न तो उतना रोया, न वैसा रोया

बीमा व्यवसाय के दौरान मिला यह अनुभव मेरे लिए अब तक मर्मान्तक पीड़ादायक बना हुआ है। लगभग पन्द्रह वर्षों के बाद, इस क्षण तक भी मुझे लगता है कि निश्चय ही मैंने ईश्वर के प्रति कोई गम्भीर अपराध किया होगा जिसके दण्डस्वरूप मुझे ऐसे क्षणों का साक्षी बनना पड़ा। किन्तु जब इन क्षणों के ‘भोक्ता‘ का स्मरण होता है तो मेरी आत्मा काँप उठती है-ईश्वर उससे कितना खिन्न रहा होगा?

यह सम्भवतः 1993 की बात है। मेरी एजेन्सी का तीसरा वर्ष चल रहा था। बीमा व्यवसाय का मूल आधार होता है - सम्पर्क और अनुशंसा। जब भी किसी से बीमा मिलता है, उससे हम (एजेण्ट) लोग उसके किसी मित्र, परिचित का अता-पता लेते हैं और अनुरोध करते हैं कि वह अपने मित्र को, टेलीफोन कर हमारी सिफारिश कर दे और हमारी विश्वसनीयता की पुष्टि कर दे। बाकी काम हमारा।

ऐसे ही एक सिफारिशी फोन के ‘फालो-अप’ में मैं ‘उन’ सज्जन से मिला। सुविधा के लिए आगे मैं उन्हें 'रामजी' के काल्पनिक नाम से उल्लेखित करूँगा।

रामजी से यह मेरी पहली ही भेंट थी। न मैं उन्हें जानता था, न वे मुझे। सवेरे कोई सवा नौ-साढ़े नौ बजे मैं उनके निवास पर पहुँचा। मुख्य बाजार में गर्वोन्नत मस्तक खड़ा उनका तीन मंजिला मकान उनकी सुदृढ़ आर्थिक स्थिति का उद्घोष कर रहा था। बीच बाजार में उनकी, कपड़े की खूब बड़ी दुकान मैं देख ही चुका था। वैभव लक्ष्मी मानो अपने अनुचरों सहित वहाँ विराजित थीं। मैं खुश हुआ। बीमा मिलने की प्रचुर सम्भावनाएँ मुझे साफ-साफ नजर आ रही थीं।
रामजी नहा-धो कर, पूजा-पाठ कर उठे ही थे। भेंट पूर्व निर्धारित थी। वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अभिवादन के आदान-प्रदान के बाद मैंने अपना परिचय दिया। अपना विजिटिंग कार्ड उन्हें थमाया और उनके व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा आर्थिक ब्यौरे प्राप्त करने में जुट गया। मुझे यह जानकर विस्मय हुआ कि उनके परिवार मे अब तक किसी को बीमा नहीं था। किन्तु बहुत ही जल्दी समझ में आ गया कि ऐसा क्यों था। उनकी सारी गणना ब्याज केन्द्रित और ब्याज आधारित थी जिसके सामने बीमे से मिलने वाली प्राप्तियाँ तो पानी भी नहीं भर पातीं! कुछ ही क्षणों में मुझे भान हो गया कि यहाँ से बीमा या तो नहीं मिलेगा और मेरे सौभाग्य से मिल गया तो उसके लिए मुझे असाधारण परिश्रम करना पड़ेगा और उससे भी अधिक असाधारण धैर्य धारण कर भरपूर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।


बीमा को ब्याज के मुकाबिल बनाए रखने के लिए मैंने कहा - ‘आपको मुनाफा चाहिए तो बीमा में फूटी कौड़ी लगाना भी मूर्खता है। किन्तु यदि आपको सुरक्षा चाहिए तो फिर बीमे के अतिरिक्त और कहीं पैसा लगाना बुध्दिमानी नहीं है।’ रामजी ने जो हाव-भाव प्रकट किए उससे मुझे तत्क्षण ही लग गया कि इस वाक्य ने उन्हें तनिक उलझा दिया है। बोले - ‘मैं समझा नहीं। साफ-साफ समझाओ।’ मैंने कहा - ‘हम मुनाफा नहीं, सुरक्षा बेचते हैं।’


इसके बाद तो मुझे खुलकर खेलने के लिए बिना बाड़वाला लम्बा-चैड़ा मैदान मिल गया। लाभ के पाश में बँधा ‘चतुर-सुजान व्यापारी’ अचानक ही ‘असुरक्षा भाव से ग्रस्त’ हो गया। अब मैं बोल रहा था और रामजी सुन रहे थे। उनकी मुख मुद्रा से निर्विकार भाव तिरोहित हो चुका था और आत्मपरकता व्याप्त होने लगी थी। वे मेरी बातों पर सहमतिसूचक मुद्रा में अपना सर हिला रहे थे। यह देख-देख मेरे मन में फुलझड़ियाँ छूटने लगी।


तभी उनका इकलौता बेटा सीढ़ियाँ उतर कर कमरे में प्रकट हुआ। वह बी. काम. द्वितीय वर्ष का छात्र था। आयु के उन्नीसवें वर्ष में चल रहा था। पिता के पास बैठे अपरिचित का अभिवादन करना तो दूर रहा, उसने हम दोनों की ओर देखा भी नहीं। रामजी तनिक असहज हुए। उन्हें अच्छा नहीं लगा। बेटे के चेहरे पर पसरे उपेक्षा भाव को उन्होंने मानो पहली ही नजर में पढ़ लिया था। सो, उन्होंने यह भी नहीं कहा कि अतिथि को नमस्कार करो।


बेटा बिना बोले बाहर निकलने को ही था कि रामजी बोले - 'भैया, तू कल शाम को दुकान पर नहीं आया। नहीं आया तो कोई बात नहीं। खबर कर देता तो थोड़ी आसानी हो जाती। दोपहर में एक लड़के की छुट्टी कर दी थी, वह नहीं करता। शाम को दुकान पर थोड़ी परेशानी हो गई।' उनके स्वर में न तो आदेश भाव था न ही उपालम्भ। बेटे की असूचित अकस्‍मात अनुपस्थिति से उपजी अस्तव्यस्तता के कारण झेली परेशानी की सूचना थी - अत्यन्त दयनीय स्वरों में। मैं साफ-साफ समझ पा रहा था कि रामजी ने जो कहा सो कहा किन्तु जो नहीं कहा वह था - आगे से ऐसी परेशानी खड़ी न हो, इतनी मदद करना।


रामजी की बात सुनकर पुत्र ठिठका। गर्दन को रामजी की तरफ हलकी सी जुम्बिश देकर, चेतावनी भरे रूखे स्वरों में बोला - ‘टिड़, टिड़ मत करो। यह मकान मेरे नाम पर है। लात टिका कर निकाल दूँगा।’ यह कह कर वह बिना हम दोनों की ओर देखे, अपनी चेतावनी की प्रतिक्रया जानने का यत्न किए बिना, बेलौस चला गया।


वह तो चला गया किन्तु कमरे में जो कुछ छोड़ गया था, उसे झेल पाना हम दोनों के लिए समूची धरती का भार सर पर उठाने से भी अधिक कठिन था। रामजी सचमुच में जड़वत हो गए। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वे निश्चल, निस्पन्द, मूर्तिवत हो गए थे। मानो लकवाग्रस्त हो गए हों।


और मैं? मुझे लग रहा था कि पूरी धरती लट्टू की तरह पूरी तेजी से घूम रही है और इसी तरह घूमती-घूमती रसातल में चली जाएगी-मुझे और रामजी को अपने साथ लपेट कर। मैं हम दोनों को तेज भँवर की लपेट में आए हुए, घूमते देख रहा था। हम दोनों बचाव की मुद्रा में अपने-अपने हाथ उठाए हैं किन्तु आवाज किसी के भी गले से नहीं निकल रही है। केवल धरती के घूमने की आवाज गूँज रही है।


नहीं पता कि हम दोनों कब अपने आप में लौटे। मुझे अब तक नहीं याद कि पहले मैं संयत हुआ या रामजी। लेकिन, रसातल की ओर घिसटते जाने से बच धरती पर आए तो पाया कि हम दोनों ही हिचकियाँ ले-लेकर रो रहे हैं-निःशब्द। एक दूसरे को ढाढस बँधाने का न तो साहस न ही भान। बस, रोए जा रहे हैं। थोड़ी देर बाद रामजी के मुँह से निकला - ‘जिन्दगी बेकार हो गई।’ और इसके बाद उन्होंने जो रोना शुरु किया तो लगा कि उनके प्राण, उनकी छाती चीरकर बाहर निकल पड़ेंगे। वाल्मिकी के बाण से बिंधा क्रौंच पक्षी सम्भवतः कुछ इसी तरह छटपटाया, बिलखा होगा। वैसा ही क्रन्दन किया होगा जैसा रामजी कर रहे थे।


उनकी दशा देख मैं आहत था किन्तु जैसे-जैसे चेतना लौटने लगी तो भयभीत होने लगा। मुझे लगा - रामजी को ‘कुछ’ हो न जाए या फिर भावातिरेक में वे खुद ही ‘कुछ’ कर न लें। जैसे-तैसे खुद संयत हुआ और रामजी को अपनी बाँहों में लिया। वे फिर बिखर गए। मैंने सचमुच में ‘येन-केन-प्रकारेण’ रामजी को सम्हाला। उनके आँसू पोंछे। मेरा कुछ भी कहना व्यर्थ ही नहीं, मेरे लिए असम्भव ही था। केवल उनकी पीठ पर हाथ फेरता रहा। पता नहीं कितनी देर बाद उनका क्रन्दन हिचकियों से होता हुआ सुबकियों तक आया। ऐसी स्थिति का साबका मुझे मेरे अब तक के जीवन में पहली ही बार पड़ा था। सो, यह भी नहीं जानता था कि ऐसे समय में क्या कहना चाहिए, किस तरह ढाढस बँधाना चाहिए।


मानो, जेठ की चिलचिलाती दोपहर में, नंगे पाँवों, कच्छ का रन पार करके लौटे हों, कुछ ऐसी ही लस्त-पस्त स्थिति में उन्होंने अपने आप को सम्हालने का उपक्रम किया। मेरी ओर जिस दृष्टि से देखा उससे मुझे एक बार फिर रोना आ गया। मैं आँखें मूँद कर, कुर्सी की पीठ से टिक कर बैठ गया। तभी उनकी आवाज सुनाई दी। बोलने में मानो अपनी समूची शक्ति लगानी पड़ रही हो रामजी को। हाँफते, कराहते बोले - ‘इनकम टैक्स की प्लानिंग के लिए मकान इसके नाम कर रखा है। वकील साहब ने सलाह दी थी। लेकिन इसके कारण यह दिन देखना पड़ेगा यह तो सपने में भी नहीं सोचा था। मैं तो समझ रहा था कि मेरे घर में कोई कमी नहीं है। किन्तु आज मालूम पड़ा कि मेरे पास बस पैसा ही पैसा है, बाकी तो कुछ भी नहीं है। यह दिन दिखाने से तो अच्छा होता कि भगवान मुझे उठा ही लेता।’ मैं कुछ नहीं बोला। बोल पाना मेरे लिए मुमकिन ही नहीं हो पा रहा था।


अब तक मैं अपने आप में आ चुका था। बुद्धि और विवेक जाग्रत हो मेरे कान उमेठने लगे थे। रामजी भी ‘खतरे से बाहर’ हो चुके थे। ‘मुझे अब यहाँ से निकल जाना चाहिए’ जैसी स्थिति आ गई थी। अचानक मुझे ध्यान आया-हम दोनों इतना रो लिए, रामजी ने इतना विलाप, इतना क्रन्दन किया किन्तु रामजी की पत्नी तक आवाज नहीं पहुँची! मैंने पूछा - ‘भाभीजी घर में नहीं हैं?’ रामजी ने कहा - 'है। तीसरी मंजिल पर।' कह कर उन्होंने कमरे के स्विच बोर्ड का एक बटन दबाया। घण्टी की धीमी आवाज सुनाई दी। कुछ ही क्षणों में रामजी की पत्नी सीढ़ियों उतरीं। मैंने नमस्कार किया। मेरे नमस्कार का जवाब देने के बजाय वे चकित हो हम दोंनों को देखने लगीं। रामजी ने मुझसे कहा -‘आप पधारो सा'ब। फिर कभी आना।’ उनकी पत्नी ने कुछ पूछना चाहा तो रामजी बोले -‘इन्हें जाने दो। फिर बात करेंगे।’


और मैं चला आया। उस दिन मैं भोजन नहीं कर पाया। घर से बाहर भी नहीं निकल पाया। मेरी पत्नी नौकरी पर गई हुई थीं। खुल कर रोने के लिए मुझे पूरा-पूरा एकान्त मिला। जितना उस दिन रोया, उतना न तो उससे पहले कभी और न ही अब तक कभी रोया। सीधा बिस्तर पकड़ लिया। दोपहर होते-होते बुखार आ गया। पता नहीं मैं सो रहा था या तन्द्रा में था किन्तु रामजी का चेहरा मेरी नजरों से नहीं हट रहा था। उनका बिलखना, उनका हाथ-पाँव पटकना मेरी आँखें नहीं झपकने दे रहे थे।


अगले दिन सामान्य हो पाया। जिन सज्जन ने सिफारिश कर मुझे रामजी के पास भेजा था वे फोन पर पूछ रहे थे -‘रामजी ने बीमा दिया या नहीं?’ मैंने कहा - ‘बाद में बुलाया है।’ यह ‘बाद’ आज तक नहीं आया। रामजी के पास जाने की हिम्मत ही नहीं हुई। डरता रहा कि मुझे देखते ही वे कहीं आत्म ग्लानि में आकण्ठ डूब न जाएँ।


इस घटना के कोई सात माह बाद मेरे एक मित्र ने कहा -‘रामजी तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे। तुम्हें नमस्कार कहलवाया है।’ मैंने पूछा -‘तुम उनसे मिल कर आ रहे हो?’ मित्र बोला -‘हाँ। परसों मिला था। सूरत में।’ मैं चैंका। पूछा - ‘सूरत में?’ मित्र ने निस्पृह भाव से कहा -‘हाँ। सूरत में। पता नहीं क्या हुआ कि पाँच-छह महीने पहले रामजी अपना मकान और दुकान बेच कर सूरत चले गए। कह रहे थे कि यहाँ से उनका मन उचट गया है।’


मैंने खोद-खोद कर मित्र से रामजी के बारे में पूछा तो मालूम हुआ कि रामजी सूरत में बहुत ही सामान्य, छोटे से मकान में रह रहे हैं। दुकान भी नाम मात्र की कर रखी है, इतनी कि घर चल जाए। यहाँ से जो रकम लेकर गए थे, वह बैंक में एफडी कर दी है और उसके ब्याज की रकम निर्धन बच्चों की पढ़ाई के लिए दे देते हैं। इस सबमें उनकी पत्नी उनके साथ है।


‘और उनका बेटा? वह कैसा है?’ मैंने पूछा। मित्र तनिक अचरज से बोला -‘पता नहीं क्या हुआ! वह तो पूरा बदल गया है। कोशिश करता है कि रामजी को दुकान पर या तो बैठना ही नहीं पड़े या फिर कम से कम बैठना पड़े। यहाँ तो वह रामजी की परवाह ही नहीं करता था लेकिन वहाँ तो श्रवण कुमार बना हुआ है।’


मित्र की बात सुनकर मेरी आँखें बहने लगीं। मित्र घबरा गया। बोला -‘क्यों? क्या बात है? तुम क्यों रो रहे हो?’ मैंने कहा - ‘कुछ नहीं। सात महीने पहले मैं लुट गया था। आज मेरी लुटी रकम मुझे सूद समेत मिल गई सो रोना आ गया।’


मित्र मुझे लाल बुझक्कड़ की तरह देखने लगा। मैं उसे, इसी दशा में छोड़ घर लौट आया। घर आकर मैं फिर रोया।


लेकिन इस बार न तो उतना रोया और न ही वैसा रोया।

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8 comments:

  1. एक से बढ़कर एक अनुभव हैं आपके पास, इन्हें ऐसे ही बांटते रहिये।

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  2. कथा में पूरा यू टर्न है। लेकिन उस में रहस्य छोड़ दिया है आप ने। आखिर यू टर्न का कारक क्या रहा?
    यह सही है कि धन मानवीय रिश्तों की छुरी है।

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  3. पहले हमें यह बताएं कि आपको रोना क्यों आता हैं. एक ब्लॉगर बिटिया का मेल आया था. उसकी बातें कुछ ऐसी थीं कि रोना आ गया. अकारण ही रोना आ जाता है. यह मानसिक कमजोरी है. हमें इस से निजात पाना होगा.

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  4. आपकी स्मृ्तियां, लेखन शैली,और भावुकता सब की सब तारीफ के काबिल हैं.....

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  5. अब तक बीमा वालों के कारण लोगों के घर बनने और बसने का सुना था , बिकने का
    पहली बार ..................

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