ज्योतिष : मात्र जिज्ञासा, प्रश्न नहीं

(अपने एक अनुभव से उपजी जिज्ञासा प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह प्रश्न नहीं है और ‘चुनौती‘ जैसा भाव और मनःस्थिति तो ‘कल्पनातीत‘ या कि ‘स्वप्नातीत‘ ही है। इसके बाद भी, ‘ज्योतिष‘ से (किसी भी स्तर और प्रकार से) जुड़े महानुभावों को यह सब तनिक भी ‘अनपेक्षित, अन्यथा, अनुचित, अशालीन‘ लगे तो मैं उन सबसे कर-बध्द क्षमा याचना करता हूँ।
मैं 'ज्योतिष' पर न तो आँख मूँद कर विश्वास करता हूँ और न ही इसे सिरे से निरस्त ही करता हूँ। इसके साथ ही साथ यह भी भली प्रकार जानता हूँ कि किसी का असम्मान कर मैं स्वयम् के लिए भी असम्मान की फसल ही उपजाऊँगा।)

यह 1990 की बात है। दवाइयाँ बनाने वाली हमारी औद्योगिक इकाई ‘नगद हानि‘ (केश लास) की दशा में आ गई थी। मेरे दोनों भागीदार अत्यधिक परिश्रमी, प्रतिभाशाली, उद्यमी और अच्छे व्यापारी । जबकि मैं जीवन, उद्योग और व्यापार के सिद्धान्तों, नियमों, व्यवहार जैसे समस्त पक्षों में शून्य। वे दोनों मुझे निभा रहे थे। आँकड़े मुझे समझ नहीं पड़ते थे (आज भी समझ नहीं पड़ते) किन्तु स्थितियाँ तो दिखाई दे रही थीं। वे दोनों मेरा लिहाज भी करते थे और चिन्ता भी। मुझसे उनका दुख नहीं देखा जाता था।

जनरल इंश्योंरेस की एक कम्पनी के स्थानीय शाखा प्रबन्धक ने मुझे एजेण्ट बनने का प्रस्ताव दिया। अपने भागीदारों को बताए बिना और उनसे सहमति लिए बिना कोई भी अन्य काम शुरु करना मेरे लिए अनैतिक ही था। सो मैंने इंकार कर दिया। शाखा प्रबन्धकजी ने मेरे भागीदारों से सम्पर्क किया। दोनों भागीदारों ने अपनी ओर से कहा कि मैं यह एजेन्सी ले लूँ ताकि घर में ‘बघार‘ तो लग सके। मैंने एजेन्सी ले ली किन्तु वह नाम मात्र तक ही सीमित रही। उसके लिए जितना समय चाहिए था, कारखाने से लौटने के बाद वह निकाल पाना सम्भव नहीं था। महीने में पाँच-सात, छोटे-छोटे बीमे मिल जाते थे किन्तु उनका कमीशन प्रोत्साहित करने वाला नहीं था।


मेरे प्रति मोहग्रस्त, मुझे अग्रज मानने वाला एक स्वजाति युवक मेरी दशा से खिन्न था। उसे लगता था कि मुझे मेरा प्राप्य नहीं मिल रहा। वह मुझे बार-बार इस भागीदारी से मुक्त होने के लिए कहता रहता था। चाहता तो मैं भी था कि मैं अपने दोनों भागीदारों को मुक्त कर दूँ किन्तु साहस नहीं हो पा रहा था। न तो गाँठ में पूँजी, न ही भेजे में अकल! करूँ भी तो क्या?

उस युवक ने, मेरी अनुपस्थिति में मेरी जन्म पत्रिका अपने विश्वस्त और प्रिय ज्योतिषी (इस पोस्ट में आगे मैं उन्हें ‘पण्डितजी‘ उल्लेखित करूँगा) को दिखाई। पण्डितजी ने ‘स्पष्ट प्रश्न’ माँगे। युवक ने कहा - ‘वर्तमान दुर्दशा से मुक्ति और भविष्य में किया जाने वाला व्यवसाय।’ पण्डितजी ने एक पखवाड़े के बाद बुलाया और कहा - ‘बैरागी को लेकर आना।’


निर्धारित दिनांक और समय पर हम दोनों पहुँचे। यह अक्टूबर 1990 की बात है। पण्डितजी ने मुझसे कहा - ‘पहले आप अपनी बात कह दें।’ मैंने कहा - ‘सब कुछ भाई ने आपको बता ही दिया है। मेरे दोनों भागीदारों का दुःख मुझसे नहीं देखा जा रहा। मेरी इच्छा है कि मैं उन्हें मेरी जिम्मेदारी से मुक्त कर दूँ। इस भागीदारी से अलग हो जाऊँ।’

पण्डितजी ने कहा - 'आप लिख लो, 1991 की पहली अप्रेल से आप इस भागीदारी में नहीं रहेंगे। इसलिए आप अभी चुप रहें। निकलने का निर्णय लेने के अपयश से बचें। वैसे भी, यदि आप अलग भी होना चाहेंगे तो भी आपका अलग होना, चालू वित्तीय वर्ष की समाप्ति (31 मार्च 1991) के बाद ही प्रभावशील होगा। इसलिए आप चुप रहें। प्रतीक्षा करें। और यदि 31 मार्च 1991 तक वैसा न हो जैसा कि मैं आपको कह रहा हूँ तो 1991 की पहली अप्रेल को आप अलग होने की बात कर दें। आपके भागीदारों को तो कोई आपत्ति होगी ही नहीं।'


पण्डितजी की बात की तार्किकता और व्यवाहारिकता मुझे बिलकुल ठीक लगी। मेरे हितैषी युवक ने पूछा -‘फिर, आगे क्या?’ पण्डितजी ने अविलम्ब उत्तर दिया - 'आप दलाली शुरु कर दें। आपको दलाली से ही आय प्राप्ति के योग हैं।' पण्डितजी की बात सुनते ही मैं ऐसे भड़का जैसे साँड को लाल कपड़ा दिखा दिया हो। पण्डितजी को मेरी पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि भली प्रकार मालूम थी। हँसते हुए बोले -'दलाली केवल तबादले कराने और लोगों के अटके काम कराने में ही नहीं ली जाती। आप तेल, जमीन, लोहा आदि व्यापार की दलाली शुरु कर दें।' मैंने कहा - ‘मुझे तो दलाली शब्द से ही चिढ़ है।’ पण्डितजी बोले - ‘आपकी आप जानो किन्तु आपको आजीविका तो दलाली से ही मिलनी है।’

पण्डितजी की बात सुनकर मैं उद्विग्न हो गया। मुझे लाने वाला मेरा हितैषी युवक असहज हो गया। हम उठने का उपक्रम करने ही वाले थे कि पण्डितजी ने कहा - ‘आपके पास जल्दी ही दलाली का सुन्दर प्रस्ताव आने वाला है। आप गर्मी खाकर, तुनक कर इंकार मत कर दीजिएगा। लक्ष्मी आपका दरवाजा खटखटा रही है।’

अब तक तो मैं खिन्न था। पण्डितजी की बातों ने दुखी कर दिया था। सो दुखी-मन हो लौटा और अपने आप को व्यस्त रखने के जतन करने लगा।

नवम्बर के अन्तिम सप्ताह में नितिन वैद्य नामक एक नौजवान मेरे पास आया (नितिन का उल्लेख मेरी गन्ध के झोंके: मनु और प्रज्ञा और मुम्बई में जावरा का ओटला पोस्टों में आया है)। वह भाजीबीनि में, नया-नया विकास अधिकारी बना था और एजेण्ट तलाश रहा था। मुझसे मेरे भाई साहब का नाम जुड़ा होने से उसे मुझमें ‘अपार सम्भावनाएँ’ दिखीं। मुझे रोमांच हो आया। ‘पण्डितजी’ की बातें मेरे कानों में गूँजने लगीं। मुझे उसी क्षण सूझ पड़ा कि एजेण्ट और एजेन्सी से मिलने वाला कमीशन, बोलचाल की भाषा में ‘दलाल’ और ‘दलाली‘ ही तो है! किन्तु मैंने कोई उत्तर नहीं दिया और पूर्वानुसार ही यह गेंद भी अपने दोनों भागीदारों के पाले में सरका दी। दोनों ने न केवल सहमति दी बल्कि इस काम के लिए, कारखाने से तनिक जल्दी जाने का परामर्श भी अपनी ओर से दे दिया।

मैंने अपनी कुछ विवशताएँ और शर्तें नितिन के सामने रखीं। उसने कहा-‘आप तो केवल हाँ कर दो। बाकी सब मैं देख लूँगा।’

और 30 जनवरी 1991 को मैं विधिवत तथा अधिकृत रुप से भारतीय जीवन बीमा निगम का एजेण्ट हो गया। निर्धारित समय पर नितिन अपनी 'बुलेट' पर आता और हम दोनों, कस्बे में ‘फेरी’ पर निकल पड़ते। मुझे जो ‘रिस्पान्स’ मिला उससे मैं आज तक चकित हूँ। फरवरी 1991 के कमीशन की रकम ने मेरा हौसला इतना बढ़ाया कि मुझे लगा कि मैं अपने भागीदारों को तत्‍काल ही मुक्त कर दूँ। किन्तु पण्डितजी की बातें मुझे अब तो और अधिक याद आने लगी थीं। सो, मैं चुप ही रहा और भागीदारी की तथा बीमा की अपनी जिम्मेदारियाँ अधिकाधिक परिश्रम से निभाने में जुट गया।

1991 का मार्च शुरु हो चुका था। मैं अत्यन्त अधीरतापूर्वक एक-एक दिन गिन रहा था। आधा मार्च निकल गया। पत्ता भी नहीं खड़का। दिन, एक-एक करके बीत रहे थे और मेरी आकुलता और चैकन्नापन बढ़ते ही जा रहे थे। मैं फैक्ट्री में बैठता तो था किन्तु वहाँ होकर भी वहाँ नहीं होता था।

इसी तरह एक-एक दिन होते हुए 25 मार्च आ गया। सब कुछ वैसा का वैसा ही। अन्य तमाम दिनों की तरह। दोपहर तीन बजे की चाय हुई। एक भागीदार अपने ‘उत्पादन विभाग’ में चला गया। अब हम दो भागीदार बचे थे। जैसे-तैसे काम करते हुए चार बजे। साढ़े चार बजते-बजते घर लौटने का उपक्रम शुरु किया ही था कि मानो बिजली कड़की और शून्य को चीरती हुई हमारे कमरे में आ खड़ी हुई। बिना किसी सन्दर्भ-प्रसंग के, मेरा भागीदार अकस्मात् बोला -‘विष्णु! पहली अप्रेल से तुम अपनी व्यवस्था कर लो यार! अब यह गाड़ी नहीं चल पाएगी।’

उस क्षण की मेरी दशा का वर्णन कर पाना मेरे बूते में न तब था न अब है। मेरी जबान सूख कर मानो तालू से चिपक गई। बोल पाना मुश्किल क्या, असम्भवप्रायः हो गया। मेरे मुंह से ‘गों! गों!’ करती घरघराहट सी कुछ हुई। पहले गला भर आया और अगले ही क्षण आँखें झरने लगीं। मेरे भागीदार ने मुझे समझाया। दूसरा भागीदार भी तब तक वहाँ आ गया। पहले वाले ने अपने निर्णय की जानकारी दी, दूसरे ने बिना बोले, सिर हिलाकर सहमति दी। और कुछ ही क्षणों में हम तीनों अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे थे। बिना बोले। बस! एक दूसरे की ओर कनखियों से देखते हुए।


1991 की 30 मार्च को शनिवार था। याने भागीदार के रूप में, इस कारखाने में मेरा अन्तिम दिन। दोपहर में भोजन करने घर लौटा तो लौटते में, अपनी जेब की क्षमता से अधिक खर्च कर मिठाई ले गया। शेष दिन काम किया और लौटते समय कामगारों, कर्मचारियों और दोनों भागीदारों को मिठाई खिलाकर विदा ली। सबका मन भारी था। मेरा भी। किन्तु मैं 'विस्मित होने के चरम' पर था। शब्दशः वही और वैसा ही हुआ जो और जैसा पण्डितजी ने बताया था।


उसके बाद मैं बीमा एजेन्सी में जुट गया। जिस दिन मैं ने भागीदारी छोड़ी उस दिन विपन्नता की कगार पर था - लगभग, अपने परिवार के पुराने व्यवसाय, भिक्षा वृत्ति की कगार पर। बीमा एजेन्सी ने मेरी विपन्नता दूर की, मैं निर्धनता तक आया, उसके बाद साधनहीनता समाप्त होने लगी, घर में ‘दो पैसे’ आने लगे। जो छुटपुट कर्जा था, उससे मुक्ति मिली। बच्चों की पढ़ाई आसान लगने लगी। दुश्वारियाँ कम होने लगीं, आसानियों में इजाफा होने लगा।

आज मेरा बड़ा बेटा बी.ई., एम.बी.ए. कर हैदराबाद में ठीक-ठीक वेतन पर काम कर रहा है। छोटा बेटा बी. ई. के दूसरे वर्ष में पढ़ रहा है। बड़े बेटे के विवाह की पहली वर्ष गाँठ इस नौ मार्च को हमारा परिवार मनाएगा। माथे पर बाजार का कोई कर्ज नहीं है। आज मैं, 30 प्रतिशत की 'स्लेब' में, सरचार्ज सहित आय कर चुका रहा हूँ। बीमा एजेण्टों में, 'अध्यक्ष क्लब' की प्रतिष्ठादायी सदस्यता प्राप्त किए हूँ। आर्थिक सुविधा ऐसी और इतनी हो गई है कि लोगों से अशिष्टता तथा दम्भपूर्वक बातें कर लेता हूँ।


निस्सन्देह, मेरी जीवन संगिनी का संघर्ष मेरे संघर्ष की अपेक्षा करोड़ गुना अधिक रहा। उन्होंने अपनी नौकरी की, बच्चे सम्हाले, घर सम्हाला, परिवार के सारे सामाजिक उत्तरदायत्वि निभाने का विकट काम सफलतापूर्वक किया, मेरी ज्यादतियाँ और अशिष्टताएँ सहन कीं, मुझे सम्हाला। यदि वे नहीं होतीं तो जिन-जिन उपलब्धियों की दुदुम्भी मैं बजा रहा हूँ, वे सब अर्थहीन हो जातीं। मेरी जीवन संगिनी ने ही इन सबको सार्थक बनाया। घर को घर और मुझे मनुष्य बनाए रखा।

आज पण्डितजी हमारे परिवार के आदरणीय और पूजनीय सदस्य बने हुए हैं। किन्तु उसके बाद से अब तक उनकी अधिकांश (लगभग 95 प्रतिशत) बातें सच नहीं हुईं जैसी उनकी पहली बात हुई थी। मैं पण्डितजी से यह सब कहता भी हूँ। वे हँसकर कहते हैं - ‘मैं ने तब भी वही कहा था जो मुझे आपकी पत्रिका में नजर आ रहा था। आज भी वही कहता हूँ जो आपकी पत्रिका में नजर आता है। वह सच होता है या नहीं, यह मेरी चिन्ता नहीं है।’

मेरी जिज्ञासा यही है। मैं वही का वही हूँ और मेरी पत्रिका भी वही की वही। इसी पत्रिका को देख कर, पण्डितजी की कही बात शब्दशः (बोलचाल की भाषा में कहूँ तो ‘तारीखवार’) वास्तविकता में बदली। किन्तु अब क्या हो गया है? पण्डितजी का अनुभव और परिपक्वता का ग्राफ 1990 की अपेक्षा बढ़ा ही है। आज उनकी कही बातें सच क्यों नहीं हो रही हैं?

इस संस्मरण से जुड़े सारे पात्र जीवित हैं और चाहने पर उनसे सम्पर्क किया जा सकता है।

मैं न तो पण्डितजी की विद्वत्ता और ज्ञान पर प्रश्न चिह्न लगा रहा हूँ और न ही ‘ज्योतिष’ की विश्वसनीयता पर। पर जो सच है, वह सामने है। उससे उपजी जिज्ञासा ने ही मुझसे यह पोस्ट लिखवाई है।

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11 comments:

  1. aapke naam ke aage koi upnaam nahi hai. 'DALAL' kaisa rahega sahib?

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  2. सबसे पहले तो जिस पंडित की अभी तक 95 प्रतिशत भविष्‍यवाणियां गलत हो ... उनकी एक भविष्‍यवाणी कितनी भी सटीक क्‍यों न हो जाए .... उस विश्‍वास पर ज्‍योतिषी को या फिर ज्‍योतिष को विज्ञान नहीं माना जा सकता ... उन्‍होने आपकी कुंडली में कोई ऐसा योग देखा हो .... जिसके बारे में ज्‍योतिष की पुरानी पुस्‍तकों में ऐसा लिखा हो .... कि ऐसे लोग दलाली के द्वारा ही जीवन यापन करते हैं ... मैने गांव के अनेक पंडितो को ऐसा करते पाया है .... वे विभिन्‍न ग्रहों की स्थिति के अनुसार होनेवाले फल की एक पुस्‍तक रखते हैं .... और बच्‍चे की जन्‍मकुंडली बनाकर उस से संबंधित पूरा अनुच्‍छेद लिख देते हैं .... कोई कोई वाक्‍य इतना सटीक होता है कि लोगों का विश्‍वास उस पंडित पर हो जाता है ... चाहे वह संयोग ही क्‍यों न हो ... पर मैं इस पक्ष में हूं कि जबतक कम से कम 80 प्रतिशत भविष्‍यवाणी सही न हो तो .... ज्‍योतिष या ज्‍योतिषी पर विश्‍वास नहीं किया जाना चाहिए .... लेकिन यदि अपने जीवन भर के अनुभव के आधार पर किसी ज्‍योतिषी की 80-90 प्रतिशत भविष्‍यवाणियां सही हों ... तो 10-20 प्रतिशत गलत होने पर भी उसपर उंगली उठाना गलत है ... लेकिन दिक्‍कत तब आती है .... जब एक ज्‍योतिषी को लोग भगवान समझ बैठते हैं .... और उसकी कही किसी भी भविष्‍यवाणी के गलत होने पर उपहास किया करते हैं ।

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  3. वैसे जिज्ञासा होती बड़ी विकट चीज है. :)

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  4. ज्योतिष के बारे में हम "गुटनिरपेक्ष" हैं. आप दीर्घायु हों और सुखी रहें.

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  5. हमारे पास ज्योतिष पर विश्वास न करने का बडा स्वार्थी सा कारण है। हमारे घर में मेरी अथवा दोनो बहनों की जन्मपत्री नहीं थी, बडी बहन के विवाह के सन्दर्भ में जब वरपक्ष के लोगों ने जन्मपत्री के बारे में बात की तो मथुरा के एक पंडितजी से मेरी और छोटी बहन की जन्मपत्री भी साथ में बनवा ली गयी। जन्मपत्री के साथ पंडितजी ने कुछ भविष्यवाणियाँ भी हाथ से लिखकर दीं।

    मेरी बडी बहन के बारे में लिखा कि "सास सुख कम" बल्कि इसके उलट मेरी बहन की सासूमाँ का व्यवहार इतना सरल और अच्छा है कि मैं हंसी में अपनी बहन को कहता हूँ कि तुम्हारी लाटरी लग गयी और तुम्हारी सासूमाँ की जमानत जब्त हो गयी :-)

    मेरे बारे में लिखा कि "पत्नी रूपता में पति से कम" और इसे सुनकर हमारे जैसे रूपवान पुत्र की माताजी ने अपना माथा पकड लिया कि हाय अब क्या होगा :-) अब बताईये कैसे यकीन करके खुद ही जहर का प्याला पी लें, हम सुकरात भी तो नहीं हैं :-)

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  6. बैरागी जी, आपने बहुत ही सरलता पूर्वक अपनी बात को रखा.
    सबसे पहले तो मैं एक बात कहना चाहूंगा कि चाहे कोई ज्योतिषी हो अथवा एक साधारण मनुष्य, मान-अपमान,सुख-दुख,हानि-लाभ प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने भाग्य के अनुरूप ही प्राप्त करता है.ग्रह एक पंडित जी को भी उतना ही प्रभावित करते हैं जितना एक साधारण मनुष्य को.यहां मुझे उन पंडित जी की विद्वता अथवा उनके ज्ञान पर किसी प्रकार की कोई शंका नहीं है. हो सकता है कि इससे ज्यादा पंडित जी के अपने भाग्य में आपके द्वारा यश प्राप्ति न लिखी हो.आखिर वो भी तो भाग्य चक्र में बंधे हुए हैं.
    दूसरी बात ये जो कि मेरी अनुभव सिद्ध है कि जब आप किसी भविष्यदृ्ष्टा के पास अपने बारे में जानने अथवा किसी समस्या के समाधान हेतु जाते हैं तो वो पूर्णत: निरपेक्ष भाव से आपके बारे में फलकथन करता है किन्तु जहां आपसी संबंध मित्रता अथवा पारिवारिक सदस्य के रूप में बनते जाते हैं,वहीं से गडबड होनी प्रारम्भ हो जाती है.तब ज्योतिषी के मन में उस व्यक्ति विशेष के प्रति जो भाव हैं-फलकथन में वो आडे आने लगते हैं.
    ऊपर संगीता जी ने अपनी टिप्पणी मे गांवों के पंडितो की विद्वता पर प्रश्न चिन्ह लगाया है.मैं बहुत ही विनम्रता पूर्वक उनसे कहना चाहूंगा कि ऎसा नहीं है कि विद्वता केवल शहरों तक ही सीमित है.ज्ञानी/ अज्ञानी तो कहीं भी हो सकते हैं,चाहे शहर हो या फिर गांव.

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  7. पंडित जी, ने उस समय आप के लिए बहुत ही अच्छे सलाहकार की भूमिका अदा की। उस में जन्म पत्रिका की कितनी भूमिका थी नहीं कहा जा सकता। मेरे पूर्वज खानदानी रूप से यह काम करते रहे हैं। लेकिन मै ने देखा कि उस में हताशा के काल में अनुभव जन्य सलाहों की भूमिका ही अधिक रही। हाँ, जन्मपत्रिकाएं उस में विश्वास का माध्यम जरूर बनती रहती थीं।

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  8. श्री शर्माजी सही फरमा रहे हैं कि भविष्य-वक्ता से जहाँ आपसी संबंध पारिवारिक सदस्य सद्रश्य हो
    जाते हैं तब ज्योतिषी के मनोभाव -- व्यक्ति विशेष से लगाव - के कारण -- फलकथन में आड़े आने
    लगते हैं और कथन मे वैसी द्रढ़ता नहीं रह पाती जो यह कहते समय रही --- "आपकी आप जानो
    किन्तु आजीविका तो दलाली से ही मिलनी है ." और आप भी स्वीका र रहे हैं कि सारी लाली इसी
    से है . अस्तु...कोई लाख करे चतु..........! पू रे परिवार को 9 मार्च के लिए अग्रिम बधाई !

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  9. ज्योतोष पर अन्तिम राय नहीं बन सकी है, अत: क्या कहा जाये। इस पोस्ट को एकाग्रता से ग्रहन किया, यही कह सकता हूं।

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