चीनी सामान का बहिष्कार याने रुई लपेटी आग
चीनी सामान, देश-भक्ति याने फिक्र का जिक्र
यह मुकदमा जीतना ही चाहिए
लड़ी जा सकनेवाली एक लड़ाई
अब भगतसिंह की बारी है?
चील कह रही है - मैं गोश्त नहीं खाऊँगी
भारत की नई राष्ट्रीय पहचान : अंग्रेजों की चाय
यह ‘रानी’ है - चाय। जिसके बिना हमारी सुबह गुनगुनी नहीं होती, दिन राजी-खुशी नहीं गुजरता और शाम सुरमई नहीं होती। मोण्टेक सिंह अहलूवालिया ने मुदित भाव से, देश को उपकृत करने की मुद्रा में सदाशयतापूर्वक अग्रिम सूचना दी है कि अप्रेल 2013 तक, चाय को भारत का ‘राष्ट्रीय पेय’ घोषित कर दिया जाएगा। देश के संघीय ढाँचे की रक्षा के नाम पर राष्ट्रीय एकता को परे सरकाया जा सकता है और राष्ट्रीय प्रतीक के नाम हमारा राष्ट्र-ध्वज तिरंगा एक बार मतभेद और विवाद का विषय हो सकता है किन्तु इसमें रंच मात्र भी सन्देह नहीं कि चाय हमारी राष्ट्रीय एकता की वास्तविक संवाहक और सच्चा राष्ट्रीय प्रतीक बन गई है। काश्मीर से कन्याकुमारी तक और गौहाटी से चौपाटी तक, समान रूप से उपलब्ध है - चौबीसों घण्टे। ‘अहर्निशं सेवामहे’ की तर्ज पर। छोटे से छोटे गाँव में, राजस्थान की ढाणियों और आदिवासियों के फलियों-टापरों में, पीने का पानी एक बार भले ही न मिले, चाय जरूर मिल जाएगी। भारतीयता भले ही पूरे भारत में नजर न आए, चाय अवश्य नजर आ जाएगी। भारतीय समष्टि में व्याप्ति के मामले में चाय ने तो ईश्वर को भी मात दे दी है। ईश्वर के अस्तित्व को नकारनेवाले नास्तिक भी चाय के आराधक बने मिल जाएँगे। यही बनी है राय, वतन अहवाल की।
एक पिछड़ा, नासमझ राष्ट्रवादी

राष्ट्रवादी होने का मतलब
तो, यह है अपना वास्तविक राष्ट्रीय चरित्र
राष्ट्र और धार्मिक आस्थाओं की बलिवेदी पर अपने प्राण न्यौछावर कर देने की हमारी दम्भोक्तियों की पोल खुल गई है। प्रथमतः तो हमने ऐसी दुहाइयाँ देनी ही नहीं चाहिए (राष्ट्र और धर्म पर प्राण न्यौछावर करने की अपनी मंशा भी भला कोई गर्वोक्ति का विषय है? यह तो हमारा न्यूनतम कर्तव्य है) किन्तु हम देते रहे हैं। चलिए, कोई बात नहीं। बहुत हो गया। यह ठीक समय है कि हम अपनी इस निर्लज्ज मूर्खता का सार्वजनिक घोष अब अविलम्ब बन्द दें।
मैं बार-बार और बराबर कहता रहा हूँ कि हमारे राष्ट्रीय चरित्र की वास्तविक पहचान तो सदैव ही शान्ति काल में होती है। युध्द काल में तो हर कोई न केवल देश भक्त होता है बल्कि उसे होना ही पड़ता है। आज देश में युध्द काल नहीं है और इसीलिए हमारे राष्ट्रीय चरित्र की वास्तविकता, निर्लज्जता की सड़ांध के साथ सड़कों पर बह रही है।
यह बताने वाली बात नहीं है कि अवर्षा, कम पैदावार, सरकार के निकम्मेपन और राजनीतिक स्वार्थ सिध्दि के चलते पूरा देश शकर और दालों के अभाव से जूझ रहा है। देश के 80 प्रतिशत लोग तो आज भी 20 रुपये प्रतिदिन से कम पर जीवन यापन कर रहे हैं। किन्तु, जो मध्यम वर्ग, येन-केन-प्रकारेण अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींच रहा है, उसके लिए भी इन दोनों चीजों को अपने रसोई घर में बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती हो गया है। होना तो यह चाहिए कि ऐसे समय में हम अपनी आवश्यकताओं को कम करें किन्तु घर से बाहर बनाई हुई अपनी हैसियत की रक्षा की चिन्ता और ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसे जुमले हमें अनुशासित नहीं रहने देते। सो, औसत मध्यमवर्गीय परिवार के लिए तो यह स्थिति किसी ‘राष्ट्रीय आपदा’ से कम नहीं है।
ऐसे में सबसे पहले और सबसे बड़ी उम्मीद सरकार से ही होती है। किन्तु सारा देश देख रहा है कि सरकार के मन्त्री अपनी लाचारी सार्वजनिक करने में जुट गए हैं। ऐसे में, खुद समाज की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। आपात स्थितियों में तो लोग अपने, अनाज के कोठार खोल देते हैं। बेशक, स्थिति अकाल की नहीं है किन्तु सामान्य भी नहीं है। असामान्य स्थितियों में हमारा सार्वजनिक आचरण उदार और परस्पर चिन्ता लिए हुए होना चाहिए। किन्तु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत उजागर हो रही है।
सारे देश की बात छोड़ दें, केवल मध्य प्रदेश में ही करोड़ों रुपयों की लाखों क्विण्टल शकर और दाल का अवैध संग्रह बरामद किया गया है। याने, एक ओर लोग इन चीजों को तरस रहे हैं और दूसरी ओर भाई लोग, नियमों, नैतिकता, धार्मिक उपदेशों को ताक पर रखकर मुनाफे की जुगत में आपराधिक ही नहीं, असामाजिक, अमानवीय और ईश्वर के प्रति अपराध तक कर रहे हैं। बड़ी ही आसानी से कह दिया जाएगा कि यह तो व्यापार का हिस्सा है और व्यापार का अन्तिम तथा एकमेव लक्ष्य मुनाफा होता है। सो, यदि मुनाफे के लिए यह सब किया गया तो इसमें गैर वाजिब क्या? किन्तु ऐसा कहना ‘गुनाह बेलज्जत’ के सिवाय और कुछ भी नहीं है। बेशक, व्यापार मुनाफे के लिए ही किया जाता है किन्तु व्यापार का भी अपना धर्म होता है। उसमें जायज और नाजायज जैसे तत्व काम करते हैं। व्यापारिक बुध्दि सदैव ही मुनाफे के लिए पे्ररित करते हुए मनुष्य को लालची बनाती है। यही वह क्षण और स्थिति होती है जब हमारा राष्ट्रीय चरित्र सामने आता है। किन्तु राष्ट्रीय चरित्र तो हमारे लिए केवल समारोहों में, बढ़ चढ़ कर प्रदर्शित करने की वस्तु है, आचरण की नहीं।
अवैध संग्रह के जितने मामले सामने आए हैं उनकी विस्तृत नहीं, सामान्य जानकारियाँ ही बता देंगी कि इनमें लिप्त लोग किसी न किसी राजनीतिक दल से, किसी इन किसी धर्म से, किसी न किसी सामाजिक संगठन से जुड़े होंगे और राष्ट्र पे्रम तथा धर्म की दुहाइयाँ देने में पीछे नहीं रहते होंगे। किन्तु, चूँकि हमारे समाज में ‘होने’ के बजाय ‘दिखना’ अधिक आवश्यक है इसीलिए लालच के मारे और लालच से अन्धे हुए इनमें से एक को भी, लोगों के कष्टों की बात तो छोड़िए, न तो राष्ट्र याद आया और न ही धर्म।
यहाँ मुझे रामचरित मानस की एक चैपाई याद आ रही है -
पर हित सरिस, धरम नहीं भाई।
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।
शकर-दाल के अवैध संग्रहियों को तो कोई ‘पर हित’ भी करना था। वे अपना वाजिब मुनाफा लेकर व्यापार करते। ऐसा कर वे ‘पर पीड़ा’ के अधर्म से बच ही सकते थे। पर ‘वाजिब’ से हमारा काम नहीं चलता। हमारी बुध्दि तो हमें ‘गैर वाजिब’ की ओर धकेलती है। जिन क्षणों और स्थितियों में हमें विवेकवान बनना चाहिए, हम केवल लालची बन कर सामने आते हैं।
सो, हम राष्ट्र और धर्म के लिए प्राण न्यौछावर करने की दम्भोक्तियाँ भले ही करते रहें किन्तु वह सब हमारा दोगलापन, पाखण्ड और आत्म-वंचना है।
यही है हमारा वास्तविक राष्ट्रीय चरित्र।
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वेलेण्टाईन डे का विरोध : एक 'कुविचार'
मेरे लेप टाप की घड़ी के मुताबिक इस समय 12 और 13 फरवरी की दरमियानी रात के दो बजने वाले हैं। ‘ब्लागवाणी’ के जरिए ढेर सारे ब्लागों की सैर की। कुछ पर टिप्पणी की। अचानक ही इस पोस्ट का विषय मन में कौंधा। मुमकिन है कि यह ‘कुविचार’ अथवा ‘कुतर्क’ हो किन्तु अन्ततः इसमें ‘विचार’ और ‘तर्क’ तो है ही। इसलिए इसके साथ तनिक अतिरिक्त सदाशयता और उदारता बरती जाए, यह अनुरोध भी है और अपेक्षा भी।
वेलेण्टाइन डे के विरोध का आधारभूत तर्क है कि यह नितान्त पाश्चात्य अवधारणा है और भारतीयता से इसका कोई तादात्म्य नहीं है। सही है। किन्तु यह एकमात्र ऐसी पाश्चात्य अवधारणा क्यों है जो आँखों में खटक रही है? अनेक पाश्चात्य अवधारणाएँ और परम्पराएँ हमने अत्यन्त उदारतापूर्वक और प्रसन्नतापूर्वक अंगीकर कर रखी हैं-बरसों से। जैसे कि, जन्म दिन पर केक काटना।
केक काटने में पहले, केक पर लगी मोम बत्तियाँ फूँक मार कर बुझाई जाती हैं। इसके ठीक विपरीत, भारतीय परम्परा में तो ऐसे प्रसंगों पर दीप प्रज्ज्वलन किया जाता है। कहाँ है वह परम्परा? और तो और, भारतीयता के ज्वाजल्य प्रतीक पुरुष अटलजी के जन्म दिन पर भी केक काटा जाता है! यही क्यों, अब तो मन्दिरों में भी केक काटे जाने लगे हैं! मेरे बच्चे भी केक काट कर ही अपना जन्म दिन मनाते हैं।
एक और पाश्चात्य परम्परा हम समारोहपूर्वक अंगीकार करने लगे हैं। यह है - रिंग सेरेमनी। भारतीय संस्कार सूची में ‘रिंग सेरेमनी’ कहीं है ही नहीं। हाँ, 'वाग्दान संस्कार' का उल्लेख अवश्य है। लेकिन इसका स्थान अब ‘रिंग सेरेमनी’ ने ले लिया है। मेरे बेटे का ‘वाग्दान संस्कार’ जब सम्पन्न हो रहा था तब ‘रिंग सेरेमनी‘ की आवाज उठी थी। मैं ने सहज भाव से इससे इंकार कर दिया था और कहा था कि भारतीय परम्परा में ‘रिंग सेरेमनी’ नहीं है। मेरी बात तब भले ही मान ली गई थी किन्तु कई लोग अब भी मुझसे खिन्न बैठे हैं और गाहे-बगाहे मुझे उलाहना दे ही देते हैं कि मैं ने एक रस्म पूरी नहीं होने दी।
हाथ मिलाना भी भारतीय परम्परा नहीं है। भारतीय परम्परा में तो अपने ही दोनों हाथ जोड़ कर, यथा सम्भव नत-मस्तक हो, सामने वाले का अभिवादन किया जाता है। लेकिन हम सब देख रहे हैं कि ‘करतल युग्म से नमस्कार’ करें न करें, हाथ अवश्य मिलाते हैं।
हाथ मिलाना पूर्णतः पाश्चात्य परम्परा है जिसका अपना अनुशासन है। इसमें ‘जूनीयर’ केवल ‘विश’ (यथा,गुड मार्निंग गुड नून,) करता है और प्रत्युत्तर में ‘सीनीयर’ हाथ बढ़ाते हुए ‘विश’ का जवाब देते हुए कुशलक्षेम पूछता है-‘हाऊ डू यू डू?’ किन्तु हमने न केवल इस पाश्चात्य परम्परा को प्रेमपूर्वक आत्मसात कर लिया है अपितु इसका भारतीयकरण भी कर लिया है-अब ‘जूनीयर‘ भी मिलते ही तपाक् से अपना हाथ आगे बढ़ा देता है और कोई भी इस ‘अशिष्टता’ का बुरा मानना तो दूर रहा, इसका नोटिस भी नहीं लेता!
नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा भी हमारे लिए एक समारोह मात्र है। इस प्रसंग का उपयोग हम अपनी भारतीयता को याद करने और प्रदर्शित करने के लिए करते हैं और जैसे ही हमारा यह ‘मतलब’ पूरा होता है, हम इसे तत्काल ही भूल जाते हैं। हममें से कितने लोग अपने दैनन्दिन व्यवहार में भारतीय महीनों और तिथियों का उपयोग करते हैं? अपवादों को छोड़ दें तो, कोई नहीं। हम सब ‘ईस्वी’ सन् और तारीखें ही प्रयुक्त करते हैं और ऐसा करते हुए क्षणांश को भी अनुचित, अन्यथा अथवा अटपटा नहीं लगता।
ये तो गिनती की बाते हैं जो मुझे इस समय बिना किसी कोशिश के याद आ रही हैं। कोशिश करने पर ऐसी बीसियों बातें निकाली जा सकती हैं।
फिर, आखिर वेलेण्टाईन डे का ही विरोध क्यों? मुझे सन्देह होने लगा है कि यह विरोध कहीं प्रायोजित अथवा ‘डब्ल्यू डब्ल्यू एफ’ की तरह ‘नूरा कुश्ती’ तो नहीं?
इस दिन कोई आयोजन नहीं होते, कोई समारोह नहीं होते। होने के नाम पर बस, आपस में कार्ड का या भेंट का या फूलों का आदान-प्रदान होता है। ऐसे ‘डे’ और इनके बधाई पत्र भी भारतीय परम्परा का अंग नहीं हैं। किन्तु अनेक विदेशी कम्पनियाँ इनका उत्पादन/व्यापार करती हैं। इस व्यापार के आँकड़े अरबों-खरबों के निकल आएँ तो मुझे ताज्जुब नहीं होगा। यही नहीं, यह आँकड़ा वर्ष-प्रति-वर्ष तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। मुझे सन्देह हो रहा है कि कहीं, इन कार्डों का उत्पादन/व्यापार करने वाली विदेशी कम्पनियाँ ही तो यह विरोध प्रायोजित नहीं करवा रहीं? सन्देह इसलिए भी हो रहा है क्यों कि विरोध करने वाले भाई लोग इन कार्डों का विक्रय करने वाली दुकानों को तो निशाने पर लेते हैं पर इन्हें उत्पादित करने वाली फैक्ट्रियों की तरफ देखते भी नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘वहाँ’ न देखने की एवज में ‘पार्टी फण्ड’ मिलता हो और यहाँ ‘देख लेने’ के नाम पर वसूली हो रही हो?
वेलेण्टाईन डे का विरोध करने वालों का विरोध करने के लिए अब गुलाबी चड्डियाँ भेजे जाने का क्रम चल पड़ा है। भारतीय समाज में ‘चड्डी’ कभी भी विरोध का प्रतीक अथवा माध्यम नहीं रही। यह भी पूरी तरह से पाश्चात्य प्रतीक और परम्परा है। इसके उत्पादन और व्यापार में भी विदेशी कम्पनियाँ अग्रणी हैं। कहीं यह अभियान भी तो प्रायोजित नहीं?
मुझे तो इस सबके पीछे कोई ‘विशेषज्ञ’ (मैं ‘माहिर’ और ‘शातिर’ जैसे विशेषण प्रयुक्त करने से बचना चाह रहा हूँ) ‘मानव मनोविज्ञानी मस्तिष्क’ अनुभव हो रहा है। सामान्य मनुष्य प्रकृति के अधीन ‘निषेध सदैव ही आकर्षित करते हैं।’ सो, इसी मनुष्य प्रकृति का ‘वाणिज्यिक उपयोग’ करने के लिए, वेलेण्टाईन डे का विरोध करवाया जा रहा हो ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा इसकी ओर आकर्षित हों, (और विदेशी कम्पनियों को मालामाल करने के लिए) ज्यादा से ज्यादा बधाई पत्र, भेंट दी जाने वाल वस्तुएँ खरीदें। इसे ‘दबाने पर गेंद और ज्यादा उछलती है’ या फिर ‘न्यूटन के गति नियमों’ के अनुसार ‘किसी भी क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है’ भी कहा जा सकता है।
अब ‘विरोध का विरोध’ भी चड्डियों के जरिए हो रहा है। मुझे तो यह भी ‘फारेन गुड्स की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी’ ही अनुभव हो रही है और प्रायोजित या कि ‘नूरा कुश्ती’ ही लग रही है।
आधी रात को मन में उठी इन बातों का मेरे पास न तो कोई आधार है और न ही कोई तथ्यात्मक प्रमाण। ‘यही सही है’ यह कहने की स्थिति में मैं बिलकुल ही नहीं हूँ। किन्तु ‘यह सही क्यों नहीं हो सकता?’ जैसा सवाल, इस समय तो मुझे मथ ही रहा है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि भारतीयता की रक्षा के नाम अपने ही लोग अपने ही लोगों को पीट रहे हैं और जेबें भर रहे हैं विदेशियों की?
मुझे किसी की नीयत पर सन्देह नहीं है। किन्तु सन्देह के बीज को अंकुरित होने के लिए न तो उपजाऊ जमीन की आवश्यकता होती है और न ही खाद-पानी की। फिर, जयचन्द और मीर जाफर जैसे नाम, ऐसे क्षणों में न चाहते हुए भी मन में उठने लगें और ‘विश्वामित्र-मेनका’ जैसे प्रसंग आँखों के सामने नाचने लगें तो ऐसे ‘कुविचार‘ और ‘कुतर्क’ सच अनुभव होने लगें तो आश्चर्य नहीं।
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लो जी! मैं उकस गया
कल वाली मेरी पोस्ट राष्ट्र बनाम ‘माँ’ और ‘वार वनीता’ पर मायोपिकजी की टिप्पणी नहीं आती तो सच मानिए मेरी दशा उस महिला जैसी हो जाती जिसने नई, मँहगी, भारी-भरकम बनारसी साड़ी पहनी हो और कोई उससे यह भी न पूछे-‘साड़ी नई है? कितने की है?’
सो, सबसे पहले मायोपिकजी को अन्तर्मन से धन्यवाद और आभार। यदि वे ‘अपनीवाली’ पर नहीं आते तो मुझे यह सब कहने का निमित्त कैसे मिलता?
मैं कांग्रेसी हूँ या नहीं इसकी सफाई व्यर्थ होगी (क्योंकि मायोपिकजी ने मेरी सारी पोस्टें थोड़े ही पढ़ी हैं?) किन्तु यह कहना जरूरी है कि मैं बरसों 'शाखा' में गया हूँ, खूब 'दक्ष-आराम' किया है और ‘धरम पर मरना सीखा है, धरम से कैसे हट जाएँ’ तथा ‘भारत के वीरों जागो, सोये सितारों जागो’ जैसे समवेत गीतों में अपना कण्ठ मिलाया है।
‘संघ’ की अनेक ‘परोक्ष विशेषताएँ’ मेरे लिए सदैव आकर्षण का विषय। रहीं उनमें से चार मुझे महत्वपूर्ण लगीं। पहली : जिस काम के लिए दूसरों को वर्जित करो वही काम दबंगता से खुद करो किन्तु हाँ, अकेले मत करो, सामूहिक रूप से करो और दबदबा बनाते हुए करो ताकि तत्काल प्रतिरोध, प्रतिवाद और प्रतिकार करने का साहस कोई नहीं जुटा पाए। दूसरी : स्ववर्जित काम करते हुए पकड़े जाओ तो जोर-जोर से कहो कि वह काम मैं ने किया ही नहीं, लोग झूठ बोल रहे हैं। तीसरी : फिर भी लोग न मानें और बात बनती न दिखाई दे तो अपने विरोधी की वैसी ही गलती बताओ और उसे दलील बना कर अपनी गलती का औचित्य साबित करो। चौथी : ऐसा करते समय यह विशेष ध्यान रखो कि वृत्ति का हवाला मत दो, व्यक्ति का हवाला दो क्योंकि लोग वृत्ति को नहीं जानते, व्यक्ति को जानते हैं। (संघ के विरोधी इस तरीके को ‘व्यक्तित्व हनन‘ अथवा ‘चरित्र हनन’ करना कहते हैं।)
मायोपिकजी की राजनीतिक प्रतिबध्दता मुझे नहीं पता किन्तु वे संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक की तरह व्यवहार करते दिखाई दे रहे हैं और यही भूमिका निभाते हुए उन्होंने इन्हीं विशेषताओं का सहारा लिया। उनकी ट्रेनिंग सफल रही। बधाई।
मैंने अपनी पोस्ट में किसी का नाम नहीं लिया किन्तु मायोपिकजी को शायद समस्त सम्बन्धितों के नाम नजर आ गए। ऐसा ही होता है। आदमी सारी दुनिया से अपने पाप छुपा ले, अपने आपसे नहीं छुपा पाता और ऐसे में यदि कोई किसी और की बात करे तो भी उसे अपना ही उल्लेख अनुभव होता है।
मायोपिकजी ने किन्हीं कांग्रेसी मिनिस्टर किरण चौधरी द्वारा, राष्ट्रीय शोक काल में सूरजकुण्ड मेले का रंगारंग उद्घाटन का उल्लेख कर मुझे ‘उकसाते’ हुए पूछा है कि मैं चौधरीजी पर कब लिख रहा हूँ। नेक काम में देरी कैसी? लो जी! लिख दिया। फौरन। किरण चौधरी कोई ‘पवित्र गाय’ नहीं है जो राष्ट्रीय शोक काल में उत्सव मनाने के अपराध से मुक्त हो जाएँ। वे कांग्रेसी हों या कोई और, अपराध तो अपराध है। उनकी सजा भी वही जो मध्य प्रदेश के ‘संघियों’ की। अब मायोपिकजी की बारी है। वे बताएँ कि मध्यप्रदेश के संघियों को कब सजा दिलवा रहे हैं ताकि किरण चौधरी को सजा दिलवाने का उपक्रम शुरु किया जा सके?
लेकिन किरण चौधरी में और मायोपिकजी की जमात में एक मूलभूत अन्तर है। किरण चौधरी की जमात के लोग राष्ट्रवाद की ठेकेदारी नहीं करते। वे संस्कृति, नैतिकता, ईमानदारी, सदाचार और ऐसी ही तमाम बातों की दुहाइयाँ नहीं देते। वे अपनी गरेबान में भले ही न झाँकते हों किन्तु दूसरों की गरेबान पर भी नजर नहीं डालते। वे 'सोशल पुलिसिंग' भी नहीं करते। वे ‘भारतीय संस्कृति’ की दुहाई देकर महिलाओं को सड़कों पर नहीं पीटते। जो काम वे खुद करते हैं वे काम दूसरे करें तो आपत्ति नहीं उठाते।
इसके ठीक विपरीत संघ परिवारी वह सब करते हैं जिसके लिए वे दूसरों को मना करते हैं। वे ईमानदारी की दुहाई देते हैं और उनके आनुषांगिक संगठन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कैमरे के सामने 'मिठाई' के निमित्त प्रसन्नतापूर्वक रिश्वत लेते हैं। ‘हिन्दुओं की घर वापसी’ का अभियान चलाने वाले उनके जन-नायक, 'पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा कसम, खुदा से कम भी नहीं' कहते हुए नोटों की गड्डियाँ लेने में न तो देर करते हैं और न ही संकोच। वे ‘चरित्र’ की दुहाइयाँ देते हैं और उनके स्वयंसेवक, रंगरेलियाँ मनाते हुए 'मादरजात' अवस्था में पकड़े जाते हैं।
किसी गरीब हिन्दू की बेटी यदि किसी मुसलमान से प्रेम कर बैठे तो समूचे हिन्दुत्व पर संकट आ जाता है लेकिन खुद आडवाणी की सगी भतीजी एक मुसलमान के बच्चों की माँ बनी हुई है, इसका जिक्र नहीं करते। सुना तो यह भी है कि भाजपा के कम से कम दो मुसलमान नेताओं (उनमें से एक तो भूतपूर्व केन्द्रीय मन्त्री बताए जाते हैं) की वंश बेल बढ़ाने का पुण्य कार्य भी हिन्दू स्त्रियों के ही खाते में जमा है जिस पर एक भी ‘हिन्दू धर्म रक्षक संघी’ को आज तक आपत्ति नहीं हुई है।
वे इसाई मिशनरी संचालित स्कूलों को इसाईयत के प्रचार केन्द्र और धर्मान्तरण के कारखाने कहते हैं लेकिन मेरे शहर में आ जाइए, आपको ऐसे बीसियों ‘हिन्दू वीरों’ के दर्शन करा दूँगा जो सवेरे तो 'शाखा' में जाते हैं और दोपहर में अपने बच्चों या पोतों/पोतियो को लेने के लिए कान्वेण्ट स्कूल के सामने प्रतीक्षारत खड़े हैं। ‘संघ’ के कुछ 'निष्ठावान स्वयंसेवकों' ने, ‘धर्मान्तरण के ऐसे कारखानों’ में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए मुझसे सिफारिश कराई है।
‘संघ परिवारी’ आज भी 6 दिसम्बर को ‘हिन्दू शौर्य दिवस’ के रूप में मनाते हैं। इसी दिन बाबरी मस्जिद का ध्वंस, सुनियोजित तरीके से किया गया था। लेकिन मजे की बात यह है कि ‘छोटे सरदार’ से लेकर मेरे मोहल्ले के छुटभैया स्वयंसेवक तक, एक भी ‘हिन्दू नर पुंगव’ इस ‘शौर्य’ की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। सब के सब एक स्वर में कहते हैं - ‘‘हिन्दू शौर्य दिवस का कारण बना ‘बाबरी मस्जिद ध्वंस’ मैं ने नहीं किया।’’ अपनी-अपनी जमानत का जुगाड़ सबकी जिन्दगी और मौत का सबब बन गया-हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व गया भाड़ में। श्रेय लेने के लिए 'शूर वीर' हैं और जिम्मेदारी लेने के नाम पर 'शिखण्डी' को शर्मिन्दा कर दें। ये न तो बाप का नाम बताते हैं और न ही श्राध्द करते हैं। ये सबके सब मादा हैं, यह जानने के लिए इनकी पूँछे उठाकर देखने की भी जरूरत नहीं रखी भाई लोगों ने।
लेकिन मैं यह सब क्यो कह रहा हूँ? यह सब ही नहीं, इसका करोड़ गुना अधिक तो खुद मायोपिकजी को मालूम है-वह सब भी, जो दुनिया को नहीं मालूम। लेकिन यह सब नहीं कहता/लिखता तो मायोपिकजी निराश हो जाते, मुझे उकसाने का उनका उपक्रम अपूर्ण रह जाता।
सो, मायोपिकजी शायद अब अनुभव करें कि जिस जमात की सरपरस्ती वे उत्साह के अतिरेक की सीमा तक करते हैं उस जमात के बन्दे भी औसत मनुष्य ही हैं-देवता नहीं। उनमें भी वे तमाम कमजोरियाँ हैं जो बाकी सबमें हैं। उनकी जमात के लोग भी बाकी सब लोगों की तरह रिश्वत लेते-देते हैं, टैक्स चुराते हैं, नम्बर दो में खरीद-बिक्री करते हैं, यातायात के नियमों का उल्लंघन करते हैं, लोक भय के अधीन एक सामान्य व्यक्ति जितना चरित्रवान रह पाता है, उतने ही चरित्रवान वे भी रह पाते हैं, अपने स्वार्थ के लिए बिना सोचे, अपने सम्पूर्ण आत्म विश्वास से झूठ बोल लेते हैं, पाखण्ड करने में तो उनका कोई सानी है ही नहीं।
इसलिए, हे! राष्ट्रीयता के ठेकेदारों के सरपरस्त श्रीमान् मायोपिकजी! मुद्दे की बात यह है कि आप और आपकी जमात के लोग जिस सहजता से पैमानों का दोहरीकरण कर रहे हैं, उस पर पुनर्विचार कीजिए। राष्ट्रीयता की दुहाई आप बेशक दें किन्तु अपनी बारी आने पर उस दुहाई को याद रखें। आप लोगों की ऐसी ही हरकतों के कारण ‘संघ’ को लांछन और आरोप झेलने पड़ रहे हैं। राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान कोई भी करे, अपराध है। कोई कांग्रेसी है या संघी, इस आधार पर वह अपराध मुक्त नहीं होता।
दूसरों के अपराध को बचाव की दलील की तरह प्रयुक्त करने से आप निर्दोष नहीं हो जाते। उनके उन तमाम अपराधों को गिनवा कर तथा लोगों को वैसे अपराधों से मुक्ति दिलाने का वादा कर आप सत्ता में आते हैं तो आपकी यह न्यूनतम जिम्मदारी (मेरी हिम्मत देखिए कि मैं आपसे ‘जिम्मेदारी’ की उम्मीद करने लगा!) होती है कि आप वैसी कोई गलती नहीं करें। यदि दूसरों के अपराध के आधार पर आप अपराध करने की सुविधा और छूट लेना चाहते हैं तो फिर पुराने वाले ही क्या बुरे थे? लोगों ने उन्हें हटाया ही क्यों? उस दशा में तो फिर उन्हें ही चुना जाना चाहिए था-वे आपसे अधिक ‘अनुभवी अपराधी’ जो थे!
इसीलिए अपनी कल वाली पोस्ट की अन्तिम बात फिर कह रहा हूँ। यदि आप चाहते हैं कि आपकी ‘माँ’ को सारी दुनिया ‘देवी’ माने और उसकी पूजा करे तो इसकी शुरुआत आपको ही करनी पड़ेगी। यह बिलकुल नहीं चलेगा कि आप तो अपनी माँ के साथ ‘वार वनीता’ जैसा व्यवहार करें और चाहें कि बाकी सब उसे देवी मानें और पूजा करें।
यह न तो सम्भव है और न ही उचित।
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राष्ट्र बनाम ‘माँ’ और ‘वार वनीता’
पुलिसवालों के बीच एक कहावत अत्यधिक लोकप्रिय ही नहीं है, वे इसे अपनी सफलता का मूल-मन्त्र भी मानते हैं। कहावत है-‘काम मत कर, काम की फिक्र कर, फिक्र का जिक्र कर। तेरा प्रमोशन पक्का।’
संघ परिवार की गतिविधियाँ देख कर लगता है कि या तो उसने पुलिसवालों की इस कहावत को अपना भी आदर्श बना रखा है या फिर पुलिसवालों ने यह आदर्श, संघ परिवार से ग्रहण किया है।
भोपाल के, इसाई मिशनरी संचालित एक स्कूल में घुसकर अ.भा.वि.प. कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ कर दी। गणतन्त्र दिवस समारोह में, इस स्कूल के प्राचार्य ने, ध्वजारोहण के बाद, राष्ट्रगीत शुरु करने वाले एक अध्यापक को बीच में ही रोक दिया था। अ.भा.वि.प. के कार्यकर्ता, प्राचार्य के इस 'अनुचित और राष्ट्र विरोधी आचरण' से उत्तेजित थे। तोड़फोड़ करने वालों में, बजरंग दल के कार्यकर्ता भी शरीक हो गए। पुलिस ने प्राचार्य को गिरतार किया जिसे बाद मे जमानत पर छोड़ दिया गया।
राष्ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की चिन्ता तो की ही जानी चाहिए और ऐसा करना निस्सन्देह प्रशंसनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है। किन्तु ऐसा, प्रत्येक अवसर पर समान रूप से किया जाना चाहिए। याने, पैमाने दोहरे नहीं होने चाहिए।
गणतन्त्र दिवस के आयोजनों में, मध्य प्रदेश में दो स्थानों पर, भाजपा पार्षदों और पदाधिकारियों ने राष्ट्रध्वज के स्थान पर पार्टी का झण्डा फहरा दिया। एक भी संघ परिवारी ने इस पर कार्रवाई करना तो कोसों दूर की बात रही, इसका नोटिस भी नहीं लिया। इसके विपरीत, भाजपाइयों के इस आचरण का बचाव किया गया और इस आचरण का औचित्य प्रतिपादित किया गया। भोपाल के, इसाई मिशनरी संचालित स्कूल के प्राचार्य का आचरण यदि राष्ट्र विरोधी था तो, राष्ट्रीय ध्वज के स्थान पर पार्टी ध्वज फहराना राष्ट्र विरोधी क्यों नहीं है?
भूतपूर्व राष्ट्रपति वेंकटरमण के निधन के कारण देश में सात दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। किन्तु इसी अवधि में कटनी के एक स्कूल के वार्षिकोत्सव में फिल्मी गीतों पर नृत्यों सहित रंगारंग कार्यक्रम आयोजित हुए। इस आयोजन में भाजपा विधायक मुख्य अतिथि थे तथा स्थानीय निकायों के पदों पर आसीन भाजपाई प्रमुखता से उपस्थित थे। लोगों ने इस पर जब आपत्ति ली तो अपनी गलती स्वीकार करने के स्थान पर पचासों ‘किन्तु-परन्तु’ के साथ इस सबका औचित्य प्रतिपादित किया गया।
राष्ट्रीय शोक की इसी अवधि में, सिवनी जिले की पेंच वेली में, सरकारी स्तर पर ‘मोगली महोत्सव’ ससमारोह आयोजित किया गया। इस पर आपत्ति उठाई गई तो इसका भी बचाव किया गया।
राष्ट्रीय सम्मान के पैमाने सभी मामलों में, सभी स्थानों पर समान होते हैं। किन्तु संघ परिवार इस मामले में जो दोहरापन अपना रहा है उससे वह आज भले ही खुश हो जाए किन्तु अन्ततः यह न केवल संघ परिवार के लिए अपितु समूचे राष्ट्र के लिए अत्यधिक घातक होगा।
व्यक्ति उसकी बातों से नहीं, आचरण से जाना जाता है। राष्ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को लेकर संघ परिवार का आचरण ईमानदार नजर नहीं आता। वह इस सम्मान को अपने आचरण में उतारने के बजाय इसे अपनी चिन्ता का विषय और अपनी इस चिन्ता के सार्वजनिक प्रकटीकरण को (पुलिसिया कहावत को चरितार्थ करता हुआ) अपना अन्तिम विषय तथा लक्ष्य बनाता हुआ नजर आ रहा है। कथनी और करनी में 180 डिग्री का यह अन्तर संघ परिवार की मंशा पर प्रश्न चिह्न लगाता है।
‘चिन्ता’ यदि ‘आचरण’ में नहीं बदलती है तो वह ‘पाखण्ड’ हो जाती है।
अपने आनुषांगिक संठन ‘भाजपा’ के जरिए संघ आज यदि सत्ता में है तो राष्ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के सन्दर्भ में उसकी जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। किन्तु वह जिम्मेदार होने के स्थान पर ‘पद-मदान्ध’ होकर उच्छृंखल आचरण करता नजर आ रहा है। वह 'वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति' उक्ति को चरितार्थ करता दिखाई दे रहा है और राष्ट्र तथा राष्ट्रीय सम्मान के लिए पैमानों का दोहरीकरण कर रहा है। वह चाह रहा है कि दूसरे तो राष्ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों का समुचित सम्मान करे किन्तु उसे इस मामले में मनमानी करने की सुविधा मिले।
दूसरों को सुधारने के प्रयत्नों में सफलता सदैव संदिग्ध ही रहती है जबकि खुद को सुधारने के प्रयत्नों में सफलता असंदिग्ध तथा सुनिश्चित होती है।
संघ परिवार यदि सचमुच में राष्ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की चिन्ता करता है तो उसकी ईमानदारी लोगों को अनुभव भी होनी चाहिए। वर्ना परिदृश्य पर अभी तो स्थिति ‘भटजी भटे खाएँ, औरों को परहेज बताएँ’ वाली अनुभव हो रही है।
अपनी माँ के प्रति आपका व्यवहार तो ‘वार वनीता’ जैसा हो और आप चाहें कि बाकी सारी दुनिया उसे देवी की तरह पूजे।
क्या यह सम्भव है? और उससे भी पहले, क्या यह उचित है?
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