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चीनी सामान का बहिष्कार याने रुई लपेटी आग

देश में इन दिनों उग्र राष्ट्रवाद और कट्टर धर्मान्धता की अफीम का समन्दर ठाठें मार रहा है। भ्रष्टाचार और कालेधन का खात्मा न होना, बढ़ती बेरोजगारी, स्कूलों-कॉलेजों में दिन-प्रति-दिन कम होते जा रहे शिक्षक, घटती जा रही चिकित्सा सुविधाएँ, किसानों की बढ़ती आत्महत्याएँ जैसे मूल मुद्दे परे धकेल दिए गए हैं। असहमत लोगों को देशद्रोही घोेषित करना और विधर्मियों का खात्मा मानो जीवन लक्ष्य बन गया है।

लेकिन सब लोगों को थोड़ी देर के लिए मूर्ख बनाया जा सकता है। कुछ लोगों को पूरे समय मूर्ख बनाए रखा जा सकता है। किन्तु सब लोगों को पूरे समय मूर्ख नहीं बनाए रखा जा सकता। 

जून और जुलाई के पूरे दो महीने मैं फेस बुक से दूर रहा। गए कुछ दिनों से सरसरी तौर पर देखना शुरु किया। इसी क्रम में राजेश कुमार पाण्डेय की एक पोस्ट नजर आई। घटना सम्भवतः बस्ती (उत्तर प्रदेश) की है। यह पोस्ट मैंने भी साझा की। उसके तीन स्क्रीन शॉट यहाँ दे रहा हूँ। इनमें पूरी पोस्ट पढ़ी जा सकती है। सारी बात अपने आप में स्पष्ट है। अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती।



लोग समझ तो शुरु से रहे थे और समझ रहे हैं लेकिन बोल कोई नहीं रहा था। अब लोगों ने बोलना शुरु कर दिया है। लोग ही क्यों? बोलना तो भाजपा सांसदों ने भी शुरु कर दिया है। यह अलग बात है कि वे चुप रह कर बोल रहे हैं। संसद के सदनों में अपने सांसदों की अनुपस्थिति से खिन्न प्रधान मन्त्री मोदी दो-दो बार उन्हें चेतावनी दे चुके लेकिन अनुपस्थिति का क्रम बना रहा। स्थिति यहाँ तक आ गई कि मोदी को धमकी देनी पड़ी - ‘2019 में देख लूँगा।’

यह सब देख-देख कबीर का एक दोहा बरबस ही याद आ गया। कबीरदासजी से क्षमा याचना सहित, उसमें ‘पाप’ को विस्थापित कर, ‘साँच’ का उपयोग कर रहा हूँ -

साँच छुपाए ना छुपे, छुपे तो मोटा भाग।
दाबी-दूबी ना रहे, रुई लपेटी आग।।

सच सामने आ रहा है। सच हमेशा ताकत देता है। इसी का असर है कि सच लोगों की जबान और सर पर चढ़कर बोलने लगा है। 

सत्य तो सनातन से परीक्षित है। झूठ को ही खुद को साबित करना पड़ता है। परास्त तो अन्ततः झूठ को ही होना है। तब तक सत्य को छोटे-छोटे संकट झेलते रहने पड़ेंगे।
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चीनी सामान, देश-भक्ति याने फिक्र का जिक्र

हम प्रतीकीकरण के चरम समय में जी रहे हैं। पाखण्ड और प्रदर्शन ने आचरण को खारिज कर विस्थापित कर दिया है। देश-भक्ति इस पाखण्ड प्रदर्शन का सर्वोत्कृष्ट, श्रेष्ठ-उपयोगी और श्रेष्ठ परिणाम देनेवाला तत्व बन गया है। चोरी-कालाबाजारी करो, गरीबों को लूटो, सेक्स रेकेट चलाओ, देश के विरुद्ध जासूसी करो, संविधान की भावनाओं की हत्या करो लेकिन यदि वन्दे मातरम् का नारा लगा दिया तो आप प्रशंसनीय और अनुकरणीय देश भक्त हैं। आप ईमानदारी से देश के सारे कानून मान रहे हैं, सपने में भी देश का अहित नहीं सोचते, संविधान को अपने धार्मिक ग्रन्थ की तरह मानकर उसकी भावनाओं, उसके निर्देशों का पालन करते हैं लेकिन वन्दे मातरम् नहीं कह पाते हैं तो आप देशद्रोही हैं, आपने खुद को पाकिस्तान भेजे जाने की पात्रता हासिल कर ली है।

कोई बीस-बाईस बरस पहले एक सज्जन ने सुनाया था - ‘काम मत कर। काम की फिक्र कर। फिक्र का जिक्र कर। तेरा प्रमोशन पक्का।’ देशभक्ति के नाम पर आज यही हो रहा है। 

पहली अगस्त से देश में एक अभियान शुरु हुआ है - चीनी सामान का बहिष्कार करने का। वस्तुतः यह इस अभियान का दूसरा भाग है। पहला भाग गत वर्ष दीपावली पर सम्पन्न हुआ था। तब हमने चीन निर्मित पटाखों, फुलझड़ियों, झालरों का बहिष्कार किया था। देश भक्ति जताई थी। खूब खुश हुए थे। पटाखे फोड़ कर खुशी जताई थी। यह अलग बात है कि खुशी के आवेग में भूल कर चीनी पटाखे ही फोड़ बैठे। 

देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम के अधीन अपनी शक्ति, अपनी क्षमता, अपना इतिहास ही भूल बैठे। यह भूलना कोई रणनीति है या भावावेग - इस पर बहस की जा सकती है। हम भूल गए कि चोर को नहीं, चोर की माँ को मारना चाहिए। हम भूल गए कि खरीदनेवालों के मुकाबले बेचनेवाले बहुत कम हैं। ये बेचनेवाले हमारे अपने ही लोग हैं। याद नहीं आया कि इनसे कहें कि चीनी सामान न बेचें। अपनी सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टी के विधायकों को खरीदने को सही बताते हुए, अभी-अभी अनुपम खेर ने कहा - ‘खरीदा वही जाता है जो बिकता है।’ इस सूत्र की तरफ ध्यान नहीं गया। सामान यदि बाजार में दुकानों पर उपलब्ध है तो बिकेगा ही। देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम के भावावेग में हम भूल गए कि रोज सुबह हमारे साथ कवायद करनेवाले अनगिनत सेवक चीनी सामान के विक्रेता हैं। हम भूल गए कि इनसे कहें कि यह सामान मत बेचो। हम भूल गए कि अपनी संस्कृति और धर्म-रक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरनेवाले अनगिनत सैनिक हमारे पास हैं। वेलेण्टाइन डे पर बधाई पत्रों की दुकानों को ध्वस्त कर देनेवाले अपने वीरों को हम भूल गए। हम उन्हें ही कह सकते थे कि चीनी सामान बेचनेवाली दुकानों पर अपनी ‘कृपा दृष्टि’ डाल दें। गौ रक्षा के लिए और लव जेहाद का नाश करने के लिए प्राण लेने में भी न हिचकनेवाले शूरवीर हमें याद नहीं आ रहे। पार्टी में संगठन मन्त्री और सरकार में मन्त्री कौन बने, इस व्यस्तता में हम भूल गए कि हम अपनी ही सरकार से चीनी सामान पर प्रतिबन्ध लगाने का आदेश जारी न करा पाए। हमें एक ही बात याद रही - देश के लोग देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम भूल न जाएँ इसलिए घर-घर जाकर याद दिलाएँगे। लोगों को मालूम होना चाहिए कि हमें देश की और उनकी कितनी फिक्र है!


एक ऑडियो इन दिनों वाट्स एप पर खूब चल रहा है। मुझे अब तक सत्रह मित्रों से प्राप्त हो चुका है। इनमें से तीन ऐसे हैं जो खुद के सिवाय किसी को भी देश भक्त नहीं मानते। किन्हीं डाक्टर अनुराग के, लगभग साढ़े तेरह मिनिट के इस ऑडियो में अनेक छोटे-छोटे सवाल पूछे गए हैं और अनेक छोटी-छोटी जानकारियाँ दी गई हैं। जैसे, यदि चीन हमारा दुश्मन है तो प्रधान मन्त्री ने अब तक विरोध क्यों नहीं जताया? वे तीन बार चीन जाकर भारत में निवेश करने का आग्रह कर चुके हैं! हम कौन-कौन सा सामान नहीं वापरें या नहीं खरीदें? घर, दफ्तर, संस्थानों, हमारे दैनन्दिन जीवन में काम आ रहा कौन सा सामान ऐसा है जो चीन में न बना हो या जिसमें चीनी सामान न लगा हो? आधुनिक चिकित्सा उपकरणों के लिए हम विदेशों पर ही निर्भर हैं। इनमें से लगभग अस्सी प्रतिशत उपकरण पूर्णतः या आंशिक चीनी ही हैं। हम चीन से आयात बन्द क्यों नहीं कर देते? चीन अपने सकल निर्यात का अधिकतक तीन प्रतिशत ही भारत को निर्यात करता है। वह हम पर निर्भर नहीं है। इसके समानान्तर हम अपने सकल निर्यात का ग्यारह प्रतिशत निर्यात चीन को करते हैं। हम यह नुकसान उठाने को तैयार हैं? भारत में सत्ताईस हजार चीनी रहते हैं। इन्हें चीन क्यों नहीं भेज देते? लेकिन चीन में लगभग साढ़े चार लाख भारतीय काम कर रहे हैं। उनके लिए हमारे पास रोजगार हैं? चीनी सामान से जुड़े व्यापार, उत्पादन पर लगभग आठ करोड़ परिवार (लगभग चालीस करोड़ लोग) निर्भर हैं। इनके रोजगार का क्या होगा? खास कर तब जबकि आजादी के बाद से अब तक कुल नब्बे लाख सरकारी नौकरियाँ ही मिली हैं। 

अपनी गलती, अक्षमता, निष्क्रियता, अपनी काली करतूतें छुपाने का सबसे बढ़िया उपाय है - सामनेवाले को गलत, अक्षम, निकम्मा, चोट्टा-डाकू साबित करना शुरु कर दो। लेकिन इससे सचाई नहीं बदलती। डॉक्टर अनुराग के अनुसार स्कूलों में दिया जा रहा मध्याह्न भोजन तो स्थानीय स्वयम् सेवा समूहों द्वारा ही उपलब्ध कराया जा रहा है, चीन से नहीं। लेकिन सरकारी आँकड़ा है कि इस मध्याह्न भोजन से अब तक सोलह हजार बच्चे मर चुके हैं। नकली/घटिया स्वदेशी दवाओं से छियासी हजार लोगों की जानें चली गईं। ऐसी ही स्वदेशी दवाओं से कोलकोता में आठ हजार बच्चे मर गए। डॉक्टर अनुराग के अनुसार यह भी सरकारी आँकड़ा है। चीनी सामान के बहिष्कार के आह्वान को ‘ढकोसला’ बताते हुए डॉक्टर अनुराग पूछते हैं - ‘अपने पीएम चीनियों को भारत में आकर सामान बनाने को कह रहे हैं। उनका बनाया सामान न खरीद कर हम अपने पीएम का निरादर नहीं कर रहे? उनकी मेहनत पर पानी नहीं फेर रहे?’ डॉक्टर अनुराग के अनुसार हम चीन का फायदा कम और अपना फायदा ज्यादा कर रहे हैं। चीनी तकनीक का उपयोग कर हम आगे बढ़ रहे हैं। भारत में चीनी सामान की बिक्री का कुल चार प्रतिशत पैसा चीन को जाता है। शेष छियानवे प्रतिशत भारत में ही रहता है। साल में दो बार भारतीय और चीनी सेनाएँ साथ-साथ युद्धाभ्यास कर, परस्पर अनुभवों का लाभ लेती हैं। सच तो यह है कि हमारा स्वदेशी सामान चीनी सामान से कम गुणवत्तावाला और मँहगा है। देश भक्ति के नाम पर यह सब करने के बजाय हमें प्रतियोगिता कर खुद को बेहतर साबित करना चाहिए। यही चीन को सच्चा और प्रभावी जवाब होगा। 

मैं भी उलझन में हूँ। जिन तरीकों, माध्यमों से चीनी सामान के बहिष्कार का अभियान चलाया जा रहा है उनमें चीन है। मैं जिस कम्प्यूटर पर यह सब लिख रहा हूँ, वह चीनी पुर्जों से ही बना है। जिस इण्टरनेट से इसे अखबार तक भेज रहा हूँ, उसमें भी चीन शामिल है। जाहिर है, समूचा अभियान एक नकली लड़ाई है। योद्धा प्राणों की आहुति देने की मुद्रा में लकड़ी की तलवारों से दुश्मन को मौत के घाट उतारने के लिए जूझ रहे हैं। मुखौटों की त्यौरियाँ चढ़ी हुई हैं। देश की फिक्र का जिक्र करने में मुखौटों की आँखों से आँसू धार-धार बह रहे हैं। पपोटे सूज गए हैं।

ठीक वक्त है कि हम अपनी-अपनी भूमिका तय कर लें।
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 03 अगस्त 2017 को प्रकाशित)

यह मुकदमा जीतना ही चाहिए

चेम्पियन्स ट्राफी के फायनल में भारत की हार के बाद, पाकिस्तान की जीत की खुशी में पटाखे छोड़ने और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगा कर, जश्न मना कर, ‘राष्ट्र की गरिमा के विपरीत कृत्य’ के आरोप में बुरहानपुर पुलिस ने 15 लोगों को गिरफ्तार किया। अपने प्रदेश की पुलिस पर गर्व हो आया। वर्ना कहीं हमारी पुलिस भी जम्मू-कश्मीर पुलिस की तरह ‘बन्‍दनयन’ होती तो ये देशद्रोही बच निकलते। मध्य प्रदेश की ही तरह जम्मू-कश्मीर में भी भाजपा सरकार में है लेकिन वहाँ, पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाते और भारतीय झण्डे को जलाते, हजारों लोग वहाँ की पुलिस को या तो नजर नहीं आते या वहाँ की पुलिस देख ही नहीं पाती। बुरहानपुर में लगे ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ और जम्मू-कश्मीर में आए दिनों लग रहे ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ के नारों के अर्थ और मकसद में निश्चय ही कोई गुणात्मक अन्तर होगा। वर्ना, राष्ट्र की गरिमा के विपरीत कृत्य पर वहाँ के भाजपाइयों का खून भी उबलता ही। मैं नहीं मानता कि ‘राष्ट्र प्रथम’ को जीवन ध्येय घोषित करनेवाला कोई भाजपाई ‘सत्ता’ के लालच में राष्ट्र विरोधी कोई हरकत बर्दाश्त कर लेता है।

बुरहानपुर के समाचार ने मुझे जिज्ञासु और उत्सुक बना दिया। मैं सोच रहा हूँ, इन पन्द्रह लोगों के विरुद्ध कोर्ट में क्या दलीलें दी जाएँगी! कहीं ऐसा न हो कि ये लोग ‘बाइज्जत बरी’ हो जाएँ! मेरे पास अपनी कुछ आशंकाएँ, कारण हैं।

पाकिस्तानी आतंकवाद ने हमारे अनगिनत सैनिकों के प्राण ले लिए हैं। यह सिलसिला थम नहीं रहा। शायद ही कोई दिन जाता हो जब पाकिस्तानी सेना या पाकिस्तान-पालित-पोषित-पल्लवित आतंकवादी हमले न करें।  जम्मू-कश्मीर का जनजीवन और अर्थ व्यवस्था ध्वस्तप्रायः है। लेकिन हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं। मनमोहन सरकार की तरह ही वाणी-वीर, शब्द-शूर बने हुए हैं। हमलों-हत्याओं की कड़ी निन्दा कर रहे हैं, आतंकियों को कायर कह रहे हैं और ‘हमारे जवानों का खून व्यर्थ नहीं जाएगा’ के घोष कर रहे हैं। मनमोहन सरकार की तरह ही हम अमेरीका से गुहार लगा रहे हैं, विश्व मंचों पर पाकिस्तान की असलियत उजागर कर रहे हैं। वादा तो ‘घर में घुस कर’ मारने का  था। लेकिन सब कुछ पहले जैसा ही हो रहा है। कुछ भी नहीं बदला। बदलता नजर भी नहीं आ रहा।

एक भाजपाई सांसद ने, पाकिस्तान को शत्रु-देश घोषित करने का निजी संकल्प प्रस्तुत किया। उम्मीद थी कि यह संकल्प न केवल विचारार्थ ले लिया जाएगा बल्कि सर्वानुमति से, पारित भी हो जाएगा। लेकिन मुझे विश्वास ही नहीं हुआ जब सरकार ने यह कह कर यह संकल्प लौटा दिया कि इस संकल्प से दोनों देशों के सहयोग-सौहार्द्र-मधुरता के सम्बन्धों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। मुझे डर है कि कहीं बुरहानपुर के राष्ट्रद्रोही सरकार के इस जवाब को अपने पक्ष में पेश न कर दें। वे कह न दें कि हार से व्यथित होने के बाद भी वे पाकिस्तान से भारत के मधुर सम्बन्धों की चिन्ता करने की, भारत सरकार की भावना को ही बल दे रहे थे।

मुझे बार-बार सुनने को मिलता है कि हमने पाकिस्तान को ‘अति अनुकूल राष्ट्र’ (मोस्ट फेवर्ड नेशन) का दर्जा दे रखा है। माना कि किन्हीं अन्तरराष्ट्रीय मजबूरियों के चलते हम पाकिस्तान को शत्रु देश घोषित नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन उसे दिया हुआ यह दर्जा वापस न लेने में कौन सी मजबूरी है? बुरहानपुर के, गिरफ्तार किए गए ये राष्ट्र-द्रोही, भारत के इस आधिकारिक व्यवहार के तथ्य को अपनी ढाल बना लें तो?

जिस तरह यूपीए सरकार ‘सोनिया नियन्त्रित-निर्देशित-संचालित’ थी उसी तरह एनडीए सरकार, ‘संघ’ द्वारा संचालित है। सब जानते हैं कि ‘राष्ट्र प्रथम’ ही ‘संघ’ का जीवनाधार है। इसी ‘संघ’ के प्रमुख मोहन भागवत, पाकिस्तान को ‘भारत का भाई’ घोषित कर चुके हैं।ये पन्द्रह ‘बुरहानपुरी’ कहीं भागवत को अपने गवाह के रूप में न बुलवा लें। पूछ न लें कि भाई की बेहतरी चाहना अपराध है? 

समूचा भारतीय जनमानस पाकिस्तान विरोधी भावनाओं से ओतप्रोत है। पाकिस्तान को लतियाने, जुतियाने का कोई पल हम नहीं गँवाते। मैं नहीं मानता कि हमारे प्रधानमन्त्री इन जनभावनाओं से अनजान होंगे। ‘संघ’ का निष्ठावान, समर्पित स्वयम्सेवक’ होना उनकी अनेक विशेषताओं, योग्यताओं में प्रमुख है। लेकिन पाकिस्तानी प्रधामन्त्री नवाज शरीफ के जन्म दिन के जलसे में भाग लेने के लिए वे, प्रधानमन्त्री की हैसियत में, बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम, अचानक (पता नहीं, बुलावे पर या बिना बुलाए) पाकिस्तान पहुँच जाते हैं। सद्भावना और मैत्री भाव से ‘शरीफ परिवार’ को उपहार देते हैं। बदले में अपनी माँ के लिए नवाज से साड़ी स्वीकारते हैं। सारी दुनिया भौंचक रह जाती है। फिर सम्हलती है और मोदी के इस मैत्री-भाव की प्रशंसा करती है। जाहिर है, वे शत्रु-भाव से तो नहीं ही गए होंगे। बुरहानुपर के ये पन्द्रह लोग, कहीं मोदी के इस सौजन्य-व्यवहार को अपनी ढाल न बनालें।

मनमोहन सिंह सरकार के समय, मौजूदा सरकार से जुड़े तमाम लोग ‘आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते’ और ‘पाकिस्तान को पाकिस्तान की भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए’ का तर्क आसमान पर चस्पा किए हुए थे। मोदी सरकार आने के बाद सबको विश्वास था कि अब पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा और देश पाकिस्तानी आतंकवाद से मुक्ति पा लेगा। लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज ने, कम से कम दो बार संसद में कहा कि बात किए बिना आतंकवाद से मुक्ति के रास्ते तलाश नहीं किए जा सकते। बुरहानपुर के ये पन्द्रह राष्ट्रद्रोही कहीं सुषमा स्वराज की इस बात को अपने पक्ष में न ‘घुमा’ लें। 

चेम्पियन्स ट्राफी के फायनल के दौर में तमाम प्रखर राष्ट्रवादी बार-बार भारत को ‘पाकिस्तान का बाप’ कह रहे थे। क्या यह मुमकिन नहीं कि बुरहानपुर में गिरफ्तार ये लोग कहें कि टूर्नामेण्ट के उस दौर में उपजे पितृभाव के अधीन वे बेटे की जीत का जश्न मना रहे थे या कि ‘फादर्स डे’ पर, बेटे से मिले उपहार का उल्लास प्रकट कर रहे थे? 

पाकिस्तान को लेकर हमारे सरकारी और सार्वजनिक व्यवहार का यह विरोधाभास मुझे दहशत में डाले हुए है। मेरी जानकारी में, पाकिस्तान के सन्दर्भ में राष्ट्रद्रोह का यह पहला मामला है। इसके दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए। अपनी आशंकाओं के बीच मुझे एक ही बात राहत दती है - अभियोजन तो ये सारी बातें अधिक अच्छी तरह जानता ही होगा। और इन सबकी काट भी उसके पास होगी ही। बस! यही  मेरा आशा-तन्तु है।

लेकिन इसके समानान्तर मुझे कुछ बातें और नजर आ रही हैं। पाकिस्तान नहीं रहेगा तो हम लोग फिर ‘पाकिस्तानी’ कह कर किसे चिढ़ा पाएँगे? क्या कह कर मुसलमानों को देशद्रोही आरोपित कर पाएँगे? अभी तो बात-बात में हम जिसे भी देशद्रोही घोषित कर देते हैं, उसे पाकिस्तान भेजते रहते हैं। यदि पाकिस्तान सचमुच में मुर्दाबाद हो गया तो फिर हम ऐसे देशद्रोहियों को कहाँ भेजेंगे? अभी तो पाकिस्तानी और देशद्रोही पर्याय बने हुए हैं। पाकिस्तान सचमुच में मुर्दाबाद हो गया तो देशद्रोहियों को किस देश का नागरिक बताएँगे? कभी-कभी तो लगने लगता है कि हम भले ही ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ कहें, लेकिन अपनी देशभक्ति, अपना राष्ट्रप्रेम दिखाने के लिए पाकिस्तान हमारी जरूरत है। यदि पाकिस्तान ही नहीं रहेगा तो हमारी देशभक्ति का क्या होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि पूनम को पूनम बने रहने के लिए जिस तरह से अमावस की जरूरत होती है उसी तरह हमारी देशभक्ति के लिए पाकिस्तान जरूरी है?

लेकिन इस परिहास को छोड़, मुद्दे की बात पर आएँ। बुरहानपुर का मुकदमा हम सबके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन गया है। अच्छा सोचें और इसके अनुकूल फैसले की प्रतीक्षा करें। 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 22 जून 2017 को प्रकाशित)

लड़ी जा सकनेवाली एक लड़ाई

पूरा देश राष्ट्रोन्माद और गुस्से में उफन रहा है। विदेशों में बैठे भारतीय भी इसी दशा में हैं। सबकी एक ही इच्छा है-इस बार पाकिस्तान को निपटा ही दिया जाए। यह भावना अकारण नहीं है। लोक सभा चुनावों के दौरान पाकिस्तान के सन्दर्भ में मोदी ने लोगों को जो भरोसा दिलाया था, उसी भरोसे के आधार पर लोग न केवल यह चाह रहे हैं बल्कि विश्वास भी कर रहे हैं कि मोदी अपनी बात पर अमल करेंगे। लेकिन मोदी की आवाज सुनाई ही नहीं दे रही। और केवल मोदी ही क्यों? राष्ट्रवाद की दुहाइयाँ देनेवाले संघ परिवार और तमाम भाजपाइयों की भी आवाज नहीं सुनाई दे रही। कल तक खुद के सिवाय बाकी सब को देशद्रोही घोषित करनेवाले तमाम लोगों को मानो साँप सूँघ गया है। यह देख-देख कर मुझे मालवी का यह लोक आख्यान पल-पल याद आ रहा है।

लोगों को प्रभावित करने के लिए एक नौजवान बीच चौराहे पर, भीड़ के सामने हँसिये निगलने लगा। अधिकांश लोग तो उसके इस करतब पर तालियाँ बजाते रहे किन्तु कुछ समझदार लोग भाग कर उसके पिता के पास पहुँचे और कहा कि अपने बेटे को यह आत्मघाती करिश्मा करने से रोके। पिता अपने बेटे से पहले से ही परेशान था चिढ़ कर बोला कि वह जो करता है, करने दें। अभी उसे मजा आ रहा है लेकिन सुबह जब निपटने जाएगा तब उसे मालूम पड़ेगा कि उसने क्या मूर्खता की। पिता ने जो कहा, वही हुआ। कुछ घण्टों पहले तालियों की गड़गड़ाहट से बौराया बेटा, सुबह शौचालय में, लहू-लुहान दशा में चित्कार रहा था। 
आख्यान में और आज की दशा में एक ही अन्तर है। वहाँ वह नौजवान चिल्ला रहा था। यहाँ, राष्ट्र को लेकर गर्वोक्तियाँ करने का छोटा से छोटा मौका भी हथियाने वाले तमाम लोगो की बोलती बन्द है। सवाल पूछनेवालों में पराये तो हैं ही, अपनेवाले भी बड़ी तादाद में सामने आ रहे हैं। मोदी और अन्य भाजपाइयों के आक्रामक भाषणों के वीडियो अंश सोशल मीडिया पर छााए हुए हैं। लोग क्षुब्ध होकर व्यंग्योक्तियाँ कस रहे हैं। पुराने भाषणों को चुटकुलों की तरह पेश कर रहे हैं। सर्वाधिक फजीहत ‘छप्पन इंच का सीना’ की हो रही है। कल तक राष्ट्रवाद के प्रमाण-पत्र बाँटनेवाले मुँह छिपा रहे हैं और जिन्हें देशद्रोही करार देकर पाकिस्तान भेजने की बात की जा रही थी वे तमाम लोग, पूर्वानुसार ही सहज भाव से देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं-चुपचाप।

वस्तुतः कुछ भी अनोखा नहीं हो रहा। आकांक्षाए जगाना जितना आसान है, उन्हें पूरा करना उतना ही कठिन। मुझे लगता है, इन सबसे एक ही चूक हुई-यह जानते हुए भी कि भारत अपनी ओर से पाकिस्तान पर आक्रमण नहीं करेगा, ये लोग भावनाएँ भड़काते रहे। याद कीजिए, गृह मन्त्री राजनाथसिंह कह चुके हैं कि पहली गोली भारत नहीं चलाएगा। उन्होंने अपना यह वक्तव्य इस क्षण तक न तो वापस लिया है न ही संशोधित किया है। सत्ता में आकर अपने विरोधियों को नष्ट करने की जो निर्द्वन्द्व आजादी मिलती है, अन्तरराष्ट्रीय बिसात पर वह नहीं मिलती। पाकिस्तान की वास्तविक स्थिति ने शुरु से ही सबके हाथ बाँध रखे हैं। वहाँ प्रधान मन्त्री सहित तमाम निर्वाचित जनप्रतिनिधि सेना के बन्धक हैं। कठपुतलियों की तरह निष्प्राण, निर्जीव। कुर्सी पर बने रहने के लिए सेना की इच्छा का पालन करना पड़ता है। सेना अपनी मनमर्जी से कुछ भी कर सकती है, नेता नहीं। कारगिल युद्ध इसका प्रमाण है। मुशर्रफ ने नवाज शरीफ का कहना मानने से इंकार कर दिया था और भारत पर युद्ध थोप दिया गया था। 

सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के आतंकी सेना की शह और संसाधनों से लैस रहते हैं। किन्तु वहाँ का कोई सैनिक सामने नहीं आता। जिहाद के नाम पर दिग्भ्रमित युवा ही सरहद पार करते हैं। उनका जो भी किया-कराया है, सब कुछ अनधिकृत, अनौपचारिक होता है। इन सबमें सरकार का हाथ न होने की बात कहने की सुविधा वहाँ की सरकार को मिलती रहती है। ऐसे में तकनीकी तौर पर सरकार सदैव बरी-जिम्मे रहती है। सारी दुनिया भली प्रकार जानती है आतंकवादी पाकिस्तानी हैं किन्तु घुसपैठ या हमला पाकिस्तान ने नहीं किया होता है। ऐसे में हम चाह कर भी हमला नहीं कर सकते और यही वजह है कि राजनाथसिंह अपने वक्तव्य पर बने रहने को मजबूर हैं। वे हमारे गुस्से के नहीं, सहानुभूति के पात्र हैं। हम चुप रहकर उनका हौसला बढ़ाएँ, उन्हें मदद करें।

इस तकनीकी पेचीदगी के चलते हम सीधा आक्रमण तभी कर सकते हैं जब हम आक्रामक होने का तमगा कबूल करने को तैयार हों। निश्चय ही, हम यह तमगा कभी हासिल नहीं करना चाहेंगे। ऐसी स्थिति मे हमारे पास कोई नया विकल्प नहीं है। हमें अपने (वार्ता करने, राजनयिक , कूटनीतिक प्रयासों से पाकिस्तान को सारी दुनिया से अलग-थलग करने के) चिर-परिचित विकल्पों पर ही काम करना पड़ेगा। इन विकल्पों में हम कितना कौशल वापर सकते हैं, यही महत्वपूर्ण बात होगी।

मैं ठेठ देहाती आदमी हूँ। सीधी बात कहने-सुनने में आसानी होती है। कूटनीति या राजनय के दाँव मुझे नहीं आते। निजी तौर मैं अमरीका को मूल अपराधी मानता हूँ। मेरी राय में पाकिस्तान यदि चोर है तो अमरीका चोर की माँ है। मैं पाकिस्तान को अमरीका का रण्नीतिक उपनिवेश मानता हूँ। इनमें चीन, पाकिस्तान की मौसी की तरह शामिल हो गया है। मुझे लगता है कि पाकिस्तान का इलाज करने के लिए हमे अमरीका और चीन का इलाज करने पर विचार करना चाहिए। किन्तु इन दोनों से भी हम सीधी लड़ाई नहीं लड़ सकते। 

हमारे देहातों में कहा जाता है कि यदि किसी को मारना हो तो उसकी पीठ पर नहीं, पेट पर लात मारो। मेरा विश्वास है कि हम इन दोनों देशों के पेट पर लात मारने की जोरदार स्थिति में हैं। हम दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बने हुए हैं। कुछ ऐसा कि कभी-कभी लगता है कि हम भारतवासी खुद उत्पाद बन गए हैं। चीनी सामान से हमारे बाजार अटे पड़े हैं। हम सब इनसे त्रस्त हैं, यह बात बार-बार सामने आती रहती है। सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती। उसके हाथ भी बँधे हुए हैं मुँह भी बन्द ही है। वह तो कुछ कर नहीं सकती। किन्तु हम, भारत के लोग काफी-कुछ कर सकते हैं। दुकानदार चीनी सामान की बिक्री बन्द कर दें और हम खरीददारी, तो चीन का दिमाग ठिकाने आ जाएगा।

अमरीकी उत्पाद तो हमारे खून में शामिल हो गए हैं। अमरीकी उत्पादों ने भारतीय चोला पहन लिया है। कौन सी चीज अमरीकी है और कौन सी नहीं, तय करना मुश्किल हो गया है। किन्तु वहाँ के (कोका कोला और पेप्सी जैसे तमाम) शीतल पेय तो जग जाहिर हैं। हम इनका ही बहिष्कार कर दें तो अमरीका घुटनों पर आ जाएगा। हम में से बहुत कम लोग जानते होेगे कि शीतल पेयों की ये कम्पनियाँ अमरीका की अर्थनीति में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। अमरीका अपनी अर्थ नीति निर्धारण में इन कम्पनियों का विशेष ध्यान रखता है। आर्थिक लाभ के मामले में पाकिस्तान, अमरीका के लिए तनिक भी उपयोगी नहीं है किन्तु हमसे तो अमरीका मालामाल हुआ जा रहा है। भारत के बाजार को खोने की जोखिम वह कभी नहीं उठा पाएगा।

मोदी इस समय देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। पार्टी से परे, निजी स्तर पर उनके अनुयायियों की संख्या भी कम नहीं। ठीक है कि वे कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं। किन्तु वे पर्दे के पीछे से यह अभियान छेड़ सकते हैं। आज का माहौल ऐसे अभियान के लिए अत्‍यधिक अनुकूल है।

हम, पाकिस्तान से सर्वाधिक त्रस्त देश हैं। हम सीधा युद्ध तो शुरु नहीं कर सकते किन्तु पाकिस्तानी सेना की तरह छù युद्ध तो लड़ ही सकते हैं। एक ही अन्तर होगा। हमारी यह लड़ाई धीमी होगी, देर से नतीजा देनेवाली और भारत में ही लड़ी जाएगी।

एक लड़ाई ऐसी भी लड़ने पर विचार करने में हर्ज ही क्या है? 
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(भोपाल से प्रकाशित दैनिक ‘सुबह सवेरे’ के दिनांक 22 सितम्बर 2016 के अंक में छपा)

अब भगतसिंह की बारी है?

गाँधी और भगतसिंह को परस्पर विरोधी की तरह चित्रित/निरूपित किया जाता है। लेकिन सचाई इसके ठीक विपरीत है। दोनों ही एक दूसरे के मुक्त-कण्ठ प्रशंसक थे। यदि प्रशंसक नहीं भी थे तो, बैरी तो नहीं ही थे।

आज का भारत, निश्चय ही न तो गाँधी के सपनों का भारत है न ही शहीद-ए-आजम भगतसिंह के सपनों का। उन्हीं भगतसिंह के साथ हो रहे व्यवहार से मैं आज दो सवालों के बीच फँस गया। तय नहीं कर पा रहा कि कौन सा सवाल सही है।

पहला सवाल - क्या यह अच्छा ही हुआ कि अंग्रेजों ने भगतसिंह को फाँसी दे दी और उन्हें (भगतसिंह को) आज के भारत को देखने के दारुण दुःख से बचा दिया?

दूसरा सवाल - क्या यह अच्छा नहीं होता कि भगतसिंह आज हमारे बीच होते तो उनके नाम पर जो कुछ किया जा रहा है, वह नहीं होने देते और अपने सपनों का भारत बनाते?

भगतसिंह के बारे में मैं नाम मात्र को ही जानता हूँ। सुना अधिक। पढ़ा बहुत कम। लेकिन दो बातें अवश्य पढ़ी हैं। पहली तो यह कि वे नास्तिक/अनीश्वरवादी थे। और दूसरी यह कि वे जात-पाँत में भरोसा बिलकुल ही नहीं करते थे।

पहली बात तो उनके उस लेख से मालूम हुई जो उन्होंने अपने नास्तिक होने को लेकर लिखा था। जाति-पाँति न माननेवाली बात उस घटना से मालूम हुई जो उन्होंने अपनी अन्तिम इच्छा के रुप में व्यक्त की थी।

अपनी अन्तिम इच्छा उन्होंने बताई थी कि फाँसी पर चढ़ने से पहले वे अपनी ‘बेबे’ (पंजाबी में माँ को ‘बेबे’ ही सम्बोधित किया जाता है) के हाथ की बनी रोटी खाना चाहते थे। जेलर परेशान हो गया था। इतने कम समय में भगतसिंह की माँ को कैसे बुलाया जाए? भगतसिंह ने तब कहा था कि ‘बेबे’ से उनका मतलब उस महिला से था जो उनके शौचालय की साफ-सफाई करती थी। भगतसिंह की सीधी-सपाट व्याख्या थी - माँ ही अपने बच्चों का मल-मूत्र साफ करती है। इसी व्याख्या से उन्होंने जेल में, उनके शौचालय की साफ-सफाई करनेवाली महिला को अपनी ‘बेबे कहा और माना था।

भगतसिंह की बात सुनकर वह महिला संकुचित हो गई थी। उसके मन पर हावी ‘जाति-बोध’ के चलते वह भगतसिंह के लिए रोटी बनाने को तैयार नहीं थी। लेकिन भगतसिंह की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा। उसने रोटी बनाई और भगतसिंह ने बड़े प्रेम से खाई।

आज,  ग्यारह सितम्बर 2014 को मैंने भगतसिंह की इन दोनों बातों को दफन होते देखा।

एक साहित्यिक संस्था ने भगतसिंह की मूर्ति, एक सार्वजनिक उद्यान में स्थापित करवाई। उद्यान नगर निगम ने विकसित किया और मूर्ति का मूल्य इस साहित्यिक संस्था ने चुकाया। आयोजन इसी उद्यान में था लेकिन मेजबानी इस साहित्यिक संस्था की थी। मुख्य अतिथि हमारे नगर के विधायक थे। वे भाजपाई हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता हमारे महापौरजी ने की। वे भी भाजपाई हैं। मंच यद्यपि साहित्यिक संस्था का था और पीछे बैनर भी इस संस्था का ही था लेकिन मंच पर संस्था का कोई प्रतिनिधि नहीं था। कुल सात लोग कुर्सियों पर विराजमान थे जिनमें विधायक, महापौर, भाजपा के जिलाध्यक्ष, भाजपा युवामोर्चा के जिलाध्‍यक्ष, क्षेत्रीय पार्षद (वे भी भाजपाई) और भाजपा के दो कर्मठ कार्यकर्ता शामिल थे। ऐसा लग रहा था मानो इस साहित्यिक संस्था ने भाजपा का, वार्ड स्तरीय भाजपा सम्मेलन आयोजित किया हो।

मेरे प्रदेश के मुख्यमन्त्री 18 सितम्बर को मेरे कस्बे में आ रहे हैं। उसी तैयारी के लिए जिला प्रशासन द्वारा आयोजित बैठक में भाग लेने के लिए विधायक और महापौर को जाना था। दोनों को जल्दी थी। वे भगतसिंह को जल्दी से जल्दी निपटा कर मुख्यमन्त्री को सँवारने में लगना चाह रहे थे। दोनों ने संक्षेप में अपनी-अपनी बात कही। महापौर ने अपने  कार्यकाल की उपलब्धियाँ गिनवाईं (उनका कार्यकाल इसी दिसम्बर में समाप्त हो रहा है)। उन्होंने भगतसिंह का उल्लेख केवल यह कह कर किया कि उनकी मूर्ति का अनावरण है। 

विधायक ने भगतसिंह का उल्लेख कुछ अधिक वाक्यों में किया। भगतसिंह को अपनी राजनीतिक विचारधारा के आदर्श के रूप में उल्लेखित किया। कहा कि भगतसिंह के सपनों का भारत उनकी पार्टी ही बना सकती है और बनाएगी भी। उन्होंने महापौर से अधिक समय नहीं लिया।

दोनों भले ही बहुत कम बोले लेकिन स्वागत-अभिनन्दन के कारण कार्यक्रम काफी लम्बा खिंच गया था। स्थिति यह हो गई थी कि तय करना मुश्किल हो गया था कि किसे अधिक जल्दी है - विधायक, महापौर को या श्रोताओं को?

कार्यक्रम तो निपट गया लेकिन मैं अपने ही दो सवालों में उलझ गया। भगतसिंह के सपनों का भारत बनाने का दावा वे लोग कर रहे हैं जो ‘भगवा, भगवान और हिन्दू धर्म’ की डोर थामे सरकार में बैठे हैं। हिन्दू धर्म का आधार तो वर्णवादी व्यवस्था है! भगवान की दुहाइयाँ देनेवाले और अपने व्यवहार से वर्णवादी व्यवस्था को मजबूत करने में व्यस्त लोग भला भगतसिंह के सपनों का भारत कैसे बनाएँगे? मुझे भगतसिंह की जाति नहीं मालूम। लेकिन क्या हमें, आनेवाले दिनों में भगतसिंह के बारे में कुछ इस प्रकार सुनने को मिलेगा - ‘खत्री-शिरोमणी, हिन्दू धर्म के गर्व पुरुष, अमर शहीद भगतसिंह।’

गाँधी को काँग्रेसियों ने निपटा दिया। हालत यह कर दी कि अब गाँधी और गाँधीवाद से मुक्ति पाने की आवाजेें उठने लगी हैं। लेकिन यह स्थिति आने में 65 बरस लग गए। किन्तु लगता है, संघ परिवार भगतसिंह को उससे कहीं अधिक जल्दी निपटा देगा। भारत के शहीद-ए-आजम को दस-पाँच बरस में ही ‘खत्री शिरोमणी और हिन्दू धर्म का गर्व पुरुष’ बना देगा। 

यह सच है कि संघ परिवार के पास, स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने की कोई विरासत नहीं है। वह अपने लिए किसी महापुरुष की तलाश में जुटा हुआ है। पहले कुछ हद तक लाल बहादुर शास्त्री और अब सरदार पटेल के जरिए वह अपनी टोपी में कुछ पंख खोंस रहा है। लेकिन क्या इसके लिए यह जरूरी है कि भगतसिंह की विशालता और व्यापकता को संकुचित, सीमित कर दिया जाए? समन्दर को नाले में बदल दिया जाए?

गाँधी को हम नहीं बचा पाए। लगता है, भगतसिंह भी गाँधी-गति को प्राप्त हो जाएँगे।

मैं अब भी अपने दोनों सवालों में उलझा हुआ हूँ। 

चील कह रही है - मैं गोश्त नहीं खाऊँगी

वक्त कटी की बातें ‘महज बातें’ नहीं होतीं और फुरसती लोग फालतू नहीं होते। तनिक ध्यान से देखें, सोचें-विचारे तो लगेगा, इनके जरिए हमारा ‘लोक’ बड़ी ही प्रभावशीलता से जीवन के कड़वे यथार्थ उजागर करता है। 

दोपहर की वेला। एलआईसी दफ्तर में भोजनावकाश। हाथ में काम कुछ खास नहीं। प्रीमीयम जमा करने के लिए आए दोे ‘रिटायर्डों’ से साबका पड़ गया। दोनों ही परिचित और परिहासप्रिय। प्रीमीयम जमा करने के बाद मुझसे पूछा - ‘चाय पीएगा या पिलाएगा?’ इतने अपनेपन और अधिकार से अब कौन बात करता है? मैं निहाल हो गया। बोला - ‘केवल चाय ही क्यों? साथ में और कुछ भी। आपने मुझे इस काबिल तो कर ही दिया कि आपकी सेवा कर सकूँ।’ दोनों खुश हो गए। एक ने मेरी पीठ पर धौल मारी और धकिया कर, दफ्तर के सामने, सड़क पार, मनोज की चाय की दुकान की ओर ले चले।

मनोज दुकान पर नहीं था। वह आए तो चाय बनाए। मनोज गैरहाजिर तो भला कोई ग्राहक क्यों हो? सो, हम तीन के तीन, सुनसान दुकान की बेंच पर बैठ गए।

‘और क्या चल रहा है?, मानसून दगा दे रहा है, भादों अभी आधे से ज्यादा बाकी है लेकिन अगहन सा तप रहा है’ जैसी रस्मी बातों से होते-होते ‘न खाऊँगा, न खाने दूँगा’ वाले जुमले पर बात आ गई। दोनों खूब हँसे। एक बोला - ‘स्साले! नेता! अपने सिवाय सबको बेवकूफ समझते हैं। नहीं खाएँगे। मासूम बन कर बात करते हैं और सोचते हैं सब उनकी बातों पर आँख मूँद कर भरोसा कर लेंगे।’ मैं चुप रहा। बोलने पर कुछ महत्वपूर्ण से वंचित हो जाने का खतरा था। मुझे सम्बोधित करते हुए एक बोला - ‘चील कह रही है, मेरे घोंसले में गोश्त सुरक्षित रहेगा। अरे! एक-एक रैली में लाखों-करोड़ों खर्च हुए हैं और कह रहे हैं न खाऊँगा और न ही खाने दूँगा। ऐसा कहीं होता है? कहनेवाला जानता है कि वह सच नहीं बोल रहा लेकिन सुननेवाला भी नासमझ नहीं है, इतना भी विचार नहीं रहता इन लोगों को।’

फिर उन दोनों ने अपना-अपना एक-एक किस्सा सुनाया।

पहला किस्सा इस तरह था।

एक बहुत ही ‘चालू’ अफसर, एक ‘गृह वित्त (हाउसिंग फायनेन्स) कम्पनी’ के एरिया मैनेजर बन गए। सुविधा के लिए उनका नाम नेकीरमजी मान लें। नेकीरामजी वो आदमी जो साँस भी न तो मुफ्त में ले और न लेने दे। कम्पनी अच्छी-खासी दमदार। रोज, अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के विज्ञापन देनेवाली। लोगों की रेलमपेल हो गई। लेकिन ताज्जुब की बात कि कोई भी भ्रष्टाचार की शिकायत नहीं कर रहा। क्या नेकीरामजी बदल गए?

सीधे-सीधे उन्हीं से पूछ लिया - ‘क्या बात है? तबीयत तो ठीक है?’ नेकीरामजी ठठा कर हँसे और खुलकर बोले - ‘पहले कौन सी खराब थी जो अब ठीक होने का सवाल उठे? अब तो पहले से सौ गुना ज्यादा ठीक।’ पूछताछ के जवाब में उन्होंने रहस्य उजागर किया - “इण्डिविज्युअल एप्लीकेण्ट (व्यक्तिगत रूप से लोन माँगनेवाले) की तरफ देखता भी नहीं लेकिन ‘क्लस्टर फायनेन्स’ में कस कर वसूली करता हूँ।” ‘क्लस्टर फायनेन्स’ का मतलब नेकीरामजी ने बताया - बहुमंजिला इमारतों (मल्टियों) के फ्लेटों को लोन देना। ऐसा लोन मंजूर करने में खुले हाथों बटोरते हैं। एक-एक आदमी से बात करो तो मेहनत और वक्त तो ज्यादा लगेगा ही, बदनामी भी ज्यादा होगी। मल्टियों के फ्लेटों का लोन आठ, बारह, सोलह फ्लेटों के हिसाब से एक साथ होता है। एक ही आदमी से बातचीत करनी होती है और लेन-देन भी एक से ही होता है। यह आदमी या तो बिल्डर खुद होता है या उसका आदमी। सो, बदनामी के खतरे की कोई बात नहीं। पहली बात तो यह कि बड़े धन्धेवाला सड़क पर चिल्लाता नहीं और यदि वह चिल्लाता है तो सब ‘इण्डिज्युअल एप्लीकेण्ट’ उसे झूठा कहेंगे। कहेंगे - ‘हमसे तो एक पैसा नहीं लिया।’ नेकीरामजी ने कहा - ‘तुम वाकई में सठिया गये हो। कोई छोड़ता है भला? मैं दोनों हाथों से माल बटोर रहा हूँ और ईमानदार का ईमानदार बना हुआ हूँ।’

दूसरे का सुनाया किस्सा भी लगभग ऐसा ही था। पहलेवाला किस्सा तो रतलाम से बाहर का था लेकिन यह दूसरा रतलाम का ही था।

यह किस्सा इस तरह है -

कोई बीस-बाईस बरस पहले की बात है यह। मेरे एक परिचित रतलाम नगर निगम के कमिश्नर बन कर आए। आते ही उन्होंने मुझे फोन किया। अपने आने की खबर दी और फौरन मिलने के लिए बुलाया। 

मिलते ही नाराज हुए - ‘मेरे आने की खबर मिलने के बाद भी मिलने नहीं आए! बुरी बात है। मिलना-जुलना न सही, इतना तो विचार करते कि नई जगह में मैं रोटी कहाँ खाऊँगा! चलो। कोई बात नहीं। मेरे, आज शाम के भोजन की व्यवस्था तुम्हारे जिम्मे।’

बातों ही बातों में नगर निगम में भ्रष्टाचार की बात चली। उनसे पूछा - “आपकी ‘स्ट्रेटेजी’ क्या होगी?” तपाक से बोले - “वेरी सिम्पल! ‘फोर फिगर्स’ से कम नहीं लूँगा।” उन्होंने भी वही राज बताया - “थ्री फिगर्स’ वाले ज्यादा हैं। उन्हें छोड़ूँगा। वे मेरा गुण-गान करेंगे। मेरी ईमानदारी का ढिंढोरा पीटेंगे। उनसे हुए नुकसान की भरपाई ‘फोर फिगर्स’ वालों से करूँगा। मोटा आसामी गहरा होता है। जबान पर नहीं आता। छोटा आसामी जल्दी खुश और जल्दी गुस्सा होता है। छोटा आसामी मेरी पहचान बनाएगा और मोटा आसामी मुझे ‘राजी-खुशी’ जिन्दा रखेगा।”

अपना-अपना किस्सा सुनाकर दोनों ‘हो-हो’ करते हुए देर तक हँसते रहे। हँसी रुकी तो एक बोला - ‘ये तेरा चायवाला कब आएगा? अब तो हमने मेहनत भी कर ली और तेरा मनोरंजन भी। उसे देर हो तो सैलाना बस स्टैण्ड चल कर, कालू की चाय पी लेते हैं। गरमागरम कचोरी भी मिल जाएगी।’ मुझे लगा - जो कुछ मुझे मिला है उसके बाद, दोनों की कचोरी तो बनती ही बनती है।

अब हम तीनों, सैलाना बस स्टैण्ड पर, कालू की दुकान की ओर जा रहे थे। 

भारत की नई राष्ट्रीय पहचान : अंग्रेजों की चाय

विश्व बैंक के गौरव पुरुष, ‘एलपीजी’ (लिबरलाइजेशन-उदारीकरण, प्राइवेटाइजेशन-निजीकरण और ग्लोबलाइजेशन-वैश्वीकरण) के अग्रणी सच्चे सपूत और सम्भवतः किसी सुनिश्चत उद्देश्य की प्राप्ति हेतु, भारतीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष बनाए गए मोण्टेक सिंह अहलूवालिया की सूचना यदि सच में बदल गई तो (जो कि बदलनी ही है) अंग्रेजी, अंग्रेजीयत और क्रिकेट के बाद सम्भवतः यह चौथी ‘अंग्रेजी चीज’ होगी जिसे हम पूर्वानुसार ही, आधिकारिक रूप से,  या तो माथे पर बैठा लेंगे या फिर ‘स्थापित भारतीय  परम्पराओं का निर्वहन’ करते हुए, उदारतापूर्वक आत्मसात कर लेंगे। स्थिति दोनों में से कोई भी हो, हम यह करेंगे - आत्माभिमान की कीमत पर ही, स्वयम् को धन्य और गद्गद अनुभव करते हुए, अत्यन्त आदरपूर्वक, साष्टांग दण्डवत करते हुए। बाबा नागार्जुन को याद करते हुए - ‘हम ढोएँगे पालकी।’ इस बार भी यह पालकी होगी तो ‘रानी’ की ही किन्तु किसी ‘जैविक रानी’ की नहीं, ‘वानस्पतिक रानी’ की।

यह ‘रानी’ है - चाय। जिसके बिना हमारी सुबह गुनगुनी  नहीं होती, दिन राजी-खुशी नहीं गुजरता और शाम सुरमई नहीं होती। मोण्टेक सिंह अहलूवालिया ने मुदित भाव से, देश को उपकृत करने की मुद्रा में सदाशयतापूर्वक अग्रिम सूचना दी है कि अप्रेल 2013 तक, चाय को भारत का ‘राष्ट्रीय पेय’ घोषित कर दिया जाएगा। देश के संघीय ढाँचे की रक्षा के नाम पर राष्ट्रीय एकता को परे सरकाया जा सकता है और राष्ट्रीय प्रतीक के नाम हमारा राष्ट्र-ध्वज तिरंगा एक बार मतभेद और विवाद का विषय हो सकता है किन्तु इसमें रंच मात्र भी सन्देह नहीं कि चाय हमारी राष्ट्रीय एकता की वास्तविक संवाहक और सच्चा राष्ट्रीय प्रतीक बन गई है। काश्मीर से कन्याकुमारी तक और गौहाटी से चौपाटी तक, समान रूप से उपलब्ध है - चौबीसों घण्टे। ‘अहर्निशं सेवामहे’ की तर्ज पर। छोटे से छोटे गाँव में, राजस्थान की ढाणियों और आदिवासियों के फलियों-टापरों में, पीने का पानी एक बार भले ही न मिले, चाय जरूर मिल जाएगी। भारतीयता भले ही पूरे भारत में नजर न आए, चाय अवश्य नजर आ जाएगी। भारतीय समष्टि में व्याप्ति के मामले में चाय ने तो ईश्वर को भी मात दे दी है। ईश्वर के अस्तित्व को नकारनेवाले नास्तिक भी चाय के आराधक बने मिल जाएँगे।


अंग्रेज, शासक या प्रशासक बन कर भारत में नहीं आए थे। वे ‘व्यापारी’ बन कर आए थे। भारत को ‘चाय की देन’, उस ‘अंग्रेज व्यापारी’ की ही है। हमारे पैतृक मकान के चबूतरे पर हर शाम, मुहल्ले की चौपाल लगती। उसी में, पिताजी से, बीसियों बार सुना था कि अंग्रेजों ने किस तरह हम भारतीयों को चाय की लत लगाई।
रोज सवेरे, मुहल्लों-गलियों के एक सिरे पर, बड़े-बड़े तपेलों/भगानों में, बादामी रंग का गरम-गरम पेय लेकर अंग्रेजों के भारतीय कारिन्दे (निश्चय ही वे ‘ब्रुक बॉण्ड टी कम्पनी’ के कारिन्दे होते थे) पहुँच जाते। ‘लो! मुफ्त में चाय ले लो। गरम-गरम चाय ले लो!’ की हाँक लगा-लगा कर सबको बुलाते। लोग अपने-अपने बर्तन लेकर जाते और मुफ्त में, गरम-गरम, मीठी-मीठी चाय भर ले जाते। यदि किसी घर से कोई नहीं आता या आ नहीं पाता तो उनके घर जाकर उन्हें चाय देते। लोग इसे ‘अंग्रेजी चाय’ कहते थे। कुछ लोग पीते, कुछ नहीं पीते। बच जाती तो ढँक कर रख दी जाती और जब जी चाहता, गरम करके पी लेते। किसी को बुखार आ जाता तो ‘इसे अंग्रेजी चाय पिलाओ’ की सलाह दी जाती और ताज्जुब कि यह कारगर दवा भी बन जाती।

अंग्रेज तो चले गए किन्तु  काफी कुछ नष्ट-भ्रष्ट-ध्वस्त कर गए। निस्सन्देह इस सबमें हम ‘अंग्रेजों के मानसिक गुलाम आजाद भारतीयों’ ने तब भी पूरा-पूरा योगदान दिया और अब भी दिए जा रहे हैं - अत्यन्त गौरवपूर्वक, निष्ठापूर्वक, सम्पूर्ण तन्मयता से। देव-आराधना करने की, निर्लिप्त नयन, मुदित मन और प्रसन्न वदन मुद्रा में। जो अंग्रेज हमें ‘चौबीसों घण्टे चाय की चुस्कियों का चस्का’ लगा गए वे अंग्रेज तो तब भी निर्धारित समय पर, निर्धारित विधि से बनी चाय पीते थे और आज भी वैसे ही पी रहे हैं। बस! ये तो हम (उनके उपनिवेशी देशों के लोग) ही हैं जिनके चाय बनाने की न तो कोई एक समान मानक-विधि है और न ही पीने का कोई निर्धारित समय। जैसे चाहो, वैसे बना लो और जब चाहे, पी लो। हालत यह हो गई कि चाय आज केवल एक पेय नहीं रह गई। आवभगत का पैमाना बन गई है।

मेरा एक मित्र भोपाल से नीमच जा रहा था। उसकी रेल, रात एक बजे रतलाम पहुँचने वाली थी और रतलाम से नीमच तक उसे कार से जाना था। उसने कहा कि वह भोजन मेरे यहाँ करेगा। मुझे उसकी इस अनौपचारिकता पर प्रसन्नता तो हुई किन्तु रात एक बजे भोजन? मैंने कहा कि मैं उसके लिए शुजालपुर (रात लगभग नौ बजे) या उज्जैन (रात लगभग ग्यारह बजे) में उसके भोजन की व्यवस्था करवा देता हूँ। उसने मना कर दिया। कहा कि वह भोजन तो मेरे यहाँ ही करेगा।

वह आया। उसने भोजन किया। हम दोनों थोड़ी देर बतियाते रहे। रात लगभग ढाई-पौने तीन बजे वह नीमच हेतु प्रस्थित हो गया।
अगली सुबह से मैं उसके पहुँचने की सूचना की प्रतीक्षा करने लगा। शाम तक उसकी कोई खबर नहीं आई तो मैंने ही फोन लगा कर पूछताछ की। वह अत्यधिक खिन्न, अप्रसन्न और कुपित था। उसने कहा - ‘तू ने आधी रात को भोजन तो कराया पर चाय के लिए एक बार भी नहीं पूछा।’ मुझे धक्का लगा। ऐसी बात के लिए तैयार नहीं था। मैंने कहा - ‘मुझे लगा रात ढाई-पौने तीन बजे चाय के लिए पूछना ठीक नहीं रहेगा। डर भी लगा कि कहीं तू मेरी मजाक न उड़ाए। बस! इसीलिए नहीं पूछा।’ वह बोला - ‘ठीक होता या नहीं, यह तो मेरे सोचने की बात थी। तूने कम से कम एक बार पूछना तो था। तू भोजन नहीं कराता तो एक बार चल जाता लेकिन चाय की नहीं पूछना तो सरासर बेइज्जती करना है।’ मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

चाय हमारे जीवन का नहीं, हमारे शरीर की जैविक संरचना का हिस्सा बन गई लगती है। हमारा जीवन और समाज इसीसे पूर्णता प्राप्त कर पा रहा है। शहरी क्षेत्रों में सड़क किनारे सर्वाधिक अतिक्रमण  चाय की गुमटियों/ठेलों का ही मिलेगा। शहरों को जोड़ने वाली सड़कों के विराने को, चाय की होटलों  ही गुलजार बनाए हुए हैं। हमारे चौड़े-चिकने, फोर/सिक्स-लेन हाई-वे पर तो चाय की दुकानें, सुहागन के माथे की बिन्दी की तरह शोभायमान लगती हैं। चाय उत्पादन से लेकर पी गई चाय के कप-प्लेट धोने तक, देश के करोड़ों लोग इससे रोजगार हासिल किए हुए हैं। ‘गोल गुम्बद वाली इमारत’ में दिन भर एक दूसरे की छिछालेदारी करनेवाले हमारे नेता, अपनी सारी नफरत यदि शाम को चाय की प्याली से उठते धुँए के साथ शून्य मे विसर्जित कर देते हैं तो राजनीतिक नायिकाओं का एक साथ बैठकर एक प्याला चाय पीना, सरकार बदल देता है। चाय के दम पर पूरे देश के सरकारी दफ्तरों में काम हो पा रहा है। ‘चाय-पानी’ न हो तो एक कागज भी न सरके।

चाय, केवल चाय नहीं है। इसे होठों से लगाएँ या इससे नफरत करें, हकीकत तो यही है कि अंग्रेजों की यह ‘विचत्र देन’ हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गई है।

चाय को राष्ट्रीय पेय बनाने की बात पर थोड़ा-बहुत हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा होगा लेकिन होगा वही जो होना है। जिस तरह हमने हिन्दी को अंग्रेजी की और भारतीयता को अंग्रेजीयत की ‘लौंडियाँ’ बना दिया है, हॉकी को क्रिकेट की उतरन पहनने वाला खेल बना दिया है, उसी तर्ज पर अपने मट्ठा, शिकंजी जैसे देशी पेयों को चाय के क्रीत दास बना देंगे।

इसलिए, सच्चे भारतीय की तरह व्यवहार कीजिए और गगनभेदी स्वरों में चाय की अगवानी कीजिए -

आओ रानी! हम ढोएँगे पालकी।
यही बनी है राय, वतन अहवाल की।




एक पिछड़ा, नासमझ राष्ट्रवादी

मेरी उत्तमार्द्ध ‘बहनजी’ हैं। ‘बहनजी’ याने शिक्षक। रोज सुबह उन्हें स्कूल छोड़ना और शाम को स्कूल से लाना मेरी दिनचर्या का अनिवार्य अंग है।

26 जनवरी को जब मैं उन्हें ले कर लौट रहा था तो बोलीं - ‘जब से इस स्कूल में आई हूँ, हर साल छब्बीस जनवरी और पन्द्रह अगस्त को हमारे स्कूल के झण्डे की प्रेस के पैसे नहीं देने पड़े। हम बच्चों से पुछवाते हैं तो वह प्रेसवाला बताता ही नहीं। पैसे लेने से मना कर देता है।’ मैंने उसके बारे में पूछा तो बोलीं कि नाम जानना तो दूर की बात रही, उन्होंने तो उसकी शकल भी नहीं देखी है। सुनकर मुझे अच्छा तो लगा ही, इस्तरी करनेवाले से मिलने की इच्छा भी बलवती हुई। चार दिनों तक लगातार कोशिश की उससे मिलने की किन्तु सफलता कल, पाँचवें दिन, 31 जनवरी की शाम को मिली।

उसे देखकर मेरी कल्पना की मूरत ध्वस्त हो गई। मेरा कम्प्यूटर खराब होने के कारण मैं उसका चित्र यहाँ नहीं दे पा रहा हूँ। (अब ठीक हो गया है तो फिरोज का चित्र लगा रहा हूँ।) मेरे कस्बे के रोटरी बाल उद्यान के बाहर, ठेले पर, इस्तरी करने की ‘पोर्टेबल’ दुकान चलाता है। सुबह आकर दुकान जमाना और सूरज ढलते-ढलते समेट लेना। पहली ही नजर में मालूम हो जाता है कि उसकी दुकान, नगर निगम की जमीन पर अस्थायी अतिक्रमण है। क्षीणकाय, चेहरे पर कोई उल्लास नहीं, उलझे-बिखरे लम्बे बाल, गालों की हड्डियाँ बाहर निकली हुईं, कोई तीस-पैंतीस बरस के ‘नौजवान’ से मेरा सामना हुआ।

वह अपनी दुकान समेट रहा था। मैंने कहा - ‘यार! तुम अजीब आदमी हो! प्रेस करने के पैसे नहीं लेते? तुम्हारा नाम क्या है?’ जवाब आया - ‘पैसे क्यों नहीं लूँगा? पैसे नहीं लूँगा तो खाऊँगा क्या?’ मैंने कहा - ‘झूठ बोलते हो। चार दिन पहले तुमने झण्डे की प्रेस करने के पैसे नहीं लिए।’ दुकान समेट रहे उसके हाथ रुक गए। आँखों में चमक आ गई। बोला - ‘अरे! वो! आप झण्डे की बात कर रहे हो? अरे क्या सा‘ब! आपने भी क्या बात कर दी? वो तो ‘अपना झण्डा’ है। उसकी प्रेस करने के पैसे कैसे ले सकता हूँ?’

उसका ‘अपना झण्डा’ कहने पर जोर देना मुझे विगलित कर गया।

बातों का सिलसिला आगे बढ़ा तो मालूम हुआ कि दिन भर में 60-70 रुपयों की ग्राहकी हो जाती है। यह रकम गुजारे के लिए कम तो पड़ती है किन्तु वह कोशिश करने के सिवाय और कर ही क्या सकता है? प्रति वर्ष 26 जनवरी और 15 अगस्त को आसपास के स्कूलों से और विभिन्न संस्थाओं से लगभग बीस-बाईस झण्डे उसके पास प्रेस करने के लिए आते हैं। वह किसी से पैसे नहीं लेता। ‘अपना झण्डा’ जो है! उसकी बातों से मालूम हुआ कि इन दिनों चार रुपये प्रति कपड़े से कम का भाव नहीं है इस्तरी करने का। मैंने हिसाब लगाया, 26 जनवरी और 15 अगस्त को वह अपने दिन भर की ग्राहकी से अधिक की रकम की प्रेस मुफ्त में करता है - ‘अपना झण्डा’ जो है! पहली बार तो उसने अपना नाम नहीं बताया। दूसरी बार पूछा तो लापरवाही से बोला - ‘फिरोज।’

झण्डों की इस्तरी मुफ्त में करने के लिए उससे किसी ने नहीं कहा। ‘अपने झण्डे’ की खिदमत करने की भावना से, अपनी मर्जी से वह यह काम कर रहा है। जब वह यह सब बता रहा था तो उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था - मुद्राविहीन मुद्रा में बता रहा था यह सब। जी में आया, उससे पूछूँ कि क्या यार फिरोज! पैसे नहीं लेते तो मत लो। कोई बात नहीं। पर अपने इस काम का एक प्रेस नोट तो जारी कर देते। साथ में अपना फोटू भी दे देते तो अच्छा होता। लेकिन कहने की हिम्मत नहीं हुई। डर लगा। कहीं पलट कर न कह दे - ‘क्या सा’ब! कैसी बातें करते हो? यह तो ‘अपने झण्डे’ का काम है! इसका क्या बखान करना? क्या लोगों को बताना?’

इस ‘पिछड़े और नासमझ राष्ट्रवादी’ पर मुझे गुमान हो आया। उसे तो पता भी नहीं होगा कि वह 'राष्‍ट्रवादी' है। मुझे बरबस ही वे लोग याद आ गए जो अपने राष्ट्रवादी होने का ढिंढोरा पीटने के मौके तलाश करते हैं और न मिले तो पैदा कर लेते हैं। राष्ट्र के नाम पर भारी-भरकम आयोजनों के लिए लोगों से चन्दा एँठते हैं, सचित्र प्रेस विज्ञप्तियाँ जारी करते हैं और अपने ऐसे कारनामों से रौब जमाते हैं। एक यह फिरोज है जो अपने किए की बात भी पूरी-पूरी नहीं बताता!

फिरोज के दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर मैंने भरे गले से कहा - ‘भाई फिरोज! मैं तुम्हें सलाम करता हूँ। तुम मुझसे बेहतर आदमी और बेहतर हिन्दुस्तानी हो।’

राष्ट्रवादी होने का मतलब

वास्तविकता तो भगवान ही जाने किन्तु वे खुद को राष्ट्रवादी कहते तो हैं ही, ऐसा कहने का कोई मौका नहीं छोड़ते। नहीं मिलता है तो मौका बना लेते हैं। जैसे - ‘बहुत दिनों से आपने चाय नहीं पिलाई। चलिए! राष्ट्रवादी को चाय पिलाइए।’


वे एक सरकारी दफ्तर में अनुभाग अधिकारी हैं। मँहगी जमीनवाली पॉश कॉलोनी में, तीन हजार वर्ग फीट के प्लॉट पर बने भव्य ‘सुदामा निवास’ में रहते हैं। बड़ा बेटा इंजीनीयरिंग के पहले साल में है। छोटा बेटा, इसाई मशीनरी संचालित, अंग्रेजी माध्यम के मँहगे स्कूल में, नौंवी कक्षा में पढ़ रहा है। पत्नी के नाम पर एक जनरल स्टोर है - सुदामा निवास में ही। घर में दो कारें और दो मोटर सायकिलें हैं। इससे अधिक और कुछ हो तो पता नहीं। मुझे तो इतना ही मालूम है।


गणतन्त्र दिवस की पूर्व सन्ध्या पर मैं घर के बाहर खड़ा था। वे जाते हुए नजर आए। व्यस्त थे। बोले - ‘अपन तो राष्ट्रवादी हैं। पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को अपने घर पर राष्ट्र-ध्वज फहराते हैं। आप भी सुबह आइए।’ मैंने कहा - ‘कल की कल देखेंगे। फिलहाल मुमकिन हो तो आधा कप चाय पी लीजिए।’ मेरी बात पूरी बाद में हुई, वे फटफटी से पहले ही उतर गए।


चूँकि उनकी आदत से परिचित था सो वे कुछ बोलते उससे पहले ही मैंने, ‘आक्रमण ही श्रेष्ठ बचाव है’ पर अमल करते हुए कहा - ‘आप तो राष्ट्रवादी हैं। राष्ट्र के लिए क्या कर सकते हैं?’ बोले - ‘आप भी क्या सवाल करते हैं! देश के लिए जान भी दे सकता हूँ।’ मैंने कहा - ‘जान देने की जरूरत जब आएगी तब देखी जाएगी। फिलहाल तो आप यदि कर सकें तो दो-चार कुछ छोटे-छोटे काम कर दें।’ ‘कहिए! कहिए! देश का कोई काम छोटा नहीं होता।’ उत्साह से जवाब दिया उन्होंने। मैंने सन्देह से देखा और बोला - ‘मुझे नहीं लगता कि आप ये छोटे काम कर पाएँगे।’ वे बुरा मान गए। बोले - ‘आप मेरे राष्ट्रवादी होने पर शक कर रहे हैं?’ मैंने कहा - ‘आप तो बुरा मान गए। मैं भला आपके राष्ट्रवादी होने पर शक कैसे कर सकता हूँ? आपके बारे में आप जो कहेंगे वह तो मुझे मानना ही है।’ वे खुश हो गए। बोले -‘हाँ। अब ठीक है। बताइए।’ मैंने कहा - ‘आपने अपनी कोठी के सामने की सरकारी जमीन की 6 फीट की पट्टी पर अतिक्रमण कर रखा है। उसे हटा लीजिए।’ वे चिहुँक गए। आँखें तरेर कर बोले - ‘आप अपने घर बुलाकर मेरा मजाक उड़ा रहे हैं? वह अतिक्रमण है? आसपास के तमाम लोगों ने जमीन घेर रखी है। मैं तो सबके साथ चल रहा हूँ।’ मैंने कहा - ‘चलिए। छोड़िए। मुझे पता है कि आपकी दोनों कारें आपके या आपके किसी परिजन के नाम पर नहीं हैं। इन्हें अपने नाम पर करवा लीजिए।’ खुद पर काबू करते हुए बोले - ‘आज आपके इरादे नेक नहीं लग रहे। आप जानते हैं कि मैं ऐसा नहीं कर सकता फिर भी आप कह रहे हैं। कारें किसी के भी नाम हो, क्या फर्क पड़ता है? हैं तो देश में ही?’


दो सवाल हो गए थे और वे अपने राष्ट्रवादी होने का नारा बुलन्द नहीं कर पाए थे। मेरा आत्म विश्वास बढ़ गया। मैंने थोड़ी हिम्मत और की। बोला - ‘अच्छा, एक काम तो आप कर ही सकते हैं। भाभीजी के जनरल स्टोर से कोई भी सामान बिना बिल के नहीं बिके, यह तो आप कर ही सकते हैं।’ अब वे तनिक असहज हुए। आवाज का ‘दम’ अचानक ही कम हो गया। बोले - ‘वह सब तो टैक्स प्लानिंग के हिसाब से होता है। वकील साहब और सैल्स टैक्स-इनकम टैक्स के इन्सपेक्टरों-अफसरों की सलाह से होता है।’ उनसे सहमत होने का और उन पर दया दिखाने का पाखण्ड करते हुए मैंने कहा - ‘हाँ। यह बात तो है। जब वकील, इन्सपेक्टर और अफसर सलाह देते हैं तो आप कर ही क्या सकते हैं? चलिए, इसे भी छोड़ें। लेकिन बबलू को बिना लायसेन्स के मोटर सायकिल चलाने से तो आप रोक ही सकते हैं। अभी तो चौदह साल का ही है और आप जानते हैं कि अठारह साल से कम के बच्चे का, बिना लायसेन्स गाड़ी चलाना अपराध है।’ अब उनका स्वर सामान्य से भी नीचा हो गया था। बोले - ‘हाँ, गैरकानूनी तो है किन्तु क्या किया जाए? एक तो उसका स्कूल दो किलोमीटर दूर है और दूसरा, उसके सारे दोस्त मोटर सायकिलों से ही स्कूल आते हैं। मेरी तो कोई बात नहीं किन्तु बच्चों का मामला है। आप तो जानते ही हैं कि वे जल्दी बुरा मान जाते हैं। दोस्तों के बीच उसकी इज्जत का सवाल है।’ मैंने लापरवाही से कहा - ‘चलिए। इसे भी छोड़िए। लेकिन आप उससे यह तो कह ही सकते हैं कि वह अपनी मोटर सायकिल पर तीन सवारी न बैठाए। यह भी गैरकानूनी है और अपराध है।’ ‘आपकी यह बात भी सही तो है किन्तु आप तो जानते ही हैं कि आजकल के बच्चे किसी नहीं सुनते। माँ-बाप की भी नहीं। कहने का कोई फायदा नहीं।’


चाय कब की खत्म हो चुकी थी। वे जाने को कसमसाने लगे थे किन्तु ‘अच्छा! चलता हूँ’ कहने का मौका नहीं पा रहे थे। मैंने कहा - ‘आप जब भी मिलते हैं तो मुझे खुद पर गर्व हो आता है कि मैं आप जैसे राष्ट्रवादी से मिला।’ उन्हें मानो टॉनिक मिल गया। एक झटके में ताजादम हो गए। मैंने कहा - ‘कहने को तो आप सेक्शन ऑफिसर हैं किन्तु मैंने देखा है कि आपको पूरे दफ्तर का काम करना पड़ता है। इस चक्कर में आपको कई बार नाजायज व्यवहार करना पड़ता है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि काम करने के नाम पर आप आम लोगों से, अपनी ओर से कुछ नहीं माँगें? बिना माँगें वे जो दे दें, वह कबूल कर लें और कोई कुछ नहीं दे तो उसे, उसका काम हो जाने के बाद चला जाने दें?’ इस बार वे अचानक ही आक्रामक हो गए। बोले - ‘आप क्या समझते हैं मैं अपने लिए लेता हूँ? मुझे तो ऊपरवालों को देने के लिए लोगों से लेना पड़ता है। और फिर! क्या मैं अकेला ही लेता हूँ? सारी दुनिया इसी पर चल रही है। आप को मैं ही मैं नजर आ रहा हूँ! घण्टे भर से आप मुझसे ऊलजलूल बातें किए जा रहे हैं, कुछ तो भी कहे जा रहे हैं। मैं तो आपको बुद्धिजीवी मानकर आपकी बातें सुने जा रहा हूँ। कोई और होता या मैं आपकी इज्जत नहीं करता तो देखते कि क्या हो जाता।’


मैं तत्काल कुछ नहीं बोला। थोड़ी देर बाद जब वे सामान्य होते लगे तो बोला - ‘याने आप देश के लिए कुछ नहीं कर सकते?’ वे भड़ाक् से उठ खड़े हुए। बोले - ‘सबसे पहले यही तो बात हुई थी? मैंने कहा था ना कि मैं देश के लिए जान दे सकता हूँ। लेकिन लगता है आपने सुना ही नहीं। सारी दुनिया जानती है कि मैं राष्ट्रवादी हूँ। विश्वास न हो तो सुबह मेरे घर आइएगा। कल छब्बीस जनवरी है। मेरे घर पर झण्डावन्दन होगा। आपको पता लग जाएगा।’और मेरे नमस्कार करने से पहले ही वे अपनी मोटर सायकिल पर बैठ गए, मेरी ओर देखा भी नहीं और फुर्र हो गए।


सोच रहा हूँ कि कल उनके घर जाऊँ या नहीं? वे तो राष्ट्रवादी हैं! देश पर जान देने के लिए एक पाँव पर बैठे हैं और कृतघ्न राष्ट्र है कि उन्हें मौका ही नहीं दे रहा।

तो, यह है अपना वास्तविक राष्ट्रीय चरित्र

राष्ट्र और धार्मिक आस्थाओं की बलिवेदी पर अपने प्राण न्यौछावर कर देने की हमारी दम्भोक्तियों की पोल खुल गई है। प्रथमतः तो हमने ऐसी दुहाइयाँ देनी ही नहीं चाहिए (राष्ट्र और धर्म पर प्राण न्यौछावर करने की अपनी मंशा भी भला कोई गर्वोक्ति का विषय है? यह तो हमारा न्यूनतम कर्तव्य है) किन्तु हम देते रहे हैं। चलिए, कोई बात नहीं। बहुत हो गया। यह ठीक समय है कि हम अपनी इस निर्लज्ज मूर्खता का सार्वजनिक घोष अब अविलम्ब बन्द दें।


मैं बार-बार और बराबर कहता रहा हूँ कि हमारे राष्ट्रीय चरित्र की वास्तविक पहचान तो सदैव ही शान्ति काल में होती है। युध्द काल में तो हर कोई न केवल देश भक्त होता है बल्कि उसे होना ही पड़ता है। आज देश में युध्द काल नहीं है और इसीलिए हमारे राष्ट्रीय चरित्र की वास्तविकता, निर्लज्जता की सड़ांध के साथ सड़कों पर बह रही है।


यह बताने वाली बात नहीं है कि अवर्षा, कम पैदावार, सरकार के निकम्मेपन और राजनीतिक स्वार्थ सिध्दि के चलते पूरा देश शकर और दालों के अभाव से जूझ रहा है। देश के 80 प्रतिशत लोग तो आज भी 20 रुपये प्रतिदिन से कम पर जीवन यापन कर रहे हैं। किन्तु, जो मध्यम वर्ग, येन-केन-प्रकारेण अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींच रहा है, उसके लिए भी इन दोनों चीजों को अपने रसोई घर में बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती हो गया है। होना तो यह चाहिए कि ऐसे समय में हम अपनी आवश्यकताओं को कम करें किन्तु घर से बाहर बनाई हुई अपनी हैसियत की रक्षा की चिन्ता और ‘लोग क्या कहेंगे’ जैसे जुमले हमें अनुशासित नहीं रहने देते। सो, औसत मध्यमवर्गीय परिवार के लिए तो यह स्थिति किसी ‘राष्ट्रीय आपदा’ से कम नहीं है।


ऐसे में सबसे पहले और सबसे बड़ी उम्मीद सरकार से ही होती है। किन्तु सारा देश देख रहा है कि सरकार के मन्त्री अपनी लाचारी सार्वजनिक करने में जुट गए हैं। ऐसे में, खुद समाज की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। आपात स्थितियों में तो लोग अपने, अनाज के कोठार खोल देते हैं। बेशक, स्थिति अकाल की नहीं है किन्तु सामान्य भी नहीं है। असामान्य स्थितियों में हमारा सार्वजनिक आचरण उदार और परस्पर चिन्ता लिए हुए होना चाहिए। किन्तु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत उजागर हो रही है।


सारे देश की बात छोड़ दें, केवल मध्य प्रदेश में ही करोड़ों रुपयों की लाखों क्विण्टल शकर और दाल का अवैध संग्रह बरामद किया गया है। याने, एक ओर लोग इन चीजों को तरस रहे हैं और दूसरी ओर भाई लोग, नियमों, नैतिकता, धार्मिक उपदेशों को ताक पर रखकर मुनाफे की जुगत में आपराधिक ही नहीं, असामाजिक, अमानवीय और ईश्वर के प्रति अपराध तक कर रहे हैं। बड़ी ही आसानी से कह दिया जाएगा कि यह तो व्यापार का हिस्सा है और व्यापार का अन्तिम तथा एकमेव लक्ष्य मुनाफा होता है। सो, यदि मुनाफे के लिए यह सब किया गया तो इसमें गैर वाजिब क्या? किन्तु ऐसा कहना ‘गुनाह बेलज्जत’ के सिवाय और कुछ भी नहीं है। बेशक, व्यापार मुनाफे के लिए ही किया जाता है किन्तु व्यापार का भी अपना धर्म होता है। उसमें जायज और नाजायज जैसे तत्व काम करते हैं। व्यापारिक बुध्दि सदैव ही मुनाफे के लिए पे्ररित करते हुए मनुष्य को लालची बनाती है। यही वह क्षण और स्थिति होती है जब हमारा राष्ट्रीय चरित्र सामने आता है। किन्तु राष्ट्रीय चरित्र तो हमारे लिए केवल समारोहों में, बढ़ चढ़ कर प्रदर्शित करने की वस्तु है, आचरण की नहीं।


अवैध संग्रह के जितने मामले सामने आए हैं उनकी विस्तृत नहीं, सामान्य जानकारियाँ ही बता देंगी कि इनमें लिप्त लोग किसी न किसी राजनीतिक दल से, किसी इन किसी धर्म से, किसी न किसी सामाजिक संगठन से जुड़े होंगे और राष्ट्र पे्रम तथा धर्म की दुहाइयाँ देने में पीछे नहीं रहते होंगे। किन्तु, चूँकि हमारे समाज में ‘होने’ के बजाय ‘दिखना’ अधिक आवश्यक है इसीलिए लालच के मारे और लालच से अन्धे हुए इनमें से एक को भी, लोगों के कष्टों की बात तो छोड़िए, न तो राष्ट्र याद आया और न ही धर्म।


यहाँ मुझे रामचरित मानस की एक चैपाई याद आ रही है -

पर हित सरिस, धरम नहीं भाई।

पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।


शकर-दाल के अवैध संग्रहियों को तो कोई ‘पर हित’ भी करना था। वे अपना वाजिब मुनाफा लेकर व्यापार करते। ऐसा कर वे ‘पर पीड़ा’ के अधर्म से बच ही सकते थे। पर ‘वाजिब’ से हमारा काम नहीं चलता। हमारी बुध्दि तो हमें ‘गैर वाजिब’ की ओर धकेलती है। जिन क्षणों और स्थितियों में हमें विवेकवान बनना चाहिए, हम केवल लालची बन कर सामने आते हैं।


सो, हम राष्ट्र और धर्म के लिए प्राण न्यौछावर करने की दम्भोक्तियाँ भले ही करते रहें किन्तु वह सब हमारा दोगलापन, पाखण्ड और आत्म-वंचना है।


यही है हमारा वास्तविक राष्ट्रीय चरित्र।

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वेलेण्टाईन डे का विरोध : एक 'कुविचार'

मेरे लेप टाप की घड़ी के मुताबिक इस समय 12 और 13 फरवरी की दरमियानी रात के दो बजने वाले हैं। ‘ब्लागवाणी’ के जरिए ढेर सारे ब्लागों की सैर की। कुछ पर टिप्पणी की। अचानक ही इस पोस्ट का विषय मन में कौंधा। मुमकिन है कि यह ‘कुविचार’ अथवा ‘कुतर्क’ हो किन्तु अन्ततः इसमें ‘विचार’ और ‘तर्क’ तो है ही। इसलिए इसके साथ तनिक अतिरिक्त सदाशयता और उदारता बरती जाए, यह अनुरोध भी है और अपेक्षा भी।


वेलेण्टाइन डे के विरोध का आधारभूत तर्क है कि यह नितान्त पाश्चात्य अवधारणा है और भारतीयता से इसका कोई तादात्म्य नहीं है। सही है। किन्तु यह एकमात्र ऐसी पाश्चात्य अवधारणा क्यों है जो आँखों में खटक रही है? अनेक पाश्चात्य अवधारणाएँ और परम्पराएँ हमने अत्यन्त उदारतापूर्वक और प्रसन्नतापूर्वक अंगीकर कर रखी हैं-बरसों से। जैसे कि, जन्म दिन पर केक काटना।


केक काटने में पहले, केक पर लगी मोम बत्तियाँ फूँक मार कर बुझाई जाती हैं। इसके ठीक विपरीत, भारतीय परम्परा में तो ऐसे प्रसंगों पर दीप प्रज्ज्वलन किया जाता है। कहाँ है वह परम्परा? और तो और, भारतीयता के ज्वाजल्य प्रतीक पुरुष अटलजी के जन्म दिन पर भी केक काटा जाता है! यही क्यों, अब तो मन्दिरों में भी केक काटे जाने लगे हैं! मेरे बच्चे भी केक काट कर ही अपना जन्म दिन मनाते हैं।


एक और पाश्चात्य परम्परा हम समारोहपूर्वक अंगीकार करने लगे हैं। यह है - रिंग सेरेमनी। भारतीय संस्कार सूची में ‘रिंग सेरेमनी’ कहीं है ही नहीं। हाँ, 'वाग्‍दान संस्‍कार' का उल्लेख अवश्य है। लेकिन इसका स्थान अब ‘रिंग सेरेमनी’ ने ले लिया है। मेरे बेटे का ‘वाग्‍दान संस्कार’ जब सम्पन्न हो रहा था तब ‘रिंग सेरेमनी‘ की आवाज उठी थी। मैं ने सहज भाव से इससे इंकार कर दिया था और कहा था कि भारतीय परम्परा में ‘रिंग सेरेमनी’ नहीं है। मेरी बात तब भले ही मान ली गई थी किन्तु कई लोग अब भी मुझसे खिन्न बैठे हैं और गाहे-बगाहे मुझे उलाहना दे ही देते हैं कि मैं ने एक रस्म पूरी नहीं होने दी।


हाथ मिलाना भी भारतीय परम्परा नहीं है। भारतीय परम्परा में तो अपने ही दोनों हाथ जोड़ कर, यथा सम्भव नत-मस्तक हो, सामने वाले का अभिवादन किया जाता है। लेकिन हम सब देख रहे हैं कि ‘करतल युग्म से नमस्कार’ करें न करें, हाथ अवश्य मिलाते हैं।


हाथ मिलाना पूर्णतः पाश्चात्य परम्परा है जिसका अपना अनुशासन है। इसमें ‘जूनीयर’ केवल ‘विश’ (यथा,गुड मार्निंग गुड नून,) करता है और प्रत्युत्तर में ‘सीनीयर’ हाथ बढ़ाते हुए ‘विश’ का जवाब देते हुए कुशलक्षेम पूछता है-‘हाऊ डू यू डू?’ किन्तु हमने न केवल इस पाश्चात्य परम्परा को प्रेमपूर्वक आत्मसात कर लिया है अपितु इसका भारतीयकरण भी कर लिया है-अब ‘जूनीयर‘ भी मिलते ही तपाक् से अपना हाथ आगे बढ़ा देता है और कोई भी इस ‘अशिष्टता’ का बुरा मानना तो दूर रहा, इसका नोटिस भी नहीं लेता!

नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा भी हमारे लिए एक समारोह मात्र है। इस प्रसंग का उपयोग हम अपनी भारतीयता को याद करने और प्रदर्शित करने के लिए करते हैं और जैसे ही हमारा यह ‘मतलब’ पूरा होता है, हम इसे तत्काल ही भूल जाते हैं। हममें से कितने लोग अपने दैनन्दिन व्यवहार में भारतीय महीनों और तिथियों का उपयोग करते हैं? अपवादों को छोड़ दें तो, कोई नहीं। हम सब ‘ईस्वी’ सन् और तारीखें ही प्रयुक्त करते हैं और ऐसा करते हुए क्षणांश को भी अनुचित, अन्यथा अथवा अटपटा नहीं लगता।


ये तो गिनती की बाते हैं जो मुझे इस समय बिना किसी कोशिश के याद आ रही हैं। कोशिश करने पर ऐसी बीसियों बातें निकाली जा सकती हैं।

फिर, आखिर वेलेण्टाईन डे का ही विरोध क्यों? मुझे सन्देह होने लगा है कि यह विरोध कहीं प्रायोजित अथवा ‘डब्ल्यू डब्ल्यू एफ’ की तरह ‘नूरा कुश्ती’ तो नहीं?


इस दिन कोई आयोजन नहीं होते, कोई समारोह नहीं होते। होने के नाम पर बस, आपस में कार्ड का या भेंट का या फूलों का आदान-प्रदान होता है। ऐसे ‘डे’ और इनके बधाई पत्र भी भारतीय परम्परा का अंग नहीं हैं। किन्तु अनेक विदेशी कम्पनियाँ इनका उत्पादन/व्यापार करती हैं। इस व्यापार के आँकड़े अरबों-खरबों के निकल आएँ तो मुझे ताज्जुब नहीं होगा। यही नहीं, यह आँकड़ा वर्ष-प्रति-वर्ष तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। मुझे सन्देह हो रहा है कि कहीं, इन कार्डों का उत्पादन/व्यापार करने वाली विदेशी कम्पनियाँ ही तो यह विरोध प्रायोजित नहीं करवा रहीं? सन्देह इसलिए भी हो रहा है क्यों कि विरोध करने वाले भाई लोग इन कार्डों का विक्रय करने वाली दुकानों को तो निशाने पर लेते हैं पर इन्हें उत्पादित करने वाली फैक्ट्रियों की तरफ देखते भी नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘वहाँ’ न देखने की एवज में ‘पार्टी फण्ड’ मिलता हो और यहाँ ‘देख लेने’ के नाम पर वसूली हो रही हो?


वेलेण्टाईन डे का विरोध करने वालों का विरोध करने के लिए अब गुलाबी चड्डियाँ भेजे जाने का क्रम चल पड़ा है। भारतीय समाज में ‘चड्डी’ कभी भी विरोध का प्रतीक अथवा माध्यम नहीं रही। यह भी पूरी तरह से पाश्चात्य प्रतीक और परम्परा है। इसके उत्पादन और व्यापार में भी विदेशी कम्पनियाँ अग्रणी हैं। कहीं यह अभियान भी तो प्रायोजित नहीं?


मुझे तो इस सबके पीछे कोई ‘विशेषज्ञ’ (मैं ‘माहिर’ और ‘शातिर’ जैसे विशेषण प्रयुक्त करने से बचना चाह रहा हूँ) ‘मानव मनोविज्ञानी मस्तिष्क’ अनुभव हो रहा है। सामान्य मनुष्य प्रकृति के अधीन ‘निषेध सदैव ही आकर्षित करते हैं।’ सो, इसी मनुष्य प्रकृति का ‘वाणिज्यिक उपयोग’ करने के लिए, वेलेण्टाईन डे का विरोध करवाया जा रहा हो ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा इसकी ओर आकर्षित हों, (और विदेशी कम्पनियों को मालामाल करने के लिए) ज्यादा से ज्यादा बधाई पत्र, भेंट दी जाने वाल वस्तुएँ खरीदें। इसे ‘दबाने पर गेंद और ज्यादा उछलती है’ या फिर ‘न्यूटन के गति नियमों’ के अनुसार ‘किसी भी क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है’ भी कहा जा सकता है।


अब ‘विरोध का विरोध’ भी चड्डियों के जरिए हो रहा है। मुझे तो यह भी ‘फारेन गुड्स की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी’ ही अनुभव हो रही है और प्रायोजित या कि ‘नूरा कुश्ती’ ही लग रही है।


आधी रात को मन में उठी इन बातों का मेरे पास न तो कोई आधार है और न ही कोई तथ्यात्मक प्रमाण। ‘यही सही है’ यह कहने की स्थिति में मैं बिलकुल ही नहीं हूँ। किन्तु ‘यह सही क्यों नहीं हो सकता?’ जैसा सवाल, इस समय तो मुझे मथ ही रहा है।


कहीं ऐसा तो नहीं कि भारतीयता की रक्षा के नाम अपने ही लोग अपने ही लोगों को पीट रहे हैं और जेबें भर रहे हैं विदेशियों की?

मुझे किसी की नीयत पर सन्देह नहीं है। किन्तु सन्देह के बीज को अंकुरित होने के लिए न तो उपजाऊ जमीन की आवश्यकता होती है और न ही खाद-पानी की। फिर, जयचन्द और मीर जाफर जैसे नाम, ऐसे क्षणों में न चाहते हुए भी मन में उठने लगें और ‘विश्वामित्र-मेनका’ जैसे प्रसंग आँखों के सामने नाचने लगें तो ऐसे ‘कुविचार‘ और ‘कुतर्क’ सच अनुभव होने लगें तो आश्चर्य नहीं।

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लो जी! मैं उकस गया

कल वाली मेरी पोस्ट राष्‍‍ट्र बनाम ‘माँ’ और ‘वार वनीता’ पर मायोपिकजी की टिप्पणी नहीं आती तो सच मानिए मेरी दशा उस महिला जैसी हो जाती जिसने नई, मँहगी, भारी-भरकम बनारसी साड़ी पहनी हो और कोई उससे यह भी न पूछे-‘साड़ी नई है? कितने की है?’


सो, सबसे पहले मायोपिकजी को अन्तर्मन से धन्यवाद और आभार। यदि वे ‘अपनीवाली’ पर नहीं आते तो मुझे यह सब कहने का निमित्त कैसे मिलता?


मैं कांग्रेसी हूँ या नहीं इसकी सफाई व्यर्थ होगी (क्योंकि मायोपिकजी ने मेरी सारी पोस्टें थोड़े ही पढ़ी हैं?) किन्तु यह कहना जरूरी है कि मैं बरसों 'शाखा' में गया हूँ, खूब 'दक्ष-आराम' किया है और ‘धरम पर मरना सीखा है, धरम से कैसे हट जाएँ’ तथा ‘भारत के वीरों जागो, सोये सितारों जागो’ जैसे समवेत गीतों में अपना कण्ठ मिलाया है।


‘संघ’ की अनेक ‘परोक्ष विशेषताएँ’ मेरे लिए सदैव आकर्षण का विषय। रहीं उनमें से चार मुझे महत्वपूर्ण लगीं। पहली : जिस काम के लिए दूसरों को वर्जित करो वही काम दबंगता से खुद करो किन्तु हाँ, अकेले मत करो, सामूहिक रूप से करो और दबदबा बनाते हुए करो ताकि तत्काल प्रतिरोध, प्रतिवाद और प्रतिकार करने का साहस कोई नहीं जुटा पाए। दूसरी : स्‍ववर्जित काम करते हुए पकड़े जाओ तो जोर-जोर से कहो कि वह काम मैं ने किया ही नहीं, लोग झूठ बोल रहे हैं। तीसरी : फिर भी लोग न मानें और बात बनती न दिखाई दे तो अपने विरोधी की वैसी ही गलती बताओ और उसे दलील बना कर अपनी गलती का औचित्य साबित करो। चौथी : ऐसा करते समय यह विशेष ध्यान रखो कि वृत्ति का हवाला मत दो, व्यक्ति का हवाला दो क्योंकि लोग वृत्ति को नहीं जानते, व्यक्ति को जानते हैं। (संघ के विरोधी इस तरीके को ‘व्यक्तित्व हनन‘ अथवा ‘चरित्र हनन’ करना कहते हैं।)


मायोपिकजी की राजनीतिक प्रतिबध्दता मुझे नहीं पता किन्तु वे संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक की तरह व्यवहार करते दिखाई दे रहे हैं और यही भूमिका निभाते हुए उन्होंने इन्हीं विशेषताओं का सहारा लिया। उनकी ट्रेनिंग सफल रही। बधाई।


मैंने अपनी पोस्ट में किसी का नाम नहीं लिया किन्तु मायोपिकजी को शायद समस्त सम्बन्धितों के नाम नजर आ गए। ऐसा ही होता है। आदमी सारी दुनिया से अपने पाप छुपा ले, अपने आपसे नहीं छुपा पाता और ऐसे में यदि कोई किसी और की बात करे तो भी उसे अपना ही उल्लेख अनुभव होता है।


मायोपिकजी ने किन्हीं कांग्रेसी मिनिस्टर किरण चौधरी द्वारा, राष्‍‍ट्रीय शोक काल में सूरजकुण्ड मेले का रंगारंग उद्घाटन का उल्लेख कर मुझे ‘उकसाते’ हुए पूछा है कि मैं चौधरीजी पर कब लिख रहा हूँ। नेक काम में देरी कैसी? लो जी! लिख दिया। फौरन। किरण चौधरी कोई ‘पवित्र गाय’ नहीं है जो राष्‍ट्रीय शोक काल में उत्सव मनाने के अपराध से मुक्त हो जाएँ। वे कांग्रेसी हों या कोई और, अपराध तो अपराध है। उनकी सजा भी वही जो मध्य प्रदेश के ‘संघियों’ की। अब मायोपिकजी की बारी है। वे बताएँ कि मध्यप्रदेश के संघियों को कब सजा दिलवा रहे हैं ताकि किरण चौधरी को सजा दिलवाने का उपक्रम शुरु किया जा सके?


लेकिन किरण चौधरी में और मायोपिकजी की जमात में एक मूलभूत अन्तर है। किरण चौधरी की जमात के लोग राष्ट्रवाद की ठेकेदारी नहीं करते। वे संस्कृति, नैतिकता, ईमानदारी, सदाचार और ऐसी ही तमाम बातों की दुहाइयाँ नहीं देते। वे अपनी गरेबान में भले ही न झाँकते हों किन्तु दूसरों की गरेबान पर भी नजर नहीं डालते। वे 'सोशल पुलिसिंग' भी नहीं करते। वे ‘भारतीय संस्‍कृति’ की दुहाई देकर महिलाओं को सड़कों पर नहीं पीटते। जो काम वे खुद करते हैं वे काम दूसरे करें तो आपत्ति नहीं उठाते।


इसके ठीक विपरीत संघ परिवारी वह सब करते हैं जिसके लिए वे दूसरों को मना करते हैं। वे ईमानदारी की दुहाई देते हैं और उनके आनुषांगिक संगठन भाजपा के राष्‍‍ट्रीय अध्यक्ष कैमरे के सामने 'मिठाई' के निमित्त प्रसन्नतापूर्वक रिश्‍वत लेते हैं। ‘हिन्दुओं की घर वापसी’ का अभियान चलाने वाले उनके जन-नायक, 'पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा कसम, खुदा से कम भी नहीं' कहते हुए नोटों की गड्डियाँ लेने में न तो देर करते हैं और न ही संकोच। वे ‘चरित्र’ की दुहाइयाँ देते हैं और उनके स्वयंसेवक, रंगरेलियाँ मनाते हुए 'मादरजात' अवस्‍‍था में पकड़े जाते हैं।


किसी गरीब हिन्दू की बेटी यदि किसी मुसलमान से प्रेम कर बैठे तो समूचे हिन्दुत्व पर संकट आ जाता है लेकिन खुद आडवाणी की सगी भतीजी एक मुसलमान के बच्चों की माँ बनी हुई है, इसका जिक्र नहीं करते। सुना तो यह भी है कि भाजपा के कम से कम दो मुसलमान नेताओं (उनमें से एक तो भूतपूर्व केन्द्रीय मन्त्री बताए जाते हैं) की वंश बेल बढ़ाने का पुण्य कार्य भी हिन्दू स्त्रियों के ही खाते में जमा है जिस पर एक भी ‘हिन्दू धर्म रक्षक संघी’ को आज तक आपत्ति नहीं हुई है।


वे इसाई मिशनरी संचालित स्कूलों को इसाईयत के प्रचार केन्द्र और धर्मान्तरण के कारखाने कहते हैं लेकिन मेरे शहर में आ जाइए, आपको ऐसे बीसियों ‘हिन्दू वीरों’ के दर्शन करा दूँगा जो सवेरे तो 'शाखा' में जाते हैं और दोपहर में अपने बच्चों या पोतों/पोतियो को लेने के लिए कान्वेण्ट स्कूल के सामने प्रतीक्षारत खड़े हैं। ‘संघ’ के कुछ 'निष्‍‍ठावान स्वयंसेवकों' ने, ‘धर्मान्तरण के ऐसे कारखानों’ में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए मुझसे सिफारिश कराई है।


‘संघ परिवारी’ आज भी 6 दिसम्बर को ‘हिन्दू शौर्य दिवस’ के रूप में मनाते हैं। इसी दिन बाबरी मस्जिद का ध्वंस, सुनियोजित तरीके से किया गया था। लेकिन मजे की बात यह है कि ‘छोटे सरदार’ से लेकर मेरे मोहल्ले के छुटभैया स्वयंसेवक तक, एक भी ‘हिन्दू नर पुंगव’ इस ‘शौर्य’ की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। सब के सब एक स्वर में कहते हैं - ‘‘हिन्दू शौर्य दिवस का कारण बना ‘बाबरी मस्जिद ध्वंस’ मैं ने नहीं किया।’’ अपनी-अपनी जमानत का जुगाड़ सबकी जिन्दगी और मौत का सबब बन गया-हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व गया भाड़ में। श्रेय लेने के लिए 'शूर वीर' हैं और जिम्मेदारी लेने के नाम पर 'शिखण्डी' को शर्मिन्दा कर दें। ये न तो बाप का नाम बताते हैं और न ही श्राध्द करते हैं। ये सबके सब मादा हैं, यह जानने के लिए इनकी पूँछे उठाकर देखने की भी जरूरत नहीं रखी भाई लोगों ने।


लेकिन मैं यह सब क्यो कह रहा हूँ? यह सब ही नहीं, इसका करोड़ गुना अधिक तो खुद मायोपिकजी को मालूम है-वह सब भी, जो दुनिया को नहीं मालूम। लेकिन यह सब नहीं कहता/लिखता तो मायोपिकजी निराश हो जाते, मुझे उकसाने का उनका उपक्रम अपूर्ण रह जाता।


सो, मायोपिकजी शायद अब अनुभव करें कि जिस जमात की सरपरस्ती वे उत्साह के अतिरेक की सीमा तक करते हैं उस जमात के बन्दे भी औसत मनुष्‍य ही हैं-देवता नहीं। उनमें भी वे तमाम कमजोरियाँ हैं जो बाकी सबमें हैं। उनकी जमात के लोग भी बाकी सब लोगों की तरह रिश्वत लेते-देते हैं, टैक्स चुराते हैं, नम्बर दो में खरीद-बिक्री करते हैं, यातायात के नियमों का उल्लंघन करते हैं, लोक भय के अधीन एक सामान्य व्यक्ति जितना चरित्रवान रह पाता है, उतने ही चरित्रवान वे भी रह पाते हैं, अपने स्वार्थ के लिए बिना सोचे, अपने सम्पूर्ण आत्म विश्‍‍वास से झूठ बोल लेते हैं, पाखण्ड करने में तो उनका कोई सानी है ही नहीं।


इसलिए, हे! राष्ट्रीयता के ठेकेदारों के सरपरस्त श्रीमान् मायोपिकजी! मुद्दे की बात यह है कि आप और आपकी जमात के लोग जिस सहजता से पैमानों का दोहरीकरण कर रहे हैं, उस पर पुनर्विचार कीजिए। राष्‍‍ट्रीयता की दुहाई आप बेशक दें किन्तु अपनी बारी आने पर उस दुहाई को याद रखें। आप लोगों की ऐसी ही हरकतों के कारण ‘संघ’ को लांछन और आरोप झेलने पड़ रहे हैं। राष्‍‍ट्रीय प्रतीक का अपमान कोई भी करे, अपराध है। कोई कांग्रेसी है या संघी, इस आधार पर वह अपराध मुक्त नहीं होता।


दूसरों के अपराध को बचाव की दलील की तरह प्रयुक्त करने से आप निर्दोष नहीं हो जाते। उनके उन तमाम अपराधों को गिनवा कर तथा लोगों को वैसे अपराधों से मुक्ति दिलाने का वादा कर आप सत्ता में आते हैं तो आपकी यह न्यूनतम जिम्मदारी (मेरी हिम्मत देखिए कि मैं आपसे ‘जिम्मेदारी’ की उम्मीद करने लगा!) होती है कि आप वैसी कोई गलती नहीं करें। यदि दूसरों के अपराध के आधार पर आप अपराध करने की सुविधा और छूट लेना चाहते हैं तो फिर पुराने वाले ही क्या बुरे थे? लोगों ने उन्हें हटाया ही क्यों? उस दशा में तो फिर उन्हें ही चुना जाना चाहिए था-वे आपसे अधिक ‘अनुभवी अपराधी’ जो थे!

इसीलिए अपनी कल वाली पोस्ट की अन्तिम बात फिर कह रहा हूँ। यदि आप चाहते हैं कि आपकी ‘माँ’ को सारी दुनिया ‘देवी’ माने और उसकी पूजा करे तो इसकी शुरुआत आपको ही करनी पड़ेगी। यह बिलकुल नहीं चलेगा कि आप तो अपनी माँ के साथ ‘वार वनीता’ जैसा व्यवहार करें और चाहें कि बाकी सब उसे देवी मानें और पूजा करें।


यह न तो सम्भव है और न ही उचित।
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राष्‍ट्र बनाम ‘माँ’ और ‘वार वनीता’

पुलिसवालों के बीच एक कहावत अत्यधिक लोकप्रिय ही नहीं है, वे इसे अपनी सफलता का मूल-मन्त्र भी मानते हैं। कहावत है-‘काम मत कर, काम की फिक्र कर, फिक्र का जिक्र कर। तेरा प्रमोशन पक्का।’

संघ परिवार की गतिविधियाँ देख कर लगता है कि या तो उसने पुलिसवालों की इस कहावत को अपना भी आदर्श बना रखा है या फिर पुलिसवालों ने यह आदर्श, संघ परिवार से ग्रहण किया है।

भोपाल के, इसाई मिशनरी संचालित एक स्कूल में घुसकर अ.भा.वि.प. कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ कर दी। गणतन्त्र दिवस समारोह में, इस स्कूल के प्राचार्य ने, ध्वजारोहण के बाद, राष्ट्रगीत शुरु करने वाले एक अध्यापक को बीच में ही रोक दिया था। अ.भा.वि.प. के कार्यकर्ता, प्राचार्य के इस 'अनुचित और राष्ट्र विरोधी आचरण' से उत्तेजित थे। तोड़फोड़ करने वालों में, बजरंग दल के कार्यकर्ता भी शरीक हो गए। पुलिस ने प्राचार्य को गिरतार किया जिसे बाद मे जमानत पर छोड़ दिया गया।

राष्‍‍ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की चिन्ता तो की ही जानी चाहिए और ऐसा करना निस्सन्देह प्रशंसनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है। किन्तु ऐसा, प्रत्येक अवसर पर समान रूप से किया जाना चाहिए। याने, पैमाने दोहरे नहीं होने चाहिए।

गणतन्त्र दिवस के आयोजनों में, मध्य प्रदेश में दो स्थानों पर, भाजपा पार्षदों और पदाधिकारियों ने राष्‍‍ट्रध्वज के स्थान पर पार्टी का झण्डा फहरा दिया। एक भी संघ परिवारी ने इस पर कार्रवाई करना तो कोसों दूर की बात रही, इसका नोटिस भी नहीं लिया। इसके विपरीत, भाजपाइयों के इस आचरण का बचाव किया गया और इस आचरण का औचित्य प्रतिपादित किया गया। भोपाल के, इसाई मिशनरी संचालित स्कूल के प्राचार्य का आचरण यदि राष्‍‍ट्र विरोधी था तो, राष्‍‍ट्रीय ध्वज के स्थान पर पार्टी ध्वज फहराना राष्‍‍ट्र विरोधी क्यों नहीं है?

भूतपूर्व राष्‍‍ट्रपति वेंकटरमण के निधन के कारण देश में सात दिनों का राष्‍‍ट्रीय शोक घोषित किया गया। किन्तु इसी अवधि में कटनी के एक स्कूल के वार्षिकोत्सव में फिल्मी गीतों पर नृत्यों सहित रंगारंग कार्यक्रम आयोजित हुए। इस आयोजन में भाजपा विधायक मुख्य अतिथि थे तथा स्थानीय निकायों के पदों पर आसीन भाजपाई प्रमुखता से उपस्थित थे। लोगों ने इस पर जब आपत्ति ली तो अपनी गलती स्वीकार करने के स्थान पर पचासों ‘किन्तु-परन्तु’ के साथ इस सबका औचित्य प्रतिपादित किया गया।

राष्‍‍ट्रीय शोक की इसी अवधि में, सिवनी जिले की पेंच वेली में, सरकारी स्तर पर ‘मोगली महोत्सव’ ससमारोह आयोजित किया गया। इस पर आपत्ति उठाई गई तो इसका भी बचाव किया गया।

राष्‍‍ट्रीय सम्मान के पैमाने सभी मामलों में, सभी स्थानों पर समान होते हैं। किन्तु संघ परिवार इस मामले में जो दोहरापन अपना रहा है उससे वह आज भले ही खुश हो जाए किन्तु अन्ततः यह न केवल संघ परिवार के लिए अपितु समूचे राष्‍‍ट्र के लिए अत्यधिक घातक होगा।

व्यक्ति उसकी बातों से नहीं, आचरण से जाना जाता है। राष्ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को लेकर संघ परिवार का आचरण ईमानदार नजर नहीं आता। वह इस सम्मान को अपने आचरण में उतारने के बजाय इसे अपनी चिन्ता का विषय और अपनी इस चिन्ता के सार्वजनिक प्रकटीकरण को (पुलिसिया कहावत को चरितार्थ करता हुआ) अपना अन्तिम विषय तथा लक्ष्य बनाता हुआ नजर आ रहा है। कथनी और करनी में 180 डिग्री का यह अन्तर संघ परिवार की मंशा पर प्रश्न चिह्न लगाता है।

‘चिन्ता’ यदि ‘आचरण’ में नहीं बदलती है तो वह ‘पाखण्ड’ हो जाती है।

अपने आनुषांगिक संठन ‘भाजपा’ के जरिए संघ आज यदि सत्ता में है तो राष्‍‍ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के सन्दर्भ में उसकी जिम्‍मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। किन्तु वह जिम्मेदार होने के स्थान पर ‘पद-मदान्ध’ होकर उच्छृंखल आचरण करता नजर आ रहा है। वह 'वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति' उक्ति को चरितार्थ करता दिखाई दे रहा है और राष्ट्र तथा राष्‍‍ट्रीय सम्मान के लिए पैमानों का दोहरीकरण कर रहा है। वह चाह रहा है कि दूसरे तो राष्‍‍ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों का समुचित सम्मान करे किन्तु उसे इस मामले में मनमानी करने की सुविधा मिले।

दूसरों को सुधारने के प्रयत्नों में सफलता सदैव संदिग्ध ही रहती है जबकि खुद को सुधारने के प्रयत्नों में सफलता असंदिग्ध तथा सुनिश्चित होती है।

संघ परिवार यदि सचमुच में राष्‍‍ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की चिन्ता करता है तो उसकी ईमानदारी लोगों को अनुभव भी होनी चाहिए। वर्ना परिदृश्‍‍य पर अभी तो स्थिति ‘भटजी भटे खाएँ, औरों को परहेज बताएँ’ वाली अनुभव हो रही है।

अपनी माँ के प्रति आपका व्यवहार तो ‘वार वनीता’ जैसा हो और आप चाहें कि बाकी सारी दुनिया उसे देवी की तरह पूजे।

क्या यह सम्भव है? और उससे भी पहले, क्या यह उचित है?

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