मेवालाल और उसका प्याज

मेवालाल खुद को सचमुच में अन्नदाता मानने लगा था। शहर ने एक झटके में उसका मुगालता दूर कर दिया। उसे उसकी औकात बता दी।

यह कल, 31 मई 2018 गुरुवार को ही हुआ। रतलाम की मण्डी में।

मेवालाल रतलाम जिले के गाँव बरबोदना का रहनेवाला है। उसे मालूम हुआ कि रतलाम मण्डी में प्याज का भाव साढ़े तीन/चार रुपये किलो मिल रहा है। वह बड़ी आशा से अपना प्याज लेकर रतलाम मण्डी में आया। लेकिन उसकी आशाओं पर ओले गिर गए। उसे कहा गया कि उसे ढाई रुपये किलो के भाव पर अपना प्याज बेचना पड़ेगा। उसने एतराज जताया तो उन सबने पीठ फेर ली जो उसकी बेहतरी और उसकी हिफाजत की ग्यारण्टी देने के दावे करते हैं। उसे दो टूक जवाब मिला - ‘यही भाव मिलेगा। बेचना हो तो बेचो। नहीं तो अपना प्याज वापस ले जाओ।’ मन मसोस कर मेवालाल को अपना प्याज ढाई रुपये किलो ही बेचना पड़ा।

मेवालाल ऐसा अकेला किसान नहीं है। यहाँ हर किसान मेवालाल है। इन मेवालालों के साथ ऐसा ही हो रहा है। 

ये मेवालाल अपनी उपज मण्डी में लाते हैं। खरीदने के लिए व्यापारी इकट्ठे होते हैं। एक व्यापारी कहता है - ‘यह प्याज मैं खरीदूँगा।’ सुनकर बाकी व्यापारी लौटते तो नहीं लेकिन बोली भी नहीं लगाते। लगाते भी हैं तो इस तरह कि उसी व्यापारी की बोली अन्तिम हो जो खरीदने का इरादा जता चुका है। 

यह सब कुछ चौड़े-धाले हो रहा है। नेताओं, अफसरों की आँखों के सामने और नाक के नीचे। लेकिन मेवालालों की मदद कोई नहीं कर रहा। न तो मण्डी अध्यक्ष (जो खुद एक किसान है और किसानों के वोट लेकर अध्यक्ष बना है) न ही मण्डी सचिव और न ही कलेक्टर। कैसे करें बेचारे? सब कुछ कानून कायदे से तो हो रहा है! व्यापारी इकट्ठे हो रहे हैं। बोली लगा रहे हैं। सब कुछ किसान के सामने हो रहा है। सब कुछ पारदर्शी है। कहीं कोई बदमाशी, चोरी-चकारी नहीं। लेकिन फिर भी तमाम मेवालाल कहते हैं कि उनके साथ बेईमानी, अन्याय हो रहा है। उन पर जुल्म हो रहा है।

इन मेवालालों से पूछते हैं - ‘जब मनमाफिक भाव नहीं मिल रहा तो क्यों बेचते हो? वापस क्यों नहीं ले जाते?’ लगभग रोते-रोते ये मेवालाल कहते हैं - ‘बात तो सही कर रहे हो सा’ब। लेकिन वापस ले जाने पर और घाटा हो जाएगा। इस बार लाने-ले जाने का खर्चा माथे पड़ेगा और अगली बार लाने का खर्चा फिर झेलना पड़ेगा। और सा’ब! इस बात की क्या ग्यारण्टी कि अगली बार भी मनमाफिक भाव मिल जाएगा? इसलिए मजबूरी है सा’ब!’ हालत यह है कि जब किसी मेवालाल को मनमाफिक भाव नहीं मिलता तो वह घरवालों को फोन लगाता है - ‘भाव नहीं मिल रहा। क्या करूँ?’ लाचारी की चक्की में पिसा हुआ, घुटी-घुटी आवाज में जवाब आता है - ‘बेच दे भैया! मजबूरी है। जो भी भाव मिल, उस भाव बेच दे।’

व्यापारियों, नेताओं, अफसरों की मिली भगत का शानदार उदाहरण मण्डी में खुली आँखों देखा जा सकता है। यहाँ प्रत्येक व्यापारी ने खरीदी का अपना-अपना आँकड़ा तय कर रखा है। उसका आँकड़ा पूरा करने में बाकी सारे व्यापारी मदद करते हैं। जैसे ही उसका आँकड़ा पूरा होता है, वह पीछे हट जाता है और उन व्यापारियों का आँकड़ा पूरा करने में मदद करने लगता है जिन्होंने उसका आँकड़ा पूरा करवाया था। किस भाव खरीदना है और कितना खरीदना है, सारी मनमानी मिली भगत से हो रही है।

कोई मेवालाल दीन स्वरों में प्रतिवाद, प्रतिरोध करता है तो व्यापारी उससे ठिठोली करते हैं - ‘तुझे क्या नुकसान हो रहा है? भावान्तर में बाकी रकम सरकार से ले लेना।’ तमाम मेवालाल चुपचाप यह जवाब सुन लेते हैं। कुछ नहीं बोलते। बोलते हैं तो कहते हैं - ‘भावान्तर से भी फायदा तो सेठों को ही मिल रहा है।’

ऐसी दुर्दशा झेल रहे मेवालाल यदि शहर आने से इंकार करें और कहें कि उनकी अपनी उपज उनके दरवाजे पर ही खरीदी जाए तो सबके पेट में मरोड़ें उठने लगती हैं।
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पुछल्ला - कल मैंने कहा था कि किसान को अपना माल मण्डी में खुला रखना पड़ता है। उसकी सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं। बरसात हो जाए तो सारा नुकसान किसान को ही झेलना पड़ता है। कोई नेता, कोई अफसर उसकी मदद पर नहीं आता।

कल मेरी यह बात सच हो गई। कल रात हुई बरसात से किसानों का, मण्डी में, खुले में रखा प्याज गीला हो गया। यह नुकसान किसानों को ही सहन करना पड़ेगा। मण्डी सचिव ने किसानों की चिन्ता की और अमूल्य सलाह दी - ‘किसान अपनी उपज तिरपाल या अन्य साधनों से ढँक कर लाएँ ताकि बरसात होने पर उनकी उपज सुरक्षित रहे।’
चित्र - गुरुवार की रात हुई बरसात से भीगे प्याज। चित्र सौजन्य - ‘पत्रिका’।

8 comments:

  1. सब मिली भगत ही तो है अब आन्दोलन कहाँ तक सफल होगा ये देखने की बात है.
    लेकिन अब किसान भाइयों को उनकी मेहनत का उचित रेट मिलना ही चाहिए.
    उनकी जायज मांगे पूरी होनी चाहिए.
    सार्थक लेख.

    कविता और मैं

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  2. किसान वैसे भी राम भरोसे ही रहता है हर जगह यही हाल है आज के समय में किसान होना ही अपराध है

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  3. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति कमजोर याददाश्त - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं आपकी अपेक्षानुरूप आचरण नहीं कर पाता। चाह कर भी। मुझे क्षमा कर दीजिएगा।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (03-06-2018) को "दो जून की रोटी" (चर्चा अंक-2990) (चर्चा अंक-2969) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद। कृपा है आपकी।

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  5. किसानों की दुर्दशा का जीवंत वर्णन।

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  6. किसान हितेषी शिवराज मामा की आंख खोलने के लिये ये पोस्ट उन्हें भी भेजना चाहिए ।

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आपकी टिप्पणी मुझे सुधारेगी और समृद्ध करेगी. अग्रिम धन्यवाद एवं आभार.