आप तो लोगों की लुगाइयाँ बिकवाते हैं

यह कथा उसी लोकविश्वास को प्रगाढ़ करती है कि व्यक्ति सारी दुनिया की अनदेखी-अनसुनी कर सकता है किन्तु ‘अपने’ की एक बात उसके जीवन को और जीवन-दिशा को बदल देती है।


कथा के नायक का वास्तविक नाम न देना और सुविधा के लिए कोई नाम अवश्य देना मेरी विवशता है। इसी के चलते मानलें कि इस कथा के नायक मलयजी हैं। वे पुलिस में उप निरीक्षक (सब इन्सपेक्टर) थे और पदोन्नत होकर निरीक्षक के रूप् में काल कवलित हुए।

आयु में वे मुझसे कोई 12-15 वर्ष बड़े थे। उनसे परिचय भी पुराना था किन्तु सम्पर्कों में प्रगाढ़ता बीमा के कारण ही आई। नौकरी के दौरान उनका लक्ष ‘पैसा’ ही रहा। किन्तु सफलता भी उनके चरण-चुम्बन करती रही। मेरे सम्पर्क क्षेत्र में वे अब तक के इकलौते व्यक्ति हैं जो ‘प्रचण्ड रिश्वतखोर’ और ‘प्रचण्ड सफल’ एक साथ थे। मेरे लिए यह तय कर पाना अब तक दुरुह बना हुआ है कि उन्होंने रिश्वत अधिक ली अथवा सफलता अधिक अर्जित की? वे इस सीमा तक ‘रिश्वत आग्रही’ थे कि ‘तू तेरी लुगाई को बेच कर पैसे ला, इससे मुझे क्या?’ वाला वाक्य उनके मुँह से मैंने एकाधिक बार सुना था। ऐसा ‘रिश्वत आग्रही’ अपराधियों से भी इसी सीमा तक चिढ़ता था। उनका बस चलता तो वे दुनिया को ‘अपराधी विहीन’ कर देते। निश्चय ही उन पर कोई दैवी कृपा ही रही होगी कि वे सर्वथा विपरीत सत्यों को समानरूप से साधते रह पाते थे। मैंने उनसे उनकी इस सफलता का रहस्य जब-जब भी जानना चाहा, उन्होंने एक ही उत्तर दिया - ‘मैं दोनों कामों में पूरी ईमानदारी बरतता हूँ।’


उन्हें लेकर मैं सदैव सम्भ्रम में ही बना रहा। उनकी ‘रिश्वतखोर’ की छवि, मेरी सार्वजनिक छवि को नकारात्मक रूप से प्रभावित न कर दे, इस आशंका से मैं सदैव भयभीत बना रहा। सो उनसे तभी मिलता जब कोई मतलब होता। वे इस बात को खूब अच्छी तरह समझते थे और कहते थे -‘तू नहीं मिलना चाहे तो मत मिल। किन्तु मैं तुझसे मिलना चाहूं, तुझसे मिलने आऊँ, इस पर तो तेरा कोई बस नहीं है।’ सो, सम्पर्क की प्रगाढ़ता का समूचा यश उन्हीं के खाते में रहा।


वे तीन बेटियों के बाप थे। तीनों का विवाह कर चुके थे। प्रचण्ड रिश्वतखारी के कारण तीनों ही विवाह भरपूर ‘शान-बान’ से सम्पन्न हुए। घर में कहीं कोई कमी नहीं थी। पुत्र नहीं था किन्तु इस बात का मलाल उन्हें तनिक भी नहीं था। वे ‘शिव आराधक’ थे। कहते थे ‘भोले की इच्छा है कि मैं पुत्रविहीन रहूँ। दुखी होकर अपने आराध्य का अपमान कैसे कर सकता हूं?’


वार-त्यौहार पर तीनों बेटियों का आना-जाना बना रहता। कभी तीनों एक साथ आ जातीं तो कभी एक-एक कर। दामाद भी प्रायः ही सुसराल सुख भोगने आते। किन्तु बेटी-दामाद के आने का वास्तविक अर्थ हर बार उनके जाने के बाद ही मालूम हो पाता। विभिन्न दुकानदार आकर बताते कि इस बार बिटिया और कुँवर साहब इतनी-इतनी खरीदी कर गए हैं। यह खरीदी हर बार हजारों में ही होती। मलयजी भी हँसते-हँसते दुकानदारों का भुगतान करते। एक बार भी किसी भी बेटी-दामाद से खरीदी की पुष्टि कभी नहीं की।


स्थानान्तर उनकी नौकरी का अपरिहार्य हिस्सा था। सो, उनका स्थानान्तर हो गया। मेरे कस्बे से कोई 160 किलो मीटर दूर। जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, शुरु-शुरु में फोन सम्पर्क अधिक (प्रायः नियमित) बना रहा। धीरे-धीरे कम होता चला गया जो ‘प्रासंगिक’ की सीमा तक सिमट गया। किन्तु उनकी श्रीमतीजी के फोन बराबर आते रहे। वे मुझे भला आदमी आदमी मानने का भ्रम पाल बैठी थीं।


उनके स्थानान्तर के कोई पौने दो वर्ष बाद की बात है यह। उनकी श्रीमतीजी का फोन आया। बिना किसी भूमिका के कहा - ‘भैया! फौरन चले आओ।’ वे अत्यधिक घबराई हुई थीं। मैंने पूछा - ‘सब ठीक-ठाक तो है? कोई गड़बड़ तो नहीं है?’ वे बोलीं -‘कुछ भी ठीक नहीं है। पूछताछ मत करो। फौरन चले आओ। रोटी वहाँ खाओ तो पानी यहाँ आकर पीना।’


घबराहट तो मुझे भी हो ही गई थी। किन्तु पूछताछ किए बिना जाना नहीं चाहता था। मालूम हुआ कि मलयजी ने दो दिनों से खुद को कमरे में बन्द कर रखा। रोटी-पानी बन्द रखी है। आवाज देने पर जवाब भी नहीं दे रहे। कमरे की खुली खिड़की से उन्हें देख पाना सम्भव हो रहा है। वे बिस्तर पर लेटे हुए हैं। कभी हिचकियाँ ले-ले कर तो कभी सिसकियाँ भर कर रोए जा रहे हैं। उन पर चैबीसों घण्टे नजर रखी जा रही है। तसल्लीबख्श बात यही थी कि वे आत्महत्या का प्रयास करते नजर नहीं आए। लेकिन ‘कब क्या कर बैठें?’ की आशंका तो बराबर बनी हुई है।

मैं सचमुच में भाग कर पहुँचा-अपने सारे काम छोड़कर। उनकी श्रीमतीजी ने मेरे नमस्कार करने पर बिलकुल ही ध्यान नहीं दिया। बोलीं--‘दरवाजा खुलवाओ।’ मैंने अपना नाम बता कर आवाज लगाई। उन्होंने तत्काल ही दरवाजा खोल दिया और इससे पहले कि मैं कमरे में प्रवेश करता, वे मुझे बाँहों में भींचकर, दहाड़ें मार-कार कर रोने लगे। दरवाजे पर उनकी श्रीमतीजी सहित कुछ पुलिसकर्मी एकत्र हो गए थे। सबके सब मलयजी को इस दशा में देखे जा रहे थे-भौंचक और किंकत्र्तव्यविमूढ़ होकर।


इसी दशा में, कमरे की देहलीज पर ही कुछ मिनिट बीत गए। उनका रोना जब कम हुआ तो मैंने कहा -‘क्या हुआ?’मुझे आलिंगनबध्द दशा में ही वे कमरे में ले आए। फिर मुझे छोड़कर, सबकी ओर देखे बिना ही कमरे का दरवाजा किया। पहले खुद पलंग पर बैठे। फिर मुझे बैठने को कहा। उन्हें संयत होने में सचमुच में अपेक्षा से अधिक समय लगा। हम दोनों में बात शुरु हुई।

मालूम हुआ कि सबसे छोटी बेटी रचना दो दिन पहले ही लौटी है। दामाद सहित ही आई थी इस बार थी। तीनों बेटियों में वही सबसे अधिक प्रिय थी मलयजी को। वे उसे अपनी बेटी कम और मित्र अधिक मानते थे। घर की और मन की जो बात पत्नी से भी नहीं कह पाते थे, रचना से कह देते थे। अपनी उसी ‘प्रियतम’ बेटी का एक वाक्य मलयजी के ह़रदय को बेध गया। उन्होंने सहज ही कहा था कि वे पति-पत्नी बाजार से जो भी खरीदी करें तो करें, कोई बात नहीं। किन्तु जाने से पहले यदि बताते जाएँ कि उन्होंने बाजार मे कितनी उधारी की है तो अच्छा होगा। पिता की यह इच्छा रचना को अपनी हेठी लगी और उसने कुछ ऐसा कहा -‘तो पापा अब मुझे हिसाब देकर जाना पड़ेगा? आपको क्या फर्क पड़ता है अगर दुकानदार हजार-पाँच सौ की ठगी कर ले? आपको कौन सा अपनी गाँठ से पैसा देना पड़ रहा है? आप तो लोगों की लुगाइयाँ बिकवा कर पैसे लेते हो!’ यह कह कर रचना तो ‘यह जा, वह जा’ हो गई और थोड़ी ही देर बाद बेटी-दामाद अपने निर्धारित कार्यक्रमानुसार अपने घर लौट गए।

रचना के जाने के बाद से ही मलयजी ने खुद को कमरे में बन्द कर लिया। उन्होंने कहा कि सारी दुनिया उन्हें रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी और ‘लोगों की लुगाइयाँ बिकवानेवाला’ कहती है, उन्होंने किसी की परवाह नहीं की। किन्तु जिन बच्चों के लिए यह सब किया, वे ही बच्चे आज उनके मुँह पर ही यह सब कह गए और यह कहते हुए उन्हें पल भर भी विचार नहीं आया कि बाप पर क्या गुजरेगी। बच्चे जिस बाप की इज्जत न करें, उस बाप को तो डूब मरना चाहिए। किन्तु मलयजी का विवेक नष्ट नहीं हुआ था। वे आत्महत्या को ईश्वर के प्रति अपराध मानते रहे हैं। आत्महत्या के प्रत्येक प्रकरण में उन्होंने आत्महन्ता को ‘खुद तो हरामखोर मर गया और अपने घरवालों की जिन्दगी नरक बना गया’ जैसी बातें कर खूब कोसा है और जी भर कर गालियाँ दी हैं। रचना की बात उनसे अब भी सहन नहीं हो पा रही थी। वे ‘कुछ’ करना चाह रहे थे किन्तु कुछ सूझ नहीं पड़ रहा था। उन्होंने मुझसे कहा - ‘तू ही बता। मैं क्या करूँ कि इस जिल्लत से निजात मिल सके?’

मैं क्या कहता? मैं तो उनसे हर मामले में बहुत ही छोटा था। किन्तु उस क्षण वे मुझे ‘दुनिया का सबसे ज्यादा जरूरतमन्द व्यक्ति’ लगे। सो मैंने कहा कि मेरे पास एक उपाय है अवश्य किन्तु उस पर अमल कर पाना उनके लिए नितान्त असम्भव ही लग रहा है। मलयजी बोले -‘अभी तो तूने कुछ कहा नहीं है? मुझे तुझ पर पूरा विश्वास है। तू जो कहेगा, वही करुँगा। अपने ईष्ट भोल शंकर की साक्षी में तुझसे वादा करता हूँ। शर्त यही है कि मुझे इस जलालत से मुक्ति मिल जाए।’ मैंने कहा कि रिश्वतखोरी ही इस संकट के मूल में है, सो इस मूल को नष्ट करना ही एकमात्र उपाय नजर आता है जो उनकी नौकरी के चरित्र को देखते हुए नितान्त असम्भव है।


उन्होंने मुझसे दो बार और पूछा कि ऐसा करने से वास्तव में वे संकट मुक्त हो सकेंगे? मैंने कहा -‘मुझे तो पूरा विश्वास है।’ मलयजी ने कहा -‘तो तू भरोसा कर। शिव साक्षी में मैं इसी मिनिट से रिश्वतखोरी बन्द कर रहा हूँ।’ उनके स्वरों की दृढ़ता ने मेरे आत्मविश्वास को डिगा दिया। मुझे प्रसन्न होना चाहिए था किन्तु मुझे कँपकँपी हो आई। मैंने कहा- ‘तब आप नौकरी नहीं कर पाएँगे। इसलिए इसमें एक सुधार कर रहा हूँ कि आप अपनी ओर से रिश्वत माँगना बन्द कर दीजिएगा और यदि कोई स्वैच्छिक रूप से ‘शुकराना’ दे तो मना मत कीजिएगा।’ उन्होंने मेरे इस स्खलन को तत्काल ही भाँप लिया। बोले - ‘रिश्वत तो रिश्वत ही होती है। फिर भी तेरी सलाह व्यवहारहिक है। यही करूँगा। पक्का वादा। शिव साक्षी में वादा।’

यह सब होने के बाद, कोई तीसरे दिन उन्होंने अन्न-जल ग्रहण किया। रात को उन्होंने मेरी उपस्थिति में अपनी श्रीमतीजी को पूरी बात सुनाई और ‘सूखी तनख्वाह पर’ घर चलाने के लिए तैयार रहने की सूचना दे दी। अगली सवेरे मैं चला आया।

चला तो आया, किन्तु समूचा घटनाक्रम मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था। पल-प्रति-पल मैं भयभीत बना रहात। पता नहीं मलयजी पर क्या बीत रही होगी? वे अपनी नौकरी कैसे कर रहे होंगे? अब मैंने अपनी ओर से सम्पर्क करना शुरु कर दिया था-नित्य प्रायः ही। उनके स्वरों में एक बार भी निराशा, दुर्बलता, उपालम्भ अनुभव नहीं हुआ। सब ठीक ही चल रहा था। अपराधियों को तो वे पहले भी नहीं बख्शते थे। अब भी नहीं बख्श रहे हैं। सो, नौकरी में सफलता का ग्राफ अपनी वृध्दि नियमित बनाए हुआ था। जो भी अन्तर पड़ रहा था, आमदनी पर पड़ रहा था। मलयजी में आए परिवर्तन की जानकारी कानोंकान होते उनके समूचे कार्यक्षेत्र में अनपेक्षित तेजी से फैली। अपराधी अधिक भयभीत हुए। दौरों पर आने वाले उच्चाधिकरियों ने भी उनसे ‘अर्थापेक्षाएँ’ मानो शून्यवत कर लीं। इन सारी बातों से मलयजी का आत्मबल और बढ़ा। घटना के कोई सात माह बाद एक दिन उन्होंने टेलीफोन पर कहा -‘तेरी एक बात टाल दी है। अब शुकराना लेने के लिए आत्मा गवाही नहीं देती। वह भी बन्द कर दिया है।’ उनके स्वरों में मानो चौड़े पाट में बह रही गंगा की शान्त-गम्भीर सरसराहट थी और मेरी आँखें गंगा हुई जा रही थीं। बता रहे थे कि शुरु-शुरु के तीन-चार महीने अवश्य अर्थाभाव अनुभव हुआ किन्तु उम्मीद से अधिक जल्दी ही जीवनक्रम सामान्य हो गया। अब वे गहरी नींद सोते हैं।

और रचना सहित तीनों बेटी-दामादों का व्यवहार? उन्होंने बताया कि सबके सब अब भी पूर्वानुसार ही आते-जाते हैं लेकिन घर से बाहर कोई नहीं जाता। रचना को जैसे ही मालूम हुआ कि उसकी बात ने पिता की जीवन दिशा और दशा बदल दी है तो अपराधबोध से ग्रस्‍त हो, उसने अपनी दोनों बड़ी बहनों और तीनों दामादों को ‘हिदायत’ देकर दुरुस्त कर दिया। बेटी-दामाद के जाने के बाद कोई दुकानदार अब घर नहीं आता।

घटना के कोई सवा वर्ष बाद, एक विवाह प्रसंग में,उनकी पदस्थापना वाले कस्बे में फिर जाना हुआ। अकेला नहीं था, चार-पाँच मित्र भी साथ थे। सो तय किया था कि विवाह समारोह से निपट कर लौटते समय उनसे मिलूँगा। किन्तु वे तो मुझसे पहले ही विवाह समारोह में उपस्थित थे। मुझे देखते ही मेरी ओर लपके। मुझे लगा कि वे मुझे बाँहों में भर लेंगे। किन्तु वे तो एकदम मेरे पैरों की ओर झुकते नजर आए। मैंने घबराकर, सकपकाकर उन्हें अपनी बाँहों में थामा। बडी ही कठिनाई से कह पाया - ‘यह क्या कर रहे है? मुझे पाप में क्यों डाल रहे हैं?’ मुझे लगा था कि वे रोना शुरु कर देंगे। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। मेरे हाथों में थमे अपने हाथों को छुड़ाकर, अपने दाहिने हाथ से मेरी पीठ को घेरे में लेकर, अपने साथ मुझे आगे ले चलते हुए लोगों से बोले -‘यही है वो आदमी जिसकी बात मैं आपसे करता रहता हूँ। इसने मुझे जिन्दगी दी भी और सुधारी भी।’ इसके बाद जो कुछ हुआ हुआ उसका वर्णन यहाँ अनावश्यक ही है। बस इतना ही कि मैं न भोजन कर पाया और न ही व्यंजनों का स्वाद ले पाया। उस समय जो अनुभूति हुई वह आज भी मेरी धरोहर बनी हुई है।


नौकरी में रहते हुए ही गम्भीर ह़रदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई। अपनी सम्वेदनाएँ प्रकट करने मुझे जाना ही था। गया तब तक शोक निवारण तक की सारी उत्तरक्रियाएँ सम्पन्न हो चुकी थीं। सारे मेहमान लौट चुके थे। केवल रचना रुक गई थी। मैं लौटने लगा तो रचना मुझसे लिपट गई। बड़ी मुश्किल से उसने कहा - ‘पहली बार पापा को मैंने मार दिया था। तब मम्मी ने आपको खबर कर दी थी और आपने पापा को बचा लिया था। इस बार सब कुछ इतना एकाएक हुआ कि मम्मी को आपको बुलाने की याद आने का मौका भी नहीं मिला।

रोना तो मुझे भी आ ही रहा था। मलयजी की मृत्यु के कारण, रचना के लिपट कर रोने के कारण, रचना की कही बात के कारण। किन्तु उससे अधिक शायद इस बात के कारण कि मैंने मलयजी को शुकराना लेने की सलाह क्यों दी। वे तो मेरी सलाह के बाद पहले ही क्षण से रिश्वतखोरी को त्यागने को तत्पर थे। मेरे कारण ही वे कुछ और समय तक रिश्वतखोर बने रहने का वजन अपनी आत्मा पर झेलते रहे होंगे।

भला बताइए! ऐसी बातें याद करते समय, लिखते समय रोना क्यों नहीं आए?

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10 comments:

  1. बहुत ही प्रेरक प्रसंग है।
    रोने का कोई प्रसंग नहीं, लेकिन आदत का क्या किया जाए?

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  2. रिश्‍वतखोरी का इतिहास तो मानव सभ्‍यता में पुराना रहा है। आपने इसे जिस तरह से रेखांकित किया है वह रोचक है। बधाई।

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  3. बहुत हो रोचक और प्रेरक प्रसंग. लगता है द्विवेदी जी आप
    के पूर्व परिचित है. आभार.

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  4. बहुत ही प्रेरक प्रसंग.....एक बात तो माननी पडेगी कि जीवन के घट्नाक्रमों का ऎसा अद्भुत प्रस्तुतिकरण आपसे बढकर कोई नहीं कर सकता.......पाठक को बांध के रखने की कला आप बखूबी जानते हैं.

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  5. प्रायः प्रेरणादायक प्रसंग केवल प्रेरणादायक ही होते हैं। वे पाठक को यूँ साँस रोके बाँधे नहीं रखते। आप की कलम में यह जादू है कि एक ही प्रसंग में दोनों गुण होते हैं।
    घुघूती बासूती

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  6. ...इकलौते व्यक्ति हैं जो ‘प्रचण्ड रिश्वतखोर’ और ‘प्रचण्ड सफल’ एक साथ थे।
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    इतने सारे सफल व्यक्तियों को देखता हूं तो शंका होती है कि ये दोनो शब्द-युग्म समानार्थी हैं!

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  7. अद्भुत कथा है भैया...लेखन में प्रवाह तो आपकी खा़सियत है मगर इस प्रसंग से पता चलता है कि किस तरह आज भी नैतिक सीख से ईमान की स्थापना होती है और आस्था का साम्राज्य फलता-फूलता है।
    आपकी जैजैकार है। आपके अनुभवों से लाभ लेने ऐसे ही आते रहेंगे....
    साभार
    अजित

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  8. प्रेरक प्रसंग...आपने बहुत रोचक ढंग से लिखा है

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  9. मेरो नाम केभिन एडम्स, बंधक ऋण उधारो एडम्स तिर्ने कम्पनी को एक प्रतिनिधि, म 2% ब्याज मा ऋण दिनेछ छ। हामी विभिन्न को सबै प्रकार प्रदान
    ऋण। तपाईं यस इमेल मा अब हामीलाई सम्पर्क गर्न आवश्यक छ भने: adams.credi@gmail.com

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.