हमारा कृष्ण तो वहीं, कहीं....

बहुत लम्बा/बड़ा है दादा श्री बालकवि बैरागी का यह लेख। किन्तु मुझे आकण्ठ विश्वास है कि आपने यदि पढ़ना शुरू कर दिया तो अन्तिम शब्द तक पढ़ने के बाद ही अगली साँस ले पाएँगे। 

दादा की कविताओं और गद्य में एक अघोषित प्रतियोगिता चलती रहती है। दादा का ‘कहन’ जबरदस्त है। दादा की कविताएँ यदि सम्मोहित करती हैं तो इस ‘कहन’ के चलते उनका गद्य लुभाता है। 

इस लेख में दादा की भाषा का लालित्य देखते ही बनता है। दादा आपको जहाँ एक ओर, राधाष्ठमी के उत्सव पर, वृन्दावन के बाँकेबिहारीजी के मन्दिर के प्रांगण में जुड़े भक्त समुदाय में शामिल होने की अनुभूति करा देते हैं और अनजाने में ही आप ‘राधे! राधे!!’ का जयघोष करने पर विवश कर देते हैं वहीं दूसरी ओर, लेख के अन्तिम छोर पर पहुँचते-पहुँचते प्रेमाश्रु से सराबोर भी कर देते हैं।

साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ के 16 सितम्बर 1991 में छपा यह लेख, जीरन (नीमच) वाले प्रिय विवेक मेहता ने बड़ी चिन्ता और आत्मीयता से उपलब्ध कराया है।

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हमारा कृष्ण तो वहीं, कहीं....

-बालकवि बैरागी


बात उन दिनों की है जब मैं संसद में वो था-क्या कहते हैं जिसे-सांसद यानी कि लोक सभा सदस्य था।

सुशील ‘पिया’ ने एक सात्विक दुराग्रह किया कि छोटा-मोटा साधन जुटा कर कम-से-कम एक बार तो ‘राधाष्टमी’ हम लोग वृन्दावन में कर ही लें। ब्रज में बसनेवाले हमारे कई मित्र समय-समय पर कहा भी करते थे कि भारतीय श्रद्धा का आधार यदि देखना हो तो मुझे राधाष्टमी का पर्व एक बार अवश्य ही वृन्दावन में स्वयं देखना चाहिए। कुल मिला कर हम दोनों जीव एक-दो दिन का समय निकाल कर वृन्दावन जा ही पहुँचे। जाना तो वहाँ बार-बार हुआ है पर राधाष्टमी पर्व का यह पहला अवसर था। लोकश्रद्धा का ज्वार तो ब्रज के कटिबन्ध से ही उमड़ता दिखाई देने लगा था। खैर, वृन्दावन में पहुँच कर पहले एक निजी अतिथिशाला में हम लोगों ने डेरा डाला। अतिथिशाला के प्रबन्धक मुझे पहचानते थे। नाम से तो परिचित थे ही, शायद कभी-कभार मिल भी चुके थे। कोई असुविधा नहीं हुई। भीड़ के अपने ठाठ थे। वृन्दावन की हर गली जन-सागर की लहरों में डूबती-उतराती नजर आती थी। शाम होते-होते तो लोकश्रद्धा और लोकसागर का अनन्त उफान देख कर मन मुग्ध हो गया। सुशील ‘पिया’ की आँख में कृष्ण-करुणा के आँसू और होठों पर सूर-सेवा के अटपटे बोल तैरने लगे। सोचने की शक्ति प्रायः समाप्त हो गई थी। देखते ही रहो। भीड़ में खड़े हो गए तो फिर उसकी लहरों पर ही आपको किसी तट का सहारा मिले तो मिले वरना बस ‘राधे...राधे’ के श्रद्धा सरोवर में गोते खाते रहिए। न तन की सुध, न मन का बोध। रोशनी, बैण्ड, लाउडस्पीकर, ढोल, मृदंग, नगाड़े, ताल, करताल, तुरही, बाँसुरी, झाँझ, डफली और भी न जाने किस-किस तरह के देसी और परदेसी वाद्य और लोकवाद्य अपना अन्तस खोलकर, सुरों का संसार सिरज रहे थे। भारत के दूर-सुदूर और पास-अतिपास यानी कि हर कोने से आए कृष्णभक्त अपने-अपने रंग-बिरंगे परिधानों में तन-मन की सुध बिसराए नाचते-गाते, कुकते-हूकते सारे वृन्दावन को स्वर्ग बनाए हुए विभोर भावालोक के विधाता लग रहे थे। हृदय था कि ओठों तक आ रहा था-आँसू थे कि अविरल, अथाह थे। अपरिचित, अनजाने श्रद्धालुओं के हाथ कन्धों पर थे और हमारे हाथ न जाने किनके कन्धों पर जा टिके थे।

उस अव्यक्त अनुभूति से अभिभूत वह रात मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा। बाँके बिहारी के दर्शनों का बखान कैसे करूँ और कब तक करूँ? जब नटखट नन्दलाल, नटनागर का विराट दर्शन मन्दिर के बाहर ही वैसा कुछ हो चुका था कि चेतना चहचहाना बिसार चुकी थी। मन्दिर का भीतरी आँगन दर्शन-मुद्रा का अनुपम और अगम उदधि लगता था। कोई अपने ठाकुर से बतिया रहा था तो कोई राधे मैया की चिरौरी कर रहा था। कोई उसे मना रहा था तो कोई पटा रहा था। राधे के प्रति श्रद्धापूर्ण ईर्ष्या का आह्लादमय स्वर यहाँ से वहाँ तक ठाठें मार रहा था। श्रद्धा, करुणा, विरह, व्याकुलता, विह्वलता, विकलता और विवशता के बोल समूचे आकाश में तैर रहे थे-‘राधे तू बड़ भागनि कौन तपस्य कीन, तीन लोक के नाथ जो, सो तेरे आधीन।’ और, ‘राधे! राधे! श्याम से मिला दे, मुझको भी राधा बना ले नन्दलाल’ जैसे रस घोल रहे थे। ‘नन्द, जसोदा जमुना मैया-जय गोवर्धन राधे मैया-जय गोकुल के धेनु चरैया-जय हलधर के दाऊ भैया’ के रोमांचित दर्शक या तो दुपट्टों, पल्लुओं से अपने प्रेमाश्रु पोंछ रहे थे या हाथों को आसमान तक ऊँचा उठा-उठा कर जय-जयकारा कर रहे थे। कहते हैं, वृन्दावन में पूजा, प्रार्थना, अर्चना, आराधना, आरती और अनहद सभी गड्डमड्ड हो कर मात्र सेवा के अभिन्न उपांग होकर रह जाते हैं। ‘तुलसी और सेवा’ वृन्दावन का मुख्य भाव है। वृन्दावन में कोई मोक्ष नहीं माँगता। वहाँ जा कर हर कोई माँगता है - पुनर्जन्म। और वह भी उसी सेवास्थली में। वहाँ के कुंज-निकुंज लोगों का जन्म-जन्मान्तर भुला देते हैं और याद भी दिला देते हैं। बड़े-बड़े मोक्षकामी वहाँ जाकर अपनी मोक्ष कामना भूल जाते हैं। सारा वृन्दावन ‘ठाकुर सेवा’ का एक लौकिक किन्तु अलौकिक संसार बन कर श्रद्धालुओं के प्राणों में समा जाता है।

मन करता है, यहीं मर जाएँ। मन करता है, यहीं जीवित रहें। जी करता है, श्याम के बिना जीवन अकारथ है। जी करता है, यहाँ आ कर जनम सफल हो गया। अकारथ और सकारथ का अद्भुत संगम है वृन्दावन। प्रेमाकुलता का यह आलम है कि यदि मर्यादा आड़े नहीं आए और सेवारत मुख्य पुजारीजी पल-दो पल को गर्भ का चबूतरा छोड़ दें तो माखनचोर पर मरनेवाले मन्दिर के भीतरवाली मूर्तियों का दर्शन भूल-भाल कर उस मूर्ति को झपट्टा मार कर उठा लें और उसे अपने कलेजे से लगाए-लिपटाए ‘कान्हा...कान्हा...’ करते वृन्दावन से निकल भागें। मन बावरा हो जाता है। प्राण छटपटाने लगते हैं। साँस, निसाँस में बदल जाती है। पूजाएँ अपने-आप प्रार्थना में परिवर्तित हो जाती हैं। समर्पण, सेवा का आचार्य बन बैठता है। निराकार के उपासक वृन्दावन में सदेह, साकार सशरीर कृष्ण का स्पर्श करने को उतावले हो जाते हैं। पता नहीं उस मिट्टी में इतना सम्मोहन प्रकृति ने कैसे और क्यों, कहाँ से डाल दिया है? जब-जब  ब्रज मे विचरण किया, मुझे लगा कि यहाँ कृष्ण अवश्य हुआ होगा। हुआ क्या होगा, वह अभी भी यहीं-कहीं घूमता-फिरता आता होगा और मैं उसे देख पाऊँगा। उससे मिल सकूँगा। वह बोलेगा, बात करेगा, बतियाएगा। हाल-हवाल पूछेगा। समाचार देगा-लेगा। कभी नहीं लगा कि वह  हजारों साल पहले हुआ था। लगता है, यहीं-कहीं, लुकाछिपी खेल रहा होगा। रूठ-मनौवल चल रही होगी। महारास का थका-हारा, किसी कदम्ब के नीचे अपनी बाँह का सिरहाना लगा कर थोड़ी-सी थकान उतार रहा होगा-थोड़ा ठहर लें, आता ही होगा। शायद ग्वालों ने घेर रखा होगा। हो सकता है, गोपियों ने रार मचा रखी हो, बाँसुरी को लेकर बहस चल रही होगी। उधर से छूटे तब तो इधर आए ना! ऐसे ही विचार मन को मथते रहते हैं। वृन्दावन में जाकर प्रतीत होता है कि यह कृष्ण-प्रेम का नाभि-क्षेत्र है इसी पर उसने कस कर पीताम्बर बाँध रखा है। कनुप्रेम का पगा प्राणी उसी कसावट के बन्धन को वहाँ महसूस करता है। हारी हुई साँसों का हीरामन हल्ला मचा-मचाकर कहता है-‘और कसो मेरे कनु! इस कसावट को और कसो।’ चेतन, अचेतन हो जाता है। अथ-श्लथ हो जाता है। कनु के कटिबन्ध का एक ही बन्धन, पीताम्बर की एक ही गाँठ जनम-जनम के बन्धन ढीले कर देती है। अगर यह एक गाँठ लग गई तो फिर सारी गाँठें अपने-आप खुल जाती हैं। ब्रह्म-गाँठ तक अपने आप खुल कर राधा की लट की तरह श्याम की उंगलियों में उलझ-उलझ कर फिसलने लगती है, एक अपूर्व सुख, जो आदमी को अवाक् कर दे...ऐसा ही लगा उस रात वृन्दावन में, कम-से-कम मुझे।

दूसरे दिन हल लोगों ने जन-सागर का उतार देखा। मंगला के दर्शन करके लोग जो बिखरने-बहने शुरू हुए तो तो दूसरी शाम आते-आते सारी गलियाँ सहज हो गईं। जन-जमना इठला जरूर रही थी पर उसकी उत्तालता कूलों में सिमट आई। कगारों और छारों का अटाव ठहर गया। घूमना-फिरना आसान हो गया। वातवरण में श्रद्धा और सेवा की सुवास अब भी भरपूर थी। इस शाम मैंने पूज्य आचार्य प्रवर श्री गोपालजी स्वामी को सूचना दी कि मैं सपत्नीक वृन्दावन में हूँ और राधाष्टमी की तल्लीनता में अभी तक तन्मय हूँ। कल मंगला के दर्शन करके हम लोग मथुरा स्टेशन से अपने गन्तव्य के लिए गाड़ी पकड़ना चाहते हैं। एक तो वे स्वयं दर्शन दे दें और दूसरा, मथुरा स्टेशन तक पहुँचाने का दायित्व ले लें। उनकी मुझ पर शुरू से कृपा रही है। वे हरिहितवंशजी के रक्त और वंश से सीधे जुड़े हुए एक शालीन साधु पुरुष हैं। सस्मित तो हैं ही, वृन्दावन में उनका जो सम्मान है, वह प्रीतिकर है। प्रसन्नता होती है। लौटकर उनका समाचार मिला कि वे शाम को प्रसाद भेज रहे हैं और समय निकाल कर स्वयं भी पधार रहे हैं। आसपास के लोगों को आश्चर्य हुआ जब उन्हें यह देखने को मिला कि मुझ जैसे अकिंचन को दर्शन देने वे स्वयं वृन्दावन के अतिथिगृहों में छानबीन करते घूम रहे हैं। यह भेंट मेरे लिए गौरवमयी थी।

वृन्दान में हम लोग यह तीसरा दिन शुरू करनेवाले थे। स्नानादि से पिवृत्त होकर मंगला के दर्शन किए और अपनी लकुटी-कमरिया सँभाली। सुशील ‘पिया’ ने सामान की पुटलिया बाँधी। अतिथिगृह के एक अनुचर ने सन्देश दिया कि नीचे कार आ गई है, ड्रायवर प्रतीक्षा कर रहा है। गए दो दिनों में एक परिवार और भी हमारा सहयात्री बन चुका था। उसे भी मथुरा आना था। पौ फटने को थी। आचार्य प्रवर श्री गोपालजी गोस्वामी से सुशील का एक आग्रह यह भी था कि वे ड्रायवर को यह संकेत दे दें कि हम लोग मथुरा में पहले जमुनाजी का दर्शन करेंगे। उसके बाद भगवान द्वारकाधीशजी का जो भी दर्शन उस समय होनेवाला होगा, वह करेंगे और फिर स्टेशन जाएँगे। हो सकता है कि दर्शन बेला में घड़ी-अधघड़ी का समय ज्यादा निकालना पड़े तो वह हमें इतनी सुविधा जरूर दे दें। रेल पकड़ने की हमें कोई जल्दी नहीं है। मित्र परिवार को आगरा जाना था और हमें रतलाम की दिशा में। हमारे पास पर्याप्त रेलें थी। हमें इस बात से बड़ा सन्तोष मिला कि आचार्य प्रवर ने ड्रायवर को सबकुछ भलीभाँति समझा दिया था। वह सन्नद्ध था।

ड्रायवर मुझे पहली नजर में ड्रायवर नहीं लगा। नहाया-धोया, साफ-सुथरा, सफेद रेशमी कुरते में एक मझोले कद का गोरा शरीर, सुँती हुई नाक, कन्धों पर घने, काले, लहराते केश, सलीके से खाया हुआ पान, आँखों में सुरमा, चौड़े प्रशस्त ललाट पर रक्त चन्दन और आसपास कुंकुम की रक्ताभा। सफेद और झक्क मलमली धोती। कन्धे पर किनारीदार स्कन्ध-वस्त्र, कण्ठी और कलाई पर बढ़िया मॉडल की घड़ी। जितना सुघर और राधाबरन ड्रायवर, उतनी ही काली-कलूटी, चरमराती, भडभड़ाहट करती एम्बेसेडर कार। फाटक पकड़ कर बैठना जरूरी। मालवा की मिट्टी के ब्रज में ही रह जाने की पूरी सम्भावना। अगली सीट पर ड्रायवर के पास मित्रवर और उनके पास फाटक पकड़ कर बैठा मैं। पिछली सीट पर सुशील और उसके साथ मित्र का परिवार-उनकी बेटियाँ, एक बेटा तथा पत्नी। ठसाठस।

वृन्दावन को बिदा कर हमने ‘राधे-राधे’ कहा और मैंने ड्रायवर से पूछा, ‘आपका नाम?’ वह गियर बदलने में लग गया। कोई ध्यान उसने मेरे सवाल पर नहीं दिया। मेरा दूसरा सवाल था, ‘कार आपकी है या कि किसी दूसरे मालिक की?’ उसने सुरमई आँखों से मुझे गहरे तक घूरा और बोला, ‘मैं ड्रायवर हूँ। बस।’

सुशील ने पीछे से मेरे कन्धे पर दबाव देकर मुझे चौकन्ना करने की कोशिश की। शायद कहती थी, ‘मत छेड़ो।’ आसमान पूरा खुल चुका था। सूरज बिलकुल अपनी ड्योढ़ी से बाहर आ चुका था। उसका जलाल जलने लगा था। दस-पाँच किरणें ही ड्रायवर की कनपटी पर पड़ी थीं कि वह पसीना-पसीना हो गया। मुझे लगा, शायद तीखे मसालेवाला पान खा रहा होगा। हममें से किसी को पसीना नहीं हो रहा था पर हमारा बृजवासी ड्रायवर पसीने के रेलों को पोंछने लगा।

मथुरा में उसने द्वारकाधीशजी के मन्दिर से जरा-सी दूर कार पार्क कर दी। हम लोग उतर कर अपनी-अपनी खिड़की के शीशे चढ़ाने लगे। उसने हमें रोका और कहा, ‘यह काम मैं कर लूँगा। आप अपनी सुविधा से अपना काम कीजिए।’ वह शीशे चढ़ाने लगा। मैंने उससे कहा, ‘हम लोग दर्शन करने जा रहे हैं। समय निकाल कर आप भी दर्शन कर लेना। फिर यहीं मिलना।’ उसने शीशे की चरखी को रोका और मुझे सिर से पैर तक देखा। कुछ नहीं बोला। उधर का शीशा चढ़ाकर वह पिछले शीशे चढ़ाने के लिए पिछले फाटक की तरफ गया। मैंने फिर उससे कहा,  ‘देखना भैया! आप दर्शन में ज्यादा समय मत लगाना। हाँ, दर्शन जरूर कर लेना। हम लोग आते हैं।’ उसने फिर बिना बोले मेरी ओर देखा और अपने काम में लग गया। सुशील ने मेरी बाँह पकड़ी। चलने का संकेत। मुख्य मार्ग पर दर्शनार्थियों का रेला चला जा रहा था। शायद जल्दी ही पट खुलनेवाले थे। सोचा, चलो जमुनाजी के दर्शन बाद में कर लेंगे। चलने से पहले मैंने फिर ड्रायवर से कहा, ‘गुरु! चूकना मत। दर्शन अवश्य कर लेना।’

भगवान श्री द्वारकाधीशजी के दर्शन कर हम लोगों ने जमुनाजी का दर्शन किया। चालीस-पचास मिनट लगे होंगे।

ड्रायवर ने गाड़ी स्टार्ट की और हम मथुरा रेल्वे स्टेशन के लिए चल पड़े।

बाजार पार करके हम मुख्य द्वार से निकले और गाड़ी ने बस स्टैण्ड के पासवाली गली में मोड़ लेकर स्टेशन का रास्ता लिया। मैंने ड्रायवर से पूछा, ‘भैया! दर्शन तो आराम से हो गए ना?’ उसने फिर गियर बदल कर, पान का पीक थूकने के लिए अपनी खिडकी से मुँह बाहर निकाला और गाड़ी आगे बढ़ा दी। रास्ते में एक रेल्वे क्रासिंग पड़ती है। फाटक पार करने पर मैंने पुनः ड्रायवर से पूछने की कोशिश की, ‘भैया! आपने न तो अपना नाम बताया और न ही यह बताया कि मथुरा में आपने दर्शन कर लिए या नहीं? क्या मैं पूछ सकता हूँ कि....’

बस। जैसे कोई पटाखा फूट पड़ा। उसने ब्रेक लगाया। गाड़ी रोकी। एक पाँव गाड़ी के भीतर और दूसरा जमीन पर टिका कर, दाँत भींचते हुए मुझसे पूछा, ‘क्या आप ही बालकवि बैरागी हैं,’

‘हाँ।’

‘क्या आप एम. पी. हैं,’

‘हाँ।’

‘क्या आप गोपालजी महाराज के मेहमान हैं?‘

‘हाँ।’

‘अब आप यह भौंकना, यह बकबक बन्द करेंगे या नहीं? दर्शन...दर्शन...दर्शन....आपने सबेरे से यह सब क्या हल्ला मचा रखा है?’

मेरे और सहयात्रियों के होश उड़ गए। मैं खुद समझ नहीं पाया कि यह इतना लाल-पीला क्यों हो रहा है।

मैंने अपनी देहाती मासूमियत से फिर पूछा, ‘देवता! मैंने और तो कुछ आपसे कहा नहीं! पहले भी यही कहा था और अब भी मेरी यही जिज्ञासा है कि आपने मथुरा में भगवान द्वारिकाधीश के दर्शन....’

और मुझे आभास हुआ कि अब वह मेरी जान ले लेगा। कार खड़ी थी और हम सब तनाव में थे। सुशील का सारा सात्विक आग्रह एक लावे में पिघलता लग रहा था। क्या करने चले थे और क्या हो रहा था! 

हमने हाथ जोड़ कर ड्रायवर को बैठाया। कहा, ‘अच्छा दादा! अब चलो स्टेशन। जब आपका मन माने तब अपने गुस्से का कारण बता देना। नहीं तो हम लोग आपके बृज का यह वजन अपने कलेजे पर बाँध कर लिए चले जाएँगे।’

स्टेशन बहुत दूर नहीं रह गया था। दो-एक मिनट भर ही दूर था। मैंने देखा कि वह गाड़ी चलाते-चलाते अपने दुपट्टे से आँसू पोंछता जा रहा है। करीब-करीब रुँआसा हो गया। मैंने उसकी पीठ सहलाई, ‘भाई! हमारे कारण आप क्यों अपने मन पर बोझ बाँधते हो? गाली देना हो तो गाली दे दो। मारपीट करना हो तो तमाचा जड़ दो पर अपना मन हलका कर दो वरना हमारी तो यात्रा ही....’

उसने गाड़ी की रफ्तार कुछ कम की। बोला, ‘साहब! गोकुल-वृन्दावन में मुझ जैसे लोग भी आपको कभी मिल जाएँगे। मेहरबानी करके हम लोगों से कभी मत कहिएगा कि मथुरा में दर्शन कर लो।’

मैं चकित! मेरे रोम-रोम में सन्नाटा छा गया। 

वह करीब-करीब रुँधे कण्ठ से बोल रहा था, ‘साहब! जब तक यह कन्हैया बच्चा था, हम गोकुल-वृन्दावनवालों ने इसे सँभाला। सगे माँ-बाप ने इसे छोड़ दिया तो हमारी जसोदा मैया ने उसे कलेजे से लगाया। अपनी छाती का दूध पिलाया। हमारे आँगन में इसने जो भी किया, हमने उसे अपनी तपस्या की तरह माना। हमारी गगरिया फोड़ता रहा, माखन चुराता रहा, हमें नचाता रहा। हम इसके इशारों पर नाचते रहे। इसका हर नखरा हमने सहा। जरा-सा बड़ा हुआ और मथुरा आया, मामा के यहाँ। सगे माता-पिता के पास। भूल गया हमारी गलियों को, भूल गया नन्द बाबा को। भूल गया जसोदा मैया को। भूल गया ग्वाल-बालों को। मनसुखा इसे याद नहीं रहा। राधा, हमारी गायें, हमारे कुंज-करील, हमारी लता-पत्तियाँ, हमारी लहरें, हमारी निश्छल श्रद्धा सबको यह चोर यहाँ आकर भूल गया। इसको राज की एक कुर्सी क्या नजर आ गई, यह सिंहासन क्या दिखाई पड़ा, यह यहीं अटक गया! हम गोकुल-वृन्दावनवाले इस सिंहासनारूढ़ राजा का कोई दर्शन-वर्शन नहीं करते। जो राजा हो गया, उससे हमें क्या लेना-देना? हमारा कृष्ण तो जमुना के उस पार वहीं कहीं....’

हम सभी की मनःस्थिति का अनुमान आप स्वयं लगा पा रहे होंगे। उसके पास तो आँसू पोंछने को स्कन्ध-वस्त्र भी था। हम तो बस! बहे जा रहे थे। न कुछ बोल पा रहे थे, न कुछ समझ पा रहे थे।

स्टेशन के मैदान में उसने कार रोकी। कुलियों ने हमारी कार को सामान के लालच में घेर लिया। वह कार से उतरा। मैं भी उतरा। मैंने अपने भीतर के संसद सदस्य को धक्का देकर ‘स्व’ से बाहर निकाला और सीधा उस ड्रायवर के चरणों में अपना माथा रख दिया-इस श्रद्धा की जय हो! राधे मैया की जय हो!! जय गोकुल-वृन्दावन!!! मन का सारा कल्मष धुल चुका था। सुशील आँसू पोंछ रही थी। कुली सामान निकाल रहे थे, गाड़ी की पूछ रहे थे। मैं ड्रायवर को सिर से पैर तक निरख रहा था। कभी नहीं भूल पाऊँगा मैं श्रद्धा के उस सुधा-सावन को।

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