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए खरीदी गई, पार्टी के रंग और चुनाव चिह्नवाली सैंकड़ों मोटर सायकिलों के फोटू छपे थे। ये सब नोटबन्दी से पहले ही खरीद ली गईं थीं।’ 12 मार्च को यूपी विधान सभा चुनाव परिणाम आए। भाजपा ने सबका सूपड़ा साफ कर दिया। इसके ठीक अगले ही दिन, 13 मार्च को चुनाव आयोग ने घोषणा की कि बसपा के पार्टी फण्ड के 104 करोड़ रुपयों के मामले में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई। और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि 13 मार्च को,  यूपी विधान सभा चुनाव परिणाम घोषित होने के अगले ही दिन, रिजर्व बैंक ने बैंकों से रकम निकासी सीमा पर लगाया प्रतिबन्ध हटा लिया।
उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए खरीदी गई मोटर सायकिलों 
का ऐसा ही चित्र उन दिनों अखबारों में छपा था।  यह चित्र फेस बुक से 05 सितम्बर को लिया गया है।  


सीए मित्र की बातें सुनते-सुनते मुझे भी कुछ बातें याद आने लगीं। नोटबन्दी के बाद दिल्ली के मुख्य मन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने एक चैनल पर बैंकों के आँकड़े दिए थे जिनके मुताबिक 2016 की, जुलाई-सितम्‍बर वाली दूसरी तिमाही में बैंकों में जमा धन, पूर्व वर्षों की इसी  समयावधि के मुकाबले कई गुना अधिक था। केजरीवाल का दावा था कि नोटबन्दी की पूर्व सूचना मिलने के बाद भाजपा ने ही यह धन जमा कराया था। यह भी याद आया कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अध्यक्षतावाले सहकारी बैंक में बहुत बड़ी संख्या में (सम्भवतः भारत के किसी भी सहकारी बैंक में सबसे ज्यादा) पुराने नोट जमा किए गए थे। यह भी याद आया कि स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा धन में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह याद आते-आते जेटली का वह वक्तव्य भी याद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि स्विस बैंकों में भारतीयों का जमा धन सारा का सारा काला धन नहीं कहा जा सकता।     

पूरी कहानी सुनते-सुनते मुझे, अपने स्कूली दिनों में पढ़े हुए, कर्नल रंजीत के जासूसी उपन्यास याद आ गए। जिसे सारा देश राष्ट्र सेवा मान रहा था, अपना ही पैसा पाने के लिए, लाइनों में लगे, एड़ियाँ रगड़ते-रगड़ते मर गए लोगों के परिजनों को सीमा पर शहीद हुए जवान याद दिलाए जा रहे थे, वह सब झूठ, छलावा था! इस सबमें देश कहीं नहीं था! देश के लिए राजनीति थी या राजनीति के लिए देश को काम में ले लिया गया! 

मैं आर्थिक मामलों का जानकार नहीं। लेकिन नोटबन्दी की विभीषिका एक सच है। उस पर, ‘कर्नल रंजीत’ की तरह मेरे इन सीए मित्र का दिया यह ब्यौरा! जहाँ चश्मदीद गवाह न हों, दस्तावेजी सबूत न हों, वहाँ परिस्थितिजन्य साक्ष्य बोलते हैं। 

तो क्या ‘दल से पहले देश’ वाला मुहावरा उलट दिया गया था? जेटली यही तो नहीं कह रहे थे?
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दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 06 सितम्बर 2018



पुलिसवाले तो पैसे लेते हैं सर! देते नहीं

लोकोक्तियाँ एक दिन में नहीं बनतीं। पीढ़ियों के अनुभवों
का निचोड़ होती हैं लोकोक्तियाँ। प्रत्येक लोकोक्ति के अपवाद जरूर मिल जाएँगे लेकिन इस बात का क्या कीजिए कि अपवाद सदैव सामान्य नियमों की ही पुष्टि करते हैं। ऐसी ही एक लोकोक्ति है - ‘पुलिस वालों की न दोस्ती अच्छी न दुश्मनी।’ सारी दुनिया की छोड़ दीजिए, अनेक पुलिसवालों को यह लोकोक्ति उच्चारते हम सबने सुना होगा - कभी परिहास में तो कभी चेतावनी की तरह। लेकिन सबके अपने-अपने अनुभव होते हैं। पुलिसवालों को लेकर मेरे भी अनेक अनुभव हैं। लोकानुभवों पर सवाल उठाए बिना कह पा रहा हूँ, मेरे ये सतरंगी अनुभव सुखद अधिक रहे हैं। दुःखद अनुभव अपवाद ही रहे।

हम बीमा एजेण्टों को कभी-कभार दफ्तर की प्रक्रियाओं के जुर्माने भुगतने पड़ते हैं। कभी हँस कर तो कभी दुःखी होकर हम लोग ये जुर्माने कबूल कर लेते हैं। लेकिन कभी-कभी स्थिति होती है कि जुर्माना हमारी सामान्य सामर्थ्य से बाहर हो जाता है। तब प्रक्रिया में चूक करनेवाले कर्मचारी पर बन आती है और जुर्माना उसे चुकाना पड़ता है। लेकिन तब ऐसी स्थिति में  एजेण्ट प्रायः ही स्वैच्छिक स्तर, प्रसन्नतापूर्वक उस कर्मचारी के जुर्माने में आंशिक भागीदारी कर लेता है।

जुर्माने की यह स्थिति तब बनती है जब दफ्तर की किसी चूक के कारण किसी पालिसीधारक को अधिक भुगतान कर दिया जाता है। विशेषतः पॉलिसी के अन्तिम/परिक्वता भुगतान के समय। यह जानकारी ऑडिट के समय सामने आती है। ऑडिट पार्टियाँ चार-पाँच दिनों के लिए आती हैं। ऑडिट चलने के दौरान ही ये गलतियाँ मालूम हो जाती हैं। यदि ये गलतियाँ ऑडिट रिपोर्ट में शामिल हो जाएँ तो दफ्तर की ‘रेटिंग’ बिगड़ जाती है। इसलिए दफ्तर की कोशिश होती है कि ऑडिट रिपोर्ट बनने से पहले, अधिक भुगतान की गई ऐसी रकम जमा करा दी जाए। चूँकि पॉलिसी पूरी हो चुकी होती है इसलिए अपना भुगतान मिलने के बाद ग्राहक द्वारा अपनी ओर से, दफ्तर से सम्पर्क करने की सम्भावनाएँ पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं। कानूनी प्रक्रिया तो यह है कि दफ्तर उस ग्राहक को पत्र लिख कर अधिक भुगतान की गई रकम वापस जमा करने के लिए कहे। लेकिन  पत्र लिखने में ही इतना समय लग जाता है कि ऑडिट पार्टी के लौटने का दिन आ जाता है। तब, सम्बन्धित एजेण्ट से मदद का ‘आग्रह’ किया जाता हैै। हमारे काम की प्रकृति ही ऐसी है कि हम एजेण्टों को कुछ न कुछ ‘पाप’ करने ही पड़ते हैं। कुछ तो ऐसे ‘पापों’ का अपराध बोध और कुछ यह कि दफ्तर से काम तो रोज-रोज पड़ता है। थोड़ी राहत यह कि यह रकम सामान्यतः एजेण्ट की ‘सहन शक्ति की सीमा’ में होती है। सो एजेण्ट प्रायः ही अपनी जेब से यह रकम जमा कर देते हैं और ऑडिट रिपोर्ट में दफ्तर की रेटिंग बिगड़ने से जाती है।

ऐसा ही एक मामला मेरे ग्राहक का सामने आया। लेकिन रकम थी - पूरे साढ़े सात हजार रुपये। मेरी भी सहन शक्ति से बाहर और बाबू की सहन शक्ति से भी। लेकिन, रकम जमा करने के लिए मुझसे कहे कैसे? एक तो मैं मेरी शाखा का सबसे पुराना एजेण्ट। दूसरा सबसे बूढ़ा एजेण्ट भी। तीसरा, मेरा ‘पत्थर मार’ स्वभाव। चौथा और सबसे बड़ा कारण - मैं रतलाम से बाहर और मेरी वापसी, ऑडिट पार्टी की वापसी के बाद। तनिक हिम्मत जुटाकर, बहुत ही हिचकिचाते हुए सम्बन्धित कर्मचारी ने मुझे फोन किया। रकम सुनकर मैंने अविलम्ब इंकार कर दिया। मेरी ओर से मामला खत्म हो गया।

लौटा तो मालूम हुआ कि यह वसूली ऑडिट रिपोर्ट में शामिल कर ली गई थी। सम्बन्धित कर्मचारी से मिला तो वह दोहरा घबराया हुआ। केवल रकम के आँकड़े से ही नहीं, ग्राहक के कारण भी। ग्राहक, एक सेवा निवृत्त पुलिस उप अधीक्षक। एक तो पुलिसवाला, ऊपर से डिप्टी एसपी! कर्मचारी ने जुर्माने को अपनी नियती मान लिया। 

लेकिन तभी सहा. प्रशासकीय अधिकारी ने दखल दिया। उन्हें लगा कि रकम तय करने में ऑडिटर ने चूक की है। उनके हिसाब से यह रकम ढाई हजार होनी थी। उन्होंने अपने हिसाब से गणना के ब्यौरे ऑडिट विभाग को भेजे। विभाग ने अपनी चूक मानी और वसूली साढ़े सात हजार से ढाई हजार पर आ गई। हम सबकी सहानुभूति कर्मचारी के साथ थी। उसने घपला तो किया नहीं था! मैंने ग्राहक का नाम पूछा। (तब तक मुझे केवल रकम बताई गई थी, ग्राहक का नाम नहीं।) नाम सुनकर मैं बल्लियों उछल पड़ा। वे मेरे अच्छे मित्र निकले। मैं उन्हें तब से जानता हूँ जब वे उप निरीक्षक (सब इंस्पेक्टर) थे। नाम है - श्री ए. पी. तोमर। रेकार्ड में श्री अनंग पाल सिंह तोमर और दुनियादारी में श्री आनन्द पाल सिंह तोमर। वे खण्डवा में हैं। बहुत ही शानदार आदमी। उनसे बात किए बिना ही मैंने सबको भरोसा दिला दिया कि वे रकम लौटा देंगे। कर्मचारियों ने अविश्वास और हैरत से कहा - ‘लौटा देंगे! आप कैसे कह रहे हैं? आपने बात कर ली उनसे?’ मैंने बताया कि वे ऐसे आदमी हैं जिनसे बात किए बिना ही उनकी ओर से वादा किया जा सकता है। और अधिक अविश्वास और अचरज से मित्रों ने पूछा - ‘क्या बात कर रहे हैं आप? वो पुलिसवाले हैं! पुलिसवाले तो पैसे लेते हैं सर! देते नहीं।’ मैंने हँस कर, उसी बेफिक्री से कहा - ‘आप सच कह रहे हैं। लेकिन मैं भी सच कह रहा हूँ। तोमर सा‘ब मेरे कहते ही पैसे लौटा देंगे।’ सुनकर सब खुश तो हुए लेकिन विश्वास किसी को नहीं हुआ। मानो चुनौती दे रहे हों, कुछ इस तरह बोले - ‘देखते हैं सर!’

मैंने उसी क्षण तोमर सा‘ब को फोन लगाया। पूरी बात बताई और कहा - ‘एलआईसी ऑफ इडिया के नाम पर ढाई हजार का चेक भिजवा दीजिए।’ तोमर सा‘ब ने जवाब दिया - ‘मैं ब्लेंक चेक भेज रहा हूँ। रकम आप भर लेना और मुझे फोन पर बता देना।’ मैंने पूछा - ‘चेक कब तक भेज देंगे?’ उधर से जवाब आया - ‘अब आज तो नहीं भेज पाऊँगा। लेकिन कल पक्का भेज दूँगा। स्पीड पोस्ट से। भेजने का काम मेरा। आप तक पहुँचाने का काम पोस्ट ऑफिस का।’ धन्यवाद देकर मैंने फोन बन्द कर दिया। मुझे घेरे हुए कर्मचारी मित्रों ने अविश्वास से पूरा संवाद सुना।

डाक वितरण व्यवस्था की मौजूदा दशा के आधार पर मेरा अनुमान था कि चेक आने में सात दिन तो लग ही जाएँगे। लेकिन मेरे अनुमान को ध्वस्त करते हुए डाक विभाग ने चौथे ही दिन चेक पहुँचा दिया। चेक लेकर मैं दफ्तर पहुँचा तो सबने उस चेक को हाथ में ले-ले कर दुनिया के आठवें अजूबे की तरह देखा।

सम्बन्धित कर्मचारी गद्गद और विह्वल था। वह मुझे बार-बार धन्यवाद दिए जा रहा था। मैंने रोका और पूछा - ‘अब बोलो! क्या राय है? पुलिसवाले पैसे देते हैं कि नहीं?’ उसने छूटते ही, बिना विचारे (विदाउट थॉट) मासूमियत से जवाब दिया - ‘सर! वो आपको देते हैं। सबको नहीं।’

यह जवाब, लाजवाब था। जोर का ठहाका लगा। सब इस ठहाके में शरीक थे। मैं भी।
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खुद पर हँसने का हासिल

दो दिन मैं खूब हँसा। किसी और पर नहीं, खुद पर ही।  लेकिन खुल कर नहीं। कुछ इस तरह कि हँसी दिखाई भले ही दे लेकिन सुनाए किसी को नहीं।

केमरा मुझे बचपन से ही अपनी गिरफ्त में लिए हुए है। छुपाए जाने वाले इश्क की तरह। कभी धन की कमी तो कभी वक्त की। यूँ तो जिन्दगी आसान ही बनी रही किन्तु इतनी भी नहीं कि दुनिया को भूल कर केमरा थाम लूँ। हाँ, लेकिन यह जरूर हुआ और लगातार होता रहा कि जब-जब जिन्दगी ने मौका दिया, केमरे को सहला लिया।

आग्फा क्लिक-III मेरा पहला केमरा था। बड़ी ही मुश्किलों में खरीदा था। लेकिन एक तो उससे जुड़े रीलों, रीलों की धुलाई, फोटुओं की बनवाई के खर्चों ने दिमाग दुरुस्त कर दिया और दूसरे, बाल-बच्चेदार बैरागी को जिन्दगी ने तनिक अधिक व्यस्त कर दिया। 

लेकिन चार बरस पहले अचानक ही केमरा खरीदने की मरोड़ें उठने लगीं। खुद को ही कोई कारण और औचित्य नजर नहीं आ रहा था केमरा खरीदने का। महीनों तक द्वन्द्व चलता रहा। इस बार यह द्वन्द्व बुद्धि और विवेक के बीच नहीं, मन और विवेक के बीच था। बुद्धि जब-जब भी बीच में आई, मन ने झिड़क दिया। विवेक समझाता रहा लेकिन मानना तो दूर, मन तो सुनने को ही तैयार नहीं हुआ। मन इतना बदमाश बना रहा कि किसी और से पूछने, सलाह लेने से भी रोके रखा। कम से कम चार महीनों तक यह बेकली, बेचैनी बनी रही। और अन्ततः, अपनी जेब पर डाका डाल कर निकान डी 5100 केमरा खरीद ही लिया। चैन तो पड़ा लेकिन अचानक ही अपराध बोध भी मन पर हावी हो गया। दशा यह हो गई कि किसी को केमरा बताना/दिखाना तो दूर, किसी को सूचना देने की भी हिम्मत नहीं रही। वैसे भी रतलाम में बात करूँ, रास्ता पूछूँ भी किससे? दुनिया भर में रतलाम का नाम रोशन करनेवाले ख्यात केमरा कलाकार देवेन्द्र भाई शर्मा मुझ पर आदरभरा स्नेह रखते थे। केमरा लेकर, रात के अँधेरे में उनसे मिला। वे बड़े खुश हुए। खूब तारीफ की, हिम्मत बँधाई और प्रेरित किया। कुछ प्रारम्भिक निर्देश दिए। तय हुआ कि अगले रविवार को मुझे उनके पास बैठना है। लेकिन वे भी उलझे रहे और मैं भी। और वह रविवार कभी नहीं आया। अब आएगा भी नहीं।

केमरा, बेग में ही बन्द पड़ा रहा। फरवरी 2016 में अण्डमान गया तो केमरा साथ ले गया। वहाँ ढेर सारे फोटू लिए। परिजनों और कुछ मित्रों को दिखाए। सबने तारीफ ही की। लेकिन मन की झेंप रत्ती भर भी कम नहीं हुई। आत्म विश्वास तो कभी रहा ही नहीं था।

एक दिन अखबार से अचानक ही मालूम हुआ कि रोटरी
क्लब प्राइम के सहयोग से, रतलाम का सृजन केमरा क्लब, 30 अगस्त से 01 सितम्बर के बीच, ख्यात अन्तरराष्ट्रीय केमरा कलाकार श्री चित्रांगद कुमार की तीन दिवसीय फोटो प्रदर्शनी और दो दिवसीय वर्क शॉप आयोजित कर रहा है। समाचार ने मन को उकसाया और मैं अपना केमरा लटका कर पहुँच गया। चित्रांगदजी का भारी-भरकम नाम तो पहले से ही सुना हुआ था, कुछ महीनों पहले जब देवेन्द्र भाई की स्मृति में एक आयोजन हुआ था तब महावीरजी वर्मा ने उनसे परिचय भी कराया था।  

पहली शाम तो प्रदर्शनी के उद्घाटन में ही बीत गई। चित्रांगदजी से औपचारिक बातें हुईं। मैंने वर्क शॉप में शामिल होने की इच्छा जताई। उन्होंने अत्यधिक गर्मजोशी से मुझे सहमति दी। वर्क शॉप का समय बताया अगले दिन दोपहर तीन से पाँच बजे।

तय समय पर मैं पहुँचा। आयोजकों के अलावा लगभग पचास बच्चे जुटे हुए थे। तीस बरस से अधिक उम्र का शायद ही कोई बच्चा रहा होगा। सबने मुझे अजूबे की तरह ही देखा। मेरे हौसले पस्त हो गए। लेकिन मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ता हुआ बना रहा। कुर्सियाँ लगभग सारी भर गई थीं। मैं सबके पीछेवाली कुर्सी पर बैठा। (सबसे आगेवाली कुर्सी मिलती भी तो भी मैं वहाँ बैठने की हिम्मत तो नहीं ही जुटा पाता।) उसके बाद से ही खुद पर हँसने का सिलसिला शुरु हो गया।

चित्रांगदजी ने बात शुरु की तो कुछ ही पलों में सारे बच्चे उनसे जुड़ गए। मेरी स्थिति बड़ी विचित्र थी। एक तो उम्र। दूसरे, मुझे वैसे भी थोड़ा कम सुनाई देता है। तीसरे, सबसे पीछे बैठना। चौथे, तेज गति से चल रहे पंखों से उपज रही सरसराहट का शोर। पाँचवें, सभागार की कम ऊँचाई और खिड़कियाँ कम होने से आवाज का गूँजना। छठवें, चित्रांगदजी का तेजी से बोलना। और इन सबसे आगे बढ़कर, मेरी, विषय की ज्ञान-शून्यता। सारे बच्चे तकनीक और तकनीकी ज्ञान से लैस। उनकी बातें, उनकी शब्दावली मेरे लिए तो ‘काला अक्षर, भैंस बराबर’ थी। पहले ही पल मैं ‘गूँगा-बहरा दर्शक’ की बन कर रह गया। उधर, चित्रांगदजी ने मुझसे कुछ पूछा तो मैंने कानों पर हाथ रखकर इशारा किया - ‘मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा।’ उन्होंने बुला कर अपने पास बैठा लिया। अब मुझे सुनाई तो सब दे रहा था लेकिन ‘केमरा’, ‘लेंस’, ‘आब्जेक्ट’, ‘क्लिक’ जैसे शब्दों के सिवाय कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। उम्र के लिहाज से मेरी दशा ‘बछड़ों के बीच बूढ़ा बैल’ और ज्ञान के लिहाज से ‘स्नातक कक्षा में घुस आया पहली का छात्र’ जैसी थी। अपनी यही दशा मुझे खुद पर हँसाए जा रही थी। लेकिन अजीब बात यह रही कि वहाँ से भागने का विचार पल भर भी मन में नहीं आया।

दूसरे, अन्तिम दिन चित्रांगदजी ने अपने खींचे विभिन्न चित्रों के जरिए काफी-कुछ समझाया। एक बच्ची को मॉडल बनाकर प्रकाश व्यवस्था/प्रबन्धन  समझाई। मुझसे भी एक फोटू क्लिक करवाया। लेकिन समझ के मामले में मेरी दशा में कोई अन्तर नहीं आया। मुझे लगा तो बहुत अच्छा लेकिन सूझ-समझ कुछ नहीं पड़ा। मैं वहाँ बराबर बना रहा। मेरी झेंप लगभग समाप्त हो गई - यह सबसे बड़ा हासिल रहा मेरे लिए।

कल शाम, वर्क शॉप से लौटते समय, देवेन्द्र भाई के बेटे हरीश के जरिए चित्रांगदजी को आज सुबह की चाय मेरे साथ पीने के लिए न्यौत कर आया था। हरीश उन्हें तो लाया ही, सृजन केमरा क्लब के संस्थापकों में से एक (और रतलाम के पुराने केमरा कलाकार) श्री कमल उपाध्यायजी को साथ लेकर आया। कोई घण्टा भर हम लोग बैठे। मैंने, अण्डमान में खींचे फोटू उन्हें दिखाए। वे चुपचाप देखते रहे। उनकी चुप्पी मुझे भयभीत बनाए  रही। सूर्योदय श्रृंखला का एक चित्र देखकर जब उन्होंने सहसा ‘वाह!’ कहा तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरा डर एकदम छू हो गया। सारे फोटू दिखाने के बाद मैंने पूछा - ‘मैं आगे बढ़ूँ या केमरे को ताला लगा दूँ?’ उन्होंने कहा - ‘नहीं! नहीं!! आप रुकिए नहीं। आगे बढ़िए। बाहर निकलिए।’ 

उनकी इस बात ने मेरा हौसला और आत्म विश्वास बढ़ाया है। मैं सृजन केमरा क्लब का सदस्य बन रहा हूँ। झेंप तो समाप्त हो ही गई है। आत्म विश्वास भी बढ़ा है। 

दो दिन खुद पर हँसने का यह हासिल बुरा नहीं। 
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वर्क शॉप के कुछ चित्र दे रहा हूँ। इतने चित्र एक साथ देने का मौका पहली बार आया है। इसलिए इन चित्रों का न तो को सिलसिला है न ही सलीका।