सबसे गरीब और नितान्‍त अकेला

बेंगलुरु स्थित मेरे एक परिचित ने कल पहली बार मेरा यह चिट्ठा पढ़ा और चिट्ठे पर टिप्पणी करने के बजाय ‘मेल‘ कर पूछा कि चिट्ठे पर आत्म परिचय में मैंने 'इस एजेन्सी के कारण धनपतियों की दुनिया में घूमने के बाद का निष्कर्ष कि पैसे से अधकि गरीब कोई नहीं । पैसा, जो खुद अकेले रहने को अभिशप्त तथा दूसरों को अकेला बनाने में माहिर' वाला वाक्य क्यों लिखा?


बीमा ऐजन्सी के कारण मुझे सभी स्तर की आर्थिक हैसियत वाले परिवारों में जाना पड़ता है। जीवन को हम ‘इन्द्रधनुष’ क्यों कहते हैं, यह मैंने इसी एजेन्सी के कारण जाना। मैंने पाया, निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों में अभाव तो होते हैं किन्तु परिजनों में परस्पर दुराव-छिपाव और उपेक्षा भाव या तो होता ही नहीं है और यदि होता भी है तो वह सम्भवतः 'अनिवार्य और अपरिहार्य' की दशा में ही होता है और वह भी अपने न्यूनतम स्तर पर। इसके विपरीत, धनाढ्य परिवारों में ये सारी बातें मुझे सामान्य से अधिक स्तर पर अनुभव हुईं और इस सबके पीछे एक ही कारण अनुभव हुआ - पैसा। इन परिवारों में कहीं कोई अभाव नहीं दिखाई दिया और पैसा आवश्यकता से अधिक ही दिखा।

जिन निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों में अभाव देखे वहाँ परिवार का प्रत्येक सदस्य अन्य सदस्यों की चिन्ता करते हुए दिखाई दिया जबकि अभावविहीन परिवारों में कोई किसी की चिन्ता, परवाह करता नजर नहीं आया। हाँ, ऐसे परिवारों के वृध्द सदस्य अवश्य अपने बच्चों की और उनकी इस मानसिकता की चिन्ता करते मिले।

अनगिनत परिवारों से मिले अनुभवों के आधार मैं कहने की स्थिति में हूँ कि मनुष्य जीवन तो 'इन्द्रधनुष' से भी एक कदम आगे है। इन्द्रधनुष में काला रंग नहीं होता किन्तु ‘इस इन्द्रधनुष’ में तो काला रंग भी नजर आया। मेरे एजेन्सी काल के प्रारम्भिक समय का एक अनुभव प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अभावविहीन, अतिरिक्त समृध्द ऐसे ही एक परिवार में चार सदस्य हैं। माता, पिता और उनके दो पुत्र। घटना के समय दोनों पुत्र अविवाहित थे। आज दोनों ही बाल-बच्चेदार हैं। तब मैं डाक घर की अल्प बचत योजनाओं का एजेण्ट भी था। उन दिनों ‘किसान विकास पत्र’ में निवेशित रकम पाँच वर्षों में दुगुनी हो जाया करती थी और तब ‘एण्टी मनी लाण्ड्रिंग एक्ट’ भी लागू नहीं था। ‘किसान विकास पत्र’ निवेशकों के बीच सम्भवतः सर्वाधिक लोकप्रिय ‘निवेश माध्यम’ था।

इस परिवार के चारों सदस्यों ने एक के बाद एक, मेरे माध्यम से ‘किसान विकास पत्र’ खरीदे। प्रत्येक की निवेशित रकम का आँकड़ा ‘भारी भरकम’ था। निवेश करते समय प्रत्येक ने शर्त रखी कि उसके निवेश की जानकारी शेष तीनों परिजनों को न हो। चूँकि निवेश अलग-अलग समय पर किया गया था सो तब मुझे कुछ भी अटपटा और असहज नहीं लगा। किन्तु, चारों के निवेश के बाद जब उस घर में मेरा आना-जाना बार-बार होने लगा तो यह बात पहले तो मुझे चैंकाने लगी और बाद में कचोटने लगी।

तब ऐसा होने लगा कि मैं उन चारों में से किसी एक से बात कर रहा होता तो हमारा विषय ‘किसान विकास पत्र’ ही होता। किन्तु बात करने के दौरान जैसे ही, परिवार का कोई दूसरा सदस्य आता तो मुझसे बात करने वाला मेरा निवेशक तत्काल विषय बदल देता। उदाहरणार्थ, बात तो किसान पत्र पर हो रही है और माताजी आ गईं। बेटा तत्काल कहता - ‘तो भाई साहब! फिर आपने नगर निगम में मेरे आवेदन की पूछताछ की या नहीं?’ माताजी से अकेले में बात कर रहा होता और उनके पतिदेव आ जाते तो माताजी उलाहना देने लगतीं - ‘आपसे कितनी बार कहा कि भाभीजी को लेकर आइए लेकिन आप सुनते ही नहीं।’ पिताजी से बात कर रहा होता तो बेटा या पत्नी के आगमन पर फौरन ‘ट्रेक’ बदल लेते - ‘आप तो बुध्दिजीवी हैं। आपकी बात सब सुनते और मानते हैं। नेताओं से कह कर शहर की दशा सुधारते क्यों नहीं?’


शुरु-शुरु में तो मुझे यह सब सामान्य लगता रहा किन्तु ऐसा जब बार-बार होने लगा तो मुझसे रहा नहीं गया। बेटा, बाप से छुपा कर और बाप, बेटे से छुपा कर निवेश करे या माँ-बेटे परस्पर छुपा कर निवेश करें, यह तो मुझे अटपटा नहीं लगा किन्तु पति-पत्नी दुराव-छिपाव बरतें, यह मुझे न केवल अटपटा लगता अपितु मुझे असहज और परेशान भी करता। एक दिन मैंने पतिदेव से इसका कारण पूछा तो हँसकर (लगभग टालने का प्रयत्न करते हुए) बोले - ‘अभी आपने दुनिया नहीं देखी है। पैसे के लिए औरतें अपने आदमी का खून तक करा देती हैं। आखिर में पैसा ही साथ देता है। पति-पत्नी के भरोसे-वरोसे वाली बातों में कोई दम नहीं है।’ एकान्त में उनकी पत्नी से पूछा तो बोलीं - ‘मर्दों का कोई भरोसा नहीं। पति है तो क्या हुआ? है तो मर्द ही। इन्हें अपने पैसे पर बड़ी अकड़ है। क्या पता, कल एक औरत और कर लें और मुझे घर से निकाल कर सड़क पर खड़ा कर दें? तब पैसा ही तो साथ देगा?’ दोनों बेटों के पास भी इसी प्रकार अपने-अपने तर्क थे।


चारों की बातें सुनकर मुझे अचरज और कष्ट हुआ। चारों के चारों, एक छत के नीचे, एक साथ रह रहे हैं किन्तु किसी को किसी पर विश्वास नहीं है। और तो और, पवित्र अग्नि के फेरे लेकर, अपने-अपने कुल देवताओं की साक्षी में जिन पति-पत्नी ने आजीवन दुख-सुख में साथ निभाने की और एक दूसरे की चिन्ता करने की शपथ ली, वे भी एक दूसरे पर न केवल सन्देह और अविश्वास कर रहे हैं अपितु अपने प्राणों पर खतरा मान कर भयभीत भी हैं। प्रत्येक ने अपने बचाव में, परिवार की अति-समृध्दि को ही कारण माना।

इस परिवार के अनुभव ने मेरा कौतूहल बढ़ाया और पैसे के ऐसे प्रभाव पर अतिरिक्त रूप से ध्यान देने लगा। मैंने अनुभव किया कि जहाँ-जहाँ आवश्यकता से अधिक पैसा है वहाँ-वहाँ यही स्थिति है। कहीं कम, कहीं अधिक किन्तु है यही सब। कहने को परिवार है किन्तु परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने आप में अकेला और ‘पैसे से उपजे आतंक’ के कारण भयभीत भी।

मेरे मानस पर इस सबका गहरा प्रभाव हुआ है। मैं ईश्वर से सदैव प्रार्थना करता हूँ कि परिवार में कोई न कोई अभाव निरन्तर बनाए रखे ताकि परिवार के सारे सदस्य एक दूसरे की चिन्ता करते रहें। गप्प गोष्ठियों में मैं परिहास करता हूँ कि यदि किसी का बुरा करना हो तो उसे श्राप देने के बजाय ईश्वर से प्रार्थन कीजिए कि उसे, उसकी आवश्यकता से कई गुना अधिक धन दे दे। उसका सुख-चैन छिन जाएगा।

मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि अभाव परिवार को जोड़े रखते हैं और अति समृध्दि परिवार में बिखराव लाती है। यह बिखराव परिदृश्य पर भले ही दिखाई न दे, पूरा परिवार इसे भोगने को अभिशप्त रहता है।


यह सब लिखते हुए मैं भली प्रकार जानता हूँ कि इसके अपवाद हो सकते हैं किन्तु अपवाद तो सदैव ही सामान्यता की ही पुष्टि करते हैं!

इसीलिए मैंने कहा है कि पैसा सबसे गरीब होता है। जहाँ आवश्यकता से अधिक पैसा है वहाँ सामूहिकता और विश्वास अनुपस्थित हो जाते हैं। इसीलिए : पैसा - अकेला रहने को अभिशप्त और लोगों को अकेला करने में निष्णात।


ऐसे ही कुछ कड़वे अनुभव (या कि इन्द्रधनुष का काला रंग) फिर कभी।

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7 comments:

  1. आप ने सही कहा। पैसा है ही ऐसी चीज।

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  2. धन की माया है बड़ी धन ही है सुख धाम
    जा भी ऐसा मानते हे है दुखराम

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  3. माया ना जाने क्या क्या करा देती है .....रिश्तों के अर्थ बदल जाते हैं

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  4. "यह सब लिखते हुए मैं भली प्रकार जानता हूँ कि इसके अपवाद हो सकते हैं किन्तु अपवाद तो सदैव ही सामान्यता की ही पुष्टि करते हैं!"

    ..इस बात के आगे कोई तर्क नहीं ..आप से एक एक शब्द पर सहमत हूँ

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  5. "...गप्प गोष्ठियों में मैं परिहास करता हूँ कि यदि किसी का बुरा करना हो तो उसे श्राप देने के बजाय ईश्वर से प्रार्थन कीजिए कि उसे, उसकी आवश्यकता से कई गुना अधिक धन दे दे। उसका सुख-चैन छिन जाएगा।..."

    थैक अल्लाह, तूने मुझे आवश्यकता से बहुत बहुत बहुत कम धन दिया है. मेरे पास मेरा पर्सनल याच और जेट नहीं है तो क्या हुआ, मैं और मेरा परिवार खुश तो है...:)

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  6. " विद्या ददाति विनयम विनयाद याति पात्रताम ,
    पात्रत्वाद धनमाप्नोति धनात धर्मं ततः सुखम् ! "
    अर्थात विद्या से विनय , विनय से पात्रता / योग्यता , योग्यता से धन , धन से धर्म और धर्म से सुख
    की प्राप्ति होती है .परंतु प्राप्तियों का यह क्रम जब विकृत हो जाता है / बिगड़ जाता है तब परिवारों मे
    ऐसी विकृतियाँ अवश्य - संभावी हैं . इसीलिए कहा है --
    " साईं इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय ,
    मै भी भूखा ना रहूँ , साधु न भूखा जाय ! "

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