हथियार भी है मालवी बाफला

मालवा के स्‍वादि‍ष्‍ट व्‍यंजन 'बाफला' की प्रारम्भिक जानकारी आपने चिपलूनकरजी के चिट्ठे से हासिल कर ली होगी । बाफला बनाने का जो तरीका उन्‍होंने बताया है, वह 'सर्वहारा' का सामान्‍य तरीका है । वर्ना इस क्षेत्र में भी 'विशेषज्ञ' मौजूद हैं जो तरह-तरह से, तरह-तरह के बाफले बना कर आपको अपना मुरीद बना लेंगे । लेकिन इन 'तरह-तरह' के बाफलों में एक विश्‍व व्‍यापी समानता यह है कि अन्तिम प्रभाव सबका एक जैसा ही होता है । बाफले का एकमेव, अन्तिम और अपरिहार्य प्रभाव होता है - इसे खाने के बाद आप लाख चाहें तो भी काम नहीं कर पाते । इसे खाने के बाद आपको आराम करना ही करना है ।बाफले के इस प्रभाव का 'उपयोग' अपने पक्ष में कोई कैसे कर सकता है और इसके उपयोग से कोई खुद को किस तरह से परेशान कर सकता है, इसके दो 'अनुपम' संस्‍मरण मेरे पास हैं । यकीनन, इनका जायका बाफलों के सामने कुछ भी नहीं है लेकिन इतना बुरा और इतना कम भी नहीं है कि आपको मजा ही न आए ।



लखनऊ निवासी, हिन्‍दी के ख्‍यात समीक्षक-आलोचक श्री राजनारायण बिसारिया, कोई सैंतीस-अडतीस बरस पहले बाफला-प्रभावित हुए थे, यह खुद बिसारियाजी, अब तक भी नहीं जानते होंगे । यह बात सम्‍भवत: सन् 1969 की है । 1967 में बनी, मध्‍य प्रदेश की संविद (संयुक्‍त विधायक दल) सरकार का पतन होने के बाद, पण्डित श्‍यामाचरण शुक्‍ल के नेतृत्‍व में कांग्रेस सरकार बनी थी । घोषित प्रतिकूल गुटीय निष्‍ठा के बावजूद उन्‍होंने श्री बालकवि बैरागी को राज्‍य मन्‍त्री के रूप में अपने मन्त्रि मण्‍डल में शामिल किया था । किसी साहित्‍यकार को मन्‍त्री बनाए जाने से तब, साहित्‍यकारों की जमात में अपेक्षित प्रसन्‍नता व्‍याप्‍त थी । बैरागीजी के बंगले पर साहित्‍यकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का जमावडा बराबर बना रहता था ।


इसी क्रम में एक दिन सवेरे-सवेरे, श्री राजनारायण बिसारिया लखनऊ से चलकर भोपाल पहुंचे । अपने मित्र से मिल कर बधाई और शुभ-कामनाएं देना उनका एकमात्र 'पाक मकसद' था, इसके सिवाय उन्‍हें भोपाल में और कोई काम नहीं था । ऐसे 'निश्‍छल आगमन' से बैरागीजी पुलकित, मुदित हो गए ।


नित्‍यकर्म से मुक्‍त होकर दोनों मित्र बतियाने बैठे । बातों का सिलसिला शुरू हुआ ही था कि बैरागीजी के निजी सचिव (पी ए) निरखेजी ने फोन पर सूचना दी कि मुख्‍यमन्‍त्रीजी ने दोपहर में, मन्त्रि मण्‍डल की आवश्‍यक बैठक बुलाई है । बैरागीजी असहज हो गए । विवेक पर आत्‍मा भारी पडने लगी थी । बिसारियाजी को छोड नहीं सकते और मन्त्रि मण्‍डल की बैठक से तडी मारने की तो कल्‍पना भी नहीं की जा सकती थी । बडा धरम संकट खडा हो गया था और दोनों धरम निभाना जरूरी था । 'क्‍या करें, क्‍या न करें' के उहापोह में फंसे बैरागीजी को 'संकटमोचक' के रूप में 'बाफला' याद हो आया । उन्‍होंने बिसारियाजी के आतिथ्‍य को मालवा की विशिष्‍टता का स्‍पर्श देते हुए, भोजन में 'दाल-बाफला' बनाने का निर्देश दिया ।


इधर दोनों मित्र बतियाते रहे और उधर बाफले बनते रहे । बीच-बीच में बैरागीजी अपना 'राज-काज' भी निपटाते रहे । थोडी ही देर में भोजन का बुलावा आया । बिसारियाजी ने इससे पहले बाफला देखा भी नहीं था तो चखने का तो सवाल ही नहीं उठता । बैरागीजी ने अपनी साहित्यिकता का सम्‍पूर्ण उपयोग करते हुए बाफला की खासियतों को बखान कुछ इस तरह से किया कि बिसारियाजी के दिल-दिमाग पर बाफला पूरी तरह काबिज हो गया । जिसने कभी बाफला खाया होगा वह भली प्रकार जानता होगा कि इसका स्‍वाद, आदमी को लगभग अनियन्त्रित कर देता है । फिर, बैरागीजी द्वारा की जा रही मनुहार पर मनुहार और लखनवी मिजाज के बिसारियाजी मनुहार के कच्‍चे । सो,बिसारियाजी को पता ही नहीं चला कि वे अपनी आवश्‍यकता से कुछ अधिक ही खा बैठे हैं ।


भोजन से निवृत्‍त हुए तो बिसारियाजी के होठों पर बाफलों के कसीदे छाए हुए थे । वे इसे अपने अब तक के जीवन का आनन्‍ददायी और अविस्‍मरणीय 'भोजन-अनुभव' बता रहे थे । बीस-पचीस मिनिट भी नहीं बीते थे कि बाफला-प्रभाव रंग जमाने लगा । बिसारियाजी को यकायक ही तेज प्‍यास लग आई । उन्‍होंने एक ही सांस में डेड ग्‍लास पानी पी लिया । लगा कि प्‍यास बुझ गई है । लेकिन थोडी ही देर में फिर प्‍यास लग आई । फिर पानी पिया । कुछ मिनिट और बीते होंगे कि बिसारियाजी की पलकें भारी होने लगीं । बैरागीजी से बात करते-करते उनकी पलकें मुंदने लगीं और कुछ ही पलों में नींद के आगोश में चले गए ।


बैरागीजी को पहले से न केवल यह सब पता बल्कि यह सब तो उन्‍हीं का किया कराया था । बिसारियाजी को नींद आते ही बैरागीजी उठ खडे हुए, बिसारियाजी के पास ग्‍लास और ठण्‍डे पानी का जग रखने का निर्देश सेवकों को दिया, कपडे बदले और मन्त्रि मण्‍डल की बैठक में भाग लेने के लिए चल दिए ।


कोई दो ढाई घण्‍टे बाद बैरागीजी लौटे तो बिसारियाजी की नींद खुली ही थी । वे आंखें मलते हुए, जम्‍हाइयां ले रहे थे और विस्मित भाव से परेशान हो रहे थे कि यह सब क्‍या हो गया, उन्‍हें असमय नींद क्‍यों और कैसे आ गई । अपने पास रखे जग में से ग्‍लास में पानी उंडेलते हुए वे इस अपराध बोध से भी ग्रस्‍त हो रहे थे कि बेचारे बैरागीजी तो अपना सारा काम-काज छोड कर उनके पास बैठे थे और वे थे कि सो गए । लखनवी मिजाज उनके अपराध बोध को और भारी किए जा रहे था । उन्‍होंने अत्‍यधिक संकोच के साथ बैरागीजी से क्षमा याचना की । 'मित्रों के बीच कैसी औपचारिकता और कैसी क्षमा याचना' वाली मुद्रा में बैरागीजी ने बिसारियाजी को इस नैतिक संकट से उबारा और बताया कि बिसारियाजी को सोता देख, वे भी अपनी एक मीटिंग निपटा आए हैं । बिसारियाजी ने इस बात का शुक्र मनाया और खुद को यह कह कर तसल्‍ली दी कि उनका 'अनपेक्षित और आकस्मिक शयन' बैरागीजी को मुफीद हो गया वर्ना उन्‍हें इस बात का मलाल आजीवन रहता कि उनके कारण बैरागीजी को अपना जरूरी काम छोडना पडा था ।


वातावरण पूरी तरह सामान्‍य हो चुका था और दोनों मित्र एक बार फिर सहजता और आत्‍मीयता से बतिया रहे थे । फर्क इतना ही था कि एक जानता था जो हुआ वह क्‍या और क्‍यों हुआ था और दूसरा इस सबसे अनजान था ।


यह वाकया तो सहज रहा । लेकिन बाफला प्रभाव का दूसरा वाकया थोडा सा दूसरा रंग लिए हुए है । इसके 'बाफला प्रभावित नायक' थे (अब स्‍वर्गीय) श्री बसन्‍तरावजी उइके । वे उन दिनों मध्‍य प्रदेश के शिक्षा मन्‍त्री थे । उनके साथ बाफला ने क्‍या हरकत की - यह जल्‍दी ही देखेंगे, हम लोग ।

11 comments:

  1. इसे कहते हैं प्यारी सी जंग. किसी को नुकसान नहीं और काम भी हो गया. ऐसे तो बाफला हथियार ही है.

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  2. वाह मज़ा आ गया। इस पर शोध होना चाहिये कि मौर्यकाल में बाफला था या नहीं। होता तो कौटिल्य की कूटनीति में एक सूत्र बाफला के प्रयोग पर भी होता :)

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  3. Valkal tere chakkar mein is baar bafle nahi kha paye......
    Uncleki ek blog Chak de India pe bhi ho jaye....

    ~Abhishek

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  4. मजेदा वाकया रहा यह, अब दूसरे का इंतजार है।

    सिर्फ बाटी (बाफला)से खास कुछ नहीं होता, ज्यादा घी (में डूबी) चुपड़ी होनी जरूरी है।
    साथ में लहसुन वाली काली (छिलके वाली ) उड़द की दाल ना हो तो मजा नहीं आता।

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  5. प्रिय अभिषेक,
    यह देख कर अच्‍छा लगा और सुखद आश्‍चर्य हुआ कि तुम मेरा ब्‍लाग पढ रहे हो । धन्‍यवाद ।
    तुम्‍हारी फरमाइश पूरी कर पाऊं, यह मेरा सौभाग्‍य ही होता किन्‍तु (तुम हंसना मत) मुझे 'चक दे' का अर्थ ही नहीं मालूम । तुम अर्थ बता दोगे तो मुझे मदद मिलेगी ।

    अपना ध्‍यान रखना ।

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  6. नाहर साहब,

    आप जानकार हैं सो आपने आत्‍मा पकड ली । शुक्रिया ।
    वैसे, जब भी दाल-बाटी/बाफला का जिक्र होता है तो उसमें भी का समावेश स्‍वत: होता ही है । लेकिन मैं भूल गया था कि यह बात सब नहीं जानते । बिना घी के बाटी/बाफला, बिना बिन्‍दी वाली सुहागन जैसे होते हैं ।
    बहरहाल, अगली पोस्टिंग में आपको जेहन में रखकर, यह महत्‍वपुर्ण बात याद रखूंगा ।
    फिर से शुक्रिया ।

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  7. Uncleji

    aapka response time maan gaya. Mujhe laga tha kal wapis check karoonga to kuch reply ayega.

    chak de bole to....
    http://www.urbandictionary.com/define.php?term=chak+de+phatte

    ~Abhishek

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  8. वाह! मुझे अपने रतलामी दिन याद आ जाते हैं. दाल-बाफ़ले और चूरमे के लड्डू खाने के बाद कौन सयाना जागना चाहेगा?!

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  9. मैं तो मालवी परंपरा में ही पला-बढ़ा हूं सो पता है कि बाफले क्या चीज है। आपका ब्लॊग एक मित्र की मदद से पहली बार पढ़ने को मिला, पर मजा आ गया।
    अरविंद, इंदौर

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  10. बाफला तो वाकई व्‍यंजनराज है, उसे यदि खाया है तो फिर पूरा मजा देता ही है। मालवा माटी धन्‍य है जहां बाफला है।
    अच्‍छा किस्सा है इसने हंस-हंस कर लोटपोट कर दिया । वाकई वाफला संकटमोचक साबित हुआ ।

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.