सालाना साढ़े बारह अरब के एसएमस याने गरीबों की अमीरी


एसएमएस मुझे सदैव ‘आपात’ ही लगते हैं - पढ़ना हो या भेजना हो। पढ़ने में ही प्राण निकल जाते हैं तो लिखने में क्या गत होती होगी, कल्पना की जा सकती है। फिर भी, इससे बच पाना सम्भव नहीं रह गया है। सो, पढ़ता भी हूँ और (लिख कर) भेजता भी हूँ।

कुछ मेहरबान हैं जो मुझे एसएमएस से बराबर जोड़े रखे हुए हैं। प्रति दिन सुबह, मध्याह्न, अपराह्न, देर रात एसएमएस भेजते रहते हैं। कुछ इस तरह, मानो अपने आराध्य की निर्धारित पूजा-सेवा का क्रम, निष्ठापूर्वक निभा रहे हों। सुबह प्रभातियाँ गाकर उठाते हैं और रात को शयन-आरती करके सुलाते हैं। उत्सवों, पर्वों और विशेष प्रसंगों पर आनेवाले एसएमएस इनमें शामिल नहीं हैं। कभी-कभी ऐसे एसएमएस भी आ जाते हैं जो मुझे अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों की आदिम-फूहड़ता की याद दिला देते हैं। ऐसे एसएमएस अपने अन्तरंगों को ही भेजे जाते होंगे, मुझे गलती से आ जाते हैं। जाहिर है, भेजनेवाले को भी पता नहीं कि वह किसे, कौन सा सन्देश भेज रहा है। सो, प्रतिदिन, लगभग अठारह-बीस एसएमस पढ़ ही लेता हूँ।

गए कुछ दिनों से ये एसएमस ही विचार पटल पर छाए हुए हैं। इनमें मुझे कोई रचनात्मकता दिखाई नहीं देती। उपयोगिता तो निश्चय ही कुछ नहीं होती। मुझे लगता है, भेजनेवाले किसी व्यसन के अधीन ही भेजते होंगे। क्योंकि मुझे नियमित रूप से एसएमएस भेजनेवाले  दो कृपालु मुझे प्रायः प्रतिदिन मिलते हैं किन्तु अपने ही भेजे हुए एसएमएस की चर्चा उन्होंने कभी नहीं की। उनसे बातें करते समय मैं नजरें गड़ा कर, ध्यान से उनका चेहरा देखता हूँ। मुझे एक बार भी, एक पल को भी नहीं लगा कि उन्हें पता है कि वे मुझे नियमित रूप से एसएमस भेजते हैं।

मुझे नहीं पता कि मेरा सोचना कितना सही या कितना गलत है। किन्तु मुझे लग रहा है कि एसएमएस के मामले में हमने अपनी स्थिति और दशा एकदम विपरीत दिशा में स्थापित कर दी है - एसएमएस हमारे लिए होने चाहिए थे किन्तु हम एसएमएस के होकर रह गए हैं। हमें मोबाइल कम्पनियों का उपभोक्ता होना चाहिए था किन्तु हम मोबाइल कम्पनियों के उत्पाद बन कर रह गए हैं। हम मोबाइल कम्पनियों और मोबाइल सेवाओं को प्रयुक्त नहीं कर रहे, वे हमें प्रयुक्त कर रही हैं और मजे की बात यह कि यह सब हम अपनी गाढ़ी कमाई की कमत पर कर रहे हैं।

सुनता और पढ़ता हूँ कि देश की जनसंख्या और देश की मोबाइल संख्या लगभग बराबर हो गई है। गई रात मैंने बहुत ही मामूली गिनती की तो, हाड़ जमा देनेवाली इस ठण्ड में भी मुझे पसीना आ गया।

मेरी गणित शुरु से ही बहुत ही कमजोर रही है। सम्भव है, मेरी गणना गलत हो। ऐसे में, किसी और बात के लिए नहीं तो केवल इसी बात के लिए कि मेरी गणना सही है या नहीं, थोड़ी देर के लिए मेरे साथ हो लीजिए।

मोटे तौर पर हमारी जनसंख्या सवा अरब मान रहा हूँ। मान रहा हूँ कि इनमें से 80 प्रतिशत जनसंख्या के बराबर ही देश में मोबाइलों की संख्या होगी - याने एक अरब। इनमें से 10 प्रतिशत लोग अर्थात् 10 करोड़ लोग वैसे ही ‘एसएमएस व्यसनी’ होंगे जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है और प्रति व्यक्ति, प्रति दिन एक एसएमएस करता होगा। एक एसएमएस का शुल्क कम से कम एक पैसा तो होगा ही। याने, 10 करोड़ पैसे प्रतिदिन। याने 10 लाख रुपये प्रति दिन। इस मान से पूरे वर्ष का आँकड़ा बनता है - 36 करोड़ 50 लाख रुपये।

मोबाइल कम्पनियाँ एक और ‘लोकप्रिय’ सेवा उपलब्ध कराती हैं - रिंग टोन की। मोबाइलधारकों की, मेरी उपरोक्त अनुमानित संख्या के 5 प्रतिशत, याने 5 करोड़ मोबाइलधारक भी यदि यह सेवा प्रयुक्त करते हैं तो इसका आँकड़ा ‘भयावह’ की सीमा तक पहुँच जाता है। इस सेवा के लिए एक उपभोक्ता यदि 20 रुपये मासिक चुकाता है तो एक महीने का राष्ट्रीय आँकड़ा 1 अरब रुपये अर्थात् 12 अरब रुपये वार्षिक होता है।

यहाँ तक लिखते-लिखते मेरी साँस फूल आई है। मैं ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूँ कि मेरी यह गिनती आंशिक रूप से भी सच न हो। लेकिन आप इसमें कितनी कमी कर पाएँगे?  

मेरी इस गणना को परखने का श्रम कीजिए और साथ-साथ यह भी विचार करते रहिएगा कि यह सब उस देश में हो रहा है जिसकी आधी से अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है।

यह सब हम ही कर रहे हैं। या तो हम, यह सब जानते ही नहीं हैं या फिर जानना ही नहीं चाहते। हमने ‘परम् प्रसन्नतापर्वूक’ खुद को, मोबाइल कम्पनियों के ‘उत्पाद’ में बदल लिया है। 

यह कौन सा भारत है? 

13 comments:

  1. मोबाइल और SMS सेवा आज व्यसन बन गई है, उसीका या दुष्परिणाम है । अनर्गल SMS भेजना एक शौक हो गया है । आपका गणित बिलकुल सही है,लेकिन ग्राहक सोचता है मेरे तो 10 पैसे,1 रुपया,20 रुपये ही जा रहे है,देशव्यापी गणित लगाने की किसे फुर्सत है (आपको छोडकर)।

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  2. मुझे तो मुआ मोबाइल ही जी का जंजाल लगता है

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (09-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
    सूचनार्थ |

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    1. कोटिश: धन्‍यवाद। मेरा हौसला बढा आपकी इस सूचना से। आभार।

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  4. ऐसा सुना है कि मोबाइल कंपनिया वेतन भोगी कर्मचारी रखती है जो विभिन्न प्रकार के sms बनाते है जिसे फॉरवर्ड करने में हम पैसा खर्च करते है.

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    1. यदि ऐसा होता है तो कोई ताज्‍जुब की बात नहीं।

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  5. चाहे- अनचाहे सभी इस मोबाइल क्रांति से प्रभावित हैं .
    आप की गणना वाकई चौंका देने वाली है परंतु यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे कोई जानना नहीं चाहता.

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  6. ♥(¯`'•.¸(¯`•*♥♥*•¯)¸.•'´¯)♥
    ♥♥नव वर्ष मंगलमय हो !♥♥
    ♥(_¸.•'´(_•*♥♥*•_)`'• .¸_)♥


    सालाना साढ़े बारह अरब के एसएमएस याने गरीबों की अमीरी
    आलेख में कमाल की गणना की है आपने
    आदरणीय विष्णु बैरागी जी !

    बच्चों को मोबाइल का व्यसनी बना दिया गया है...
    हम सब हैरान हैं कि कैसे हमारे घरों में मोबाइल की इतनी जबरदस्त घुसपैठ हो गई !!

    ... हालांकि , मेरे मोबाइल में आए हुए एसएमएस कई दिनों तक अनदेखे ही पड़े रहते हैं (मित्रों से क्षमा...)

    लेख में आपका व्यंगकार जगह जगह मुखर हुआ है ...
    बधाई इतने श्रम से लिखे गए आलेख के लिए !

    हार्दिक मंगलकामनाएं !
    मकर संक्रांति की अग्रिम शुभकामनाओं सहित…

    राजेन्द्र स्वर्णकार
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    1. आपकी टिप्‍पणी अपने आप में तनिक हट कर ही है। मेरी हिम्‍मत बढी। कोटिश: धन्‍यवाद।

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  7. Bhaijee ! Aisi gananaa me duble na hon. Har chhote-bade kasbe ki Deshi-Angreji "Pey" ki dukano par lagnewali bhid dekh kahin lagtaa hai ki desh me garibi hai ? Rasoi gas ke badhte daamo par chikhanewale yahaan daam nahi poochhate ?

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  8. आपका विश्‍लेषण जैसा कुछ-कुछ मुझे बहुत दिनों से असहज किए था.....आपने विवरण देकर मुझे इस विषय पर मेहनत करने से बचा लिया। आपका विवरण अत्‍यन्‍त सराहनीय है।

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  9. बिन्दु बिन्दु से सिन्धु बन गया।

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  10. फेस बुक पर श्री सुरेशचन्‍द्रजी करमरकर, रतलाम की टिप्‍पणी -

    लगता है, गरीब लोग, खुद को गरीब ही बनाए रखना चाहते हैं। शराब, मोबाइल,, दुपहिया वाहन जैसे चीजें, हमारे निम्‍न मध्‍यम वर्ग की कमजोरियॉं हैं। यही वर्ग, गरीबों की संख्‍या बढाता है। अब तो ईश्‍वर ही हमें बचा सकता है।

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.