समूहिक नकल: देवासवालों की परीक्षा उज्जैन में

कलवाली अपनी पोस्ट पढ़ते-पढ़ते मुझे अचानक ही पहले तो हैरत हुई, फिर खुद पर गुस्सा आया। मेरे जन्म नगर मनासा का एक गर्व पुरुष ऐसी ही एक ऐतिहासिक कथा का रचयिता बना था। मेरे आग्रह पर अपनी यह कथा-रचना उन्होंने ही सुनाई थी। इस कथा के बारे में उन्होंने अपनी ओर से कभी कुछ नहीं कहा। अखबारों में यह घटना छपी न होती तो मुझे भी मालूम न हो पाती।

इस कथा के नायक थे प्रो. श्री हरीश गुलाटी। 

भारत विभाजन के समय पाकिस्तान से आए कुछ पंजाबी परिवार मनासा में बसे। ‘गुलाटी परिवार’ उन्हीं में से एक है। चार भाइयोंवाले इस परिवार के तीसरे भाई थे प्रो. हरीश गुलाटी। बड़े प्रतिभावान। मुझे उनके बारे में न तब बहुत ज्यादा जानकारी थी न अब है। उनका जन्म 1931 या 1932 में हुआ था। मेरी पीढ़ी ने उन्हें देखा कम, उनके बारे में सुना ज्यादा। वे गणित के प्राध्यापक थे। अनुशासन, निष्ठा और ईमानदारी जैसे विशेषण उनके नाम के अविभाज्य अंग थे। वे जहाँ भी रहे, अलग से पहचाने और पूजे गए। छुट्टियों में मनासा आते तो या तो अपनी पारिवारिक दुकान पर बैठते या घर पर। अत्यधिक मितभाषी। कोई बात दो बार पूछो तो एक बार जवाब मिले। कभी आते-जाते नजर आ जाते तो हम लोग ठिठक कर खड़े हो, एक-दूसरे से कहते - ‘देख रे! वो गुलाटी सर जा रहे हैं।’ उन्हें देख लेना हम लोगों के लिए अतिरिक्त उल्लेखनीय बात होती। 

इस समय मुझे सन् तो याद नहीं आ रहा था किन्तु यह बराबर याद है कि वे वार्षिक परीक्षाओं के दिन थे। एक दिन नईदुनिया में खबर छपी कि देवास के एम.एससी. पूर्वार्द्ध के छात्रों की गणित की परीक्षा फिर से होगी और वहाँ के इन छात्रों को परीक्षा देने के लिए उज्जैन जाना पड़ेगा। कारण बताया गया था - इन छात्रों ने सामूहिक नकल की है। समाचार में उल्लेखनीय बात यह थी कि ये तमाम छात्र परीक्षा देते हुए नहीं पकड़े गए थे बल्कि इनकी उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक ने यह सामूहिक नकल पकड़ी थी। इस प्रकार की यह पहली घटना थी। सो, अगले कुछ दिनों तक लगातार यह घटना अखबारों में जगह पाती रही। देवास के छात्र जगत में तीव्र असन्तोष था। प्रदर्शन, नारेबाजी, ज्ञापनबाजी हुई। राजनेता भी बीच में पड़े किन्तु उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक की तथ्यात्मक विश्लेषणवाली रिपोर्ट के आगे किसी की नहीं सुनी गई और पुनर्परीक्षा उज्जैन में ही हुई।  उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनेवाले प्राध्यापक प्रो. हरीश गुलाटी थे। 

इस समाचार ने हम लोगों के लिए प्रो. गुलाटी को और अधिक महत्वपूर्ण तथा रहस्यमयी बना दिया। परीक्षा हॉल में नकल करते पकड़े जाने के किस्से तो कई सुने थे किन्तु उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचने से सामूहिक नकल करना कैसे मालूम हुआ होगा?

निश्चय ही मेरी तकदीर अच्छी थी कि उन परीक्षाओं के बादवाली छुट्टियों में प्रो. गुलाटी मनासा आए तो दादा से मिलने हमारे घर आ गए। वे दादा से बातें कर रहे थे और मैं उन्हें लगातार देखे जा रहा था। लगातार घूरती आँखें हमें अपनी पीठ पर भी अनुभव हो जाती हैं। मैं तो लगभग सामने ही बैठा उन्हें घूरे जा रहा था। वे तनिक असहज हो गए। दादा से बोले - ‘मुझे पहले इससे बात कर लेने दो।’ मुझे अपने पास बुलाया। मुझे कँपकँपी छूट गई-‘बेटा विश्न्या! आज तो गया काम से!’ 

मैं बहुत दूर नहीं बैठा था। मुश्किल से दो-तीन हाथ दूर। यह दूरी पार करने में मुझे मानो उफनता नाला पार करना पड़ा हो। उन्होंने सस्मित पूछा - ‘क्या बात है? क्या हो गया?’ मेरे गले से घरघराहट सी निकली। वे खुलकर हँस दिए। मुझे अभयदान देते हुए बोले - ‘घबरा मत। बता। क्या बात है?’ बड़ी मुश्किल से मेरे बोल फूटे - ‘वो, कॉपियाँ जाँचने से आपको कैसे मालूम हुआ कि सबने नकल की?’ वे खुश हो गए। बोले - ‘तो इतना घबरा कर क्यों पूछ रहा है? बताता हूँ।’ मेरी साँस में साँस आई।

उन्होंने बताया कि उन्होंने उलटे क्रम से उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचनी शुरु की। याने सबसे अन्तिम उत्तर पुस्तिका सबसे पहले। अन्तिम से प्रथम के क्रम से। पाँच-सात कॉपियाँ जाँचते-जाँचते हुए उन्हें यह देख कर हैरत हुई कि एक समीकरण हल करते हुए प्रत्येक बच्चे ने, समीकरण के प्रत्येक चरण की शुरुआत में ‘2‘ का अंक लिखा है। उन्होंने यह क्रम बन्द कर, कापियाँ जाँचने का क्रम बदल दिया। याने प्रथम से अन्तिम की ओर। शुरु की पाँच-सात कॉपियाँ देखते ही उन्हें पूरी बात आईने की तरह साफ हो गई।

सबसे पहलेवाले बच्चे ने समीकरण का अगला चरण बराबर के निशान (=) से शुरु किया था। एक के पीछे एक, नकल करते-करते, बराबर का यह निशान ‘=’ से ‘2’ में बदल गया। 

प्रो. गुलाटी को ‘गुप्त सूत्र’ समझ में आ गया था। एक के बाद एक, उन्होंने सारे सवाल देखे और पाया कि जिस-जिस सवाल में बराबर का निशान (=) था, वह अपना स्वरूप बदलते-बदलते ‘2’ में बदल गया। इसके बाद उन्होंने कॉपियाँ तो एक तरफ रख दीं और सिलसिलेवार उदाहरण देते हुए विस्तृत रिपोर्ट के साथ सारी कॉपियाँ विश्व विद्यालय को इस निर्णायक अनुशंसा सहित लौटा दी कि देवास में यदि यह परीक्षा कराई गई तो विश्व विद्यालय की विश्वसनीयता सन्देह के घेरे में आ जाएगी। इस रिपोर्ट के बाद किसी के बोल नहीं फूटे और देवास के बच्चों की यह परीक्षा उज्जैन में ही हुई।

पूरा किस्सा याद आते ही मैंने अपने कक्षापाठी सखा अर्जुन पंजाबी को फोन लगा कर प्रो. गुलाटी को तलाश किया तो मालूम हुआ कि मनासा का यह गर्व पुरुष अब इस दुनिया में नहीं रहा। मैंने उनका फोटू और कुछ जानकारियाँ चाहीं। अर्जुन ने प्रो. गुलाटी के बेटे राजीव का नम्बर दिया। उससे मालूम हुआ कि प्रो. गुलाटी 1994 में सेवानिवृत्त हो गए थे और 2015 में, 83 वर्ष की उम्र में उन्होंने अन्तिम साँस ली। अर्जुन ने ही प्रिय प्रकाश गुलाटी से कह कर प्रो. गुलाटी का फोटू उपलब्ध कराया। फोटू देख कर मुझे धक्का लगा। मेरे दिल-दिमाग में तो उनकी वही छवि बनी हुई थी - भरा हुआ चेहरा, चमकती काली आँखें, मुस्कुराहट सजाए होठ, मजबूत कद काठी। लेकिन फोटू में इस सबमें से कुछ भी नहीं। मानो इतना ही पर्याप्त नहीं था। बची-खुची कसर चश्मे ने पूरी कर दी। ये मेरे प्रो. गुलाटी तो नहीं हैं।

लेकिन मेरा कष्ट यहीं खत्म नहीं हुआ। अपनी ब्लॉग पोस्टें मैं मनासा के कुछ मित्रों को भेजता हूँ। सामूहिक नकल से जुड़ी दो पोस्टें पढ़ने के बाद भी मनासावाले मेरे किसी मित्र को प्रो. गुलाटी से जुड़ी यह महत्वपूर्ण घटना याद नहीं आई।

‘आँख ओट, पहाड़ ओट’ इसी को कहते होंगे। अपने लिए मैं यही सोच कर राहत तलाश कर रहा हूँ कि मेरी यह पोस्ट पढ़कर मनासा के कुछ लोग शायद प्रो. गुलाटी के बारे में आपस में ही पूछताछ कर लें। 
-----


2 comments:

  1. देवास का वह कालेज तो उस क्षेत्र में लंबे समय से बदनाम रहा है नकल के मामले में. एक तरह से प्रसिद्ध. बाहर प्रदेश के लोग इसीलिए वहाँ एडमीशन लेते थे - पास होने के लिए! :)

    ReplyDelete
  2. नकल प्रकरण और अपनी श्रेष्ठता के लिए सागर भी अग्रगण्य रहा है जब मैं ग्रेजुएशन कर रहा था तब नौकरी के विज्ञापन में छपा करता था सागर वि.वि. के छात्र आवेदन न करें।।।।।

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.