खून नहीं, दूध बहता है नसों में

ऐसी यातना मैंने अब तक किसी यात्रा में नहीं झेली। नर्क यात्रा और कैसी होती होगी? 22 जुलाई को दोपहर लगभग साढे तीन बजेवाली रेल से मैं रतलाम से राजेन्द्रनगर (इन्दौर) के लिए चला था। मेरा यात्रा टिकिट नम्बर एस-52084459 था।
 
हमारे नेताओं के निर्लज्ज निकम्मेपन,  रेल अधिकारियों के (क्रूरता की सीमा तक के) रूखेपन और जन सामान्य की, सब कुछ सहते हुए चुप रहने की प्रकृति, के कारण, रतलाम-महू के बीच चल रही छोटी लाइन की रेलों से यात्रा करना किसी दण्ड भोगने से कम नहीं रह गया है। रेल अधिकारियों का रवैया कुछ ऐसा कि मानो हड़का रहे हों - ‘हजार बार कह दिया है कि यात्रा मत करो। फिर भी नहीं मान रहे हो तो जाओ! मरो! करो यात्रा अपनी ऐसी-तैसी कराते हुए।’
 
बैठने की जगह तो रतलाम से ही मिल गई किन्तु थोड़ी मेहनत करनी पड़ी। रेल्वे की कोई परीक्षा देने के लिए आए, महू लौट रहे चार रेलकर्मियों ने, बैग रख कर अपने उस साथी के लिए जगह रोक रखी थी जो दुनिया में था ही नहीं। मैंने हाथ जाड़कर (सचमुच में हाथ जोड़कर कर) कहा - ‘आपका दोस्त आ जाएगा तो मैं उठ जाऊँगा।’ अत्यधिक अनमनेपन ने उन्होंने मुझे बैठने की अनुमति देने का उपकार किया।

डिब्बे में भरपूर भीड़ थी। हिलना-डुलना दूभर था। फिर भी सबकी यात्रा प्रसन्नतापूर्वक जारी थी। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी। मौसम बदराया हुआ था। लग रहा था, बरसात होगी। इस ‘लगने’ के दम पर ही सब आशा भी कर रहे थे कि बरसात हो ही जाए। फतेहाबाद से ठीक पहलेवाले फ्लेग स्टेशन, ओसरा से कुदरत महरबान हो गई। बरसात शुरु हो गई। जल्दी ही फतेहाबाद आ गया। वे ही हरकत में आए जिन्हें उतरना था। कुछ लोग चढ़े भी। लेकिन उतरने-चढ़नेवालों को परे धकेलते हुए और जोरदार हल्ला करते हुए, तीन-चार लोगों ने, डिब्बे के दोनों दरवाजों और दोनों शौचालयों के बीच दूध की टंकियाँ जमा दीं - पाँच टंकियाँ दरवाजों के बीच और दो टंकियाँ शौचालयों के बीच। इतना ही नहीं, दरवाजे से अन्दर (सीटों की ओर) आनेवाली जगह पर भी दो टंकियाँ रख दीं। अब स्थिति यह कि जो जहाँ बैठा/खड़ा था, वहीं बैठा/खड़ा रहे। हिलना-डुलना, आना-जाना बन्द। टंकियों की ऊँचाई इतनी कि फलाँग कर भी नहीं जा सकते। अब कोई, पेशाब करने के लिए भी नहीं जा सकता था। कुछ लोगों ने टंकियों को ही ‘सीट’ बना लिया। स्थिति ऐसी बन गई थी मानो डिब्बा था तो दूध की टंकियाँ रखने के लिए और हम लोग जबरन उसमें घुस कर बैठ गए हों।
 
मुझे अजीब तो लगा ही, असहनीय भी लगा। मैंने हाँक लगा कर पूछा - ‘ये किसकी टंकियाँ हैं भाई?’ कोई जवाब नहीं आया। जाहिर था कि टंकियाँ रखनेवाले अपना काम करके जा चुके थे। मैंने फिर हाँक लगाई - दूसरी, तीसरी बार। सुनकर एक नौजवान प्रकट हुआ। मुझे हड़काते हुए बोला - ‘क्या बात है? क्यों चिल्ला रहे हो?’ मैंने टंकियाँ रखने और रास्ता बन्द होने पर आपत्ति जताई और कहा कि टंकियाँ भले ही रखी रहें किन्तु इस तरह कि शौचालयों तक जाने के लिए तथा यात्रियों के चढ़ने-उतरने के लिए रास्ता मिल जाए। मेरी बात को उसने अपनी हेठी समझा। आँखें तरेरकर और त्यौरियाँ चढ़ाकर बोला - ‘टंकियाँ तो रख दी हैं औैर अब यहीं रखी रहेंगी। बोलो! क्या करना है?’ आसपास बैठे/खड़े यात्रियों से सहयोग/समर्थन मिलने की आशा में अपने आसपास देखते हुए मैंने उससे कहा कि मैं उसकी इस हरकत की और गैर कानूनी रूप से टंकियाँ रखने की शिकायत डीआरएम और सीनीयर डीसीएम से  करूँगा। जवाब में उसने जो कुछ कहा और जिस तरह से कहा, उससे लगा कि उसे पता था कि मैं क्या कहूँगा। मेरी ओर देखे बिना, लापरवाही से उसने कहा - ‘जरूर करना और आकर मुझे बताना कि क्या हुआ?’ उसके तेवर और अपने कहे पर उसका आत्म विश्वास देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया। मेरी बदरंग शकल देखकर उसे मजा आ गया। मेरा मखौल उड़ाते हुए वह बोला - ‘चुपचाप बैठे रहो सा‘ब। लगता है, आप साल में कभी-कभार ही रेल में बैठते हो। यहाँ रोज की बात है। हम लोग रोज टंकियाँ रखते हैं और किसी से छुपा कर, चुपचाप नहीं रखते। सारी दुनिया के सामने रखते हैं। आप जैसे कई आए और चले गए। शिकायतें भी हुईं हैं और होती रहती हैं। आज तक कुछ नहीं हुआ। आप भी चाहो तो शिकायत करके तसल्ली कर लो। कुछ नहीं होगा। स्टेशन के पोर्टर से लेकर डीआरएम तक की नसों में खून नहीं, हमारा दूध बहता है। अब नमक के असरवाला जमाना गया। अब नमक का नहीं, दूध का असर होता है। बरसों से हो रहा है। सारी दुनिया देख रही है। आप भी शिकायत करके देख लो। आपको भी मालूम हो जाएगा।’

मुझे बहुत बुरा लगा। तय नहीं कर पा रहा था कि मुझे गुस्सा अधिक आ रहा है या रोना। लगा, अभी रोना आ जाएगा। मेरी आँखें डबडबा आईं। अपने आसपास देखा। कोई भी उस नौजवान से कुछ कहने को, मेरा साथ देने को तैयार नहीं लगा। मुझे लगा, सब मेरी ओर दया भरी नजरों से देख रहे हैं। मुझे और अधिक बुरा लगा।
 
अकस्मात ही मेरा विवेक और आत्म विश्वास लौटा। नहीं, वे मुझ पर दया नहीं दिखा रहे थे। उन सबकी नजरों में दयनीयता उजागर हो रही थी। वे भली प्रकार जान रहे थे कि मैं सही हूँ, उन्हें मेरा साथ देना चाहिए था और चुप रहकर वे अनुचित का समर्थन करने का ‘आदतन- अपराध’ कर रहे थे।

मैंने खुद की पीठ थपथपाई - मैं कामयाब नहीं हुआ तो क्या? मैंने प्रतिकार करने का साहस और यत्न तो किया! स्टेशन पोर्टर से लेकर डीआरम तक, सबके सब अपनी-अपनी जानें। अपने बारे मे मैं भली प्रकार जानता हूँ कि मेरी नसों में खून ही बह रहा है, फतेहाबाद के दूधियों का दूध नहीं।           

6 comments:

  1. बैरागी जी, बात इतनी सी नहीं है. इस समस्या का पूरा सामाजिक-राजनैतिक विश्लेषण किया जाए तो यह बहुत गहराई तक जाएगी।

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  2. मैंने खुद की पीठ थपथपाई - मैं कामयाब नहीं हुआ तो क्या? मैंने प्रतिकार करने का साहस और यत्न तो किया! स्टेशन पोर्टर से लेकर डीआरम तक, सबके सब अपनी-अपनी जानें। अपने बारे मे मैं भली प्रकार जानता हूँ कि मेरी नसों में खून ही बह रहा है, फतेहाबाद के दूधियों का दूध नहीं।

    गलत के प्रतिकार का माद्दा मृत्यु तक बना रहना चाहिए . अन्यथा सचमुच खून, नहीं दूध नहीं, नसों में पानी दौड़ेगा . बैरागी जी आप सचमुच बैरागी हैं

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  3. रवि कुमार शर्माSeptember 29, 2012 at 9:11 AM

    भाई साहब, आजकल ज़माना माफियाओ का है,ये दूध माफिया थे,जिनका आपने वर्णन किया है,जब तक गांधी जी छाप नोटों की हरियाली रहेगी, तब तक भारत मे ऐसा ही चलता रहेगा,अन्ना जैसे भी थक गए,जब तक समूची जनता जाग्रत नही होती,कुछ नही होगा । चोरी और सीना जोरी वाली कहावत आज कल सब जगह साकार दिखाई दे रही है ।

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    1. सार्थक और सामयिक पोस्ट, आभार.
      मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" पर आप सादर आमंत्रित हैं.

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  4. दूध का असर इतना उल्टा होगा, ज्ञात नहीं था।

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