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‘वे’ अब ऐसी गलतियों से ही याद किए जाएँगे


लोक सभा के चुनावों के महत्व को अनुभव करते हुए विश्वास कर रहा हूँ कि दैनिक भास्कर के आज (14 अप्रेल 2019) के अंक में छपा उपरोक्त समाचार निश्चय ही भास्कर के समस्त संस्करणों में छपा होगा। इस समाचार में, प्रदेश के पूर्व मुख्य मन्त्री स्वर्गीय श्री वीरेन्द्र कुमार सकलेचा का हवाला देते हुए उनका जो चित्र छपा है वह सकलेचाजी का नहीं, किसी और का है। समाचार का, गलत चित्र वाला हिस्सा भी यहाँ दे रहा हूँ।
समाचार का वह अंश जिसमें सकलेचाजी के चित्र की जगह किसी और का चित्र छपा है।

सकलेचाजी के चित्र बहुत कम मिलते हैं। कैमरे से नजदीकी उन्हें नहीं सुहाती थी। मेरे छोटे भतीजे गोर्की के विवाह समारोह में (दिनांक 21 जून 1983) वे वर-वधू को आशीर्वाद देने पहुँचे तो भरपूर विलम्ब से। समारोह के समापन छोर पर। मंच पर पहुँचे तो चित्र खिंचवानेे को तैयार नहीं हुए। गोर्की उनसे अनौपचारिक होने की छूट ले लिया करता था। उसने कहा कि चित्र तो खिंचवाना पड़ेगा। वे अत्यधिक अनिच्छापूर्वक तैयार हुए तो वर-वधू से भरपूर दूरी बना कर खड़े हुए। तब गोर्की ने हँसते हुए, उनकी बाँह पकड़ कर अपने पास खींचते हुए भरोसा दिलाया था कि वे (सकलेचाजी) निश्चिन्त रहें, इस चित्र का राजनीतिक उपयोग नहीं होगा। गोर्की के इस आश्वासन पर ही उन्होंने फोटू खिंचवाया तो जरूर लेकिन गोर्की के और फोटोग्राफर के बार-बार आग्रह के बाद भी मुस्कुराए नहीं।

सकलेचाजी संघ के निष्ठावान, समर्पित स्वयम्सेवक थे। हिटलरी मूँछें रखना संघियों की पहली पसन्द है। बल्कि यह कहना अधिक समीचीन होगा कि हिटलरी मूँछें संघियों की प्रमुख पहचान है। सकलेचाजी भी हिटलरी मूँछे रखते थे और मुस्कुराने से परहेज करते लगते थे। सकलेचाजी के, बिना मूँछोंवाले चित्र की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।

पत्रकारिता में ऐसी चूकें होना बहुत सामान्य बात है। वैसे भी पत्रकारिता की आज की पीढ़ी अध्ययन से दूर होती जा रही है। वह तकनीक और गूगल पर निर्भर हो गई है। पुराने पत्रकारों को सहेजना तो दूर की बात रही, उनकी पूछ-परख भी नहीं रही। उनके पास बैठ कर उनके अनुभव सुनना अब वक्त खराब करना हो गया है। ऐसे में सकलेचाली के चित्र की जगह किसी और का चित्र छाप देना, पीड़ादायक भले ही हो, किन्तु आश्चर्यजनक नहीं। मैंने भी गूगल से उनका चित्र तलाश किया। जो चित्र मिला वह यहाँ दे तो रहा हूँ लेकिन खुद भी सन्देहग्रस्त हूँ। मेरे मानस में सकलेचाजी की जो छवि है, उससे यह चित्र मेल खाता है। हिटलरी मूँछें आश्वस्त होने में सहायता करती हैं। यह चित्र उनकी जवानी के दिनों का लगता है। 

स्वर्गीय श्री वीरेन्द्र कुमारजी सकलेचा
(चित्र सौजन्य गूगल)

लेकिन ऐसी एक मजेदार चूक का किस्सा मुझे 1975-76 में भोपाल में सुनने को मिला था। उन दिनों मैं अंग्रेजी दैनिक हितवाद के प्रबन्धन विभाग में नौकरी करता था। श्री गोविन्द तोमर वहाँ वरिष्ठ संवाददाता थे। समाजवादी विचारधारावले तोमरजी के पास नेताओं और पत्रकारिता के अन्तर्सम्बन्धों और सस्मरणों का खजाना था। 

प्रेस की चूक का यह मजेदार किस्सा उस जमाने का है जब चित्रों के ब्लॉक बनाए जाते थे। उस जमाने में एक विज्ञापन भोपाल के लगभग तमाम अखबारों में, ‘स्पेस बुकिंग एग्रीमेण्ट’ के तहत प्रतिदिन छपता था। यह विज्ञापन था हकीम वीरूमल आर्यप्रेमी का। जैसा कि नाम से ही जाहिर है, वे हकीम थे और आर्य समाजी थे। उन दिनों सफेद टोपी आर्य समाजियों की पहचान हुआ करती थी। विज्ञापन के साथ हकीम वीरूमलजी का चित्र भी छपता था जिसमें वे सफेद टोपी पहने नजर आते थे। 

भारत के राष्ट्रपति रहे डॉक्टर शंकर दयालजी शर्मा उस काल खण्ड में मध्य प्रदेश की राजनीति के चर्चित चेहरों में शामिल थे। वे भोपाल ही रहते थे। वे भी सफेद टोपी पहनते थे। बिना टोपीवाला उनका चित्र अपवादस्वरूप भी शायद ही मिले। डॉक्टर साहब और हकीमजी के चित्रों के सिंगल कॉलम चित्र लगभग एक जैसे लगते थे। 

स्वर्गीय डॉक्टर शंकर दयालजी शर्मा
(चित्र सौजन्य गूगल)  

मुझे याद नहीं कि तोमरजी ने अखबार का नाम बताया था या नहीं। लेकिन एक अखबार में ऐसा हुआ कि विज्ञापन विभाग ने लायब्रेरियन से हकीम वीरूमल आर्यप्रेमी का ब्लॉक माँगा। लायब्रेरियन ने अपना खजाना टटोला और सफेद टोपी लगा जो ब्लॉक नजर आया वह विज्ञापन विभाग को दे दिया। वही ब्लॉक उस अखबार में छपा और छपता रहा।

पाँच-सात दिन बाद, किसी कर्मचारी का ध्यान चित्र पर गया तो चौंक उठा। विज्ञापन में हकीम वीरूमल आर्यप्रेमी के चित्र के बजाय डॉक्टर शंकर दयालजी शर्मा का चित्र छप रहा था। उसने सम्बन्धितों को बताया तो सबका ध्यान गया और तत्काल ही गलती दुरुस्त की गई। लेकिन गौर करनेवाली बात यह रही कि इस चूक की ओर किसी का ध्यान नहीं गया - न विज्ञापनदाता का, न अखबारवालों का, न ही किसी काँग्रेसी का। हकीमजी के चित्र की जगह डॉक्टर साहब का चित्र छपा और छपता रहा। चूक की दुरुस्ती भी किसी के चौकन्ननेपन की वजह से नहीं, एक अदना कर्मचारी के, फुरसत में ‘यूँ ही’ फोटू देखने से हुई। ईश्वर तोमरजी को दीर्घायु प्रदान करें। यह लेख उन तक पहुँचेगा तो वे निश्चय ही इस विवरण की पुष्टि करेंगे।

पता नहीं, भास्कर की इस चूक की ओर किसी का ध्यान गया या नहीं। ध्यान जाएगा भी या नहीं। क्योंकि प्रेस/मीडिया-जगत में ऐसी चूक होना कोई गम्भीर बात नहीं होती।

बाल संरक्षण के लिए नोबल पुरुस्कार प्राप्त श्री कैलाश सत्यार्थी वाला मामला तो बहुत पुराना नहीं है। उस समाचार में कैलाश सत्यार्थी की जगह कैलाश विजयवर्गीय को दे दी गई थी और दिग्गज भाजपाइयों ने गर्वपूर्वक ‘अपने कैलाशजी’ का महिमा बखान करते हुए अपनी विद्वत्ता बघारते हुए विजयवर्गीय को बधाइयाँ भी दे दी थीं। 

आप-हम जो भी कहें। कह लें। लेकिन प्रेस की चूक यह परम्परा तो सनातन से चली आ रही है जो प्रलय तक चलती रहेगी और डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा, कैलाश सत्यार्थी, सकलेचाजी जैसे कई लोग ऐस बहानों से भी याद किए जाएँगेे।
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कमरे में दुनिया और बाजार में अकेलापन

कल शाम जब उपाध्यायजी से मिलने गया तब तक कल्पना भी नहीं थी कि मैं यह सब लिखूँगा। नहीं, ‘लिखूँगा’ कह कर ठीक नहीं कर रहा। यहाँ ‘लिखना पड़ेगा’ लिखना चाहिए था मैंने। अब दुरुस्त कर लेता हूँ - उपाध्यायजी से मिलने तक कल्पना भी नहीं थी कि यह सब लिखना पड़ेगा।

उपाध्यायजी याने डॉक्टर प्रोफेसर प्रकाश उपाध्याय। मेरे रतलाम की यशस्वी पहचानों में से एक। मृदुभाषी, सुरुचिसम्पन्न उपाध्यायजी जाने-माने साहित्यकार हैं। कबीर पर साधिकार बात करते हैं। मालवी लोक जीवन के गहरे जानकार। एक सरकारी कॉलेज के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। अच्छे-भले सामाजिक प्राणी हैं। कस्बे की अधिकांश गतिविधियों में उनकी मौजूदगी नजर आती है। घर-गृहस्थी के काम-काज निपटाते हुए यदा-कदा, आते-जाते दीख जाते हैं। जो भी देखता है, मान ही लेता है कि उपाध्यायजी उसे ही देखकर मुस्कुरा रहे हैं। मेरा उनसे नियमित मिलना तो नहीं होता किन्तु उनके बारे में इधर-उधर से जानकारी मिलती रहती है। उनसे मिलने का कोई मौका छोड़ता नहीं। उनसे मिलना और बतियाना सदैव ही सुखकर होता है। जब भी उनसे मिलता हूँ, समृद्ध होकर ही लौटता हूँ।

अभी, तीन दिन पहले, शनिवार को सुभाष भाई जैन के यहाँ बैठा था।  ओमजी (उपभोक्ता न्यायालय के नामित
न्यायाधीश) भी बैठे थे। बातों ही बातों में ओमजी ने बताया कि उपाध्यायजी की एंजियोप्लास्टी हुई है। सुनकर अच्छा नहीं लगा। साधु पुरुषों को ऐसी यन्त्रणा झेलनी पड़े, यह सूचना ही अपने आप में यन्त्रणादायी होती है। विश्वास नहीं हुआ। उपाध्यायजी की जिन्दगी सीधी लकीर की तरह है - नियमित, संयमित, अनुशासित। भला उन पर ईश्वर की यह कुदृष्टि क्यों? उसी क्षण तय किया कि जल्दी से जल्दी उपाध्यायजी से मिलना है।

कल, सोमवार की शाम को उनके घर पहुँच गया। पहले फोन कर दिया था। दरवाजा उपाध्यायजी ने ही खोला। बिलकुल सहज, सामान्य। सदैव की तरह ताजादम। चेहरे पर वही मोहिनी मुस्कान। रोग, पीड़ा की छोटी सी खरोंच भी चेहरे पर नहीं। लगा, ओमजी ने गलत जानकारी दे दी या फिर मैंने ही कुछ गलत सुन लिया।

मैं अधीर था। खुद को रोक नहीं पाया। बैठते-बैठते ही पूछ लिया - ‘सच्ची में आपकी एंजियोप्लास्टी हुई है?’ उपाध्यायजी की हँसी बिखर गई। बोले - ‘बैठिए तो! बताता हूँ।’ उसके बाद उपाध्यायजी ने जो कुछ सुनाया, उसी के कारण मुझे यह सब लिखना पड़ा।

उपाध्यायजी ने बताया, मई 2018 की एक शाम वे अपने स्कूटर पर बाजार जा रहे थे। एक नौजवान ने टक्कर मार दी। बाँये कन्धे में फ्रेक्चर हो गया। इलाज शुरु हुआ। उसी दौरान एक रात घबराहट हुई। सीधे सरकारी अस्पताल पहुँचे। वहाँ समाधान नहीं हुआ। एक निजी अस्पताल पहुँचे। वहाँ भी समाधान नहीं हुआ। डॉक्टर सुभेदार साहब के यहाँ पहुँचे। उन्होंने जल्दी से जल्दी इन्दौर जाने की सलाह दी। इन्दौर मेदान्ता में पहुँचे। जाँच का निष्कर्ष निकला - एंजियोप्लास्टी करनी पड़ेगी। दो स्टेण्ट लगाए। कुछ दिनों बाद रतलाम लौट आए। जिन्दगी पहले ही संयमित, नियमित थी। इसलिए डॉक्टर के निर्देश-पालन के लिए अतिरिक्त कुछ नहीं करना पड़ा। अब सब सामान्य है। ठीक-ठीक चल रहा है।

सुनकर तसल्ली तो हुई लेकिन यह सूचना मुझ तक पहुँचने में दस महीने लग गए! इसी बात ने मुझे विचार में डाल दिया। उपाध्यायजी घर-घुस्सू आदमी नहीं हैं। लोगों से मिलना-जुलना उन्हें अच्छा लगता है। किसी समागम में शामिल होने का, लोकाचार निभाने का मौका नहीं छोड़ते। रतलाम बहुत बड़ा कस्बा नहीं। अधिकाधिक पन्द्रह मिनिट में कस्बे के एक छोर से दूसरे छोर पर पहुँचा जा सकता है। मैं बीमा एजेण्ट हूँ। लगभग दिन भर घर से बाहर रहता हूँ। मुख्य बाजार हो या दूर-दराज का मुहल्ला, कस्बे के हर हिस्से में मेरा आना-जाना होता ही है। रोज ही दस-बीस लोगों से मिलता हूँ। कई लोग ऐसे हैं जो मेरे और उपाध्यायजी के सम्पर्क क्षेत्र में समान (कॉमन) हैं। लेकिन उपाध्यायजी की यह जानकारी मुझे कहीं नहीं मिली! इसी बात ने मुझे चौंकाया और विचार में डाल दिया।

हम कहाँ आ गए हैं? क्या हो गए हैं? उपाध्यायजी के और मेरे, समान (कॉमन) परिचितों से बात करते हुए हमने कभी किसी अपनेवाले के बारे में बात करने की जरूरत ही अनुभव नहीं की! अपनी और अपने काम की बातें करते रहे! अपने मतलब तक ही सिमटे रहे! हमारी बातों में किसी तीसरे, ‘अपनेवाले’ का जिक्र आया ही नहीं! इण्टरनेट ने हमें, अपने घर में बैठे, बन्द कमरे में होते हुए भी सारी दुनिया से जोड़ दिया लेकिन घर से बाहर, दुनिया के बीच बैठकर भी हम अपने आप में ही रहने लगे! दुनिया अंगुलियों की पोरों पर आ सिमटी है। कोई भी सूचना हो, कुछ ही पलों में हर-एक के पास पहुँच जाती है। लेकिन उपाध्यायजी की यह सूचना, गाँव की गाँव में मुझ तक दस महीनों में पहुँची! यह एकान्त हमने बुना या हम अनायास ही इस एकान्त के शिकार हो गए?

उपाध्यायजी से मिल कर लौटे हुए मुझे लगभग सोलह घण्टे हो गए हैं। लेकिन यह विचार पीछा नहीं छोड़ रहा। इस समय भी, जब मैं यह सब लिखने को विवश हुआ और लिख चुका।
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