मुमकिन है, आज की पीढ़ी पं. सूर्यनारायणजी व्यास को और उनके बारे में कुछ नहीं जानती हो। उनके बारे में जितना भी कहा जाए, बहुत-बहुत कम होता है। वे भारतीय ज्योतिष शास्त्र के श्रेष्ठ साधक, श्रेष्ठ ज्ञाता थे। भारतीय ज्योतिष शास्त्र की वैज्ञानिकता को उन्हीं ने प्रामाणिकता प्रदान की। भारत की आजादी का मुहूर्त उन्हीं ने तय किया था और उन्हीं का कहा मान कर, आधी रात को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया गया था। वे सौ से अधिक रियासतों के राज-ज्योतिषी थे। उनके ‘सपूत’ श्री राज शेखर व्यास ने, ‘नवनीत’ के अक्टूबर 1977 अंक में प्रकाशित यह लेख अत्यन्त कृपापूर्वक उपलब्ध कराया है। हाँ, यह संस्मरण पढ़ते-पढ़ते याद करने की कोशिश जरूर कीजिएगा कि ‘उस जमाने में’ एक हजार रुपये कितनी कीमत रखते थे।
बालकवि बैरागी
विक्रमादित्य और उसके नवरत्नों की नगरी उज्जैन में आज भी तीन रत्न हैं - पं सूर्यनारायण व्यास, डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, डॉ. भगवतशरण उपाध्याय। तीन विशिष्ट व्यक्तित्व - तीनों की अपनी ओप, अपनी शान। प्रस्तुत प्रसंग का इन्हीं में से प्रथम से है।
फरवरी या मार्च 1971 में जब मैं लोकसभा के चुनावों में उम्मीदवार के नाते व्यस्त था, व्यास जी एकाएक भीषण रूप से बीमार पड़े। उनकी स्मृति जाती रही और बोलना तक बन्द हो गया। लकवा भी हुआ और ऐसा लगा कि पंछी उड़ जाएगा।
मार्च की 10 तारीख को मेरा चुनाव परिणाम निकला। मैं हार गया था। 11 मार्च को मैंने अपने पद और विधान-सभा की सदस्यता दोनों से अपना त्याग-पत्र मुख्यमन्त्री पं. श्यामाचरण शुक्ल को दे दिया। उन्होंने दोनों त्यागपत्रों को निरर्थक कहकर एक तरफ पटक दिया और मैं मन्त्री बना रहा।
मार्च में विधान-सभा का सत्र शुरू हुआ और अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक चला। इस बीच उज्जैन से भाई हरीश निगम किसी काम से भोपाल आये और उन्होंने व्यासजी की बीमारी और उसकी भीषणता का जिक्र मुझसे किया। उन्होंने बताया कि 20-25 दिन से व्यास जी जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, डॉक्टर पूरी तत्परता से उनका इलाज कर रहे हैं, पर कुछ किया अवश्य जाना चाहिए।
व्यास जी के अस्वास्थ्य के समाचार की कटिंग प्रतिदिन की समाचार-कतरनों के साथ भोपाल में मेरे कार्यालय में आई थी और अनदेखी ही वापस चली गई थी । मुझे अपनी चुनावी-व्यस्तता और अपने सूचना-मन्त्रित्व, दोनों पर गहरी ग्लानि हुई। लगा कि किसी ने हजार हथौड़े सिर पर मार दिए हैं।
मैंने तत्काल मुख्यमन्त्रीजी के नाम पर नोट तैयार किया और उसमें सारी स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा कि व्यासजी के लिए मध्य प्रदेश सरकार को जितना हो सके, उतना करना चाहिए, और सरकार जो भी करेगी, वह कम ही होगा।
शुक्ल जी उसी दिन दिल्ली जाने वाले थे, शायद कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने। चालू विधान-सभा में उन्होंने वह नोट पढ़ा और एक क्षण वे भी हक्के-बक्के रह गए। उन्हें व्यासजी की बीमारी का पता नहीं था। अपनी और सदन की गरिमा के अनुरूप जिस प्रकार मुझे डाँटा जा सकता था, उन्होंने डाँटऔर मेरी ही कलम से तत्काल आदेश लिखा - ‘व्यासजी का सारा उपचार आज से ही सरकार करायेगी और उपचार के दौरान विशेष व्यवस्था के लिए व्यासजी के परिवार को तत्काल पहली किस्त के रूप में एक हजार रुपये दे दिए जाएँ।’
मामला राज्य के विद्वान् मुख्य सचिव श्री रमाप्रसन्न नायक को मार्क करके वह फाइल वापस मुझे ही देकर मुख्यमन्त्री हवाई जहाज से दिल्ली रवाना हो गए।
मेरे सामने मुख्य समस्या यह थी कि इस समाचार को व्यासजी से कैसे छिपाया जाए?
मैं जानता था कि स्वाभिमानी व्यास जी को यदि पता चल जाए कि सरकार ने उन्हें सहारा दिया है, तो वे बहुत दुःखी होंगे। कभी किसी राज्य या शासन के सामने उन्होंने हाथ नहीं पसारा है। मैंने भाई हरीश निगम से कहा कि वे इस बात को गुप्त रखें। फिर मैंने उज्जैन के कलेक्टर श्री समरसिंह और विक्रम विश्व विद्यालय के कुलपति सुमनजी को फोन पर यह बात बताई और आग्रह किया कि वे इस समाचार को व्यास जी से गुप्त रखते हुए सारी व्यवस्था करा दें।
विशेष डर सुमनजी से था। वे प्रसन्नता की बात को बच्चों की तरह उमंग से बखानते फिरते हैं। डर था कि वे कहीं कह ही न बैठें कि देखो हमारे बैरागी ने एक बढ़िया काम किया।
इलाज पूरी तत्परता से चला। यहाँ-वहाँ के जितने भी विशेषज्ञ डॉक्टर जुट सकते थे, जुटे। व्यासजी बच गए। उनकी स्मृति लौट आई और वे बोलने भी लग गए। लकवे के कारण उनका चलना-फिरना जरूर अभी तक कठिन है।
यह सब तो ठीक चला। लेकिन समस्या तब खड़ी हुई, जब कलेक्टर श्री समरसिंह ने व्यास जी के परिवार को एक हजार रुपये देने का उपक्रम किया। व्यासजी जी से पूछे बिना पैसा लिया नहीं जा सकता था। एक संस्कारवान परिवार की संस्कारिता का प्रश्न था। बड़ी हिम्मत करके ठीक समय और मूड देखकर श्री समरसिंह ने प्रस्ताव व्यासजी के सामने ही रखा।
व्यास जी व्याकुल हो गए और जब उन्हें सारी बात बताई गई, वे बहुत देर तक रोते रहे। उन्होंने कलेक्टर को और सरकार को धन्यवाद देते हुए वह राशि सादर अस्वीकार कर दी। इलाज चूँकि शुरू हो चुका था और उसका इन्तजाम लम्बे समय के लिए कर दिया गया था, अतः व्यास जी विवश थे। परन्तु नकद राशि लेने से उन्होंने दृढ़ता से इन्कार कर दिया।
सारी बात मुझे कई दिनों बाद भाई हरीश निगम ने ही बताई। मैं मारे खुशी के उछल पड़ा। ऐसा नहीं कि यदि व्यासजी यह राशि ले लेते, तो मुझे दुःख होता। तब मैं सन्तुष्ट और सुखी होता, परन्तु प्रसन्नता के मारे उछलता नहीं। व्यासजी ने अपने स्वाभिमान के अनुरूप ही काम किया था। वैसे मैं यह भी जानता हूँ कि ‘भारती भवन’ में कई बार चाय के लिए शक्कर लाने को पैसे नहीं रहे हैं और अखबारों की रद्दी बिकवाकर व्यासजी ने मेहमानों की चाय में शक्कर डाली है। आज भी पता नहीं, वे अपने संघर्षों से कैसे पार पाते हैं।
जब मैंने मुख्यमन्त्रीजी को बताया कि व्यास जी ने एक हजार रुपया अस्वीकार कर दिया है और सरकार को धन्यवाद दिया है, तो उन्होंने ऐसी बात कही कि सुनकर तबीयत खुश हो गई। बोले - ‘मुझे गर्व है कि मैं उस प्रदेश का मुख्यमन्त्री हूँ, जिसमें पं. सूर्यनारायण व्यास जैसे नागरिक रहते हैं। आगे उन्होंने कहा - ‘यदि सरकार, कलाकार की कोई सेवा या सहायता करती है, तो वह अपने दायित्व का पालन करती है, न कि उस पर उपकार करती है। व्यास जी ने हमारी जितनी सेवा स्वीकार की है, वही हमारे लिए उनका आशीर्वाद है। एक हजार या दस-पाँच हजार रुपया सरकार और व्यासजी के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। यह पैसा लौटाकर उन्होंने राज्य पर अविश्वास या अनादर व्यक्त नहीं किया हैं, वरन् यह संकेत दिया है कि यह शासन उनका अपना शासन है, और जब कोई चीज अपनी है, तो उसका उपयोग कभी भी किया जा सकता है।’
और अन्त में बोले - ‘जाओ, उनके इलाज की जानकारी लेते रहो, और जब भी वे मिलें, मेरा भी उन्हें प्रणाम कहना।’
समझ नहीं पाता हूँ कि सूरज का राजदूत किसे कहूँ? रोशनी से दोनों का रिश्ता है।
-----

No comments:
Post a Comment
आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.