‘मिट्टी’ की पुकार

कल का दिन कष्ट में ही बीता। शरीर की पोर-पोर में पीड़ा, आँखें मुँदी-मुँदी। खुलने को तैयार ही नहीं। चिकित्सक को दिखाया तो बोले-‘कुछ भी नहीं हुआ है।’ अर्थात् मैं ‘निरोग किन्तु अस्वस्थ’ था।

ऐसे में पूरा दिन बिस्तर में निकला-करवटें बदलते हुए। भारत-न्यू जीलैण्ड के बीच दूसरे एक दिवसीय क्रिकेट मैच का जीवन्त प्रसारण आ रहा था। किन्तु ‘इतने ओवरों के बाद इतने विकेट पर इतने रन’ से अधिक कुछ भी समझ नहीं पड़ता। सो वहाँ अधिक देर तक टिके रहना सम्भव नहीं था। समाचार चैनलों पर समाचार कम और जुगाली अधिक देखनी/सुननी पड़ती है। सो, रिमोट का उपयोग कल कुछ अधिक ही किया।

इस बीच एक समाचार ने ध्यानाकर्षित किया। अनगढ़ लिखावट वाले, झोंपड़ी के बाहर लटके, गत्ते वाले एक सूचना पत्र को प्रमुखता से बार-बार दिखया जा रहा था जिस पर ‘ताम्र पत्र बेचना है। मिलें’ लिखा हुआ था। ‘सहारा मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़’ पर इसे विशेष समाचार कथा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था। समाचार छत्तीसगढ़ के कोरबा अंचल के किसी गाँव (जिसका नाम मुझे इस समय ‘करघोड़ा’ याद आ रहा है) की लोक कलाकार ‘मिट्टीबाई’ पर केन्द्रित था। समाचार प्रस्तोता कलाकार को ‘मिट्टीबाई’ कह रहा था और उनका सम्वाददाता ‘मीठी बाई’ बोल रहा था। मुझे ‘मिट्टीबाई’ अधिक अच्छा और (कलाकार के कला क्षेत्र से) अधिक जुड़ा लगा।

‘मिट्टीबाई’ की अवस्था लगभग 75-80 वर्ष लग रही थी। झुर्रियों ने चेहरे को जीवनानुभवों का कोलाज बना रखा था। वैसे भी, गरीबी और अभाव व्यक्ति के चेहरे पर पीड़ा और झुर्रियाँ बन कर ही तो व्यक्त होती हैं! वे छत्तीसगढ़ी में बोल रहीं थीं। ‘शब्दार्थ’ तो समझ नहीं आ रहे थे किन्तु कहानी पूरी-पूरी पहुँच रही थी।

घास-फूस और मिट्टी के मिश्रण से कलाकृतियाँ बनाने वाली इस ‘मिट्टीबाई’ को, इन्दिरा गाँधी के प्रधानमन्त्रित्व वाले कार्यकाल में ताम्र पत्र से सम्मानित किया गया था। इन्दिरा गाँधी के निधन को ही अब 25 वर्ष होने वाले हैं। तब ‘मिट्टीबाई’ का शरीर अधिक साथ दे रहा होगा और प्रशंसा ने उनके उत्साह, हौसले, आत्म-विश्वास में भरपूर वृध्दि की होगी। तब वे गर्वित और पुलकित भी हुई ही होंगी। किन्तु आज स्थिति ‘दयनीय’ और ‘शोचनीय’ है। दो वक्त की रोटी आज ‘मिट्टीबाई’ की सबसे बड़ी समस्या है। जीविकोपार्जन का कोई उपाय नहीं है। सबसे छोटी बेटी के साथ रह रही हैं। शासन से उन्हें 600 रुपयों की मासिक पेंशन मिलती अवश्य है किन्तु वह अनियमित है। चार-चार, छः-छः माह की पेंशन एक साथ मिलती है जबकि पेट तो प्रतिदिन दोनों समय रोटी माँगता है।

समाचार के अनुसार, सहायता पाने के लिए ‘मिट्टीबाई’ ने प्रत्येक दावाजा खटखटाया, प्रत्येक प्रयास किया किन्तु सहायता मिलना तो दूर रहा, आश्वासन भी नहीं मिले। ऐसे में ‘मिट्टीबाई’ करे तो क्या करे? गाँठ में पूँजी होती तो कोई कठिनाई ही नहीं होती। ‘घर’ (?) में कोई मूल्यवान सामान होता तो उसे ही बेच कर रोटी जुटा लेती। शासन प्रदत्त ताम्र पत्र ‘मिट्टीबाई’ को बार-बार नजर तो आया होगा किन्तु उसे अपनी कला का सम्मान मान कर उसे बेचने के बारे में कभी सोचा भी नहीं होगा। ‘सम्मान बेच कर जीना भी कोई जीना होता है?’ वाला भाव भी मन में कम से कम एक बार तो आया ही होगा। अपने सम्मान का अर्थ समझने में ‘मिट्टीबाई’ की निरक्षरता ने कोई बाधा खड़ी नहीं की होगी। किन्तु यह भी जल्दी ही समझ आ गया होगा कि सम्मान से पेट नहीं भरता। शायद भूख से उपजी समझ अधिक प्रभावी होती है। ऐसे में ‘मिट्टीबाई’ ने अपने ‘सबसे बड़े सामान’ को बेचने का मर्मान्तक पीड़ादायी यह निर्णय लिया होगा और ‘ताम्र पत्र बेचना है। मिलें’ वाला ‘विज्ञापन’ घर के बाहर लटकाया होगा।

समाचार प्रस्तोता और चैनल का सम्वाददाता, अपने-अपने वक्तव्य में एक बात बार-बार कह रहे थे कि खुद ‘मिट्टीबाई’ ने और उनके आसपास के अनेक लोगों ने शासन से असंख्य बार निवेदन किया किन्तु कहीं, कोई सुनवाई नहीं हुई। ‘ताम्र पत्र दे कर भूल गई सरकार’ वाली बात को इतनी प्रमुखता से प्रस्तुत किया जा रहा था कि ‘मिट्टीबाई’ की भूख भी उसके नीचे दब कर कराहती अनुभव होने लगी। कुछ देर तक तो यह निर्धारण कठिन हो गया कि चिन्ता का विषय क्या है - ‘मिट्टीबाई’ का भूखों मरना या शासन का, ताम्र पत्र देकर भूल जाना? मुझे लगा, शासन का यह भूल जाना अधिक चिन्ता का विषय बनाया जा रहा था।

इस चिन्ता में मैं भी खुद को शरीक करता हूँ। ‘लोक कलाकार’ जीते जी हमारी मूल्यवान सम्पत्ति होते हैं जिनकी देख-भाल किसी भी ‘लोक कल्याणकारी राज्य’ की जिम्मेदारी होती है। किन्तु इसी के समानान्तर कुछ और बातें भी मेरे मन में उठती रहीं। ‘लोक कलाकार’ केवल शासन की ही जिम्मेदारी क्यों होने चाहिए? वे हम सबकी (‘लोक’ की) जिम्मेदारी क्यों नहीं होते? चलिए, माना कि हमें ‘कला’ की सूझ नहीं और ‘कलाकार’ के वैशिष्ट्य से हम परिचित नहीं। किन्तु हमारा पड़ौसी भूखों मर रहा है, यह जानकारी भी नहीं? कहा जाता है कि पड़ौसी सबसे पहला रिश्तेदार होता है। पड़ौसी की चिन्ता सबसे पहले करने के संस्कार हमें घुट्टी में दिए जाते हैं। वे संस्कार कहाँ चले गए? विश्व शान्ति के लिए किए जाने वाले यज्ञों में लाखों रुपयों का घी उँडेल देने वालों के कानों तक ‘मिट्टीबाई’ जैसों की आवाज क्यों नहीं पहुँचती? महीने-महीने भर तक लंगर और भण्डारे चलाने वालों के पास ‘मिट्टीबाई’ जैसों तक पहुँचने का समय और सूझ नहीं है। जिसे खाना हो, हमारे दरवाजे पर आए। पखवाडों/सप्ताहों के कथा-आयोजन कराने वालों को ‘मिट्टीबाई’ जैसों की कथाएँ कब ‘नारायण सेवा’ लगेगी? दारु, साड़ियाँ, बर्तन बाँट कर वोट बटोरने वालों के लिए ‘मिट्टीबाई’ जैसों का जीवन महत्वपूर्ण क्यों नहीं बनता? ‘हमारा हाथ, गरीब के साथ’ वालों को ‘मिट्टीबाई’ गरीब नहीं लगती? छत्तीसगढ़ में ‘हिन्दुओं की घर वापसी का ऐतिहासिक/यशस्वी अभियान’ चलाने वाले ‘हिन्दू वीर’ की नजरें ‘मिट्टीबाई’ जैसों पर क्यों नहीं पड़ती?

ऐसी अनेक बातें मुझे कल बड़ी देर तक कचोटती रहीं। अपने कलाकारों, साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों का बखान तो हम खूब करते हैं किन्तु उन्हें सुरक्षित और व्यविस्थित बनाए रखने में हमारा योगदान शून्य से अधिक कुछ भी तो नहीं होता! कलाकार हमारा किन्तु चिन्ता करे शासन! लोक कला हमारी किन्तु रक्षा करे सरकारी कारिन्दे! स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी हमारा किन्तु उसकी देख-भाल तहसीलदार के जिम्मे! हम क्या करेंगे? हम दुहाईयाँ देंगे, उनके बचाव की गुहार लगाएँगे, उनकी बदहाली के लिए जमाने को कोसेंगे, जमाने को ही जिम्मेदार बताएँगे।

हम यही करेंगे क्योंकि ‘फिक्र का जिक्र’ करने में हम विशेषज्ञ हैं।

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5 comments:

  1. आपसे बिलकुल सहमत हूँ. हर समस्या का समाधान शासन में ढूँढ़ते ही नहीं ढूँढवाते भी है. ताम्र पत्र बिकाऊ है लिखने के लिए सुझाव हम में से ही किसी बुद्धिजीवी ने दिया होगा.

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  2. मैं तो कई ऎसे परिचितों को आज़मा चुकी जो रोज़ ऑफ़िस के बोर्ड पर सदविचार लिखते हैं , कथाएँ कराते हैं , लोगों के फ़टे कपड़े गरीबों में बाँट कर समाज सेवा का पुण्य कमाते हैं । मैंने कई बार प्रस्ताव रखा कि क्यों ना हम छोटी - छोटी धनराशि इकट्ठा करें और सक्षम लोगों से धन एकत्र कर ऎसे लोगों की मदद का बीड़ा उठाएँ , लेकिन दो साल गुज़र गये उन समाजसेवियों के दर्शन दुर्लभ हैं । यहाँ लोग मंदिरों - प्रवचनकारों पर धन लुटा सकते हैं ,ज़रुरतमंद पर नहीं । आखिए पुण्य कमाने का मामला है और पुण्य का फ़ल तो धर्म कर्म से ही मिलता है ।

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  3. शासन समाज को नियंत्रित, नियमित करने का तंत्र है तो जिम्मेदारी उसी की आएगी। आज समाज में जो विघटन दिखाई दे रहा है क्या उस के लिए स्वयं शासन जिम्मेदार नहीं है?

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  4. मिट्टी बाई ही एक नहीं ऐसे अनेक कलाकार और प्रतिभावान हमारे देश में हैं ... जो दो जून की रोटी जुटाने में भी समर्थ नहीं ... ऐसे लोगों को सहयोग की आवश्‍यकता है ... पर आज सब लोग स्‍वार्थी हैं ... काम भी वहीं करेंगे ... जहां से प्रसिद्धि मिलने की ... अखबार में नाम छपने की संभावना बनें ... ताकि आगे उसका फायदा उठाया जा सके।

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