दावा छूट और पुनर्चलित पालिसियाँ

गत गुरुवार को अपनी पोस्ट बीमा किश्त भुगतान की रियायती अवधि में मैंने कहा था: ''पालिसी लेप्स होने पर उसे चालू कराने के साथ ही ग्राहक को बीमा सुरक्षा फिर से मिलने लगती है। किन्तु लेप्स पालिसी चालू करा लेने के बाद भी, (पालिसी के लेप्स होने के कारण उपजा खतरा और उससे होने वाली हानि के कारण) ग्राहक ने अपना कितना बड़ा नुकसान कर लिया है, यह ग्राहक को मालूम नहीं हो पाता।''

इस बात को समझने के लिए पहले दावा छूट (क्लेम कन्सेशन) को समझ लेना उचित होगा।


रियायती अवधि में किश्त जमा नहीं कराने पर पालिसीधारक को जोखिम सुरक्षा (रिस्क कवरेज) उपलब्ध नहीं होता और ऐसी दशा में यदि पालिसीधारक की मृत्यु हो जाए तो उस पालिसी पर मृत्यु दावा राशि का भुगतान नहीं मिलता।


किन्तु प्रत्येक बार ऐसा नहीं होता। निर्धारित अवधि पूरी हो जाने के बाद, यदि रियायती अवधि में किश्त जमा नहीं हो और पालिसीधारक की मृत्यु हो जाए तो भी नामित (नामिनी) को दावा राशि का भुगतान किए जाने के प्रावधान हैं।


ऐसे प्रावधानो को ‘दावा छूट’ (क्लेम कन्सेशन) कहा गया है। यह छूट मुख्यतः दो प्रकार की है - आधारभूत दावा छूट (बेसिक क्लेम कन्सेशन) तथा विस्तारित दावा छूट (एक्सटेण्डेट क्लेम कन्सेशन) । इनके ब्यौरे निम्नानुसार हैं-


आधारभूत दावा छूट (बेसिक क्लेम कन्सेशन) - यदि पालिसी की तीन वर्षों की किश्तें जमा कराई जा चुकी हों और पालिसीधारक की मृत्यु, रियायती अवधि के बाद किन्तु 6 महीनों की अवधि के भीतर हुई हो तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा (मृत्यु दिनांक तक की पालिसी अवधि के) बोनस की रकम का भुगतान देय होगा।


इस भुगतान में से अन्तिम बकाया किश्त की रकम काट ली जाएगी।


उदाहरण - पालिसी का प्रारम्भ दिनांक 28 दिसम्बर 2005 है। इस पालिसी की, दिसम्बर 2007 तक की किश्तें जमा कराई जा चुकी हैं किन्तु दिसम्बर 2008 वाली किश्त का भुगतान नहीं हुआ है। इस पालिसीधारक की मृत्यु यदि दिनांक 27 जून 2009 को या उससे पहले हो गई है तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा दिसम्बर 2005 से दिसम्बर 2008 तक की अवधि के बोनस की रकम का भुगतान किया जाएगा।

यदि पालिसी शर्तों में ‘दुर्घटना हित लाभ’ उपलब्ध कराया गया है और मृत्यु दुर्घटना से हुई है तो बीमा धन के बराबर रकम का भगतान अतिरिक्त रूप से किया जाएगा।

भुगतान की जाने वाली राशि में से दिसम्बर 2008 वाली किश्त की रकम काट ली जाएगी।

विस्तारित दावा छूट (एक्सटेण्डेट क्लेम कन्सेशन) - यदि पालिसी की पाँच वर्षों की किश्तें जमा कराई जा चुकी हों और पालिसीधारक की मृत्यु, प्रथम बकाया किश्त की देय दिनांक के 12 महीनो की अवधि के भीतर हुई हो तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा (मृत्यु दिनांक तक की पालिसी अवधि के) बोनस की रकम का भुगतान देय होगा।

इस भुगतान में से अन्तिम बकाया किश्त की रकम काट ली जाएगी।

उदाहरण - पालिसी का प्रारम्भ दिनांक 28 दिसम्बर 2002 है। इस पालिसी की, दिसम्बर 2006 तक की किश्तें जमा कराई जा चुकी हैं किन्तु दिसम्बर 2007 वाली किश्त का भुगतान नहीं हुआ है। इस पालिसीधारक की मृत्यु यदि दिनांक 27 दिसम्बर 2008 को या उससे पहले हो गई है तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा दिसम्बर 2002 से दिसम्बर 2008 तक की अवधि के बोनस की रकम का भुगतान किया जाएगा।

यदि पालिसी शर्तों में ‘दुर्घटना हित लाभ’ उपलब्ध कराया गया है और मृत्यु दुर्घटना से हुई है तो बीमा धन के बराबर रकम का भगतान अतिरिक्त रूप से किया जाएगा।

भुगतान की जाने वाली राशि में से दिसम्बर 2007 वाली किश्त की रकम काट ली जाएगी।

किन्तु, अपने पालिसीधारकों तथा उनके परिवारों की चिन्ता करते हुए ‘निगम’ ने ‘चेयरमेन रिलेक्सेशन रूल्स 1987’ के अधीन अतिरिक्त रूप से दावा छूट (क्लेम कन्सेशन) सुविधा और उपलब्ध कराई है। यह सुविधा केवल उन्हीं पालिसियों पर उपलब्ध कराई गई है जिनकी, दो वर्षों की किश्त जमा कराई जा चुकी हों।

इस छूट का विवरण इस प्रकार है -
(1) दो वर्षों की किश्तें जमा कराई जा चुकी हैं किन्तु अगली देय किश्त की रकम रियायती अवधि में जमा नहीं कराई जा सकी।


ऐसे पालिसीधारक की मृत्यु यदि उपरोक्त किश्त के देय दिनांक से 3 माह की अवधि में हुई तो नामित को पूर्ण बीमा धन तथा पालिसीधारक की मृत्यु दिनांक तक की पालिसी अवधि के बोनस की रकम का भुगतान मिलेगा।
उदाहरण - पालिसी का प्रारम्भ दिनांक 28 नवम्बर 2006 है। इसकी, नवम्बर 2007 वाली किश्त जमा कराई जा चुकी है किन्तु नवम्बर 2008 वाली किश्त जमा नहीं की गई है। इस पालिसीधारक की मृत्यु यदि 27 फरवरी 2009 को या उससे पहले होने की दशा में नामित को पूर्ण बीमा धन तथा नवम्बर 2006 से नवम्बर 2008 तक की अवधि का बोनस भुगतान किया जाएगा।इस भुगतान में से नवम्बर 2008 वाली किश्त की रकम काट ली जाएगी।


(2) उपरोक्त उदाहरण में, यदि पालिसीधारक की मृत्यु, देय दिनांक से 3 माह (27 फरवरी 2009) के बाद किन्तु 6 माह पूर्ण होने से पहले (27 मई 2009 तक)हो जाती है तो नामित को बीमा धन की आधी रकम का भुगतान किया जाएगा। इस स्थिति में बोनस राशि का भुगतान नहीं किया जाएगा। और
भुगतान की जाने वाली राशि में से नवम्बर 2008 वाली किश्त की रकम काट ली जाएगी।

(3) उपरोक्त उदाहरण में यदि पालिसीधारक की मृत्यु देय दिनांक से 6 माह (27 मई 2009) के बाद किन्तु 12 माह (28 नवम्बर 2009) से पहले हो जाती है तो नामित को ‘आनुपातिक प्रदत्त मूल्य’ राशि का भुगतान किया जाएगा।इस स्थिति में भी बोनस राशि का भुगतान नहीं किया जाएगा और बकाया किश्त की रकम काट ली जाएगी।
उदाहरणार्थ - पालिसी एक लाख रुपये बीमा धन और 20 वर्ष अवधि की है। इसकी कुल दो किश्तें जमा हुई हैं और तीसरी किश्त के देय दिनांक से एक वर्ष पूर्ण होने से पहले ही पालिसीधारक की मृत्यु हुई। अर्थात् पालिसीधारक ने कुल जमा की जाने वाली किश्तों (20) की 1/10 किश्तें (कुल 2) किश्तें ही जमा कराई हैं, इसलिए यहाँ पालिसी के बीमाधन का 1/10 बीमा धन ही भुगतान किया जाएगा।


विशेष: ‘चेयरमेन’ द्वारा उपलब्ध कराई गई इस छूट के अन्तर्गत ‘दुर्घटना हित लाभ’ की रकम का भुगतान नहीं किया जाएगा भले ही पालिसीधारक की मृत्यु, दुर्घटना से हुई हो और भले ही पालिसी शर्तों के अन्तर्गत ‘दुर्घटना हित लाभ’ उपलब्ध क्यों न कराया गया हो।


उपरोक्त वर्णित दावा छूट, ‘निगम’ की निम्नांकित तालिकाओं वाली पालिसियों में किसी भी दशा में नहीं दी जाती हैं -तालिका 21, 58, 94, 111, 150, 153, 164, 177 तथा 190.
उपरोक्त के अतिरिक्त ‘निगम’ की पेंशन योजनाओं में भी किसी भी प्रकार की दावा छूट उपलब्ध नहीं है।

किन्तु गत पोस्ट का अन्त और इस पोस्ट का प्रारम्भ मैंने जिस बात से किया उसका इन ‘दावा छूटों’ से क्या लेना-देना?

है। लेना-देना है और अत्यन्त गम्भीरता से है।

कालातीत (लेप्स) पालिसी के पुनर्चलन को मूल पालिसी का ‘फिर से’ चालू होना माना जाता है। ऐसा करते समय पालिसी के प्रारम्भ दिनांक और पालिसी की बोनस अर्जन पात्रता पर तो कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता किन्तु ऐसी पालिसियों में ‘जोखिम सुरक्षा दिनांक’ स्वतः ही बदल जाता है। ऐसी पालिसियों में, पालिसी को फिर से चालू करने के दिनांक को ‘जोखिम सुरक्षा प्रारम्भ दिनांक’ माना जाता है और तदनुसार ही, उपरोक्त समस्त दावा छूटों का लाभ मिल पाता है।इसे इस तरह समझें - पालिसी प्रारम्भ दिनांक 28 दिसम्बर 2001 है। पालिसी की दिसम्बर 2006 तक की किश्तें जमा की जा चुकी हैं अर्थात् पहली चुकाई जाने वाली बकाया किश्त इस प्रकरण में दिसम्बर 2007 है।

इस पालिसी पर, उपरोल्लेखित ‘विस्तारित दावा छूट’, 27 दिसम्बर 2008 तक उपलब्ध थी। 28 दिसम्बर 2008 से यह पालिसी उक्त छूट की दावेदार भी नहीं रही।

दिनांक 20 जनवरी 2009 को यह पालिसी चालू कराई गई। अब, इस दशा में इस पालिसी का प्रारम्भ दिनांक 28 दिसम्बर 2001 ही रहेगा और बोनस की गणना भी इसी दिनांक से की जाएगी किन्तु ‘दावा छूट’ की गणना 20 जनवरी 2009 से की जाएगी। अर्थात् पूरे 8 वर्ष चल चुकने के बाद भी, जोखिम सुरक्षा (रिस्क कवरेज) के सन्दर्भ में यह पालिसी, 20 जनवरी 2009 से प्रारम्भ मानी जाएगी।


मेरी बात की गम्‍भीरता अब स्‍पष्‍ट हो गई होगी।


इसलिए ग्राहक की बेहतरी इसी में है कि अपनी पालिसी की प्रीमीयम किश्तें रियायती अवधि में ही भरे और किसी भी हालत में अपनी पालिसी कोे लेप्स न होने दे।

ऐसी ही कुछ छोटी-छोटी बातें फिर कभी।

एक बार फिर याद रखने का उपकार कीजिएगा कि ये सूचनाएँ मैं व्यक्तिगत स्तर पर प्रस्तुत कर रहा हूँ। इन्हें भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा प्रस्तुत जानकारियाँ न समझें।
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4 comments:

  1. बीमा पालिसी पुनर्चलन की जटिलताओं की सहज प्रस्तुति के लिए बहुत - बहुत धन्यवाद . इतनी
    बारीकियाँ तो इस व्यवसाय से जुड़े लोग भी कम ही जानते होंगे .

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  2. जीवन बीमा के बारे में बहुत उपयोगी जानकारियाँ आपके ब्लॉग से मिल रही हैं. धन्यवाद!

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  3. आपके ज़रिए बीमा से जुड़ी बारीक से बारीक जानकारी मिलती है । लेकिन मुश्किल इतनी है कि इसे समझ पाना आम आदमी के बूते की बात नहीं । मेरे पास कई पॉलिसी हैं ,जैसे जीवन मित्र ,जीवन धारा,आनद , जीवन स्नेह और सुरभि । मैं तो बड़ी ईमानदारी से एक महीने के ग्रेस पीरियड का फ़ायदा उठाते हुए इन्की प्रीमियम अदा करती हूँ क्या यह सही है । कई मर्तबा भूल वश एक आध महीने का गैप हो जाता है ,तो क्या पॉलिसी लेप्स मानी जाएगी ।

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