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हाँ! मेरी थैली में अफीम है।

सच का रास्ता अपनानेवाले वकील सा’ब की आपबीती से गुजरते हुए मुझे अनायास ही मिस्त्री सा’ब याद आने लगे और पूरे समय तक याद आते रहे।
मिस्त्री साब का नाम भँवरलाल प्रजापति था लेकिन उन्हें अपवाद स्वरूप ही ‘प्रजापति’ सम्बोधित किया गया होगा। सदैव मिस्त्री, भँवरलाल मिस्त्री या मिस्त्री साब ही सम्बोधित किए गए। औसत मध्यवर्गीय संघर्षशील आदमी। मैंने उन्हें किराये के मकान में ही रहते देखा। उनमें ऐसा कुछ भी नहीं था कि लोग उन्हें ध्यान से देखें। लेकिन वे सबसे अलग थे। मुख्य काम मकान बनाना किन्तु शब्दशः हरफनमौला। उन्हें हर काम आता था। या कहिए कि कोई काम ऐसा नहीं जो उन्हें न आता हो। हर काम कर लेते और जब करते तो लगता, इसीमें मास्टर हैं। पूरे मनोयोग, पूरी तल्लीनता और अपनी सम्पूर्णता से करते। चुनौतियाँ उन्हें ललचाती थीं। कोई नई बात देखते तो ‘भेदिया नजर’ से। नजरों ही नजर में उसका एक्स-रे कर लेते। कोई  पूछता - ‘मिस्त्री साब! ये कर सकोगे?’ वे उत्साह और उत्फुल्लता से कहते - ‘क्यों नहीं कर सकते? अपन नहीं कर सकते तो फिर कौन करेगा?’ और पहली ही बार में उसे इस तरह कर लेते मानो जन्म-जन्मान्तर से वही काम करते चले आ रहे हों। 
मस्तमौला और खुशदिल ये दो शब्द मैंने उन्हीं से साकार होते देखे। अभावों को वे कबीर के फक्कड़पन से जीते थे। उन्हें जिन्दगी से कभी शिकायत करते नहीं देखा। गरीबी, अभाव और साधनहीनता ने उन्हें कभी खिजाया नहीं और समृद्धि ने कभी ललचाया नहीं। बात और हाथ के सच्चे, साफ-सुथरे। उन्हें झूठ बोलने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। वे जिन्दगी के पल-पल को भरपूर आनन्द से जीते। मुझे इस क्षण भी लग रहा है कि उनकी मस्ती और मौज से कुबेर भी उनसे ईर्ष्या करते रहे होंगे। वे हमारे मुहल्ले की समाजिकता के प्राण और हरियाली थे। मुहल्ले के उत्सव मिस्त्री साब की भागीदारी से ही पूर्णता और सार्थकता पाते थे। वे उत्सवों की रंगीनी होते थे। किसी न्यौते-बुलावे की प्रतीक्षा नहीं करते। होली के दिनों में, लगभग पूरे पखवाड़े खेले जानेवाले ‘वाना’ में हर दिन नई धज, नए स्वांग में नजर आते। खुद ‘वाना’ नहीं खेलते किन्तु उनके बिना ‘वाना’ शुरु ही नहीं होता। उनके बाँये हाथ का पंजा, जन्म से ही, मणीबन्ध से लगभग नब्बे डिग्री से अन्दर की ओर मुड़ा हुआ था। किन्तु यह आंशिक अपंगता उन पर अंशतः भी हावी नहीं हो पाई। 
उतनी पत्नी पर मैं लट्टू था। नाटे कद की, गोरी-चिट्टी। उनका गोलमटोल, मुस्कुराता चेहरा मैं इस क्षण भी देख रहा हूँ। उनकी मुस्कान मेरी नजरों से अभी भी ओझल नहीं हो रही। ऐसी सहज, निश्च्छल, मोहक मुस्कान उनके बाद मुझे आज तक किसी के चेहरे पर नजर नहीं आई। मेरा बस चलता तो मैं उनकी इस ‘भुवन मोहिनी मुस्कान’ को   माचिस की किसी खाली डिबिया में उसी तरह सहेज कर रख लेता जिस तरह उन दिनों हम जुगनुओं को बन्द कर रख लेते थे। मुझे लगता, वे मुझे देखकर ही मुस्कुरा रही हैं। इसी मुस्कान के कारण उनके चेहरे से मेरी नजर हटती ही नहीं थी। मैं टकटकी लगाए उन्हें देखता। वे जैसे ही मेरी ओर देखतीं, मैं झेंप कर नजरें नीची कर लेता। वे खिलखिला कर हँस देतीं। 
डिबिया को मालवी में ‘डाबी’ कहते हैं। उनके नाटे कद के कारण मैं उन्हें ‘डाबी भाभी’ कहता था। मैं जब तक मनासा में रहा, इस सम्बोधन पर मेरा एकाधिकार रहा। मेरी गैरहाजरी में किसी ने भले ही उन्हें ‘डाबी भाभी’ कहा हो, मेरे सामने दूसरा कोई उन्हें ‘डाबी भाभी’ नहीं कह सकता था। कह ही नहीं सका। मैंने किसी को कहने ही नहीं दिया। उनके गोरे-चिट्टे भाल पर लगी, बड़ी सुर्ख लाल बिंदिया ऐसे लगती मानो पूनम की रात में सूरज उगा हुआ हो। वे मिस्त्री साब की परछाई बनी रहतीं।
मिस्त्री साब शिक्षित तो नहीं थे  किन्तु अनपढ़ भी नहीं थे। वे दस्तखत कर लेते और कहीं लिखना भूल न जाएँ, इसलिए कभी-कभार चिट्ठी-पत्री कर लेते। एक सुबह, काम पर जाते हुए वे बड़ा लिफाफा लेकर दादा के पास आए। बोले - ‘दादा! जरा देखना तो यह क्या आया है।’ दादा ने देखा, वह हिन्दुस्तान मोटर्स का, चिकने कागजों पर छपा, भारी-भरकम, रंगीन केटलॉग था जिसमें एम्बेसेडर कार के ब्यौरे दिए हुए थे। दादा को कोई हैरत नहीं हुई। दादा ही नहीं, पूरा मुहल्ला मिस्त्री साब के मिजाज से वाकिफ था। दादा ने पूछा - ‘कहीं, किसी को चिट्ठी लिखी थी क्या?’ मिस्त्री साब ने लापरवाही से कहा - ‘हाँ। वो बिड़लाजी को कारड (पोस्ट कार्ड) लिखा था कि कारें बनाना बन्द तो नहीं कर दिया?’ दादा ने कहा - ‘उसी का जवाब भेजा है बिड़लाजी ने। कार का फोटू है। पूछा है कितनी कारें खरीदोगे।’ औजारों का थैला कन्धे पर धरते हुए, बहुत ही जिम्मेदारी से मिस्त्री साब ने निरपेक्ष भाव से जवाब दिया - ‘कार-वार क्या लेनी? क्या करूँगा लेकर? कहाँ जाऊँगा। आप बिड़लाजी को लिख देना, कारें बनाते और बेचते रहें। मेरे भरोसे नहीं रहें।’ और दादा को हँसने का मौका दिए बिना निकल लिए।
इन्हीं मिस्त्री साब ने सच की ताकत का यह किस्सा मुझे सुनाया था जिसकी वजह से वकील साब की आपबीती के दौरान मुझे मिस्त्री साब याद आ गए।
मालवा में अफीम की तस्करी बहुत सामान्य बात है। बड़े तस्कर तो अपना काम करते ही हैं लेकिन फटाफट हजार-पाँच सौ कमा लेने के चक्कर में कई लोग, सौ-पचास किलो मीटर में अफीम पहुँचाने के लिए केरीयर का काम करते रहते हैं। मिस्त्री साब ऐसे लफड़ों में कभी नहीं पड़े। वे लालच में कभी पड़े ही नहीं। लेकिन एक बार, बात-बात में चुनौती ले बैठे। एक केरीयर ने अपने काम की जोखिम का बखान किया तो मिस्त्री साब कह बैठे -  ‘इस तरह अफीम पहुँचाने में क्या है? कोई भी पहुँचा सकता है।’ केरीयर ने कहा - ‘दो तोले की जबान हिलाने में क्या जाता है? कभी जोखिम उठाओ तो मालूम पड़े।’ बात-बात में बात ‘काची की हाँची’ (कच्ची की सच्ची/मजाक से हकीकत) हो गई। मिस्त्री साब ने चुनौती झेल ली। तय हुआ कि मिस्त्री साब सौ ग्राम अफीम, मनासा से बत्तीस-पैंतीस किलो मीटर दूर बघाना (नीमच) पहुँचाएँगे। 
नीमच का नाम सबने सुना ही होगा। अंग्रेजों के समय से यहाँ सेना का बड़ा केन्द्र बना हुआ है। अभी  सीआरपीएफ के प्रशिक्षण केन्द्र सहित कुछ बटालियनों का मुख्यालय है। आज तो नीमच अपने आप में जिला मुख्यालय हो गया है किन्तु तब मन्दसौर जिले का सब डिविजन था। नीमच तीन हिस्सों में बसा हुआ है - नीमच सिटी, नीमच केण्ट और बघाना। बघाना, नीमच रेल्वे स्टेशन के पार है। वहाँ जाने के लिए रेल्वे फाटक पार करना पड़ता है। 
मिस्त्री साब ने सुनाया - “टाट की थैली में अपने एक जोड़ कपड़े और कुछ सामान के बीच सौ ग्राम अफीम रखकर मैं मनासा से चला। नीमच उतरा। बस स्टैण्ड से पैदल-पैदल बघाने की ओर चला। रेल्वे फाटक पर पहुँचा तो दिन में तारे नजर आने लगे। फाटक के दोनों ओर एक-एक पुलिस जवान खड़ा था। आने-जानेवालों के सामान की तलाशी ले रहे थे। मेरी समझ में नहीं आया कि क्या करूँ। मैं सिपाही के इतने पास पहुँच चुका था कि वापस लौट भी नहीं सकता था। मेरी धुकधुकी बढ़ गई। क्या करूँ, क्या न करूँ? आँखों के आगे काले-पीले आने लगे। लम्बी साँस लेकर मैंने सिपाही के पास ही खड़े-खड़े, जेब से बण्डल निकाल कर बीड़ी सुलगाई। इसी बहाने सोचने का थोड़ा मौका मिलेगा। दो-एक फूँक लगाने के बाद तय किया - आगे बढ़ूँगा और सच बोलूँगा।
“मैंने कदम बढ़ाया ही था कि पुलिसवाला कड़का - ‘ऐ! कहाँ जा रहा है? थैली में क्या है?’ मैंने कहा - ‘बघाना जा रहा हूँ।’ फिर थैली उसकी ओर बढ़ाते हुए बोला - ‘थैली में अफीम है। देखोगे?’ पुलिसवाले ने मुझे धौल जमाई और बोला - ‘स्साले! पुलिसवाले से मजाक करता है? कहता है, अफीम है। कभी अफीम देखी भी है तेरे बाप ने? अभी अन्दर कर दूँगा स्साले को। चल! भाग!’ मैं भागा तो नहीं लेकिन जल्दी-जल्दी फाटक पार की। मुकाम पर पहुँचा। ‘सामान’ सौंपा और जो बघाना से चला तो मान लो कि घर पहुँच कर ही साँस ली।
“आकर मैंने सामनेवाले के हाथ जोड़ लिए। हाँ भई! हाँ। तेरे काम में बहुत रिस्क है। लेकिन मेरे सच ने तेरी रिस्क की हवा निकाल दी। मैं राजी खुशी घर आ गया। मेरा कहना मान। तू भी ये धन्धा छोड़ दे। मेरी नकल कर, सच बोलने से तू एक-दो बार भले ही बच जाएगा लेकिन सच भी तो सच्चे काम का ही साथ देगा। कभी न कभी पकड़ा जाएगा और तेरे छोरे-छापरे तेरी जमानतें कराते-कराते कंगाल हो जाएँगे।’ उसे मेरी बात जँच गई। बोला - ‘छोड़ तो दूँ लेकिन करूँगा क्या?’ मैंने कहा - ‘करे तो बहुत काम है। कल से मेरे साथ आ जा। साल-दो साल में मिस्त्री बन जाएगा। कपड़े जरूर धूल मिट्टी में सन जाएँगे लेकिन इज्जत की जिन्दगी जीएगा और चैन से सोएगा।’ उसने कहा मान लिया और अफीम से राम-राम कर ली। आज वो मेरे बराबरी से काम कर रहा है।”
अपनी बात खतम करते हुए मिस्त्री साब ने कहा था - ‘बब्बू भई! साँच को आँच नहीं और मेहनत को जाँच नहीं।’
सच कहा था मिस्त्री साब ने। आँच और जाँच जारी तो है लेकिन सच की नहीं, झूठ की।
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जिन्दगी बदल दी गाँजे ने

जबलपुर से एक परिचित वकील सा‘ब का फोन आया। बोले - ‘मेरे पास मेरे एक सीनीयर सर बैठे हैं। मैं इन्हें आपका ब्लॉग पढ़वाता रहता हूँ। आज इन्होंने मुझे आपके लिए एक आपबीती सुनाई। कहा कि वह मैं आपको सुना दूँ। सर का कहना है कि सुनने के बाद इनकी यह आपबीती लिखने से खुद को रोक नहीं पाएँगे। मैंने सर से कहा कि खुद ही आपसे बात कर लें। मैं फोन सर को दे रहा हूँ।’

वकील साहब की आपबीती सचमुच में ऐसी है जिसे लिखने से कोई नहीं रुक पाए। उनकी बात मैं लिखूँ इससे बेहतर है कि उनकी यह आपबीती उन्हीं की जबानी सुन लें।

“मैं महाकौशल के एक जिला मुख्यालय पर रहता हूँ। वहीं वकालात करता हूँ। इस समय मेरी उम्र साठ के आसपास है। जो केस आपको सुना रहा हूँ वह मेरी लाइफ का टर्निंग पवाइण्ट रहा। मेरी जिन्दगी बदल गई।

“कोई अट्ठाईस, तीस बरस पहले की बात है। वकालात में मेरी पहचान बन गई थी। क्रिमिनल लॉ मेरा पसन्ददीदा सब्जेक्ट था। मैं लॉ भी पढ़ता और क्रिमिनल केस स्टडी भी करता। धीरे-धीरे यह मेरी पहचान बन गया। अपराधियों की जमानत कराना और अपने नालेज और लॉजीकल स्किल के दम पर उन्हें एक्विट कराने में एक्सपर्ट माना जाने लगा। जिले के नामचीन क्रिमिनलों का मेरे घर पर आना-जाना बना रहता। जिनके नाम से लोग थर्राते थे उनसे मेरा याराना हो गया। मेरी पीठ पीछे लोग मुझे ‘क्रिमिनल लॉ लायर’ के बजाय ‘क्रिमिनल लायर’ कहते थे। मालूम मुझे सब था लेकिन मैं किसी की परवाह नहीं करता था। मुँहमाँगी तगड़ी फीस तो मिलती ही थी, मेरे बहुत सारे काम इसी कारण चुटकी बजाते हो जाते।

“मुझे डीजे कोर्ट का एक केस मिला। पहली नजर में केस बहुत ही मामूली, बहुत ही छोटा था। इसके इसी मामूलीपन, छोटेपन ने मेरा ध्यान खींचा। एक आदमी से साढ़े तीन सौ ग्राम गाँजा पकड़ा गया था। लोअर कोर्ट ने सजा दे दी थी। यूँ तो बात बहुत बड़ी नहीं थीं लेकिन जिसे सजा दी गई थी, उसके कारण मामला इम्पार्टण्ट हो गया था। अपराधी बहुत खूँखार था। पूरे इलाके के लिए परेशानी का सबब बना हुआ था। एडमिनिस्ट्रेशन के लिए वह एक चेलेंज बन गया था। उसकी क्रिमिनल हिस्ट्री के लिहाज से उससे साढ़े तीन सौ ग्राम गाँजा बरामद होना और उसे सजा हो जाना ही सबसे बड़ा सरप्राइज था। इतने बड़े और खूँखार क्रिमिनल के लिए तो यह बेइज्जती जैसी ही बात थी।

“एक इसी फेक्ट ने मुझे क्यूरीयस बनाया। मैंने पूरा केस बार-बार पढ़ा। मुझे हैरत हो रही थी - ‘ऐसे मामलों में अपने क्लाइण्ट को एक्विट कराना तो चुटकी बजाने से भी कम का काम होता है! फिर, इस केस में आखिर ऐसा क्या है?’ बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। मुझे समझ आ गया कि पूरा मामला पुलिस का बनाया हुआ है। पुलिस पर ऊपर से दबाव था - ‘किसी भी तरह इसे एक बार जेल भेजो। एक बार अन्दर गया तो फिर कभी बाहर न निकले, ऐसी व्यवस्था कर लेंगे। जैसे ही छूटेगा, जेल के दरवाजे पर ही दूसरे गुनाह में गिरफ्तार कर फिर अन्दर कर देंगे।’ इसी प्लान के तहत इसे सजा हुई थी। पुलिस ने इस मामले में फुल-प्रूफ प्लान बनाया और उसे अंजाम तक पहुँचाया।

“मामले में कुल पाँच गवाह थे। पाँचों के पाँचों पक्के। पब्लिक प्रासीक्यूटर ने मानो अपना सारा जोर इसी मामले में लगा दिया था। पुलिस ने पूरी चौकसी बरती। एक भी गवाह टूटना तो दूर, एक हर्फ से भी इधर-उधर नहीं हुआ। सब कुछ ‘किसी वेल रिहर्स्ड, टाइट ड्रामा’ की तरह हुआ। यह केस मुझे इण्‍टरेस्‍ि टंग तो लगा ही, चेलेंजिंग भी लगा। सोच लिया - ‘इसे फीस के लिए नहीं, खुद को प्रूव करने के लिए लड़ना है।’   

“डीजे साहब नए-नए आए थे। उनकी पहचान उनके आने से पहले ही पहुँच चुकी थी। बड़े सख्त मिजाज। जल्दी से जल्दी मामला निपटानेवाले। यह, ‘मामला जल्दी निपटानेवाली बात’ ही मुझे सबसे बड़ी बाधा लगी। मुझे, ‘प्रोफेशनल नालेज’ को एक तरफ सरका कर पहले इसका तोड़ ढूँढना था।

“लोअर कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील करने का आखिरी दिन तेजी से पास आता जा रहा था। मैंने सबको टटोलना शुरु किया। मुकदमे में मेरा नाम सामने आते ही पुलिस अतिरिक्त सजग हो चुकी थी। यह केस जिस तरह से मेरे लिए चेलेंजिंग था, मेरा नाम सामने आने के बाद पब्लिक प्रासीक्यूटर के लिए उससे भी अधिक चेलेंजिंग था। पुलिस की चुस्ती, चौकन्नापन ऐसा कि गवाह तो क्या गवाहों के परिजन भी नजर आने बन्द हो गए। गवाह मिल भी जाते तो उनका न टूटना तय था। केस में कुछ नया कहने, नया पेश करने की गुंजाइश तिनके बराबर भी नहीं। चारों ओर इसी केस के चर्चे। 

“मुझे हर दिन, अपील करने का आखिरी दिन लगने लगा। मैंने केस ले तो लिया लेकिन अब करूँगा क्या? इन डीजे साहब के सामने मेरा पहला केस था। ऐसा कुछ भी करने सोच भी नहीं सकता था जिसकी वजह से मेरे बारे में वे नेगेटिव ओपीनीयन बना लें। कुछ भी नहीं सूझ रहा था। एक बार विचार आया -  मुकदमा लड़ने से इंकार कर दूँ। लेकिन यह भी मुमकिन नहीं था। एकान्त में मैं खुद को ‘साँप छछूूॅूँदर’ वाली पोजीशन में पाता। 

“लेकिन जहाँ चाह, वहाँ राह। मैंने एक रास्ता तलाश लिया। मुझे ‘नालेज’ नहीं ‘स्किल’ से काम लेना होगा। मैंने वही किया। पूरी सुनवाई के दौरान ‘नार्मल एण्ड नेचुरल’ बना रहा। एक बार भी लम्बी तारीख नहीं माँगी। डीजे साहब ने जो कहा, जैसा कहा, वह, वैसा ही माना। मैंने कोई नया सबूत पेश नहीं किया न ही कोई गवाह टूटा। सब कुछ वैसा का वैसा ही रहा जैसा लोअर कोर्ट में था।

“जल्दी ही फैसले का दिन आ गया। डीजे कोर्ट रूम पूरा
भरा हुआ था। मेरे क्लाइण्ट से जुड़े लोग तो गिनती के थे बाकी सब वकील ही वकील। मुझे खबर मिली कि फैसला जल्दी से जल्दी जानने के लिए कलेक्टर और एसपी भी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के पास वाले डाक बंगले पर बैठे हैं। 

“मेरे केस का नम्बर आया। डीजे साहब ने अपना, रिटन डिसीजन पढ़ना शुरु किया। बहुत बड़ा नहीं था। लेकिन जैसे ही अन्तिम पैराग्राफ आया, डीजे साहब रुके। गम्भीर मुद्रा और निराश, थकी आवाज में बोले - ‘अब मैं जो पढ़ने जा रहा हूँ, वह एक फैसला मात्र है, न्याय नहीं (नाऊ व्हाट आई एम गोइंग टू रीड, इज ए मीअर डिसीजन, नाट द जस्टिस)। और उन्होंने बेमन से कुछ इस तरह पढ़ा - ‘लोक अभियोजक, अपराध असंदिग्ध रूप से प्रमाणित नहीं कर सके। न्यायालय के सामने आरोपी को दोष मुक्त करने के सिवाय और कोई चारा नहीं।’ कह कर डीजे साहब उदास मुख-मुद्रा में अपने चेम्बर में चले गए।

“डीजे साहब का जाना था कि कोर्ट रूम में कोहराम मच गया। मानो बम फट गया। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं कामयाब हो गया हूँ। सब हैरान थे। वकील एक के बाद एक मुझे ग्रीट कर रहे थे। मैं धरती पर नहीं था। चारों ओर मैं ही मैं था। अपनी कामयाबी पर मुझे गर्व हो रहा था। 
लेकिन आत्म-मुग्धता में मैंने कल्पना भी नहीं की यह समाप्ति नहीं, शुरुआत है। मेरी जिन्दगी की दशा और दिशा बदलने की शुरुआत। 

“दो दिनों के बाद मुझे डीजे साहब ने शाम को अपने बंगले पर बुलाया। उन्होंने जो कहा, उसका एक-एक शब्द आज, कोई तीस बरस बाद भी मेरे कानों में गूँज रहा है। धीर-गम्भीर आवाज में उन्होंने कहा - ‘तुम मेरे बड़े बेटे की उम्र के हो। तुमने जो कुछ किया उससे मुझे फिक्र हो रही है कि कहीं मेरा बेटा भी ऐसा ही न करने लगे। तुमने जो किया, अच्छा नहीं किया। तुमने अपने अनुभव और ज्ञान का उपयोग किया होता तो मैं तुम्हें वहीं, फैसला सुनाते हुए, कुर्सी से ही बधाई देता। किन्तु तुमने चतुराई बरती। मुझे खुद पर गुस्सा और खीझ हो रही है कि तुम्हारी चतुराई मुझे बहुत देर से समझ में आई। तुमने प्रक्रिया की कमजोरी का फायदा उठाया। जो गवाही एक दिन में पूरी हो सकती थी, तुमने तीन-तीन दिन में पूरी की। बेशक तारीख तुमने वही मानी जो मैंने दी थी। लेकिन तुमने ऐसा क्यों किया, यह मुझे तब समझ में आया जब तुमने, अपनी जिरह यह कह कर समाप्त की कि कोर्ट में पेश किया गया गाँजा वह गाँजा है ही नहीं जो जप्त किया गया था। तुम्हारी इस दलील ने मुझे चौंका दिया था। लेकिन जब गाँजा तुलवाया गया तो वह पौने तीन सौ ग्राम के आसपास निकला, साढ़े तीन सौ ग्राम नहीं। दूसरे लोगों की छोड़ो, खुद मैं ही हक्का-बक्का रह गया। ऐसा कैसे हो गया? यह ऐसा ‘वस्तुपरक तथ्य’ (मटीरीयल फैक्ट) था जिसकी अनदेखी करना मुमकिन ही नहीं था। अब समझ में आया कि हर पेशी पर, गवाह से जिरह करते समय तुम जप्त गाँजे की पोटली खुलवा कर, गाँजे को चुटकी में मसलते हुए गवाह से पूछते थे - ‘क्या यह वही गाँजा है जो जिसकी जप्ती के पंचनामे पर तुम्हारे दस्तखत हैं?’ तो उसका मतलब क्या होता था। तुमने हर पेशी पर, गवाह से की गई हर जिरह में इस तरह चुटकियों से मसल-मसल कर गाँजे की मात्रा कम कर दी। और तुम यह सबित करने में कामयाब हो गए कि जो गाँजा जप्त करने का आरोप है, वह गाँजा तो है ही नहीं। तुमने मुकदमे की नींव ही ढहा दी। लेकिन याद रखो, तुम मुकदमा जरूर जीत गए, जिन्दगी हार गए। वकील जीत गया, वकालात का प्रोफेशन, उसकी पवित्रता  हार गई।’

“मुझे काटो तो खून नहीं। मैं तो इस उम्मीद से आया था कि डीजे साहब जो बधाई कोर्ट में नहीं दे सके वही बधाई मुझे यहाँ मिलेगी। लेकिन यहाँ तो सब कुछ उल्टा हो गया। उन्होंने मेरी चोरी पकड़ ली थी। मुझे लग रहा था मैं अपनी आँखों अपना पोस्टमार्टम होते हुए देख रहा हूँ।

“डीजे साहब रुके नहीं। बोले - ‘जिन्दगी तुम्हारी है। इसे कैसी बनाना, यह तुम ही तय करोगे। लेकिन जिन लोगों को तुम बचा रहे हो वे दुधारे हथियार हैं। वे किसी के सगे नहीं होते। जिस दिन तुम उनकी उम्मीद पूरी नहीं कर पाओगे उस दिन सबसे पहले वे तुम पर ही वार करेंगे। तब तुम्हें कोई नहीं बचा पाएगा। उनकी दी हुई फीस भी किसी काम नहीं आएगी। परसों जिसे तुमने छुड़ाया है, तुम जानते हो वह पूरे समाज के लिए परेशानी बना हुआ है। कभी सोचना कि कितने लोगों की बददुआएँ तुम्हें लगेंगी। सोचना कि उस एक आदमी के कारण कितने लोग अपनी नींद नहीं सो पाएँगे। अभी तुम्हारी शुरुआत है। एक तो जवानी और उस पर कामयाबी। मनमाफिक मिल रहा पैसा अलग। तुम बौरा रहे हो। ये सब मिलकर तुम्हारी जिन्दगी कहीं नरक न बना दें। लोगों की दुआएँ असर करे न करे, बददुआएँ जरूर असर करती हैं। अभी जवान हो। प्रतिभावान हो। मेहनती भी हो यह तो इस केस में मैं देख ही चुका हूँ। अभी पहाड़ जैसी जिन्दगी बाकी है। जिस इलाके का मैं रहनेवाला हूँ, वहाँ कहा जाता है - ‘जैसा खाए धान, वैसा आए भान।’ आज अपराधियों को बचा रहे हो। कल कहीं खुद ही अपराधी न बन जाओ। मैं भगवान से तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा कि तुम्हें सद्बुद्धि दे। अपनी कृपा तुम पर बरसाए। तुम सपरिवार स्वस्थ, सुखी, प्रसन्न, सकुशल रहो। अब जाओ। फिर कभी आने को जी करे, अपना घर समझ कर आ जाना।’

“उसके बाद क्या हुआ, मुझे याद नहीं। मैं कब उठा, कब डीजे साहब के बंगले से निकला, किस रास्ते से, कैसे अपने घर पहुँचा, रास्ते में कौन मिला, किससे जुहार की। मुझे कुछ याद नहीं। उस रात सो नहीं पाया। मेरी शकल और दशा देख कर पत्नी घबरा गई। मुझसे बार-बार पूछे लेकिन मेरे मुँह से बोल नहीं फूटे। फटी आँखों उसे देखूँ। वह भी रात भर सो नहीं पाई। रोए और रोते-रोते अपने ईष्ट-आराध्य को जपती-भजती रही।

अगली सुबह सब कुछ बदला हुआ था। मैंने खुद से वादा किया - अपराधियों के और दोषियों के मुकदमे नहीं लूँगा। स्कूल के दिनों में पढ़ी हुई गाँधीजी की कहानियाँ याद आईं। उन्होंने लिखा था कि वे, पक्षकार के निर्दोष होने की खातरी कर लेने के बाद ही मुकदमा लेते थे।

“उसी क्षण मैंने अपने फैसले पर अमल करना शुरु कर दिया। लेकिन फैसला लेना जितना आसान था, उसे निभाना उससे कई गुना कठिन साबित हो रहा था। शुरु-शुरु में तो कोई विश्वास करने को ही तैयार नहीं हुआ। कई परमानेण्ट क्लाइण्ट गुण्डे-बदमाश नाराज हुए। दो-एक ने तो ‘अंजाम अच्छा नहीं होगा’ की धमकी दी। मुझे बहुत डर भी लगा। लेकिन मैं अपने संकल्प पर कायम रहा। कोई दो-ढाई साल मुश्किल के निकले। रुपये-पैसों की तो कमी नहीं हुई लेकिन फुरसत में बैठना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे स्थिति बदलने लगी। मेरी पहचान बदली तो आनेवाले भी बदल गए। ‘हैलो बॉस’ की जगह ‘जुहार साहेब’, ‘जै रामजी की साहेब’, ‘खुस रहा साहेब’ सुनाई देने लगा। 

“लोग ऐसी बातें भूल जाना चाहते हैं बैरागीजी! लेकिन मैं कुछ भी नहीं भूलना चाहता। एक शब्द भी नहीं। उन डीजे साहब ने मेरी जिन्दगी बदल दी। मेरा चोला बदल दिया। वकीलों की नई फसल को उनका कहा, सुनाता हूँ। उन्हें जो करना हो वे करें। लेकिन मैं मन ही मन खुश होता हूँ। ये जो खुशी मिलती है ना बैरागीजी! उसका आनन्द ही अलग है। आत्मा तृप्त हो जाती है। सच का रास्ता कितना आनन्द देता है, यह कोई मुझसे पूछे।

“अब कहिए बैरागीजी! कैसी लगी मेरी आपबीती? लिखने काबिल है कि नहीं? लिखेंगे? मेरी रिक्वेस्ट है, जरूर लिखिएगा। आपका मन नहीं करे तो भी लिखिएगा। लिखने के बाद मुझे बताईएगा कि आपको आनन्द आया या नहीं। आपको तृप्ति मिली या नहीं।”

मैंने उन्हें हाँ या ना कोई जवाब नहीं दिया। वे ठठाकर बोले - “अब तो यह भी याद नहीं कि इन बीस-तीस बरसों में यह आपबीती किस-किस को, कितनी बार सुनाई। लेकिन हर बार ऐसा ही हुआ - सुननेवाला बोलने की हालत में नहीं रहा। बिलकुल जैसे कि अभी आप हो गए हो। अच्छा! मेरी बात सुनने के लिए धन्यवाद। नमस्कार।”

मैं सन्न था। मन्त्रबिद्ध की तरह। मानो एक जिन्दगी जी गया। देर तक मोबाइल कान पर लगा रहा। उसके बाद सबसे पहला काम जो किया वह आपके सामने है। 

बताइए! इस बात को खुद तक ही रख लेंगे या.........?
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समूहिक नकल: देवासवालों की परीक्षा उज्जैन में

कलवाली अपनी पोस्ट पढ़ते-पढ़ते मुझे अचानक ही पहले तो हैरत हुई, फिर खुद पर गुस्सा आया। मेरे जन्म नगर मनासा का एक गर्व पुरुष ऐसी ही एक ऐतिहासिक कथा का रचयिता बना था। मेरे आग्रह पर अपनी यह कथा-रचना उन्होंने ही सुनाई थी। इस कथा के बारे में उन्होंने अपनी ओर से कभी कुछ नहीं कहा। अखबारों में यह घटना छपी न होती तो मुझे भी मालूम न हो पाती।

इस कथा के नायक थे प्रो. श्री हरीश गुलाटी। 

भारत विभाजन के समय पाकिस्तान से आए कुछ पंजाबी परिवार मनासा में बसे। ‘गुलाटी परिवार’ उन्हीं में से एक है। चार भाइयोंवाले इस परिवार के तीसरे भाई थे प्रो. हरीश गुलाटी। बड़े प्रतिभावान। मुझे उनके बारे में न तब बहुत ज्यादा जानकारी थी न अब है। उनका जन्म 1931 या 1932 में हुआ था। मेरी पीढ़ी ने उन्हें देखा कम, उनके बारे में सुना ज्यादा। वे गणित के प्राध्यापक थे। अनुशासन, निष्ठा और ईमानदारी जैसे विशेषण उनके नाम के अविभाज्य अंग थे। वे जहाँ भी रहे, अलग से पहचाने और पूजे गए। छुट्टियों में मनासा आते तो या तो अपनी पारिवारिक दुकान पर बैठते या घर पर। अत्यधिक मितभाषी। कोई बात दो बार पूछो तो एक बार जवाब मिले। कभी आते-जाते नजर आ जाते तो हम लोग ठिठक कर खड़े हो, एक-दूसरे से कहते - ‘देख रे! वो गुलाटी सर जा रहे हैं।’ उन्हें देख लेना हम लोगों के लिए अतिरिक्त उल्लेखनीय बात होती। 

इस समय मुझे सन् तो याद नहीं आ रहा था किन्तु यह बराबर याद है कि वे वार्षिक परीक्षाओं के दिन थे। एक दिन नईदुनिया में खबर छपी कि देवास के एम.एससी. पूर्वार्द्ध के छात्रों की गणित की परीक्षा फिर से होगी और वहाँ के इन छात्रों को परीक्षा देने के लिए उज्जैन जाना पड़ेगा। कारण बताया गया था - इन छात्रों ने सामूहिक नकल की है। समाचार में उल्लेखनीय बात यह थी कि ये तमाम छात्र परीक्षा देते हुए नहीं पकड़े गए थे बल्कि इनकी उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक ने यह सामूहिक नकल पकड़ी थी। इस प्रकार की यह पहली घटना थी। सो, अगले कुछ दिनों तक लगातार यह घटना अखबारों में जगह पाती रही। देवास के छात्र जगत में तीव्र असन्तोष था। प्रदर्शन, नारेबाजी, ज्ञापनबाजी हुई। राजनेता भी बीच में पड़े किन्तु उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक की तथ्यात्मक विश्लेषणवाली रिपोर्ट के आगे किसी की नहीं सुनी गई और पुनर्परीक्षा उज्जैन में ही हुई।  उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक प्रो. हरीश गुलाटी थे। 

इस समाचार ने हम लोगों के लिए प्रो. गुलाटी को और अधिक महत्वपूर्ण तथा रहस्यमयी बना दिया। परीक्षा हॉल में नकल करते पकड़े जाने के किस्से तो कई सुने थे किन्तु उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचने से सामूहिक नकल करना कैसे मालूम हुआ होगा?

निश्चय ही मेरी तकदीर अच्छी थी कि उन परीक्षाओं के बादवाली छुट्टियों में प्रो. गुलाटी मनासा आए तो दादा से मिलने हमारे घर आ गए। वे दादा से बातें कर रहे थे और मैं उन्हें लगातार देखे जा रहा था। लगातार घूरती आँखें हमें अपनी पीठ पर भी अनुभव हो जाती हैं। मैं तो लगभग सामने ही बैठा उन्हें घूरे जा रहा था। वे तनिक असहज हो गए। दादा से बोले - ‘मुझे पहले इससे बात कर लेने दो।’ मुझे अपने पास बुलाया। मुझे कँपकँपी छूट गई-‘बेटा विश्न्या! आज तो गया काम से!’ 

मैं बहुत दूर नहीं बैठा था। मुश्किल से दो-तीन हाथ दूर। यह दूरी पार करने में मुझे मानो उफनता नाला पार करना पड़ा हो। उन्होंने सस्मित पूछा - ‘क्या बात है? क्या हो गया?’ मेरे गले से घरघराहट सी निकली। वे खुलकर हँस दिए। मुझे अभयदान देते हुए बोले - ‘घबरा मत। बता। क्या बात है?’ बड़ी मुश्किल से मेरे बोल फूटे - ‘वो, कॉपियाँ जाँचने से आपको कैसे मालूम हुआ कि सबने नकल की?’ वे खुश हो गए। बोले - ‘तो इतना घबरा कर क्यों पूछ रहा है? बताता हूँ।’ मेरी साँस में साँस आई।

उन्होंने बताया कि उन्होंने उलटे क्रम से उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनी शुरु की। याने सबसे अन्तिम उत्तर पुस्तिका सबसे पहले। अन्तिम से प्रथम के क्रम से। पाँच-सात कॉपियाँ जाँचते-जाँचते हुए उन्हें यह देख कर हैरत हुई कि एक समीकरण हल करते हुए प्रत्येक बच्चे ने, समीकरण के प्रत्येक चरण की शुरुआत में ‘2‘ का अंक लिखा है। उन्होंने यह क्रम बन्द कर, कापियाँ जाँचने का क्रम बदल दिया। याने प्रथम से अन्तिम की ओर। शुरु की पाँच-सात कॉपियाँ देखते ही उन्हें पूरी बात आईने की तरह साफ हो गई।

सबसे पहलेवाले बच्चे ने समीकरण का अगला चरण बराबर के निशान (=) से शुरु किया था। एक के पीछे एक, नकल करते-करते, बराबर का यह निशान ‘=’ से ‘2’ में बदल गया। 

प्रो. गुलाटी को ‘गुप्त सूत्र’ समझ में आ गया था। एक के बाद एक, उन्होंने सारे सवाल देखे और पाया कि जिस-जिस सवाल में बराबर का निशान (=) था, वह अपना स्वरूप बदलते-बदलते ‘2’ में बदल गया। इसके बाद उन्होंने कॉपियाँ तो एक तरफ रख दीं और सिलसिलेवार उदाहरण देते हुए विस्तृत रिपोर्ट के साथ सारी कॉपियाँ विश्व विद्यालय को इस निर्णायक अनुशंसा सहित लौटा दी कि देवास में यदि यह परीक्षा कराई गई तो विश्व विद्यालय की विश्वसनीयता सन्देह के घेरे में आ जाएगी। इस रिपोर्ट के बाद किसी के बोल नहीं फूटे और देवास के बच्चों की यह परीक्षा उज्जैन में ही हुई।

पूरा किस्सा याद आते ही मैंने अपने कक्षापाठी सखा अर्जुन पंजाबी को फोन लगा कर प्रो. गुलाटी को तलाश किया तो मालूम हुआ कि मनासा का यह गर्व पुरुष अब इस दुनिया में नहीं रहा। मैंने उनका फोटू और कुछ जानकारियाँ चाहीं। अर्जुन ने प्रो. गुलाटी के बेटे राजीव का नम्बर दिया। उससे मालूम हुआ कि प्रो. गुलाटी 1994 में सेवानिवृत्त हो गए थे और 2015 में, 83 वर्ष की उम्र में उन्होंने अन्तिम साँस ली। अर्जुन ने ही प्रिय प्रकाश गुलाटी से कह कर प्रो. गुलाटी का फोटू उपलब्ध कराया। फोटू देख कर मुझे धक्का लगा। मेरे दिल-दिमाग में तो उनकी वही छवि बनी हुई थी - भरा हुआ चेहरा, चमकती काली आँखें, मुस्कुराहट सजाए होठ, मजबूत कद काठी। लेकिन फोटू में इस सबमें से कुछ भी नहीं। मानो इतना ही पर्याप्त नहीं था। बची-खुची कसर चश्मे ने पूरी कर दी। ये मेरे प्रो. गुलाटी तो नहीं हैं।

लेकिन मेरा कष्ट यहीं खत्म नहीं हुआ। अपनी ब्लॉग पोस्टें मैं मनासा के कुछ मित्रों को भेजता हूँ। सामूहिक नकल से जुड़ी दो पोस्टें पढ़ने के बाद भी मनासावाले मेरे किसी मित्र को प्रो. गुलाटी से जुड़ी यह महत्वपूर्ण घटना याद नहीं आई।

‘आँख ओट, पहाड़ ओट’ इसी को कहते होंगे। अपने लिए मैं यही सोच कर राहत तलाश कर रहा हूँ कि मेरी यह पोस्ट पढ़कर मनासा के कुछ लोग शायद प्रो. गुलाटी के बारे में आपस में ही पूछताछ कर लें। 
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सारे परीक्षार्थी जेल में

अफसर कुर्सी पर हो या सेवा निवृत्त, अफसरी की उसकी आदतें नहीं जातीं। कामकाजी दिन हो या छुट्टी का दिन, उसे कोई बहाना मिल जाना चाहिए। खुद तो अपनी आरामगाह में ऐश करता रहता है और बाकी सबको काम पर लगा देता है। वाधवाजी ने मेरे साथ यही किया। सत्रह बरस पहले सेवानिवृत्त हो गए, लेकिन अफसरी नहीं गई। अच्छे-भले रविवार को मुझे काम पर लगा दिया। 

नींद तो रोज की तरह वक्त पर ही खुल गई थी किन्तु उठने को जी नहीं किया। अलसाया हुआ बिस्तर में पड़ा था। दस बजे बाद दिन की शुरुआत की। बारह भी नहीं बजे थे कि फोन घनघनाया। पर्दे पर वाधवाजी का नाम उभरा हुआ था। इन्हें क्या हो गया? ये तो कभी फोन करते नहीं! लपककर फोन उठाया। नमस्कार कर पूछा - ‘आपकी तबीयत तो ठीक है?’ बोले - ‘अच्छा-भला हूँ। ईश्वर की कृपा और आपकी दुआएँ असर किए हुए हैं।’ आयु के चौहत्तरवें बरस में हैं, बीमार हैं लेकिन आवाज वैसी की वैसी - विक्टोरिया कल्दार सिक्के की टनटनाती, कड़क, खनकदार। मैंने पूछा - ‘आज कैसे याद कर लिया?’ बोले - ‘आपने ही उकसाया।’ मैं चकराया। महीनों हो गए इनसे बात किए! जोर से हँसे- ‘सामूहिक नकलवाला  आपका लेख अभी पढ़ा। उसी ने उकसाया।’ मुझे तसल्ली हुई। 

वाधवाजी से कोई बीस-इक्कीस बरस का परिचय है। अपनी किस्म के अनूठे आदमी हैं। नौकरी तो शुरु की थी एक साधारण लिपिक के रूप में लेकिन प्रधान लिपिक, नायब तहसीलदार, तहसीलदार की, पदोन्नति की पायदानें चढ़ते-चढ़ते सेवानिवृत्त हुए अनुभाग दण्डाधिकारी (एसडीएम) के पद से। नियमों, कानून-कायदों की आत्माएँ तक इनकी हाजरी में खड़ी रहें। फाइलबाजी और प्रक्रिया के सारे पेंच इनसे पनाह माँगें। पेचीदा मामले उलझाने में विशेषज्ञ। स्वभाव से मस्तमौला। व्यवहार का आधार ‘जैसा तेरा गाना, वैसा मेरा बजाना’। आप साीधे तो वाधवाजी आपसे भी अधिक सीधे। आप तनिक तिरछे हुए तो वाधवाजी पूरे टेड़े। 
बोले - ‘आपका किस्सा पढ़कर मुझे सुसनेर की आपबीती याद आ गई। मैंने तमाम परीक्षार्थियों को जेल में बैठा दिया था।’ मेरा आलस्य छू हो गया। अब तक चाय ही पी थी। नाश्ते से आगे बढ़कर पूरी खुराक सामने आ गई। मैंने कहा - ‘ऐसा कैसे? बात समझ में नहीं आई। आपको फुरसत हो तो विस्तार से पूरी बात बताइए।’ उसी तरह खनखनाते हुए बोले - ‘यहाँ तो पूरी तरह फुरसत है। आप अपनी देख लो।’ मैंने मौका लपका - ‘लीजिए! मैं भी पूरी तरह फुरसत में हो गया। सुनाइए।’

और वाधवाजी ने कुछ इस तरह आपबीती सुनाई -

यह 1991-92 की बात है। मैं सुसनेर में तहसीलदार था। सुसनेर तब शाजापुर जिले की एक तहसील था। आगर से लगभग तीस किलो मीटर और इन्दौर से करीब डेड़ सौ, एक सौ साठ किलो मीटर दूर। वहाँ राणाजी नाम के एक वकील साहब थे। पूरे इलाके में उनकी तूती बोलती थी। इसी के चलते सुसनेर को ‘राणाजी की सुसनेर’ के नाम से जाना-पहचाना जाता था।

परीक्षाओं के दिन थे। और जगहों की तरह, नकल की शिकायतें यहाँ भी आ रही थीं। चौहान साहब कलेक्टर थे। उनका पूरा नाम याद नहीं। बस! इतना याद है कि वे नीमच या जावद के थे और उनके पिताजी को लोग ‘जापानी वकील साहब’ कहते थे। उन्हें नकलपट्टी पसन्द नहीं थी। उन्होंने पूरे जिले में इस पर नकेल कसने की ठान रखी थी। अपने मनमाफिक नतीजे हासिल करने के लिए वे अपने अधिकारियों को खुल कर काम करने की छूट देते थे। मैं भी पूरी ताकत से इस काम में लगा हुआ था। मुझे तो आप जानते ही हो। जानबूझकर बुरा कभी किसी का किया नहीं लेकिन किसी को यह छूट भी नहीं दी कि मुझे ‘टेकन ग्राण्टेड’ ले ले। दादाओं की तरह पेश आता था। 

उस दिन शनिवार था। मेरी सख्ती से गिनती के लोग नाराज थे जबकि ईमानदार बच्चे और उनके माँ-बाप तो खुश थे। किन्तु आप ही खुद ही कहते हो कि भले लोग चुप रहते हैं और घरों से बाहर नहीे आते। सो, मेरी सख्ती से गिनती के जिन लोगों और बच्चों को असुविधा हो रही थी उन्होंने कुछ और बच्चों को एकट्ठा किया और जुलूस बनाकर, ‘तहसीलदार तेरी दादागीरी, नहीं चलेगी! नहीं चलेगी’ के नारे लगाते हुए आए। मैंने देखा, कोई 60-70 बच्चे चले आ रहे हैं। पुलिस सर्कल इंस्पेक्टर जुलूस के आगे-आगे चल रहा था। बाली सरनेम था उसका। बच्चे तो बच्चे थे। उस उम्र में वे अपना भला-बुरा क्या समझते? उनसे क्या कहना, सुनना? सो मैंने बाली को निशाना बनाया। सबके सामने उसे खूब डाँटा-फटकारा। कुछ गालियाँ भी दीं। वह कुछ भी नहीं समझ पाया कि उसका कसूर क्या था? हक्का-बक्का, परेशान हो मेरा मुँह ताक रहा था। मेरे ऐसे तेवर और बाली की दशा देखकर तमाम बच्चे दहशतजदा हो, बिना किसी के कहे, खुद-ब-खुद चुपचाप बिखर गए। मैं भी चुपचाप अन्दर चला आया। बाली शायद मेरी बात समझ गया था। जब तक हम दोनों सुसनेर रहे, उसने कभी इस बात की शिकायत नहीं की।

जुलूस तो बिखर गया लेकिन बात खत्म नहीं हुई थी। कलेक्टर तक पहुँची। चौहान साहब ने मुझे फोन किया। पूरी बात जानी। फिर पूछा - ‘चाहे जो हो, नकल तो नहीं होगी। बताओ! क्या करना चाहिए और तुम क्या कर सकते हो?’ मैंने कहा कि जहाँ अभी परीक्षा हो रही है वहीं होती रही तो नकल नहीं रुकेगी। परीक्षा की जगह बदली जानी चाहिए। उन्होंने पूछा - ‘तुम करवा सकते हो कहीं और परीक्षा?’ मैं इस सवाल के लिए तैयार था। केवल जवाब ही नहीं सोच रखा था, पूरा एक्शन प्लान भी बना रखा था। जवाब दिया - ‘आज शनिवार है। अगला पेपर सोमवार को है। आप यदि मुझे विशेष सशस्त्र बल (एस ए एफ) का एक-चार (एक हेड कांस्टेबल और चार जवान) का फोर्स दे दें तो मैं दूसरी जगह परीक्षा करा सकता हूँ।’ उन्होंने कहा - ‘फोर्स की कोई दिक्कत नहीं। जितना चाहोगे मिल जाएगा। लेकिन जगह कहाँ से लाओगे?’ मैं पूरी तरह तैयार था। एक सेकण्ड की देर किए बिना बोला - ‘नए जेल की बिल्ंिडग तैयार खड़ी है। उसका उद्घाटन भी नहीं हुआ है। पूरी की पूरी खाली है। वहीं परीक्षा हो जाएगी। जेल का उद्घाटन होगा जब होगा, इस बहाने एक नेक गतिविधि से इसका दरवाजा खुल जाएगा।’ बात सुनकर चौहान साहब बहुत खुश हुए। इतने कि मैं सामने होता तो मेरी पीठ ठोकते। बोले - ‘बहुत बढ़िया विचार है। प्रोसीड।’

इसके बाद मुझे और क्या चाहिए था? शनिवार की रात और रविवार का पूरा दिन मेरे पास था। मैं किसी से कुछ कहता उससे पहले ही सारा किस्सा पूरे सुसनेर में पसर चुका था। मेरा काम बहुत आसान हो गया था। हालत यह हो गई थी कि मैं एक कहूँ तो लोग दो मानने को तैयार। तैयारियाँ कुछ इस तरह हुईं कि रविवार को ही परीक्षा हो जाए।

सोमवार को बच्चे तो बच्चे, झुण्ड के झुण्ड लोग नई बनी जेल की तरफ उमड़ रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो हर कोई जेल में हुई परीक्षा का चश्मदीद गवाह बनना चाह रहा हो। उम्मीद से कहीं ज्यादा शान्ति से परीक्षा पूरी हुई। उसके बाद जब तक मैं सुसनेर रहा तब तक मुझे ‘जेल में परीक्षा करानेवाला तहसीलदार’ के रूप में ही जाना-पहचाना जाता रहा।

वाधवाजी रुक गए। उनके हिसाब से उनकी आपबीती पूरी कही जा चुकी थी। लेकिन मेरे मन का पत्रकार अब भी कुलबुला रहा था। पूछा - ‘किसी पत्रकार ने आपको निपटाया नहीं?’ अचानक कुछ याद आया हो, कुछ इस तरह वाधवाजी बोले - खूब याद दिलाया आपने। यह बात तो मैं तो भूल ही गया था। पत्रकारों ने मुझे खूब घेरा। किसी ने तारीफ की तो किसी ने खुन्नस निकाली। लेकिन अगले दिन अखबारों में समाचार लगभग एक ही हेडिंग से छपा - सारे के सारे परीक्षार्थी जेल में।

अब कुछ भी बाकी नहीं रह गया था। इस पुछल्ले से मुझे वह भी मिल गया था जिसकी ओर वाधवाजी का ध्यान नही नहीं था। मैंने कहा - ‘आपकी आवाज से लग रहा है, आप थक गए हैं। आप हाँफ रहे हैं।’ बरसों का प्रशासकीय अनुभव परिहासपूर्वक बोला - ‘जान रहा हूँ कि आपका काम निकल गया है। चलिए, मैं थका ही सही। मैं भी अपना काम करता हूँ। आप भी अपना काम निपटाइए।’

और हम दोनों ने ठठाते हुए अपना-अपना फोन बन्द कर दिया।
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सामूहिक नकल: दरोगा ने दोस्ती नहीं की

‘बैरागीजी हैं?’

मैं अगले कमरे में बैठकर अपनी लिखत-पढ़त कर रहा था। अपने नाम की हाँक सुन, तनिक ऊँची आवाज में जवाब दिया -‘जी। अन्दर आ जाईए। दरवाजा खुला है।’

वे अदब से अन्दर आए। मुझे नमस्कार किया। मुझे लगा, प्रीमीयम जमा करने आए हैं। मैंने उनकी ओर देखे बिना, लापरवाही से कहा - ‘प्रीमीयम जमा करनी है? बैठिए। पॉलिसी नम्बर दीजिए।’ धीमी आवाज में जवाब आया - ‘नहीं। प्रीमीयम जमा नहीं करनी है। आपसे थोड़ी बात करनी है।’ अब मैंने उनकी ओर देखा। उम्र सत्तर के आसपास। लेकिन चेहरा और कद-काठी पचपन जैसी। सफेद कुर्ता-पायजामा, काला जॉकेट। माथे पर भूरे रंग की टोपी। जेब में दो पेन। दोनों ही स्याहीवाले। हाथों में ‘हंस’ और ‘वीणा’ के मार्च महीने के अंक। 

अपना नाम बता कर बोले - ‘मैं सेवानिवृत्त हायर सेकेण्डरी लेक्चरार हूँ। पास ही के गाँव में रहता हूँ। पढ़ाना मेरा व्यवसाय था। पढ़ने का शौक है। सुबह भोजन कर रोज रतलाम आ जाता हूँ। साहित्यिक रुचिवाले मित्रों, परिचितों से मिल कर, बतिया कर शाम को लौट जाता हूँ। आज एक मित्र के बेटे ने आपका लेख पढ़वाया। बिलकुल वैसे ही एक किस्से का अनुभव मुझे भी है। वही सुनाने आया हूँ। सुन लीजिए और हो सके तो इस पर भी एक लेख लिख दीजिए।’ उन्हें लेकर मेरी सोचने की दिशा और धारणा एक झटके में बदल गई। वे अपने लिए नहीं, मेरे लिए आए थे। मैंने चाय की मनुहार की। सहजता से बोले - ‘बात में थोड़ा समय तो लगेगा ही। बनवा लीजिए। पी लूँगा।’

बिना किसी विस्तृत परिचय और भूमिका के उन्होंने कुछ इस तरह अपना अनुभव बताया।

यह कोई दस बरस पहले की बात है। हायर सेकेण्डरी की वार्षिक परीक्षा में उनकी डयूटी लगी थी। परीक्षा केन्द्र शहर के एक छोर पर स्थित स्कूल में था। इस दो मंजिले स्कूल भवन का मुख्य दरवाजा आम स्कूलों की तरह खूब चौड़ा, चेनल वाला ही था। परीक्षार्थियों की बैठने की व्यवस्था दोनों मंजिलों पर थी। यह स्कूल इनका नहीं था। इसमें ये पहली बार आए थे। योग-संयोग कुछ ऐसा रहा कि यहाँ ये किसी को नहीं जानते थे। 

केन्द्राध्यक्ष द्वारा बताए कमरे में गए तो पाया कि उनका कमरा ठीक चेनल गेट के पासवाला है। समयानुसार परीक्षा की कार्रवाई शुरु हुई। कमरों में प्रश्न-पत्र पहुँचे, बँटे। बच्चों ने अपनी-अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में माथा गड़ाया। सब कुछ शान्त, संयत, नियन्त्रित। 

पाँच-सात मिनिट ही बीते होंगे कि चेनल गेट बन्द होने की आवाज आई। इन्हें अटपटा लगा। जिज्ञासावश गेट तक आए। देखा, चपरासी गेट पर ताला लगा रहा था। इन्हें कुछ समझ में नहीं आया। परीक्षा ड्यूटी का बरसों का अनुभव। किन्तु इस तरह मुख्य दरवाजे पर ताला कभी, कहीं नहीं लगा। चपरासी से पूछा। जवाब मिला - ‘यहाँ ऐसे ही परीक्षा होती है।’ अब कुछ जानने, समझने की जरूरत नहीं रह गई थी। जी कसैला हो गया। डर भी लगने लगा। ऐसा सुना तो जरूर था किन्तु देखा कभी नहीं था। आज न केवल देख रहे थे बल्कि इसका हिस्सा भी हो रहे थे। मन ही मन भगवान का नाम लिया-‘बचाना भगवन्। रिटायरमेण्ट के दो बरस बचे हैं। बुढ़ापा मत बिगाड़ देना।‘ अब इनका ध्यान परीक्षा पर कम, खुद के बचाव पर ज्यादा हो गया।

तकदीर बहुत अच्छी थी कि इनके कमरे में नकल नहीं हो रही थी। लेकिन मनोदशा ऐसी हुई कि हर बच्चा नकल करता नजर आ रहा था। एक-एक पल भारी पड़ रहा था। आज सब राजी-खुशी निपट जाए तो गंगा नहाए। कल, कुछ भी करके अपना केन्द्र बदलवा लेंगे।

कोई डेड़ घण्टा बीता होगा कि मुख्य दरवाजे पर कार रुकने की आवाज आई। फिर, कार की फाटकें खुलने और बन्द होने की। सीढ़ियों पर कुछ लोगों के चढ़ने की आहट हुई। फिर, चेनल खड़खड़ाने के साथ ही किसी ने रोबदार आवाज में आदेश दिया - ‘दरवाजा खोलो।’ चपरासी बहुत दूर नहीं था। लेकिन वह भागकर नहीं आया। आना तो दूर, पहली बार तो उसने मानो आवाज सुनी ही नहीं। पल भर की प्रतीक्षा के बाद चेनल जोर-जोर से खड़खड़ाने के साथ बावाज गूँजी ‘अरे! सुना नहीं? दरवाजा फौरन खोलो।’ इस बार चपरासी भाग कर आया। पूछा - ‘आप लोग कौन हैं?’ बौखलाई हुई आवाज ने बुरी तरह से फटकारते हुए कहा - ‘कौन हैं? समझ में नहीं आता? इंस्पेक्शन टीम आई है। चलो! फटाफट दरवाजा खोलो।’ चपरासी ने हाथ जोड़कर, नम्रतापूर्वक माफी माँगी और पूरी ताकत से केन्द्राध्यक्ष को पुकारा - ‘सर! चाबी दीजिए। गेट खोलना है। इंस्पेक्शन टीम आई है।’ 

होना तो यह चाहिए था कि केन्द्राध्यक्ष पहली मंजिल से कूद कर आते। लेकिन इसके बदले जवाब आया - ‘रुकना जरा! सर बाथरूम गए हैं। आते हैं।’ 

इसके बाद, जो होना था, वही हुआ। केन्द्राध्यक्ष आए। क्षमा याचना करते हुए खुद ताला खोला। कहा-सुनसान इलाके के कारण सुरक्षा की दृष्टि से दरवाजे पर ताला लगाना पड़ा। 

लेकिन इसके बाद वह नहीं हुआ जो इंस्पेक्शन टीम को करना था। निरीक्षण दल के प्रमुख ने निरीक्षण से इंकार कर दिया। कहा-‘अब केन्द्र का नहीं, आपका निरीक्षण करेंगे। वह भी यहाँ नहीं, कलेक्टर के दफ्तर में।’ 

दल प्रमुख ने वहीं, वस्तुस्थिति के विस्तृत ब्यौरे सहित रिपोर्ट बनाई। केन्द्राध्यक्ष के हस्ताक्षर लिए और लिखित में आदेश दिए - ‘उत्तर पुस्तिकाएँ सील कर आप कलेक्टर कार्यालय पहुँचें। अगली कार्रवाई वहीं होगी।’

घटना सुनकर मैंने पूछा - ‘उसके बाद क्या हुआ? केन्द्राध्यक्ष पर कोई कार्रवाई हुई? उन्हें कोई सजा मिली?’ ये बोले - ‘उस वक्त तो मुझे कुछ भी भान नहीं रहा। ड्यूटी के बाद घर जाने के बजाय सीधा जिला शिक्षाधिकारी के पास पहुँचा। पूरी बात सुनाई और साफ-साफ कह दिया कि मैं तो अब वहाँ ड्यूटी नहीं करूँगा। फिर चाहे मुझे बर्खास्त ही क्यों नहीं कर दें। उन्होंने मेरी सुनवाई कर ली। फौरन मेरी ड्यूटी बदल दी।’ मैंने अपनी जिज्ञासा दुहराई तो बहुत खुश होकर बोले - ‘सर! इंस्पेक्शन टीम के प्रमुख ने उस दरोगा की तरह केन्द्राध्यक्ष से दोस्ती नहीं की। उन्होंने पहली ही रिपोर्ट ऐसी बनाई कि केन्द्राध्यक्ष को निलम्बित कर जाँच बैठाई गई जिसमें वो दोषी साबित हुए। सजा के तौर पर उन्हें अपने घर से सैंकड़ों किलोमीटर दूर फेंक दिया गया। उनकी भविष्य की सारी वेतनवृद्धियाँ रोक दी गईं और ऐसी व्यवस्था कर दी गई कि वे फिर कभी परीक्षा केन्द्राध्यक्ष नहीं बन सके।’ 

मैंने देखा, उनके चेहरे पर परम प्रसन्नता व्याप्त है। उनके अनुसार वे दो बातों से बहुत खुश थे। पहली, उन पर कोई आँच नहीं आई और दूसरी, निरीक्षण दल के दरोगा ने दोस्ती नहीं की।

जिस तन्मयता और आत्मपरकता से उन्होंने आपबीती कही यह उसका ही प्रभाव था कि इस बीच कब चाय आई और कब हमने पी ली, हमें पता ही नहीं चला।

सुख और प्रसन्नता के क्षण सचमुच में बहुत तेजी से बीतते हैं।
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पटेल बा की अफीम की तस्करी



वे रतलाम आए तो मुझे तलाश कर, मिलने के लिए बुलाया। मैं हाथ के सारे काम छोड़, भाग कर गया। कम से कम पैंतीस बरस बाद उनसे मिलना जो हो रहा था! हम दोनों की उम्र में अठारह बरस का फासला है-वे 88 बरस के, मैं 70 बरस का। लेकिन इस अन्तर को उन्होंने न तो खुद माना न ही मुझे मानने दिया। परिचय के पहले ही क्षण से मित्रवत् ही मिले और आज जब मिले तब भी उसी भाव से। स्वभाव पर उम्र की छोटी सी खरोंच भी नहीं आ पाई। खूब गर्मजोशी से मिले। खूब बतियाये। बातें करते-करते मुझे, हमेशा की तरह ही पाँच-सात धौल जमाए। वैसे ही झन्नाटेदार, जैसे पैंतीस बरस पहले थे। बातों ही बातों में वह किस्सा भी सुनाया जिसने उनकी ‘पटलई’ को सीमेण्ट-काँक्रीट की मजबूती दे दी थी। 

वे बरसों तक, मन्दसौर जिले की मल्हारगढ़ तहसील के एक समृद्ध गाँव के ‘पटेल’ बने रहे। वे उस जमाने के ‘इण्टर पास’ हैं जिस जमाने में मेट्रिक पास होना ही किसी को दर्शनीय बना देता था। अच्छी-खासी सरकारी नौकरी मिल रही थी लेकिन न तो ताबेदारी (अधीनस्थता)  कबूल न ही बँध कर रहना। सो इंकार कर दिया। परिवार के पास सिंचित जमीन का भरपूर रकबा। खुद को खेती में झोंक दिया। ‘इण्टर पास पेण्टधारी जण्टरमेन’ को खेतों में बुवाई, सिंचाई, निंदाई-गुड़ाई करते देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते।

आज तो नीमच अलग जिला है लेकिन तब वह मन्दसौर जिले का उप सम्भाग (सब डिविजन) हुआ करता था। प्रदेश को, सुन्दरलालजी पटवा और वीरेन्द्रकुमारजी सकलेचा जैसे दो-दो मुख्यमन्त्री देने की पहचान से पहले मन्दसौर जिले की पहचान अफीम के लिए रही है। मध्य प्रदेश में सर्वाधिक अफीम मन्दसौर जिले में ही पैदा होती है। अफीम की खेती वहाँ आज भी एक महत्वपूर्ण ‘सामाजिक प्रतिष्ठा-प्रतीक’ है। आज तो स्थिति लगभग आमूलचूल बदल गई है किन्तु तब माना जाता था कि प्रत्येक अफीम उत्पादक किसान किसी न किसी स्तर पर अफीम तस्करी से जुड़ा हुआ है। 

जैसा कि ‘पटेल बा’ ने बताया, उनका गाँव अफीम उत्पादक गाँवों मे अग्रणी था। नामचीन अफीम तस्कर और उनके कारिन्दे इस गाँव मे अक्सर नजर आते थे। एक बार अफीम का बड़ा सौदा हुआ। गाँव के कई किसान इस सौदे में शरीक थे। पढ़े-लिखे और प्रतिभाशाली होने के कारण पटेल बा को गाँव की ओर से प्रभारी बनाया गया। तय हुआ कि फलाँ तारीख की रात को तस्कर के लोग आकर अफीम की डिलीवरी लेंगे। भागीदार किसानों की अफीम पटेल बा के घर में इकट्ठी की गई। 

एक तो बड़ा सौदा और दूसरे, माथे पर जिम्मेदारी। सो, पटेल बा ने अपने पक्के मकान की छत पर खाट बिछाई। अमावस की रात। माहौल में अफीम की मादक गन्ध। लेकिन पटेल बा की आँखों ने नींद को अनुमति नहीं दी। कभी खाट पर बैठें तो कभी छत पर चहल कदमी करें।

आधी रात होने को आई। तस्कर के कारिन्दों के आने का समय हो चला था। पटेल बा की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। ऐसा काम अब तक छुटपुट स्तर पर ही किया था। इतने बड़े स्तर का पहला मौका था। उनकी आँखें मानो मशालें बन जाना चाह रही थीं। अँधेरे को घूर कर और चीर कर दूर-दूर तक देखने, टोह लेने की कोशिशें जारी थीं।

लेकिन पटेल बा चौंके। दूर से दो जीपों की बत्तियाँ चमकती नजर आईं। यह क्या? यह तो तय नहीं हुआ था! तस्कर के लोग तो मोटर सायकिलों से आनेवाले थे! ये जीपें कैसी? बात समझने में पटेल बा को क्षण भी नहीं लगा। निश्चय ही किसी भेदिये ने पुलिस को खबर कर दी होगी। अब क्या किया जाए? जीपों की घरघराहट और उनकी रोशनी पल-पल बढ़ती जा रही थी। गाँव से उनकी दूरी हर साँस पर कम होती जा रही थी। छापा कामयाब हो गया तो आधे से ज्यादा गाँव पकड़ा जाएगा! क्या किया जाए? 

जैसे किसी आत्मा ने पटेल बा पर अपनी सवारी उतार दी हो इस तरह पटेल बा ने जोर-जोर से चिल्लाना, आवाजें लगाना शुरु कर दिया - ‘डरना मत रे! घबराना मत रे! ये डाकू नहीं हैं। ये तो अपने पुलिसवाले हैं।’ छोटा सा गाँव और कवेलू की छतें। पटेल बा की आवाज गाँव के हर घर में गूँज उठी। जिनकी अफीम थी वे तो पहले से ही अधजगे थे। वे तो पूरे जागे ही जागे, बाकी गाँव भी जाग गया और पटेल बा का मकान मानो पंचायत घर में बदल गया। जिनका ‘माल’ था, वे चीतों की तरह झपटे। अपना-अपना ‘माल’ कब्जे किया। ठिकाने लगा कर वापस पटेल बा के घर पहुँच, भीड़ में शामिल हो गए।

कुछ ही मिनिटों में पुलिस दल पहुँच गया। पूरे गाँव को जमा देख दरोगाजी भन्ना गए। सारा खेल खराब हो चुका था। समझ तो गए थे किन्तु कहते और करते भी क्या? पटेल बा को खरी-खोटी सुनाने लगे। उधर दरोगाजी बिफरे जा रहे इधर पटेल बा मासूम, दयनीय मुद्रा में सफाई दिए जा रहे - ‘क्या गलत किया सा‘ब? डाकू समझ कर गाँव के लोग बन्दूकें चला देते। पता नहीं क्या से क्या हो जाता। मैंने तो आपको और गाँववालों को बचाया सा‘ब! और आप हैं कि मुझे डपटे जा रहे हैं! सच्ची में भलमनसाहत का तो जमाना ही नहीं रहा।’ पूरा गाँव पटेल बा की हाँ में हाँ मिलाता, मुण्डियाँ हिला रहा। दरोगाजी की झल्लाहट देखते ही बनती थी। 

दरोगाजी आखिर कब तक चिल्लाते? जल्दी ही चुप हो गए। पटेल बा ने गाँववालों को डाँटा - ‘अपना आराम छोड़ कर आधी रात को हाकम आए हैं। तुम आँखें फाड़े देख रहे हो! कुछ तो  शरम करो! गाँव का नाम डुबाओगे क्या? हाकम को कम से कम पानी की तो पूछो!’ सुनते ही पूरा गाँव ताबेदारी में जुट गया। फटाफट देसी घी का हलवा बनाया और लोटे भर-भर ‘कड़क-मीठी’ चाय पेश की। 

भुनभुनाते हुए दरोगाजी चलने को हुए तो पटेल बा ने कुछ इस तरह मानो मक्खन में छुरी गिर रही हो, ‘मालवी मनुहार’ की - ‘साब! अब आधी रात में कहाँ जाओगे? गाँववालों के भाग से आपका आना हुआ। रात मुकाम यहीं करो। सवेरे कलेवा करके जाना।’ दरोगाजी तिलमिला उठे। मानो कनखजूरे पर चीनी छिड़क दी हो। चिहुँक कर बोले - ‘रहने दो पटेल! रहने दो। मुँह में आया निवाला तो आधी रात को छीन लिया और सुबह के कलेवे की मनुहार कर रहे हो। तुम्हारी मनुहार का मान फिर कभी रखूँगा। याद रखूँगा और राह देखूँगा। लेकिन तुम भी याद रखना। जब कभी मेरे ठिकाने पर आओगे तो कलेवा तो क्या पूरा भोजन कराऊँगा। वो भी बिना मनुहार के।’

बमुश्किल अपनी हँसी रोकते हुए पटेल बा, नतनयन, दीन-भाव से विनीत मुद्रा में बोले - ‘आप हाकम, हम रियाया। जैसे रखेंगे वैसे रहेंगे हजूर। आप नाराज हों, आपकी मर्जी। अपने जानते तो हमने कोई गुनाह नहीं किया। फिर भी आप सजा देंगे तो भुगत लेंगे हजूर! ग्रीब तो जगत की जोरू होता है। भला हाकम से हुज्जत कर सकता है?’

ठठाकर हँसते हुए पटेल बा ने कहा - ‘आग उगलती आँखों से देखते हुए दरोगाजी ने बिदा ली। उनकी जीपों ने गाँव छोड़ा भी नहीं कि मेरे घर के सामने जश्न मनने लगा। लोगों ने मुझे कन्धों पर उठा लिया। उसके बाद किसी ने गाँव का पटेल बनने की बात सोचना ही बन्द कर दी। नया पटेल तभी बना जब मैंने अपनी मर्जी से पटलई छोड़ी।’

मैंने पूछा - ‘वो सब तो ठीक है लेकिन आपको भोजन कराने की, दरोगाजी की हसरत पूरी होने का मौका तो नहीं आया?’ पटेल बा बोले - ‘दरोगा गुस्सैल जरूर था लेकिन मूरख नहीं। अपनी आँखों देख लिया था कि पूरा गाँव मेरी पीठ पर है। कुछ ही दिनों बाद उसने खुद ही दोस्ती कर ली।’ मैंने शरारतन पूछा - ‘आपके हर काम से दोस्ती कर ली?’ जोरदार धौल टिकाते हुए बोले - ‘पोते का दादा हो गया लेकिन अब तक अक्कल नहीं आई। उस दिन क्या उस बेचारे की फजीहत कोई कम हुई जो आज तू फिर मुझसे उसकी फजीहत कराना चाहता है।?’  

ठठाकर हँसते हुए, टेल बा ने मुझे बाँहों में भर लिया।
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