इलाज की नई, ‘विकट पद्धति’


‘विकटजी’ कुपित हैं। नहीं। कुपित कम और क्षुब्ध अधिक। झुँझलाहट से उबले जा रहे हैं। उनके साथ ‘यह सब’ करनेवाले दोनों लोगों का ‘किंचित मात्र भी’ नहीं बिगाड़ पाने की झुंझलाहट से। क्रुद्ध, बिगड़ैल साँड की तरह फूँ-फूँ करते हुए कभी मोहल्ले की चाय की गुमटी पर बैठ रहे हैं तो कभी नाई की दुकान पर। उनकी यह मुद्रा देख कर किसी हिम्मत नहीं हो रही कि उनसे इस दशा का कारण पूछे।


‘विकटजी’ की विवशता यह है कि ये ‘दोनों लोग’ कोई सड़कछाप, सामान्य लोग नहीं हैं। ये दोनों, कस्बे के ऐसे नामी-गिरामी, अग्रणी और वरिष्ठ डॉक्टर हैं जिनका नाम लेने से पहले नई उमर के डॉक्टरों को अपने कान पकड़ने पड़ते हैं। एक डॉक्टर हैं विजयन्त हालदार और दूसरे शैलेन्द्र फाटक। डॉक्टर फाटक वरिष्ठ हैं और डॉक्टर हालदार कनिष्ठ। कहने को तो विकटजी की सामजिक हैसियत भी कोई कम नहीं है। वे कस्बे के लिखने-पढ़नेवाले प्रथम पाँच वरिष्ठों में आते हैं। उनकी कविताएँ प्रायः ही स्थापित पत्रिकाओं और अखबारों में छपती रहती हैं। विकटजी का दावा है कि जब भी समकालीन हिन्दी कविता का इतिहास लिखा जाएगा तो उनका उल्लेख अनिवार्य, अपरिहार्य होगा। इसके बाद भी मेरे कस्बे का ‘वैश्विक सत्य’ यह है कि विकटजी की प्रतिष्ठा पर दोनों डॉक्टरों की प्रतिष्ठा ‘एक लुहार की’ की तरह भारी पड़ती है। विकटजी यहीं मात खा गए। उनकी झुँझलाहट का कारण भी यही है।


विकटजी उसी कॉलोनी में रहते हैं जिसमें डॉक्टर हालदार का नर्सिंग होम है। कहने को तो डॉक्टर हालदार भी अभिरुचि सम्पन्न हैं किन्तु वे अपनी अभिरुचि को अपने व्यवसाय पर हावी नहीं होने देते। अपने मरीजों को वे सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। ईश्वर ने उनके हाथ में ‘यश रेखा’ बहुत गाढ़ी और बहुत लम्बी बनाई है। इसीलिए डॉक्टर हालदार अतिरिक्त सतर्क और सचेष्ट भी रहते हैं। सेवा निवृत्त विकटजी की कठिनाई यह है कि उनके पास कोई बैठने को तैयार नहीं। जो भी उनसे मिलने को अभिशप्त होता है वह लौट कर काम-काज करने काबिल नहीं रहता। सो, हर कोई अपने आप को विकटजी से बचाए रखने के लिए अतिरिक्त सतर्क रहता है। किन्तु विकटजी का यही एक मात्र कष्ट नहीं। बुढ़ापा अपने आप में बीमारी होता है। तिस पर यदि एकान्त भोगना विवशता हो तो बीसियों बीमारियाँ अकारण ही मन-मस्तिष्क में घर बनाने लगती हैं। विकटजी के साथ भी ऐसा ही है। सो, वे प्रायः ही डॉक्टर हालदार के चेम्बर में घुस जाते हैं - बिना किसी पूर्व सूचना और अपाइण्टमेण्ट के। अपनी संस्कारशीलता के चलते डॉक्टर हालदार उनकी अगवानी करते हैं, हाथवाले मरीज को छोड़कर पहले विकटजी को देखते हैं, उनकी सुनते हैं और विकटजी के मन को समझाने के लिए छोटी-मोटी, कामचलाऊ दवा लिख देते हैं। हाँ, इतना ध्यान वे जरूर रखते हैं कि दवा सस्ती हो। होना तो यह चाहिए कि इसके बाद विकटजी नमस्कार कर डॉक्टर हालदार को मुक्त कर दें। किन्तु ऐसा होता नहीं। वे बैठ जाते हैं और अपनी सद्य लिखित या सद्य प्रकाशित रचना की चर्चा करने लगते हैं और रोना रोने लगते हैं कि कस्बे में कोई उनकी रचना की चर्चा ही नहीं करता, उनकी पूछ-परख नहीं करता। डॉक्टर हालदार निरुपाय, असहाय हो जाते हैं ऐसे क्षणों में। वे अपनी व्यस्तता जताने के शालीन प्रयास करते जरूर हैं किन्तु विकटजी को कुछ नजर नहीं आता। डॉक्टर हालदार के लिए यह ऐसी बीमारी बन गई जिसका इलाज उनके चिकित्सा शास्त्र की किसी भी किताब में नहीं मिलता।


डॉक्टरों के एक जलसे में ‘दुःखी आत्मा’ डॉक्टर हालदार ने, रुँआसी मुद्रा में डॉक्टर फाटक को अपनी यह व्यथा-कथा सुनाई। डॉक्टर फाटक हँस दिए। डॉक्टर हालदार की पीठ सहलाते हुए बोले - ‘घबरा मत। फिकर मत कर। आज से तू अपने आप को मुक्त समझ। तू उसे एक बार मेरी ओर भेज दे। सब कुछ परमानेण्टली निपटा दूँगा।’ डॉक्टर हालदार को लगा, डॉक्टर फाटक नहीं, कोई देवदूत उन्हें ‘अभय दान’ दे रहा है।
और, विकटजी से बचने की जुगत भिड़ानेवाले वाले डॉक्टर हालदार अब बेसब्री से विकटजी के आने की प्रतीक्षा करने लगे। उन्हें अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। कोई तीसरे ही दिन विकटजी डॉक्टर हालदार के चेम्बर में प्रकट हो गए। डॉक्टर हालदार ने इस बार अतिरिक्त गर्मजोशी से उनकी अगवानी की और ‘एक मिनिट’ कह कर टेलीफोन उठा लिया। कोई नम्बर डायल किया और थोड़ी देर बाद बोले -‘हैलो! फाटक साहब से अर्जेण्ट बात कराइए।’ उधर से उत्तर सुन कर डॉक्टर हालदार तनिक निराश होकर बोले - ‘अरे! यह तो बड़ी परेशानीवाली बात हो गई। एक सीरीयस पेशेण्ट के बारे में मुझे तो एक्सपर्ट ओपीनियन चाहिए। मेरी तो इज्जत दाँव पर लगी है। फाटक साहब से बात नहीं होगी तो आज तो मेरा भट्टा बैठ जाएगा। उनका मोबाइल नम्बर दीजिए।’ मानो उधर से किसी ने इंकार किया हो, ऐसे व्यवहार करते हुए डॉक्टर हालदार बोले -‘हाँ मुझे पता है कि वे मोबाइल नहीं रखते किन्तु मैंने सोचा कि क्या पता रखना शुरु कर दिया हो। आप एक काम करना, जैसे ही फाटक साहब आएँ, फौरन उनसे मेरी बात करना। एक मरीज की जिन्दगी का और मेरी इज्जत का सवाल है।’ कह कर, फोन रखकर डॉक्टर हालदार, विकटजी से मुखातिब हुए - ‘जी, फरमाएँ।’


तब तक विकटजी बैठे नहीं थे। खड़े ही थे। वे असहज हो गए। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस डॉक्टर की चिकित्सा पर वे ईश्वर की देन की तरह आँख मूँदकर भरोसा करते हैं, वही डॉक्टर हालदार अपने मरीजों के इलाज के लिए किसी और डॉक्टर से परामर्श लेता है। वे अपनी बीमारी भूल गए और प्रश्न किया - ‘ये डॉक्टर फाटक साहब राजस्व कॉलोनी में ही रहते हैं ना?’ डॉक्टर हालदार ने कहा - ‘हाँ। वहीं तो रहते हैं!’ विकटजी बोले - ‘मैं सोच रहा था कि एक बार उन्हें दिखा लूँ।’ डॉक्टर हालदार ने बड़ी मुश्किल से अपने उछलते दिल को काबू किया। उन्होंने डॉक्टर फाटक का, मरीजों को देखने का, समय बताया और कहा -‘अरे! आप अब तक उनसे नहीं मिले? आप एक बार जरूर उन्हें दिखाइएगा। उसके बाद आपको मेरे पास आने की जरूरत नहीं रहेगी। आप उनसे मेरा नाम ले लीजिएगा। वैसे, आज जब उनसे मेरी बात होगी तो मैं आपके बारे में बता दूँगा और कह दूँगा कि आपसे फीस नहीं लें।’ डॉक्टर हालदार की बात खत्म होती उससे पहले ही विकटजी हवा की चाल, उल्टे पैरों लौट गए।


डॉक्टर हालदार को विश्वास ही नहीं हुआ कि विकटजी चले गए हैं। उनका जी किया कि ‘मुझे खुशी मिली इतनी कि मन में न समाय’ वाले गीत से दसों दिशाएँ गुँजा दें। किन्तु मरोजों की भीड़ और ‘लोग क्या कहेंगे’ ने उन्हें मन की करनी से रोक दिया।
बस! वह दिन और आज का दिन। तबसे विकटजी कुपित, क्षुब्ध और झुँझलाए हुए हैं। बिगड़ैल साँड की तरह ‘फूँ-फूँ’ करते हुए कभी यहाँ तो कभी वहाँ बैठ रहे हैं। उन्हें कहीं कल नहीं पड़ रही है, चैन नहीं मिल रहा है।


कोई चार दिनों बाद पूरा किस्सा मालूम हुआ। विकटजी से पूछने का आत्‍मघाती, मूर्खतापूर्ण दुस्साहस कौन करता? सो, किस्सा डॉक्टर फाटक से ही मालूम हुआ। डॉक्टर फाटक चिकित्सा विशेषज्ञता के लिए जितने प्रसिद्ध हैं लगभग उतने ही प्रसिद्ध ‘सुरा-पान’ के कारण भी हैं। डॉक्टर फाटक ने बताया - ‘विकटजी को तो मेरे पास आना ही था। मुझे मालूम ही था। सो जैसे ही उन्होंने अपना नाम बताया तो मैंने कहा कि हाँ डॉक्टर हालदार ने बताया था। उसके बाद मैंने ऐसे व्यवहार किया मानो मैंने दस-बीस बोतल दारु पी रखी हो। विकटजी कहें कुछ, मैं सुनूँ कुछ और कहूँ कुछ। विकटजी को सबसे पहली और सबसे बड़ी तकलीफ तो यह हुई कि मैंने उनसे तू-तड़ाक् से बात की जबकि सारा शहर उन्हें विकटजी कहता है। सो, सबसे पहले तो उनका अहम् ध्वस्त हुआ। फिर, उनकी बीमारी को लेकर मैंने काफी-कुछ पूछताछ कर बताया कि उनकी बीमारी मामूली और इलाज आसान नहीं है। कई दिनों तक, शायद महीनों तक दवाइयाँ लेनी पडे। किन्तु मैंने न तो उनका पर्चा बनाया और न ही कोई दवाई लिखी। हाँ, इतना जरूर मैंने सन्देश दे दिया कि उनका इलाज अब कोई कर सकता है तो बस मैं ही कर सकता हूँ। लेकिन कब करूँगा, यह नहीं बताया। ‘सुरा प्रभाव’ का आभास कराते हुए विकटजी को डाँट कर भगा दिया और कहा कि दो-चार दिन में पूछताछ करते रहना। मैंने कहा कि कविराज! यह कोई कविता लिखने का मामला नहीं है। चिकित्सा विज्ञान का मामला है। तुम क्या जानो कि इसमें कितना पढ़ना पड़ता है, अपने आप को कितना झोंकना पड़ता है।’


अब हालत यह है कि विकटजी, डॉक्टर हालदार से अपना इलाज करना नहीं चाहते और डॉक्टर फाटक हैं कि बताते नहीं कि इलाज कब शुरु करेंगे। अब विकटजी को इलाज कराना है तो केवल डॉक्टर फाटक से ही कराना है। उधर, डॉक्टर फाटक ने जिस लहजे में, जिस तरह से हड़काते, प्रताड़ित करते हुए व्यवहार किया उससे विकटजी चौकड़ियाँ भूले हुए हैं। वे विश्वास ही नहीं कर पा रहे हैं कि कोई उनसे, इस तरह, इतने असम्मान से बात कर सकता है! वे रह-रह कर अपने आप पर झुँझला रहे हैं - जिस डॉक्टर हालदार ने डॉक्टर फाटक के पास भेजा न तो उसका कुछ कर पा रहे हैं और न ही डॉक्टर फाटक का कुछ कर पा रहे हैं जिसने लू उतार कर, इज्जत हाथ में थमा दी।


कल शाम मैं डॉक्टर हालदार से मिलने गया तो देखा कि डॉक्टर फाटक भी वहीं बैठे हैं और दोनों ठहाके लगा रहे हैं। रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। मैंने बौड़म की तरह दोनों को देखा और किस्सा-ए-ठहाका जानना चाहा। बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोकते हुए डॉक्टर फाटक ने कहा - ‘एक नई चिकित्सा पद्धति की खोज मैंने की है किन्तु मेडिकल साइन्स मुझे इसकी क्रेडिट नहीं देगा। मिलेगा तो बस यही कि हालदार किसी एक शाम को मुझे दारु पिला देगा।’ कह कर वे फिर आसमान फाड़ ठहाके लगाने लगे। डॉक्टर हालदार भी उनके साथ शुरु हो गए।


और विकटजी? उन्हें तो पता ही नहीं कि उनका इलाज कर दिया गया है।
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7 comments:

  1. अब इस पर तो ठहाका ही लगाया जा सकता है।

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  2. हम तो सवा इंच मुस्कुराएंगे वकील साहब

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  3. धन्य है, हम भी बिना मुस्कुराये नहीं रह सके...:)

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  4. क्या करें..गर न मुस्करायें. :)

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  5. aree saab ye to Ratlam ki kahani hai ... asli patro ke naam dete to shayad masala aur bhi badh jaata aur anand bhi.

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