राष्‍ट्र बनाम ‘माँ’ और ‘वार वनीता’

पुलिसवालों के बीच एक कहावत अत्यधिक लोकप्रिय ही नहीं है, वे इसे अपनी सफलता का मूल-मन्त्र भी मानते हैं। कहावत है-‘काम मत कर, काम की फिक्र कर, फिक्र का जिक्र कर। तेरा प्रमोशन पक्का।’

संघ परिवार की गतिविधियाँ देख कर लगता है कि या तो उसने पुलिसवालों की इस कहावत को अपना भी आदर्श बना रखा है या फिर पुलिसवालों ने यह आदर्श, संघ परिवार से ग्रहण किया है।

भोपाल के, इसाई मिशनरी संचालित एक स्कूल में घुसकर अ.भा.वि.प. कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ कर दी। गणतन्त्र दिवस समारोह में, इस स्कूल के प्राचार्य ने, ध्वजारोहण के बाद, राष्ट्रगीत शुरु करने वाले एक अध्यापक को बीच में ही रोक दिया था। अ.भा.वि.प. के कार्यकर्ता, प्राचार्य के इस 'अनुचित और राष्ट्र विरोधी आचरण' से उत्तेजित थे। तोड़फोड़ करने वालों में, बजरंग दल के कार्यकर्ता भी शरीक हो गए। पुलिस ने प्राचार्य को गिरतार किया जिसे बाद मे जमानत पर छोड़ दिया गया।

राष्‍‍ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की चिन्ता तो की ही जानी चाहिए और ऐसा करना निस्सन्देह प्रशंसनीय ही नहीं अनुकरणीय भी है। किन्तु ऐसा, प्रत्येक अवसर पर समान रूप से किया जाना चाहिए। याने, पैमाने दोहरे नहीं होने चाहिए।

गणतन्त्र दिवस के आयोजनों में, मध्य प्रदेश में दो स्थानों पर, भाजपा पार्षदों और पदाधिकारियों ने राष्‍‍ट्रध्वज के स्थान पर पार्टी का झण्डा फहरा दिया। एक भी संघ परिवारी ने इस पर कार्रवाई करना तो कोसों दूर की बात रही, इसका नोटिस भी नहीं लिया। इसके विपरीत, भाजपाइयों के इस आचरण का बचाव किया गया और इस आचरण का औचित्य प्रतिपादित किया गया। भोपाल के, इसाई मिशनरी संचालित स्कूल के प्राचार्य का आचरण यदि राष्‍‍ट्र विरोधी था तो, राष्‍‍ट्रीय ध्वज के स्थान पर पार्टी ध्वज फहराना राष्‍‍ट्र विरोधी क्यों नहीं है?

भूतपूर्व राष्‍‍ट्रपति वेंकटरमण के निधन के कारण देश में सात दिनों का राष्‍‍ट्रीय शोक घोषित किया गया। किन्तु इसी अवधि में कटनी के एक स्कूल के वार्षिकोत्सव में फिल्मी गीतों पर नृत्यों सहित रंगारंग कार्यक्रम आयोजित हुए। इस आयोजन में भाजपा विधायक मुख्य अतिथि थे तथा स्थानीय निकायों के पदों पर आसीन भाजपाई प्रमुखता से उपस्थित थे। लोगों ने इस पर जब आपत्ति ली तो अपनी गलती स्वीकार करने के स्थान पर पचासों ‘किन्तु-परन्तु’ के साथ इस सबका औचित्य प्रतिपादित किया गया।

राष्‍‍ट्रीय शोक की इसी अवधि में, सिवनी जिले की पेंच वेली में, सरकारी स्तर पर ‘मोगली महोत्सव’ ससमारोह आयोजित किया गया। इस पर आपत्ति उठाई गई तो इसका भी बचाव किया गया।

राष्‍‍ट्रीय सम्मान के पैमाने सभी मामलों में, सभी स्थानों पर समान होते हैं। किन्तु संघ परिवार इस मामले में जो दोहरापन अपना रहा है उससे वह आज भले ही खुश हो जाए किन्तु अन्ततः यह न केवल संघ परिवार के लिए अपितु समूचे राष्‍‍ट्र के लिए अत्यधिक घातक होगा।

व्यक्ति उसकी बातों से नहीं, आचरण से जाना जाता है। राष्ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को लेकर संघ परिवार का आचरण ईमानदार नजर नहीं आता। वह इस सम्मान को अपने आचरण में उतारने के बजाय इसे अपनी चिन्ता का विषय और अपनी इस चिन्ता के सार्वजनिक प्रकटीकरण को (पुलिसिया कहावत को चरितार्थ करता हुआ) अपना अन्तिम विषय तथा लक्ष्य बनाता हुआ नजर आ रहा है। कथनी और करनी में 180 डिग्री का यह अन्तर संघ परिवार की मंशा पर प्रश्न चिह्न लगाता है।

‘चिन्ता’ यदि ‘आचरण’ में नहीं बदलती है तो वह ‘पाखण्ड’ हो जाती है।

अपने आनुषांगिक संठन ‘भाजपा’ के जरिए संघ आज यदि सत्ता में है तो राष्‍‍ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के सन्दर्भ में उसकी जिम्‍मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। किन्तु वह जिम्मेदार होने के स्थान पर ‘पद-मदान्ध’ होकर उच्छृंखल आचरण करता नजर आ रहा है। वह 'वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति' उक्ति को चरितार्थ करता दिखाई दे रहा है और राष्ट्र तथा राष्‍‍ट्रीय सम्मान के लिए पैमानों का दोहरीकरण कर रहा है। वह चाह रहा है कि दूसरे तो राष्‍‍ट्र और राष्‍‍ट्रीय प्रतीकों का समुचित सम्मान करे किन्तु उसे इस मामले में मनमानी करने की सुविधा मिले।

दूसरों को सुधारने के प्रयत्नों में सफलता सदैव संदिग्ध ही रहती है जबकि खुद को सुधारने के प्रयत्नों में सफलता असंदिग्ध तथा सुनिश्चित होती है।

संघ परिवार यदि सचमुच में राष्‍‍ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की चिन्ता करता है तो उसकी ईमानदारी लोगों को अनुभव भी होनी चाहिए। वर्ना परिदृश्‍‍य पर अभी तो स्थिति ‘भटजी भटे खाएँ, औरों को परहेज बताएँ’ वाली अनुभव हो रही है।

अपनी माँ के प्रति आपका व्यवहार तो ‘वार वनीता’ जैसा हो और आप चाहें कि बाकी सारी दुनिया उसे देवी की तरह पूजे।

क्या यह सम्भव है? और उससे भी पहले, क्या यह उचित है?

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3 comments:

  1. दिखावे पर ना जाएं अपनी अकल लगायें । सारा देश ढकोसलों में उलझ कर रह गय है । भीतर से कछु और हैं बाहर से कछु और ...। इस विचारधारा से तो कुच बदलने वाला नहीं ।

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  2. मायोपिकFebruary 3, 2009 at 11:41 AM

    अजीब बात है हमारा राष्ट्रीय शोक है और हमें ही मालूम नहीं! मेरी ध्यान में तो तीन दिन का राष्ट्रीय शोक तब हुआ था जब इटली में पोप जान पाल-II मरे थे.

    1 फरवरी 2009 से सूरजकुंड मेला बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है. CON-gresi मिनिस्टर किरन चौधरी ने का रंगारंग उद्घाटन किया है. आप इस पर कब लिख रहे हैं?

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  3. दोहरे मापदंड कहीं भी हो, निंदनीय ही रहेंगे.

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