एक ऑपरेशन ने बदल दी मेरी हैसियत

यदि मेरी जानकारियाँ सही हैं तो मैं देश के सवा अरब से अधिक लोगों में से गिनती के, लगभग तीन हजार लोगों में शरीक हो गया हूँ। एक छोटे से ऑपरेशन ने मुझे यह हैसियत दिला दी है।

इसी बरस, मार्च के दूसरे सप्ताह में मुझे ‘मूत्र नली संक्रमण’ (अर्थात् यूटीआई अर्थात् यूरीनरी ट्रेक्ट इन्फेक्शन) का रोगी घोषित कर दिया। यूरोलॉजिस्ट के अनुसार मेरी मूत्र नली अच्छी-खासी सिकुड़ गई थी और मुझे फौरन ही किसी कुशल यूरोसर्जन की सेवाएँ लेनी चाहिए। रतलाम के डॉक्टर उदयजी यार्दे ने कहा - ‘आप बड़ौदा में डॉक्टर नागेश कामत से मिलिए। इस कष्ट से मुक्ति वे ही दिलाएँगे।’ मैंने आँख मूँदकर यार्देजी का कहा माना और कष्ट-मुक्त ही नहीं हुआ, देश के ‘अब तक के गिने-चुने’ लोगों में भी शरीक हो गया। मुझे इतनी राहत मिली है कि मैं अपने इस अनुभव को सार्वजनिक करने से खुद को रोक नहीं पा रहा।

कामतजी पहले ही मेरा, सरकम सीजन का ऑपरेशन कर चुके थे। उन्होंने मेरे कागज देखे, पूरी बात सुनी और कहा कि ऑपरेशन से पहले वे ऑपरेशन के बारे में मुझे विस्तार से बताना/समझाना चाहेंगे। कारण पूछने पर उन्होंने कहा कि जिस तरीके से वे ऑपरेशन करेंगे वह सामान्य चलन में नहीं है। इस बीमारी के जो ऑपरेशन इन दिनों हो रहे हैं उनमें मूत्र नली की मरम्मत की जाती है और मरीज को एक छोटी सी शलाका (रॉड) प्रयुक्त करने की सलाह दी जाती है जिसे, (ऑपरेशन के बाद) जब-जब मूत्र त्याग में  बाधा अनुभव हो तब-तब मूत्र मार्ग में डालकर मरीज खुद अपनी सहायता करता रहे। यह व्यवस्था तनिक कष्टदायक होती है और कालान्तर में रोगी झुंझलाने लगता है। कामतजी ने कहा कि वे जर्मन पद्धति अपनाएँगे जिसमें मूत्र नली की मरम्मत करने के स्थान पर, मूत्र नली के क्षतिग्रस्त भाग का ‘पुनर्निमाण’ किया जाता है। (यह ‘पुनर्निमाण’ शब्द मैंने गढ़ा है।) बोलचाल की भाषा में इसे मूत्र नली की प्लास्टिक सर्जरी और डॉक्टरी भाषा में यूरोथ्रोप्लास्टी कहा जाता है। कोई पन्द्रह बरस पहले यह पद्धति जर्मनी में ईजाद हुई और लगभग दस बरस पहले भारत में इस पद्धति से ऑपरेशन शुरु हुए हैं।

इस पद्धति में मूत्र नली के पुनर्निर्माण हेतु मरीज के शरीर की चमड़ी प्रयुक्त की जाती है। चूँकि मूत्र नली चौबीसों घण्टे गीली रहती है इसलिए वहाँ सूखी चमड़ी (याने, शरीर पर बाहर दिखाई दे रही चमड़ी) प्रयुक्त नहीं की जा सकती। उसके सिकुड़ने की आशंका बनी रहती है। इसलिए रोगी के शरीर की गीली चमड़ी ही ली जाती है। यह गीली चमड़ी मनुष्य शरीर में चार स्थानों, दोनों गालों और दोनों होठों के अन्दर से ली जाती है। गालों की अन्दरूनी चमड़ी तनिक मोटी होती है इसलिए होठों के अन्दर की चमड़ी अधिक उपयुक्त होती है। गालों/होठों की चमड़ी निकालने की प्रक्रिया को ‘बकास मकोसाा हार्वेस्टिंग’(BUCCAS MUCOSA HARVESTING) कहा जाता है। 

जर्मनी में इस हेतु मरीज की चमड़ी का बहुत छोटा सा अंश लेकर उसे विकसित किया जाता है। बोलचाल की भाषा में कह सकते हैं कि इस चमड़ी की खेती जाती है, छोटी-मोटी फसल उगाई जाती है जिसे ‘सेल कल्चर’ (CELL CULTURE) कहते हैं। यह प्रत्येक रोगी के लिए अलग-अलग की जाती है। किन्तु यह पद्धति अधिक खर्चीली और अत्यधिक समय लेनेवाली होती है। इसलिए इसके बजाय आवश्यकतानुसार पूरी चमड़ी ही ली जाती है।

कामतजी ने पहले ही बता दिया था कि ऑपरेशन तो बहुत छोटा (माइनर सर्जरी) होगा। खतरे, चिन्ता या अतिरिक्त गम्भीरता जैसी कोई बात नहीं है। किन्तु यह ‘एक में दो ऑपरेशन’ जैसा होगा - चमड़ी निकालना और मूत्र नली का पुनर्निर्माण। इसलिए कम से कम चार घण्टे लगेंगे। 


मेरे मामले में मेरे ऊपरी होठ की चमड़ी निकाली गई। ऑपरेशन थिएटर में घुसने से लेकर निकलने तक का समय करीब पौने पाँच घण्टे रहा। ऑपरेशन हेतु मुझे निश्चेष्ट किया गया। पुनर्निर्मित मूत्र नली अपने नवनिर्मित आकार में बनी रहे इसलिए वहाँ, उपयुक्त गोलाई की एक नली लगा दी गई। चूँकि मुख्य मूत्र मार्ग का पुनर्निर्माण किया गया था इसलिए वह रास्ता तो बन्द करना ही था। मूत्र त्याग हेतु अतिरिक्त रास्ता बनाकर एक नली लगा कर एक थैली लगा दी गई। याने, जब मैं ऑपरेशन थिएटर से बाहर आया तो मुझे दो नलियाँ लगी हुई थीं।

मैं 19 मई की शाम को कामतजी के अस्पताल में भर्ती हुआ, ऑपरेशन 20 मई को हुआ और 27 मई को मुझे छुट्टी मिली। तयशुदा कार्यक्रमानुसार मैं 04 जून को फिर बड़ौदा गया। उस दिन मेरी, मूत्र त्याग के मुख्य मार्ग पर लगी (पुनर्निर्मित मूत्र नली का आकार बनाए रखने के लिए लगाई गई) नली निकाली गई। 19 मई के बाद उसी दिन मैंने सामान्य और स्वाभाविक रूप से मूत्र त्याग किया। याने, पन्‍द्रह दिनों तक मुझे पेशाब, बाहर लगाई गई नली से अपने आप होता रहा। तयशुदा कार्यक्रमानुसार 13 जून को मैं फिर बड़ौदा गया। उस दिन बाहरी नली निकाली गई। बाहरी नली से जुड़ी पेशाब की थैली पहले मरीज को हाथ में लेकर चलना पड़ता था। तकनीकी विकास इस मामले में भी हुआ। अब मरीज अपने पाँव पर ही यह थैली बाँध कर पेण्ट/पायजामा पहन सकता है।

इस ऑपरेशन से मुझे मेरी अपेक्षा से अधिक राहत मिली है। मूत्र नली सँकरी होने के कारण पहले मुझे पेशाब करने में अधिक समय तो लगता था ही था, अधिक दबाव भी झेलना पड़ता था। पेशाब शुरु होने की अनुभूति तो होने लगती थी किन्तु पेशाब आना कुछ देर बाद शुरु होता और समाप्त होने की अनुभूति होने के देर बाद तक आता रहता। अब सब कुछ सहज, सामान्य और प्राकृतिक स्थिति जैसा हो गया है। अभी, 13 जुलाई को मैं फिर बड़ौदा जाकर लौटा हूँ। यूरोफ्लोमीटरी के जरिए मेरे  मूत्र-प्रवाह की गति आदि की जाँच हुई है। सब कुछ सामान्य है। कामतजी के मुताबिक अब मुझे उनके पास किसी जाँच के लिए नहीं जाना है।

इस अक्टूबर में अपने जीवन के पचास वर्ष पूरे करनेवाले कामतजी लगभग इक्कीस वर्षों से इस पेशे में हैं। जैसा कि मैंने शुरु में ही बताया है, भारत में गए दस बरसों में इस तरह के लगभग तीन हजार ऑपरेशन हुए हैं। मैं इनमें से एक हूँ। कामतजी ने यूरोथ्रोप्लास्टी का पहला ऑपरेशन कोई आठ-नौ बरस पहले किया था। मैं उनका सम्भवतः ‘शतकीय मरीज’ हूँ। बड़ौदा में अकोटा इलाके में 21, विनायक सोसोयटी पर, एसएनडीटी कॉलेज के सामने, अकोटा स्टेडियम के पीछे, ‘कामत किडनी एण्ड आई हास्पिटल’ नाम से उनका अपना अस्पताल है। उनकी उत्तमार्द्ध श्रीमती प्रीती कामत प्रख्यात, कुशल नेत्र चिकित्सक हैं। अस्पताल का फोन नम्बर  (0265) 2322463, मोबाइल नम्बर 9558819868 तथा ई-मेल पता:kamatkeh@gmail.com  है।

यह मेरा अपना अनुभव है। इतनी गुंजाइश रखी जानी चाहिए कि मेरा अनुभव दूसरों के अनुभव से अलग भी हो सकता है।
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यहाँ दिया गया मेरा चित्र, मेरे ऊपरी होठ के अन्दर की चमड़ी निकालने के बाद, मेरी स्थिति बता रहा है। पोस्ट पर, चित्र के नीचे केप्शन देना मैं अब तक नहीं सीख पाया। 

14 comments:

  1. अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएँ। स्वास्थ्य के क्षेत्र में वाकई चमत्कार हो रहे हैं।

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    1. धन्यवाद गुरुजी। आप मुझ पर नजर रखे हुए हैं यह बड़ी तसल्ली की बात है मेरे लिए।

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  2. अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएँ। स्वास्थ्य के क्षेत्र में वाकई चमत्कार हो रहे हैं।

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " भ्रम का इलाज़ - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. अच्छे स्वास्थ्य के लिए शुभकामनाएँ

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  6. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-07-2016) को "धरती पर हरियाली छाई" (चर्चा अंक-2405) पर भी होगी।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद।

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    2. बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  7. Vishnuji. Thank you. Aapka anuvad bahut hi truthful ( meri Hindi ki vocabulary bahut limited hai. Mai kshma chhata hu) hai. Surgery ek lamba undertaking hota hai. Usme kai chote taklifen bhi hote hain. Aapne unko overlook karke yhe likha hai. Aapka ( aur mere doosre patients) ka dil bada hai ki itna vishwas se complicated surgery ke liye tayyar hote hain. Shookriya. Main doosri bar Hindi lipi main likhna koshish karoonga.

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  8. Vishnuji. Thank you. Aapka anuvad bahut hi truthful ( meri Hindi ki vocabulary bahut limited hai. Mai kshma chhata hu) hai. Surgery ek lamba undertaking hota hai. Usme kai chote taklifen bhi hote hain. Aapne unko overlook karke yhe likha hai. Aapka ( aur mere doosre patients) ka dil bada hai ki itna vishwas se complicated surgery ke liye tayyar hote hain. Shookriya. Main doosri bar Hindi lipi main likhna koshish karoonga.

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