जन प्रतिनिधि: ‘तब’ के और ‘अब’ के (2)

प्रकाशचन्द्रजी सेठी को मध्य प्रदेश के लोग न केवल ‘कुशल प्रशासक‘ अपितु ‘कठोर प्रशासक’ के रूप में आज भी याद करते हैं। उनके बताए किसी काम को मना करने से पहले अधिकारियों को पुनर्जन्म लेना पड़ता था। सेठीजी ने जिस काम की हाँ लोगों से कर दी, तय मान लिया जाता था कि वह काम हो गया।

‘लौह पुरुष’ पण्डित द्वारकाप्रसाद मिश्र के मन्त्रि मण्डल में एक मन्त्री हुआ करते थे - गुलाबचन्दजी तामोट। वे मूलतः समाजवादी थे। वे मतदाताओं/नागरिकों के सार्वजनिक सम्मान की सर्वाधिक चिन्ता करते थे। लोगों की अनुचित माँग का उपहास करने का साहस कोई अधिकारी, उनके सामने तो कभी नहीं कर सका। ‘खाँटी समाजवादी शब्दावली’ में तामोटजी किसी अधिकारी को जब ‘समझाते’ तो उस अधिकारी की इच्छा होती कि धरती फट जाए और वह उसमें समा जाए। जब कोई अधिकारी कानूनों की दुहाई देता तो वे कहते -‘कानून हमने ही बनाए हैं और लोगों का काम करने के लिए बनाए हैं।’

दादा का मन्त्रित्व मैंने बहुत ही समीप से देखा है। कानूनों और प्रक्रियाओं की जानकारी उन्हें, मन्त्री बनने के बाद ही हुई थी। उन दिनों अविभाजित मन्दसौर जिले के कलेक्टर मुदालियार साहब और लो.नि.वि. के कार्यपालन यन्त्री नवलचन्दजी जैन थे। पूरे मन्दसौर जिले में एक इंच सड़क भी डामर की नहीं थी। दादा के मन्त्री बनने के बाद जब ये दोनों अधिकारी दादा से मिलने मनासा पहुँचे तो दादा ने अपनी इच्छा कुछ इस तरह जताई थी - ‘मैं अपने जिले में डामर की सड़कें देखना चाहता हूँ। इसमें कोई कानून-कायदा आड़े नहीं आना चाहिए। सरकार से कुछ करवाना हो तो बता दीजिएगा। वह सब मैं करवा दूँगा।’ और, जिन सड़कों पर धूल ही धूल उड़ती थी वे सब, दादा के कार्यकाल में ही डामर की हो गईं। कोई फाइल कहीं नहीं रुकी।

ऐसी ही दो-एक घटनाएँ और, कल।

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5 comments:

  1. काम करना हो तो कायदे कानून आड़े भी आते हों तो भी रास्ते निकाले जा सकते हैं। बस जनहित के काम करने की इच्छा तो हो।

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  2. इसे कहते है नेता, काश आज भी होते भारत मे ऎसे नेता. बहुत अच्छा लगा प्रकाशचन्द्रजी सेठी जी के बारे पढ कर
    धन्यय्वाद

    आपको और आपके परिवार को होली की रंग-बिरंगी भीगी भीगी बधाई।
    बुरा न मानो होली है। होली है जी होली है

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  3. दादा के कार्यकाल के उनके किए काम और उनकी कार्यप्रणाली से निःसंदेह अविभाजित मंदसौर जिले
    का हर नागरिक वाक़िफ़ है और याद करता है .स्मृतियों के पृष्ठ यों ही पलटते रहिए..............
    " दौड़ते हैं याद की , पगडंडियों पे पाँव ,
    अ रा व ली की गोद बसा, अपना रामपुरा गाँव !"

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