अपनी-अपनी रेपुटेशन है


दादा श्री बालकवि बैरागी के लेखन का यह रंग भी है।

साप्ताहिक धर्मयुग के, 4 मई 1980 के अंक के पृष्ठ 41 पर प्रकाशित यह कतरन, वर्तमान में आदीपुर (कच्छ-गुजरात) में रह रहे प्रिय विवेक मेहता ने यह  कतरन भेजी है।

पढ़िए और दादा को याद करते हुए आनन्द लीजिए।

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रंग और व्यंग्य : बालकवि बैरागी के संग







Û  थ्री व्हीलर ऑटो रिक्शावाले ने अपनी ऑटो रिक्शा के सारे पर्दे, तीनों व्हील, गार्ड और सामनेवाला शीशा वगैरह निकाल कर ठीक पीछे लिख दिया - ‘जीनत अमान, सत्यं शिवमं सुन्दरम् में।’


Û  ‘विवाह के बाद वहीं एक कवि सम्मेलन भी है कृपया अवश्य पधारें।’ एक कवि ने अपने विवाह का आमन्त्रण देते हुए कई मित्रों को लिखा।

    सुरेन्द्र शर्मा ने उत्तर भेजा, ‘विवाह की बधाई, परन्तु मैं उस कवि सम्मेलन में नहीं आ पाऊँगा। उसका कारण यह है कि मैं शोक-गीत नहीं लिखता हूँ।’


Û  ‘पप्पू! तुममें सोने की तमीज भी नहीं है। रात को जब सोते हो, तो पूरब-पश्चिम सोते हो। पर जब सुबह उठते हो तो उत्तर-दक्षिण मिलते हो। कितनी बुरी बात है?’ माँ ने बेटे को डाँटा।

    ‘मैं तो मम्मी! जहाँ-का-तहाँ सोता हूँ। कल ही मास्टरजी ने हमको समझाया है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर निरन्तर घूमती रहती है।’ 

    पप्पू ने माँ को चुप कर दिया।


Û  हरियाणा के एक कवि सम्मेलन में पहुँचते ही सुरेन्द्र शर्मा ने संयोजक से धोबी के लिये चिल्ल-पों मचायी। संयोजक ने धोबी को बुलवाया। सुरेन्द्र शर्मा ने अपने पेटीनुमा सूटकेस में से कोई अठारह-बीस कपड़े निकाले और धोबी को शाम तक बढ़िया धो कर लाने का निर्देश दिया।

    संयोजन समिति के एक सदस्य ने एक-के-बाद-एक कपड़ों को गिनते हुए सुरेन्द्र शर्मा से पूछा, ‘भाभीजी के कपड़े नहीं लाये क्या? लगे हाथ वे भी धुलवा लेते।’


Û  प्रहलाद एण्ड पार्टी के मालिक-संचालक प्रहलाद ने सुरेन्द्र शर्मा की दवाइयों की फैक्ट्री के काउण्टर पर, प्रतिदिन होनेवाली चोरियों को एक झटके में रुकवा दिया।

    कहीं से ढूँढकर एक भैंगा सेल्समेन प्रहलाद भाई नेकाउण्टर पर बैठा दिया। चोरियाँ तत्काल बन्द हो गईं। जो भी काउण्टर पर आता है, समझता है कि यह सेल्समेन उसी की तरफ देख रहा है।


Û  कविवर शैल चतुर्वेदी ने पाँच-छह बार टैक्सी का किराया, सुरेन्द्र शर्मा से यह कह कर दिलवा दिया उनके पास केवल सौ रुपये का एक नोट ही है। अन्ततः सुरेन्द्र शर्मा खीज गए। उस बार भी जब वे टैक्सी से उतरे, शैलजी फौरन बोले, ‘मेरे पास सौ का नोट है।’

    जब सुरेन्द्र चालीस-पचास खर्च कर चुके तो उनके सब्र का बाँध टूट गया। ज्यों ही शैल भाई ने पूछा, ‘सुरेन्द्र! अगला प्रोग्राम क्या है?’

    सुरेन्द्र ने तपाक से उत्तर दिया, ‘अब सबसे पहला प्रोग्राम है, आपके सौ के नोट को तुड़वाना।’


Û  आखिर कविवर सुरेन्द्र शर्मा ने एक सेकण्ड हेण्ड मरक्यूरी डॉज कार खरीद ही ली। अपने मित्र जगमोहन जिन्दल को कार की खूबियाँ गिनाते हुए सुरेन्द्र ने कहा, ‘यही कोइ आठ-दस हजार रुपया खर्च जरूर आएगा, पर गाड़ी ए-वन हो जायेगी।’

    गाड़ी की खस्ता हालत पर भरपूर नजर डालते हुए जगमोहन बोले, ‘अरथी पर भले ही लाख रुपये खर्च कर लो, आखिर में तो उसे फूँकना ही पड़ेगा।’


Û  अपनी-अपनी रेपुटेशन है। मंचों पर काव्य-पाठ कर के हजारों श्रोताओं को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देनेवाले सुरेन्द्र शर्मा अपने घर में यदि हल्का-सा मुस्कुरा भी देते हैं तो उनकी पत्नी पूछ बैठती है, ‘क्या बात है? क्या तबीयत खराब है?’

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