बाबा! बहुत रुलाया था आपने

आज दादा श्री बालकवि बैरागी की पाँचवीं पुण्य तिथि और चौथी बरसी है। पत्रकारिता में ‘प्राधिकार’ (अथॉरिटी) की हैसियत प्राप्त, मध्य प्रदेश के सुपरिचित पत्रकार डॉक्टर राकेश  पाठक (ग्वालियर) ने दादा की मृत्यु के चौथे ही दिन, 16 मई 2018 को अत्यन्त आत्मीय भावाकुलता से दादा को याद किया था। राकेशजी का नयनजलसिक्त यह संस्मरण और चित्र मुझे karmveer.org से प्राप्त हुआ है। साभार प्रस्तुत है। 




बाबा कहते थे -

‘झर गए पात..
बिसर गयी टहनी
करुण कथा जग से क्या कहनी।’

लेकिन बाबा मैं आज करुण कथा जग से कहूँगा। कहूँ भी क्यों नहीं? कितना रुलाया था आपने हम सबको! 

सन 2006 की बात है। नवभारत में सम्पादक रहने के दौरान कोसोवो (पूर्व युगोस्लाविया) गया था। यूएन मिशन की रिपोर्टिंग करने बाद मैं नईदुनिया में सम्पादक बना तब इस यात्रा पर किताब छपी।

ग्वालियर में मेरी इस पहली किताब ‘काली चिड़ियों के देश में’ (यूरोप का यात्रा वृत्तांत) के विमोचन समारोह में आप मुख्य अतिथि थे। वरिष्ठ साहित्यकार चित्रा मुदगल, भाषाविद् प्रो. सत्येन्द्र शर्मा और वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल साथ मंचासीन थे। कवि मित्र पवन करण संचालन कर रहे थे।

‘पहलौठी’ किताब का विमोचन था सो बहुत उमंग थी। पवन ने औपचारिकताएँ पूरी की ही थीं कि आपने अचानक माइक थाम लिया। जोर से डाँटते हुए कहा - ‘राकेश!’ (सब सन्न रह गए। मुझे कुछ समझ नहीं आया।) फिर आपने कहा - ‘तेरी किताब का विमोचन है। तू मंच पर बैठा है और माँ सामने श्रोताओं में? जा! माँ को लेकर ऊपर आ।’

मैं माँ को लेकर आया। मंच पर बैठाया।

बाबा फिर दहाड़े - ‘और उसे भी लेकर आ जिसके बिना तू अधूरा है। बहूरानी को भी मंच पर साथ बैठा।’ मैं प्रतिमा (अब स्मृतिशेष) को लेकर आया।

बाबा ने मेरे ही हाथों माँ और पत्नी का स्वागत कराया। फिर भरपूर नेह से बोले - ‘बेटा राकेश! इन दोनों के बिना तू ये किताब लिख ही नहीं सकता था।

बाबा ने अपने भाषण में जो कुछ कहा वो सबको आँसुओं के समन्दर में डुबा देने को काफी था।

बाबा हर रचना लिखते समय कागज पर सबसे पहले ‘माँ  शब्द लिखते थे। अपनी माँ को याद कर उन्होंने अपने ‘भिखमंगे’ या ‘मंगते’ होने की बात बताई। (ये उनकी माँ का आशीष ही है कि उन्होंने ‘मातृ दिवस’ को प्रस्थान किया) बाबा कहते - ‘हम लोग भिखारी नहीं भिखमंगे थे।’ कहते, ‘भिखारी फिर भी थोड़ा अच्छा शब्द है मैं तो भिखमंगा था। हमारी माँ ने हमें बनाया। सँवारा।’ वे खुद को माँ का सृजन कहते थे।

बाबा ने पूरी जिन्दगी माँग कर ही कपड़े पहने। अपने पैसे से कपड़े नहीं खरीदे। कहते थे - ‘माँग कर पहनता हूँ ताकि भूल न जाऊँ कि मैं मंगता हूँ।’ (बाबा की बहुचर्चित किताब का नाम - ‘मंगते से मिनिस्टर तक’ है।) बाबा सांसद, मन्त्री सब रहे लेकिन अपनी जमीन से हमेशा जुड़े रहे।

बोली लगवा कर 25 हज़ार में बिकवाई किताब-

विमोचन समारोह में बाबा ने एक प्रति पर मेरे और सभी अतिथियों के दस्तखत करवाये। फिर खड़े होकर कहा कि - ‘ये किताब वैसे तो सौ रुपये की है लेकिन मैं इसकी नीलाम बोली लगवा रहा हूँ। इसकी जो सबसे ज्यादा कीमत अदा करेगा उसे ये किताब मिलेगी। ये रकम गरीब बच्चों की पढ़ाई में खर्च होगी।’

सभागार में होड़ लग गई। देखते-देखते किताब की बोली हजारों में पहुँच गई।

आखिर में नगर निगम की जनसम्पर्क अधिकारी आशा सिंह ने 25 हज़ार रुपयों की बोली लगाई। उन्होंने रुँधे गले से कहा - ‘ये किताब मैं ही खरीदूँगी।’ सारे सभागार में आँसुओं का सैलाब आ गया। बाबा, चित्रा मुदगल और हम सब रो रहे थे।

बाबा ने रोते हुए कहा- ‘इस बेटी के आँसुओं से ज्यादा मूल्यवान कुछ नहीं हो सकता। अब 25 हजार से ज्यादा भी कोई बोली लगाएगा तो किताब नहीं दूँगा।’ बाबा ने मंच पर बुलाकर आशा सिंह को किताब की प्रति भेंट की।

आप बहुत याद आओगे बाबा।

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7 comments:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(१४-०५-२०२२ ) को
    'रिश्ते कपड़े नहीं '(चर्चा अंक-४४३०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद। बड़ी कृपा है आपकी।

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  2. मार्मिक संस्मरण! इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई भाई बैरागी जी!

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद। मूल पूँजी तो रकेशजी की है। मैं तो केवल हरकारा हूँ।

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  3. बहुत सुंदर संस्मरण।

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  4. This comment has been removed by a blog administrator.

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